हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ घुँघरू की तरह बजती ही रही हूँ मैं… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा

कार में धीमी आवाज़ में गीत बज रहा था – “घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं…”

“मम्मी, आप रो रही हो?” बेटी ने पूछा।

उसने जल्दी से शीशे की तरफ़ देखा – “नहीं बेटा, आँख में कुछ चला गया।”

“आप हमेशा यही कहती हो।”

वह चुप हो गई।

गीत की पंक्तियाँ जैसे वर्षों पुराना हिसाब खोल रही थीं।

कभी पति की पसंद, कभी परिवार की उम्मीदें, कभी बच्चों की जरूरतें – वह सबकी ताल पर चलती रही।

कभी टूट गई, कभी तोड़ी गई। कभी बिखरी, फिर रात के अँधेरे में खुद ही अपने टुकड़े समेटती रही।

किसी ने कभी यह नहीं पूछा कि उन टुकड़ों को जोड़ते-जोड़ते उसके हाथ कितनी बार लहूलुहान हुए थे। शायद इसलिए कि खून दिखाई नहीं देता था।

बेटी ने धीरे से पूछा – “मम्मी, आपको क्या पसंद है?”

वह जवाब नहीं दे पाई।

इतने वर्षों में शायद वह अपनी पसंद ही भूल चुकी थी।

गीत खत्म हो गया।

लेकिन कार में खामोशी बनी रही।

बेटी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

उसने शीशे में खुद को देखा, फिर बेटी को।

होंठ कुछ कहने के लिए खुले… मगर आवाज़ नहीं निकली।

रेडियो पर अगला गाना शुरू हो चुका था।

और वह फिर चुपचाप सुनने लगी।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२५ – आईना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आईना।)

☆ लघुकथा # १२५ – आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“नेहा! तुम हमेशा मेरे दुश्मनों से ही क्यों बात करती हो? मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं। आज ही मेरा मकान खाली कर दो।”

मकान मालकिन शांता देवी का स्वर गुस्से से काँप रहा था।

नेहा बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। पीछे से शांता देवी की बड़बड़ाहट सुनाई देती रही—”किराए के घर में रहती है और तेवर महारानी जैसे!”

शाम को संदीप घर पहुँचा तो शांता देवी ने फिर वही बात दोहरा दी। कमरे में आकर उसने पूछा, “आख़िर बात क्या हुई?”

नेहा ने शांत स्वर में कहा, “कोने वाले घर में हमारे गाँव की पूजा रहती है। वह मुझसे दो बातें कर लेती है। आंटी उसे अपना दुश्मन मानती हैं। उनकी दुश्मनी में मेरा क्या दोष?”

संदीप ने कहा, “ठीक है, दोस्त का मकान खाली है। वहीं चलेंगे।”

दोनों सामान समेटने लगे। अलमारी बंद करते हुए नेहा की नज़र अपने पुराने पारिवारिक फोटो पर पड़ी। उसने उसे देर तक देखा, फिर धीमे से बोली, “एक बार सास-ससुर से दूर होकर सोचा था कि शांति मिल जाएगी। अब यहाँ भी वही कड़वाहट… क्या हर बार घर ही बदलना समाधान है?”

संदीप उसकी ओर देखने लगा।

कुछ क्षण बाद नेहा ने दृढ़ स्वर में कहा, “नहीं… गाड़ी विश्वकर्मा नगर नहीं जाएगी।”

“तो कहाँ?” संदीप ने पूछा।

नेहा की आँखें नम थीं।

“रामपुर… माँ-पिताजी के पास। अब किराए के मकान नहीं, अपने व्यवहार को बदलने की कोशिश करूँगी। शायद रिश्ते घर बदलने से नहीं, रवैया बदलने से सँवरते हैं। आज मैंने स्वयं को आईने में देख लिया है।”

गाड़ी रामपुर की ओर मुड़ चुकी थी और नेहा के जीवन की दिशा भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ – स्वतंत्रता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “स्वतंत्रता”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७३ ☆

🌻लघु कथा🌻 स्वतंत्रता 🌻

आज 15 अगस्त तिरंगे झंडे की टोकरी लिए बैठी सड़क पर स्वतंत्रता दिवस की भोर देख रही थी। अभी कुछ झंडे और छोटे – छोटे बैच बिकने को बाकी रह गया था। सोच रही थी अब तो लगभग सभी भीड़ खत्म होने चली है।

मेरी टोकरी में  यह बच गया नही बिक पाया। तभी एक नौजवान दौड़ता भागता आया, पूरा सामान उठा कई गुना ज्यादा राशि देकर चलता बना।

वह खुश होकर टोकरी उठा, मुखड़े पर मुस्कान और सरपट चल दी घर की ओर।

दरवाजे पर पहुची ही थी कि झपट्टा मार टोकरी को फेंकते उसका पतिदेव पैसे झींनते हुए

—मना आई स्वतंत्रता दिवस

अब देख गुलामी क्या है। इससे तू आजाद नही हो सकती।

धम्म से धरा पर बैठते सिसक पड़ी – – क्या स्वतंत्र होना इतना निर्मोही होता है। अश्रुं धारा बह चली तुझे तो उम्र भर की गुलामी मिली है जो सदैव जीवन्त रहेगी।

शायद शहीद होने के बाद ही स्वतंत्र हो सकूंगी. 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ रुग्ण मानसिकता…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  – रुग्ण मानसिकता…!

☆ लघुकथा ☆ रुग्ण मानसिकता…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

(आज के समय में दम तोड़ती हुई संवेदना से उपजी लघुकथा…!)

 

रमिया जिन साहब के घर झाड़ू-पोंछे और बर्तन साफ़ करने का काम करती है। उनकी उम्र यही कोई अस्सी और मेम साहब की लगभग पचहत्तर की होगी। पति-पत्नी दोनों पढ़े-लिखे और सेवानिवृत्त हैं। बेटा और बेटी लक्ष्मी जी की कृपा से साधन-सम्पन्न हैं।

पिछले दिनों रमिया के साहब की आधी रात के लगभग अचानक साँस हलक में अटकने से पलक झपकते निधन हो गया। मेम साहब ने रमिया को मोबाइल लगाकर दुखद समाचार दिया कि साहब नहीं रहे हैं। वह भागी-भागी साहब के घर पहुँची और रात भर मेम साहब के आँसू पोंछती रही।

मेम साहब आँसू बहाते हुए बोली- ‘हाय राम! देख, तो री! रमिया… मेरे दाँए पड़ोसी को कैंसर और बाँए पड़ोसी को हार्ट की बीमारी है, बावजूद उनको कुछ नहीं हुआ और मेरे अच्छा-ख़ासा, खाता-पीता, चलता-फिरता आदमी मेरी आँखों के सामने चल बसा।

यह सुनकर कम पढ़ी-लिखी, पर समझदार रमिया ने अपना सर दीवार से ठोक लिया और सोचने लगी… क्या कथित शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग ऐसी रुग्ण मानसिकता के होते हैं जो अपनों की मौत पर बीमार पड़ोसियों के मरने की कामना करते हैं…!

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११५ – लेन – देन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– लेन – देन …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११५  — लेन – देन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

एक ध्यातव्य ग्रामीण प्रसंग है। पड़ोसी देता था और लेने वाला पड़ोसी तो लौटाता ही नहीं था। देनदार पड़ोसी कशमकश अनुभव करता था किस चितवन से वापस मांगने का साहस कर पाए। उसकी पत्नी बड़ी गंभीरता से यह सब आँकती थी। इस मामले में अपने पति की अपेक्षा वह होशियार ही थी। उसने अपने पति से बात निकाल ली अपने घर से कुछ जाने का उसे दुख तो बहुत होता है। दुख की बात हुई तो उसने पति को सुख का नुस्खा सुझाया। तुम मांगने वाला फकीर बन जाओ। बाबा दो, लेकिन वापस पाने की आशा मत करना। पत्नी से सलाह पाने पर मांगने जैसे भाव से वह चेतन हो गया। पहली बार ही मांगे जाने पर उससे कहा गया, “मिंतर, तुमसे ली हुई कुल्हाड़ी मैं वापस कर दूँगा।” वह अंदर ही अंदर खुश हुआ। उसे तो याद ही न था अपनी कुल्हाड़ी कभी वहाँ गई थी। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

05  — 08 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “खोया हुआ कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “खोया हुआ कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-सुनो।

-कौन?

-मैं।

-मैं कौन?

– अच्छा। अब मेरी आवाज भी नहीं पहचानते?

– तुम ही तो थे जो काॅलेज तक एक सिक्युरिटी गार्ड की तरह चुपचाप मुझे छोड़ जाते थे। बहाने से मेरे काॅलेज के आसपास मंडराया करते थे। सहेलियां मुझे छेड़ती थीं। मैं कहती कि नहीं जानती।

– मैं? ऐसा करता था?

– और कौन? बहाने से मेरे छोटे भाई से दोस्ती भी गांठ ली थी और घर तक भी पहुंच गये। मेरी एक झलक पाने के लिए बड़ी देर बातचीत करते रहते थे। फिर चाय की चुस्कियों के बीच मेरी हंसी तुम्हारे कानों में गूंजती थी।

– अरे ऐसे?

– हां। बिल्कुल। याद नहीं कुछ तुम्हें?

– फिर तुम्हारे लिए लड़की की तलाश शुरू हुई और तुम गुमसुम रहने लगे पर उससे पहले मेरी ही शादी हो गयी।

-एक कहानी कहीं चुपचाप खो गयी।

– कितने वर्ष बीत गये। कहां से बोल रही हो?

– तुम्हारी आत्मा से। जब जब तुम बहुत उदास और अकेले महसूस करते हो तब तब मैं तुम्हारे पास होती हूं। बाॅय। खुश रहा करो। जो बीत गयी सो गयी।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“तुम्हें मेरी बात की कभी परवाह ही नहीं रही…” साक्षी की आँखें भर आईं।

अभिषेक ने थके स्वर में कहा, “ऑफिस की परेशानियाँ थीं… इसलिए चुप था।”

कुछ दिनों बाद साक्षी पूरे दिन खामोश रही।

अभिषेक झल्लाया, “हर बात पर चुप्पी क्यों? रिश्ते ऐसे नहीं चलते!”

साक्षी ने उसकी ओर देखा और धीमे से बोली—

“जब तुम चुप रहते हो, उसे तनाव कहते हो…जब मैं चुप रहती हूँ, उसे अहंकार क्यों कहते हो?”

अभिषेक के पास कोई उत्तर नहीं था।

साक्षी की आवाज़ काँप गई-

“तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारी झुंझलाहट और तुम्हारा दर्द मैं पढ़ लेती हूँ। मेरी आँखें भीग जाएँ, तो तुम मेरा व्यवहार पढ़ते हो… मेरा दर्द नहीं।”

कमरे में सन्नाटा था।

अभिषेक ने उसका हाथ थाम लिया।

“मुझे माफ़ कर दो,” उसने कहा, “मैं तुम्हारी गलतियाँ देखता रहा, तुम्हारी थकान नहीं।”

साक्षी मुस्कराई, “पति-पत्नी तब एक नहीं होते जब दोनों सही हों… बल्कि तब होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे की गलतियों को भी एक ही दिल और एक ही तराजू से तौलें।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२४ – देशभक्ति का आईना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – देशभक्ति का आईना।)

☆ लघुकथा # १२४ – देशभक्ति का आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यालय में देशभक्ति पर भाषण प्रतियोगिता होने वाली थी। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा, “बच्चो, बताओ, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में तुम क्या जानते हो?”

एक बच्चा सहजता से बोला, “मैडम, आप चिंता मत कीजिए। हम गूगल से भाषण खोजकर याद कर लेंगे। इस बार प्रतियोगिता हम ही जीतेंगे।”

शिक्षिका ने गंभीर होकर पूछा, “बेटा, बात केवल प्रतियोगिता जीतने की नहीं है। क्या तुम जानते हो कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई ने देश के लिए क्या किया था?”

बच्चा बोला, “मैडम, इंटरनेट पर सब मिल जाएगा।”

शिक्षिका ने कहा, “इंटरनेट जानकारी दे सकता है, उनके त्याग का एहसास नहीं। राष्ट्रभक्ति केवल भाषण देने का नाम नहीं, उसे जीवन में उतारना भी जरूरी है।”

बच्चा कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मैडम, जब आज भी शिक्षा व्यवस्था में इतनी समस्याएँ हैं, परीक्षाओं में धांधली होती है और पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, तब हम राष्ट्रभक्ति की बातें क्यों करें?”

शिक्षिका ने कहा, “इसीलिए तो पढ़ो बेटा! राष्ट्रभक्ति केवल ‘भारत माता की जय’ बोलना नहीं है। ईमानदारी से पढ़ना, नकल न करना, गलत के विरुद्ध आवाज उठाना और अपने कर्तव्य को निष्ठा से निभाना भी राष्ट्रभक्ति है।”

बच्चा मुस्कुराया, “तो मैडम, इस बार मैं गूगल से भाषण याद नहीं करूँगा। पहले अपने देश को समझूँगा, फिर देश के लिए कुछ करने की कोशिश करूँगा।”

शिक्षिका की आँखों में संतोष उतर आया।

तभी बच्चा फिर बोला, “लेकिन मैडम, एक बात पूछूँ? अगर मैं सच बोलूँगा, नकल नहीं करूँगा और गलत के खिलाफ आवाज उठाऊँगा… तो क्या अगली बार भी मुझे भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने के लिए गूगल से ही कोई ‘सफलता का मंत्र’ ढूँढ़ना पड़ेगा?”

शिक्षिका निरुत्तर थीं।

कक्षा में सन्नाटा छा गया।

बाहर विद्यालय की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ अच्छा लिखा था।

बच्चे ने उस वाक्य को देखा और धीमे से मुस्कुराया।

शायद उस दिन पहली बार उसने ‘सत्यमेव जयते’ पढ़ा नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े होकर देशभक्ति का असली आईना देख लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ – श्याम पट ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा श्याम पट”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७२ ☆

🌻लघु कथा🌻 श्याम पट 🌻

गिरधारी लाल आज कमरे की दिवाल पर काले रंग का श्याम पट बनवा रहें हैं। दौड़ता हुआ पारस—- पास आकर

दादा जी ये क्या बना रहे?

(ब्लैक ब्लैक)

आज के बच्चे रंगों को रेड ब्लू, ग्रीन, यलो—से ही पहचानते हैं

धूमिल हो गई सिंदूरी रंग, भोर की लालिमा, गोधूली की बेला—

दादा जी ने बाल सुलभ चंचलता को आंकते कहा–यहाँ तुम लिखाई करोगे और एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनोगे। पारस गले में झूल गया मुझे तो आपके जैसा बनना है पापा तो दिनभर मोबाइल चलाते है क्या आपने उन्हें ये बोर्ड नही बनवाया था।

दादा ने कनकी लगा देखते फुसफुसा कर कहने लगे – – मोबाइल रिश्तों को काला करने लगा श्याम पट में आज भी वो ताकत है, जो परिवार जोड़ रखेगा।

देखते है श्याम पट पर पारस की छूअन कंचन बन कर कैसे निखरेगी। दादा श्याम पट को ध्यान से देखने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ईडन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा –  ईडन ? ?

…..उस रास्ते मत जाना, आदम को निर्देश मिला। आदम उस रास्ते गया। एक नया रास्ता खुला।

….पानी में खुद को कभी मत निहारना। हव्वा ने निहारा। खुद के होने का अहसास जगा।

 ….खूँख़ार जानवरों का इलाका है। वहाँ कभी मत घुसना।….आदम इलाके में घुसा, जानवरों से उलझा। उसे अपना बाहुबल समझ में आया।

…..आग से हमेशा दूर रहना, हव्वा को बताया गया। हव्वा ने आग को छूकर देखा। तपिश का अहसास हाथ और मन पर उभर आया।

….उस पेड़ का फल मत खाना। आदम और हव्वा ने फल खाया। ईडन धरती पर उतर आया।

 

?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 8.09, 29.7.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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