हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“तुम्हें मेरी बात की कभी परवाह ही नहीं रही…” साक्षी की आँखें भर आईं।

अभिषेक ने थके स्वर में कहा, “ऑफिस की परेशानियाँ थीं… इसलिए चुप था।”

कुछ दिनों बाद साक्षी पूरे दिन खामोश रही।

अभिषेक झल्लाया, “हर बात पर चुप्पी क्यों? रिश्ते ऐसे नहीं चलते!”

साक्षी ने उसकी ओर देखा और धीमे से बोली—

“जब तुम चुप रहते हो, उसे तनाव कहते हो…जब मैं चुप रहती हूँ, उसे अहंकार क्यों कहते हो?”

अभिषेक के पास कोई उत्तर नहीं था।

साक्षी की आवाज़ काँप गई-

“तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारी झुंझलाहट और तुम्हारा दर्द मैं पढ़ लेती हूँ। मेरी आँखें भीग जाएँ, तो तुम मेरा व्यवहार पढ़ते हो… मेरा दर्द नहीं।”

कमरे में सन्नाटा था।

अभिषेक ने उसका हाथ थाम लिया।

“मुझे माफ़ कर दो,” उसने कहा, “मैं तुम्हारी गलतियाँ देखता रहा, तुम्हारी थकान नहीं।”

साक्षी मुस्कराई, “पति-पत्नी तब एक नहीं होते जब दोनों सही हों… बल्कि तब होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे की गलतियों को भी एक ही दिल और एक ही तराजू से तौलें।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२४ – रिश्ते जिंदा है क्या?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # १२४ – देशभक्ति का आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यालय में देशभक्ति पर भाषण प्रतियोगिता होने वाली थी। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा, “बच्चो, बताओ, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में तुम क्या जानते हो?”

एक बच्चा सहजता से बोला, “मैडम, आप चिंता मत कीजिए। हम गूगल से भाषण खोजकर याद कर लेंगे। इस बार प्रतियोगिता हम ही जीतेंगे।”

शिक्षिका ने गंभीर होकर पूछा, “बेटा, बात केवल प्रतियोगिता जीतने की नहीं है। क्या तुम जानते हो कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई ने देश के लिए क्या किया था?”

बच्चा बोला, “मैडम, इंटरनेट पर सब मिल जाएगा।”

शिक्षिका ने कहा, “इंटरनेट जानकारी दे सकता है, उनके त्याग का एहसास नहीं। राष्ट्रभक्ति केवल भाषण देने का नाम नहीं, उसे जीवन में उतारना भी जरूरी है।”

बच्चा कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मैडम, जब आज भी शिक्षा व्यवस्था में इतनी समस्याएँ हैं, परीक्षाओं में धांधली होती है और पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, तब हम राष्ट्रभक्ति की बातें क्यों करें?”

शिक्षिका ने कहा, “इसीलिए तो पढ़ो बेटा! राष्ट्रभक्ति केवल ‘भारत माता की जय’ बोलना नहीं है। ईमानदारी से पढ़ना, नकल न करना, गलत के विरुद्ध आवाज उठाना और अपने कर्तव्य को निष्ठा से निभाना भी राष्ट्रभक्ति है।”

बच्चा मुस्कुराया, “तो मैडम, इस बार मैं गूगल से भाषण याद नहीं करूँगा। पहले अपने देश को समझूँगा, फिर देश के लिए कुछ करने की कोशिश करूँगा।”

शिक्षिका की आँखों में संतोष उतर आया।

तभी बच्चा फिर बोला, “लेकिन मैडम, एक बात पूछूँ? अगर मैं सच बोलूँगा, नकल नहीं करूँगा और गलत के खिलाफ आवाज उठाऊँगा… तो क्या अगली बार भी मुझे भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने के लिए गूगल से ही कोई ‘सफलता का मंत्र’ ढूँढ़ना पड़ेगा?”

शिक्षिका निरुत्तर थीं।

कक्षा में सन्नाटा छा गया।

बाहर विद्यालय की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ अच्छा लिखा था।

बच्चे ने उस वाक्य को देखा और धीमे से मुस्कुराया।

शायद उस दिन पहली बार उसने ‘सत्यमेव जयते’ पढ़ा नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े होकर देशभक्ति का असली आईना देख लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ – श्याम पट ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा श्याम पट”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ ☆

🌻लघु कथा🌻 श्याम पट 🌻

गिरधारी लाल आज कमरे की दिवाल पर काले रंग का श्याम पट बनवा रहें हैं। दौड़ता हुआ पारस—- पास आकर

दादा जी ये क्या बना रहे?

(ब्लैक ब्लैक)

आज के बच्चे रंगों को रेड ब्लू, ग्रीन, यलो—से ही पहचानते हैं

धूमिल हो गई सिंदूरी रंग, भोर की लालिमा, गोधूली की बेला—

दादा जी ने बाल सुलभ चंचलता को आंकते कहा–यहाँ तुम लिखाई करोगे और एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनोगे। पारस गले में झूल गया मुझे तो आपके जैसा बनना है पापा तो दिनभर मोबाइल चलाते है क्या आपने उन्हें ये बोर्ड नही बनवाया था।

दादा ने कनकी लगा देखते फुसफुसा कर कहने लगे – – मोबाइल रिश्तों को काला करने लगा श्याम पट में आज भी वो ताकत है, जो परिवार जोड़ रखेगा।

देखते है श्याम पट पर पारस की छूअन कंचन बन कर कैसे निखरेगी। दादा श्याम पट को ध्यान से देखने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ईडन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा –  ईडन ? ?

…..उस रास्ते मत जाना, आदम को निर्देश मिला। आदम उस रास्ते गया। एक नया रास्ता खुला।

….पानी में खुद को कभी मत निहारना। हव्वा ने निहारा। खुद के होने का अहसास जगा।

 ….खूँख़ार जानवरों का इलाका है। वहाँ कभी मत घुसना।….आदम इलाके में घुसा, जानवरों से उलझा। उसे अपना बाहुबल समझ में आया।

…..आग से हमेशा दूर रहना, हव्वा को बताया गया। हव्वा ने आग को छूकर देखा। तपिश का अहसास हाथ और मन पर उभर आया।

….उस पेड़ का फल मत खाना। आदम और हव्वा ने फल खाया। ईडन धरती पर उतर आया।

 

?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 8.09, 29.7.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ६ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # ६ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

(चित्र साभारश्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)

≡ छः ≡

आशी को, पहले तो कोई साड़ी पसंद नहीं आ रही थी और अब एक घंटे से, ड्रेसिंग-टेबल के सामने डटी बैठी है!

पूछता हंू, ”आखि़र यह सब करने की ज़रूरत क्या है?”

वह केवल मुस्करा देती है।

“स्त्रियां अपने को कभी नहीं बदल सकतीं!” मैं खीज कर कहता हूं।

”और स्त्रियों के हर मामले में, पुरूषों की दख़ल देने की आदत कभी नहीं जा सकती!”

कहने के बाद, वह फिर मुस्करा पड़ती है।

“अर्चना कहां है?” पूछता हूं।

”लेटी है।”

“क्यों? वह नहीं चलेगी हमारे साथ?”

”कहती है, रेस्ट करना चाहती हूं।”

“कमाल है! कल रात उसने क्या कहा था, याद है?”

”कल रात, हम दो बजे तक जागती रहीं। बातें ही ख़त्म नहीं हो रही थीं और अब उसे नींद आ रही है।”

“जाओ, तुम भी सो जाओ जाकर!” चिड़ कर कहता हूं।

”ना… मुझे तो साथ ही चलना है… आप के साथ साथ क़दम से क़दम मिलाकर… ज़रा देखूं तो वहां जाकर, वह क्या चीज़ है, जिसकी बार बार सराहना करते, दोनों भाई बहन नहीं अघाते!”

“अब तो सुना है, वह पहचानी भी नहीं जाती।”

”तब भी, मिसमार खंडरात को देख कर भी, इमारत की बुलंदी और शानोशौक़त का अन्दाज़ा हो ही जाता है!”

“तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है! उस बेचारी से ज़रा भी सहानुभूती नहीं?”

”मुझे तो आप से भी काफ़ी सहानुभूति है!”

औरत हमेशा औरत ही रहेगी! लाख पढ़-लिख जाये। समझदार और योग्य भी कहलाने लगे, किंतु अपनी इन शंकाओं और ईष्र्या से वह कभी मुक्त नहीं हो सकती! इसे साथ ही न ले जाऊं, तो?

मगर साथ जाये बिना, क्या वह टल जायेगी?

ठीक है, चली चलने दो साथ। ज़रा इसे भी तो पता चले, सौंदर्य क्या होता है। अपने को बहुत समझती है न! बड़ा ही नाज़ है इसे अपनी खूबसूरती पर! यह चार बार साड़ी बदल ले। दिन भर डेªसिंग टेबल के सामने बैठ कर बनती संवरती रहे, मगर मीता के सामने टिक पाने में कहां समर्थ होगी?

मीता पर लाख मुसीबतें टूटें, तब भी उसका सौंदर्य नष्ट नहीं हो सकता। आशाी को उसके सामने ग़रदन झुकानी ही पड़ेगी।

 

अर्चना वाक़ई हमारे साथ नहीं चल रही है।”उसे हरारत सी लग रही है। थोड़ा चिंतित हो जाता हूं।”

”चलो, पहले तुम्हें डाक्टर को दिखा दें।” मैं कहता हूं, तो वह मुस्कराने लगती है।

“दवा ले लेनी चाहिये।” आशी भी अपनी राय ज़ाहिर करती है।

उसके ‘चाहिये’ का वही उच्चारण है, लेडी टीचरों वाला!

अर्चना निश्ंिचत सी कहती है, ”ऐसा कुछ भी तो नहीं। आप तो यों ही चिंतित हो रहे हैं। मामूली थकान है, एक-आध दिन में वैसे ही ठीक हो जायेगी।”

“तो फिर उधर?”

”आप दोनों वहां हो आइये। मैं फिर किसी दिन जाकर मिल लूंगी मीता से।”

 

मीता अब तक काफी बदल गई होगी। कैसी नज़र आती होगी अब?। मिलने पर बात क्या करूंगा उससे? क्या पूछूंगा?… मुझे देखते ही वह हड़बड़ा सी जायेगी। टकटकी लगा कर देखती रहेगी… आंखों में जल भर आयेगा… फिर अचानक मुस्कराने या हँसने का प्रयास करेगी।

कहेगी, ”सो यु हैव कम।”

”यह क्या हालत बना रखी है?” पूछूंगा।

वह फिर उदास हो जायेगी… मगर मेरे साथ आशाी भी तो होगी। इसे साथ देख, वह पहले तो चैंक जायेगी। फिर अनुमान लगाकर, उसे एक बार तो झटका सा लगेगा। वह ज़रा सम्भलेगी और पुनः मुस्कराने की चेष्ठा करेगी और पूछेगी, शादी कब हुई?”

”तीन साल हो गये।”

“मुझे क्यों नहीं इन्वाइट किया शादी पर?”

मैं चुप हो जाऊंगा। उसकी ओर टकटकी लगाये देखता रहूंगा।

मगर आशी, वह इतनी देर कैसे चुप रह सकेगी? वह ज़रूर पूछेगी, ”हमारे साथ चलोगी?”

उसकी आंखों में एकाएक चमक आ जायेगी। किंतु वह चमक, देखते ही देखते अदृश्य हो जायेगी। मैं प्रश्न करूंगा, ”तुम्हारे अंकल कैसे हैं?”

“ठीक ही हैं!”

चाहूंगा, आशाी थोड़ी देर के लिये इधर उधर हो जाये, ताकि एक बार पूछ सकंू, ”मीता एक बार इतना तो बता दो कि …“

 

अर्चना द्धारा बताये पते के अनुसार, थ्री व्हीलर से यहां तक आने में अनुमान से भी अधिक देर लग गई है। शहर के बिल्कुल आखिरी छोर पर बसी, यह नई काॅलोनी है।

आशी के चेहरे से लगता है, उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई है।

“क्या बात है, कुछ परेशान-सी लगती हो?” पूछता हूं।

”आप के वहम का इलाज, लुकमान हक़ीम भले न कर सके, मैं ज़रूर कर सकती हूं।”

“बेशक कर सकती हो!”

 

काफी बड़ी काॅलोनी है। पूछतेे पूछते, यहां तक आ ही पहंुचे हैं। मकानों की संख्या पढ़ते पढ़ते, एक डबल स्टोरी मकान के आगे हम रूक जाते हैं। बड़ा उम्दा डिज़ाइन है मकान का! बहर लकड़ी के गेट पर जैसे नया पेंट हुआ है।

गेट के पार काफी खुला प्रांगन है, जिस का फर्श बहुत चिकना मालूम दे रहा है। मेरी नज़र शायद किसी गमले में खिले फूल या रात की रानी के पौधे को खोज रही है।

काॅलबेल का बटन दबाने के एक मिनट बाद दरवाज़ा खुलता है।

एक महिला दरवाज़े में खड़ी हैं।

”कहिये?”

“श्री एन0 मोहन यहीं रहते हैं?”

”वे लोग पिछले पोर्शन में रहते हैं। उस ओर से जाकर पीछे… मगर वे लोग तो आप को इस समय नहीं मिल सकेंगे।”

“कहीं बाहर गये हुए हैं?”

”कल दिन में वे काफी सीरियस हो गये थे। डाक्टर को घर बुला कर दिखाया। उसने इंजेक्शन दे दिया। साथ ही यह कहा, इन्हें फ़ौरन दिल्ली ले जाइये। बस कल ही रात की ट्रेन से, उनकी लड़की, उन्हें दिल्ली ले गई।”

मैं पूछता हूं, ”कुछ पता चला होगा, वहां कौन से अस्पताल में उन्हें ले जाने को डाक्टर ने कहा था?”

”यह तो हमें नहीं मालूम। वे लोग कभी किसी से बातचीत तो करते नहीं। कल दिन में डाक्टर आया, तो उनकी लड़की से बात हुई। शायद मीता नाम है उसका?”

“जी।”

अजीब स्थिति है!

आशी, जैसे उकता कर कहती है, ”चलिये अब, यहां कब तक खड़े रहेंगे!”

तभी महिला चैंक कर और लज्जित सी होकर कहती है, ”अरे अरे, मैं भी बस क्या हूं! आप तो काफी दूर से आये लगते हैं। भीतर आइये न।”

”बस, चलें।”

“ऐसी भी क्या बात है! पानी वानी पीकर जाइये।”

”थैंक यू।” कह कर आशी बाहर की ओर मुड़ती है।

मैं भी सिर झुकाये, पीछे हो लेता हूं।

आशी रूक जाती है। हम दोनों पीछे घूम कर देखते हैं।

महिला, अभी तक खुले दरवाज़े में मौजूद है।

“मीता जब लौटे, तो हमारे बारे में बता देंगी न?”

”आप?”

आशाी मेरा नाम बता देती है।

 

आशी चुपचाप मेरे साथ चल रही है। मैं भी चुप हूं। वह अचानक ही बोल उठती है, ”आप का यह शहर तो बहुत खूबसूरत मालूम पड़ता है। यहां से, इतने साल रहने के बाद जब गये होंगे, तो वाक़ई अफ़सोस हुआ होगा।”

मैं कुछ नहीं कहता। वही बोलती है, ”कल सुबह तो हम लोग, यहां से लौट जायेंगे। आप आज दिन दिन में ही शहर घुमा दीजिये। लोग तो न जाने कहां कहां से इधर पर्यटन के लिये आते हैं।”

उन्हीं रास्तों से एक बार फिर गुज़र रहा हूं। आज अकेला नहीं हूं, आशी साथ है। आशी के साथ साथ, जैसे एक परछाई सी भी हमारे साथ चल रही है…

यह परछाई, मेरी या आशी की नहीं, यह परछाई, उदासी की है।

आशी को शहर की ख़ास-ख़ास जगह दिखा दी है। उसे यहां बहुत ही अच्छा लगा है। वह प्रसन्न और आनन्दित सी लग रही है।

शाम घिर आई है। लोकल बस पकड़ कर, हम वापिस फैक्टरी एस्टेट पहुंच गये हैं।

स्ट्रीट लाइट, न जाने क्यों ग़ायब है। किंतु क्वार्टरों के भीतर, बत्तियां जल रही हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे क्वार्टर न होकर, ये किसी रेलगाड़ी के डिब्बे हों। दोनों ओर रेलगाड़ियां, जैसे रात के वक़्त, किसी स्टेशन पर रूकी खड़ी हों!

आसपास से गुज़रते चंद स्त्री-पुरूष, जैसे हमें पहचानने की कोशिश करते हैं।

“बाहर के लगते हैं।” एक कहता है।

बाहर के! मैं सोचने लगता हूं। ज़हन में ‘साहिर’ का एक शेर उभरने लगता हैः-

हम इन्हीं फ़िज़ाओं के पाले हुए तो हैं

गर यां नही ंतो यां से निकाले हुए तो हैं

शेर के साथ साथ उस्ताद सोहन लाल की याद भी आ जाती है। वे दिन भी, क्या दिन थे!

विचार भंग होता है। आशी कुछ कह रही है। उसकी ओर ध्यान देता हूं।

”बेचारी मीता!” वह जैसे अफ़सोस ज़ाहिर कर रही हो!

मैं उसकी ओर ग़ौर से देखने की कोशिश करता हूं। वह कह रही है, ”दिल्ली जैसे बड़े शहर में, न जाने वह उसे लेकर, कहां मारी मारी फिर रही होगी! वह अकेलीे कैसे इस तरह के मरीज़ का इलाज करा पायेगी और जब वह इतना सीरियस है, तब बचेगा, तो क्या ही! कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया, तो क्या करेगी? कैसे सम्भालेगी उसे?… और वह सब हो जाने के बाद, वह खुद कहां जायेगी? करेगी क्या वह?

मैं चुप हूं।

“आप क्यों इतना उदास हो रहे हैं? यह तो संसार है, इस जीवन में, न जाने सुबह शाम, क्या कुछ घटता बढ़ता रहता है। मगर… काश! मैं उसे एक बार देख पाती!”

मैं अब भी ख़ामोश हूं।

”इतना मत सोचिये। आप को मैं एक बात बताऊं?”

मेरे ‘बताओ’ कहे बिना ही, वह अपनी बात कहने लगती है… कल रात अर्चना से मेरी खूब बातें हुई, दो बज गये थे बातें करते हुए… आपने पूछा नहीं, कि तब क्या क्या बातें हुईं?”

मैंने तब भी कुछ नहीं पूछा।

”चलो, ठीक है, मैं बिना पूछे ही बता देती हूं।”

वह ज़रा सा रूकने के बाद फिर शुरू हो गई है…

“मैंने अर्चना से पूछा, ”तुमने अरूणा को पढ़ा लिखा दिया उसकी शादी भी कर दी। अब अपने बारे में क्या सोचा है? बस, चुप! जैसे अकसर आप चुप रहा करते हैं, बिल्कुल वैसे ही! उसकी चुप्पी देख तो ऐसा ही लगता है, जैसे वह सचमुच ही आप की सगी बहन हो!… मैंने तो उस से कह दिया, तुम यह काम वाम छोड़ कर किसी आश्रम में जा बैठो। सुबह शाम कीर्तिन किया करना और खड़तालें बजाना। वहां पर, कम से कम, पांच-सात साथ देने वाले तो होंगे। आने जाने वालों से, दो बातें करोगी, तो थोड़ा दिल भी बहलेगा। यहां क्वार्टर में अकेली पड़ी, घुट घुट कर मर जाओगी। कोई पूछने वाला भी न होगा!… मगर वह अर्चना तो… उसी तरह गुम सुम। मैं हैरान परेशान, आखि़र इस लड़की के मन में क्या है? मैं स्कूल में पढ़ाती हूं। इतने-सारे लड़के-लड़कियों और उनके मात-पिता से वास्ता पड़ता है। सभी की बातें, मेरी समझ में आ जाती हैं। मगर यह लड़की तो, बस क्या कहूं! जब वह किसी भी तरह खुल कर बात करने के लिये तैयार ही नहीं हुई, तो मैंने एक अन्य बात भी पूछ ही ली। कहा, अर्चना, एक बात तो बताओ, आखि़र तुम किस के लिये इस तरह घुट घुट कर मर रही हो? तब जानते हैं उसने क्या कहा?”

मैं फिर उसकी ओर, अंधेरे में ही तकने लगा हूं। वह धीरे धीरे चलती और तेज़ तेज़ बोलती जा रही है…

कुछ लोग, क्वार्टरों से निकल कर सड़क पर आ गये हैं। उन्हांेने बग़ल में चादर या कम्बल दबा रखे हैं। लगता है, फैक्टरी में नाइट शिफ़्ट फिर से शुरू हो गई है।

आशी की वार्ता, बदस्तूर जारी है। मैं पुनः उसकी ओर ध्यान देने का प्रयास करता हूं। वह थोड़ा इधर उधर देख कहती है, ”कहीं हम, अर्चना का क्वार्टर पीछे तो नहीं छोड़ आये? स्ट्रीट लाइट के बिना तो कुछ भी पता नहीं चल रहा!”

किंतु शीघ्र ही वह आश्वस्त होकर कहती है, ”नहीं, हम ठीक ही चल रहे हैं। वह रही प्राइमरी स्कूल की इमारत और वह डिस्पैंसरी। उसके बाद जो ब्लाॅक शुरू होता है, उसी में तो है अर्चना वाला क्वार्टर… मैं कुछ कह रही थी। क्या कह रही थी?”

मैं कुछ नहीं कहता। वही बोलती है,

”हां, याद आया… वह बात तो बीच में ही रह गई! मैंने अर्चना से कहा, आज हम लोग तुम्हारे पास बैठे हैं। कल चले जायेंगे। फिर क्या जाने, कब आना हो! तब किस से कह पाओगी अपने मन की बात? अब तो अरूणा भी पास नहीं होगी, जो पूछ ले, क्यों उदास हो, या क्यांे रो रही हो। कोई नहीं होगा पास चुप कराने को…!

”मेरी यह बात सुन उसने चुप्पी तोड़ ही डाली। बोली, अरूणा की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी। मां को मैंने वचन दिया था। न भी दिया होता, तब भी मुझे यह ज़िम्मेदारी निभानी ही थी। सो, जितना कर सकती थी, मैंने जैसे-तैसे कर ही दिया। अब मेरी अपनी ज़िम्मेदारी, तो आप दोनों पर है… सुन कर मैं फूले नहीं समाई। सच मानो, बड़ा ही प्यार आया उस पर! बस, अब वहां पहुंच कर, कोई अच्छा सा लड़का तलाश कर लेंगे। हम जो भी करेंगे, उसे स्वीकार होगा। वह मुझे वचन दे चुकी है… अरे, आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे!”

 – समाप्त –

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ५ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # ५ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

(चित्र साभारश्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)

≡ पांच ≡

आशी अभी अभी उठ कर किचिन में गई है। चाय की तलब लगी होगी। एक कप चाय, उसके पेट में पहुंचेगी, तभी वह कुछ कहने या सुनने के योग्य हो पायेगी। चाय के बिना वह रह ही नहीं सकती और खूबी यह, कि कप पर कप चढ़ाती जायेगी और पूरी चाय, मेरे नाम लिखती जायेगी!

कल, जब लोग एक एक करके, अर्चना को शगुन के लिफ़ाफे और गिफ़्ट-पैकेट पकड़ाते जा रहे थे, मैंने दो तीन बार आशी की ओर देखा। मगर वह बिल्कुल निश्ंिचंत और तटस्थ सी बैठी थी। मैने उसे अलग बुला कर पूछा, ”हमें भी तो कुछ देना चाहिये था।”

वह निश्ंिचंत-सी बोली, ”आप को ऐसी क्या जल्दी हो रही है!”

“जल्दी? शादी तो आज ही है न!”

वह मुस्कराई और उठ कर अपने एक ओर रखे सामान के पास चली गई। अटैची खोल, एक डिबिया निकाली। फिर चेक बुक निकाल कर एक चेक भरा।

आशी ने टोपस की जोड़ी मुझे दिखा दी। मगर चेक मुझे नहीं दिखाया। दोनों चीज़ें, उसने अर्चना को थमा दीं। अर्चना ने चेक देखा, तो चैंक कर बोली, ”भाभी यह क्या! न न… मैं इतने नहीं लूंगी।”

“बोलने की ज़रूरत नहीं, चुपचाप रख लो।”

”मगर…“ अर्चना ने मेरी ओर देखा। मैंने हंस कर कहा, ”एक तो तुम्हारी भाभी, रिश्ते में बड़ी और फिर टीचर भी! तुम्हारा कोई तर्क नहीं चल पायेगा।”

बाद में मैंने आशी से पूछा, ”चेक में कितना लिखा था?”

वह हंस कर बोली, ”चेक में, आज की तारीख डाल दी, अर्चना का नाम लिख दिया और अपने हस्ताक्षर भी कर दिये। एकाऊंट नम्बर पहले ही लिखा हुआ था।

“मतलब, रूपये कितने लिखे, यह नहीं बताओगी?”

”आप को क्या लेना इन बातों से! यह मेरा काम था, मैंने कर दिया।”

“अर्चना इतने क्यों कह रही थी?”

”रिश्ते निभाने में, स्त्री और पुरूष का नज़रिया अलग अलग होता है, हम स्त्रियों को, बातें बनाने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ देखना पड़ता है। आप की समझ में ये बातें नहीं आने की!”

वह दो गिलासों में चाय लिये आ पहुंची है। एक गिलास मेरे हाथ में थमा, वह स्वयं कुर्सी पर बैठ कर सिप करने लगती है,

“अर्चना को भी जगा देना था?” मैं कहता हूं।

”मैं उसे चाय देकर आई हूं।”

तीन-चार घंटे की गहरी नींद लेकर, अर्चना सामान्य नज़र आने लगी है और खूब बातें कर रही है। फैक्टरी में इस दौरान क्या क्या परिवर्तन हुए हैं। कितनी प्रमोशनें हुई हैं। कौन कौन-सी नई इमारतों का निर्माण हुआ है। कितनी भीड़ होती है अब सुबह शाम फैक्टरी के गेट पर… बहुत से पुराने लोग, रिटायर हो चुके हैं। कितने ही नये भरती हो गये हैं। अनुशासन अब पहले जैसा नहीं रहा। काफी बिगड़ गया है। कोई किसी की सुनता ही नहीं…”

”यूनियन-बाज़ी कैसी चल रही है?”

“आडम्बरबाज़ी कहिये। जो नेता, दिन में, ऊंची आवाज़ में नारे लगाते हैं, अफ़सरों को गालियां देते हैं, वही शाम को बेंगलो एरिया में जाकर अफ़सरों को मस्का लगाने का काम करते हैं। नेताओं की, आपस में ही होड़ लगी रहती है। वे हर वक़्त एक दूसरे की टांग खींचने मंें ही लगे रहते हैं।”

”अफ़सरों का व्यवहार कैसा है अब?”

“पहले जैसा तो नहीं। मगर आजकल के अफ़सर बहरूपियों जैसे नज़र आते हैं।”

”वह कैसे?”

“एक मिनट में कुछ और दूसरे मिनट कुछ और।”

”यह बात तो पहले भी थी।” मैं कहता हूं।

“पहले कुछ दूसरे ढंग से होता था। अब एक ओर तो वे यह ज़ाहिर करते हैं, कि वे समाजवादी हैं, सभी को बराबर मानते और समझते हैं और भीतर ही भीतर, अपने को कुशल प्रशासक समझ कर, पुराने हथकंडे प्रयोग में लाते रहते हैं।”

”अब तो फैैक्टरी में और भी लड़कियां काम करने लगी होंगी?”

“भीड़ लग गई ह ैअब तो लड़कियांे की! दिनभर धमाचैकड़ी मचाये रखती हैं। काम कम और बातें अधिक!”

”लड़के, छेड़ख़ानी तो नहीं करते उनसे?”

“छेड़ख़ानी? कुछ दिन पहले की बात है, एक क्लर्क ने रिपोर्ट कर दी, कि जब वह नल पर पानी पीने जाता है, उसे लड़कियां छेड़ती है।”

मैं हंसने लगा। फिर जैसे अचानक ही कुछ याद आ गया हो।

पूछा, ”मीता कहां है आजकल?”

“यहीं है।”

”उसे निमंत्रण नहीं दिया था?”

“बिल्कुल दिया था।”

”फिर आई क्यों नहीं? कहीं बीमार न हो?”

“उसे बीमार ही समझिये!”

”मतलब?”

“वह आजकल, कहीं इधर उधर नहीं जाती।”

”क्यांे? कोठी में ही बंद रहती है?”

“कोठी में कहां! वे लोग आजकल शहर में रहते हैं। दरअसल, मीता के अंकल को लकवा हो गया था। बहुत इलाज कराया, मगर कुछ भी लाभ न हुआ। सर्विस पूरी होने से दो साल पहले ही रिटायरमेंट लेना पड़ गया। आजकल शहर में, वे किराये के मकान में रहते हैं। मीता और उसके अंकल।”

 

मीता अभी तक उसके साथ है, मैं इसी बात के बारे में सोच कर आश्चर्य किये जा रहा हूं। मीता और ‘वह’ उसका अंकल एन0 मोहन। वही मैनेजर, जिसके बारे में अर्चना ने बताया, कि उसका शरीर बेकार हो चुका है।

मीता की अंाटी, जिन के ट्रंक अलमारियां, रंग बिरंगे रेशमी और क़ीमती वस्त्रों से भरे रहते थे और वे स्वयं, सफे़द साड़ी ब्लाउज़ में, पति के होते हुए भी, सूनी मांग लिये, घंटों चुपचाप, छोटे से कमरे में अलग थलग बैठीं, छत और दीवारों को ताकती रहती थीं।

 

उस दिन भी, वे सफ़ेद परिधान में, फ़र्श पर लेटी, छत को ही जैसे ताके जा रही थी। नहीं मालूम, क्या सोचते हुए, उनकी चेतना सदा के लिये लुप्त हुई होगी!

सभी कुछ समाप्त हो गया था। किंतु वे आंखें, जो उनके द्धारा पहने गये वस्त्रों की तरह ही सफ़ेद हो चली थीं, ऊपर छत से, जैसे किसी प्रश्न का उत्तर मांग रही थीं।

एन0 मोहन स्वयं ‘केबल’ द्धारा, दोनों बेटों को सूचित करने कहीं गया था। उसका अपना फ़ोन न जाने कब ख़राब हो गया था।

यह भी पता चला, कि वह डाक्टर को साथ लेकर, पुलिस स्टेशन गया था। वहां से लौट कर वह बैंक पहुंचा और एक भारी रकम निकलवा कर, किसी बड़े पुलिस अफ़सर की कोेठी पर भी गया था।

बड़े बेटे से, उस की बात ही नहीं हो पाई। छोटा, बड़ी ही बेरूख़ी से पेश आया। कहने लगा, ”मां चली गई, हमारे लिये सभी कुछ समाप्त हो गया। अब हमारे आने या जाने का मक़सद ही क्या रह जाता है!”

एन0 मोहन ने कुछ और कहना चाहा, तो उत्तर और भी कड़वा मिला, ”आप के लिये तो यह अच्छा ही हो गया। अब आप के सभी रास्ते साफ़ हैं, जो जी में आये, करते जायें। कोई भी रोकने-टोकने वाला नहीं।”

किंतु एन0 मोहन, इतना जल्द हारने वाला व्यक्ति नहीं था। अपने पद, धन और चातुर्य के बल पर, उसने सभी कुछ ठीक ठाक कर लिया था और वह कुछ ही दिन बाद, उसी तरह अकड़ के साथ और तन कर फैक्टरी की सड़कों पर और सेक्शनों में गश्त लगा रह था, जैसे इस बीच कुछ भी न हुआ हो!

तब भी, उसके पूरे अभिनय के बावजूद, देखने वाले को यह पता चल ही जाता था, कि वह भीतर से लगातार टूटता चला जा रहा है। यह दूसरी बात है, कि वह अपनी हार स्वीकार करने को, किसी भी हालत में तैयार न था।

मैं मीता से अब भी मिलता रहता था। हमारे मिलने पर एन0 मोहन ने किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया था। मगर कभी कभी महसूस होता, कि उसे हमारा मिलना जुलना विशेष अच्छा नहीं लगता।

स्थिति विकट थी। चाहते हुए भी, मैं वहंा जाना नहीं छोड़ पाया। एक बार कारणवश मैं दो तीन दिन तक उधर नहीं जा सका, तो एन0 मोहन ने मुझे स्वयं बुला भेजा।

वह बड़ी गम्भीरता से बातें कर रहा था। मालूम पड़ा, वह मीता के बारे में बेहद चिंतित है। कहने लगा, ”यह लड़की कहीं पागल न हो जाये। समझाने पर भी कुछ नहीं समझती। ठीक से खा-पी नहीं रही। रात को उठकर बैठ जाती है और न जाने, क्या बड़बड़ाती रहती है।”

“उसके कम्पीटीशन का क्या रहा?” मैंने पूछा तो वह व्यंग्यात्मक हंसी हंस कर बोला, ”कौन से कम्पीटीशन! मेर घर में तो बेवकूफ़ियों के कम्पीटीशन चल रहे हैं! और उसमें… वह सबसे आगे निकल गई!”

मैं केवल सुन रहा था।

वह मिन्नत सी करते बोला, ”तुम ही इसे समझाओ न।”

 

मैं मीता को सामान्य स्थिति में लाने के लिये लगातार प्रयास किये जा रहा था, वह किसी तरह खुल जाये, मन हल्का हो और यहां से वह कहीं और चली जाये, जहां उसका कोई अपना हो।

किंतु उसका अपना, कौन हो सकता था?

कितने ही दिन के लगातार प्रयास के बाद, वह कुछ खुल पाई थी… डैडी का इतना बड़ा बिज़नेस, एक ही झटके में तबाह हो जायेगा, कौन जानता था। कुछ ही दिन में ज़मीन और कोठी के साथ साथ, घर के जेवरात तक चले गये… डैडी बहुत ही सेेंटीमेंटल थे। पहले हार्ट अटैक में ही हमें छोड़, चलते बने… बड़ा ब्रदर, एक नम्बर का शराबी और गेम्बलर। हर वक्त नशे में धुत ही दिखाई पड़ता था। बस, वही एक था कहने के लिये अपना। मां तो उससे भी पहले चल बसी थी।

उन्हीं दिनों, उसका अंकल, अर्थात मीता का फूफ़ा, अपने साले का शोक व्यक्त करने, वहां पहुंचा हुआ था। उसने मीता को, अपने साथ ले जाने के लिये सहमत कर लिया। अन्य सभी रिश्तेदारों ने भी इस योजना की सराहना की। अच्छे माहौल में रहकर, लड़की योग्य बन जायेगी और अपने फूफा की कोशिश से, किसी अच्छे से घर की शोभा भी बन जायेगी।

वह उसे कार में बिठा कर अपने साथ ले आया। कुछ ही दिनों में, उसने अपने हंसी-मज़ाक और चुटकलेबाज़ी से, उसका सभी दुख-दर्द भुला दिया। वह उसे उत्साह बढ़ाते हुए कहता, ”तुम ग्रेज्युएट हो। समझदार भी काफी हो। कुछ दिन की मेहनत करके, आई. ए0 एस0 बन सकती हो। अरे, फिर तो तुम अपने इस अंकल से भी बड़ी अफ़सर बन जाओगी!”

बहुत प्रयास करने के बाद, वह थोड़ा सा और खुल पाने में समर्थ हुई… अंकल को आंटी, पहले बहुत ही चाहती थीं। शादी से पहले, अंकल के कई लड़कियों के साथ रिलेशनस रहे थे। आंटी ने कभी इस बात को तूल नहीं दी थी। मैरेज हो जाने के बाद भी अंकल ने कई जगह इधर उधर हाथ मारने की कोशिश की थी, जिन की भनक, आंटी के कानों में पड़ती रहती थी। मगर आंटी ने तब भी, अंकल को कुछ नहीं कहा। मगर कोई सहन करे, तो कहां तक?… आंटी शुरू शुरू में, मीता से सभी तरह की बात कर लिया करती थीं। एक दिन कहने लगी-दो शादीशुदा लड़कों का पिता, इधर उधर आंख मिचैनी खेलता फिरे, तो कितनी शरम की बात है! इतनी बड़ी पोस्ट का आदमी, सरकारी जिम्मेदार अफ़सर, रात को उठ कर, बंगले में मौजूद साफ़ सुथरे बिस्तर और पत्नी को छोड़कर सर्वेंट क्वार्टर की गन्दगी संूघता फिरे, यह मर जाने की बात नहीं?… एक दिन, आंटी रोकर बोलीं, मैं ऐसे आदमी के साथ और नहीं रह सकती, जो ज़रा सी बात के लिये, किसी मासूम लड़के को गुंडों से इस तरह पिटवा दे, कि उसके प्राण ही निकल जायें… मुझे इस आदमी से घिन आने लगी है। अब मैं इसे और अधिक सहन नहीं कर सकती…

मीता ने यह सब एक ही बार में नहीं बताया था। केवल टुकड़ों में ही, मैं इन बातों को जान पाया था। मैंने उसे सांत्वना देने के विचार से कहा, ”कितने ही पुरूष हैं, जो यह सब करते हैं। सभी की स्त्रियां तो इस तरह आत्महत्या नहीं कर लेतीं।”

”आंटी तो अंकल की हर एक्टीविटी वाच करने लगी थीं। एक दिन…“

“रूक क्यों गईं?”

मीता चुप थी।

”न बताना चाहो, तो रहने दो।” मैंने उसे चुप देखकर कहा।

“नहीं, अब कुछ भी नहीं छिपाऊंगी… एक दिन, नहीं एक रात, अंकल मुझे नाइट शो दिखाने शहर ले गये। किसी इंगलिश फ़िल्म का लास्ट शो था। पौने एक का वक़्त होगा, जब हम घर लौटे। डिनर हमने बाहर ही ले लिया था… मैंने ड्रेस बदला। बिस्तर में लेटते ही आंखें मुंद गईं। कह नहीें सकती, तब कितने बजे थे, जब किसी को अपने ऊपर झुके पाकर, मैं चीखने ही वाली थी, कि एक भारी हाथ ने मेरा मुंह बंद कर दिया। मैंने ज़ोर लगा कर उठने की कोशिश की, तो वह पीछे मेज़ से टकरा गया और मेज़ पर पड़ा पानी का जग, फ़र्श पर गिर कर चिकनाचूर हो गया… उधर आंटी चीखीं… कौन है, कौन है?… वह फुर्ती से निकल भागा था। अंधेरे में मैं उसकी शक्ल नहीं देख सकी थी। मगर आंटी का यही कहना था, कि वह और कोई नहीं, तुम्हारे अंकल हीे होंगे… उसके बाद, घर में कई दिन तक झगड़े का माहौल बना रहा। अंकल अपने ऊपर ऐसा लगा लांछन, स्वीकार करने को तैयार न थे और आंटी भी अपनी ज़िद पर अड़ी थीं।

“तुम्हें बिल्कुल शक नहीं हुआ, कौन था?”

”शक कैसे किया जाये? किस पर किया जाये, जब मैंने उसकी शक्ल देखी ही नहीं। मगर आंटी मानी ही नहीं। वे अपनी बात पर अड़ी ही रहीं और…“

 

मीता अब थोड़ा सामान्य हो चली थी। एक दिन उसने बहुत पहले अपनी कही बात पुनः दोहराई। कहने लगी,

“मेरी मानें, तो आप अर्चना से शादी कर ही लें। इतनी अच्छी लड़की आप को और कहीं नहीं मिलेगी। सो लवली एंड सो सिम्पल! व्हाट एल्स यु वांट?”

”देखो मीता…”

“फिर वही देखो मीता! आखि़र क्या कमी है उस लड़की में?”

”मेरी बात तो सुन लो।”

“ठीक है, सुनाइये?”

”मैं अर्चना को, छोटी बहन की तरह मानता हूं।”

“वाह! वहीं घिसी पिटी बातें! दुनिया कहां से कहां पहुंच गई और आप… क्या कहने!”

”उसका भाई नहीं रहा। वह भी इसी लिये मेरा आदर करती है।”

“उससे भी कभी आपने पूछा? क्या वह भी आप को एक बहन की तरह ही चाहती है?”

”ये बातें भी क्या पूछने या बताने की होती है!”

“तो आप… बिल्कुल शादी नहीं करना चाहते?”

”बिल्कुल का क्या मतलब?”

“मतलब, उससे नहीं, या किसी से भी नहीं?”

”किसी से?”

“मेरे साथ भी मैरेज नहीं कर सकते?”

”क्या…?”

इतनी महत्वपूर्ण बात, अकस्मात और सीधे सीधे सुनकर मैं हड़बड़ा गया था।

“क्या ऐसा हो सकता है?” मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था।

”क्यों नहीं हो सकता!” वह निर्भय थी।

“तुम्हारे अंकल?” मैं अभी तक आशंकित था।

”मैं अब, हर हालत में, अंकल से छुटकारा पा लेना चाहती हूं।”

मैं सोच में पड़ गया।

“सिर्फ़ सोचेंगे? मेरी बात का जवाब नहीं देंगे?”

”जवाब भी दूंगा।”

“कब?”

”अभी, इसी वक़्त… मैं शादी के लिये तैयार हूं!”

“थैंक्स!”

”अंकल के साथ तुम साफ़ तौर पर बात कर सकोगी?”

“हां, बात तो मुझे ही करनी होगी!”

दो दिन बाद ही, मीता मिली। खूब सजधज कर आई थी वह। आते ही चहक कर बोली, ”अंकल मान गये!”

“सच?” मुझे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था।

”बिल्कुल सच। उन्होंने तो ज़रा भी आब्जेक्शन नहीं किया। बल्कि सुन कर, बहुत खुश हुए और मेरी पीठ भी थपथपाई।”

 

तीन चार दिन ही गुज़रे थे, मुझे जेनरल मैनेजर के कार्यालय में उपस्थित होने का निदेश प्राप्त हुआ। मैं बड़े उत्साह में था। मैंने इस दौरान, अपने सेक्शन में कार्य बड़े ही परिश्रम से किया था और दूसरों से भी खूब काम लिया था। हो सकता है, उसी उपलक्ष में मेरा प्रमोशन कर दिया गया हो, या नक़द पुरस्कार, मेरे लिये स्वीकृत हो जाने की सूचना देने के लिये, बड़े साहब ने मुझे बुलाया हो।

“प्लीज़, टेक मोर सीट।”

मैं थैंक्स कह कर बैठ गया।

”आप आजकल इंस्पेक्शन में हैं?”

“जी।”

”कब से हैं?”

मैंने अवधि बता दी।

वे मेरी ओर ग़ौर से देखने लगे। फिर एक काग़ज मेरी ओर बढ़ा कर बोले, ”इसे देखिये, यह साइन आप के हैं?”

”जी।”

“यह काम, आपने खुद चेक किया था?”

”सर, बात यह है…“

किंतु उन्होंने मुझे बीच में ही टोक कर कहा,

“नो नो, बात वात कुछ नहीं। सिर्फ़ उस बात का जवाब दीजिये, जो पूछी गई है।”

”जी।”

“चेक किया था?”

”नहीं।”

“मतलब, आप ने बिना चेक किये ही, सामान को पास कर दियाः कितना पैसा खाया?”

”सर!”

“देखो, जो भी हुआ है, मुझे साफ़ साफ़ बता दो। यू नो वेरी वेल, आई डोंट टाॅलरेट एनी कोरप्शन इन माई डिपार्टमेंट!”

मैं चुप था। बोलता भी क्या! यह आक्रमण तो अचानक ही मेरे ऊपर कर दिया गया था।

”मिस्टर, नौकरी तो इस केस में जायेगी ही… पुलिस को भी हैंड ओवर करना पड़ सकता है।”

“सर, कुछ मेरी भी सुनेंगे?”

”ज़रूर सुनेंगे… मगर मिस्टर, यह सब करने के बाद भी, एक बार आप अगर यहां आकर मुझे बता देते, तो मैं इस केस को, किसी तरह सम्भाल ही लेता। मगर यह केस तो काफी ऊपर तक जा पहुंचा है। किसी ने सीधे ऊपर रिपोर्ट कर दी है… आप की वजह से, मुझे भी नीचा देखना पड़ गया… हाऊ सैड!”

“सर…”

”हां हां, कहिये?”

“मुझे सहगल सर ने कहा था, कि इस काम की बहुत ही जल्दी है। कोई गड़बड़ होगी तो वह देख लेगा।”

”उसके साइन हैं किसी काग़ज़ पर? कोई चिट या नोटिंग? चिट या नोटिंग? मुझे कमरे की दीवारें ही नहीं, सभी कुछ घूमता नज़र आने लगा।”

“दो दिन का टाइम देता हूं, अपना कोई बचाव करना हो, तो कर लो।”

कुछ समझ में नहीं आ रहा था, यह सब कैसे हो गया। कोई अन्य चारा न देख, मैं उसी मैनेजर एन0 मोहन की शरण में जा उपस्थित हुआ।

उसने मेरी पूरी बात सुनी। सुनकर उसने गम्भीरता प्रदर्शित की,

”इतनी लापरवाही नहीं करनी चाहिये थी!”

“सर, मुझे एसिस्टेंट मैनेजर सहगल ने धोखा दिया।”

”वह तो साला शुरू से ही बदमाश है! मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं। मगर मिस्टर, एक बात कहूं, वो… कोई किसी को धोखा नहीं देता। धोखा, आदमी अपने से ही खाता है।”

मैं चुप रहा।

“तो, क्या चाहते हो?”

”सर, मैं इस समय सख़्त मुसीबत में हूं। कुछ सूझ नहीं रहा, क्या करूं! आप मुझे किसी तरह बचा लें सर!”

“किसी तरह?… सुनो।”

”जी।” मुझे आशा की किरण नज़र आई।

“तुम एक अच्छे लड़के हो एंड आई लाइक यु वेरी मच… बट…”

”सर?”

“जेल जाने से तो मैं तुम्हें बचा ही लूंगा। मगर… तुम एक काम करो।”

”जी?”

“अपना रिज़ाइन लिख कर मुझे दे दो। बाकी मैं सब कुछ ठीक करा दूंगा।”

”सर!”

“नौकरियों की कमी नहीें, बहुत मिल जाती हैं।”

”कहां मिलती है नौकरी इन दिनों सर!”

“अरे, कोशिश करने पर सभी कुछ मिल जाता है। मगर दिल छोटा करने से कुछ भी नहीं मिलता।”

”सर, और कोई रास्ता नहीं?”

“घबराने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। नौकरी मिल जायेगी। बल्कि इससे भी बढ़िया मिल सकती है। चाहो, तो रिज़ाइन करने से पहले, एप्वायेंटमेंट लेटर लेकर, जेब में रख लो। मगर एक शर्त होगी।”

मैं अब तक, नज़र झुका कर और गिड़गिड़ा कर बात कर रहा था। उसकी यह बात सुनते ही, मैं बुरी तरह चैंक गया।

ग़ौर किया, उसका लम्बा चैड़ा शरीर, उसी तरह तवाना है। चेहरे पर वही पहले जैसी सुर्खी मौजूद है और बड़ी-बड़ी आंखों में चिर प्रतिचित शरारत तैर रही है!

मगर एक शर्त होगी!

एक क्षण के लिये, मैं उसकी ओर देखता रहा। फिर कहा,

”मैं शर्त समझ गया!”

“देट्स व्हाई, आई लाइक यु सो मच!”

”मगर एक बात ज़रूर जानना चाहंूगा।”

“बोलो।”

”यह शर्त क्यों?”

“यह नहीं बताया जा सकता!”

”नुक़सान क्या है बताने में?”

“फ़ायदा भी क्या होगा जानकर? सोच लो। अच्छी तरह से सोच लो। फ़िल्मी हीरो की तरह, यहां से निकल कर जेल जाना चाहते हो, तो शौक़ से जाओ। कोई रोकने या टोकने वाला नहीं और अच्छे ढंग से कमा कर और इज़्जत के साथ दो वक़्त की रोटी खाना चाहते हो, तो उसके लिये भी रास्ता खुला है। अच्छी तरह सोच लो और फ़ैसला कर लो, कि तुम्हारे लिये क्या बेहतर है। दिल माने, तो मुझ से फिर मिल लेना। वरना…”

 

मैं फ़िल्मी हीरो नहीं था, जो हँसते, गाते या नारे लगाता हुआ, जेलयात्रा के लिये वहां से रवाना हो जाता। मैं सिर्फ़ एक मामूली आदमी था। इसलिये वही किया, जो एक मामूली आदमी से अपेक्षित था।

मैंने, दूसरे शहर जाकर नई नौकरी तलाश कर ली और धीरे-धीरे, नई जिं़दगी में रमने की कोशिश करने लगा और फिर एक दिन, आशी का साथ भी मिल गया।

क्रमशः…६ 

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा – स्टिकर ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

आज प्रस्तुत है लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा दर्शाती सुप्रसिद्ध लघुकथाओं में से एक सर्वश्रेठ लघुकथा –  स्टिकर।  हम आपके साथ भविष्य में भी श्री कमलेश भारतीय जी की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ आपसे साझा करते रहेंगे। कृपया आत्मसात करें।

☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा : स्टिकर  

एक पार्टी के लोग मुझसे चंदा मांगने आए । उनके भले चेहरों को देखकर मैं इंकार न कर सका । चलते चलते वे अपनी पार्टी का स्टिकर भी ड्राइंगरूम में लगा गये । मैं विचारों से सहमत न होते हुए भी लोकलज्जावश चुप रह गया ।

अब जो भी आता, पहले मुझको, फिर स्टिकर को घूरने लगता । घुमा फिरा कर पूछ ही लेता कि क्या मैं फलां पार्टी का सदस्य हूं । मैं इंकार में सिर हिला देता । अगला सवाल फिर होता, यदि सदस्य नहीं तो क्या इस पार्टी के हमदर्द हो ? मैं मासूम सा इंकार फिर कर देता । फिर तो जैसे तोप का मुंह मेरी ओर हो जाता ।

मोटी सी बात कही जाती- जब सदस्य नहीं, हमदर्द नहीं, तो फिर चंदा किसलिए ?

अब मेरा माथा ठनका । यह मामूली सा स्टिकर मेरी जान का जंजाल बन गया । बात ठीक भी लगने लगी । यदि किसी पार्टी का स्टिकर मेरे ड्राइंगरूम में लगेगा तो मेरे ही विचारों का प्रतिरूप माना जायेगा । मैं मामूली से स्टिकर को अपना मुखौटा क्यों बनने दूं ? किसी की विचारधारा को मैं क्यों ढोता फिरूं ?

एक फैसले के तहत मैने चाकू लेकर स्टिकर को काट दिया और मुक्ति की सांस ली

 

©  कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ४ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # ४ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

(चित्र साभारश्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)

≡ चार ≡

आशी के हल्का सा झंझोड़ते ही मैं उठ बैठा हूं। उसने हड़बड़ाहट मचा रखी है। मालूम भी नहीं पड़ा, सोचते सोचते कब आंख लग गई और हाथ में पकड़ी पत्रिका, कब बर्थ से नीचे जा गिरी।

वह बोली, ”बड़ी अजीब बात है! आप तो कभी, सफ़र में सोते नहीं थे। आज कैसे नींद आ गई और वह भी इतनी गहरी?”

”मैं, ढाई बजे तक तो जाग ही रहा था। उसके बाद का, कुछ पता नहीं!”

वह अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देख, कहती है, ”बीस मिनट और रहते हैं हमारे डेस्टीनेशन तक पहुंचने मंे। आप फटाफट सामान इकटठा कराइये।”

कितने दिन बाद, आज इधर फिर से आना हुआ है। यहां का तो पूरा नक़्शा ही बदल गया है! क्या यह वही एस्टेट है?

नये तामीर हुए, पीले से दुमंज़िला क्वार्टरों की क़तारें, दूर दूर तक नज़र आ रही हैं। पुराने क्वार्टरों की भी काया पलट हो गई लगती है।

पार्क, स्कूल और चिकित्सालय, सभी का निर्माण, नये सिरे से हुआ है। कई एक नई सड़कें, चैक और दुकानें भी दिखाई पड़ रही हैं।

इस दौरान, अर्चना को, एक प्रमोशन मिल जाने के बाद, दो कमरों वाला बढ़िया-सा क्वार्टर मिल गया है। बहुत साफ़ सुथरा, आधुनिक बाथरूम। बिजली की फिटिंग भी मुकम्मल। दोनों कमरों में बिजली के पंखे भी लगे हैं।

बड़ी ही व्यस्त नज़र आ रही है अर्चना! सुबह, जब हम यहां पहुंचे, थ्री व्हीलर की आवाज़ सुनते ही वह ‘आ गये!’ कह कर भागती हुई आई और आशी से लिपट गई।

”मैं भी आया हूं।” मैंने कहा, तो वह लज्जित-सी, हाथ जोड़, मेरी ओर देखने लगी।

मैंने सस्नेह पूछा, ”इतनी दुबली कैसे हो गई?”

”यहीं बताना होगा सड़क पर?” वह हंस कर बोली और आशी को बांह से लपेट कर भीतर ले गई। मैं सामान सम्भालने लगा।

कितने सारे लोग, अर्चना ने एकत्रित कर लिये हैं। सभी, जैसे अपने घर का काम समझ, भाग दौड़ में लगे हैं। इनमें से कुछ ने मुझे पहचान कर हाल चाल भी पूछा है।

“अर्चना, कोई काम मुझे भी तो बताओ।”

”क्या बतांऊ?” उसने थकान भरे चेहरे पर मुस्कान लाते पूछा।

“मुझे भी तो कुछ करना चाहिये।”

वह सोचने लग पड़ी। फिर बोली, ”आप दोनों इस अवसर पर पहुंच गये, मेरे लिये यह बहुत बड़ी बात है। सफ़र से थके होंगे, थोड़ा आराम कर लें।”

“वाह! मैं यहां आराम करने आया हूं।”

”तो ठीक है। आप बस, सभी ओर थोड़ी नज़र रखिये। जहां गड़बड़ दिखाई दे, वही सम्भाल लीजिये। देखिये, किसी मूर्ख ने कितने ग़लत मौके़ का रिक़ार्ड लगा रखा है!”

अरूणा, ज़मीन पर बिछी दरी पर, मैलेे-कुचैले कपड़े पहने, सिर झकाये बैठी है। वह समूची ही, पीली पीली-सी दिखाई पड़ रही है। शायद कुछ ही देर पहले, उसे उबटन लगाया गया है। लड़कियां विवाहोत्सव वाले गीत गाने में व्यस्त हैं। दो एक साथ मिलकर, ढोलक पर थाप दे रही हैं।

अरूणा, दृष्टि ज़रा सी ऊपर उठाती है। हाथ जोड़ती है और फिर गरदन झुका लेती है।

“अरूणा, ठीक हो न?”

वह तनिक सा सिर, फिर ऊपर उठाती है।

”पगली! रोती क्यों है?”

वह टप्टप् आंसु गिराती जा रही है।

बारात आ गई है… वरमाला हो रही है… सेहरा पढ़ा जा रहा है… बारात खाना खा रही है… बेदी तैयार हो रही है… पंडित जी पूजा की तैयारी कर रहे हैं… लड़के को बुलाइये… मंत्रोच्चारण जारी हैं… कन्या को लाइये… अरे फ़ोटोग्राफ़र कहां गायब हो गया?… फेरे हो रहे हैं… वर-वधु को शिक्षा दी जा रही है… सभी की आंखांे में धुआं, घी और डालो, थोड़ा और…

सुबह हो गई है… बारात नाश्ता कर रही है… सामान, बस की छत पर चढ़ाया जा रहा है। अब रस्सों से बांधा जा रहा है…

अरूणा की विदाई हो रही है। वर का पिता, थैली से कई मुटिठयां सिक्के निकाल, बस की छत के ऊपर से उछाल देता है…

अरूणा को विदा कर, अर्चना, चारपाई पर टूटी डाल की तरह गिर गई है।

आशी उसे राय देती है, ”थोड़ा सो लो।” वह कहना मान लेती है मगर पांच मिनट बाद ही, वह उठ बैठती है।

“क्या हुआ?” आशी पूछती है।

”अभी तो बहुत काम पड़ा है!”

“कौन सा काम?”

”सामान वापिस करना है।”

आशी ग़ुर्राती है, ”चुपचाप लेटी रहो। हम लोग यहां क्या सिर्फ़ फ़ोटो उतरवाने आये हुए हैं?”

”आप दोनों, एक मिनट के लिये भी चैन से नहीं बैठ पाये।”

 

अभी कुछ ही देर पहले, यहां कितनी चहलपहल थी। और अब सभी ओर, शांत और उदास सा माहौल हो गया है!

मैं एक घंटा नींद लेकर उठ बैठा हूं। दूसरे कमरे में, आशी और अर्चना, बेसुध-सी पड़ी, गहरी नींद में हैं। कुछ देर पहले, खाने की छुट्टी का हूटर बजा था। फैक्टरी की ओर से, क्वार्टरों को लौटते हुए कर्मचारी, खिड़की में से नज़र आ रहे हैं।

 

उस दिन, अर्चना बड़ी नर्वस लग रही थी। सुबह उसके क्वार्टर से मैं उसे साथ लेता गया और उसे निश्चित स्थान तक पहंुचा कर, अपने सेक्शन में चला आया था।

मैंने रोज़मर्रा की तरह, वर्करों को काम बांट दिया। जिन्हें ड्राइंग या औज़ार चाहियें थे, स्टोर से दिला दिये। फ़ोरमैन के कमरे में जाकर, पिछली शाम तक की प्रोग्रेस बताई। कठिनाइयां और व्यवधान बयान किये। आगे के लिये ज़रूरी निदेश प्राप्त किये और अपनी सीट पर आकर, रजिस्टर आदि को ठीक ठाक करने लगा।

बीच में एक बार, अर्चना को देखने, उसके दफ़तर चला गया। वह कुर्सी पर चुपचाप बैठी थी। सामने मेज़ बिल्कुल साफ़ थी।

“क्या हुआ?” मैंने पूछा।

”अभी तक तो किसी ने मुझे कोई भी काम नहीं दिया।”

“कोई बात नहीं। पहला दिन है न आज। चाय पी?”

”कैन्टीन वाला आया तो था। मगर मेरे पास गिलास नहीं था।”

“गिलास ले लेना था किसी से।”

”अच्छा थोड़े ही लगता, गिलास मांगना किसी से!”

“उधर मेरे पास एक स्पेयर पड़ा है, भिजवा देता हंू।”

”लंच टाइम में घर तो जाना ही है, लेती आउंगी।”

“ठीक है, घर से ही ले आना।” कहकर मैं चलने लगा, तो वह बोली, ”एक मिनट, दोपहर को घर तो मुझे साथ लेते जायेंगे न?”

“मगर मैं तो कैन्टीन में खाना खाता हूं। खैर मैं एडजस्ट कर लूंगा। एक बजे यहीं मिलंूगा।”

लंच टाइम का हूटर होने में अभी एक घंटा शेष था। मेरा कहीं से फ़ोन था।

फ़ोन पर मीता थी, जो बेहद घबराई लगती थी।

”आप इधर चले आइये।”

“बात क्या है?”

फ़ौरन चले आइये, प्लीज। आंटी ने फिर कुछ कर लिया है।”

“क्या?”

”टिकटुएंटी की शीशी।”

“माई गाॅड!… साहब बाहर से लौटे?”

”नहीं।” प्लीज़ कम इम्मीडीएटली, मैं बहुत…”

”घबराओ नहीं, अभी पहंुच रहा हूं, पांच मिनट में।”

यह मैं किस झंझट में पड़ गया! इन बड़े लोगों के कोठी-बंगलों में तो सुबह से शाम तक, जाने क्या कुछ होता रहता है। कैसे कैसे गुल खिलते रहते हैं!

ऐसे में पुलिस केस बन गया, तो? कहीं मैं स्वयं ही धर लिया गया, तो?

तो, क्या करूं? किनारा कर जाऊं?

मगर मीता?

मीता के भयभीत चेहरे की कल्पना कर, मैं तुरंत, फैक्टरी के मेनगेट से बाहर होकर, एन0 मोहन के बंगले की ओर भाग खड़ा हुआ।

बड़ी ही विकट स्थिति थी। एक ओर, मृत्यु के द्धार पर खड़ी आंटी और दूसरी ओर, अजीब हरकतें करती हुई मीता। लगने लगा, जैसे मृत्यु से पूर्व, आंटी अपना पागलपन, मीता को, धरोहर के रूप में सौंप जाना चाहती हैं।

“मीता, होश मे आइये!” मैंने उसे कंधे से पकड़ कर झकझोंर दिया। किंतु छूते ही, वह छोटे बच्चे की तरह, मुझ से लिपट कर रोने लगी।

मैंने तुरंत निर्णय ले लिया। मीता के साथ, थोड़ा सख़्ती से पेश आया और भागता सा हुआ, फैक्टरी-अस्पताल जा पहंुचा।

मैं सीधा लेडी डाक्टर के कमरे मेें जा पहुंचा। मुझे इस तरह अपने कमरे में देख, डाक्टर चिल्लाई, ”यह क्या है मिस्टर? आप उधर जाइये डाक्टर भट्टाचार्य के पास।”

“डाक्टर साहिबा, मुझे इस वक़्त आप की ही सहायता चाहिये, प्लीज़!”

”ठीक है, बोलिये, क्या तकलीफ़ है?”

मैंने इधर उधर देखा। डाक्टर ने बाकी पेंशेंट्स को थोड़ी देर के लिये बाहर जाने के लिये कहा।

“हां, अब कहिये।”

मैंने संक्षेप में, पूरी बात बता दी। सुनकर वह उचक सी पड़ी।

”कितनी देर हुई इस बात को?”

“पौन घंटा।”

”यह बात किसी और से तो नहीं कही?”

“मैं सीधा यहीं चला आ रहा हूूं।”

”अच्छा किया। चलिये, देखते हैं।” कह कर वह उठ खड़ी हुई।

बाहर निकल, उसने कतार में लगी स्त्रियों से कहा, ”मैं एक सीरियस पेशेंट को देख कर अभी आ रही हूं। आप लोग थोड़ा रूकिये।”

आंटी, इस बार भी बच गईं। मगर, इस तरह कब तक चल पायेगा, मैं यही सोचे जा रहा था।

लंच टाइम में, अर्चना मेरी प्रतीक्षा करके, अकेली ही घर चली गई थी। दोपहर के बाद, मैंने उससे क्षमा मांग ली। मगर उसे सही बात नहीं बताई।

 

शाम ढले, मैं फिर बंगले पर जा पहुंचा। सोचा, पता करूं, अब वहां क्या स्थिति है।

एन0 मोहन की कार गैराज में मौजूद थी। मैं सोच रहा था, अब मेरे भीतर जाने की ज़रूरत है भी या नहीं? मगर यहां तक आकर, लौट जाना भी मुझे कुछ ठीक नहीं लगा। क़दम आगे बढ़ाया।

बरामदे में पहुंचते ही, मुझे ठिठक जाना पड़ा। भीतर कुछ गड़बड़ लग रही थी।

एन0 मोहन मीता पर झुंझला रहा था, ”तुम्हारे जैसी मूर्ख लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!”

“मगर मैं करती भी क्या?” यह मीता थी।

”तुम्हें लेडी डाक्टर के पास सीधे कान्टेक्ट करना चाहिये था। फैक्टरी फ़ोन करके, उसे बुलाने की क्या ज़रूरत थी?”

“मैं बुरी तरह नर्वस हो गई थी। कुछ सूझ ही नहीं रहा था।”

”और सूझा भी तो क्या!… कुछ तो सोचा होता। वह बाहर का आदमी है। बात कहीं भी लीक आउट हो सकती है।”

“नो… ही केन नेवर डू देट… मैं अच्छी तरह जानती हूं।”

”अच्छी तरह?”

“प्लीज़, ग़लत मतलब मत लगाइये।”

”मैं तो किसी की भी बात का ग़लत मतलब नहीं लगाता। मगर, वह एक सुपरवाइज़र है। जानती हो न, फैक्टरी में एक सुपरवाइज़र की क्या हैसियत होती है?”

“मैं तो मैनेजर की भी…”मीता न जाने, क्या कहने वाली थी। एन मोहन ने उसे वहीं डपट कर कहा, ”शटअप!”

मेरा वहां और अधिक खड़े रहना कठिन था। वापिस लौटने के लिये मुड़ने लगा, तो खटाक से दरवाज़ा खुला और वह ठीक मेरे सामने था।

”कम इन… कम इन प्लीज़।”

मैं झिझकता हुआ भीतर चला गया।

“बैठिये… आई एम रियली ग्रेटफुल… युडिड ए-लाॅट फ़ारमी।”

”नहीं सर, मैंने तो कुछ भी नहीं किया।”

“नो नो… बहुत ज़यादा किया। वरना कुछ भी हो सकता था। अब मैं जल्दी ही इसे किसी”अच्छे से मेंटेल हाॅसपिंटल भेजने की सोच रहा हूं… मैं भी कितना बदकिस्मत हूं! दोनों बेटे अमेरिका में हैं और यहां पर, यह चल रहा है!”

“आप धैर्य रखिये, सब ठीक हो जायेगा।”

”शायद ठीक हो जाये!” उसने जेब से रूमाल निकाल कर आंखों से लगा लिया। मालूम नहीं, उस रूमाल पर, उसकी आंखों की नमी का कोई अंश, चिपका भी या नहीं!

मैं अपने कैबिन में बैठा, प्रोग्रेस रिपोर्ट पर नज़र घुमा रहा था। पता चला, किसी का मेरे लिये फ़ोन है।

सोचा, मीता होगी।

फ़ोन पर मीता की नहीं, अर्चना की आवाज़ थी। वह अपने दफ़तर से बोल रही थी।

“क्या बात है?” मैंने पूछा।

”आप पांच मिनट के लिये इधर हमारे दफ़तर मेें आ सकेंगे?”

“उधर क्या है जी, आप के दफ़तर में?” मैंने मज़ाक के मूड में कहा।

”इधर मैं हूं और… एक बहुत स्वादिष्ट चीज़ घर से बना कर लाई हूं।”

“मैडम! यह फैक्टरी है। कोई फ़िल्म स्टूडियो नहीं!”

”एक ज़रूरी बात भी करनी है।”

“बात निःसन्देह ज़रूरी होगी। मगर देखो, मैं अभी एक बहुत ही ज़रूरी काम में उलझा हूं। शाम को छुट्टी के बाद, ज़रूरी बात कर लेंगे और वो आलू का परांठा, अचार भी है न?”

”नहीं, परांठे में अनारदाना डाला है।”

“ठीक है, रूमाल में बांध कर रख लो। मगर सिर्फ़ मेरे हिस्से का।”

 

न जाने मैं यह कैसे माने बैठा था, कि उन दिनों तेज़ी से घट रही घटनाओं के बारे में, कुछ एक को छोड़ कर, शेष सभी अनिभिज्ञ हैं। जबकि स्थिति, इसके पूर्णतः विपरीत थी।

किंतु जो कुछ वास्तव में था, वह चर्चित कुछ दूसरे ही ढ़ग से हो रहा था। निश्चित रूप से, उन काल्पनिक कथाओं में, मेरा नाम भी बराबर शामिल किया जा रहा था। हालांकि यह सब, मुझे थोड़ा बाद में मालूम पड़ा।

इस प्रकार की सूचनाएं फैलाने वाले, साधारणतया, अपनी कला में पर्याप्त निपुण हुआ करते हैं। ‘ऐसा मैं कह रहा हूं। ’ यह कोई भी नहीं कहेगा! ‘उसको, अमुक से यह बात कहते, मैंने अपने कानों से सुना है। ’ ऐसा कहने वाले, अनेक मिल जायेंगे!

तब, कभी कभी मैं यह सोच कर हैरान हो जाता, कि आखि़र मैं स्वयं कैसे इस झमेले में उलझ कर रह गया। कोई रिश्तेदारी नहीं। किसी के साथ बराबरी या मित्रता नहीं। अफ़सरों को मस्का लगाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। तब क्यों, मैं इस कंटीले जाल में फंसता ही चला जा रहा था।

किसी एक मामूली आधार पर, लोगों के अनुमान लगा लेने का ढंग भी, शायद अलग अलग ही होता होगा। अतः आधार को पूर्णतः नकारा जाना भी व्यर्थ ही था। देखने वाले, यह तो देखते ही होंगे, कि कितनी ही बार, शाम ढले, वर्कर काॅलोनी के एक कमरे वाले क्वार्टर में, मैं घंटों के हिसाब से, बातें करता और चाय-परांठा उड़ाता रहा था। जहां दो जवान बहनें, अपनी विधवा मां के साथ, सहमा सा जीवन व्यतीत कर रही थीं… अथवा उसी एस्टेट के एक अन्य भाग में, अर्थात बेंगलो एरिया की ओर, मैं चुपके चुपके जाता दिखाई पड़ता, जहां एक बड़े अफ़सर की भव्य कोठी के चैड़े से फाटक को धकेल कर, मैं बिना इधर-उधर देखे, भीतर प्रवेश करता… जहां वह बड़ा अफसर कार में बैठ कर, क्लब या बाज़ार गया होता। उसकी मेम साहिबा को, अकसर पागलपन का दौरा पड़ गया होता। और वहीं एक जवान और खूबसूरत लड़की, कोई चुस्त और भड़कीला लिबास पहने, लम्बे बरामदे में, फूलों के गमलों के समानांतर चहल क़दमी करती हुई, बार बार बाहर वाले गेट की ओर ताक रही होती…

”आज कुछ देर से नहीं पहुंचे?” मीता ने पूछा।

“क्या यहां भी फैक्टरी का मेनगेट है, जहां हूटर हो जाने के पांच मिनट से छह मिनट हो जाने के बाद, मायूसी का सामना करना पड़ जाये!”

उत्तर में वह मुस्करा पड़ी और बोली, ”आइये, अन्दर चल कर बैठते हैं।”

“चलिये… आंटी कैसी हैं अब?”

”पूरी तरह गुम हैं।”

“उन्हें मेंटल हाॅस्पीटल ले जाने को कह रहे थे।”

”अंकल इन दिनों खुद ही नार्मल फ़ील नहीं कर रहे। अपने आप थोड़ा बेहतर होंगे, तभी कुछ हो सकेगा। आप को आज, डिनर इधर लेना है। डु यु रिमेम्बर?”

“खाना तो, मैं खा चुका।”

”व्हाई? मैंने फ़ोन जो किया था?”

“साॅरी! बिल्कुल ही याद न रहा। फैक्टरी से लौटते ही हर रोज़ की तरह, खाना बनाने में लग पड़ा। पता नहीं कैसे भूल गया!”

”याद नहीं रहा, फिर इधर कैसे चले आये?”

“सच बताऊं? चार रोटियां पेट में पड़ जाने के बाद, मुझे कई भूली हुई बातें भी याद हो आती हैं।”

”तब ठीक है। हो सकता है, दो चपातियां और पेट में पहुंच जाने के बाद, कोई और अच्छी सी बात याद हो आये!”

मैंने कहा, ”एक बात तो बताइये?”

”नो, पहले मेरी एक बात का जवाब दीजिये।”

“ठीक है, पूछिये?”

”आप मुझे आंटी कह कर क्यों बात नहीं किया करते?”

अपनी हंसी पर सप्रयास नियंत्रण पाते, मैंने उत्तर दिया, ”ऐसी नौबत, आठ दस साल बाद तो आ सकती है!”

”डांेट यु फ़ील एशेम्ड? मैं छह सात साल छोटी हूं और मुझे आप-आप कह कर टीज़ करते रहते हैं!”

“ओह!”

”व्हाट ओह! मैं कितना शाई फ़ील करती हूं!”

“तो क्या कहा करूं?”

”मेरे नाम का प्रानाऊंसिएशन क्या इतना डिफ़ीकल्ट है?”

मैं सोच में पड़ गया… न जाने क्या कारण है, कि मैंने दूसरों के सामने हमेशा ही, अपने को सीमाओं में बांध कर रखा है और मालूम नहीं, क्यों मैंने अपने मान सम्मान की रक्षा के लिये, अपने दायरे, इस क़द्र तंग कर रखे हैं!

“अब क्या सोचते ही जायेंगे?… क्या सोचे जा रहे हैं, बताइये न प्लीज़?”

”सोच रहा हूं कि… मीता कह कर बात करूं, या साथ किसी अन्य शब्द का भी सम्बोधन के लिये प्रयोग करूं… या फिर मौसम के ठंडा-गरम होने का ज़िक्र करूं और फिर किसी दिन… विवाह का प्रस्ताव भी प्रस्तुत कर दूं!… अरे, क्या बात हुई? क्या हुआ?”

अनुमान था, मेरा मज़ाक सुनकर वह ठठा कर हंसेगी या हंसते-हंसते दोहरी हो जायेगी। किंतु वह तो देखते ही देखते, कितनी गम्भीर दिखाई पड़ने लगी थी। एक ही मिनट में, उसके चेहरे का गुलाबीपन अदृश्य हो चला था, जैसे किसी ने, बड़ी सिरिंज से, उसका पूरा रक्त शरीर से बाहर खींच लिया हो!

“हुआ क्या?” मैं काफी सहम गया था।

”कुछ नहीं? … कुछ भी तो नहीं।”

“कुछ नहीं? फिर ऐसा क्यों?… अरे, रोने क्यों लगीं? हुआ क्या? कुछ तो पता चले?”

उसने चेहरा, दूसरी ओर घुमा लिया।

”मीता!” मैंने धीरे से कहा।

“मुझे यहां से ले चलो… कहीं भी ले चलो… यहां मेरा दम घुटा जा रहा है… मैं अब यहां और नहीं रह सकती…”

”यह क्या हो रहा है!… प्लीज़, होश में आइये… देखिये, शायद बाहर कोई है।”

वह थोड़ा संतुलित हुई।

इधर-उधर झांक कर देखा, कोई न था।

वह टकटकी लगाये, मेरी ओर ताके जा रही थी।

अकस्मात ही वह खिलखिला कर हंस पड़ी।

“यह क्या हो रहा है?” मैंने खीज कर पूछा।

”एक्टिंग! क्या ख़याल है, मुंबई पहंुच जाऊं, तो कोई छोटा मोटा रोल, किसी फ़िल्म में मिल सकेगा?”

“मैंने कोई फ़िल्म-कम्पनी नहीं खोल रखी।” मैंने जलभुन कर कहा।

”आप इसे रियल समझ गये थे न? सच बताइये, एक्टिंग अच्छी कर लेती हूं न?”

“यह एक्टिंग थी? मतलब क्या था इसका?”

”मतलब? पहले जो बताया था।”

“मैं नहीं मान सकता।”

”मानना, या न मानना, कुछ भी ज़रूरी नहीं। अच्छा, आप बताइये आप क्या पूछना चाहते थे?”

“मुझे याद नहीं।”

”आप काफ़ी नाराज़ हो गये लगते हैं!”

मेरी ओर से कोई उत्तर न पाकर वह कहने लगी, ”चलिये, मैं ही कुछ और पूछ लेती हूं।”

मैंने उसकी ओर देखा।

”आप अर्चना से शादी क्यों नहीं कर लेते?”

मैंने अब उसकी ओर तीखी निगाह से देखा और कहा, ”शायद यह नाटक का दूसरा अंक है!”

”नहीं, यह उसी सीन का, एक छोटा सा हिस्सा है!”

“एक अच्छी लड़की के बारे में, ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये थी।”

”मतलब, जिस लड़की से आप मैरेज करेंगे, वह अच्छी नहीं होनी चाहिये?”

“अजीब मज़ाक है!”

”एक बात मैं बता दूं, अर्चना से बेहतर लड़की आपको नहीं मिल सकेगी।”

“यह आप का ख़याल है?”

”ख़याल, जहां तक मैं सोचती हूं, खूबसूरत ही है!

“होगा!”

”होगा, मींस?”

“मींस… अगर मैं यह कहूं, कि अर्चना से बढ़कर एक और लड़की है, जो बेहद खूबसूरत है और मैं उसी से शादी करना चाहता हूं, तो यह ख़याल, पहले ख़याल से ज़यादा खूबसूरत नहीं होगा?”

”ख़यालात की खूबसूरती में तब भी कोई डिफ्रेंस नहीं आयेगा। मगर उस खूबसूरत लड़की के भारी भरकम अंकल के पास, एक छोटा सा खूबसूरत रिवाल्वर भी है, जो कभी कभी अचानक चल जाया करता है और जब चल जाता है, तो आवाज़ बिल्कुल नहीं होती!

”और कुछ?”

“इज़ इट नाॅट सफ़िशियेंट?”

”मीता, मुझे लगता है, बाहर कोई है।”

“नाइस! वेरी नाइस! डरपोक आदमी भी खूबसूरत लड़कियों को पा लेने के डिज़ायरस हैं!… हाऊ स्ट्रेंज!”

 

निःसन्देह मैं डरपोक था। तभी, अपने आप को चेतावनी दिये जा रहा था… यह खेल अच्छा नहीं। इसका परिणाम काफ़ी भयानक हो सकता है। इसलिये, जितना शीघ्र हो सके, यहां से भाग खड़े होना चाहिये। नौकरी छोड़ देनी चाहिये, या कम से कम, ट्रांस्फर के लिये तो तुरंत ही आवेदन पत्र दे देना चाहिये…

किंतु उस समय, मैं नौकरी नहीं छोड़ सका। ऐसा करना, तब शायद सम्भव ही न था। बल्कि यह शिकंजा, तो पल प्रतिपल, मेरे गिर्द और अधिक मज़बूत होता चला जा रहा था। इस जकड़न से, मैं कभी कभी बुरी तरह सिहर उठता। किंतु बेहद भयानक होने के बावजूद, उस सिहरन में भी एक आकर्षण था।

एक परिवर्तन अकस्मात ही देखने में आया। मुझे वर्कशाप से हटा कर, इंस्पेक्शन अनुभाग में पोस्ट कर दिया गया। मेरा यह स्थानांतरण, किस आधार पर हुआ था, यह किसी की भी समझ में न आया।

वैसे एक तरह से यह अच्छा ही हुआ था। यहां का वातावरण वर्कशाप के मुकाबिले कुछ बेहतर और शांत सा था। मशीनों का लगातार होने वाला शोर, प्रत्येक चार-पांच मिनट बाद, किसी न किसी की शिकायत। कोई छोटी या बड़ी समस्या, कोई नोंक झोंक, यहां पर इन सभी से निजात थी। इस नई सीट पर बैठ कर, सम्मानपूर्वक व्यवहार भी मिलता था। जो भी आता, विनम्र होकर ही बात करता। वर्कशाप से तैयार होकर आया सामान, यहां पर मेरे अधीन कर्मचारियों द्धारा पारित किया जाना अपेक्षित था। वे एक एक आइटम का निरीक्षण करते और मेरे हस्ताक्षर होने के बाद, वह लाॅट, पारित स्वीकार कर लिया जाता। पास हुआ सामान स्टोर में भेज दिया जाता और उसी पारित सामान की संख्या अनुसार वर्करों को रूपये की अदायगी कर दी जाती थी।

यहां पर, मेरे अधीन कुल सात वर्कर थे। मालूम पड़ा, ये सभी वर्करों से पैसा खाकर, सामान पास करते हैं। मैंने मन ही मन, निर्णय ले लिया, मैं इस धांधलेबाज़ी को समाप्त करके ही दम लूंगा। कोशिश करूंगा, मेरे अधीन एक भी कर्मचारी ऐसा काम न कर पाये।

किंतु मेरी इस कड़ाई का तो उल्टा ही प्रभाव देखने में आया। मेरे अधीनस्थ वर्कर, मेरे साथ ही सीधे मुंह बात नहीें कर रहे थे। वर्कशाप से बनकर आये सामान का जो भी लाॅट, किसी को चेक करने के लिये दे दिया जाता, वह उसी को पकड़ कर बैठ जाता। जल्दी करने को कहा जाता, तो तुरंत उत्तर मिलता, ”यह तो पूरे का पूरा लाॅट ही बेकार बना है। इसे कैसे पास किया जा सकता है!”

उधर ऊपर से ज़ोर पड़ता, ”काम क्यों नहीं निकल रहा?”

वर्कशाॅप वाले कहते, ”हमने तो कभी का तैयार करके भेज दिया है। पता नहीं, इंस्पेक्शन वाले क्यों होल्ड करके बैठै हैं।”

चेक करने वाले, काम में बीसियों नुक़्स निकाल देते… काम ड्राइंग के मुताबिक नहीं बना। ड्राइंग के हिसाब से ठीक है, तो कार्य या अपेक्षित परिणामनुसार संतोषजनक नहीं। यह भी सही है, तो फ़िनिश अच्छी नहीं आई!

एक बार मैंने झुंझला कर कहा, ”इस लाॅट को तो आज हर हालत में निकल जाना चाहिये।”

“हमें क्या है! उठा ले जाइये।”

”मगर पहले पास तो करो।”

“काम, जब बना ही ठीक नहीं, तो पास कैसे कर दें?”

”देखो, यह लाॅट तो निकाल ही दो।”

“हमने कब मना किया! ले जाइये। समझिये, सभी काम पास हैं। मगर हम नीचे साइन नहीं करेंगे।”

”वह कौन करेगा?”

“आप करेंगे और कौन करेगा!”

 

अर्चना का फ़ोन था।

”आज शाम आप हमारे यहां आ रहे हैं?”

“कोई विशेष बात है?”

”बहुत ही विशेष है।”

“अभी आ जाऊं, तुम्हारे दफ़तर में?”

”नहीं, यहां दफ़तर में नहीं।”

“क्यों? बड़ी अफ़सर बन गई हो?”

”ऐसा कहने का मैं ज़रा भी बुरा नहीं मानूंगी। मगर यहां वह बात बताना बिल्कुल ठीक न होगा। फ़ोन रख रही हूं।”

शाम को अर्चना के क्वार्टर पर ही बात हुई।

“आप का एन0 मोहन से कोई झगड़ा हुआ था?”

”नहीं तो।”

“वह जेनरल मैनेजर से, आप के खि़लाफ कुछ उल्टा सीधा बोल रहा था। मैं तब एक लेटर साइन कराने गई थी। बस, थोड़ा सा ही सुन सकी।”

”क्या कह रहा था?”

“आप का नाम लेकर कह रहा था… यह आदमी तो बिल्कुल होपलेस है। फैक्टरी को काफ़ी नुक़्सान पहुुंचा सकता है। काम को देर तक अपने पास रोके रखता हैै और पैसे लेकर ही काम पास करता है।”

”उसने नाम मेरा ही लिया था?”

“बिल्कुल! मगर उसने ऐसा क्यों किया होगा? आप तो कभी इस तरह का काम नहीं करते।”

मुझे बार बार, वही दृश्य याद आ रहा था, जब मीता मेरे सामने, अपना असली या नक़्ली अभिनय दर्शाने में मस्त थी और मुझे बार बार, किसी के बाहर मौजूद होने का आभास हो रहा था और मीता ने उस समय मेरे पुरूषत्व पर ही छींटा कसा था।

तब कहीं, वही तो बाहर खड़ा हुआ, हमारी बातें नहीं सुन रहा था? अर्चना बोली, ”आप अधिक चिंता न करें। जेनरल मैनेजर भला आदमी है। वह कानों का कच्चा भी नहीं। बस, आप थोड़ा सतर्क ज़रूर रहें। कोई उल्टी सीधी बात होगी, तो पता चल ही जायेगा।”

कितने सहज भाव से वह यह बात कह रहीे थी। स्थिति गम्भीर होते हुए भी, मैं ज़रा सा मुस्कराया और कहा, ”दफ़तर की गोपनीय बातें बता कर, नियम भंग नहीं हो जायेगा?”

वह आवेश में आकर बोली, ”नियम भंग? कोई व्यक्ति, हमारे अपने ही विरूद्ध षडयंत्र रच रहा हो, तो क्या हम बिल्कुल आंखें मंूद कर बैठे रहेंगे?”

अरूणा का अनुरोध था, कि उसके हाथ से बना हलवा चख कर ही जाऊं। वह इस समय, मां के साथ, रसोइघर में व्यस्त थी। हलवे के लिये सूजी भूनी जा रही थी। भुन जाने की सुगन्ध, इधर मेरे नथुनों में पहुंच रही थी। तभी छन्न से, चाशनी छोड़ने और खट्खट् करके, हलवा घोंटने का स्वर भी क्रम से सुनाई पड़ा।

“क्या सोच रहे हैं?” अर्चना ने पूछा।

”कुछ नहीं।”

“मीता को मैंने बहुत दिन से नहीं देखा। कैसी है वह?”

”ठीक ही है। किसी दिन कोठी पर जाकर मिल आना उससे।”

“वहां अकेली जाते तो मुझे डर लगता है। किसी दिन वह उधर आप के क्वार्टर में आये, तो बताइयेगा, वहीं मिल लंूगी।”

”मेरे यहां तो वह अब तक, सिर्फ़ एक बार आई है।”

“ऐसा क्यों? मैं तो कभी भी पहुुंच जाती हूं वहां।”

”तुम्हारी बात और है।”

“हां, यह बात तो है। वे लोग ठहरे कोठी कार वाले!”

”कोठी कार वाले बेशक हैं, मगर जहां तक मीता की बात है, उसमें अहंकार नाम की चीज़ बिल्कुल नहीं। वह एक अच्छी लड़की है।”

“मुझे तो वह बहुत ही अच्छी लगती है। सुन्दर भी तो बहुत है।”

अरूणा ने, हलवे से भरी दो प्लेटें लाकर मेज़ पर टिका दीं और बोली, ”लीजिये, चख कर बताइये, कैसा बना है!”

“इतना!” मैंने भरी प्लेट देख कर कहा।

”इसी को इतना कह रहे हैं! आपने भी कमाल कर दिया भाई साहब! अरे, मैं चमच लाना तो भूल ही गई!”

वह लपक कर गई और दो चमच उठा लाई।

“बस झटपट खा डालिये। वरना, ठंडा हलवा खाने से तो न खाना ही भला।”

मैंने चमच भर कर मुंह में डाला।

”कैसा बना है? मीठा तो ठीक है न?” अरूणा ने पूछा।

किंतु मैं अरूणा की बात का उत्तर न दे पाया।

जीभ और तालू, बुरी तरह जल गये थे। आंखों में पानी आ गया।

“क्या हुआ?” अर्चना ने पूछा और फिर मेरी शक्ल देख और बात को समझ, वह अरूणा को झिड़क कर कहने लगी, ”पागल कहीं की! ठंडा करके नहीं ला सकती थीं?”

तब तक मैं सम्भल चुका था। कहा, ”भला इस बेचारी का क्या दोष! बेवकूफी तो मेरी थी, जो हलवा देख, बच्चों की तरह झपट पड़ा।”

अरूणा सहमी सी खड़ी थी। जैसे सचमुच उसी का दोष रहा हो! बड़ा तरस आया। मैंने दो एक इधर उधर की बातें कह कर, उसे हंसाने का भी प्रयास किया, किंतु वह उसी तरह लज्जित सी, सिर झुकाये ही खड़ी रही। फिर चुपचाप बाहर निकल गई। अर्चना फिर मीता की बात ले बैठी।

”कुछ भी हो, वह आप को बहुत मानती है।”

मैंने सिर हिलाकर उसकी बात का समर्थन किया।

“कभी कभी मैं सोचती हूं कि…”

”क्या सोचती हो, कभी कभी?” मैंने मुस्करा कर पूछा।

“मीता जैसी किसी लड़की से आप का विवाह हो जाये, तो कितना अच्छा हो!”

”मीता जैसी? मीता ही क्यों नहीं।”

”वे, बड़े लोग! इतनी बड़ी कोठी, शानदार कार, सोफे क़ालीन, टी वी. फ्रिज… हम तो चाहेंगे, उसी से हो जाये। मगर कहां! और फिर आप के वो मैनेजर!”

किंतु उस समय, मैं मैनेजर के बारे में कुछ भी न सोच, मन ही मन, अर्चना और मीता के बीच तुलना किये जा रहा था। अलग अलग परिवेश होने के बावजूद, दोनों में कितनी साम्यता थी।

”आप क्या सोचे जा रहे हैं?” नहीं खाया जाता, तो रहने दीजिये।

“नहीं, यह तो पूरे का पूरा खाकर ही रहूंगा।”

”भले ही मुंह जल जाये!”

“वह तो पहले ही जल चुका!” मैं कह कर हंसा।

व्ह मेरी ओर ताके जा रही थी। बोली, ”पहले इस प्लेट को ख़ाली हो जाने दीजिये, सोचना बाद में होता रहेेगा। वैसे आप सोच क्या रहे हैं?”

मैंने मुस्करा कर कहा, ”मीता जैसी लड़की के बारे में।”

वह पश्चाताप-सा करती बोली, ”मुझ से शायद ग़लती हो गई। सच मानिये, मेरा ऐसा कुछ भी कहने या मज़ाक करने का इरादा नहीं था।”

“मगर, मैंने तो तुम्हें कुछ भी नहीं कहा!”

”शक्ल से तो यही लगता है, कि आप मेरी बात का बुरा मान गये।”

“नहीं, मैंने बिल्कुल बुरा नहीं माना।”

”लेकिन, मैं किसी दिन मीता से मिलना ज़रूर चाहंूगी।”

“मिल लो।”

”मगर मिलूं कहां, यही समझ में नहीं आता।”

“दफ़तर में, दिन भर फ़ोन तुम्हारे पास मौजूद रहता है। बात करके, उसी से पूछ लेना, कि वह कहां मिलेगी।”

 

अर्चना के क्वार्टर से मैं बाहर निकला, तब काफी रात हो चली थी। कई कुत्ते, युद्ध की प्रारम्भिक तैयारी में, ग़ुर्रा रहे थे… कुत्तों पर कहे गये, कई मुहावरे, मुझे एक एक करके याद आने लगे, जैसे धोबी का कुत्ता…

इधर रात के समय, अब कम रौनक़ नज़र आने लगी थी। मौसम थोड़ा ठंडा और लुभावना-सा हो चला था। सड़क के किनारे, बराबर के फ़ासले पर स्थित खम्बों से लगे बिजली के बल्ब, मद्धम और ज़र्द-सा प्रकाश फेंक रहे थे।

सामने से तीन चार आदमी, झूमते चले आ रहे थे। नशा शायद इतना गहरा नहंीं चढ़ा था, क्योंकि मद्धम रोशनी में भी, उन्होंने मुझे पहचान लिया था।

”कहो बाबू, खूब सैरें हो रही हैं!”

बदबू का भभका, जैसे पूरे परिवेश में फैल गया। मैं चुप रहा और वे सभी हिनहिनाते हुए, समीप से निकल आगे बढ़ गये।

पीछे से कोई बोला, ”इस साले के तो मज़े ही मज़े हैं। दोनों तरफ एक साथ हाथ मारे जा रहा है!”

 

महीने के अंत में, काम के ढेर लग जाते। वर्कशाॅप से तैयार होकर आये सामान की कतारों से, अनुभाग का बड़ा कमरा पूरा भर जाता। कितने ही आइटम, बक्सों के भीतर, यों ही गडमड से पड़े रहते। मेज़ पर, उन्हीं कार्यों से सम्बंधित काग़ज़ों के गत्थे, पड़े फड़फड़ाते। उस महीेने में जितना काम तैयार हुआ होता उस पूरे के पास या रिजेक्ट होने की रिपोर्ट देना ज़रूरी था, क्योंकि उसी के आधार पर, वर्करों को रूपये का भुगतान करना होता था।

एसिसटेंट मैनेजर सहगल, सुबह ही सिर पर आ सवार हुआ।

”भई, इस काम का क्या हुआ?” वह शायद बहुत जल्दी में था।

“यह तो अभी चेक नहीं हो पाया।” मैंने बताया।

”चेक नहीं हुआ! महीना तो ख़त्म होने को है!” वह नाराज़ सा होता हुआ बोला।

“तो क्या हुआ, अगले महीने में बुक हो जायेगा।”

”वर्करों को पेमेंट होनी है मिस्टर!” उसने चेतावनी सी दी।

“तो आप ही बताइये, क्या करूं?”

”मामूली काम है, ऐसे ही चलता करो।”

“बिना चेक किये ही?”

”अरे, इस में है ही क्या चेक करने को।”

“तब भी…”

”डरने की क्या बात है। मैं जो मौजूद हूं इधर। जब तक मैं बैठा हूं, घबराने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। कहीं कोई गड़बड़ निकल भी आई, तो हाथ के हाथ ठीक करा दूंगा… यू डोंट वर्री एट आल। आई विल वी रिसपांसिबल।”

साहब लोगों का आदेश कैसे टाला जा सकता था। दरिया में रहकर, मगरमच्छ से वैर, कैसे निभ सकता था। फिर वह तो पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले रहा था। मैंने काग़ज़ात पर हस्ताक्षर किये और माल छोड़ दिया।

मैंने रिसीवर उठा कर कान से लगाया। अर्चना की आवाज़ थी।

“आप को मीता से मिले कितने दिन हो गये?”

”कई दिन पहले मिला था। क्या बात है?”

“मुझे लगता है, वह कुछ ठीक नहींे है।”

”मतलब, बीमार है?”

“शायद।”

”तुम्हें कैसे पता चला?”

“मैंने यहां से उसे फ़ोन किया था। उसकी आवाज़ से मुझे ऐसा ही लगा, जैसे बीमार होने की वजह से, बेहद कमज़ोर हो गई हो।”

”मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं!”

“चलिये, शाम को उधर हो आयें।”

”ठीक है, छुट्टी के बाद, यहां से सीधे निकल लेंगे।”

“ओ0 के0 मैं आप को मेनगेट के पास मिलंूगी।”

 

इस क्षेत्र में सब से अधिक भीड़, शाम को छुट्टी के समय, फैक्टरी गेट से क्वार्टरों की ओर जाने वाली सड़क पर ही नज़र आती थी। कई हज़ार कर्मचारी, रेलों की शक्ल में, गेट से निकल कर, मुख्य सड़क पर पहुंचते, तो जैसे कोई बड़ा मेला या भारी जलूस ह ीनज़र आने लगता। यद्यपि यह सारी रौनक, पांच-सात मिनट में ही, कभी कभी कितनी अनहोनी-सी घटनाएं, अकस्मात ही घट जातीं। ऋृण वसूल करने वाले लाला या पठान कम वेतन पाने वाले मज़दूरों से इसी दौरान भेंट किया करते। राजनीति पर गरमागरम बहस। फैक्टरी के भीतर से ही पीकर आने वालों के बीच गाली गलौज, मुंह में पान बीड़ी ठोंसे, ज़ोर ज़ोर से हंसते और खुले आम चीख़ चीख़ कर वह सभी कुछ कहते, जो सड़क पर चलते हुए, नहीं कहा जाना चाहिये।

…जलूस, एक ख़ामोश जलूस, या बेहद शोर मचाता हुआ लम्बा जलूस… मशीनी लोगों का मशीनी जलूस!

अर्चना, मेनगेट से थोड़ा हट कर, मोड़ के पास खड़ी, मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। वह वहां मुझ से थोड़ा सा पहले पहुंच गई थी, क्योंकि लड़कियों को, हूटर से पांच मिनट पहले, मेन गेट से बाहर निकल जाने की अनुमति थी।

हम दोनों को, उस जलूस के साथ साथ चलने में अटपटा सा महसूस हो रहा था। आगे चलने वाले भी, पीछे घूम कर हमें बारबार देखे जा रहे थे। आसपास चलते कुछ सज्जन, अपनी मुस्कराहट को दबाने का प्रयास किये जा रहे थे, या एक दूसरे को संकेत से कुछ बताना चाह रहे थे।

चैराहे से थोड़ा इधर, मोची अपने निश्चित स्थान पर बैठा दिखाई दिया, तो अर्चना ने कहा,

”मुझे ज़रा अपनी चप्पल ठीक करानी है।”

“करा लो, मैं तब तक, स्टोर से एक दो चीज़ों का पता कर लंू।”

”चीज़ें साथ लिये फिरेंगे?”

“ख़रीद कर वहीं रख छोडूंगा और लौटते हुए उठा लूंगा।”

”अच्छी बात! जल्दी आइयेगा।”

इसी बीच, भीड़ गु़ज़र चुकी थी, अर्चना की चप्पल का स्ट्रैप ठीक हो गया था और मेरा स्टोर का काम भी हो गया था।

स्ट्रीट लाइट जल चुकी थीं। हर शाम की तरह, इस ओर की सड़कें, वीरान नज़र आने लगी थीं।

“वही कोठी है न, सामने वाली?” अर्चना ने पूछा।

”वही है। तुम तो एक बार पहले भी आ चुकी हो यहां।”

“हां।”

अर्चना कुछ और न कह पाई। उसे ही नहीं, मुझे भी अनिल की याद आ गई। कोठी की सीमा में प्रवेश करते, अर्चना ने कहा, ”यहां तो बिल्कुुल सुनसान पड़ा है!”

“यहां अकसर ऐसा ही रहता है।”

”मैनेजर साहब की कार भी दिखाई नहीं दे रही।”

“कहीं गये होंगे।”

तीन बार घंटी का बटन दबाने पर भी, दरवाज़ा नहीं खुला। एक बार लगा, जैसे कोई दरवाज़े तक आकर, पीछे लौट गया हो।

”मामला क्या है, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा!” अर्चना ने कहा।

“यही मैं सोच रहा हूं!”

”लौट चलें?”

“वही ठीक रहेगा।”

उसी समय, पीछे की ओर से घूम कर, बाहर ही बाहर से, नौकर आता नज़र आया।

”साहब तो नहीं हैं।” वह अर्चना से बोला।

“मीता जी भी कहीं गई हैं?”

”जी नहीं। वह तो…“ वह झिझक रहा था।

“अन्दर हैं या नहीं?” अर्चना ने पूछा।

”जी, हैं तो अन्दर ही।”

यहां पर पहली बार इस प्रकार का व्यवहार देख, मुझे आश्चर्य हो रहा था। अर्चना के साथ होने के कारण, मुझे लज्जा भी आ रही थी।

अर्चना ने उकताये से लहज़े में मुझ से पूछा, ”क्या पहले भी यहां ऐसा ही हुआ करता है?”

मैंने उत्तर दिया, ”ऐसा तो आज, पहली बार ही देख रहा हूं!”

अर्चना ने नौकर से पूछा, ”मीता जी मिल सकती हैं या नहीं?”

तभी भीतर से आवाज़ आई, ”इन्हें पीछे के दरवाज़े से अन्दर ले आओ।”

आवाज़ तो मीता की ही है! मगर, यह कैसा स्वर है?

मैं चकित था और अर्चना बेहद सहमी हुई।

अंधेेरे में, पीछे के रास्ते से, पेड़ों से गिरे पत्तों को रौंदते हुए, हम आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़े।

भीतर वाले बरामदे का बल्ब कम पाॅवर का था। एक कमरे का दरवाज़ा खुला था। नौकर ने हमें उसी ओर चले जाने का संकेत किया और स्वयं न जाने कहां ग़ायब हो गया।

अर्चना, जो अब तक मेरे बराबर चल रही थी, अब कुछ पीछे थी।

हम दोनों को ही झटका लगा था…

वह इस समय, कोई और ही दिखाई पड़ रही थी। किसी अस्पताल में महीनों से लगातार पड़ी बीमार स्त्री की तरह, जैसे उसके शरीर में, जिगर ने अपना कार्य करने से, बिल्कुल ही इन्कार कर दिया हो।

उसका चेहरा, ज़र्द या सफ़ेद… नहीं, जैसे हल्की स्याही सी पुत गई हो पूरे चेहरे पर!

वह फ़र्श पर बेसुध सी बैठी थी। सिर के बाल बिखरे हुए और बेतरतीब, उसके पहने लिबास की ही तरह। उसके शिकनों भरे लिबास में, आज किसी भी शौखी, तेज़ी या रंगीनी का कहीं नाम न था।

वह चुप थी। हमारी ओर उसने अभी तक देखा तक नहीं था। जैसे हमारी उपस्थिति से उसे कोई भी सरोकार न हो।

“मीता!” मैंने धीरे से उसे पुकारा।

उसने गर्दन उठा कर, बारी बारी से हम दोनों की ओर, निराशा से देखा। महसूस हुआ, वह किसी भी वक़्त बिलख पड़ेगी।

”मीता, बात क्या है?”

“क्यों आये हो यहां?”

ग़ौर किया, क्या ये शब्द मीता के मुख से ही निकले थे?

”चले जाओ… यहां से चले जाओ।” वह बेहद रूखी थी।

मैंने ठीक तरह से देखा, उसी के अधर हिले थे।

“मीता…?”

”भाग जाओ… दोनों भाग जाओ यहां से। अभी।”

मैंने अर्चना की ओर देखा। वह थरथर काँप रही थी। मेरी ओर देख, वह लड़खड़ाती सी आवाज़ में कहने लगी, ”चलिये, चले यहां से।” कह कर वह पीछे की ओर मुड़ने लगी।

”रूको तो।” कहकर मैं साथ वाले कमरे के दरवाज़े पर झूलते पर्दे की ओर बढ़ा।

पर्दा एक ओर हटा कर, भीतर झांका।

फ़र्श पर, आंटी लेटी थीं। बिल्कुल सीधी। तना शरीर, जिसमें तनिक भी जुम्बिश नहीं थी।

क्रमशः…३

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # ३ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वीपंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # ३ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

(चित्र साभारश्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)

≡ तीन ≡

आशी आराम से लेटी सो रही है। ट्रेन में भी वह कैसे, निश्ंिचत हो कर सो जाती है! एक मैं हूं, जिसे सफ़र के दौरान, बढ़िया सीट उपलब्ध होने के बावजूद, कभी नींद नहीं आती।

अभी, सिर्फ़ साढ़े ग्यारह हुए हैं। गाड़ी किसी जंक्शन पर रूकी खड़ी है। शायद दो एक अतिरिक्त डिब्बे, यहां से गाड़ी के साथ जोड़े जायेंगे।

बर्थ से उतर कर, खिड़की में से, चाय वाले को, दो कप चाय देने को कहता हूं।

आशी को जगा कर, चाय का गिलास, उसे थमा देता हूं। वह बिना संवाद ही, चाय पीने के बाद, ख़ाली गिलास मुझे पकड़ा देती है और पुनः लेट कर आंखें बंद कर लेती है। चाय भी उसकी नींद को प्रभावित नहीं कर पाती। एक मैं हूं जो…

बैग से, पत्रिका निकाल और बिस्तर में थोड़ा-सा फैल कर, पढ़ने का प्रयास करता हूं। किसी समांतर लेखक की कहानी मालूम पड़ती है ‘हड़ताल’।

 

हड़ताल तब पूरी तरह असफल रही थी और हड़तालियों के हौसले, वर्षों तक के लिये, पस्त हो चुके थे। हालांकि चंद बाहरी नेताओं ने, ऊपरी तौर पर, मामला रफ़ा दफ़ा करा दिया था। जिन कर्मचारियों की सर्विस ब्रेक हुई थी, उनकी एक दिन की, अवैतनिक छुट्टी स्वीकार कर ली गई थी और नौकरी से डिस्चार्ज कर दिये जाने वालों से, मुआफ़ी नामे के छपे फार्म भरा कर, उन्हें पुनः नौकरी पर ले लिया गया था। इस अभियान में, प्रशासन को विशेष सहयोग देने वालों में से, कुछ को प्रमोशन दे दिये गये थे।

हड़ताल को असफल बनाने का श्रय, एन0 मोहन को ही जाता था। यूनियन की तो उसने कमर ही तोड़ कर रख दी थी। वह अब सड़क पर, और भी अधिक तन कर चलता। कोई वर्कर इधर उधर घूमता नज़र आता, तो उसे वहीं थाम लेता और अच्छी ख़बर लेता। साथ ही आदेश हो जाता,

“स्टाॅप हिज़ ओवर टाइम फ़ाॅर ए वीक!”

स्टाफ़ की मजाल नहीं, कि उस वर्कर की सिफ़ारिश करें। वरना, उसका अपना ओवर टाइम भी, महीने भर के लिये बंद।

देखा, सामने से वही चला आ रहा है। मैंने नमस्ते की, जिस पर उसने ध्यान नहीं दिया।

“मिस्टर, क्या बात है, आप आज कल अपने काम में दिलचस्पी नहीं ले रहे?”

मैं कुछ नहीं बोला।

“आपके आदमी, हूटर होने से बीस मिनट पहले ही, साबुन से हाथ धोकर, बारातियों की तरह खड़े हो जाते हैं और आप उन्हें कुछ भी नहीं कहते!”

“सर, पहले से तो हालत बहुत सुधर गई है।”

“क्या?… जुआ खेलना बंद हो गया?”

“स्ट्राइक के बाद तो ऐसा नहीं देखने में आया।”

“आप को पता ही क्या चलता होगा। आप को यह मालूम है, कि आप के चंद वर्कर, शाम को घर जाने से पहले, यहीं से स्पिरिट पीकर घर जाते हैं?”

“स्पिरिट तो सर, ताले में रखी जाती हैं।”

“डुप्लीकेट चाबी बनाने के लिये, उन्हें लंदन तो नहंीं जाना पड़ता।”

उसके तर्क के आगे, मैं भला कहां टिक सकता था!

“देखो मिस्टर, एक बात बता दूं… अच्छा बनने, या अच्छा कहलाने का ख़याल दिल से निकाल दो। प्रमोशन चाहिये, तो नीचे वालों की नज़र में कभी अच्छे मत रहो। यु फ़ालो माई प्वाएंट?”

“येस सर।”

“हां, वो ढाई सौ वाशर तैयार हो गये?”

“जी सर।”

“डिस्पैच कब तक हो जायेंगे।”

“आज सुबह भेज दिये।”

“ज़यादा रिजेक्ट तो नहीं हुए?”

“सभी पास हो गये सर।”

“ओ0 के0… अपना काम थोड़ा आंखें खोल कर किया करो।”

एन0 मोहन का दफ़तर, हमारे सेक्शन से अधिक दूर न था और हमारे फ़ोरमैन के दफ़तर में ट्रेलीफोन मौजूद था। तब भी वह, किसी को बुलाने के लिये, हमेशा लोकराम को भेजता था, ताकि व्यक्ति विशेष को वह साथ लेकर ही पहुंचे।

वह कुछ ही देर पहले, मुझे पैरेड करा कर गया था। अपने दफतर में पहंुचते ही उसने मुझे बुलाने लोकराम को भेज दिया।

वह उस समय, अकेला ही बैठा था। अब मूड कुछ बेहतर मालूम पड़ रहा था।

“बैठिये।”

मैं ‘थैंक्स’ कह कर बैठ गया।

“क्या नाम बताया था आपने उस लड़की का, अर्चना?”

“जी।”

“मैंने उसका नाम इधर मंगवा लिया है। उसे टाइप सीखने के लिये कह दिया था न?”

“जी, सीख रही है।”

”थोड़ा बहुत आना चाहिये। बाक़ी यहां प्रैक्टिस हो जायेगी। सोच रहा हूं, उसे रखा कौन से सेक्शन में जाये। स्कूल और अस्पताल में तो कोई जगह ख़ाली नहीं। वर्कशाप में हम किसी लड़की को लगा नहीं सकते। वर्कर लोग वक़्त-बेवक़्त सीटियां ही बजाते रहेंगे और इधर दफ़तर में… हां, इधर ही कहीं एडजेस्ट करना पड़ेगा और टाइपिंग का काम तो ज़यादातर एडमिन साइड में ही होता है। क्या ख़याल है?”

“आप जैसा भी ठीक समझें।”

“अच्छा, एक बात तो बताइये, आप का मैथ्स कैसा है?”

“ठीक ही है।”

“ठीक ही है, मतलब बेकार है? हाई स्कूल में कौन सी डिवीज़न थी।”

“सर, डिवीज़न तो फ़स्र्ट ही थी।”

“तब, काम चल जायेगा… बात ऐसी है, वो हमारी लड़की है मीता। देखा तो होगा उसे?”

“जी।”

“उसे एक कम्पीटीशन में बैठना है। बाकी तो वह सब कर लेगी। मगर उसे मैथस में थोड़ा गाइड करने की ज़रूरत है। करा तो मैं भी देता, मगर टाइम कहां है मेर पास! वैसे भी, आउट आफ टच हूं और भाई, अब बूढ़ा भी तो गया हूं।” कह कर वह हंसने लगा।

लेकिन मैंने देखा, उसके गालों पर, जवान लोगों से भी अधिक लाली झलक रही है। लम्बा चैड़ा तगड़ा शरीर और बड़ी बड़ी आंखों में हर समय तैरती कोई नई शरारत!

“तो?”

“ठीक है सर, मुझ से जितना बन पायेगा, ज़रूर करूंगा।”

“तो, मेरा मतलब है, कब से आ सकोगे?”

“कल से, छुट्टी होने के बाद आ जाया करूंगा।”

“आज, कहीं ख़ास काम है?”

“सर, आज मैंने किसी को टाइम दे रखा है।”

“ओ0 के0 जेंटलमैन, थैंक यु।”

मैंने झूठ बोला था। उस शाम के लिये, मैंने किसी को कोई टाइम नहीं दे रखा था। न जाने क्यों, मैं यह पूरी शाम, अकेले गुज़ारना चाहता था, चुपचाप ख़मोश!

 

दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। आधी आधी रात तक, नाटक और नृत्य की रिहर्सिल, तबला, हारमोनियम और घुंघरूओं की छनछन। देवी प्रतिमा, को बनाने, संवारने और सजाने में महीना भर से भी अधिक समय लग जाता। इस अवसर पर, मामूली हैसियत का बंगाली भी, सपरिवार, नये वस्त्र सिलाकर पहनता, नाचता, गाता और पूजा पर्व पर आयोजित कार्यक्रमों में, बड़े उत्साह से भाग लेकर, संतुष्ट और आनन्दित महसूस करता। मिठाई का भोग लगाता और मित्रों आदि को भी अपने यहां आमंत्रित करता। ख़ूब जशन मनाया जाता, भले ही इस सप्ताह भर के आनन्द के बदले, उसे पूरा साल, ऋणभार तले ही दबा रहना पड़ता।

मैं भी कैसी कैसी बातें सोचना शुरू कर देता हूं! सभी में कुछ न कुछ विशेषता होती है। किसी में कुछ तो किसी में कुछ और…

मीता!

मीता, कई तरह से बहुत आगे थी। बी0 ए0 कर चुकी थी। उसकी इंगलिश अच्छी थी। उच्चारण भी उम्दा था। दूसरे के मन की बात, तो वह खुली किताब की तरह पढ़ लेने में वह समर्थ थी… वह खूबसूरत थी, काफ़ी खूबसूरत। शरीर, जैसे सचमुच ही, सांचे में ढला हो। सब से बड़ा आकर्षण था, उसकी अनींदी सी आंखांे और नशीली आवाज़ में।

शुरू में, उसे ठीक से देखने का साहस नहीं जुटा पाया था। कई अवसरों पर, मैंने पूरा समय, दृष्टि को इधर उधर उलझा कर ही स्वयं को सुरक्षित बनाये रखा था। किंतु मैथस के प्र्र्र्रश्न समझाते समय, जब वह थोड़ा नज़दीक बैठ जाती, तो कभी कभी वह मुझे काफ़ी नज़दीक महसूस होने लगती।

“यह प्राॅब्लम, आप को समझ में आ गई?” मैंने पूछा।

“बिल्कुल! आप के समझाने का तरीक़ा ही कुछ ऐसा है, कि बात समझ में आये बिना रह नहीं सकती।”

उसके दांत देख, कभी कभी ईष्र्या होने लगती। सफ़ेद और चमकीले। न जाने क्यों, बढ़िया से बढ़िया टुथपेस्ट का प्रयोग करने के बावजूद, मेरे दांतों पर पीलापन सा जमा, रह ही जाता है।

“क्या देख रहे हैं?” उसने हंसते हुए पूछा।

“आप की हंसी देख रहा हूं।”

“मैंने आप को, कभी हंसते नहीं देखा… आप का कभी हंसने को मन नहीं होता?”

मैंने बात को घुमाते हुए पूछा, “साहब क्लब चले गये?”

“वे तो आप के आने से पहले ही चले गये थे।”

“आंटी? वे भी साथ गई हैं?”

“नो… बहुत ही कम आती जाती हैं वे कहीं।”

“मतलब, घर में ही हैं।”

“हां, अन्दर एक छोटा कमरा है न, वहीं बैठी रहती हैं।”

“वहां क्या करती हैं?”

“बस, सोचती ही रहती हैं?”

“क्या सोचती रहती हैं?”

“आई डोंट नो, मैंने कई बार पूछा। मगर कोई जवाब नहीं। बस, चुपचाप टकटकी लगाये, छत या दीवारों को ही घूरती रहती हैं।”

“मैंने देखा है, वे अकसर सफ़ेद कपड़े ही पहने रहती हैं।”

“टंªक अलमारियां सब भरे पड़े हैं, क़ीमती रंगीन कपड़ों से, आंटी के पास हर प्राॅविंस की ड्रेस है। मगर पहनेंगी वही सफ़ेद साड़ी ब्लाउज़“

“बोलती भी बहुत कम हैं।” मैंने कहा।

“बहुत ही कम। अंकल के साथ तो उनकी बातचीत, ना के बराबर है।”

“और आप के साथ?”

“कई बार लगता है, मेरे साथ वे कोई बात करना चाहती हैं। कुछ कहने भी लगती हैं। मगर एकाएक ही न जाने क्या हो जाता है। जैसे कोई शाॅक से लग गया हो। बस, तभी चुप। सामने वही दीवारें या छत को घूरना।”

मैंने कहा, “चलिये, नेक्स्ट प्राॅब्लम पर आ जाइये।”

“ठीक है, शुरू कीजिये।”

 

ढोल बजने की आवाज़, लगातार कोनों में पड़ रही थी। दुर्गापूजा का मुख्य आयोजन, मेरे क्वार्टर के ठीक सामने, सड़क के पार, छोटी क्लब के बड़े से प्रांगन में था। ढोल की आवाज़ वहीं से आ रही थी। आरती नृत्य का समय था, तभी बाहर सड़क पर इतनी चहल पहल नज़र आ रही थी।

पुरूष, नये सिले पैंट-कमीज़ या धोती कुरते में, पर्याप्त उत्साहित दिखाई पड़ रहे थे और महिलाएं, चटकदार साड़ियां पहने, पूरा बनाव-श्रृंगार किये, हाथों में पूजा की थालियंा लिये, मस्ती भरी चाल से चलती, हंस हंस कर बातें करती और कुछ गुनगुनाती सी हुई, पूजास्थल की ओर चली जा रही थीं।

अर्चना कुछ ही देर पहले इधर आई थी और अब सामने चुपचाप बैठी थी।

“तुम भी उधर हो आओ थोड़ी देर के लिये।” मैंने अर्चना से कहा।

“मैं वहां क्या करूंगी!”

“देवी दर्शन, सभी जा रहे हैं वहां।”

“मन नहीं होता।”

“कहते हैं, मां बिगड़े काम बना देती हैं।”

“जब बना देेंगी, तब चली जाउंगी दर्शन करने!”

“नौकरी तो तुम्हारी, लगी ही समझो।”

“तब भी, मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता।”

उसकी आंखें भर आई थीं।

सांत्वना देने के लिये मुझे उपयुक्त शब्द नहीं मिल पा रहे थे। सोचने लगा, अर्चना के भी पहले कम शौक न रहे होंगे। नाटक, नृत्य, सभी में उसकी रूचि रही होगी। वह भी अपने अनिल भइया के साथ, रात के दो-दो बजे तक मंचित होने वाले नाटक देखती ही होगी। ठीक तो है, अब इसे क्या भायेंगे ये खेल तमाशे!

उसने आंखें पोंछ लीं। फिर थोड़़ा सामान्य होने का प्रयास करते कहने लगी, ”मगर, आप तो जाकर दर्शन कर आइये देवी मां के।”

“मेरा भी जाने को मन नहीं।”

“क्यों भला?… मुझे दरअसल आज इधर आना ही नहीं चाहिये था।” कह कर, वह उठ खड़ी हुई।

“अरे! क्या हुआ?”

“काफ़ी देर हो गई। अब चलंू।”

“थोड़ा रूको। अंधेरा हो गया है। मैं साथ चलकर छोड़ आउंगा। … चिंता की अब तो कोई भी बात नहीं, नियुक्ति पत्र, दो तीन दिन में मिल ही जायेगा।”

बाहर वाले बरामदे में खटखट की आवाज़ हो रही थी, जैसे कोई ऊंची एड़ी के सैंडिल पहने, चहल क़दमी कर रहा हो। बाहर जाकर देखा।

“अरे, मीता!”

“फ़ीलिंग सरप्राइज़्ड?” उसने मुस्करा कर पूछा।

“ऐसी कोई बात नहीं, अन्दर आइये न।”

“सोचा, दुर्गा पूजा के साथ साथ आप का बंगला भी देखती चलूं। ओह साॅरी!” उसने कमरे में किसी को उपस्थित देख कहा, “साॅरी की कोई बात नहीं, अर्चना है। आप तो जानती हैं न?”

‘श्योर!… कहां बैठूं?”

“इसी कुर्सी पर बैठ जाइये।”

“थैंक्स।”

 मैं उन्हें छोड़, किचिन में चला गया और चाय के लिये पानी रख दिया। कुछ देर पहले, चाय बनाने लगा था, तो अर्चना ने मना कर दिया था। कहने लगी, ज़यादा चाय पी लेने पर, उसे मतली होने लगती है।

प्लास्टिक का डिब्बा खोल कर देखा, एक भी बिस्कुट नहीं है। बड़ी शरम महसूस हुई।

कमरे में वे दोनों न जाने क्या बात कर रही थीं। पानी खौलने लगा था। देखा, खटखट करती हुई, मीता वहीं आ पहंुची है।

“यह क्या हो रहा है?”

“चाय तैयार हो रही है।”

“मेरे लिये मत बनाइयेगा।”

“क्यों?”

“प्लीज़, मेरे लिये नहीं, मैं चाय नहीं पियूंगी।”

“यह तो अब बन चुकी है।”

इस बीच मैं चायपत्ती, चीनी और दूध, खौलते पानी में छोड़ चुका था।

“तब क्या करेंगे?” उसने पूछा।

“नाली में तो मैं इसे नहीें फंेकूंगा।”

“फिर?”

“फिर क्या! पीनी पड़ेगी।”

“ठीक है… पी लेंगे!” कह कर वह हंसने लगी।

दो कप, जिन मेें मैंने चाय डाली थी, वह उठा कर कमरे में ले गई। तीसरा कप, मैंने स्वयं उठा लिया।

तीनों चाय पी रहे थे और शायद तीनों ही यही सोच रहे थे, कि क्या बात की जाये!

मैं ही बोला, “रात के समय आप अकेली कैसे चली आईं इस इलाक़े में?” मैंने मीता से पूछा।

“क्यों, आप का यह इलाक़ा, क्या डिसट्रिक्ट मुरैना में पड़ता है?”

मीता की बात सुन कर अर्चना की हंसी छूट गई।

“थैंक्स!” मीता ने अर्चना की ओर देख विनम्रता से कहा।

“किस बात के लिये?” अर्चना ने मीता की ओर चकित होकर देखा।

“आप जैसी गुमसुम लड़की का हंसना, कोई मामूली बात तो नहीं! फिर हंसिये न एक बार। सच, आप बहुत अच्छी लगती हैं हंसती हुई।”

किंतु अर्चना, पुनः नहीं हंस पाई।

“आज का नाटक देखेंगे?” मीता ने शायद हम दोनों से ही पूछा था।

“कौन सा नाटक?” मैंने पूछा।

“बादल सरकार का पगला घोड़ा, दुर्गा पूजा वाले, जो सामने वाले मैदान में करने जा रहे हैं। उनके छपे प्रोग्राम में यही लिखा था।”

मैंने कहा, “मुझे तो कभी शौक नहीं रहा नाटक वाटक देखने का।”

“मुझे भी नहीं।” अर्चना ने कहा।

“स्ट्रेंज!… अच्छा, तो मैं चलूं। अंकल को उधर छोड़ कर आई थी। दो मिनट के लिये कहा था, बीस मिनट लग गये।”

“साहब भी आये हैं? उन्हें क्यों नहीं लाईं यहां?”

“उन्हें नाटक शुरू होने से पहले, स्टेज पर जाकर छोटा सा भाषण देना है। मालूम है, आज अंकल धोती कुरते में हैं। बिल्कुल महात्मा लग रहे हैं!” कह कर वह हंसने लगी।

मैंने अर्चना से कहा, “चलो, हम भी उधर हो आयें थोड़ी देर के लिये।”

“मैं तो अब घर ही जाऊंगी।”

“घर इस वक्त अकेली कैसे जा सकोगी।”

“आप चिंता ने करें, मुझे कुछ नहंीं होगा।” कहते ही अर्चना उठ खड़ी हुई।

तभी मीता बोल पड़ी, “मैं अंकल से कह देती हूं, वे कार से छोड़ आयेंगे।”

कार वाली बात सुन, अर्चना सकपका सी गई। बोली, “नहीं नहीं, आप कष्ट न करें, मैं पैदल चली जाऊंगी।”

मीता ने हंसते हुए, अर्चना का हाथ पकड़ लिया और बोली, “आप क्या समझती हैं, मैं आसानी से पीछा छोड़ देने वाली हूं? नो नो माई डियर, आप को हमारी कार में ही जाना पड़ेगा।”

“मगर…”

“अरे उठिये भी और आप, क्वार्टर को ताला लगाइये।”

 

उसका चेहरा देख, कोई भी नया शख़्स, आसानी से धोखा खा सकता था। वह हरदम हल्के हल्के मुस्कराता ही नज़र आता। सांवला वर्ण, तीखे नक़्श, दरम्याना क़द, शरीर छरेहरा और फुर्तीला सा। चाल में तेज़ी और आवाज़ में शीरनी घुली हुई!

वह कहता, “आज आपका काम, हर हालत में हो जायेगा। लीजिये, मैं आप का नाम, डायरी में सबसे ऊपर लिख लेता हूं और क्वार्टर नम्बर… यही है न आपका क्वार्टर नम्बर, बहत्तर का पांच?”

“जी हां, यही है।”

“तो समझिये, आप का काम हो गया!”

क्या मजाल, जो कभी किसी ने, उसके चेहरे पर शिकन देखा हो, या उसने किसी को उसके काम के लिये कभी मना किया हो।

फैक्टरी में वह भी सुपरवाइज़र था। किंतु मेरी तरह नहीं। वेतन तो उसे, मुझ से भी कम मिलता था। मगर उसकी चलती बहुत थी। उसका काम ही कुछ ऐसा था, कि एस्टेट के प्रत्येक निवासी को, उससे कभी न कभी, काम पड़ ही जाता था।

बिजली, पानी, नल फ़्लश अथवा क्वार्टर की छोटी मोटी मरम्मत और देखभाल, सब उसी के ज़िम्मे था। स्टाफ़ कम था और उसके हिसाब से, क्वार्टरों की संख्या और रोज़मर्रा की समस्याएं बहुत अधिक। कारीगर और मज़दूर, सभी ऐसे थे, जैसे आमतौर पर सरकारी कर्मचारी हुआ करते हैं। पूरे दिन में, दो घंटे भी काम कर ल, ें तो समझ लिया जाये, सरकार और देश की जनता पर, भारी उपकार हो गया। चार आदमी मिलकर एक छोटे क्र्वाटर की, चार दिन में पुताई करते। उसे करने के लिये भी, वे बड़े ही नख़रे और हील हुज्जत के बाद तैयार होते। मगर यदि उन्हीं में से, किसी एक को, प्राइवेट तौर पर अर्थात अपनी जेब से पैसे ख़र्च करके, उसी काम के लिये पक्का कर लिया जाता, तो वह अकेला ही, ढाई तीन घंटे में, पूरा काम निबटा और रूपये अपनी जेब में डाल कर चलता बनता।

अस्तु, उन लोगों से काम लेने वाला और अनेक क्वार्टर-निवासियों को संतुष्ट करने हेतु, वही एक मात्र व्यक्ति था। ऊपर वाले तो, आवेदन पत्रों को, केवल ‘उचित कार्यवाही हेतु’ वाली संक्षिप्त टिप्पणी लिख कर खिसका देते। सभी मामले घूमफिर कर, उसी के पास पहुंचने होेते थे। इसीलिये, सभी ज़रूरतमंद, अकसर उसी के पास सीधे पहंुचते थे और वह सभी को यही आशवासन दे दिया करता, “आप का काम जल्दी हो जायेगा।”

वह, जिस का नाम रोशन लाल था, किसी को ‘न’ कहना तो जानता ही न था। किंतु वह किसी का काम कब करेगा, करेगा भी या नहीं, कोई नहीं कह सकता था।

मगर चंद लोगों का काम वह तुरंत करा डालता था। अफ़सर, युनियन के बड़े नेता या उनके मुख्य चमचे, उसका कोई बहुत ही परिचित या कोई ऐसा व्यक्ति, जिस से उसका कोई अपना काम निकलता हो।

एक बार लिखकर, चार बार फ़ोन पर और पांच बार व्यक्तिगत सम्पर्क करके, मैं उससे निवेदन कर चुका था, कि मेरे क्वार्टर में फ़्लश काम नहीं कर रहा। फ़र्श कई जगह से उखड़ गया है और बाथरूम का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं होता।

इनमें से कोई भी बात ऐसी न थी, जिसके कारण, फैक्टरी के उस ‘मेनटिनेंस-अनुभाग’ में भगदड़ मच जाती। किंतु जब मेरे क्वार्टर के पिछले आंगन का बाहरी दरवाज़ा जिसकी लकड़ी पूरी तरह गल सड़ चुकी थी, एक ओर को झूलना शुरू हो गया, तो मैंने रोशन लाल को चेतावनी देते कहा, “यदि मेरे क्वार्टर में चोरी हो गई, तो उसकी पूरी ज़िम्मेदारी आप पर होगी।”

वह हंस कर बोला, “चोरी हो जाने पर हर्जाना मैं दूंगा! मगर मुझे विश्वास है, कि आप के क्वार्टर में चोरी नहीं होगी। चोर भला अकेले आदमी के घर, क्या चुराने आयेंगे!”

“फिर भी मिस्टर रोशन लाल…”

“आप का काम हो जायेगा, आप बिल्कुल चिंता न करें।”

“चिंता न करूं।”

“परेशानी तो यह हैं, कि आपके क्वार्टर में हर वक़्त ताला लगा रहता है। रिपेयर का काम हो तो कैसे?”

“ताला खुल भी तो सकता है।”

“कैसे? तोड़ कर?” उसने मुस्करा कर पूछा।

“तोड़ने की ज़रूरत नहीं। जिस दिन भी आप अपना अमूल्य समय देने में समर्थ हों, चाबी मिल जायेगी।”

“यह हुई न बात! मेरे पास कल चाबी पहंुचा दें और फिर देखिये, कितनी जल्दी होता है आपका काम!”

मेरे पास क्वार्टर की डुप्लीकेट चाबी थी, जो मैंने रोशन लाल को दे दी। वैसे इतना तो मुझे पता ही था, कि इतने मामूली काम में भी, आठ दस दिन लग जाना मामूली बात है।

किंतु उस साधारण मरम्मत में तो, मेरे अनुमान से बहुत अधिक समय लग चुका था और काम अभी तक अधूरा पड़ा था। फ़र्श पहले से भी बुरी हालत में था। दरवाज़े ज़रूर ठीक हो गये थे। फ़्लश भी काम करने लगा था। मगर फ़र्श! उसकी हालत ने, बुरी तरह परेशान कर रखा था। सभी ओर मिट्टी और हर चीज़ पर धूल। खाना तैयार तो कर लेता, मगर खाने को मन न होता। इसी वजह से, रात को, गांव के छोटे से बाज़ार में जाकर, ढाबे में खाना खाने लगा।

तंग आकर, एक दिन फिर पूछा, “रोशन लाल जी, कब तक हो जायेगा, इस मरम्मत का हिसाब किताब पूरा?”

“जब भी आप हुक्म दें, तभी। बात यह है, कि अपने आदमी का काम संतोष जनक न हो, तो हमारे ऊपर सौ बार लानत! आपका काम होगा एक दम फ़्र्सट क्लास!”

मैंने कहा, “अरे भई, यह कौन सी हमारे पिता जी की जायदाद है। आप बस, जैसा भी होता है, इसे पूरा करा दें।”

“बस, अब तो सिर्फ़ दो तीन दिन का काम और रह गया है। आप तो जानते हीे हैं, ये सब बहन के यार, काम करने में कितने सुस्त हैं और भाई साहब, आजकल टाइम बहुत ही ख़राब है। जिस किसी को ज़रा सी बात भी कह दो, वही साला जाकर यूनियन के मुसटंडों को लाकर हमारे सिर पर सवार कर डालता है।”

“आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।” मैंने उसकी बात की ताईद की।

“मगर आप निश्चिंत रहें। मैं इन हरामियों से निबटना खूब जानता हूं। आप का काम, बस हुआ ही जानें।”

 

अपना कोई भी दोष न होने के बावजूद, मेरी गर्दन शरम से झुकी जा रही थी। मेरे पास, अर्चना की बात का कोई भी उत्तर न था।

मुझे उसका कोई ऋण नहीं चुकाना था और न मैंने अब तक, उससे किसी तरह का कोई वायदा ही किया था और न अभी तक हमारे बीच कोई रिश्ता ही क़ायम हुआ था। तब भी…

मगर उसने भी तो अपनी बात, कुछ कटुता या व्यंग्य में नहीं कही थी। मामूली सा प्रश्न था, ”कौन थी वह लड़की?”

मुझे नहीं मालूम, वह कौन थी, जिसे अर्चना ने मेरे क्वार्टर से बाहर निकलते देखा था।

मैंने पूछा, “ठीक से याद है, मेरा ही क्वार्टर था?”

“कमाल है! मैं आप के क्वार्टर को कैसे भूल सकती हूं!”

“समय क्या रहा होगा?”

“चार-सवा चार का होगा।”

“मैं तो उस समय फैक्टरी में होता हूं।”

“वही तो मैं हैरान थी।”

“अब इस बारे में क्या कहूं?”

“इस बारे में मैंने आप से पूछा तो कुछ नहीं, सिर्फ बताया है। मेरा मतलब, मामला चोरी का तो नहीं?”

“चोरी तो कुछ नहीं हुआ। मगर…”

मैं बात, अर्चना से कर रहा था और सोच कुछ और ही रहा था।

अर्चना ने कहा, “आप तो सचमुच ही मेरी कही बात का बुरा मान गये। विश्वास कीजिये, मेरा वैसा कुछ भी इरादा न था और फिर मेरा अधिकार भी तो…“

मैंने बीच में ही टोका और खीज कर कहा, ”क्या वाहियात बात है!”

मैं अकस्मात ही इस प्रकार खीज कर बोला, तो वह सहम गई। देखते ही देखते, उस के माथे पर पसीने के क़तरे उभर आये। मैंने उसे इस तरह देख, अपना मूड सप्रयास बदला और मुस्कराने की भी चेष्ठा की।

“मैं पता कर के बताऊंगा, वह लड़की कौन थी।”

“कोई भी हो, मुझे नहीं जानना!” उसने उकता कर कहा।

“यह तुम्हारे जानने की हो तो बात नहीं। तुम्हारी तरह, किसी और ने भी तो उसे देखा होगा। क्वार्टर मेरे नाम पर है। बदनामी भी मेरी ही होगी।”

वह कुछ सोचने के बाद बोली, “क्वार्टर क्या खुला ही पड़ा रहता है दिन में?”

“खुला तो नहीं रहता। मगर मैंने डुप्लीकेट चाबी रोशन लाल को दे रखी है।”

“मरम्मत अभी तक चल रही है।”

“अभी तक तो चल ही रही है!”

 

यह एक तरह से ठीक ही हुआ, कि अर्चना ने बात को मन में न रख कर, अपनी शंका मेरे सामने व्यक्त कर दी।

अनुमान था, रोशनलाल अपने ऊपर लगे लांछन की बात सुनते ही आग बगूला हो उठेगा और लांछन लगाने वाले का नाम तुरंत जानना चाहेगा। मगर मेरी बात सुन कर वह तटस्थ ही बना रहा। फिर मुस्करा कर पूछने लगा, “आप से किस ने कहा?”

“किसी ने भी कहा हो! बात सच है या झूठ?”

“सच और झूठ के बीच, एक सूत का भी फ़ासला नहीं होता। और फिर अन्तर ही क्या पड़ता है ऐसी मामूली बातों से?”

मैंने पर्याप्त कटु होकर कहा, “मिस्टर रोशन लाल, अन्तर मुझे पड़ता है। क्वार्टर मेरे नाम पर है। वहां मैं रहता हूं।”

“गरम होने की भला क्या ज़रूरत है! वैसे मैं समझ तो गया, आप तक यह बात किस ने पहंुचाई!”

“किसी ने भी पहुंचाई हो, बात है तो बुरी न!”

“अरे भाई साहब, बात कुछ भी नहीं है! आप सुबह से शाम तक फैक्टरी की चारदीवारी में बंद रहते हैं। आप को क्या मालूम, बाहर एस्टेट के क्वार्टरों में दिन भी क्या क्या गुल खिलते हैं। मैं तो एक एक के कारनामों से वाक़िफ हूं, मियां शाम तक फैक्टरी में ओवर टाइम किया करते हैं और बीवी साहिबा पीछे घर में…”

“छी छी! कैसी बातें आप किये चले जा रहे हैं!”

वह बदस्तूर ढीट सा बना हुआ था।”कौन, किस के पीछे लगा हुआ है, मेरे पास तो पूरी लिस्ट मौजूद है।”

“प्रत्येक क्वार्टर में अपनी पहंुच का यही लाभ कमाया है आपने!”

“भाई जान, लाभ हानि के प्रश्न, मैं कक्षा सात में हल किया करता था। अब नहीं सोचता इन छोटे मोटे प्रश्नों के बारे में! सही बात तो यह है, कि जब आम, पेड़ पर से अपने आप टपक कर किसी की झोली में आ पड़े, तो बेचारा झोली वाला क्या करे! मैं फिर कोई साधू संत या धर्मात्मा टाइप आदमी भी नहीं, जो…”

मैंने अपनी कटुता में, मामूली-सी कृत्रिम विनम्रता का घोल मिला कर कहा, आप की बड़ी ही कृपा होगी। जो शीघ्र अति शीघ्र्र, मेरे क्वार्टर से अपना कबाड़ उठा लें। मुझे मरम्मत नहीं करानी!”

“मरम्मत का काम तो पूरा हो चुका।”

“मुझे आप से यह उम्मीद न थी!” मैंने पुनः निराशा जताई। वह चलते चलते बोला, “आप से जिसने शिकायत की, मैं उसे एक अच्छी लड़की समझता था!”

“बात मुझ तक पहंुचाने के बाद, वह अच्छी से बुरी लड़की बन गई?”

उसने उत्तर नहीं दिया।

 

समझ में नहीं आता, ये लोग किसी की कही बात को समझने की कोशिश क्यों नहीं करते! कितनी बार कहा है, कि जब काम न करना हो, तब कहीं इधर उधर जाने से पहले, मशीन का स्विच ज़रूर आॅफ़ कर दिया करें। मगर किसी को कोई परवाह नहीं! मोटर लगातार गरम होती रहती है। पाॅवर अलग ज़ाया जा रही है। ऐसे में कोई दुर्घटना हो जाये, तो लेने के देने पड़ जायेंगे।

इधर मशीन चल रही है और उधर दूर खड़े वर्कर साहब, किसी से बतिया रहे हैं। खुद ख़ाली हैं और दूसरे को भी अपना काम नहीं करने दे रहे!

“यह क्या हो रहा है मिस्टर?” मैंने एक को टोकना चाहा।

”होना क्या था! ज़्ारा इंस्पेक्शन तक जा रहा हूं।”

“वहां क्या है?”

“देखना है, मेरा पहले भेजा हुआ लाॅट, पास हुआ या नहीं।”

“यह मालूम करना, आप का नहीं, मेरा काम है।”

“अच्छी बात है! बहुत अच्छी बात है! आप जाकर मालूम कर लीजिये। मेरा नया लाॅट रिजेक्ट हो गया, तो आप पर ज़िम्मेदारी होगी।”

“अरें, लाॅट आप बना रहे हैं, तो मैं कैसे ज़िम्मेदार हूंगा?”

“तभी तो कहा, मेरे वहां पहुंचे बिना, काम पास नहीं होगा।”

“क्यों नहीं होगा, यह तो पता चले?”

“जाकर देख लीजिये। समोसे और चाय की टेª के अलावा, पिक्चर दिखाने का जब तक वायदा नहीं होगा, काम थोड़े ही पास हो जाया करता है!”

“इसी तरह रिश्वतें दे दे कर, आप ने उन लोगों को सिर चढ़ा रखा है!”

“आप थोड़ी कोशिश कर देखिये। शायद आपके कुछ करने से ही, देश की हालत में सुधार आ जाये!”

मैं चुप हो रहा। दोनों वर्कर हंसने लगे। फिर तीन चार और इधर उधर से पास आकर, उनकी हंसी में शामिल हो गये।

वे हंस रहे थे और हंसते ही चले जा रहे थे। मैं ‘कहीें कुछ भी नहीं किया जा सकता’ मान कर कुढ़ता चला जा रहा था।

हंसना और कुढ़ना! और कुछ भी नहीं!

प्रश्न फिर वही! क्या सही और क्या ग़लत?

तंग आकर कहना ही पड़ा, “आप लोग काफी हंस चुके। अब अपना काम शुरू कर दें, तो बेहतर होगा।”

“आप को काफ़ी परेशानी होती है, हमें हंसते देख?”

“मगर कोई मतलब भी तो हो हंसने का?”

मैंने महसूस किया, कि वे लोग, इससे पहले भी मुझे देख, कई बार हंसते रहे थे। मगर मैं कारण नहीें समझ पाया था।

मैंने अपने कैबिन में काम करने वाले लड़के को भेज कर, उस्ताद को बुला भेजा।

“बैठिये उस्ताद साहब।”

“शुक्रिया!” कह कर वह सामने पड़े स्टूल पर बैठ गया।

“कहिये, आप की शायरी कैसी चल रही है?”

“हयात का माहौल खुशगवार न होने की वजह से, शायरी कुछ जम नहीं रही इन दिनों।”

“ख़ैरियत तो है?”

“ख़ैरियत क्या! घर में किसी को ख़ांसी जुकाम तो किसी को पेट दर्द। बीवी साहिबा की तो हमेशा कमर ही टूटी रहती है। या मतवातर दर्द से सिर फटा रहता है। अब ऐसे हालात में, कोई कुछ लिखना भी चाहे, तो कैसे!”

“हां, बड़ा मुश्किल है ऐसे में शेर वगैरा लिखना। अच्छा, एक बात तो बताइये।”

“फ़र्माइये?”

“कई वर्कर मुझे देख, इन दिनों बहुत हंसते हैं। क्या मामला ह। ?”

“बच्चे हैं। आप कुछ ख़याल न करें।”

“फिर भी, बात क्या है?”

“मुझे कुछ सही तौर पर तो इल्म नहीं। मगर वो देवी लाल हैं न। वही उल्टी सीधी हांकता रहता है।”

“क्या कहता है?”

“अजी कहना क्या, बकता है। आप के क्वार्टर मेें कोई रिपेयर चल रही है न?”

“अब तो सब क़ाम पूरा हो चुका है वहां। क्यांे?”

“बस, उसी बारे में ये लोग, बातेें बनाते रहते हैं। कहते हैं, सुपरवाइज़र साहब के क्वार्टर में रिपेयर चल रही है और इसलिये वे खुद इधर उधर चक्कर काटते रहते हैं।”

“इधर उधर?”

“बदमाश हैं! कहते हैं, कि शाम के वक़्त सुपरवाइज़र साहब से मिलना हो, तो मज़दूर कालोनी में चले जाओ, या फिर बेंगलो एरिया में।”

 

ऐसा कई बार देखने में आया है कि जब भी कभी किसी काम की बहुत जल्दी हो, तभी रोज़मर्रा के साधारण कार्यों में भी मामूल से अधिक समय लगने लगता हैं। जेनरल मैनेजर के हस्ताक्षर किये अधिपत्र अनुसार, वे सभी कार्य, अगले दिन तक अवश्य पूरे हो जाने चाहियंे थे। किंतु कार्य विशेष आरम्भ होने के दस मिनट बाद ही ग्राइंडिंग मशीन की बेल्ट टूट गई। यह बिल्कुल मामूली मरम्मत का काम था। मगर अन्य अनुभाग से पधारे मिस्त्री लोग, मशीन को इस तरह घेर कर बैठे थे, कि इसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मैं उनसे बार बार निवेदन कर रहा था, कि बेल्ट को ठीक करके मशीन छोड़ दें, मगर कोई सुन ही नहीं रहा था।

मशीन ठीक नहीं हो रही, यह परेशानी मेरी अपनी थी। ठीक करने वालों के आगे, मेरे गिड़गिड़ाने का कोई भी अर्थ न था और ऊपर वालों के पास, मेरे लिये वही नपे-तुले शब्द थे… बहाने मत बनाइये… कहानियां मत सुनाइये… नो आर्गूमेंटस मुझे फ़ौरन यह काम मुकम्मल चाहिये, वरना…

“आप का फ़ोन है।” किसी ने कहा।

“मेरा?”

वर्कशाप में मेरा फ़ोन कम ही आया करता था। सोचने लगा, किस का होगा?

फ़ोरमैन, अपने दफ़तर में नहीं था। मैंने रिसीवर उठाया।

मीता, कोठी से बोल रही थी। पूछ रही थी, “आप बीमार हैं?”

“नहीं तो! क्यों?”

“आये क्यों नहीं इतने दिन से?”

“ऐसे ही।”

“ऐसे ही, मींस? समथिंग सीरियस?”

“नथिंग सीरियस।”

“फिर क्या बात हैं?”

“बात तो कुछ भी नहीं।”

“या बात मुझे बताने वाली नहीं, मैं शायद कुछ हैल्प कर सकंू?”

“ठीक है, मैं आज शाम को आ जाउंगा।”

“कितने बजे? जल्दी ही न?”

“यहां फैक्टरी से छुट्टी होगी, सात बजे। उसके बाद…”

“ओवर टाइम छोड़ नहीं सकते एक दिन के लिये?”

“ना… वह तो नहीं छोड़ा जा सकता।”

“बड़े ही लालची हैं! शायद बोनस वग़ैरा भी मारा जाता है, एक दिन की छुट्टी लेने पर?”

“फैक्टरी की ये बातें, आप को कैसे मालूम पड़ गईं? वैसे रूपये पैसे की कोई बात नहीं, यहां काम में बुरी तरह उलझा हूं। काम पूरा न हुआ, तो आप के अंकल मेरी पैरेड ले लेंगे।”

“तो, आठ बजे तक तो पहंुच ही जायेंगे न?”

“बिल्कुल।”

“एक ज़रूरी बात करनी है।”

“मुझे मालूम है।”

“अरे, आप को कैसे मालूम है?”

++++

“ज़रूरी काम न होता, तो आप फ़ोन क्यों करती!”

”ओ0 के0 एक बात और… शाम को कुकिंग वग़ैरा में टाइम वेस्ट न करें। डिनर इधर ही हो जायेगा।”

“एक बात बताने का तो कष्ट करेंगी मीता जी?”

”अभी? ख़ैर पूछिये।”

“आप का कहीं मुझे नौकरी से निकलवा देने का तो इरादा नहीं?”

उत्तर में वह हंस कर बोली, ”ऐम आई सो क्रूएल?”

 

पहली बार, मैंने उसे, गहरे के बजाये, हल्के रंग के लिबास में देखा। हल्का गुलाबी, बिल्कुल उसके चेहरे के रंग जैसा, या मेज़ पर रखे गुलदस्ते में सजे और भीनी भीनी खुशबू बिखेरते गुलाब के फूलों जैसा।

इस बात पर भी ध्यान गया, कि पहली बार उसने आगे बढ़ कर, भरपूर मुस्कराहट के साथ, मोतियों जैसे दांतों की नुमाएश करते हुए, मेरा स्वागत नहीं किया।

उसके होंठ बंद थे। आंखें, वहीं अनींदी सी।

सोफ़े पर बैठते ही मैंने अनुमान लगाया, यह अब अपना वही प्रश्न दोहरायेगी… आये क्यों नहीं इतने दिन से?

किंतु वह चुप थी और गरदन झुकाये, फ़र्श की ओर देखे चली जा रहीे थी। बिल्कुल अर्चना की तरह!

एकाएक ही वह गरदन ऊपर कर पूछने लगी, ”अर्चना की नौकरी लगने वाली थी। क्या रहा उसका?”

”लगने ही वाली है। कल मेडिकल हो जायेगा और शायद परसों से काम पर जाने लगेेगी।”

वह पुनः विचारों में गुम हो गई। मैं आज उसके इस तरह गम्भीर होने का कारण, कुछ भी समझ नहीं पा रहा था।

ज़रा सा रूक कर मैंने पूछा, ”वह ज़रूरी बात क्या थी?”

”ज़रूरी बात?” वह चकित सी मेरी ओर देख, पूछ रही थी।

“फ़ोन पर जो कहा था, कोई ज़रूरी बात है।”

”शायद कहा था। बट, आई डोंट रिमेम्बर! क्यों कहा होगा?” वह कुछ अनमनी सी बोल रही थी।

“मीता! बात क्या है?”

”बात… कुछ भी नहीं… आइये, पहले डिनर ले लिया जाये।” वह उठते हुए बोली।

“मगर पहले…”

”उठिये, प्लीज़!”

मैं उसके साथ डाइनिंग रूम में चला गया। ऐसा लगा, जैसे अभी अभी कोई खाना यहां लगा कर चलता बना हो।

“खाना तो मैं…”

”क्या? फ़ोन पर मैंने कुछ कहा था न!”

“कहा तो था।”

”आप, बैठ जाइये। प्लीज़!”

मैं बैठ गया, तो वह भी बैठ गई।

“शुरू कीजिये।”

मैं चुप बैठा रहा। अकस्मात ही वह खिलखला कर हंस पड़ी। मैं भौंचक्का सा रह गया। हंसते हुए तो मैंने उसे इससे पहले भी कई बार देखा था, मगर इस तरह की खोखली और कृत्रिम हंसी, वह भी मीता की!

”मामला क्या है?” मैंने पूछा।

“आप एक रिक्युस्ट मानेंगे?”

”कहिये?”

“चुपचाप खाना शुरू कर दीजिये।”

”अच्छी बात।” कह कर मैंने हाथ आगे बढ़ाया।

मैं खाने लगा तो उसने भी शुरू कर दिया। किंतु इस तरह, जैसे उसको बिल्कुल भूख न हो और सिर्फ़ मेरा साथ देने के लिये, सूप के प्याले में चमच हिलाती जा रही हो।

मैंने पूछा, ”साहब तो क्लब में होंगे?”

”वे बाहर गये हैं, आप को नहीं पता?”

“आज दिन में तो फैैक्टरी में ही थे।”

”शाम को कार में ही निकल गये हैं दो दिन के लिये।”

“और आंटी?”

”मैंने आप से एक रिक्युेस्ट की थी।”

“साॅरी!”

खाने के बाद, हम पुनः ड्राइंगरूम में पहले की तरह जा बैठे और पहले की ही तरह गुम सुम से हो गये।

”वह ज़रूरी बात, अब तो शायद बताई जा सकती है।”

“वह बाद में। पहले यह बताइये, आप मुझ से किस बात पर नाराज़ हैं?”

”किसने कहा, मैं नाराज़ हूं?”

“पूरा वीक निकल गया और आज भी आप मेरे बुलाने पर आये हैं वजह जान सकती हूं?”

”वजह बतानी ही पड़ेगी?”

“बिल्कुल बतानी पड़ेगी!”

मैंने संक्षेप में बात बता दी। सुन कर वह सोच में पड़ गई। फिर कहा, ”इसका मतलब तो यही हुआ, कि आपने अर्चना के घर जाना भी बंद कर रखा है।”

“हां, वहां भी मैं नहीं जा सका।”

”यह ज़यादती है। इसमें भला उस बेचारी लड़की का क्या दोष?”

“दोष तो किसी का भी नहीं!”

वह फिर किसी सोच में पड़ गई।

मैंने पूछा, ”क्या बात है?… क्या सोचे जा रही हैं, कुछ तो पता चले?”

वह कुछ देर चुप रही। फिर कहने लगी, ”मैं तो आपको बहुत बोल्ड समझ रही थी, मगर आप तो बहुत ही डरपोक निकले!”

मैंने कहा, ”इसके बिना भी तो काम चल सकता है।”

“किस के बिना?”

”किसी से मिलेजुल बिना।”

“आप शायद ठीक ही सोचते हैं!”

”आप ने अभी तक अपनी वह ज़रूरी बात नहीं बताई।”

“मैं कोई डिसीशन नहीं ले पा रही हूं, वह बात कहनी भी चाहिये या नहीं।”

समझ में न आया, उसकी इस बात का क्या उत्तर दूं। तब भी कहा, ”मेरे लिये आप थोड़ा बहुत भी अपनापन महसूस करती हों, तो कह देना चाहिये।”

वह थोड़ा सा रूक कर बोली, आंटी की हालत कुछ नार्मल मालूम नहीं पड़ रही।”

”क्या हुआ उन्हें?”

“उनकी मेंटल कंडीशन ख़राब लगती है।”

”वे इस वक़्त हैं कहां?” अस्पताल में?

”नहीं, वहीं हैं अपने उसी कमरे में… कई दिन से लगातार बड़बड़ा रही हैं। खानापीना भी बंद कर रखा है। सोती भी नहीं। रात मे न जाने, अपने से ही क्या कहती रहती हैं।”

“यह तो सचमुच ंिचंता की बात है!” मैंने कहा।

”परसों, नींद की गोलियां खा गईं।”

“ओह माई गाॅड!… फिर?”

”अंकल को बहुत भागदौड़ करनी पड़ी। आप को तो इस बात का कुछ भी पता न होगा?”

“किसी को भी नहीं पता।”

”अच्छा ही हुआ! वरना बहुत बदनामी होती।”

“वे जब बड़बड़ाती हैं, तो कोई बात समझ में आती है?”

”दो ही बातें समझ में आती हैं… मैं सब जानती हूं, और मैं पागल नहीं हूं।”

मैंने थोड़ा सोच कर कहा, ”मेंटल केस ही मालूम पड़ता है।”

”अंकल का भी यही ओपनियन है।”

हम कुछ देर चुप बैठे रहे। फिर मैंने कहा, ”इस समय तो बड़बड़ाने की आवाज़ नहीं आ रही।”

”डाक्टर ने, सुलाने के लिये कोई मेडिसिन दे रखी है।”

“कौन से डाक्टर का इलाज चल रहा है?”

”यहीं की लेडी डाक्टर। उसी का ट्रीटमेंट चल रहा है।”

कुछ देर के लिये फिर निस्तब्धता छा गई। वह पुनः गरदन झुका कर सोच में डूब गई। झुकी हुई गरदन, कुछ टेढ़ी हो जाने के कारण, उसके घने लम्बे बाल, एक ओर को छितरा गये थे और गरदन का दुधिया रंग चमकने लगा था।

मैंने उसे सांत्वना देने के विचार से कहा, ”इतना सोचने की ज़रूरत नहीं। अच्छा ट्रीटमेंट मिलने पर सब ठीक हो जायेगा।”

नौकर काॅफ़ी ले आया।

कप हाथ में लेकर पहला घंूट भरने ही लगा था, कि साथ वाले कमरे का पर्दा हिला और दरवाज़े में आंटी खड़ी नज़र आईं।

वही सफ़ेद लिबास, मगर बेहद मैला। आंखें बिल्कुल सुर्ख नज़रें, मीता को घूरती हुईं।

”क्या पिला रही है इसे? ज़हर?”

मीता का चेहरा सफ़ेद पड़ता जा रहा था।

“बोलती क्यों नहीं? ज़हर ही है न?”

मैंने साहस बटोर कर कहा, ”ज़हर नहीं, काॅफ़ी है।”

वे मेरी ओर बढ़ीं… समीप और समीप!

महसूस हुआ, कप मेरे हाथ से छूटने को है। मैंने सप्रयास, इसे मेज़ पर टिका दिया।

“यह कप भी, चीनी मिट्टी का नहीं, ज़हर का बना हुआ है। इस कॅाफ़ी में भी, मीठे के बजाय, ज़हर घोला गया है… यहां के हर दरोदीवार पर, ज़हर का लेप फिरा है… तुम बच नहीं सकते… इसे ज़हर से तुम कभी नहीं बच सकते… कोई नहीं बचा सकता तुम्हें… तुम मरोगे… ज़रूर मरोगे…!”

 

मैं रात भर, भयानक और अजीब से सपनों में भटकता रहा… बाजे बज रहे हैं। बारात चढ़ने लगी है… जल्दी करो, जल्दी करो… वक़्त गुज़रा जा रहा है और अभी तक कुुुछ भी तैयारी नहीं हुई… मगर यह शादी, किस की हो रही है? दूल्हा कौन है?… शादी तो शायद मेरी ही हो रही है… मगर मैं तो मैले कपड़े पहने हंू। नहाया भी नहीं। अन्य सभी सजे संवरे, घूम रहे हैं और मैं… नहीं, यह शादी तो अर्चना की हो रही है। मगर उसका लिबास, बिल्कुल मीता की तरह है… अरे, यह तो मीता की शक्ल है… दूल्हा इस तरह सिर क्यों झुकाये चला जा रहा है? … वह एड़ियां उठाकर, वरमाला गले में डालने की कोशिश कर रही है। तब भी, माला गले में न पड़कर, फ़र्श पर जा पड़ी है… वह उसे ज़मीन से उठा लेती है और इधर उधर देखती है… दूल्हा अब छोटा और नीचे हुआ जा रहा है… छोटा होते होते, अब धरती से ही लग गया है… वह फिर इधर उधर नज़र दौड़ाती है और वरमाला को झटपट मेरे गले में डाल देती है… हां, यह मेरा ही तो गला है। मगर यह हार, इसमें तो काले रंग के फूल पिरो रखे हैं… सामने, उसी लिबास में, मीता, नहीं अर्चना खड़ी है… नहीं, यह तो अर्चना भी नहीं लगती… यह तो कोई अन्य लड़की है। इस लड़की को तो मैं बिल्कुल नहीं पहचानता। एक अनजान लड़की से, भला मैं कैसे शादी कर सकता हूं?… मैं यह शादी नहीं करूंगा… नहीं, बिल्कुल नहीं… मगर, करोगे कैसे नहीं? कैसे नहीं करोगे?… आंटी खड़ी हैं, हाथ में नंगी तलवार, आंखें बिल्कुल अंगारा। शरीर पर वस्त्र, नाममात्र… करोगे कैसे नहीं? कैसे नहीं करोगे?… तलवार की नोक, मेरे सीने पर आ टिकी है और…

मैंने अर्चना से कहा, ”कल रात, मैंने एक सपना देखा।”

“आप सपने भी देखा करते हैं?” कह कर वह मुस्करा पड़ी।

देखा, वह अब पहले की तरह तरोताज़ा-सी लगने लगी है। चेहरे पर से पीलापन अदृश्य हो चला है। कपड़े भी वह पहले की ही तरह नफ़ासत से पहनने लगी है।

”क्या देखा सपने में?” वह अभी तक मुस्करा रही थी।

“देखा, तुम्हारी शादी हो रही है।”

सुनते ही वह खिलखिला कर हंस पड़ी।

”और कुछ? आप स्वयं क्या कर रहे थे सपने में? बारातियों के लिये, हलवाई से पूड़ियां तलवा रहे होेंगे!”

“नहीं, मैं गली में झंडियां लगवा रहा था।”

उसने विषय बदल कर कहा, ”आज मेडिकल तो ठीक ठाक हो गया।”

“गुड! इसका मतलब, कल से तुम काम पर जाने लगोगी?”

”हां।” कह कर वह उदास सी हो गई।

“क्या सोचने लगीं?”

”बड़ा अजीब लग रहा है। पता नहीं, नौकरी मैं कर भी पाऊंगी या नहीं!”

“ऐसी भी क्या बात है! आजकल हज़ारों लड़कियां, दफ़तरों में काम करती हैं।”

”मुझे तो बहुत ही डर लग रहा है।”

“समझ में नहीं आता, इसमें डरने की क्या बात है!”

”चलिये, आप तो वहां मौजूद ही होंगे।”

“मैं वहां क्या तुम्हारे पास बैठा रहूंगा!”

”आप मेरी कोई सहायता नहीं करेंगे?”

“क्या पता, तुम्हेें ही कहीं मेरी सहायता करनी पड़ जाये।”

”वह कैसे?”

“तुम्हारी पोस्टिंग ऐसे ख़ास दफ़तर में की जा रही है, वहां पर सब की ए0 सी0 आर0 तुम्हारे हाथों से गुजर कर, साहब लोगों के पास पहुंचा करेगी।

“ए0 सी0 आर? वह क्या बला है?”

”सब मालूम पड़ जायेगा।”

क्रमशः…४

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # २ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # २ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

(चित्र साभारश्री जगत सिंह बिष्ट, इंदौर)

≡ दो ≡

आशी ने कई-एक समस्याएं, मेरे बिना कहे ही सुलझा ली हैं। मुझ से भी पहले, उसने अपनी छुट्टी स्वीकृत करा ली है।

ट्रेन की सीटें भी बुक हैं और भी सब कुछ…

उसने अभी अभी पूछा हैं, ”वहां पर देने के बारे में क्या सोचा है?”

मेरा उत्तर न पाकर, वही बोलती है, ”या खाली हाथ ही जा खड़े होंगे लड़की की शादी में?”

मैं हाथ ऊपर उठा कर उसकी बात का उत्तर दे ही देता हूं, ”भई, यह काम तो तुम्हारा है।”

“जी हां, सभी काम मेरे हैं! आप तो सिर्फ़ तमाशा देखने वाले हैं!”

“देखो, मुझे इन चीज़ों के बारे में, कुछ भी नहीं पता… कोई साड़ी वाड़ी ले लो न।”

“बस, सिर्फ़ साड़ी?”

“और… जो तुम ठीक समझो।”

वह ज़रा सा सोच कर कहती, ”चलो ठीक है, जो लेना होगा, वहीं चल कर ख़रीद लेंगे। आजकल हर शहर में, सभी कुछ मिल जाता है। जेब में पैसे होने चाहियें।”

“तुम बिल्कुल ठीक कहती हो!” मैं कह कर पीछा छुड़ाता हूं।”

समय पर तैयार होकर घर से चले, रेलवे स्टेशन पहुंचे और गाड़ी में सवार हुए। शाम हुई, तो थरमस से चाय निकाल कर पी ली। थोड़ी देर आपस में बातचीत की। फिर टिफिन कैरियर खोल कर खाना खाने लगे। एक घंटा फिर बतियाये और…

आशी को ऊंघ आने लगी है। बिस्तर तो खोल ही रखे हैं।

“चाहो, तो सो जाओ।” उसे राय देता हूं।

“आप?”

“मुझे अभी नींद नहीं आई।”

“और शायद आयेगी भी नहीं इस खटखट में!”

आशी सो गई है। मैं गाड़ी की निरंतर खटखट सुनता चला जा रहा हूं।

उन दिनों, फैक्टरी में, दिन भर इसी तरह मशीनों का शोर हुआ करता था। हर शाम, छुट्टी हो जाने के बाद, फैक्टरी के मेनगेट के बाहर, अच्छा ख़ासा हंगामा हो जाया करता था।

पहले इस तरह के जलसे-जलूस, फैैक्टरी की चार दीवारी से थोड़ी दूरी पर, बड़े मैदान में पेड़ों तले, आयोजित हो जाया करते थे। किंतु इधर कई नई इमारतें निर्मित हो जाने के बाद, कोई स्थान, इन कार्यों के लिये ख़ाली न रहा, जहां मज़दूर अपनी मांगों के लिये, सभाएं वगैरा आयोजित कर पाते।

अब वे लोग, अपनी बातें, प्रशासन को ठीक से समझाने के लिये, मेनगेट के ठीक सामने ही, अपने कार्यक्रम आयोजित करने लगे। छुट्टी का हुटर होते ही, कुछ कार्यकर्ता अपनी साइकिलें, इस प्रकार अड़ा कर पूरा मार्ग रोक देते, कि कोई भी व्यक्ति, उनके बुलंद होते नारे और पुरज़ोर तक़रीरों को सुने बिना, वहां से नहीं निकल सकता था।

कोई एक मज़दूर-नेता, फुदक कर, पुलिया की मुंडेर पर चढ़ जाता और ऊंची आवाज़ में नारे लगवाने लगता… मज़दूर एकता, ज़िंदाबाद… इंक्लाब, ज़िंदाबाद… गुंडागर्दी, नहीं चलेगी… हिटलर शाही, नहीं चलेगी… नहीं चलेगी… नहीं चलेगी।

पर्याप्त भीड़ एकत्रित हो जाने पर, नेता अपना भाषण आरम्भ कर देता… साथियो आप को मालूम होना चाहिये, कि हमारा यह मैनेजमेंट, जो पहले सिर्फ़ बेहरा था अब पूरी तरह अंधा भी हो चला है…।

यह शायद कम लोग जानते होंगे, कि मैनेजमेंट कभी काना, अंधा या बेहरा नहीं होता। वह तो घुन्ना होता है, जो चादर ताने, या आंखें बंद किये, चुपचाप लेटा रहता है और अवसर पाते ही, उठ खड़ा होता है और अपनी शिकंजे नुमां बाहें, व्यक्तिविशेष की ओर बढ़ा कर, उसे दबोच लेता है।

महीनों तक लगाये जा रहे नारों और जलसे जलूसों के बाद भी, जब प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, तो यूनियन न, े अपनी एक सौ पांच मांगों को मनवाने के लिये, ‘हड़ताल’ का नोटिस दे दिया। मांगों की इतनी लम्बी सूची देख, अपने पराये, सभी को हंसी आ जाती। मगर धमकी तो आखिर धमकी है। एक चैलेंज है, जो यूनियन वालों को देना है और प्रशासन को स्वीकार करना है।

लक्ष्ण कुछ ऐसे ही थे। यह भी स्पष्ट दीखने लगा, कि यह कोरी धमकी नहीं, बल्कि इस बार हड़ताल होगी। यह बहुत दिन से टलती चली आ रही थी। अभी तक फैक्टरी में दो अलग-अलग यूनियन थीं, जो आपस में ही लड़झगड़ कर, प्रशासन को, समस्याओं का अपने ही तरीके से समाधान खोजने के लिये सुविधा प्रदान कर देती थीं। मगर अब न जाने कैसे, दोनों यूनियन, आपस में सुलह करके, एक हो गई थीं। पता चला, राजधानी से आये किसी नेता ने प्रयास कर, इसे सम्भव बनाया है।

किंतु अनिल ने मुझे एक और बात बताई थी, जिस पर विश्वास कर पाना, सहज मालूम नहीं पड़ रहा था। उसका कहना था, कि मैनेजर नरेन्द्र मोहन ने ही, गुप्त रूप से, दोनों यूनियन को एक हो जाने के लिये सहयोग दिया है। किंतु इस प्रयास में, उसका अपना कौन सा स्वार्थ सिद्ध हो रहा था, यह अनिल नहीं स्पष्ट कर पाया।

मुझे बड़े साहब, अर्थात जेनरल मैनेजर ने अपने दफ़तर में बुलाया है, सुनकर मेरा चैंक जाना स्वाभाविक था। छोटी पोस्ट के आदमी से, वे कम ही बात करते थे। सोचा, कोई बहुत ही खास बात होगी जो उन्होंने मुझे बुला भेजा है।

अनुमति लेकर मैं भीतर गया। वे हाथ में पेन लिये और ढेर से काग़ज़ात, सामने मेज़ पर फैलाये बैठे थे। मुझे संकेत से उन्होंने कुर्सी पर बैठ जाने के लिये कहा।

मैं बैठ गया। उन्होंने ऐनक उतार कर एक ओर रखी।

“यू आर मिस्टर…?”

मैंने नाम बताया।

“ओह येस!… सुना है, हड़ताल होने वाली है?” वे इस तरह पूछ रहे थे, जैसे उन्हें यह बात, स्वयं न मालूम हो। उत्तर में तब भी मुझे कुछ कहना ही था। कहा, ”जी, सुना तो मैंने भी है।”

“आप ने भी सुना है? किससे?”

“कुछ वर्कर आपस में बातें कर रहे थे।”

“आप वर्कर लोगों से, मिलते जुलते रहते होंगे?”

“ऐसी बात तो नहीं है सर।”

“ऐसी इनफ़रमेशन है, कि आप वर्कर काॅलोनी की तरफ़ अकसर जाते रहते हैं और … हड़ताल के भी फ़ेवर में हैं।”

“किसी ने ग़लत रिपोर्ट की है सर।”

“मेरा भी यही खयाल है!”

“विश्वास कीजिये सर, मैं यह हड़ताल वाले दिन, हर हालत में ड्यूटी पर पहंुच़ंूगा।”

“यही अच्छा होगा… मगर रिकाॅर्ड से पता चलता है, कि काफी पहले जब हड़ताल हुई, तब आपने बहुत जोशीले भाषण देकर, लोगों को भड़काने की कोशिश की थी।”

“तब की बात और थी सर… तब मैं वर्कर था।”

“ओह येस! अब आप एक रिस्पोंसिंबल स्टाफ़ मेम्बर हैं। यू आर ए पार्ट आॅफ़ मैनेजमेंट। आप को किसी भी ग़लत काम में हिस्सा नहीं लेना चाहिये।”“सर, मैं आप को फिर विश्वास दिलाता हूं।”.

“ओ0 के0 रिपोर्ट मिली थी, मैंने बुला कर पूछ लिया। डोंट टेक इट अदरवाइज़।”

मैं हाथ जोड़, उठ खड़ा हुआ।

दोनों यूनियन के एक हो जाने के कारण, लगता यही था, कि इस बार हड़ताल सफल होगी, प्रशासन को घुटने टेकने पड़ेंगे और झख मार कर, मज़दूरों की कुछ मांगें भी स्वीकार करनी होंगी।

किंतु हो कुछ और ही गया। दोनों ओर से तैयारियां जारी थीं। प्रत्येक दो घंटे बाद, संघर्ष समिति की गुप्त बैठकों में, प्रस्ताव पारित करके, रणनीति निर्धारित की जा रही थी… व्यवस्था इस प्रकार रहे, कि हड़ताल वाले दिन, कुत्ते का बच्चा भी, फैक्टरी में न घुस सके। जेनरल मैनेजर की कार के आगे स्वयं सेवकों को लिटा दिया जाये तथा अफ़सरों और अन्य स्टाफ़ को रोकने के लिये, महिला ब्रिगेड को तैनात कर दिया जाये और अपने ही आदमी, जो ग़द्दारी पर आमादा हों, उनकी जमकर पिटाई कर दी जाये। मगर मार ऐसी पड़े, कि उन्हें एम्बूलेंस में डाल कर बड़े अस्पताल ले जाना ज़रूरी हो जाये…

उधर प्रशासन भी, गुपचुप तैयारियों में जुटा था। उपद्रवी कर्मचारियों की सूचियां टाइप की जा रही थीं। सुरक्षा विभाग का स्टाफ़, दिन भर इधर उधर संूघता फिरता। अनौद्योगिक स्टाफ़ को अप्रत्यक्ष रूप् से चेतावनी दे दी गई थी। ऐसा न हो, वे लोग हड़ताली वर्करों के साथ मिल कर, अपना कैरियर हमेशा के लिये तबाह कर लेें। सुरक्षा विभाग के अतिरिक्त, स्थानीय पुलिस का भी समुचित प्रबंध था। पुलिस अधीक्षक स्वयं दो बार आकर, फैक्टरीएस्टेट का राउंड लगा गये थे।

जिस दिन हड़ताल होनी थी, उससे एक दिन पहले ही, कुछ कर्मचारी, पैंट कमीज़ के बजाये, कुरते-पाजामे में नज़र आने लगे थे। हड़ताल वाले दिन भी, वे इसी लिबास में, पैरों में अंगूठे वाली चप्पल और आंखों पर काला चश्मा चढ़ाये, मुंह अंधेरे में ही क्वार्टरों से निकल खड़े हुए। मार्ग में जो भी मिलता, वे उसे होशियार करते, ”देखो, एक भी आदमी, फैैक्टरी के अन्दर न पहंुचने पाये।”

ये लोग, प्रत्येक मोड़ या चैक पर तैनात स्वयं सेवकों के पास रूक कर दरियाफ़्त करते, “सब ठीक है न?”

अपनी तसल्ली कर लेने के बाद, वे लोग उससे आगे वाले मोर्चे का हाल जानने के लिये, बढ़ जाते।

कु्रछ काले चश्मे वाले नेता, विभिन्न मोर्चों की कुशलता का जायज़ा लेते हुए, फैक्टरी के मेन-गेट तक जा पहुंचे। वहां कुछ कार्यकर्ता पहले से ही मौजूद थे। उनमें से एक, काले चश्मे वाले से कहने लगा, ”लगता है, चंद ग़द्दार पीछे वाले छोटे गेट से अन्दर जा पहंुचे है।”

“ऐसा कैसे हो गया?… लेकिन वे अन्दर घुसे कब होंगे?”

“आधी रात में ही जा बैठे होंगे।”

“यह तो बहुत ग़लत हुआ!”

“ग़लत तो हुआ ही… मैं जाकर देखता हूं, कौन कौन से हरामी अन्दर छिपे बैठे हैं।”

इतना कहकर वह कार्यकर्ता, मेनगेट पार करके, फैक्टरी के अन्दर चला गया। वह काफी देर तक वापिस न लौटा, तब ‘अपने साथी के साथ कोई अनहोनी न घट गई हो’, पता करने के लिये, पहले वाले की तरह ही वह फैक्टरी के अन्दर चला गया। वह भी न वापिस लौटा, तो उन दोनों की कैफ़ियत मालूम करने, चार पांच अन्य कर्मचारी या कार्यकर्ता भी भीतर प्रवेश कर गये और इसी क्रम में कुछ अन्य भी…

इसी प्रकार, पचास साठ आदमी फैैक्टरी के भीतर जा पहुंचे। उनमें से कुछ भीतर अपनी हाज़िरी दर्ज करा कर वापिस आ गये और ‘गद्दारों’ को गालियां देने लगे। देखा देखी में और यह कहते, कि ये लोग क्यों अन्दर गये, ऐसी आपति उठाकर, सौ-सवा सौ लोग फैक्टरी में प्रवेश कर गये।

फ़िलहाल हड़ताल की सफलता या विफलता का कुछ भी अनुमान नहीं लगाया जा सकता था। पुलिस अपने हाथों मंे, सूचियां और डंडे लिये, जगह जगह गश्त लगा रही थी। कुछ नामी नेताओं को उन्होंने उनके क्वार्टरों पर ही धर दबोचा था। कुछ ऐसे भी नेता थे, जो स्वेच्छा से काम पर आना चाहते थे, मगर वे हमेशा प्रशासन की आंख की किरकिरी बने रहते थे। वे घर से निकल, फैैक्टरी की ओर बढ़े। थोड़ा चलकर वे चैराहे तक ही पहंुचे थे, कि पुलिस वालों ने उन पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं और फिर उन्हंे यह कह कर गिरफ़्तार कर लिया गया कि वे सड़क पर दंगाइयों के साथ मिल कर, शांतिभंग करने का प्रयास कर रहे थे।

मतलब, अधिकांश लोगों को तो यही पता नहीं चल रहा था, कि यह हो क्या रहा है!

किंतु शीघ्र ही, स्थिति स्पष्ट होने लगी। एन0 मोहन मैनेजर क आदमियों ने, अपने विरोधियों को अच्छी तरह पिटवा कर, गिरफ़्तार भी करा दिया था।

मैं बाल-बाल बचा था। क्योंकि अनिल ने, ठीक समय पर और सही ढंग से, मुझे सावधान कर दिया था। मगर अफ़सोस, इन हालात में, अनिल स्वयं को सुरक्षित न रख पाया।

लोग चकित थे। यह कैसी हड़ताल है? कौन हड़ताल कराने वाला था और कौन तोड़ने वाला? कौन किस के पक्ष में था और कौन विपक्ष में। कोई कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। बस, एक हंगामा बरपा था, जो उलझा-उलझा सा था।

जिन्हें गिरफ़्तार किया गया था, उन्हेें ट्रकों में भरकर, दूर जंगलों में ले जाया गया और छोड़ दिया गया। वे भूखे प्यासे रोते झीखते, आधी रात में घर लौटे।

हड़ताल की असफलता का प्रमाण, अगले दिन ही मिल गया। लगभग पांच सौ कर्मचारियों की सर्विस-बे्रक कर दी गई थी और सत्तर को नौकरी से, बिल्कुल ही बरख़ास्त कर देने का सरकारी पत्र थमा दिया गया।

हड़ताल से पूर्व, मज़दूरों की अनेक मांगे हुआ करती है। मगर हड़ताल के बाद, साधारणतया एक ही मांग प्रमुख होती है… जिन कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया है, उन्हें फिर से काम पर बहाल किया जाये…

अनिल कहीं नज़र नहीं आ रहा था। चुपके चुपके उसके दो एक पड़ोसियों से पूछताछ की, किंतु किसी से भी संतोषजनक उत्तर न मिला।

उसका नाम, नौकरी से निकाल दिये जाने वाले कर्मचारियों की सूची में नहीं था। सर्विस बे्रक वालों में उसका नाम अवश्य दिखाई पड़ा। मगर अनुपस्थित होने के कारण, उसे नोटिस नहीं थमाया जा सका था।

प्रश्न यही था, कि अनिल है कहां? मैं दिन भर उसके बारे में चिंतित रहा। निर्णय लिया, छुट्टी के बाद और थोड़ा अंधेरा हो जाने के बाद, उधर का चक्कर लगाऊंगा। बेचारा दुबला पतला सा है। भाग दौड़ में कहीं फिर चारपाई से न लग गया हो। उसे तो ठीक ठाक ही रहना चाहिये। विधवा मां का एक ही बेटा और दो कुंवारी बहनों का इकलोता भाई!

अजीब हालत है! जून जुलाई इस बार खुश्क निकल गये और अब सितम्बर आधे से ऊपर गुज़र जाने के बावजूद, बंूदाबादी बदस्तूर जारी है।

हाथ मंुह धोया। तौलिये से मुंह पोंछ ही रहा था, कि किसी ने दरवाज़े पर थपथपाहट की।

“कौन?”

कोई उत्तर न मिला।

मैंने हीटर आॅन कर, चाय के लिये पानी रख दिया।

इस बार, स्पष्ट रूप से थपथपाहट सुनाई पड़ी। जाकर दरवाज़ा खोला।

अकस्मात, मैं उसे पहचान नहीं पाया था। उसके पास छाता नहीं था। वर्षा की लगातार पड़ती बूंदों ने, उसे काफी भिगो ड़ाला था।

“मैं आप ही की तरफ आ रहा था।” मैंने अर्चना को बताया। उत्तर में उसने कुछ भी नहीं कहा।

“अरे, अन्दर आइये न।”

वह अन्दर आ गई और मेरे कहने से पूर्व ही, कुर्सी पर बैठ गई।

“अनिल फिर बीमार पड़ गया?” मैंने खड़े खड़े ही पूछा।

वह चुप रही। ध्यान से देखा, जैसे चेहरे पर ज़र्दी सी पुती हो!

“क्या अनिल की तबीयत बहुत ज़्यादा ख़राब है?” मैंने पूछा, तो उसकी आंखों मे ंजलकण झिलमिलाने लगे। फिर चंद क़तरे आंखों से टपक कर, उसकी भीगी साड़ी की नमी मेें जज़्ब हो गये।

किचिन में जाकर देखा, पानी खौल रहा है। एक कप पानी और डालने के बजाय, चायपत्ती के साथ, दूध की पर्याप्त मात्रा उसमें उंडेल दी, इतनी, कि चाय के दो कप तैयार हो जायें।

“लीजिये, पहले चाय पीजिये, फिर चलकर डाक्टर से बात कर लेते हैं।”

चाय का कप, उसके हाथ से छूटने लगा था, क्योंकि वह एकाएक ही फफक कर रो पड़ी थी। कप की -आधी चाय, छलक कर उसके कपड़ों और फ़र्श पर जा पड़ी।

“अर्चना! क्या बात है?” मैं काफी हैरान था।

“भइया का कुछ पता नहीं, कहां है!”

“क्या…? कब से पता नहीं?”

“कल सुबह तीन बजे उठकर, अंधेरे में ही चल दिये थे। जाते हुए सिर्फ़ इतना कहा था, कि एक मीटिंग में जा रहा हूं, दो तीन घंटे लग जायेंगे।”

“कोई साथ था?”

“बाहर तीन चार आदमी खड़े थे। मगर अंधेरे में पहचाना तो कोई भी नहीं गया।”

“तब से एक बार भी घर नहीं लौटा?”

“ना… कल आधी रात तक हम इंतज़ार करते रहे। एक एक करके पड़ौस के सभी लोग वापिस आ गये। मगर भइया का कुछ पता नहीं, कहां रह गये!”

“आप थोड़ा धैर्य रखिये, मैं पुलिस चैकी जाकर पता करता हूं।”

“कैसे रखें धैर्य! हम तो… वह फिर रोने लगी।

बहुत ज़ोर देनेे पर, वह आधा कप चाय पी सकी। किंतु मैं स्वयं, एक घंूट भी, गले में न उतार सका। ‘ठंडी हो गई’ कह कर, मैं बाहर गया और पूरी चाय, नाली में उंडेल दी।

पुलिस चैंकी से भी अनिल का कुछ पता न चला। सब इंस्पेक्टर ने सभी सूचियां सामने रख दीं और कहने लगा, ”जिन्हंे पकड़ा गया, या छोड़ा गया, इसमें सभी नाम दर्ज हैं।”

फिर हंसते हुए बोला, ”अजी, यह तो महज़ एक नाटक था। हमें कौन से मंूग दलवाने थे, किसी को यहां रख कर! मुफ़्त की रोटियां खिलाओ और यूनियन वालों से झगड़ा भी मोल लो! कोई मंत्री-वंत्री बीच में आ टपका, तो हमें ऐसी जगह ले जा पटकेंगे, जहां पानी भी न मिले!”

“मगर अनिल होगा कहां?” मैंने पूछा।

“अब यह हम क्या बतायें? रिपोर्ट लिखा दें, आदमी मिल जायेगा, तो सूचना भिजवा देंगे।”

आसपास के तीन चार आदमी साथ लिये, मैं इधर उधर पूछताछ करता फिर रहा था। मगर कहीं भी कोई सुराग़ नहीं मिल पा रहा था। किसी एक ने भी न बताया, उसने अनिल को कहीं देखा है।

हम लोग, बड़े साहब की कोठी जा पहुुंचे। भीतर सूचना भिजवाई। उत्तर मिला, कि कल सुबह बड़े साहब को बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक में भाग लेने के लिये, दिल्ली रवाना होना है। इस समय वे उसी की तैयारी में लगे हैं। साथ यह भी आदेश मिला, कि हम लोग अपने इस कार्य के संबंध में, मैनेजर एन0 मोहन से सम्पर्क करें।

अनिल के लिये, अब मुझे उसी आदमी की कोठी पर फ़रियादी बन कर जाना था, जिस की शक्ल और नाम से ही मुझे घृणा थी और जिससे, मैं हमेशा दूर रहने की ही कोशिश करता था।

रात के पौने दस बज चुके थे। बहुत समझाने के बावजूद अर्चना घर लौट जाने को तैयार न थी और मेरे साथ साथ चल रही थी। जब कि अन्य सभी, एक एक करके वहां से चलते बने थे।

फाटक खोल कर, मैंने कोठी की सीमा में प्रवेश किया। लम्बे चैड़े बगीचे के बीचो बीच होती पक्की सड़क, मोटर-गैराज तक गई थी। उससे थोड़ा इधर, बरामदे तक पहंुचने के लिये शार्टकट था, जिस पर महीन बजरी बिछी थी।

बरामदे में तेज, पाॅवर का बड़ा सा बल्ब जगमगा रहा था। सात आठ गार्डन चेयर्स, बिल्कुल एक सीध में पड़ी थीं। दोनों ओर गमले भी, बड़े क़रीने से रखे गये थे। किंतु सुगन्ध, उन गमलों में उगे, रंग बिरंगे फूलों की नहीं, अपितु कहीं आसपास से ही, रात की रानी की आ रही थी।

घंटी का बटन दबाते ही, सामने के चार दरवाज़ों में से, एक ज़रा सा खुला।

“येस…?” एक बारीक और धीमी सी आवाज़ थी।

“साहब से मिलना है।” मैंने कहा।

“साहब तो इस वक्त, क्लब में होंगे।”

“कब तक लौटेंगे?”

“आई डोंट नो… वैसे तो लौट आना चाहिये था अब तक।”

दरवाज़ा अब पूरा खुल गया था। गहरे सुखऱ् लिबास में, अठारह-उन्नीस वर्षीय स्वस्थ-सी लड़की, जैसे अनींदी सी उठ कर आ खड़ी हुई हो।

“कोई अर्जेंट काम हो, तो क्लब फ़ोन कर लें।” उसने कहा।

बात करते हुए, वह हम दोनों का, जैसे जायज़ा सा लेती जा रही थी। तभी, भीतर से किसी महिला की आवाज़ सुनाई पड़ी।

“मीता… कौन है?”

लड़की ने पीछे गरदन घुमा कर कहा, ”समवन वांट्स अंकल।”

भीतर वाले कमरे का पर्दा सरका कर, एक महिला नमंूदार हुईं। खूब गोरा रंग, कशमीरियों जैसा। आयु पैंतीस और चालीस के बीच। हो सकता है, कुछ अधिक ही हो। सफ़ेद साड़ी ब्लाउज़ की तरह उसके सिर का एक मामूली सा भाग भी सफेदी लिये था।

सामने आते ही, उसने कड़वी-सी नज़र अर्चना पर डाली।

“क्या चाहिये?”

उत्तर मैंने दिया, “कल से इसके भाई का कुछ पता नहीं चल रहा।”

“यहां तो नहीं है इसका भाई!” स्वर काफी रूखा था।

“बड़े साहब ने, मैनेजर साहब से मिलने के लिये कहा है।”

उसी समय, कार की दो रोशनियों की चमक दिखाई पड़ी। कार, मुख्य मार्ग से कोठी के फाटक में से होकर गैराज की ओर बढ़ रही थी।

गैराज से, वह चाबी घुमाता हुआ, हमारी ओर आया। हम दोनों ने हाथ जोड़े।

वह चकित सा, हमारी ओर देख रहा था।

“आप लोग बाहर क्यों खड़े हैं? अन्दर चल कर बैठिये।”

इस बीच, महिला और लड़की भीतर जा चुकी थीं।

एन0 मोहन के पीछे पीछे, हम दोनों उसके ड्राइंगरूम में जा पहुंचे। हमें सोफे पर बैठ जाने का संकेत देकर, वह स्वयं दीवान पर बैठ गया।

“कहिये?”

मैंने पूरी बात कह सुनाई। वह कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला, “आप को, मुझ से कैसी सहायता चाहिये?”

मेरे पास इस बात का कोई उत्तर न था।

वही बोला, ”पुलिस चौकी वालों से बात की?”

मैंने वहां की बात भी बता दी।

“उम्र क्या है उस लड़के की?”

“इक्कीस।” अर्चना ने, जैसे कठिनाई से कहा।

एन0 मोहन मेरी ओर देख कर बोला, ”इस बेचारी लड़की को रात के वक़्त क्यों परेशान किया? आप अकेले नहीं आ सकते थे, या मैं आप को पहचानता नहीं था?”

मैं सकपका गया। वह आज कुछ अधिक ही शराफ़त से पेश आ रहा था। हो सकता है, फैक्टरी के अन्दर उसका व्यवहार सख़्त रहता हो और बाहर, वह वास्तव में एक नेक और नरम दिल इन्सान हो।

“ऐसा कीजिये… आप तो निश्ंिचंत होकर घर जाइये। मैं एस0 एस0 पी से फ़ोन पर बात करता हूं। कल तक कुछ न कुछ पता चल ही जायेगा।”

हम दोनों उठने लगे। तभी भीतर से, नौकर ट्रे में तीन चाय के कप लिये आ पहुंचा।

मैं सचमुच चकित था। बंगले में निवास करने वाले अफ़सरों के बारे में मेरी अब तक की सभी धारणाएं, ग़लत सिद्ध हुई जा रही थीं।

“बैठिये बैठिये, चाय पीकर जाइये।”

“चाय तो…“ मैं कप उठाते हुए झिझक रहा था।

“अरे भाई, यह आप ही के लिये तैयार हुई है।”

मैं सहमा-सा हुआ, अर्चना के दायें हाथ की ओर देख रहा था। कहीं चाय छलक कर, नीचे क़ालीन पर न जा पड़े। किंतु न जाने कैसे, वह पूरा कप, मुझ से भी पहले ख़ाली कर चुकी थी!

 

ऐसा मैंने तो क्या, किसी ने भी न सोचा होगा। अचानक ही जैसे किसी ने छाती पर प्रहार कर दिया हो। आंखों में बारबार अंधेरा-सा तैरने लगता और कभी ऐसा महसूस होता जैसे कलेजे में ंिचंगारी छूट गई हो!

कितनी ही बार मैं, अर्चना, अरूणा और उनकी मां को, झूठी सांत्वना देने का असफल प्रयास कर चुका था और कितनी ही बार, मैंने स्वयं को ही, फ़रेब देना चाहा था। मगर…

कई दिन की भागदौड़ के बाद भी, अनिल का कुछ पता न चल सका था। पुलिस की खोज जारी थी। सभी ओर वायरलेस संदेश भेजे जा चुके थे। फैक्टरी के लोग, कितनी ही बार, झाड़ झंकार तक को हिला हिलाकर देख चुके थे। मगर कहीं भी कुछ पता न चला।

अनिल कहीं नहीं मिला। मगर सातवें दिन, एक अजीब सी घटना घटी। गांव की सीमा के साथ साथ बह कर आगे बढ़ जाने वाली नहर में, लगभग ढाई किलोमीटर के फ़ासले पर, एक लाश मिली। लाश, एक अटकाव के पास झाड़झंकार में उलझ कर रह गई थी और बहुत बुरी दशा में थी। शिनाख़त किसी भी तरह सम्भव न थी। केवल अनुमान के आधार पर ही कहा जा सकता था कि शायद वह अनिल की ही हो…

किंतु यह बात, सभी की समझ से बाहर थी। कि इतनी कम चैड़ी और कम गहरी नहर में, आदमी कैसे डूब कर मरा?

हो सकता है, किसी ने मार कर पानी में बहा दिया हो। मगर क्यों?

कौन, किसे समझाये, या सांत्वना दे? जबकि सांत्वना देने वाला, स्वयं ही नियंत्रण खोये बैठा हो!

अर्चना और अरूणा की दयनीय दशा देख, कलेजा मुंह को आता था। उनके पिता का तो काफी पहले ही साया सिर से उठ चुका था। अब भाई भी न जाने कहां जा पहुंचा! मां तो जैसे पत्थर ही बन कर रह गई थी।

किसी के मौजूद रहते, हमें व्यक्ति विशेष की विशेषताओं के बारे में जानने की साधारणतया फ़ुर्सत नहीं होती। मगर उसी के मौजूद न रह जाने पर, वहीं विशेषताएं, असाधारण रूप में, बारबार याद आकर कचोटने लगती हैं।

अनिल की बातें भी, बारबार याद आ रहीे थीं।

सबसे बड़ी समस्या थी, उसके जीवित होने या न होने के संश्य की… इतनी भागदौड़ के बावजूद, न तो उसके जीवित होने की उम्मीद नज़र आ रही थी और न उसकी मृत्यु ही प्रमाणित हो पा रही थी। नहर के आसपास या किसी झाड़ी में, कपड़े का कोई टुकड़ा ही फंसा मिल गया होता। कोई भी तो चिन्ह ऐसा नहीं मिला, जिससे किसी परिणाम पर पहंुचने में सुविधा मिल पाती। कुछ निश्चित हो पाता कि वह…

कुछ दिन के लिये हाहाकार मचा और शान्त हो गया। अनिल के परिवार के प्रति छोटे बड़े, सभी के मन में दया और सहानुभूति उमढी़ और धीरे धीरे बात आई गई हो गई। किंतु उनके अपने घर में मचा हाहाकार, तो एक दो दिन का नहीं था।

मृत्यु प्रमाणित हो जाने की स्थिति में, समस्या इतनी टेढ़ी न रहती। डेढ़-दो हज़ार रूपये सहायतार्थ के घर वालों को मिल गये थे, जो ऐसी हालत में, फैक्टरी कर्मचारी के किसी भी परिवार को मिल जाया करता था। मगर फ़ैमिली पैंशन, फण्ड, ग्रेच्युटी और बीमा वग़ैरा की रक़म, तो पक्के प्रमाण के अभाव में, सात वर्ष तक नहीं मिल सकती थी। अनिल तो अभी सिर्फ़ ‘गुमशुदा’ घोषित हुआ था।

सभी कुछ बदस्तूर जारी था। आठ से पांच तक साधारण ड्यूटी, जिसमें एक से दो बजे तक लंचब्रेक और शाम, पांच से सात तक ओवरटाइम। वही मशीनों की कीं कीं और चीं चीं, लगातार खटखट, वही वर्कर लोगाों का आपसी गालीगलौज, मुक्कम-मुक्का, अश्लील मज़ाक और सुबह से शाम तक ‘ऊपरवालों’ के साथ नाज़ायज़ रिश्तेदारियां क़ायम करना। वही अधिकारी वर्ग के उल्टे-सीधे और मूर्खतापूर्ण आदेश और निदेश, वही लम्बी लम्बी बहसें और तकरार… अरे मेरा काम तो सबसे अधिक हुआ था, फिर पीस वर्क प्राॅफिट, दूसरों को कैसे अधिक मिला?… लो, मेरा टूल फिर चोरी हो गया। मैंने अभी अभी ग्राइंड करके, यहां फ़ेस-प्लेट पर रखा था… उसका मिलिंग कटर ब्लंट हुआ पड़ा है और वह भद्र पुरूष बिना देखे ही कट देता चला जा रहा है… मुझे इस बार साबुन की टिकिया क्यों नहीं मिली? हाथ कैसे धोऊंगा?… उसकी मशीन का पानी बदला था। मगर यहां तो… मेरा काम इतना बढ़िया बना, तब भी इंस्पेक्शन वालों ने पास नहीं किया। उन्हें चाय की ट्रे और समोसे जो नहीं पहुंचाये गये… मेरा ट्रेडटेस्ट, मालूम नहीं कब होगा! छह महीने से ये लोग झांसा दिये जा रहे हैं! … भई वाह! उसका दो बार प्रमोशन हो गया! यह होता है रिश्तेदार होने का फ़ायदा!… आप कुछ करते क्यों नहीं? क्यों नहीं कुछ करते?

गरदन उठा कर देखा, लोकराम खड़ा है।

“बुलाया है?” मैंने जानते हुए भी पूछा।

“फौरन पहुुुंचने को कहा है।”

“और कौन-कौन हैं वहां?”

“अकेले हैं इस वक़्त तो।”

“चलो, मैं आ रहा हूं।”

 

वह हर रोज़ की तरह, कुर्सी पर तना बैठा था। काग़जों पर टिप्पणियां लिखने और हस्ताक्षर करने के बीच ही, वह मुझ से बोला, ”क्या पोज़ीशन है आप के ग्रुप की इस महीने?”

“पोज़ीशन ठीक है सर।”

“ठीक का मतलब? टारगेट पूरे हो जायेंगे या नहीं?”

“ख़याल तो यही है, कि हो जायेंगे।”

“ख़याल? वह क्या होता है? मुझे पक्की बात बताओ।”

“एक घंटे तक, चेक करकेे मैं आप को पूरी लिस्ट दे दूंगा।”

“स्पेयर आर्डर्स में भी ढील नहीं होनी चाहिये।”

“इस बारे में आप निश्चिंत रहें।”

“ठीक है, चेक करने के बाद, लिस्ट बना कर दीजिये।”

एक घंटे से भी कम समय में, मैं सूची तैयार करके पुनः मैनेजर के कार्यालय में उपस्थित हो गया।

उसने सूची पर सरसरी नज़र दौड़ाई। महसूस हुआ, वह संतुष्ट नहीं हुआ। वैसे कोई अप्रसन्नता भी उसने व्यक्त नहीं की।

“अच्छा, ठीक है। ऐसा करना… मैं जहां जहां पेंसिल से लाल निशान लगा रहा हूं, ये काम सबसे पहले निकलवा देना।”

“राइट सर।”

मैं वापिस दरवाज़े तक ही पहंुचा था, आदेश मिला, ”ज़रा रूकिये।”

मैं पहले की तरह, फिर मेज के समीप जा खड़ा हुआ।

“मुझे एक बात याद आ गई, बैठिये।”

मैं ‘थैंक्स’ कह कर बैठ गया।

वह कुछ सोचने लगा। फिर बोला, ”उस लड़के का क्या रहा?”

“जी?”

“अरे भई, वह खू़बसूरत और तेज़ तर्रार-सा लड़का, क्या नाम उसका?”

“अनिल?”

“वही… कुछ पता चला उसका?”

“कुछ पता नहीं चला सर।”

“सो सैड! उसके घर वाले तो बहुत परेशान होंगे?”

“बहुत ही बुरी हालत है उनके घर में!”

“कौन कौन हैं घर में?”

“बूढ़ी मां और दो बहनें हैं।”

“एक तो वही, जो उस दिन मेरी कोठी पर आई थी?”

“जी। दूसरी उससे छोटी है।”

“हूं…“ कह कर वह पेपर व्हेट से खेलने लगा। फिर बोला, “तो उनके घर में कैसे चल पा रहा है?… हम लोगों को उन बेचारों की कुछ मदद करनी चाहिये। डिपार्टमेंट की तरफ़ से तो उन्हें अभी कुछ भी नहीं मिल सकता।”

“वही तो परेशानी है सर। थोड़े से पैसे सेक्शन वालों ने इकट्ठे करके ज़रूर भिजवा दिये थे।”

“उससे भला कितने दिन चलेगा? आपने क्या सोचा इस बारे में?”

“इस बारे में, मेरा तो कुछ दिमाग़ काम नहीं कर रहा।”

“तो… अच्छा, मैं बड़े साहब से बात करूंगा। लड़कियां कुछ पढ़ी लिखी हैं?”

“बड़ी इन्टर पास है और छोटी इन्टर कर रही है।”

“अच्छा… देखो, क्या होता है। बड़े साहब से बात करके ही कुछ बताउंगा।”

मैं वहां से उठ कर बाहर आया। विश्वास नहीं हो पा रहा था, यह वही एन0 मोहन है!

इस बात पर भी विश्वास करना कठिन हो रहा था, कि यह वही क्वार्टर है, जहां इससे पहले भी, मैं कई बार आ चुका था, अथवा सामने खड़ी लड़की वही अर्चना है, जो…

पहले कितना साफ़-सुथरा रहा करता था उनका यह क्वार्टर! अनिल की बीमारी के दिनों में भी, क्या मजाल जो कोई चीज़, बिना सलीके़ के रखी गई हो और क्या मजाल, जो घर में किसी ने ज़रा भी मैला कपड़ा, किसी ने पहना हो या उस कपड़े पर कहीं दाग़ का निशान दिखाई दे जाये। वर्कर काॅलोनी में, उनका यह क्वार्टर, दूसरे सभी क्वार्टरों से, बिल्कुल अलग दिखाई पड़ता था। किसी साल दो अक्तूबर के अवसर पर, इसे स्वच्छता पुरस्कार, फैक्टरी प्रशासन की ओर से प्रदान किया गया था।

झटका-सा लगा। यह क्वार्टर भी तो इन लोगों को खाली करना पड़ेगा। दो महीेने पूरे होते ही, नोटिस सर्च हो जायेगा। तब, कहां जायेंगे ये लोग?

“बाहर ही खड़े रहेंगे?”

अर्चना चैखट में खड़ी थी।

भीतर आंगन में पड़ी प्रत्येक वस्तु, अव्यवस्थित, मैली मैली और उदास सी लग रही थी। रस्सी पर, धोकर सूखने के लिये फैलाये कपड़े भी पीले-पीले से लग रहे थे, जैसे बिना साबुन के धोये हों। या धोकर उन्हें नील या टिनोपाल न दिया गया हो। रसोईघर में बरतन, उल्टे सीधे पड़े थे। कोई चीज़ उबल कर, अंगीठी की बाहरी सतह पर चिपकी थी। वहीं कोने में, मां घुटों पर सिर टिकाये बैठी थी। उसने सिर उठाया। प्रत्येक बार, वह मुझे देख, इसी तरह चैंक उठती थी। इस उम्मीद में, शायद कोई समाचार हो। कोई आकर अचानक कह दे कि उसका बेटा कहीं देखा गया है।

किंतु मेरा बुझा-सा चेहरा देख और निराश हो, वह पुनः धरती की ओर देखने लगी। फिर मरी सी आवाज़ में बोली, ”अर्चना, इन्हें अन्दर ले जाओ।”

बरामदे में से निकलते हुए, मेरा पैर किसी चीज़ से टकरा गया और मैं गिरते गिरते बचा। भीतर जाकर, किसी के बिना कहे, मैं कुर्सी पर बैठ गया। अर्चना, चारपाई के पायंते पर बैठ गई।

दोनों चुप थे। कहने के लिये किसी के पास कुछ न था। वातावरण पर्याप्त बोझल महसूस हुआ। फिर इधर उधर देख कर पूछा, ”अरूणा नज़र नहीं आ रही?”

“नल पर पानी लेने गई होगी।”

एकाएक, एक अजीब और बहुत हल्की सी मुस्कान, अर्चना के चेहरे पर आई, जिसे देखकर चकित होने के बजाय, मैं सहम सा गया। किंतु यह बेमालूम सी मुस्कान, एक लहर की तरह आकर वि़लीन हो चुकी थी। वह पुनः पहले की तरह गम्भीर नज़र आने लगी थी।

गम्भीर, बुरी तरह गम्भीर!

मैंने तब, शायद ठंडी साँस ली थी।

वह बोली, ”आप इतना क्यों सोचते हैं? जो भी होगा, सह लेंगे।”

“सहने की भी तो कोई हद होती है!”

“ज़रूर होती होगी। मगर हमारे दुर्भाग्य की तो कहीं कोई हद दिखाई नहीं पड़ती। किसे पता था, अपना घर बार छोड़ कर, इस तरह प्रदेश में भटकना पड़ेगा और यहां आकर भी…

वह आगे नहीं बोल पाई।

मैंने सांत्वना देना चाही। कहा, “अर्चना, धैर्य तो रखना ही होगा। घर में, अब तो आप ही पर सभी कुछ निर्भर है। आप ही जब निराश और बेबस होकर बैठ जायेंगी, तो कैसे चल पायेगा!”

बाहर नज़र गई। अरूणा दोनों हाथों में पानी से भरी बाल्टियां लिये, आंगन में आ पहुंची थी। उसकी कमीज़ का कुछ भाग और शलवार के पांयचे, पानी छलकने से भीग गये थे। दोनों बाल्टियां, रसोई घर के बाहर रख उसने सिर पर दोपट्टा ठीक किया और भीतर आकर हाथ जोड़े और चारपाई पर, अर्चना से ज़रा सा हट कर बैठ गई।

बाहर, पड़ौस की दो स्त्रियां, किसी बात को लेकर झगड़ पड़ी थीं। कुछ ही देर में, नौबत गाली गलौज से बढ़ कर हाथापाई तक आ पहुंची थी।

भीतर बैठे हुए, अब उनके रोने चिल्लाने और घंूसे थप्पड़ मारने की आवाजें़, स्पष्ट सुनाई पड़ रही थीं। मैंने अर्चना की ओर देख पूछा, मामला क्या है? क्यों लड़ाई हो रही है इस तरह?

“साथ वाले हैं। रोज़ का ही काम है इनका। किसी न किसी बात पर आपस में भिड़ते ही रहते हैं।”

“मगर ये लड़ते क्यांे हैं?”

“स्वभाव ही लड़ने का है।”

“आप को तो ये लोग परेशान नहीं करते?”

“हमारी तो दोनों से ही बोलचाल बंद है, बहुत दिन से।”

ये क्वार्टर भी कुछ अजीब ढंग के बने थे। दोनों साथ वाले क्वार्टरों की सांझी दीवारों और छत के बीच, न जाने क्यों, रिक्त स्थान छोड़ रखा था। इसी कारण, प्रत्येक क्वार्टर का निवासी, पड़ौस वाले क्वार्टर की पूरी बात, बिना किसी कठिनाई के, साफ़ साफ़ सुन सकता था। शायद इसी लिये अरूणा बहुत धीमी आवाज़ में बात कर रही थी।

साथ वाले क्वार्टर में, आदमी अपनी पत्नी को बाहर से घसीट कर भीतर लेे आया था और अब लातों-घूसों से उसकी मरम्मत कर रहा था।

“साली हरामज़ादी, हर रोज़ किसी न किसी से झगड़ा मोल लेती है।”

“तू साला हरामज़ादा। तू अपनी जिस अम्मा के लिये मेरे ऊपर हाथ चला रहा है, मैं उसकी टांगें चीर कर रख दूंगी।”

उत्तर में, एक ज़ोरदार तमाचे की आवाज़ सुनाई पड़ी। कई मिनट तक हाथापाई होती रही। फिर आदमी गालियां देता हुआ बाहर चला गया। स्त्री सिसकियां लेती रही और पति के कमीने वंश को लगातार कोसती रही।

अरूणा उठ कर बाहर चली गई। मालूम था, कहां गई है। अर्चना से कहा, ”मैं चाय नहींे पियूंगा।”

उसकी आंखों में प्रश्न चिन्ह सा उभरा। फिर वही गहरी उदासी! सोचा, मना नहीं करना चाहिये था। चाय तैयार हो जाने पर, ये भी दो घूंट भर लेंगे। वरना मालूम ही है, कि इन दिनों, इनके खाने पीने का कुछ भी ठीक ठाक नहीं। दो कोर कभी निगल लिये, नही ंतो यों ही ठंडी साँसे लेते सो रहे।

किंतु देखा, अर्चना न तो चारपाई से उठी है और न आवाज़ देकर उसने अरूणा को, चाय तैयार करने के लिये ही कहा है।

वही हुआ, जो इन दिनों अकसर हुआ करता था।

मिन्नतें करके, मां को चाय पिलाई। अर्चना और अरूणा को पीने पर बाध्य किया और तब अपना कप उठा कर होंठो से लगा लिया।

चाय के बाद, माहौल ज़रा सा सामान्य हुआ। मैंने बात शुरू की, “मुझे आज मैनेजर ने अपने दफ़तर में बुलाया था।”

दोनों बहनें मेरी ओर देखने लगीं।

“वह आप के बारे में चिंता व्यक्त कर रहा था। पूछ रहा था, लड़कियां कितनी पढ़ी हैं। मैंने बता दिया।”

वे बिना कुछ कहे, मेरी ओर देखे जा रही थीं।

“शायद बड़े साहब से कह कर, वह नौकरी वगैरा की कोशिश करें।”

वे अब भी चुप थीं।

“आप कुछ कहेंगी नहीं?”

“हमारे कहने को तो कुछ भी नहीं रहा। आप जैसा भी कहेंगे, मैं कर लूंगी। मगर…” अर्चना ने कहा।

“मगर क्या?”

अर्चना की आंखों में पानी भर आया। बोलने लगी, तो गला रूंध गया। वह उठ कर बाहर चली गई।

समझ में न आया, क्या हुआ! मैंने अरूणा की ओर देखा।

अरूणा कुछ झिझकी। फिर बोल ही पड़ी, ”पिछले ब्लाॅक की औरतें कुछ उल्टा सीधा बोल रही थीं?”

“क्या?… क्या कह रही थीं?”

वह चुप रही।

“अरूणा, बताओ न, क्या कह रही थीं?” मैंने आतुरता से पूछा। वह असमंजस में पड़ गई। फिर कहने लगी, “दरअसल, वे आप और दीदी को लेकर कुछ बक रही थीं।”

“ओह!”

अर्चना भीतर लौट, पहले की तरह चारपाई पर बैठ गई। वह अब थोड़ा संतुलित दिखाई पड़ रही थी। अरूणा बात का संकेत दे चुकी है, यह अनुमान शायद उसने लगा लिया था।

मन बहुत ही दुखी था। गरदन नीची करके, मैं फ़र्श को लगातार ताके जा रहा था।

अर्चना ही बोली, ”हम लोगों की वजह से, आप के नाम पर भी धब्बा लग रहा है!”

“मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया। फिर धब्बा कैसा?”

“अभी कल की बात है। मैं दुकान से कुछ सामान ख़रीद कर लौट रही थी। पान की दुकान पर खड़े लोग भी, व्यंग्यवाण चलाने लगे।”

“सोचता हूं, मुझे यहां नहीं आना चाहिये।”

वह कुछ असामान्य सी होकर बोली, ”हां, अपने मान सम्मान की रक्षा का ध्यान तो रखना ही चाहिये न!”

“अर्चना, प्रश्न मेरे मान सम्मान की रक्षा का नहीं है। मैं तो यह सोच रहा हूं, कि ऐसे दूषित वातावरण में, आप दोनों बहनों और मां का यहां रहना कितना कठिन होगा। कैसे गुज़र होगी यहां, यही सोच रहा हूं।”

“किया ही क्या जा सकता है!” वह लाचार सी बोली।

मैंने उठते हुए कहा, “मैं कल मैनेजर से फिर बात करूंगा।”

 

अगले दिन, मैंने मैनेजर से भेंट करने का तीन चार बार प्रयास किया। किंतु हर बार, उसे दो चार आदमियों से घिरे ही पाया। एक बार वह ख़ाली भी मिला। फैक्टरी सम्बंधी काग़ज़ात दिखा कर, मैं निजी बात आरम्भ करने ही लगा था, कि सहायक प्रबंधक शीतल कुमार, सिग्रेट का धुआं उड़ाते और बग़ल में ड्राइंगों का बंडल दबाये, भीतर आया और एन0 मोहन के ठीक सामने पड़ी कुर्सी पर पसर गया। तब भी बात न हो पाई।

उस दिन, दोपहर के बाद काम बंद था। अगले दिन विश्वकर्मा पूजा थी। इसी कारण, मशीनों के साथ साथ, पूरे सेक्शन की सफ़ाई की जा रहीे थी।

अनिल की स्मृति ने फिर झकझोर डाला… वह कितने उत्साह से, पूजा की तैयारियों में जुट जाया करता था। सप्ताह भर पूर्व ही, वह सप्रयास पूजा समिति का गठन करा देता। साथ चल कर चन्दा इकट्ठा कराता और पूजा वाले दिन, क्या क्या कार्यक्रम रहेगा, यह सुनिश्चित कराता। खाने और नाश्ते में क्या क्या चीज़े तैयार हांेगी और कौन सी, बाज़ार से बनी बनाई लाईं जायेंगी, इस पूरे विवाद को वह कुशलतापूर्वक सुलझा देता। हारमोनियम, तबला, लाउडस्पीकर, दरियां, झडियां, कलाकार और अदाकार, वह बिना झिझक, सभी ज़िम्मेदारियां, अपने ऊपर ले लेता।

मगर उसमें एक ही कमी थी। वह मामूली सी बात पर ही चेहरा सुर्ख़ कर लेता और शुरू हो जाता… बस बस, आप रहने ही दीजिये। मुझे तो पहले ही मालूम था, यह आप से नहीं होने का। आप छोड़ दीजिये इसे, मैं अपने आप कर लंूगा…

उसी के प्रयास से, हमारे सेक्शन को, दो बार सफाई और सजावट के लिये शील्ड मिल चुकी थी…

कहां है अनिल? कहां चला गया वह? मैं भावुक होने लगा था।

“सर, कैन्टीन वालों को कह कर बरतन तो दिला दीजिये।”

देखा, तीन चार नौजवान वर्कर सामने मौजूद हैं।

“अरे भाई, मेरे कहने से वे लोग कब देने वाले हैं। आप जाकर फ़ोरमैन साहब से कहिये न।”

मैं सोच रहा था, कि पूजा वाले दिन तो फैक्टरी में कोई सरकारी काम नहीं होता। क्यों न उसी दिन एन0 मोहन से मिल लिया जाये।

किंतु पूजा वाले दिन, मैं सुबह से ही इधर उधर के कामों में उलझ गया था… फल कहां रखवा दें?… लकड़ियां तो गीली निकल गईं… गरम मसाले की पुड़िया कहां है? या उसे लाना ही भूल गये?… वह पनीर अब तक नहीं पहुंचा। भई, किसी को गेट पास देकर लाने भेजो… दूध तो खीर के लिये ही काफी नहीं, दोनों टाइम की चाय कहां से बनेगी? धूपबती और फूल, स्टोर से कौन उठा ले गया?… अरे यार, यहां तो सभी बारातियांे की तरह घूम रहे हैं। काम को हाथ लगाने के लिये कोई भी तैयार नहीं!…

अफसरों की पूरी टीम को, सभी सेक्शनों की ओर से निमंत्रण भेजा जाता था। वे लोग सभी जगह बारी बारी से जाते। प्रत्येक सेक्शन में दस बारह मिनट रूक कर, कलाकारों की कला के छोटे छोटे नमूनों का आनन्द उठाते, सफ़ाई और सजावट का निरीक्षण करते तथा खाने कीे प्लेटों में से, थोड़ा सा कुछ उठा कर मुंह जूठा करते और फिर निश्चित कार्यक्रमानुसार, अगले सेक्शन के लिये चल पड़ते।

मगर यह सब तो बाद में होता था। उससे पहले, उन्हें कुछ देर के लिये, हवन में हिस्सा लेने के लिये, एक जगह दरी पर बैठना होता था। संस्कृत में बोले गये श्लोकों और मंत्रोच्चारण को सुनना होता था। माथे पर तिलक लगवा कर बंूदी का प्रसाद लेना होता था। देवी देवताओं के प्रति विश्वास न रखते हुए भी, बहुत से महानुभाव, इस नाटक में बराबर का हिस्सा लेते थे।

हमारे सेक्शन से विदा होत समय, नरेन्द्र मोहन अपनी अफ़सरांे की टोली से थोड़ा पीछे रह गया था। दरअसल वह इस समय किसी से चुहल कर रहा था। वह वहां से चलने लगा, तो उपयुक्त अवसर पाकर मैंने उसके नज़दीक जाकर कहा, ”सर, मैं आप से मिलना चाहता था। अगर आप…“

किंतु उसने मुझे वाक्य पूरा करने का अवसर ही नहीं दिया। दोनों हाथ फैला कर, मेरी ओर बढ़ा और कहने लगा, “आइये मेहरबान! शौक़ से मिलिये!”

इर्द गिर्द खड़े वर्कर और अन्य स्टाफ़, सभी खिलखिला कर हँसे। इस समय, वह एक चतुर विदूषक की तरह, तमाशा दिखा कर, तटस्थ सा बना खड़ा था और मैं शरम से ज़मीन में गड़ा जा रहा था…

कितनी लज्जा की बात है, कि मुझे किसी से ठीक तरह से बात करनी भी नहीं आती। मगर इस बाज़ीगर को भी तो देखो, जिसे ज़रा भी शरम और हया नहीं! भरे सेक्शन के बीच, इसने मुझे इस तरह ज़लील कर डाला!

“सुनो।” कह कर वह बिना मेरी प्रतीक्षा किये, उस ओर चल दिया, जिधर कुछ देर पहले, अन्य सभी अफसर, आगे निकल गये थे।

इतना अपमान महसूस करने के बावजूद, मुझे अपने स्वाभिमान को ताक पर रख कर, केवल एक शब्द ‘सुनो’ पर ही, कुत्ते की तरह दुम हिलाते हुए, उसके पीछे लपकना था!

कुछ तेज़ क़दम बढ़ाकर, मैं उसके बराबर तक जा पहुंचा और साथ साथ चलने लगा। वह बिना इधर उधर देखे और उसी तरह तन कर चलते बोला, ”मैं तो तुम्हें अक़्लमंद आदमी समझता था।”

मैं चुप रहा।

“ऐसी बातें आराम से बैठ कर हुआ करती हैं। शाम को कोठी पर चले आना।”

कितना कुछ बना था उस दिन दोपहर के खाने में पीठी वाली पूड़ी, मटर पनीर और आलू गोभी की सब्ज़ी, बंूदी का रायता, पापड़, सलाद और अचार। खालिस गाढ़े दूध से तैयार की गई खीर में, ढेर सारे मेवे गिराये गये थे। किंतु मेरा उसे चखने तक को मन नहीं हुआ। दो वर्करों ने आकर कहा भी था, “आप भी खा लीजिये खाना।” मेरा यही उत्तर था, ”आप लोग शुरू कीजिये। मुझे अभी भूख नहीं लगी। मैं बाद में खा लूंगा।”

अनिल होता, तो क्या यों ही छोड़ देता! कितना शौक़ था उसे दूसरों को खिलाने का! कोई नख़रा दिखाने लगे, या मना करे, तो वही गरम गरम मूड!… ठीक है साहब, नाली में फेंकवा देते हैं। वैसे, आपने इस इलाके़ में कुत्तोें की भी कोई कमी नहीं… आप चुपचाप खा लीजिये, वरना आप जानते हैं कि मैं…

शाम को, मुझे मिलने के लिये उसकी कोठी पर जाना चाहिये या नहीं, इस पर सोचने या बहस की ज़रा भी गुंजायश नहीं थी। कितने ही कार्य हैं, जो अनिच्छा से भी, करने ही पड़ते हैं। नौकरी करने को भी कहां मन हो रहा था! प्रमहंस राम कृष्ण देव की शिक्षा सम्बंधी पुस्तकों का अध्ययन करने और यह जानते हुए भी, कि नौकरी करना आत्महत्या से भी बड़ा पाप है, ग़ुलामी का यह जुआ मैंने अपने कंधों पर डाल लिया था और फिर यह नौकरी भी कौन सी आसानी से मिल गई थी! कितना संघर्ष करना पड़ा था, ‘नौकर’ शब्द का काला टीका अपने माथे पर सजाने के लिये! मगर जब यह ‘गुलामी’ एक बार स्वीकार कर ही ली थी, तो यह रोना-झीकना या नख़रे दिखाना कैसा?

किंतु इस समय मैं मन मार कर जो कुछ कर रहा था, वह मेरे अपने लिये तो न था। अनिल मेरा क्या लगता था? या मैं अर्चना, अरूणा और उनकी मां के लिये कौन हूं? मैं इस पर विचार नहीं करना चाहता था। केवल एक ही बात मन में थी, मुझे इनके लिये कुछ करना ही चाहिये। भले ही मुझे, उस नरेन्द्र मोहन जैसे के सामने, बारबार ही क्यों न ज़लील होना पड़ जाये!

रात आठ बजे के आसपास, वह क्लब चला जाता था। मुझे उससे पहले ही वहां पहुंचना था। ऐसा न हो, मैं वहां सड़क तक ही पहंुचूं और उसकी कार, गैराज से निकल कर, बाहर फाटक की ओर आ रही हो और देख लेने पर फिर उसके मुंह से वही शब्द निकलें… मैं तो तुम्हें एक अक़्लमंद आदमी समझता था!

वर्कर काॅलोनी में इस समय, बहुत ही चहल पहल का माहौल रहता था। हम सुपरवाइज़र लोगों के क्वार्टरों में, मामूली आपसदारी और औपचारिकता की झलक, देखने को मिलती। मगर इधर बेंगलो एरिया में तो एकदम ख़ामोशी का माहौल, जैसे यहां के सभी निवासी, घर बार छोड़ कर पलायन कर गये हों, या किसी के ग़मी में शरीक होकर लौटें हो और इस वक़्त आराम कर रहे हों!

ये लोग शायद ही, कभी आपस में मिलते जुलते हों। याद आया, एक बार एक अफ़सर, लगभग दो महीने तक बीमार रहा। ठीक होकर जब ड्यूटी पर लौटा, तो बराबर वाले बंगले मे रहने वाला एक अन्य अफसर, उससे हाथ मिलाते हुए, पूछ रहा था, ”कहां रहते हो भाई, आजकल? दिखाई ही नहीं पड़ते। क्या एल0 टी0 सी0 लेकर, फै़मिली को कन्या कुमारी घुमाने ले गये थे?”

सवा साम बजे थे। मैंने लोहे का फाटक खोल, कोठी की सीमा में प्रवेश किया और फाटक को पहले की तरह बंद कर, पक्की सड़क पर चलता हुआ बरामदे वाले शार्ट कट पर बढ़ा।

आधी रात जैसा सुनसान। बरामदे में वही एक सीध में पड़ी ख़ाली कुर्सियां, फूलों के गमले, रात की रानी की सुगन्ध और सामने के चारों बंद दरवाज़े। सभी दरवाजे़ और खिडकियों के शीशों के पीछे, मैरून रंग के पर्दे, जिन में इस समय ज़रा भी जुम्बिश न थी।

मैं कालबेल का बटन दबाने की लगा था, कि बायीं ओर से, दूसरे कमरे का दरवाज़ा खुला।

“येस प्लीज़?”

यह वही लड़की थी। आज वह, गहरे सुखऱ् के बजाय, गहरे हरे रंग की पौशाक में थी। बालों का स्टाइल भी, आज थोड़ा बदला हुआ था। किंतु उसका चेहरा ऐसा नहीं था, जो एक बार देखने के बाद, पुनः पहचान लेने में कोई ग़लती कर जायेः

“अंकल तो नहीं हैं।” उसने कहा।

“क्लब चले गये?”

“नो नो… क्लब अभी कहां! सिटी गये हैं। कुछ शाॅपिंग करनी थी- आप…?”

“मैं फिर आ जाऊंगा।”

“कोई अर्जेंट काम था?”

“था तो अर्जेट ही।”

“आप व्हेट कर लीजिये।”

“मैं…“

“अरे, आइये न… मैं उधर से ड्राइंग रूम का दरवाज़ा खोलती हूं।”

वह अदृश्य हो गई और एक मिनट से भी कम समय में, दूसरे कमरे का दरवाज़ा खोले, मौजूद थी।

“प्लीज़, कम इन।”

मैं झिझकता-सा हुआ भीतर चला गया।

“आप तो बहुत ही हेज़िटेट कर रहे हैं… बैठिये न।”

बैठना ही पड़ा।

“चाय लेंगे?”

“चाय पी कर ही चला था घर से।”

“कोल्डड्रिंक? ओह नो, चाय के बाद कोल्डड्रिंक तो हार्मफुल होगी। काॅफ़ी ठीक रहेगी।

व्हाट डू यु थिंक? चलेगी?”

अजीब हालत है! लगता है, इन कोठी बंगलों में रहने वाले लोग, इसी तरह ख़ाली बातें बनाने, या नाटक करने में पूरी तरह माहिर होते हैं।

मगर वह बोली, “अच्छी बात, काॅफ़ी ही ठीक रहेगी। इट्स फ़ाइनेल।”

वह चुस्ती से उठ कर, साथ वाले कमरे में से होती हुई, पीछे बरामदे की ओर निकल गई और एक मिनट बाद लौट कर, कुर्सी पर बैठते बोली, “आप शायद पहले भी एक बार इधर आये थे?”

“जी।”

“हां, मुझे कुछ कुछ याद है… एक लड़की भी थी न आप के साथ? क्या नाम था उसका?

“अर्चना।”

“येस, अर्चना… ए लवली गर्ल! आपकी क्या लगती है वह?”

“लगती तो, कुछ नहीं।”

“तो, यों ही?”

“यों ही?”

“आई मीन, फाॅर सिम्पेथी?… उसके ब्रदर का कोई चक्कर था न?”

“मैं उसी सिलसिले में, साहब से बात करने आया था।”

“कुछ पता चला उसका?”

“कुछ पता नहीं चला।”

“वैरी सैड! बेचारी, उसकी सिस्टर… कैसा फ़ेस हो रहा था। उस दिन उसका। मैं रात भर उसी के बारे में सोचती रही थी।”

मैं सोच रहा था, ये लोग क्या वाक़ई इतने मासूम होते हैं, या नाटक करते रहना ही, इनके जीवन का उद्देश्य है?

किंतु, शायद यह शत प्रतिशत नाटक न होता हो। क्योंकि आज भी नौकर, टेª हाथ में लिये चला आ रहा था। काॅफ़ी के अलावा प्लेट में खाने का कुछ सामान भी था।

मैंने काॅफ़ी का पहला घूंट ही भरा था, कि उसने बंदूक सी दाग़ दी, “बाई दि वे, आप फैक्टरी में किस पोस्ट पर हैं?”

मैंने कप मेज़ पर रख कर कहा, ”मैं अफ़सर नहीं हूं।”

मेरा उत्तर सुनकर, वह मुस्कराने लगी। फिर बोली, मैंने यह तो नहीं पूछा था, कि आप क्या नहीं हैं!”

“मैं सुपरवाइज़र हूं।”

“सुपरवाइज़र? क्या करते हैं सुपरवाइज़र फैक्टरी में?”

कहना चाहा, झख मारते हैं!

“बिस्केट लीजिये न?”

मैंने एक बिस्कुट उठा लिया।

“आपने बताया नहीं, सुपरवाइज़र फैक्टरी में क्या करते हैं?”

“काम करते हैं।” मैंने कहा।

वह खिलखिला कर हँसी और बोली, “काम तो सभी करते होंगे?”

“सुपरवाइज़र भी करते हैं।”

“क्या काम करते हैं?”

””च कहूं, तो झख ही मारते हैं… सिर्फ़ पिसने का काम करते हैं हम लोग! दो पाट हैं चक्की के। ऊपर वाला पाट, अफ़सरों का। नीचे वाला वर्करों का और दोनों के बीच, हम लोग!”

“आप लोगों को अफ़सर डांटते होंगे और आप वहीं डांट, वर्करों को पास-आॅन कर देते होंगे।”

“नहीं। मैंने बताया ना, ऊपर और नीचे, दोनों ओर से, हमें ही डांट खानी पड़ती है। मगर आप यह सब क्यों पूछ रही हैं?”

“इन्ट्रेस्टिंग हैं ये बातें।”

“इन्ट्रेस्टिंग? मैं तो समझता हूं, बहुत ही बोर विषय है… आज आपकी आंटी दिखाई नहंीं पड़ रहीं?”

“शाॅपिंग के लिये गई हैं अंकल के साथ। मैंने बताया था न।”

“मुझे याद नहीं रहा। साहब तो आये नहीं अभी तक!”

वह अपनी कलाई पर बंधी खूबसूरत घड़ी को देखने लगी।

फिर बोली, “आपको यहां आये, सिर्फ़ अठारह मिनट और बीस सेकेण्ड हुए हैं। आई थिंक, यु फ़ील बोर?”

“नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।”

“फिर क्या बात है?”

“कुछ भी तो नहीं।”

“तो कुछ बात कीजिये न।”

“समझ में नहीं आता, क्या बात करूं! हम लोगों के पास तो आमतौर पर एक ही जैसी बातें हुआ करती हैं। बड़े साहब ने यह कहा और छोटे साहब ने वो कहा। कौन किसे मक्खन लगाता है और कौन किस की डांट खाता हैं। हमारा मानसिक स्तर तो बस, इससे ऊपर नहीं उठता।”

“बस बस, बस! इस तरह की बातें मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आतीं। कम पढ़ी लिखी हूं न! आप तो काफी पढ़े-लिखें होंगे।

मैंने उत्तर दिया, “फैक्टरी की नौकरी के लिये, बहुत पढ़ा लिखा होना ज़रूरी नहीं।”

तभी, साहब की कार का हाॅर्न सुनाई पड़ा।

मैंने हाथ जोड़, अभिवादन किया। मिसेस एन0 मोहन ने तनिक-सा सिर हिलाया और दूसरे कमरे में चली गई। वे आज भी सफ़ेद परिधान में थीं।

एन0 मोहन ने ‘हेलो’ के बाद ‘मैं अभी आता हूं’ कहा और मिसेस एन0 मोहन के पीछे ही दूसरे कमरे में चला गया।

पांच-सात मिनट के बाद, वह कुरते पाजामे में लौटा और दीवान पर पालथी मार कर बैठ गया। मैंने अनुमान लगाया, कि आज उनका क्लब जाने का मूड नहीं है।

“हां, अब कहिये?”

“सर, उस दिन आप से, अनिल की बहन के बारे में बात हुई थी…”

“ओह येस! मैंने बड़े साहब से बात की थी। वे मदद करने को तैयार हैं। नौकरी कर लेगी वह लड़की?”

“जी।”

“उम्र क्या है उसकी?”

“बड़ी उन्नीस की है और छोटी सतरह की।”

“छोटी तो अंडरएज है। बड़ी का काम हो सकता है। एम्पलाएमेंट एक्सचेंज में नाम तो रजिस्टर करा रखा है न?”

“शायद नहीं।”

“कमाल है! अरे भाई, इतना काम तो अब तक करा रखना चाहिये था।”

“सर, मैं कह दूंगा इसके लिये।”

“कह दूंगा नहीं। साथ ले जाकर नाम रजिस्टर करा डालो। उसके बाद, कार्ड नम्बर मुझे लिख कर दे देना। मैं अपने आप नाम निकलवा लूंगा वहां से। ओ0 के0?”

“सर, बड़ी मेहरबानी होगी आपकी।” मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया।

वह मेरी ओर आंखें फाड़ कर देखने लगा। फिर बोला, “क्या फ़रमाया आपने?… आप भी कभी कभी अजीब क़िस्म की बातें किया करते हैं!”

मैंने सिर झुका लिया।

 

अगली सुबह, मैं अर्चना के साथ, लोकल बस में बैठ, शहर रवाना हो गया। बस-स्टैंड से रोज़गार कार्यालय, लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था। समय पर्याप्त था, इसलिये पैदल चलना ही निश्चित हुआ।

दफ़तर खुलने से पहले ही, वहां काफी भीड़ जमा हो गई थी। अर्चना ने सहम कर पूछा, “इतने लोगों को कैसे मिल पायेगी नौकरी?”

“ये लोग, यहां सिर्फ़ नाम दर्ज कराने, या कार्ड पर तारीख बदलवाने आये हैं। नौकरी तो, इन सौ में एक आध को ही मिल सकेगी।

“तब, मुझे कैसे मिल सकेगी?”

“मिल जायेगी, तो अच्छा है। ना वाली स्थिति तो पहले ही है। फिर भी देखते हैं, क्या होता है!”

“यहां पर तो नाम दर्ज कराना भी आसान नज़र नहीं आता।”

“इतना काम तो अब करके ही लौटेंगे।”

किसी ने मेरे कंधे पर हाथ धरा। पलट कर देखा, योगेश था।

“कहो गुरू, कैसे हो?”

योगेश मेरे साथ ही फैक्टरी में लगा था। मगर नौकरी लगने के एक महीना बाद ही, ‘गुरू, यह काम अपने वश का नहीं’ कह कर वह नौकरी छोड़ गया और शहर के किसी मुहल्ले में, दुकान खोल कर बैठ गया।

“इधर कैसे?” उसने पूछा।

“आप बताइये, आप जैसे मेहनती और व्यस्त आदमी को इधर क्या काम पड़ गया?”

वह ज़रा सा मुस्कराया और कहने लगा, “अपना भतीजा है न रामशरण, उस का नाम निकलवाने आया हूं। अपने एक फ्रेंड का अंकल है इधर। काम तो वह कर देगा। मगर है साला हरामी, पक्का लोभी! साॅरी… इतना होते हुए भी, पांच सौ मांग रहा है। ख़ैर, आप बताओ, इधर कैसे?”

अर्चना थोड़ा हट कर खड़ी हो गई थी। मैंने कहा, “मेरे मित्र की बहन है, इसका नाम दर्ज कराना है।”

“इतना सा काम तो सौ रूपये में हो जायेगा।”

मैंने हंस कर कहा, “यह काम, बिना पैसे दिये कराना है।”

“तब तो गुरू, पूरा दिन खड़े खड़े निकल जायेगा और… मगर मैं एक बात बता दूं। आपके इस आदर्शवादी ढंग से, नाम भले ही यहां दर्ज हो जाये, नौकरी बीस साल बाद भी नहीं मिल पायेगी।”

अर्चना कुछ फ़ासले पर खड़ी थी। किंतु हमारी बातचीत, बखूबी उसके कानों में पहंुच रही थी। योगेश चला गया, तो वह समीप आकर बोली, “यहां तो बहुत बिगड़ी दशा है!”

मैंने कहा, “यहां ही नहीं, जिस दिशा में भी जाओगी, दशा बिगड़ी हुई ही नज़र आयेगी।”

दोपहर डेढ़ बजे के आसपास नाम रजिस्टर कराने का काम हो गया। कार्ड प्राप्त करते समय, यों ही पूछ लिया।

“कब तक सम्भावना है नौकरी मिल जाने की?”

क्लर्क महोदय मुस्करा कर बोले, “जब भी किसी संस्थान की ओर से, स्थान रिक्त होने का पत्र आयेगा। हम लोग योग्यता और वरयीता के आधार पर नाम भेज देंगे। यहां तो बिल्कुल सीधा सच्चा और साफ़ सुथरा हिसाब है।”

“सुना है, कुछ ले-दे कर काम हो जाता है?” मैंने धीरे से पूछा।

“कोशिश कर देखिये। बाहर कितने ही चोर-उचक्के, आप जैसों को लूटते फिर रहे हैं। वैसे, आप मुझे छुट्टी के बाद, बाहर चाय की दुकान पर मिल लें। मैं बता दूंगा, काम कैसे हो सकता है।”

हम बस स्टैंड की ओर चल पड़े। मुझे अब भूख परेशान करने लगी थी। सुबह से इधर आ कर, चाय तक नहीं पी सके थे।

कई एक साधारण सी दुकानें और रेस्तोरां, मार्ग में दिखाई पड़े। उनके समीप से गुज़रे, तो मैंने कहा, “मुझे तो बड़े ज़ोर की भूख लगी है।”

अर्चना ने मेरी ओर देखा और कहा, ”आपने पहले क्यों नहीं बताया, मेरे पास परांठे थे।”

“थे? अब नहीं?”

वह ज़रा सी हंसी। सम्भवतः बहुत दिन बाद, या शायद पहली बार, उसके चेहरे पर हंसी दिखाई पड़ी।

“अब भी हैं इस बैग में। मगर खायेंगे कहां बैठ कर?”

“सामने चाय की दुकान है, वहीं चलते हैं। आइये।”

अर्चना ने बैग खोल कर, बंधा हुआ रूमाल बाहर निकाला। रूमाल की गांठ खोली, तो अख़बार के काग़ज़ में तुड़े मुड़े परांठे नज़र आये। दो पराठों के बीच, आम का अचार की कुछ फांके, गहरे मसाले में लिपटी, महक रही थीं।

“बस, चार ही हैं?” मैंने पूछा।

“नहीं, पांच हैं।”

एक एक प्लेट आलू-छोले की और बाद में चाय लाने के लिये, मैंने दुकानदार से कह दिया।

उस अति साधारण चाय की दुकान की मैली सी मेेज़ पर, हमारा ‘लंच’ सज गया था।

“आप खा क्यों नहीं रहीं?” उसका रूका हाथ देख, मैंने पूछा।

“खा तो रही हूं।” कह कर उसने छोटा सा कोर मुंह में डाला।

“आप एक बात बतायेंगे?” उसने एकाएक पूछा।

“ज़रूर।”

“आप मुझे इस तरह आप कहकर, कब तक बात करतेे रहेंगे?”

“ओह! मैं तो डर ही गया था। सोचा, न जाने क्या पूछा जाने वाला है!”

“सच, बड़ा ही अजीब लगता है। अरूणा भी कह रही थी।”

“क्या कह रही थी?”

“यही, कि जब भाई साहब, हमें आप कह कर बात करते हैं, तो बड़ी शरम महसूस होती है।”

मैंने कहा, “जहां तक मैं समझता हूं, आप कहने, से छिन तो कुुछ भी नहीं जाता। सच मानिये, मेरा किसी को लज्जित करने का कभी विचार मन में नहीं आया।”

“तब भी, इतनी औपचारिकता, बिना बात, अनावश्यक शिष्टाचार प्रदर्शन, अपने से छोटों को भी बड़ों की तरह सम्मान देना, नाटकीय-सा नहीं लगता?”

मैं हंसने लगा।

“बताइये, परायापन-सा नहीं झलकता, ऐसी बातों में, ”

मैं फिर हंसा, तो वह चकित सी मेरी ओर देखने लगी। मैंने सहज होने के विचार से कहा, “अभी अभी मुझे ऐसे लगा, जैसे कोई हिंदी की अध्यापिका, शुद्ध हिंदी में ‘व्यवहार’ शीर्षक पर, बच्चों को निबंध लिखा रही हो!”

वह अब सचमुच ही लज्जित हुुई जा रही थी। उसका चेहरा इस समय, बिल्कुल अनिल के चेहरे जैसा लगने लगा था। सुखऱ्ी की लहरें, उसके पूरे चेहरे पर दौड़ रही थीं।

उसके इस प्रकार चुप हो जाने पर, मुझे कहना ही पड़ा, “सच बात है, मेरा व्यवहार किसी के प्रति भी, न जाने क्यों, कभी सामान्य नहीं रह पाता। कुछ न कुछ गड़बड़ हो ही जाती है।”

“आप इतनी गहराई तक जा पहंुुचेंगे, ऐसा तो नहीं सोचा था, मैं तो सिर्फ़…”

“अपनापन ज़ाहिर करने के लिये शायद आप कह रही थी।”

वह पुनः लज्जित होने लगी। फिर बात का रूख पलटते हुए कहने लगी, ”कितनी मिर्च डाल रखी है इस आलू छोले की सब्जी में!”

“अचार बहुत बढ़िया है।” मैंने कहा।

“मां के हाथ से डाला गया अचार, बढ़िया ही तैयार होता है।” उसने सगर्व कहा।

“मेरी मां भी…“ मैं कुछ कहने लगा था।

“रूक क्यों गये? आप कुछ कहने लगे थे न?”

“कुछ नहीं।”

“कुछ नहीं! ठीक तो है! आपका इतने दिन से हमारे घर आना जाना है। हम सभी आपको इतना मानते हैं। आप पर पूरा भरोसा करते हैं। मगर आप हैं कि कभी…”

“पूरी बात कह डालिये।” मैंने कहा।

“कहना यही चाहती हूं, कि दूसरों से सभी कुछ मालूम करके स्वयं अपने बारे में, आप ने कभी एक शब्द नहीं कहा। इसका क्या कारण है?”

“क्या कहूं, अपने बारे में?”

“कुछ भी नहीं है आप के पास बताने के लिये? घर में कौन कौन हैं। जो हैं, वे आप के पास यहां कभी आते क्यों नहीं, इतना तो बता ही सकते हैं।”

“दरअसल मैं…“

“यह भी पता नहीं चलता, यहां कैसे चल रहा है।”

“कैसे मतलब?”

“खाना पीना, होटल में होता है, या घर पर खुद हाथ जलाते हैं। हमने तो इस बारे में जब भी बात की, तो आपने गोल मोल करके या हंस कर ही टाल दिया!”

“अर्चना, विश्वास करो, मैं सी0 बी0 आई का आदमी नहीं हूं। मेरा कोई भी रहस्य नहीं। फैैक्टरी में एक साधारण सुपरवाइज़र हूं और शायद अगले दस साल तक भी, इसी पोस्ट पर रहूंगा। दोपहर का खाना, फैक्टरी कैंटीन में खाता हूं। वहां पांच रूपये में, परोसी थाली मिल जाती है, जिस में चार चपातियां, जो आमतौर पर अन्दर से कच्ची और ऊपर से जली हुई होती हैं। थोड़े से चावल, जो बिना साफ़ किये या धोये ही, उबाल दिये जाते हैं और दाल… दाल हमारे यहां बहुत ही बढ़िया बनती है! शर्त लग जाती हैं। जो यह बता दे कि यह कौन सी दाल है, शर्त जीत जाता है। मगर यह कोई पहचाने कैसे, कि कौन सी दाल है। दाल में तो पानी ही पानी होता है। दाल का एक भी दाना उसमें नहीं होता। एक परेशानी और है। थालियां कम और खाने वाले बहुत अधिक। कैन्टीन का गेट खुलते ही, लोग चीलों की तरह झपट पड़ते हैं उन थालियों पर। तब जिस के हाथ मेें जो भी आया…”

मैं चुप हो गया, क्यांेकि उसकी अचानक ही हंसी छूट गई थी।

“क्या बात है?” मैंने गम्भीर होते पूछा।

“आपने तो मेल टेªेन ही छोड़ दी!… हां, सुबह के नाश्ते में क्या कुछ तैयार होता है?”

“वही, जो समय पर तैयार हो सके।”

“फिर भी?”

“मैं फैक्टरी के पहले हूटर पर बिस्तर से उठता हूं। दूसरे हूटर की आवाज़ पर किचिन में जा घुसता हूं। डबल रोटी अंडा, कभी कभी परांठा। मगर आप के इन परांठों जैसा नहीं बना पाता। चकले पर बेलन से गोल करने लगता हूं, तो तिकोना सा हो जाता है। त्रिकोण ठीक करने लगता हूं, तो बेढ़ंगा सा चतुर्भुज बन कर रह जाता है।”

“तब क्या करते हैं?”

“तब, उसे उसी तरह तवे पर पटक कर, सभी कसर घी से पूरी कर देता हूं।”

“किसी दिन हमें भी खिलाइये अपने बनाये परांठे!”

“श्योर श्योर! मैं…”

बातचीत बंद हो गई। अब तक यहां हम दो ही बैठे थे। दुकानदार अपने कार्य में व्यस्त था। किंतु अभी अभी, मोटे चेक की बुशशर्ट पहने, दो नौजवान, हमारे ठीक सामने आ बैठे थे।

बस स्टैंड यहां से अधिक दूर नहीं था। मेन बाज़ार भी समीप ही था।

“बाज़ार से कुछ लेना तो नहीं?” मैंने पूछा।

“ना।”

“एक काम आप को ज़रूर करना होगा।” मैंने कहा, तो उस के माथे पर शिकन पड़ गये। मैंने कारण समझते हुए कहा, “आदत को धीरे धीरे ही ठीक कर पाउंगा।”

 वह मुस्करा कर बोली, “ख़ैर, काम बताइये।”

“आप दोनों बहनें टाइप सीखना अभी से शुरू कर दें। यह बहुत ज़रूरी होगा।”

“समझ में नहीं आता, मैं नौकरी कर भी पाउंगी, या नहीं!”

“ऐसी भी क्या बात है?”

“मेरी तो इंगलिश बहुत कमज़ोर है।”

“सरकारी नौकरी के लिये, भाषा का ताक़तवर होना क़तई ज़रूरी नहीं। एक से बढ़कर एक भरे पड़े हैं सरकारी दफतरों में, कितने ही अफसर हैं, जिन्हें इंगलिश के टेंस का भी ज्ञान नहीं। मगर वे भी नीचे वालोें के लिखे ड्राफ्टों का मलीदा बना देने में कसर नहीं छोड़ते। बस, एक बार नौकरी पर लग जाना चाहिये। फिर सभी कुछ, अपने आप ही रास्ते पर आ जाता है।”

“मिल भी जायेगी मुझे नौकरी?”

“मुझे तो पूरा विश्वास हैैै।”

“अरूणा को भी मिल जायेगी?”

“लो, कर लो बात! पहले एक का काम तो हो जाये। उसकी तो अभी उम्र भी कम है। साल भर में वह टाइपिंग और शार्ट हैंड सीख ले, तो शायद उसका भी कहीं कुछ हो जाये।”

कुछ ही देर पहले, एक लोकल बस जा चुकी थी। अगली बस चलने में, अभी बीस मिनट शेष थे। इसलिये सीटें आराम से मिल गईं।

पौने तीन बज रहे थे। अर्चना कहने लगी, “अरे, इतना टाइम हो गया! आपका तो आज पूरा दिन ही बरबाद हो गया!”इसे बरबाद होना कहते हैं? हम पिक्चर देख कर तो नहीं लौट रहे। भई, जिस काम के लिये छुट्टी ली थी, वह पूरा करके आये हैं। क्यों तुम्हें ऐसा महसूस हुआ, कि दिन बरबाद हो गया?”

“एक बात कहूं।”

“ज़रूर कहो।”

“बुरा तो नहीं मान जायेंगे?”

“बुरा क्यों मानंूगा, बोलो, क्या बात है?”

“मैंने इससे पहले, आप को कभी इतना चहकते नहीं देखा।”

“मैं दरअसल…” मैं कहते कहते चुप हो गया।

“एक बात बता देने के बाद, चुप हो रहियेगा।”

मैंने उसकी ओर ग़ौर से देखा।

“आप फैैक्टरी में सुपरवाइज़र हैं न?”

“हां।”

“सुपरवाइज़र लोग, फैक्टरी में क्या करते हैं?”

ज़ोर से छूट जाने वाली हंसी पर, मैं कठिनाई से नियंत्रण कर पाया।

क्रमशः…३

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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