(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
रीमा को विदेश की प्रतिष्ठित कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला। यह उसके वर्षों के परिश्रम का सपना था। लेकिन उसी समय उसके पिता की तबीयत बिगड़ गई। माँ की आँखों में चिंता थी और पिता के चेहरे पर मुस्कान, जो मानो कह रही थी-“तुम जाओ, हम संभाल लेंगे।”
रीमा का मन भावनाओं और वास्तविकता के बीच झूलता रहा। एक ओर अपने सपनों का भविष्य था, दूसरी ओर अपनों का वर्तमान।
उसने कुछ दिन रुकने का निर्णय लिया। पिता का इलाज करवाया और परिवार को संभाला। कुछ महीनों बाद उसने फिर आवेदन किया। इस बार उसे पहले से बेहतर अवसर मिला।
नियुक्ति-पत्र हाथ में लेकर जब वह पिता के कमरे में पहुँची, तो उन्होंने बस उसका हाथ थाम लिया। दोनों की आँखों में न कोई शिकायत थी, न कोई सफाई-सिर्फ़ एक गहरा सुकून था, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।
खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। रीमा ने चुपचाप वह पत्र मेज़ पर रखा और पिता के कंधे पर सिर टिका दिया।
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा मेरा परिवार।
लघुकथा – मेरा परिवारसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
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अध्यापिका ने बच्चों से कहा- “ चलो बच्चों आज आप सभी अपने परिवार की जानकारी देंगे. आप सभी बताएंगे आपके परिवार में कितने सदस्य हैं और कौन-कौन हैं… “ पहले बच्चे ने बड़े उत्साह से कहा – “मेरे परिवार में चार सदस्य हैं. पापा, मम्मी, मैं और मेरी बहन.” दूसरे ने कहा – “मेरी फैमिली में तीन स दस्य हैं. मैं और मेरे पापा मम्मी .” यह गिनती 15 तक इसी तरह चलती गई. उसके पश्चात रोहन का नंबर आया वह बोला- “अध्यापक जी, मेरे परिवार में कुल 11 सदस्य हैं. “क्लास के सभी बच्चे हंसने लगे. अध्यापक ने भी हैरानी से पूछा- “11 सदस्य हैं… कौन-कौन हैं…? रोहन बड़े उत्साह से बोल उठा-“ मेरे दादा दादी, पापा मम्मी, मैं और मेरी छोटी बहन, बड़े पापा, बड़ी मम्मी , उनका बेटा और बेटी. दादी कहती है हम सबके साथ भगवान भी रहते हैं वह दिखाई नहीं पड़ते लेकिन वह हमारे घर में सबसे बड़े सदस्य के रूप में हमें मार्गदर्शन करते रहते हैं . इस तरह हमारे घर में कुल 11 लोग हैं…” सभी बच्चे हैरानी से उसे देखकर हंसने लगे . एक बच्चा बोला- “लेकिन यह भगवान और दादा-दादी इनको तो मैंने कभी देखा ही नहीं. दूसरा बोला- “हां मैंने भी उनका नाम तो सुना है लेकिन देखा नहीं…” कक्षा के कुछ और बच्चों की भी यही प्रतिक्रिया थी. अध्यापिका के चेहरे पर गहरे तनाव की रेखाएं स्पष्ट नजर आने लगी थी. उसने भी तो लगभग इसी उम्र के अपने बेटे को अभी तक दादा दादी से नहीं मिलाया था न उनके बारे में कुछ बताया था.
🌷लघुकथा ☘️ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य 🌺
आज सुबह सैर के लिए निकला तो देखा कि एक अख़बार का हॉकर रामचरितमानस की चौपाइयाँ गुनगुनाते हुए बड़ी तन्मयता से अख़बार बाँट रहा था। भोर की ताज़ी हवा में तुलसीदास की वाणी का वह मधुर स्वर कुछ ऐसा घुला कि कदम अनायास ही ठिठक गए।
मैंने मुस्कराकर कहा, “भाई, यह तो बहुत सुंदर बात है। सुबह-सुबह प्रभु का स्मरण भी हो रहा है और पूरी लगन से अपना काम भी।”
बातों-बातों में उसने बताया कि वह कभी फ्रीस्टाइल रेसलिंग करता था। स्वस्थ रहने के लिए आज भी रोज़ सुबह अख़बार बाँटता है और दिन में अपना दूसरा काम करता है। फिर उसने मेरी ओर देखा। मेरे सफ़ेद होते बालों और उम्र का सम्मान करते हुए बोला, “सर, आप इस उम्र में भी बिल्कुल फिट हैं!”
मन ही मन मैंने उस युवक को आशीर्वाद दिया।
थोड़ा आगे बढ़ा तो पार्क के बाहर एक फिटनेस ट्रेनर मिल गया। मुझे दूर से आते देखकर बोला, “आपको देखकर ही अच्छा लग जाता है। आपने अपने आपको बहुत अच्छी तरह मेंटेन रखा है।”
अभी इस प्रशस्ति का सुख पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर पाया था कि पार्क के भीतर एक योग प्रशिक्षक ने भी लगभग वही बात दोहरा दी—“आप हमेशा प्रसन्न रहते हैं, और इस उम्र में भी एकदम फिट हैं।”
बस, फिर क्या था! पंद्रह मिनट के भीतर तीन-तीन फिटनेस सर्टिफिकेट मिल चुके थे। मन मयूर-सा नाच उठा। प्रसन्नचित्त, हल्के कदमों और कुछ अधिक ही सीधी कमर के साथ घर लौटा।
घर पहुँचते ही यथार्थ ने बड़ी आत्मीयता से मेरा स्वागत किया।
स्वर गूँजा—“पार्क में ठीक से वॉक क्यों नहीं करते? बार-बार झूले पर जाकर बैठ जाते हो। नियमित योग भी नहीं करते। तोंद निकलने लगी है, कंधे भी झुकने लगे हैं। थोड़ा फिटनेस पर ध्यान दो। ट्रैकिंग पर भी चलना है!”
मैंने बिना किसी प्रतिवाद के सब कुछ शांत भाव से सुना।
आख़िर बाहर की दुनिया हमें उत्साह देती है, और घर की दुनिया हमें वास्तविकता से जोड़े रखती है।
ऐसे अवसरों पर मैं स्थितप्रज्ञ हो जाना ही श्रेयस्कर समझता हूँ।☺️
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
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(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆
🌻लघुकथा🌻 सिलाई मशीन 🌻
पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।
नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।
सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कहानीकार की अंतश्चेतना…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ११२ — कहानीकार की अंतश्चेतना —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
कहानियाँ पढ़ने के अंतर्गत प्रायः ऐसा मान लिया जाता है उन कहानियों में कहानीकार के जीवन की छाप होती हो। इसी से मिलती जुलती एक छोटी सी कहानी मेरी ओर से। कहानीकार ने अपने कहानी संग्रह की अंतिम कहानी लिखी। पर उसकी अंतश्चेतना खुशी से दीप्त न हो पायी। उसकी सोच में आ रहा था इस संग्रह की सारी कहानियाँ पाठकों के यहाँ दुख ले कर जाने वाली हैं। सचमुच, सभी कहानियों में निराशा थी, उत्पीड़न थे, आँसू थे। स्वयं लेखक ने जिस लड़की को चाह कर प्रेम से घर बसाया था उसने उसे भी दुख की कलम से कुरेदा था। उसने अपनी अंतश्चेतना में एक अजीब सा उद्वेलन महसूस किया और बैठ कर पत्नी से प्रेमपूर्वक बातें करने लगा। यह उसका एक प्रायश्चित था। थोड़ी देर पहले कहानी संग्रह की अंतिम कहानी लिखने के लिए बैठते वक्त उसने अपनी पत्नी से लड़ कर उसे बहुत रुलाया था
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “बचपन”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
मेरे छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था । इसलिए ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर आया । घर के अंदर खूब रौनक और, खुशी के माहौल । बाहर क्या देखता हूं हमारी कामवाली का छोटा सा बेटा बर्तन मांज रहा है और रोते रोते मां से कह रहा है – मुझे भी केक दिलवाओ। मुझे भी जन्मदिन मनाने है ।
मां बेबस । झांक रही अपने अंदर । मैं सोच रहा हूं कि जन्मदिन किसका मनाऊं ?
☆ लघुकथा ☆ ~ अंधकार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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बच्चे ने सूरज की किरणों को मुट्ठी में बाँध लिया। सूरज का असमंजस यह था कि उसे धरती पर नया सवेरा लाना था, जो कि उसकी किरणों के बिना संभव नहीं था। धरती लोक के लोगों की चाहत यह थी कि उन्हें हर एक ईश्वर प्रदत्त चीज को अपने बस में करना था, सो उन्होंने बच्चे को इस काम के लिए भेजा। इधर बच्चे की माँ दहाड़े मार कर इसलिए रो रही थी, क्योंकि घने अंधकार मे उसे अपना बच्चा ढूंढे नहीं मिल रहा था।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें।)
☆ चुभते तीर # १११ – कथा कहानी – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
कमरे का तापमान ठीक सोलह डिग्री पर लॉक था। इस कमरे में न धूप आती थी, न हवा, बस एक सफेद सी रोशनी थी जो चौबीसों घंटे जागती रहती थी ताकि मौत को आने में कोई गलतफहमी न हो। बेड नंबर चार पर लेटे सत्तर साल के दीनानाथ जी के मुंह पर लगे ऑक्सीजन मास्क पर हर तीन सेकेंड बाद भाप जमती और पिघल जाती। यही उनके जिंदा होने का इकलौता सबूत था, जिसे देखकर बगल की कुर्सी पर बैठी नर्स सिस्टर मैरी अपनी डायरी में कुछ नोट कर रही थीं।
रात के ठीक दो बज रहे थे। यह वह वक्त होता है जब अस्पताल के गलियारों में सन्नाटा इतना गहरा हो जाता है कि ग्लूकोज की टपकती बूंदों की आवाज भी किसी टाइम बम के टिक-टिक जैसी सुनाई देती है। सिस्टर मैरी ने अपनी घड़ी देखी। वह जानती थीं कि दीनानाथ जी के पास अब कुछ ही घंटे बचे हैं। डॉक्टर आनंद ने शाम को ही राउंड पर कह दिया था कि मल्टीपल ऑर्गन फेलियर है, बस सुबह का सूरज देखना मुश्किल है।
अचानक दीनानाथ जी की उंगलियों में थोड़ी हरकत हुई। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना मास्क एक तरफ सरकाया। उनकी आवाज में एक अजीब सी घबराहट थी, “मैरी… वो… वो आ गया क्या?”
मैरी ने उनके ठंडे पड़ रहे हाथ को अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “कौन दीनानाथ जी? यमराज? अरे, अभी उनका सर्वर डाउन है, इतनी जल्दी नहीं आते वो।”
मैरी का यह व्यंग्य दीनानाथ के चेहरे पर एक सूखी सी हंसी छोड़ गया। इस हॉस्पिस केयर यानी मरणासन्न मरीजों के आखिरी घर का यही नियम था यहाँ दर्द को दवाओं से ज्यादा चुटकुलों से सुखाया जाता था। दीनानाथ जी पिछले दो महीने से यहाँ थे। उनके फेफड़े जवाब दे चुके थे, पर उनकी आँखें हर रोज दरवाजे पर टिकी रहती थीं। वह किसी का इंतजार कर रहे थे। एक ऐसा इंतजार जो इस कमरे की सफेद दीवारों से भी ज्यादा पथरीला था।
“मैरी, मेरी वसीयत… सब ठीक है न? कोर्ट का वो आदमी सुबह आएगा?” दीनानाथ ने हांफते हुए पूछा।
“हाँ बाबा, सब तैयार है। आपके वकीलों ने आपके कहे अनुसार सब कुछ कर दिया है। बस आप सुबह तक दिल थाम के बैठिए,” मैरी ने उनके माथे से पसीना पोंछते हुए कहा। उनके लहजे में एक कड़वा मजाक था, जो दीनानाथ की अमीरी पर नहीं, बल्कि उस लाचारी पर था जो करोड़ों रुपये होने के बाद भी एक-एक सांस के लिए भीख मांग रही थी।
तभी दरवाजे पर किसी के कदमों की आहट हुई। भारी बूटों की आवाज। मैरी चौंक गई। इतनी रात गए कौन आ सकता था? दरवाजा धीरे से खुला। एक लंबा, सूट-बूट पहने नौजवान अंदर दाखिल हुआ। चेहरे पर थकावट से ज्यादा एक अजीब सी जल्दबाजी थी। उसने सीधे दीनानाथ के बेड की तरफ रुख किया।
दीनानाथ की आँखों में जैसे बुझते हुए दीये की आखिरी लौ चमक उठी। उन्होंने कांपते होंठों से कहा, “अविनाश… तुम आ गए बेटा! मुझे मालूम था, तुम अपनी नौकरी, अपना लंदन का सब काम छोड़कर अपने बूढ़े बाप के आखिरी वक्त में जरूर आओगे।”
अविनाश ने अपनी महंगी घड़ी पर वक्त देखा और बिना कोई जज्बात दिखाए सीधे मैरी से मुखातिब हुआ, “सिस्टर, डॉक्टर कहाँ हैं? ये कुछ जरूरी कागजात हैं, जिन पर इनके दस्तखत चाहिए। सुबह की मेरी लंदन की फ्लाइट है, बोर्ड मीटिंग मिस नहीं कर सकता। क्या ये होश में हैं?”
कमरे का सन्नाटा जैसे और नुकीला हो गया। सिस्टर मैरी ने अविनाश को ऊपर से नीचे तक देखा। उस महंगे सूट की चमक के पीछे छुपा हुआ जो गिद्ध था, वह मैरी को साफ दिख रहा था। चिकित्सा विज्ञान ने भले ही इंसान को अमर बनाने की दवा न खोजी हो, पर ऐसे रिश्तों को जिंदा रखने का वेंटिलेटर जरूर ढूंढ लिया था।
मैरी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “हाँ सर, आपके पिता बिल्कुल होश में हैं। वो पिछले दो महीने से सिर्फ आपकी इस बोर्ड मीटिंग के लिए ही अपनी आखिरी सांसें रोककर बैठे थे। मेडिकल साइंस भी हैरान है कि जो इंसान बिना ऑक्सीजन के दो मिनट नहीं रह सकता, वो बेटे के मोह में दो महीने कैसे जी गया।”
अविनाश को इस व्यंग्य की चुभन महसूस तो हुई, पर उसके पास रीढ़ की हड्डी नहीं थी जो वो सीधा खड़ा हो पाता। उसने तुरंत अपने बैग से लीगल पेपर्स निकाले और दीनानाथ के सामने रख दिए, “डैड, प्लीज यहाँ साइन कर दीजिए। इसके बाद आपको इस दर्द से मुक्ति मिल जाएगी। डॉक्टर्स वैसे भी कह रहे हैं कि अब कोई उम्मीद नहीं है।”
दीनानाथ ने कांपते हाथों से पेन थामा। उनकी आँखों से बहता हुआ पानी उस वसीयत के सफेद कागज पर गिरा और स्याही थोड़ी सी फैल गई। उन्होंने बिना पढ़े, अपने जीवन की आखिरी ऊर्जा समेटकर उस कागज पर दस्तखत कर दिए। जैसे ही दस्तखत पूरे हुए, अविनाश ने झपट्टा मारकर वो कागज अपनी फाइल में सुरक्षित किए और एक राहत की सांस ली।
“थैंक यू डैड। अब मैं चलता हूँ। एयरपोर्ट के लिए लेट हो रहा हूँ। सिस्टर, इनका ख्याल रखिएगा,” अविनाश ने बिना मुड़े दरवाजे की तरफ कदम बढ़ा दिए। उसे अपने बाप के ठंडे होते शरीर को छूने तक का परहेज था, शायद मौत की छूत उसकी करोड़ों की डील को न लग जाए।
“अविनाश…” दीनानाथ की एक दबी हुई चीख कमरे में गूंजी। लेकिन अविनाश तब तक कॉरिडोर पार कर चुका था। उसकी परछाईं भी गायब हो चुकी थी।
कमरे में फिर वही ‘टिक-टिक’ की आवाज लौट आई। दीनानाथ की आँखें अब छत को ताक रही थीं। मॉनिटर पर चलती हुई हरी लकीरें अब धीरे-धीरे सीधी होने की तरफ बढ़ रही थीं। बीप की आवाज की रफ्तार कम हो रही थी।
सिस्टर मैरी ने चुपचाप उनके पास आकर बेडसाइड टेबल पर रखा एक लिफाफा उठाया। यह वह लिफाफा था जो दीनानाथ ने एक हफ्ते पहले मैरी को इस शर्त पर दिया था कि जब अविनाश आएगा, तब इसे खोला जाए।
“दीनानाथ जी, आपका बेटा तो चला गया। क्या मैं अब इसे खोलूं?” मैरी की आवाज में एक भारीपन था।
दीनानाथ ने बस धीरे से अपनी पलकें झुका दीं।
मैरी ने लिफाफा खोला। उसके भीतर एक और कानूनी दस्तावेज था, जिस पर भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की सील थी। जैसे ही मैरी ने उस कागज की इबारत पढ़ी, उसके हाथ कांपने लगे। उसकी आँखों से आंसू टपक कर उस कागज पर गिर पड़े।
उस कागज पर लिखा था कि दीनानाथ जी ने अपनी सारी संपत्ति, सारी फैक्ट्रियाँ और बैंक बैलेंस तीन महीने पहले ही अनाथ बच्चों के एक ट्रस्ट के नाम कर दिया था। और जो कागज अभी अविनाश दस्तखत करवा कर ले गया था, वह दरअसल संपत्ति की वसीयत नहीं थी। वह नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट था, जिसके तहत दीनानाथ जी ने मरने के बाद अपनी दोनों आँखें, लिवर और दिल उस अनाथालय के बीमार बच्चों के लिए डोनेट करने की मंजूरी दी थी। और उस एनओसी के लिए सगे वारिस के तौर पर अविनाश के गवाह वाले दस्तखत जरूरी थे, जो वो अपनी हड़बड़ी में बिना पढ़े कर गया था।
कागज के नीचे दीनानाथ के हाथ से लिखी एक छोटी सी लाइन थी: “बेटा, तुमने मुझे जीते जी कभी अपना वक्त नहीं दिया, लेकिन तुम्हारे इस अनजाने दस्तखत की वजह से आज मेरी मौत किसी और को जिंदगी दे जाएगी। मैंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सौदा कर लिया है… तुम्हारी बेरुखी के बदले, कुछ बच्चों की सांसें खरीद ली हैं।”
मैरी ने सिर उठाकर बेड की तरफ देखा। मॉनिटर की स्क्रीन पर अब एक सीधी हरी रेखा खिंच चुकी थी और एक लंबी, अंतहीन ‘बीप’ की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। दीनानाथ जी के चेहरे पर एक ऐसी शांत, तीखी और मुकम्मल मुस्कान थी, जिसने दुनिया के सबसे बड़े बाजारू रिश्ते को हमेशा-हमेशा के लिए हरा दिया था। मैरी ने रोते हुए उनके चेहरे पर सफेद चादर डाल दी, पर उस चादर के भीतर से भी वह व्यंग्य साफ चमक रहा था जो एक मरते हुए बाप ने अपनी आखिरी सांस से इस मतलबी दुनिया पर किया था।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)