☆ लघुकथा ☆ ~ अंधकार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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बच्चे ने सूरज की किरणों को मुट्ठी में बाँध लिया। सूरज का असमंजस यह था कि उसे धरती पर नया सवेरा लाना था, जो कि उसकी किरणों के बिना संभव नहीं था। धरती लोक के लोगों की चाहत यह थी कि उन्हें हर एक ईश्वर प्रदत्त चीज को अपने बस में करना था, सो उन्होंने बच्चे को इस काम के लिए भेजा। इधर बच्चे की माँ दहाड़े मार कर इसलिए रो रही थी, क्योंकि घने अंधकार मे उसे अपना बच्चा ढूंढे नहीं मिल रहा था।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें।)
☆ चुभते तीर # १११ – कथा कहानी – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
कमरे का तापमान ठीक सोलह डिग्री पर लॉक था। इस कमरे में न धूप आती थी, न हवा, बस एक सफेद सी रोशनी थी जो चौबीसों घंटे जागती रहती थी ताकि मौत को आने में कोई गलतफहमी न हो। बेड नंबर चार पर लेटे सत्तर साल के दीनानाथ जी के मुंह पर लगे ऑक्सीजन मास्क पर हर तीन सेकेंड बाद भाप जमती और पिघल जाती। यही उनके जिंदा होने का इकलौता सबूत था, जिसे देखकर बगल की कुर्सी पर बैठी नर्स सिस्टर मैरी अपनी डायरी में कुछ नोट कर रही थीं।
रात के ठीक दो बज रहे थे। यह वह वक्त होता है जब अस्पताल के गलियारों में सन्नाटा इतना गहरा हो जाता है कि ग्लूकोज की टपकती बूंदों की आवाज भी किसी टाइम बम के टिक-टिक जैसी सुनाई देती है। सिस्टर मैरी ने अपनी घड़ी देखी। वह जानती थीं कि दीनानाथ जी के पास अब कुछ ही घंटे बचे हैं। डॉक्टर आनंद ने शाम को ही राउंड पर कह दिया था कि मल्टीपल ऑर्गन फेलियर है, बस सुबह का सूरज देखना मुश्किल है।
अचानक दीनानाथ जी की उंगलियों में थोड़ी हरकत हुई। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना मास्क एक तरफ सरकाया। उनकी आवाज में एक अजीब सी घबराहट थी, “मैरी… वो… वो आ गया क्या?”
मैरी ने उनके ठंडे पड़ रहे हाथ को अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “कौन दीनानाथ जी? यमराज? अरे, अभी उनका सर्वर डाउन है, इतनी जल्दी नहीं आते वो।”
मैरी का यह व्यंग्य दीनानाथ के चेहरे पर एक सूखी सी हंसी छोड़ गया। इस हॉस्पिस केयर यानी मरणासन्न मरीजों के आखिरी घर का यही नियम था यहाँ दर्द को दवाओं से ज्यादा चुटकुलों से सुखाया जाता था। दीनानाथ जी पिछले दो महीने से यहाँ थे। उनके फेफड़े जवाब दे चुके थे, पर उनकी आँखें हर रोज दरवाजे पर टिकी रहती थीं। वह किसी का इंतजार कर रहे थे। एक ऐसा इंतजार जो इस कमरे की सफेद दीवारों से भी ज्यादा पथरीला था।
“मैरी, मेरी वसीयत… सब ठीक है न? कोर्ट का वो आदमी सुबह आएगा?” दीनानाथ ने हांफते हुए पूछा।
“हाँ बाबा, सब तैयार है। आपके वकीलों ने आपके कहे अनुसार सब कुछ कर दिया है। बस आप सुबह तक दिल थाम के बैठिए,” मैरी ने उनके माथे से पसीना पोंछते हुए कहा। उनके लहजे में एक कड़वा मजाक था, जो दीनानाथ की अमीरी पर नहीं, बल्कि उस लाचारी पर था जो करोड़ों रुपये होने के बाद भी एक-एक सांस के लिए भीख मांग रही थी।
तभी दरवाजे पर किसी के कदमों की आहट हुई। भारी बूटों की आवाज। मैरी चौंक गई। इतनी रात गए कौन आ सकता था? दरवाजा धीरे से खुला। एक लंबा, सूट-बूट पहने नौजवान अंदर दाखिल हुआ। चेहरे पर थकावट से ज्यादा एक अजीब सी जल्दबाजी थी। उसने सीधे दीनानाथ के बेड की तरफ रुख किया।
दीनानाथ की आँखों में जैसे बुझते हुए दीये की आखिरी लौ चमक उठी। उन्होंने कांपते होंठों से कहा, “अविनाश… तुम आ गए बेटा! मुझे मालूम था, तुम अपनी नौकरी, अपना लंदन का सब काम छोड़कर अपने बूढ़े बाप के आखिरी वक्त में जरूर आओगे।”
अविनाश ने अपनी महंगी घड़ी पर वक्त देखा और बिना कोई जज्बात दिखाए सीधे मैरी से मुखातिब हुआ, “सिस्टर, डॉक्टर कहाँ हैं? ये कुछ जरूरी कागजात हैं, जिन पर इनके दस्तखत चाहिए। सुबह की मेरी लंदन की फ्लाइट है, बोर्ड मीटिंग मिस नहीं कर सकता। क्या ये होश में हैं?”
कमरे का सन्नाटा जैसे और नुकीला हो गया। सिस्टर मैरी ने अविनाश को ऊपर से नीचे तक देखा। उस महंगे सूट की चमक के पीछे छुपा हुआ जो गिद्ध था, वह मैरी को साफ दिख रहा था। चिकित्सा विज्ञान ने भले ही इंसान को अमर बनाने की दवा न खोजी हो, पर ऐसे रिश्तों को जिंदा रखने का वेंटिलेटर जरूर ढूंढ लिया था।
मैरी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “हाँ सर, आपके पिता बिल्कुल होश में हैं। वो पिछले दो महीने से सिर्फ आपकी इस बोर्ड मीटिंग के लिए ही अपनी आखिरी सांसें रोककर बैठे थे। मेडिकल साइंस भी हैरान है कि जो इंसान बिना ऑक्सीजन के दो मिनट नहीं रह सकता, वो बेटे के मोह में दो महीने कैसे जी गया।”
अविनाश को इस व्यंग्य की चुभन महसूस तो हुई, पर उसके पास रीढ़ की हड्डी नहीं थी जो वो सीधा खड़ा हो पाता। उसने तुरंत अपने बैग से लीगल पेपर्स निकाले और दीनानाथ के सामने रख दिए, “डैड, प्लीज यहाँ साइन कर दीजिए। इसके बाद आपको इस दर्द से मुक्ति मिल जाएगी। डॉक्टर्स वैसे भी कह रहे हैं कि अब कोई उम्मीद नहीं है।”
दीनानाथ ने कांपते हाथों से पेन थामा। उनकी आँखों से बहता हुआ पानी उस वसीयत के सफेद कागज पर गिरा और स्याही थोड़ी सी फैल गई। उन्होंने बिना पढ़े, अपने जीवन की आखिरी ऊर्जा समेटकर उस कागज पर दस्तखत कर दिए। जैसे ही दस्तखत पूरे हुए, अविनाश ने झपट्टा मारकर वो कागज अपनी फाइल में सुरक्षित किए और एक राहत की सांस ली।
“थैंक यू डैड। अब मैं चलता हूँ। एयरपोर्ट के लिए लेट हो रहा हूँ। सिस्टर, इनका ख्याल रखिएगा,” अविनाश ने बिना मुड़े दरवाजे की तरफ कदम बढ़ा दिए। उसे अपने बाप के ठंडे होते शरीर को छूने तक का परहेज था, शायद मौत की छूत उसकी करोड़ों की डील को न लग जाए।
“अविनाश…” दीनानाथ की एक दबी हुई चीख कमरे में गूंजी। लेकिन अविनाश तब तक कॉरिडोर पार कर चुका था। उसकी परछाईं भी गायब हो चुकी थी।
कमरे में फिर वही ‘टिक-टिक’ की आवाज लौट आई। दीनानाथ की आँखें अब छत को ताक रही थीं। मॉनिटर पर चलती हुई हरी लकीरें अब धीरे-धीरे सीधी होने की तरफ बढ़ रही थीं। बीप की आवाज की रफ्तार कम हो रही थी।
सिस्टर मैरी ने चुपचाप उनके पास आकर बेडसाइड टेबल पर रखा एक लिफाफा उठाया। यह वह लिफाफा था जो दीनानाथ ने एक हफ्ते पहले मैरी को इस शर्त पर दिया था कि जब अविनाश आएगा, तब इसे खोला जाए।
“दीनानाथ जी, आपका बेटा तो चला गया। क्या मैं अब इसे खोलूं?” मैरी की आवाज में एक भारीपन था।
दीनानाथ ने बस धीरे से अपनी पलकें झुका दीं।
मैरी ने लिफाफा खोला। उसके भीतर एक और कानूनी दस्तावेज था, जिस पर भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की सील थी। जैसे ही मैरी ने उस कागज की इबारत पढ़ी, उसके हाथ कांपने लगे। उसकी आँखों से आंसू टपक कर उस कागज पर गिर पड़े।
उस कागज पर लिखा था कि दीनानाथ जी ने अपनी सारी संपत्ति, सारी फैक्ट्रियाँ और बैंक बैलेंस तीन महीने पहले ही अनाथ बच्चों के एक ट्रस्ट के नाम कर दिया था। और जो कागज अभी अविनाश दस्तखत करवा कर ले गया था, वह दरअसल संपत्ति की वसीयत नहीं थी। वह नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट था, जिसके तहत दीनानाथ जी ने मरने के बाद अपनी दोनों आँखें, लिवर और दिल उस अनाथालय के बीमार बच्चों के लिए डोनेट करने की मंजूरी दी थी। और उस एनओसी के लिए सगे वारिस के तौर पर अविनाश के गवाह वाले दस्तखत जरूरी थे, जो वो अपनी हड़बड़ी में बिना पढ़े कर गया था।
कागज के नीचे दीनानाथ के हाथ से लिखी एक छोटी सी लाइन थी: “बेटा, तुमने मुझे जीते जी कभी अपना वक्त नहीं दिया, लेकिन तुम्हारे इस अनजाने दस्तखत की वजह से आज मेरी मौत किसी और को जिंदगी दे जाएगी। मैंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सौदा कर लिया है… तुम्हारी बेरुखी के बदले, कुछ बच्चों की सांसें खरीद ली हैं।”
मैरी ने सिर उठाकर बेड की तरफ देखा। मॉनिटर की स्क्रीन पर अब एक सीधी हरी रेखा खिंच चुकी थी और एक लंबी, अंतहीन ‘बीप’ की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। दीनानाथ जी के चेहरे पर एक ऐसी शांत, तीखी और मुकम्मल मुस्कान थी, जिसने दुनिया के सबसे बड़े बाजारू रिश्ते को हमेशा-हमेशा के लिए हरा दिया था। मैरी ने रोते हुए उनके चेहरे पर सफेद चादर डाल दी, पर उस चादर के भीतर से भी वह व्यंग्य साफ चमक रहा था जो एक मरते हुए बाप ने अपनी आखिरी सांस से इस मतलबी दुनिया पर किया था।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)
श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।
सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।
पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—
“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”
चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। लोक साहित्य पर पुस्तक, चार उपन्यास एवं आठ कहानी संग्रह प्रकाशित। गुजराती, मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू, तमिल एवं पंजाबी में पुस्तकों व रचनाओं का अनुवाद। हंस, वनमाली, वागर्थ, भाषा, कथादेश, नया ज्ञानोदय, पाखी आदि कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार 2020 तथा राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान।
☆ कथा कहानी ☆ ताजपोशी☆ डॉ. हंसा दीप ☆
वह दिन उर्मि के लिए बहुत ही खास था।
सम्मान का दिन। पुरस्कृत होने का दिन। ताजपोशी का दिन।
पुरस्कार उसकी अपनी मेहनत का। पुरस्कार कलमकारी का। पुरस्कार उन अनगिनत पलों का, जिनमें डूबकर, रच-बस कर उसने लिखा था। उसे उस मंच पर जाना था, तालियों की गड़गड़ाहट के साथ। मंत्रियों और अफसरों के बीच। जीवन के सुंदरतम पलों को ले कर आएगा वह एक दिन और हमेशा के लिए माथे पर ताज की तरह सजा रहेगा।
फोटो के लिए उचित परिधान का चयन, चेहरे की झुर्रियों को खींचने वाले फेशियल-ब्लीच, ऐसे तमाम सौंदर्य प्रसाधनों से गुजरते हुए, उन प्रतीक्षित पलों को जीना था।
उसके अपने जीवन की यह महत उपलब्धि थी। अपनी मेज से सार्वजनिक मंच तक की दूरी उसने तय कर ली थी। उन पंक्तियों के सहारे, जो एकांत में जन्मी थीं। मन और कलम दोनों का तालमेल बैठाते हुए, कई-कई बार वाक्यों को तोड़ा-मरोड़ा और फिर से जोड़ा था। कभी उनसे जी भर कर प्यार किया था, तो कभी उनसे संघर्ष किया था। वे सारी कचोटती अनुभूतियाँ, जिन्हें कागज पर उतारने के लिए उसे जीते जी मरना पड़ा था, और फिर उन्हीं में पुन: जीवित भी होना पड़ा था। फिर से जीना भी उन्हीं शब्दों की ताकत थी, जिनमें उसने अपना मन उकेर कर रख दिया था।
आज वही शब्द उसकी अपनी पहचान बन चुके थे। वाहवाही और गौरव के वाहक। उसके अपने रचे शब्दों का संसार, एक लंबा सफर तय करके जैसे अपनी मंजिल को पा गया था। साहित्य जगत का यह प्रतिष्ठाजनक सम्मान हर किसी को नहीं मिलता, उसे मिला। इस साहित्यिक अलंकरण की ताजपोशी से उसका कद और भी ऊँचाइयों तक पहुँचेगा।
मगर, उर्मि सामान्य नहीं थी। भीतर की खुशी गायब थी। चेहरे पर तनाव-सा था। इसका सबसे बड़ा कारण था- उसका हमेशा से ही भीड़ से कतराना। लोगों से कन्नी काट लेना। किसी भी सभा में जाकर बोलना उसे अच्छा नहीं लगता था। अंतर्मुखी तो वह शुरू से थी ही, पर ज्यादा प्रशंसा उसे और भी नर्वस कर देती थी। समझ में नहीं आता कि इसका जवाब कैसे दिया जाए! इसीलिए वह इस सम्मान समारोह में जाने से भी बचना चाहती थी। इससे बचने का खयाल तो आया था, पूरे वेग से आया था। ठीक वैसे ही, जैसे स्वयं को ‘कमजोरों’ की प्रवक्ता मानने वाली नोबेल पुरस्कृत एल्फ़्रिड येलेनिक भी तो खुद पुरस्कार लेने नहीं गई थीं। इसलिए नहीं गई थीं क्योंकि उन्हें भीड़भाड़ वाली जगहों से भय लगता था। उन्हें भीड़ का फ़ोबिया था। टीवी एवं मीडिया से भी दूर रहती थीं।
क्यों न, वह स्वयं भी ऐसा ही कुछ करे! खयाल अच्छा था। बहुत अच्छा था। दिल को सुकून देने वाला। घर वालों से इस बात का जिक्र किया, तो सबने उसके इस निराशात्मक रवैये के लिए जी भर कर लताड़ा। तंज पर तंज करते रहे- “दिमाग तो खराब नहीं हो गया तुम्हारा!”
“तुम्हारा पुरस्कार नोबेल पुरस्कार नहीं है, न भी जाओगी तो किसी किताब में लिखा नहीं जाएगा।”
“बेहतर है कि जाकर ले लो। जिंदगी ऐसा मौका फिर न देगी।”
“बाद में पछताती रह जाओगी।”
“लोग तरसते हैं ऐसे पलों के लिए, और तुम भागना चाहती हो।”
जितनी तेजी से विचार आया था, उतनी ही तेजी से उसे बाहर का रास्ता देखना पड़ा। सच तो कहा घर वालों ने- वह नोबेल था। लोग नोबेल विजेता को यूँ भी याद रखेंगे ही। कहाँ नोबेल और कहाँ उसका पुरस्कार! दोनों में जमीन आसमान का अंतर!
बेचारी उर्मि! मरती क्या न करती! जाने के अलावा कोई चारा न था।
वह रात कुछ ऐसी थी, जैसे कत्ल की रात हो। सारी तैयारियों के बावजूद करवटें बदलती रही। तनाव और घबराहट के कारण पेट में गुड़गुड़ाहट शुरू हो गई। सोचा, कुछ खा लिया जाए, तो शायद नींद आ जाए। देर से खाना और वह भी पेट भर कर खाना, उलटा पड़ गया। फैक्ट्री चालू हो गई, यानी लूज़ मोशन्स।
एक के बाद एक, लगातार दौरे, थमने का नाम ही नहीं लेते। वापस आकर लेटने की मोहलत भी नसीब नहीं होती और फिर वही वॉशरूम की ओर भागना। देखते-देखते रात ढलकर सुबह के चार बजा गई थी। पानी का एक घूँट भी जैसे शरीर ठुकरा देता। डायरिया, अपने चरम पर था। इस समय कहीं से भी, कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं थी।
अब उसके पास पानी पीना भी बंद कर देने के अलावा कोई उपाय नहीं था। फेशियल-मसाज से जो चेहरा खिला-खिला लग रहा था, अब वह पिचक गया था। लेकिन अब उसे इन सबकी चिंता नहीं थी। चिंता थी, तो सुबह दस बजे शुरू होने वाले कार्यक्रम में टिक कर बैठने की। ऐसा न हो कि बार-बार उठकर जाना पड़ जाए।
अब पेट में न अन्न था, न पानी। सब कुछ निकल चुका था और शरीर पस्त हो चुका था। खड़े रहने की हिम्मत पुरस्कार की ताकत से मिल रही थी।
आखिर वे पल आ ही गए। उसकी मेहनत की ताजपोशी पूरे सम्मान के साथ हुई। मंच का कार्यक्रम खत्म हुआ। तालियों की गूँज के बीच, फूलों के गुलदस्ते, शील्ड और शॉल थामे वह जैसे ही मंच से उतरी, कैमरों ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। एक के बाद एक रिपोर्टर उसे घेरते चले गए। साक्षात्कार पर साक्षात्कार। हर बार वही सवाल, वही जवाब। उसका गला बैठ चुका था, पर वहाँ सारे माइक आगे बढ़ाने वाले थे। पानी देने वाला कोई नहीं था।
कैमरों की चमक का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। हालाँकि, गौर से सोचें तो इतना मुश्किल भी नहीं होना चाहिए था। फिर भी, बार-बार दोहराए जाते सवालों के वही जवाब, न जाने क्यों उसे भीतर से विचलित कर रहे थे।
अतीत में घटी हर बात कैमरे के सामने सहजता से याद नहीं आ रही थी। ऊपर से कैमरों की तीखी लाइटें और पसीने से बचाने के लिए लगे पंखों की तेज हवा। बाल इस कदर शैतान हो गए थे, जैसे उन पर फुर्री उड़ा दी गई हो। जरा सी हवा लगते ही बालों ने अनुशासनहीनता की सारी हदें पार कर दी थीं।
इसके बाद फोटोग्राफर की भीड़ ने उसे घेर लिया। अपने-अपने लिए गए फोटो थमाने के लिए। हर किसी का दावा था कि उसी के पास सबसे अच्छे फोटो हैं। बस, पैसे देने होंगे। वह आखिरी पल तक सबसे पीछा छुड़ाकर इस कदर भागी कि कोई उसे देख न पाए। तब उसे इस बात का अहसास हुआ कि बड़े स्टार, राजनैतिक हस्तियों का पत्रकारों पर गुस्सा करना कितना जायज होता है। अचानक कई सिनेमाई हस्तियों के चेहरे उसके सामने उभर आए। वही चेहरे, जो पीछे आते कैमरों को फटकारते हुए जल्दी से भीतर घुस जाते थे। आम जनता को लगता कि ये सेलिब्रिटी कितने अकड़ते हैं। किन्तु सचमुच, उनके जीवन का एक दिन जीना भी कितना मुश्किलों से भरा था।
एक ही दिन की सेलिब्रिटी जिंदगी में उसका अपना चैन कहीं खो गया था। एक दिन की ताजपोशी बहुत थी, जीवन में भी, यादों में भी। वह वहाँ से भाग जाना चाहती थी। दूर, बहुत दूर। इतनी दूर कि फिर कभी ये कैमरे उसके पीछे न आएँ, उसे कैद करने की कोशिश न करें। उसके अनचाहे गुस्से को, चिढ़ को, घबराहट को, निराशा को और न बढ़ाएँ, क्योंकि लगातार भूखे रहने से आई कमजोरी ने उसका हाल बेहाल कर दिया था।
खैर, वह दिन भी निकल गया। घर वापसी हो गई। घर लौटते ही परिवार वालों के सवाल शुरू हो गए– “बहुत खुश हो?”
“बेहद उत्साहित हो?”
“राहत महसूस कर रही हो?”
वह हर सवाल पर बस हल्के से मुस्कुराती, और शांत स्वर में हर सवाल का एक ही जवाब देती रही, “मैं इस समय कुछ भी महसूस नहीं कर रही, सिर्फ एक खालीपन है।”
वह जल्द से जल्द उन पलों से उबरना चाहती थी। अचानक आए इस भावनात्मक उतार-चढ़ाव का सामना करना उसके लिए आसान नहीं था। आने वाले कई दिन उसे एक अजीब-सी स्थिति में डाल गए। ऐसा लगता था जैसे समय आगे तो बढ़ रहा था, किन्तु भीतर कहीं कुछ ठहर-सा गया था। कई दिनों तक एक अजीब-सी रिक्तता छायी रही। ऐसी, जहाँ न शब्द थे, न भाव। वह खुद से ही कट-सी गई थी।
सबसे ज्यादा चोट उसे तब लगी, जब बरसों पुराने मित्र भी पहले की तरह बात नहीं कर रहे थे। जैसे अचानक ही इस सम्मान ने रिश्तों की डोर को ढीला कर दिया हो। उनकी आवाज में अब वह अपनापन नहीं रहा था। उनके शब्दों में घुली दूरियाँ कानों को असहनीय हो रही थी। जो हँसी, ठहाके, बेफिक्र होकर आपस में साझा होते थे, अब औपचारिक मुस्कानों तक सीमित हो गए थे। मानो इस एक उपलब्धि ने अनजाने ही मित्रों के बीच दीवार खड़ी कर दी हो।
हैरानी इस बात की थी कि अब वह कलम की ओर देखती तक नहीं थी। ऐसा लगने लगा कि बहुत हो गया लेखन।
दिमाग कह उठता- “अब क्यों?”
दिल भी साथ देता, “अब क्या लिखना, और क्यों लिखना!”
धीरे-धीरे, दिनों की खामोशी हफ्तों में, महीनों में बदल गई। लोग, कैमरे, तालियाँ सब कुछ कहीं दूर खोते गए। फिर भी, उसके भीतर का सन्नाटा अडिग था, वज्र-सा अटल। जड़वत वहीं जमा रहा। वह अपनी सामान्य जिंदगी में लौटने को व्याकुल थी, अपनी मेज, कलम, शब्द और अपनी दुनिया की ओर। लौटने का रास्ता मिलने के बजाय और भटकाव की ओर धकेल रहा था।
बेचैनी भरी एक और रात किसी लंबे रतजगे-सी करवटों में कट गई। सुबह खिड़की से छनकर आती धूप चेहरे पर पड़ी, तो अनायास उठकर वह आईने के सामने जा खड़ी हुई। खुद को इतने गौर से देखा कि थका-हारा-सा प्रतिबिंब भी बोल उठे, राख में दबी धीमी चिंगारी की तरह। बगैर पलकें झपकाए, बेचैन आँखें कुछ खोज रही थीं, ऐसे जैसे उसे पाए बगैर उन्हें बंद होना मंजूर ही न हो।
खिड़की के बाहर फेंस के छोर पर, कचरे की सड़ी हुई परतों के बीच भी जीवन ने अपनी जिद नहीं छोड़ी थी, प्रकृति, क्षय और पुनर्जन्म सब एक साथ उपस्थित थे। छोटे-छोटे नाजुक-से फूल काँपते हुए खिले थे, मानो सूरज की पहली छुअन के साथ ही अपनी पूरी उम्र जी लेना चाहते हों। एक बित्ता-सा हरा टमाटर पत्तों के बीच अपनी उपस्थिति का संकेत दे रहा था। अभी वह बड़ा होगा, धीरे-धीरे लाल मुकुट पहनेगा, किसी की थाली में सजेगा, या फिर यहीं गिरकर दोबारा उगने की कोशिश करेगा। मिट्टी से उपजा, मिट्टी में बिखरा, ताकि समय फिर से गढ़ सके।
प्रकृति के सम्मान में अनायास ही पलकें भारी होकर झुक गईं। न कोई शोर, न कोई पदचाप, शायद उसी क्षण वह अपने भीतर लौटने लगी। कलम लिखने को आतुर थी- हर ताजपोशी का एक अंत होता है।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘माया-मोह की फांस‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४० ☆
☆ लघुकथा ☆ माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
नायक जी के दुआरे पर बड़ा समूह इकट्ठा है। पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं। दरअसल नायक जी नर्मदा यात्रा पर निकल रहे हैं। करीब पंद्रह दिन नर्मदा के किनारे किनारे चलेंगे। फिर अगली बार यात्रा वहीं से उठाएंगे जहां से उसे छोड़ा था। ऐसे ही किश्तों में यात्रा होती है।
नायक जी के साथ आठ दस लोग जा रहे हैं। उनकी पत्नियां उन्हें विदा करने आयी हैं। समूह में दो बोझा ढोने वाले हैं जो बहंगी में सामान लेकर चलेंगे। बोझा मतलब राशन-पानी, खाना खाने और बनाने के बर्तन। कुछ तैयार नाश्ते का सामान भी।
भीड़ में गोपाल भी है। सामान की उठा-धराई में मदद कर रहा है।
दल का एक सदस्य गोपाल से पूछता है, ‘तुम भी चल रहे हो?’
जवाब मिलता है, ‘नहीं, अभी नहीं। अभी नर्मदा मैया की कृपा नहीं है।’
सदस्य कहता है, ‘क्यों! चलो। ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? पुन्य कमाने का मौका बार-बार नहीं मिलता।’
गोपाल जवाब देता है, ‘क्या करें! बड़ी मजबूरी है। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है। डेढ़ साल से उठने बैठने से लाचार हैं। हमीं को पूरी देखभाल करनी पड़ती है। चौबीस घंटे की ड्यूटी है। कहीं जाने की कहूं तो हाथ पकड़ कर रोने लगते हैं।
सदस्य कहता है, ‘घर में और लोग भी तो होंगे। लड़के बच्चे तो होंगे।’
गोपाल बोला, ‘सब हैं, लेकिन पिताजी हमें ही ढूंढ़ते हैं। और किसी को अपने को छूने नहीं देते।’
सदस्य बोला, ‘फालतू माया-मोह में फंसे हो। एक बार निकल पड़ो। लौट कर पाओगे कि तुम्हारे बिना भी सब ठीक-ठाक चलता है। हम तो अपना झोला उठाकर निकल पड़ते हैं। लौट कर आते हैं तो सब ठीक मिलता है। लेकिन हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे बिना नहीं चल सकती।’
गोपाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। उन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं?’
जत्था ‘नर्मदे हर’ का घोष करके रवाना हो गया और गोपाल अपने घर की तरफ चल पड़ा जहां उसके पिता नींद से जाग कर उसके लिए गुहार लगा रहे थे।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– असंभव तुलना …” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य भँवर # १११ — असंभव तुलना —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
वह समंदर पार भ्रमणार्थ एक सुन्दर देश गया। विद्वान एवं अध्ययनशील होने से यहाँ उसने अपने देश को मिला कर एक तुलनात्मक दृष्टि रख ली। यहाँ उसे घरों के दर्शन तो हुए। उसने ध्यान से मानो एक खास बात का अध्ययन कर लिया। यहाँ के तमाम घर प्रायः एक रंग के थे। उसने सोच बना ली यहाँ की संस्कृति के तहत ऐसा हो। पर उसे याद तो आया अपने देश में इस रंग को अपशकुन माना जाता है। स्वयं यह रंग देखने पर उसके मन में आता है यह तो अपशकुन है। पर उसने इस देश में सुबह से शुरु हुए शाम तक अपने इस तुलनात्मक अध्ययन का एक तरह से मन ही मन प्रायश्चित कर लिया। वास्तव में दुनिया की विचित्रता यही है। एक ही भगवान ने पूरी दुनिया बनायी है, लेकिन देशों के हिसाब से भगवान के प्रति मान्यता और आस्था एकदम अलग — अलग है।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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“माँ, इस बार प्रमोशन मिल जाए, फिर मैं चैन से जीऊँगा,” रवि ने कहा।
एक साल बाद प्रमोशन मिल गया।
“अब क्या बात है?” माँ ने पूछा।
“बस अपना घर हो जाए, फिर कोई चिंता नहीं रहेगी।”
कुछ वर्षों बाद घर भी बन गया।
माँ ने फिर पूछा, “अब तो खुश हो?”
रवि बोला, “सोच रहा हूँ, थोड़ा बड़ा घर ले लूँ।”
माँ अलमारी से उसकी बचपन की तस्वीर निकाल लाई।
“याद है, तब तुम कहते थे—बस एक साइकिल मिल जाए, फिर कुछ नहीं चाहिए।”
रवि तस्वीर को देर तक देखता रहा।
माँ ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, चीज़ें बदलती रहीं, लेकिन तुम्हारा ‘बस एक और’ कभी नहीं बदला।”
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। पुलिस तैनात हो गयी और आम जनता का रास्ता बंद कर दिया गया। हर अधिकारी मुआयना करने आया। क्या सिविल, क्या पुलिस के अधिकारी ! सब आते रहे, मुआयना करते रहे।
आखिर सीआईडी विभाग के उच्चाधिकारी ने कहा कि जिस कुर्सी पर मुख्यमंत्री को बैठना है, वह कुर्सी ठीक नहीं। इसे तुरंत बदलो। यह हमारे उच्चाधिकारियों का आदेश है।
हम वहां सारी तैयारियां कर चुके थे। अब कुर्सी में क्या खोट निकल आया?
हमने मज़ाक मज़ाक में पूछा -फिर यह भी बता दीजिये कि कौन सी कुर्सी लायें? तीन महीने वाली या पांच साल चलने वाली?
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – मौन रुदन।)
☆ चुभते तीर # १११ – कथा – मौन रुदन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
बचपन की यादों के किसी कोने में आज भी वह एक दृश्य ठहरा हुआ है- गाँव के सिवान पर लगे मेले की धूल, भपभपाती गर्मी और उस सबके बीच से गुजरती एक पुरानी, चरमराती साइकिल। उस साइकिल के पीछे कैरियर पर बंधी एक बांस की खपच्ची, जिसमें खोंसे हुए रंग-बिरंगे भोंपू, प्लास्टिक की गुड़िया, टिक-टिक करती तीतर-बटेर वाली गाड़ियां और हवा में लहराती लाल-पीली पन्नियों की फिरफिरियां। वो कोई महज खिलौने बेचने वाला नहीं था, वह सीधे अपनी पीठ पर खुशियों का पूरा का पूरा संसार लादे चला आता था। उसकी साइकिल की घंटी बजती थी, तो लगता था जैसे पूरे मोहल्ले के बच्चों के फेफड़ों में नई हवा भर गई हो। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि हम सब बड़े क्या हुए, उस साइकिल वाले की पूरी दुनिया ही कहीं खो गई। अब न वह घंटी सुनाई देती है, न मेले की उस धूल में वह जानी-पहचानी सूरत दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि वक्त की तेज रफ्तार ने उस गरीब के पैरों के पैडल ही छीन लिए हैं।
ऑनलाइन शॉपिंग वाले इस नए ज़माने में, जहाँ बस एक टच करते ही खुशियाँ पैक होकर घर के दरवाज़े पर सज जाती हैं, वहाँ उस गरीब फेरीवाले की मैली सी पोटली अब कबाड़ का ढेर लगने लगी है। वह हर सुबह उठकर अपनी साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ाता है, जी-तोड़ पैडल मारता है, पर कमबख्त वक्त का पहिया उससे बहुत आगे निकल चुका है। बाज़ार के इस चमचमाते मलबे के नीचे उसकी उम्मीदें और छोटा सा हुनर घुट-घुटकर दम तोड़ चुके हैं। लोग सच ही कहते हैं कि भूखे भजन न होय गोपाला, पर यहाँ तो पूरी ज़िंदगी ही भूख का अंतहीन भजन बन गई है। कलेजा तब फट जाता है जब सोचता हूँ कि जो शख्स दूसरों के बच्चों के होठों पर चंद रुपयों में मुस्कान बिखेरने की ज़िद में अपनी एड़ियाँ घिस देता है, उसके अपने मासूम बच्चे रात को अक्सर भूखे पेट, रोते हुए सो जाते हैं। उसकी उस फटी कमीज़ के मैल और पसीने की गंध में ईमानदारी की आख़िरी गवाही बची है, जिसे यह बेरहम दुनिया देखना ही नहीं चाहती।
मेले का मतलब कभी होता था रिश्तों का मिलना, खुशियों का सांझा होना, लेकिन अब मेले भी कॉर्पोरेट हो गए हैं। बड़े-बड़े पंडाल, टिकट वाले झूले और वीआईपी पास के बीच उस साइकिल वाले को गेट के बाहर ही खदेड़ दिया जाता है। ‘भाग यहाँ से, रास्ता मत रोक’ ये दुरदुराने वाले शब्द जब कोई रसूखदार सुरक्षाकर्मी या पुलिसवाला उसे डपटकर बोलता है, तो सिर्फ उसकी साइकिल पीछे नहीं हटती, बल्कि उसका आत्मसम्मान भीतर तक लहूलुहान हो जाता है। वह अपनी ढीली पड़ चुकी चप्पल को घसीटता हुआ, सिर झुकाए किसी पेड़ की छाँव में जा खड़ा होता है। उसकी वह लाचारी, उसका वह मौन विलाप देखकर आसमान का कलेजा भी कांप उठता होगा। उसने कभी किसी से भीख नहीं मांगी, उसने कभी हराम की कमाई नहीं चाही, उसने तो बस अपने पसीने की बूंदों से खिलौने सींचे थे, पर इस बेरहम दुनिया ने उसे उसकी ईमानदारी का यही सिला दिया।
अब तो ऐसा लगता है कि वह सिर्फ एक खिलौने बेचने वाला नहीं, बल्कि हमारी गुज़र चुकी मासूमियत का आखिरी कफ़न है जो धीरे-धीरे मैला हो रहा है। हम जितने आधुनिक हो रहे हैं, उतने ही कसाई होते जा रहे हैं। हमें तरस आता है भूखे जानवरों पर, हम सोशल मीडिया पर संवेदनाओं के समंदर बहा देते हैं, पर सामने खड़े उस जीते-जागते मरते हुए इंसान की सिसकी हमारे कानों तक नहीं पहुँचती। उसकी साइकिल का वह जर्जर ढांचा, जिसका हैंडल अब मुड़ चुका है और जिसकी गद्दी फटकर रुई उगल रही है, ठीक उसकी ज़िंदगी का आईना है। वह हर रोज़ सुबह एक नई जंग के लिए निकलता है, यह जानते हुए भी कि इस बाज़ार में उसकी हार पहले से ही तय है।
अब तो गलियों में उसकी आवाज़ भी जैसे घुटकर रह गई है। पहले उसकी एक हाक पर पूरा मोहल्ला जीवंत हो उठता था, ‘ले लो बाबू, उड़ने वाली चिड़िया, टिक-टिक घोड़ा!’ अब उसकी वह आवाज़ कलाई घड़ियों के अलार्म और मोबाइल की रील्स के शोर में कहीं दफ़न हो गई है। लोग अपने घरों के ऊंचे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं ताकि बाहर की धूल और वह दरिद्रता भीतर न आ सके। वह बंद दरवाजों को देखता है, अपनी सूखी जीभ से होठों को चाटता है और बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाता है। उसकी पीठ झुक गई है, बाल समय से पहले सफेद हो गए हैं और हाथों की नसें इस तरह उभर आई हैं जैसे कोई सूखा हुआ दरख्त हो। वह एक जीता-जागता भूत बन चुका है, जो इस इंसानों की बस्ती में अपनी खोई हुई ज़िंदगी ढूंढ रहा है।
आखिर में जब वह इतिहास के पन्नों से पूरी तरह गायब हो जाएगा, तब शायद हम उसकी तस्वीरें देखकर कहेंगे कि ‘हाँ, एक दौर ऐसा भी था’। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। हमने अपनी तरक्की की वेदी पर एक बेहद मासूम और ईमानदार वजूद की बलि चढ़ा दी होगी। जब भी कभी किसी पुरानी अलमारी से वह धूल खाती हुई प्लास्टिक की फिरफिरी मिले, तो ठहरकर सोचना जरूर कि इसे बेचने वाले के घर में उस दिन दीया जला था या नहीं। वह साइकिल वाला कोई कहानी का पात्र नहीं है, वह हमारी आँखों के सामने तड़प-तड़प कर दम तोड़ती हुई एक संस्कृति है, जिसकी मौत पर न कोई मातम मनेगा, न कोई आंसू बहाएगा। बस, हवा में उसकी साइकिल की वह आखिरी घंटी कहीं गूंजकर हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी और हम अपनी सजी-धजी दुनिया में मगन रहेंगे, यह भूलकर कि किसी का पूरा वजूद हमारी बेरुखी की भेंट चढ़ गया।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)