हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, इस बार प्रमोशन मिल जाए, फिर मैं चैन से जीऊँगा,” रवि ने कहा।

एक साल बाद प्रमोशन मिल गया।

“अब क्या बात है?” माँ ने पूछा।

“बस अपना घर हो जाए, फिर कोई चिंता नहीं रहेगी।”

कुछ वर्षों बाद घर भी बन गया।

माँ ने फिर पूछा, “अब तो खुश हो?”

रवि बोला, “सोच रहा हूँ, थोड़ा बड़ा घर ले लूँ।”

माँ अलमारी से उसकी बचपन की तस्वीर निकाल लाई।

“याद है, तब तुम कहते थे—बस एक साइकिल मिल जाए, फिर कुछ नहीं चाहिए।”

रवि तस्वीर को देर तक देखता रहा।

माँ ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, चीज़ें बदलती रहीं, लेकिन तुम्हारा ‘बस एक और’ कभी नहीं बदला।”

रवि के पास कोई उत्तर नहीं था।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कुर्सी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। पुलिस तैनात हो गयी और आम जनता का रास्ता बंद कर‌ दिया गया। हर अधिकारी मुआयना करने आया। क्या सिविल, क्या पुलिस के अधिकारी ! सब आते रहे, मुआयना करते रहे।

आखिर सीआईडी विभाग के उच्चाधिकारी ने कहा कि जिस कुर्सी पर मुख्यमंत्री को बैठना है, वह कुर्सी ठीक नहीं। इसे तुरंत बदलो। यह हमारे उच्चाधिकारियों का आदेश है।

हम वहां सारी तैयारियां कर चुके थे। अब कुर्सी में क्या खोट निकल आया?

हमने मज़ाक मज़ाक में पूछा -फिर यह भी बता दीजिये कि कौन सी कुर्सी लायें? तीन महीने वाली या पांच साल चलने वाली?

अधिकारी हमारा मुह देखते रह गये!!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # १११ – मौन रुदन – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – मौन रुदन।)  

☆  चुभते तीर # १११ – कथा – मौन रुदन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बचपन की यादों के किसी कोने में आज भी वह एक दृश्य ठहरा हुआ है- गाँव के सिवान पर लगे मेले की धूल, भपभपाती गर्मी और उस सबके बीच से गुजरती एक पुरानी, चरमराती साइकिल। उस साइकिल के पीछे कैरियर पर बंधी एक बांस की खपच्ची, जिसमें खोंसे हुए रंग-बिरंगे भोंपू, प्लास्टिक की गुड़िया, टिक-टिक करती तीतर-बटेर वाली गाड़ियां और हवा में लहराती लाल-पीली पन्नियों की फिरफिरियां। वो कोई महज खिलौने बेचने वाला नहीं था, वह सीधे अपनी पीठ पर खुशियों का पूरा का पूरा संसार लादे चला आता था। उसकी साइकिल की घंटी बजती थी, तो लगता था जैसे पूरे मोहल्ले के बच्चों के फेफड़ों में नई हवा भर गई हो। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि हम सब बड़े क्या हुए, उस साइकिल वाले की पूरी दुनिया ही कहीं खो गई। अब न वह घंटी सुनाई देती है, न मेले की उस धूल में वह जानी-पहचानी सूरत दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि वक्त की तेज रफ्तार ने उस गरीब के पैरों के पैडल ही छीन लिए हैं।

ऑनलाइन शॉपिंग वाले इस नए ज़माने में, जहाँ बस एक टच करते ही खुशियाँ पैक होकर घर के दरवाज़े पर सज जाती हैं, वहाँ उस गरीब फेरीवाले की मैली सी पोटली अब कबाड़ का ढेर लगने लगी है। वह हर सुबह उठकर अपनी साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ाता है, जी-तोड़ पैडल मारता है, पर कमबख्त वक्त का पहिया उससे बहुत आगे निकल चुका है। बाज़ार के इस चमचमाते मलबे के नीचे उसकी उम्मीदें और छोटा सा हुनर घुट-घुटकर दम तोड़ चुके हैं। लोग सच ही कहते हैं कि भूखे भजन न होय गोपाला, पर यहाँ तो पूरी ज़िंदगी ही भूख का अंतहीन भजन बन गई है। कलेजा तब फट जाता है जब सोचता हूँ कि जो शख्स दूसरों के बच्चों के होठों पर चंद रुपयों में मुस्कान बिखेरने की ज़िद में अपनी एड़ियाँ घिस देता है, उसके अपने मासूम बच्चे रात को अक्सर भूखे पेट, रोते हुए सो जाते हैं। उसकी उस फटी कमीज़ के मैल और पसीने की गंध में ईमानदारी की आख़िरी गवाही बची है, जिसे यह बेरहम दुनिया देखना ही नहीं चाहती।

मेले का मतलब कभी होता था रिश्तों का मिलना, खुशियों का सांझा होना, लेकिन अब मेले भी कॉर्पोरेट हो गए हैं। बड़े-बड़े पंडाल, टिकट वाले झूले और वीआईपी पास के बीच उस साइकिल वाले को गेट के बाहर ही खदेड़ दिया जाता है। ‘भाग यहाँ से, रास्ता मत रोक’ ये दुरदुराने वाले शब्द जब कोई रसूखदार सुरक्षाकर्मी या पुलिसवाला उसे डपटकर बोलता है, तो सिर्फ उसकी साइकिल पीछे नहीं हटती, बल्कि उसका आत्मसम्मान भीतर तक लहूलुहान हो जाता है। वह अपनी ढीली पड़ चुकी चप्पल को घसीटता हुआ, सिर झुकाए किसी पेड़ की छाँव में जा खड़ा होता है। उसकी वह लाचारी, उसका वह मौन विलाप देखकर आसमान का कलेजा भी कांप उठता होगा। उसने कभी किसी से भीख नहीं मांगी, उसने कभी हराम की कमाई नहीं चाही, उसने तो बस अपने पसीने की बूंदों से खिलौने सींचे थे, पर इस बेरहम दुनिया ने उसे उसकी ईमानदारी का यही सिला दिया।

अब तो ऐसा लगता है कि वह सिर्फ एक खिलौने बेचने वाला नहीं, बल्कि हमारी गुज़र चुकी मासूमियत का आखिरी कफ़न है जो धीरे-धीरे मैला हो रहा है। हम जितने आधुनिक हो रहे हैं, उतने ही कसाई होते जा रहे हैं। हमें तरस आता है भूखे जानवरों पर, हम सोशल मीडिया पर संवेदनाओं के समंदर बहा देते हैं, पर सामने खड़े उस जीते-जागते मरते हुए इंसान की सिसकी हमारे कानों तक नहीं पहुँचती। उसकी साइकिल का वह जर्जर ढांचा, जिसका हैंडल अब मुड़ चुका है और जिसकी गद्दी फटकर रुई उगल रही है, ठीक उसकी ज़िंदगी का आईना है। वह हर रोज़ सुबह एक नई जंग के लिए निकलता है, यह जानते हुए भी कि इस बाज़ार में उसकी हार पहले से ही तय है।

अब तो गलियों में उसकी आवाज़ भी जैसे घुटकर रह गई है। पहले उसकी एक हाक पर पूरा मोहल्ला जीवंत हो उठता था, ‘ले लो बाबू, उड़ने वाली चिड़िया, टिक-टिक घोड़ा!’ अब उसकी वह आवाज़ कलाई घड़ियों के अलार्म और मोबाइल की रील्स के शोर में कहीं दफ़न हो गई है। लोग अपने घरों के ऊंचे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं ताकि बाहर की धूल और वह दरिद्रता भीतर न आ सके। वह बंद दरवाजों को देखता है, अपनी सूखी जीभ से होठों को चाटता है और बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाता है। उसकी पीठ झुक गई है, बाल समय से पहले सफेद हो गए हैं और हाथों की नसें इस तरह उभर आई हैं जैसे कोई सूखा हुआ दरख्त हो। वह एक जीता-जागता भूत बन चुका है, जो इस इंसानों की बस्ती में अपनी खोई हुई ज़िंदगी ढूंढ रहा है।

आखिर में जब वह इतिहास के पन्नों से पूरी तरह गायब हो जाएगा, तब शायद हम उसकी तस्वीरें देखकर कहेंगे कि ‘हाँ, एक दौर ऐसा भी था’। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। हमने अपनी तरक्की की वेदी पर एक बेहद मासूम और ईमानदार वजूद की बलि चढ़ा दी होगी। जब भी कभी किसी पुरानी अलमारी से वह धूल खाती हुई प्लास्टिक की फिरफिरी मिले, तो ठहरकर सोचना जरूर कि इसे बेचने वाले के घर में उस दिन दीया जला था या नहीं। वह साइकिल वाला कोई कहानी का पात्र नहीं है, वह हमारी आँखों के सामने तड़प-तड़प कर दम तोड़ती हुई एक संस्कृति है, जिसकी मौत पर न कोई मातम मनेगा, न कोई आंसू बहाएगा। बस, हवा में उसकी साइकिल की वह आखिरी घंटी कहीं गूंजकर हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी और हम अपनी सजी-धजी दुनिया में मगन रहेंगे, यह भूलकर कि किसी का पूरा वजूद हमारी बेरुखी की भेंट चढ़ गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – प्रतिबिंब… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ प्रतिबिंब… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कामवाली बाई पोंछा लगा रही थी। तभी आम के वृक्ष से अलग हुई एक पीली सूखी पत्ती खिड़की की राह कमरे में चली आई।

बाई ने उसे सोफे पर रख दिया।

मैं हैरान! कि क्या सोचकर उसने उस पीतवर्णा पत्ती को सोफे पर रखा होगा !

चाहती तो खिड़की के बाहर फेंक सकती थी, पर नहीं फेंका।

बड़ी देर तक मैं खुद से ही उलझती रही। पत्ती को हाथ में लिया। उसे उलट पलट कर देखती रही।

शायद मैं उसमें जीवन की नश्वरता तथा अपनी सोच का प्रतिबिंब देख रही थी। उसमें सारे मौसमों के अनुराग और आघात की धुन सुन रही थी।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # ११० – व्हिस्की के गिलास में रामराज्य – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  आपकी एक विचारणीय कथा – व्हिस्की के गिलास में रामराज्य।)  

☆  चुभते तीर # ११० – कथा कहानी – व्हिस्की के गिलास में रामराज्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

धुंधली बत्ती और मच्छर भगाने वाली कॉइल के धुएं के बीच वह बैठ कर फाइलें देख रहा था। सरकारी दफ्तर की घिसी हुई कुर्सी पर बैठे-बैठे उसकी पीठ अकड़ चुकी थी। नाम था उसका अविनाश। पद था सीनियर क्लर्क, लेकिन काम था एक अदद रीढ़ विहीन बंधुआ मजदूर का। बाहर तेज बारिश हो रही थी। पूरा शहर पानी में डूब रहा था। झुग्गियों में पानी घुस चुका था। लोग छतों पर भूखे-प्यासे बैठे थे। कंट्रोल रूम के फोन लगातार बज रहे थे और अविनाश हर फोन पर एक ही रटा-रटाया वाक्य बोल रहा था, राहत सामग्री भेजी जा रही है, धैर्य रखें।

तभी उसकी जेब में रखा पुराना फोन थरथराया। स्क्रीन पर चमका, विधायक जी।

अविनाश ने हड़बड़ाकर फोन उठाया। दूसरी तरफ से भारी और रोबीली आवाज आई, सुनो अविनाश, जरा कोठी पर आओ। कुछ जरूरी कागज साइन करने हैं। और हां, वो बाढ़ राहत वाली फाइल भी लेते आना।

अविनाश ने बाहर देखा। घुटनों तक पानी था। कोई साधन नहीं था। लेकिन हुक्म तो हुक्म था। उसने प्लास्टिक की थैली में फाइल को लपेटा, अपनी फटी हुई चप्पल संभाली और पैदल ही निकल पड़ा। भूख से उसके पेट में मरोड़ उठ रही थी। उसकी अपनी बस्ती भी डूबने की कगार पर थी। उसकी बूढ़ी मां और छोटी बहन घर में अकेली थीं। उसने मां को फोन करने की कोशिश की, लेकिन नेटवर्क गायब था। एक अजीब सी घबराहट उसके सीने में बैठ गई थी।

आधे घंटे की मशक्कत के बाद वह विधायक निवास के विशाल लोहे के गेट के सामने था। बाहर पुलिस का पहरा था। अंदर का नजारा बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग था। आलीशान लॉन, चमचमाती गाड़ियां और झूमर की रोशनी।

अविनाश को सीधे अंदर बड़े हॉल में बुला लिया गया।

हॉल का दरवाजा खुलते ही जो मंजर दिखा, उसने अविनाश के पेट की भूख को एक कड़वी ऐंठन में बदल दिया। कमरे में ठंडी हवा चल रही थी। एक बड़े से सोफे पर विधायक जी अपने कुछ खास गुर्गों के साथ बैठे थे। बीच की मेज पर काजू भुने प्लेट में रखे थे और महंगी व्हिस्की ग्लास में तैर रही थी। ठहाकों की गूंज थी। ऐसा लग रहा था जैसे बाहर की तबाही से इस कमरे का कोई लेना-देना ही नहीं है। सचमुच, उतरा है रामराज्य विधायक निवास में।

विधायक जी ने अविनाश को देखा और मुस्कुराए, आओ अविनाश। बैठो नहीं, खड़े ही रहो। काम जल्दी निपटाना है। वो राहत कोष वाली फाइल लाओ।

अविनाश ने कांपते हाथों से फाइल आगे बढ़ा दी।

विधायक जी ने ग्लास में एक घूंट भरा और फाइल के पन्नों को पलटने लगे। उस फाइल में लिखा था कि शहर के किस-किस इलाके में पांच-पांच लाख रुपये की राहत सामग्री और खाना तुरंत भेजा जाना है। विधायक जी ने पेन निकाला और उन इलाकों के नामों को काटना शुरू कर दिया जहां गरीब और मजदूर रहते थे। उन्होंने उन पैसों को अपने चहेते ठेकेदारों के खातों में ट्रांसफर करने का आदेश लिख दिया।

अविनाश से रहा नहीं गया। उसने हिम्मत जुटाकर कहा, सर, उन इलाकों में स्थिति बहुत खराब है। पानी गले तक आ गया है। अगर आज रात खाना और नावें नहीं पहुंचीं, तो कई लोग नहीं बचेंगे। मेरी खुद की बस्ती भी…

विधायक जी ने अविनाश को ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी आंखों में एक डरावना ठंडापन था। उन्होंने ग्लास मेज पर पटका और बोले, राजनीति भावनाओं से नहीं, समीकरणों से चलती है अविनाश बाबू। वो लोग हमारे वोटर नहीं हैं। जो हमारे काम का नहीं, उसके लिए सरकारी खजाना नहीं खुलता। तुम अपना क्लर्कपना दफ्तर में छोड़ा करो। यहां जो कहा जाए, बस उस पर मुहर लगाओ।

तभी विधायक जी के एक गुर्गे का फोन बजा। उसने फोन सुना और हंसते हुए बोला, भाई साहब, गजब हो गया। आपके विरोधी दल के नेता जिस नाव से दौरा कर रहे थे, वो नाव ही पलट गई। नेता जी डूब गए।

पूरे कमरे में ठहाका गूंज उठा। काजू की प्लेट आगे बढ़ा दी गई। व्हिस्की के ग्लास फिर से टकराए।

अविनाश को अपनी आंखों के सामने अंधेरा छाता हुआ महसूस हुआ। यह कोई हंसी-मजाक नहीं था, यह साक्षात मौत का जश्न था जो इस आलीशान कमरे में मनाया जा रहा था। उसे लगा कि वह किसी भुतहा महल में खड़ा है जहां इंसानों का खून पीकर लोग मुस्कुरा रहे हैं। एक भयानक रहस्य उसके सामने खुल चुका था कि सत्ता की भूख के आगे जनता की जान की कीमत एक भुने हुए काजू से भी कम है।

विधायक जी ने फाइल पर दस्तखत किए और उसे अविनाश की तरफ फेंक दिया। जाओ, इसे अभी कंप्यूटर पर चढ़ाओ ताकि सुबह तक फंड रिलीज हो जाए। हमारे आदमियों के खाते में।

अविनाश ने भारी कदमों से फाइल उठाई। उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था। रोना उसकी आंखों के कोने तक आ चुका था, लेकिन वह उसे पी गया। वह चुपचाप कमरे से बाहर निकल आया।

बाहर आते ही ठंडी हवा के झोंके और बारिश के थपेड़ों ने उसका स्वागत किया। उसने तुरंत जेब से फोन निकाला। नेटवर्क आ चुका था। स्क्रीन पर मां के नंबर से दस मिस्ड कॉल दिख रही थीं।

अविनाश के हाथ कांपने लगे। उसने तुरंत वापस फोन लगाया।

दूसरी तरफ से पड़ोस के एक लड़के की रोने की आवाज आई।

अविनाश भाई, तुम कहां हो? जल्दी आओ।

अविनाश का गला सूख गया। क्या हुआ राहुल? मां और गुड़िया ठीक हैं ना?

राहुल की रुलाई फूट पड़ी। भाई, अचानक बांध का पानी छोड़ दिया गया। तुम्हारी बस्ती की तरफ बाढ़ का पानी बहुत तेजी से आया। कोई नाव नहीं थी, कोई बचाने वाला नहीं था। तुम्हारा घर पूरी तरह ढह गया। चाची और गुड़िया… वे दोनों पानी के तेज बहाव में बह गईं। हम उन्हें बचा नहीं पाए भाई। सब खत्म हो गया।

फोन अविनाश के हाथ से छूटकर पानी में गिर गया।

अविनाश वहीं घुटनों के बल कीचड़ में बैठ गया। आकाश से गिरता पानी और उसकी आंखों से बहते आंसू एक हो गए थे। उसके कान में अभी भी विधायक निवास के अंदर से आ रही ठहाकों की आवाजें गूंज रही थीं। वह चीखना चाहता था, लेकिन उसके हलक से आवाज नहीं निकली।

जिस राहत सामग्री की फाइल उसकी गोद में थी, उसी पर लिखे एक दस्तखत ने उसकी अपनी मां और बहन की जिंदगी का सौदा कर दिया था। वह उसी रामराज्य की रक्षा की फाइल दबाए बैठा था, जिसने उसकी पूरी दुनिया उजाड़ दी थी। बारिश होती रही, और वह कीचड़ में पड़ा-पड़ा अपनी छाती पीटकर बिना आवाज के रोता रहा।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ – लघुकथा – मैं ऐसा नहीं – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारानी लघुकथा मैं ऐसा नहींकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ 

☆ लघुकथा – मैं ऐसा नहीं ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

वह फिर गिड़गिड़ाया, “साहब ! मेरी अर्जी मंजूर कर दीजिए. मेरा इकलौता पुत्र मर जाएगा.”

मगर, नरेश बाबु पर कोई असर नहीं हुआ, “साहब नहीं है. कल आना.”

“साहब, कल बहुत देर हो जाएगी. मेरा पुत्र बिना आपरेशन के मर जाएगा.आज ही उस के आपरेशन की फीस भरना है. मदद कर दीजिए साहब. आप का भला होगा,” वह असहाय दृष्टि से नरेश की ओर देख रहा था.

“ कह दिया ना, चले जाइए, यहां से,” नरेश बाबु ने नीची निगाहें किए हुए जोर से चिल्लाते हुए कहा.

तभी उस का दूसरा साथी महेश उसे पकड़ कर एक ओर ले गया.

“क्या बात है नरेश! आज तुम बहुत विचलित दिख रहे हो.” महेश बाबु ने पूछा, “वैसे तो तुम सभी की मदद किया करते हो ? मगर, इस व्यक्ति को देख कर तुम्हें क्या हो गया?” वह नरेश का अजीब व्यवहार समझ नहीं पाया था.

नरेश कुछ नहीं बोला. मगर, जब महेश बाबु ने बहुत कुरैदा तो नरेश बाबु ने कहा, “क्या बताऊ महेश ! यह वही बाबु है, जिस ने मेरी अर्जी रिश्वत  के पैसे नहीं मिलने की वजह से खारिज कर दी थी और मेरे पिता बिना इलाज के मर गए थे.”

“क्या !’’ महेश चौंका.

“हां, ये वहीं व्यक्ति है.”

“तब तू क्या करेगा?” महेश ने धीरे धीरे से कहा, “जैसे को तैसा?”

“नहीं यार, मैं ऐसा नहीं हूं,” नरेश ने कहा, “मैंने इस व्यक्ति की अर्जी कब की मंजूर कर दी है और इलाज का चैक अस्पताल पहुंचा दिया है. यह बात इसे नहीं मालुम है.’’ कहते हुए नरेश खामोश हो गया.

महेश यह सुन कर कभी नरेश को देख रहा था कभी उस व्यक्ति को. जब कि वह व्यक्ति माथे पर हाथ रख कर वहीं ऑफिस में बैठा था. 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ दिल की तस्वीरें ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ दिल की तस्वीरें ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“मम्मी, आपके बचपन की फ़ोटो इतनी कम क्यों हैं?” रिया ने पुराना एल्बम पलटते हुए पूछा।

माँ मुस्कुराईं, “क्योंकि बेटा, तब हर पल को कैमरे में नहीं, दिल में कैद किया जाता था।”

“मतलब?”

“मतलब, जब गर्मियों में हम सब खुले आँगन में चारपाइयाँ बिछाकर सोते थे, तब किसी ने फ़ोटो नहीं ली। जब नानी अपने हाथों से आम काटकर खिलाती थीं, जब मोहल्ले के बच्चे गिल्ली-डंडा, कंचे और पिट्ठू खेलते थे, तब भी कोई रिकॉर्डिंग नहीं होती थी।”

“फिर याद कैसे है सब?”

“क्योंकि उन पलों में मोबाइल नहीं, अपने लोग साथ होते थे। ट्रेन के सफ़र में सुराही का पानी, घर से बने पराठे, छत पर पतंगबाज़ी, बरसात में कागज़ की नाव, दादी की कहानियाँ, त्योहारों की रौनक—इन सबकी तस्वीरें नहीं हैं, लेकिन यादें आज भी ताज़ा हैं।”

रिया ने अपना मोबाइल मेज़ पर रख दिया।

“मम्मी, आज शाम दादी से उनकी पुरानी कहानियाँ सुनेंगे?”

माँ की आँखें चमक उठीं।

“हाँ बेटा, कुछ यादें कैमरे से नहीं, अपनों के साथ बिताए समय से बनती हैं।” ❤️

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रसेदार सब्ज़ी)

☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शाम के पाँच बज चुके थे। सरकारी दफ़्तर में हिसाब-किताब देखते-देखते रामप्रसाद बाबू की आँख लग गई थी।

नींद में वह मुस्कुरा रहे थे—”आज घर जाऊँगा तो रसेदार सब्ज़ी बनी होगी। सुबह दाल बनाने को भी कह दिया था। दाँत अब पहले जैसे नहीं रहे, पर रसेदार सब्ज़ी के साथ रोटी आराम से खा लेता हूँ।”

तभी चपरासी ने आवाज़ दी, “बाबूजी! पाँच बज गए। घर नहीं जाना क्या?”

वह चौंककर उठे, झोला उठाया और रास्ते में आलू-टमाटर खरीद लिए। एक दुकान पर नज़र पड़ी तो पत्नी के लिए एक छोटा-सा पर्स भी ले लिया। मन ही मन सोचने लगे, “बहुत खुश होगी।”

घर पहुँचे। ताला खोला। भीतर सन्नाटा था।

उन्होंने सब्ज़ियाँ मेज़ पर रखीं और नया पर्स निकालकर दीवार पर टँगी पत्नी की तस्वीर के सामने रख दिया।

काँपती आवाज़ में बोले, “देखो… तुम्हारे लिए पर्स लाया हूँ।”

फिर रसोई में जाकर डिब्बे से सूखी रोटियाँ निकालीं, पानी में भिगोकर खाने लगे।

आँखों से आँसू लगातार गिरते रहे।

पत्नी को गुज़रे तीन वर्ष हो चुके थे, पर प्रेम ने आज तक यह स्वीकार नहीं किया था कि वह अब लौटकर नहीं आएगी।

उधर उसी समय उनका बेटा और बहू एक महंगे भोजनालय में परिवार के साथ भोजन कर रहे थे। तस्वीर खिंची और सामाजिक माध्यम पर लिखा गया—

“माता-पिता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ी दौलत है।”

कुछ ही देर में सैकड़ों प्रशंसाएँ मिल गईं।

इधर रामप्रसाद बाबू की थाली में आज भी सूखी रोटी थी… और उधर बेटे की तस्वीर में संस्कार।

विडंबना यह नहीं कि पिता अकेला था, विडंबना यह थी कि उसका बेटा कभी अकेला दिखाई नहीं देता था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७० – बारिश ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बारिश”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७०  ☆

🌻 अति लघु कथा (अ ल क) 🌻 🌧️बारिश🌧️

आज बारिश की बूँदों ने श्रेया के मन में ही नही, तन को भी फफोले बना रही थी। तेज, तर्रार, तीखे नयन नक्श, चुल्हे के जैसी धधकी ज्वाला जिसे अनजाने में ही किसी ने सुलगती धुंआ- धुंआ कर डाला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १०९ – कथा – मुसाफिर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक रहस्यमय कथा – मुसाफिर।)  

☆  चुभते तीर # १०९ – कथा – मुसाफिर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

दिल्ली के सराय काले ख़ां बस टर्मिनल पर शाम के साढ़े सात बजे थे। जून की उस उमस भरी गर्मी में हवा ऐसे चल रही थी मानो कोई बूढ़ा चूल्हा फूंक रहा हो।

राजीव अपनी पुरानी सुटकेस पर बैठा हुआ अपनी सड़ी सी चाय की चुस्की ले रहा था। चाय का स्वाद बिल्कुल वैसा ही था जैसी उसकी ज़िंदगी थी यानी फीकी, बेस्वाद, लेकिन मजबूरी में हलक से नीचे उतारनी ही थी। ठीक तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन टिमटिमाई। सफरनामा ऐप पर एक राइड शेयरिंग रिक्वेस्ट थी। रूट था दिल्ली से लखनऊ।

गाड़ी राजीव की ही थी यानी एक पुरानी वैगनआर, जो अब सिर्फ पेट्रोल पर नहीं, बल्कि राजीव की किस्मत के भरोसे चलती थी। उसने रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की। सह यात्री का नाम लिखा था मुसाफिर।

जब पैसेंजर गाड़ी की पिछली सीट पर आकर बैठी, तो गाड़ी की लाइट में राजीव ने शीशे से उसका चेहरा देखा। रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सनसनी दौड़ गई।

वह पल्लवी थी।

वही पल्लवी, जो आज से सात साल पहले इसी सराय काले ख़ां पर राजीव का हाथ छोड़कर बेहतर भविष्य की तलाश में एक चमचमाती ऑडी में बैठ कर चली गई थी। आज वही पल्लवी उसकी खटारा वैगनआर की पिछली सीट पर बैठी थी।

राजीव ने गला साफ़ किया, मैडम, रूट लंबा है। रात को ढाबे पर रुकेंगे।

पल्लवी ने खिड़की के बाहर देखते हुए ठंडी आवाज़ में कहा, जल्दी पहुँचाइए भैया, मेरी माँ की तबीयत ठीक नहीं है।

भैया।

राजीव के कलेजे पर जैसे किसी ने सुलगती हुई सिगरेट बुझा दी। सात साल में जान से भैया तक का सफर सिर्फ तीन अक्षरों का नहीं था, इसमें सात जन्मों की बेबसी घुली थी। व्यंग्य देखिए, जिस औरत के लिए राजीव ने कभी पूरी दिल्ली नाप डाली थी, आज वह उसे तीन सौ रुपये प्रति सीट के भाड़े पर अपनी गाड़ी में ले जा रहा था। वही कारवाँ था, वही रास्ते थे, वही ज़िंदगी थी… बस मक़ाम बदल गए थे।

गाड़ी यमुना एक्सप्रेसवे पर अस्सी की स्पीड से दौड़ रही थी। रेडियो पर किशोर कुमार रो रहे थे जीना क्या जी का जंजाल…

गाड़ी में एसी ठीक से काम नहीं कर रहा क्या? पल्लवी ने पीछे से टोका। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कपकपाहट थी।

राजीव ने शीशे में देखा। पल्लवी का चेहरा पीला पड़ चुका था। उसकी आँखों के नीचे काले गड्ढे थे। वह लगातार अपने हाथों को आपस में रगड़ रही थी, जैसे उसे बहुत ठंड लग रही हो, जबकि बाहर पारा चालीस के पार था।

पुरानी गाड़ी है मैडम, जितना रोती है उतना ही चलती है, राजीव ने अपनी कड़वाहट को व्यंग्य के पीछे छिपाते हुए कहा। सुना है आपके पति के पास बड़ी गाड़ियाँ हैं? फिर इस खटारा में?

पल्लवी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस शून्यता में ताकती रही।

तभी गाड़ी के स्टीयरिंग में एक ज़ोर का झटका लगा। हेडलाइट की रोशनी में सड़क के बीचों बीच एक साया खड़ा दिख। राजीव ने पूरी ताकत से ब्रेक मारा। टायर चीख उठे। गाड़ी सड़क किनारे एक बड़े से मील के पत्थर के ठीक सामने जाकर रुकी।

राजीव हांफ रहा था। उसने बाहर देखा, वहाँ कोई नहीं था।

क्या हुआ? पल्लवी ने पूछा। उसकी आवाज़ अब और भी भारी और गूँजती हुई सी लग रही थी।

कोई… कोई सामने था शायद, राजीव ने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा।

इस रास्ते पर कोई किसी के सामने नहीं आता राजीव। सब अपने अपने मक़ाम पर अकेले ही छूट जाते हैं, पल्लवी ने धीरे से कहा।

राजीव चौंक गया। पल्लवी ने उसे भैया नहीं, राजीव कहा था। और उसकी आवाज़… वह इतनी खोखली क्यों लग रही थी?

रात के दो बजे गाड़ी एक सुनसान ढाबे पर रुकी। ढाबे पर अजीब सा सन्नाटा था। न कोई ट्रक ड्राइवर, न कोई और गाड़ी। बस एक बूढ़ा आदमी लालटेन लिए बैठा था।

राजीव नीचे उतरा। पल्लवी भी पीछे पीछे आई। दोनों एक खाट पर बैठ गए।

चाय पियोगी? राजीव ने पूछा।

हाँ, बिना चीनी की। मीठे से अब डर लगता है, पल्लवी ने अपनी उँगलियों को देखते हुए कहा, जिन पर कोई अंगूठी नहीं थी।

राजीव ने गौर किया कि पल्लवी के पैरों में चप्पल नहीं थी। पैर धूल से सने थे और उन पर नीले रंग के अजीब से निशान थे।

तुम्हारी ये हालत कैसे हुई पल्लवी? वह ऑडी वाला कहाँ गया? तुम्हारा वो आलीशान मक़ाम? राजीव के भीतर का दबा हुआ गुबार व्यंग्य बनकर फूट पड़ा।

पल्लवी सूखी हँसी हँसी। उस हँसी में इतनी पीड़ा थी कि ढाबे की लालटेन भी थरथरा गई। मक़ाम? मक़ाम तो बस श्मशान का सच होता है राजीव। बाकी सब तो मुसाफिरखाना है। जिस ऑडी के पीछे मैं भागी थी, उसने मुझे दो ही साल में सड़क पर ला दिया। रोज़ की मार पिटाई, गाली गलौज… और एक दिन… वह चुप हो गई।

और एक दिन क्या? राजीव ने उत्सुकता और सिहरन के बीच पूछा।

एक दिन उसने मुझे चलती गाड़ी से बाहर फेंक दिया। इसी एक्सप्रेसवे पर। पल्लवी ने अपनी आँखें उठाईं। उसकी आँखों में पुतलियाँ नहीं थीं, सिर्फ एक गहरा, डरावना कालापन था।

राजीव के हाथ से चाय का कुल्हड़ छूटकर गिर गया। चाय ज़मीन पर फैल गई।

तुम… तुम क्या बकवास कर रही हो? राजीव का गला सूख गया। उसने डर कर पीछे कदम बढ़ाए।

मैं सच कह रही हूँ राजीव। आज ठीक सात साल हो गए उस बात को। मैं रोज़ इसी रास्ते पर किसी न किसी गाड़ी में बैठती हूँ, इस उम्मीद में कि कोई मुझे घर पहुँचा दे। आज तुम्हारी गाड़ी मिली। पल्लवी खड़ी हो गई। उसके जिस्म से अब सड़न की एक अजीब सी बू आ रही थी।

राजीव ने काँपते हाथों से अपना फोन निकाला। उसने सफरनामा ऐप खोला। पैसेंजर की प्रोफाइल देखने के लिए। वहाँ मुसाफिर नाम की कोई राइड ही नहीं थी। स्क्रीन पर सिर्फ एक पुराना न्यूज़ आर्टिकल खुला हुआ था, जो शायद इंटरनेट ने उसकी लोकेशन के आधार पर रीकमेंड किया था।

हेडलाइन थी सात साल पहले यमुना एक्सप्रेसवे पर मिली महिला की लाश की अब तक नहीं हुई पहचान। नीचे पल्लवी की सात साल पुरानी तस्वीर थी।

राजीव के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह चीखने ही वाला था कि ढाबे के उस बूढ़े आदमी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

बाबूजी, किससे बात कर रहे हो? यहाँ तो कोई नहीं है। आप आधे घंटे से अकेले खाट पर बैठकर रो रहे हो।

राजीव ने पलटकर देखा। खाट खाली थी। पल्लवी वहाँ नहीं थी। सिर्फ उसकी चाय का कुल्हड़ ज़मीन पर टूटा पड़ा था।

वह भागकर अपनी वैगनआर की तरफ गया। उसने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। पिछली सीट खाली थी। लेकिन सीट पर एक पुरानी, धूल से सनी हुई पायल रखी थी। वही पायल, जो राजीव ने पल्लवी को उनके पहले वेलेंटाइन डे पर अपनी जेबखर्च काटकर दी थी।

राजीव सड़क के बीचों बीच घुटनों के बल बैठ गया। आसमान से अचानक तेज़ बारिश होने लगी, जैसे कुदरत भी उसकी बेबसी पर ठहाके मार रही हो।

सात साल तक राजीव जिस औरत से नफ़रत करता रहा, जिसे कोसता रहा कि उसने उसे छोड़ दिया… वह तो इस दुनिया में थी ही नहीं। वह तो कब की मिट चुकी थी। और वह यहाँ अपनी टूटी गाड़ी और टूटी किस्मत लेकर घूम रहा था, यह सोचकर कि वह ज़िंदा है।

राजीव ने उस पायल को छाती से लगा लिया। बारिश का पानी और उसके आँसू एक होकर सड़क पर बह रहे थे। वह चीख चीखकर रोने लगा। उसकी रुलाई एक्सप्रेसवे के सन्नाटे को चीर रही थी।

वही कारवाँ था, वही रास्ते थे, वही ज़िंदगी थी… और आज दोनों एक ही मक़ाम पर थे। दोनों लावारिस थे, दोनों भटके हुए थे, और दोनों ही मर चुके थे, एक जिस्म से, और एक रूह से।

रात के उस सन्नाटे में सिर्फ एक इंसान (या शायद एक साया) रो रहा था, और दूर कहीं कोई मुसाफिर अपनी अगली मंज़िल की तलाश में भटक रहा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares