हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – डर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा – डर ? ?

पिता की खाँसी की आवाज़ सुनकर उसने रेडियो की आवाज़ बेहद धीमी कर दी। उन दिनों संयुक्त परिवार थे, पुरुष खाँस कर ही भीतर आते ताकि महिलाओं को सूचना मिल जाए।

…”संतोष की मॉं, ये तुम्हारे लल्ला को बताय देना कि वो आज के बाद उस रघुवंस के आवारा छोकरे के साथ दीख गया तो टाँग तोड़कर घर बिठाय देंगे, कौनो पढ़ाई-वढ़ाई नाय, सब बंद कर देंगे”…. वह मन मसोस कर रह गया।

रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा कि 17 बरस का तो हो लिया, अब और कितना बड़ा होना पड़ेगा कि पिता से डरना न पड़े।.. शायद बेटे का जन्म बाप से डरने के लिए ही होता है…वह मन ही मन बड़बड़ाया और औंधे होकर सो गया।

आज उसका अपना बेटा 17 बरस का हो चुका। बेहद जिद्‌दी! कल-से उसने घर में कोहराम मचा रखा था। उसे अपने जन्मदिन पर मोटरसाइकिल चाहिए थी और अभी तो उसकी आयु लाइसेंस लेने की भी नहीं हुई थी। ऊपर से शहर का ये विकराल ट्रैैफिक, उसने सोच लिया था कि अबकी बार बेटे की ये जिद्‌द पूरी नहीं करेगा।

…”मॉम, डैड को साफ-साफ बता देना, नेक्स्ट वीक मेरे बर्थडे से एक दिन पहले तक बाइक नहीं आई न, तो मैं घर छोड़कर चला जाऊँगा.. और हाँ, कभी वापस नहीं आऊँँगा।”… उसने बेटे की माँ के हाथ में बाइक के लिए चेक दे दिया।

रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा-…शायद बाप का जन्म बेटे से डरने के लिए ही होता है.., और वह सीधा होकर पीठ के बल सो गया।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६१ – लघुकथा – नेक इन्सान ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ नेक इन्सान ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज सुबह से ही काफी बरसात हो रही थी। वैसे तो नन्हा छोटू रुई वाली मिठाई की स्टिक लेकर सुबह ही घर से निकल गया था, लेकिन आज ग्राहक नदारत थे। सुबह से बरसात शुरू हुई तो बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। मनोहरलाल के समोसे वाली दुकान के आगे लगे टिन सेड में रखे बेंच का किनारा पकड़े छोटू बरसात के रुकने का इंतजार करता रहा। बरसात बिल्कुल ही बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। सुबह से घर से निकले छोटू को बड़ी तेज भूख लगी थी, लेकिन पाकेट में एक भी रुपया नही था कि कुछ खरीद कर खा ले। पॉकेट में पैसा कहां से होता, उसकी तो अब तक एक भी मिठाई नहीं बिकी थी।

मनोहरलाल की दुकान पर बरसात के मौसम में चटक समोसे खाने वालों की लाइन लगी हुई थी।

अबे, यहां क्या बैठा है, हट किनारे, … एक साहब ने उसे डांटे हुए कहा।

बेचारा छोटू क्या ही जवाब देता। उसने थोड़ा सा सरकने में ही भलाई समझी। इसी बीच कार पर सवार तीन चार लोग मनोहरलाल की दुकान पर समोसे खाने के लिए उतरे। उन्हें देखते हैं, मनोहरलाल उनकी आव भगत में लग गया। उसकी सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग जरूर कोई विशेष लोग होंगे। उनके बैठने का इंतजाम मनोहरलाल को करना था सो मनोहरलाल सो उसने कड़े तेवर दिखाते हुए छोटू को डांटते हुए कहा..

अबे, बार-बार कह रहा हूँ कि भाग यहां से, यह नालायक जाने का नाम नही ले रहा है..

कैसे जाऊँ चाचा.. इतनी तेज बरसात हो रही है भीग जाऊँगा, मेरी मिठाईयाँ भीग जाएगीं।

तेरी मिठाईयाँ भींग जाएगीं, इससे मुझे क्या लेना देना, .. हता है कि नही। चाचा यह मेरी भी तो दुकान थी.. छोटू के इतना कहते ही मनोहरलाल ने उसे एक तगड़ा सा थप्पड़ नन्हें छोटू के गाल पर जड़ दिया।

नन्हा छोटू तिलमिला कर बेंच से नीचे गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ में सन उठे। उसकी रुई वाली मिठाई कीचड में गिर कर पिचक गयी और ख़राब हो गयी। उस छोटे बच्चे की छोटी सी पूँजी बर्बाद हो गयी।

जमीन पर लुढ़का छोटू कभी खुद को देखता, तो कभी अपनी बर्बाद हो चुकी, रुई वाली मिठाई को देखता। उसने आरत दृष्टि से मनोहरलाल की ओर देखा। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा फूट पड़ी। वह बिल्कुल बेचारा और विवश था। वह कर ही क्या सकता था।

आइये बाबूजी, आपलोग लोग बैठिए, ऐसा बोलते हुए मनोहरलाल ने कार से उतरे चारों लोगों को बेंच पर बैठने का अनुरोध किया। जगह की दिक्कत जैसी की तैसी थी। ग्राहकों से सारे बेंच भरे हुए थे।

मनोहरलाल की इस गंदी सी हरकत को देखकर कार से उतरे भद्र से दिखते सज्जन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा . अरे मनोहरलाल ! तुमसे इस लड़के को मारा क्यों? यह लड़का किसका है?… शायद उस सज्जन ने बच्चे की यह बात सुन ली थी कि “चाचा यह मेरी भी दुकान तो थी।”

 मनोहरलाल अब क्या ही जवाब देता, वह उस व्यक्ति का मुँह देखने लगा। थोड़ा हिचकते हुए बोला, साहब ! ये महेश का लड़का है। सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

अरे मनोहरलाल..महेश कहाँ है? क्या वह दुकान पर बिल्कुल नहीं आता ? उसको देखे तो मुझे महीना हो गए। तूँ उसकी दुकान पर काम करता था, मैं यह समझ रहा था कि महेश तुम पर बहुत विश्वास करता है, इसलिए सारी दुकान तुम्हारी जिम्मेदारी पर छोड़ रखा है।

उस सज्जन ने जब दुबारा डांटते हुए मनोहरलाल से पूछा तो मनोहरलाल ने सारी बातें उस नेक इंसान को बता दी ..

बाबूजी, महेश अब इस दुनिया में नहीं है। उसके गुजरे लगभग छः महीने से ऊपर हो गए। यह लड़का महेश का ही लड़का है।

महेश का लड़का है !..अरे महेश की पत्नी भी तो बरसों पहले गुजर गई थी। और उसका यह लड़का इस हाल में। अब तो यह बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया होगा।

अबे नालायक तुम अपने मालिक से इस तरह की वफादारी निभा रहे हो। उसके बेटे की जिम्मेदारी निभाने की जगह, तुम इस छोटे लड़के से ऐसा व्यवहार कर रहे हो, उसको इस तरह से पीट रहे हो।

अभी के अभी खाली कर दे इस गुमटी को, नहीं तो तुम्हारी हड्डी पसली तोड़ दूँगा। बिल्कुल अभी के दफा हो जा यहाँ से, नहीं तो पुलिस बुलाकर तुम्हें बंद करता हूँ। मैंने यह दुकान ( बड़ी सी गुमटी ) तुम्हें नहीं दी थी, मैंने यह दुकान उस महेश को दी थी जो की एक नेक और सज्जन इंसान था। मेरे बचपन का दोस्त था।

उस सज्जन ने छोटे छोटू के दोनों हाथों को पड़कर उठाया और उसे अपने बाहों में समेट लिया। उनके कपड़े गंदे हो गए लेकिन उनको इससे कुछ लेना देना नहीं था। इस वक्त तो उसके बचपन के दोस्त महेश का बेटा, छोटू उसकी बाहों में था। छोटू और वह सज्जन दोनों ही रो रहे थे। धूर्त मनोहरलाल दुकान छोड़कर फरार हो चुका था। दुकान में बैठे अन्य ग्राहक इस नेकइंसान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

 दिनांक 23 जुलाई 2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

रीमा को विदेश की प्रतिष्ठित कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला। यह उसके वर्षों के परिश्रम का सपना था। लेकिन उसी समय उसके पिता की तबीयत बिगड़ गई। माँ की आँखों में चिंता थी और पिता के चेहरे पर मुस्कान, जो मानो कह रही थी-“तुम जाओ, हम संभाल लेंगे।”

रीमा का मन भावनाओं और वास्तविकता के बीच झूलता रहा। एक ओर अपने सपनों का भविष्य था, दूसरी ओर अपनों का वर्तमान।

उसने कुछ दिन रुकने का निर्णय लिया। पिता का इलाज करवाया और परिवार को संभाला। कुछ महीनों बाद उसने फिर आवेदन किया। इस बार उसे पहले से बेहतर अवसर मिला।

नियुक्ति-पत्र हाथ में लेकर जब वह पिता के कमरे में पहुँची, तो उन्होंने बस उसका हाथ थाम लिया। दोनों की आँखों में न कोई शिकायत थी, न कोई सफाई-सिर्फ़ एक गहरा सुकून था, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। रीमा ने चुपचाप वह पत्र मेज़ पर रखा और पिता के कंधे पर सिर टिका दिया।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ मेरा  परिवार… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा मेरा  परिवार

? लघुकथा – मेरा  परिवार ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

अध्यापिका ने बच्चों से कहा- “ चलो बच्चों आज आप सभी अपने परिवार की जानकारी देंगे. आप सभी बताएंगे आपके परिवार में कितने सदस्य हैं और कौन-कौन हैं…  “ पहले बच्चे ने बड़े उत्साह से कहा – “मेरे परिवार में चार सदस्य हैं.  पापा, मम्मी, मैं और मेरी बहन.” दूसरे ने कहा – “मेरी फैमिली में तीन स    दस्य हैं. मैं और मेरे पापा मम्मी .”  यह गिनती 15 तक इसी तरह चलती गई. उसके पश्चात रोहन का नंबर आया वह बोला- “अध्यापक जी, मेरे परिवार में कुल 11 सदस्य  हैं. “क्लास के सभी बच्चे हंसने लगे. अध्यापक ने  भी हैरानी से पूछा- “11 सदस्य हैं… कौन-कौन  हैं…? रोहन बड़े उत्साह से बोल उठा-“ मेरे दादा दादी,  पापा मम्मी,  मैं और मेरी छोटी बहन, बड़े पापा, बड़ी मम्मी , उनका बेटा और बेटी.  दादी कहती है हम सबके साथ भगवान भी रहते हैं वह दिखाई नहीं पड़ते लेकिन वह हमारे घर में सबसे बड़े सदस्य के रूप में हमें मार्गदर्शन करते रहते हैं . इस तरह हमारे घर में कुल 11 लोग हैं…”  सभी बच्चे हैरानी से उसे देखकर हंसने लगे . एक बच्चा बोला- “लेकिन यह भगवान और दादा-दादी इनको तो मैंने कभी देखा ही नहीं.   दूसरा बोला- “हां मैंने भी उनका नाम तो सुना है लेकिन देखा नहीं…” कक्षा के कुछ और बच्चों की भी यही  प्रतिक्रिया थी. अध्यापिका के चेहरे पर गहरे तनाव की रेखाएं स्पष्ट नजर आने लगी थी. उसने भी तो लगभग इसी उम्र के अपने बेटे को अभी तक दादा दादी से नहीं मिलाया था न उनके बारे में कुछ बताया था.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌷लघुकथा ☘️ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य 🌺

आज सुबह सैर के लिए निकला तो देखा कि एक अख़बार का हॉकर रामचरितमानस की चौपाइयाँ गुनगुनाते हुए बड़ी तन्मयता से अख़बार बाँट रहा था। भोर की ताज़ी हवा में तुलसीदास की वाणी का वह मधुर स्वर कुछ ऐसा घुला कि कदम अनायास ही ठिठक गए। 

मैंने मुस्कराकर कहा, “भाई, यह तो बहुत सुंदर बात है। सुबह-सुबह प्रभु का स्मरण भी हो रहा है और पूरी लगन से अपना काम भी।”

बातों-बातों में उसने बताया कि वह कभी फ्रीस्टाइल रेसलिंग करता था। स्वस्थ रहने के लिए आज भी रोज़ सुबह अख़बार बाँटता है और दिन में अपना दूसरा काम करता है। फिर उसने मेरी ओर देखा। मेरे सफ़ेद होते बालों और उम्र का सम्मान करते हुए बोला, “सर, आप इस उम्र में भी बिल्कुल फिट हैं!”

मन ही मन मैंने उस युवक को आशीर्वाद दिया।

थोड़ा आगे बढ़ा तो पार्क के बाहर एक फिटनेस ट्रेनर मिल गया। मुझे दूर से आते देखकर बोला, “आपको देखकर ही अच्छा लग जाता है। आपने अपने आपको बहुत अच्छी तरह मेंटेन रखा है।”

अभी इस प्रशस्ति का सुख पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर पाया था कि पार्क के भीतर एक योग प्रशिक्षक ने भी लगभग वही बात दोहरा दी—“आप हमेशा प्रसन्न रहते हैं, और इस उम्र में भी एकदम फिट हैं।”

बस, फिर क्या था! पंद्रह मिनट के भीतर तीन-तीन फिटनेस सर्टिफिकेट मिल चुके थे। मन मयूर-सा नाच उठा। प्रसन्नचित्त, हल्के कदमों और कुछ अधिक ही सीधी कमर के साथ घर लौटा।

घर पहुँचते ही यथार्थ ने बड़ी आत्मीयता से मेरा स्वागत किया।

स्वर गूँजा—“पार्क में ठीक से वॉक क्यों नहीं करते? बार-बार झूले पर जाकर बैठ जाते हो। नियमित योग भी नहीं करते। तोंद निकलने लगी है, कंधे भी झुकने लगे हैं। थोड़ा फिटनेस पर ध्यान दो। ट्रैकिंग पर भी चलना है!”

मैंने बिना किसी प्रतिवाद के सब कुछ शांत भाव से सुना।

आख़िर बाहर की दुनिया हमें उत्साह देती है, और घर की दुनिया हमें वास्तविकता से जोड़े रखती है।

ऐसे अवसरों पर मैं स्थितप्रज्ञ हो जाना ही श्रेयस्कर समझता हूँ।☺️

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares
1

हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ सुबह की मुस्कान😊 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 सुबह की मुस्कान😊

आज सुबह हमारे अपार्टमेंट की लिफ़्ट के कपाट जैसे ही ग्राउंड फ्लोर पर खुले, एक मधुर स्वर कानों में घुला — “गुड मॉर्निंग!”

मैंने मुड़कर देखा। एक प्रफुल्लित दंपत्ति मुस्कुराते हुए लिफ़्ट से बाहर निकल रहे थे। मैंने भी मुस्कान के साथ उनके अभिवादन का उत्तर दिया।

न जाने क्यों, लिफ़्ट से बाहर आते ही दोनों विपरीत दिशाओं में चल पड़े—पति बाईं ओर, पत्नी दाहिनी ओर।

पति ने हँसते हुए पुकारा, “अरे, उधर नहीं… इधर!”

पत्नी ने भी मुस्कुराकर अपनी दिशा बदल ली।

मैंने हल्के से चुटकी ली, “लगता है, आजकल रास्ते भी थोड़े-थोड़े भटकने लगे हैं!”

क्षण भर में तीनों की निश्छल हँसी एक साथ फूट पड़ी। लगा, सुबह की हवा में किसी ने थोड़ी-सी खुशबू, थोड़ी-सी आत्मीयता और थोड़ी-सी हँसी घोल दी हो।🥰

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ – सिलाई मशीन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆

🌻लघु कथा🌻 सिलाई मशीन 🌻

पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।

नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन  उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।

सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११२ – कहानीकार की अंतश्चेतना… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कहानीकार की अंतश्चेतना…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११२ कहानीकार की अंतश्चेतना  ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

कहानियाँ पढ़ने के अंतर्गत प्रायः ऐसा मान लिया जाता है उन कहानियों में कहानीकार के जीवन की छाप होती हो। इसी से मिलती जुलती एक छोटी सी कहानी मेरी ओर से। कहानीकार ने अपने कहानी संग्रह की अंतिम कहानी लिखी। पर उसकी अंतश्चेतना खुशी से दीप्त न हो पायी। उसकी सोच में आ रहा था इस संग्रह की सारी कहानियाँ पाठकों के यहाँ दुख ले कर जाने वाली हैं। सचमुच, सभी कहानियों में निराशा थी, उत्पीड़न थे, आँसू थे। स्वयं लेखक ने जिस लड़की को चाह कर प्रेम से घर बसाया था उसने उसे भी दुख की कलम से कुरेदा था। उसने अपनी अंतश्चेतना में एक अजीब सा उद्वेलन महसूस किया और बैठ कर पत्नी से प्रेमपूर्वक बातें करने लगा। यह उसका एक प्रायश्चित था। थोड़ी देर पहले कहानी संग्रह की अंतिम कहानी लिखने के लिए बैठते वक्त उसने अपनी पत्नी से लड़ कर उसे बहुत रुलाया था

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मेरे छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था । इसलिए ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर आया । घर के अंदर खूब रौनक और, खुशी के माहौल । बाहर क्या देखता हूं हमारी कामवाली का छोटा सा बेटा बर्तन मांज रहा है और रोते रोते मां से कह रहा है – मुझे भी केक दिलवाओ। मुझे भी जन्मदिन मनाने है ।

मां बेबस । झांक रही अपने अंदर । मैं सोच रहा हूं कि जन्मदिन किसका मनाऊं ?

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares