हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समीकरण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समीकरण ? ?

मन और मस्तिष्क में

संघर्ष चलता रहा,

जगत का समीकरण

सदा टेढ़ा बना रहा,

बड़प्पन समझकर जिसका,

जिसके भी निकट गया,

संकीर्णता जानकर उसकी,

उससे दूर होना पड़ा!

 ?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 10:58 बजे, 17 दिसम्बर 2022

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३९ – रब की ईबादत का सिला सबको मिला… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – रब की ईबादत का सिला सबको मिला…।)

✍ रब की ईबादत का सिला सबको मिला… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

जिसे चाहा उस फ़न का मैं माहिर बना

जुनूँ था कि,  क़ादिर बनू,  क़ादिर बना

चाहिता तो,  मुर्शिद भी बन सकता था 

ग़मज़दा बशर देखे तो मैं काफ़िर बना

 *

गाड़ी बंगला कोठी ये, सुकूं के सामां नही

सुकूं उसको मिला, जो कोई तारिक बना

 *

उस करिश्माई दरवेश के मैं सदके जाउं

जिस संग को छुआ उसने वो नादिर बना

 *

रब की ईबादत का सिला सबको मिला

कोई मुलाजिम बना तो कोई ताजिर बना

 *

वाइज़ की सोहबत, सबको कहां हांसिल

मुझ कमज़र्फ को मिली और मैं आरिफ़ बना

* 

मुश्किल घडी में सब बचकर निकल गये

‘हेमंत’ वो तेरा दोस्त था जो जाँनिसार बना

☆

क़ादिर = शक्तिमान, मुर्शिद = धर्मगुरु, ग़मज़दा बशर = दु:खी मनुष्य, काफ़िर = नास्तिक, तारिक = त्यागी, संग = पत्थर, नादिर = अमूल्य, ताजिर = सौदागर, वाइज़ = धर्मोपदेशक, आरिफ़ = ज्ञाता, जाँनिसार = प्राण रक्षक

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३३ ☆ मौत से मुमकिन नहीं है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मौत से मुमकिन नहीं है…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३३ ☆

✍ मौत से मुमकिन नहीं है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

मुझको आया ही नहीं है दिल किसी का जीतना

ज़िंदगी में सबसे मुश्किल है भरोसा जीतना

* 

इसके फंदे में फसा जो हारता है ज़ीस्त को

मौत से मुमकिन नहीं है दाँव अपना जीतना

 *

हार में भी जीत से मिलती उसे बढ़कर ख़ुशी

एक बेटे से न कोई बाप चाहा जीतना

 *

हो मुखालिफ़ आपके कोई भी छोटा या बड़ा

उसको तदवीरों से मुमकिन हो सकेगा जीतना

 *

लोक हित में भस्म होना काम को मंजूर था

जानता था शिव से नामुमकिन है उसका जीतना

 *

हौसले को छोड़ उसने मान आधी हार ली

जंग से पहले ही जो मुश्किल है सोचा जीतना

 *

आदमी कठपुतलियों सा नाचता रहता है बस

वक़्त तय करता है जब क्या हार है क्या जीतना

 *

अय अरुण हर जीत तेरी कितनी आहों से भरी

बुद्ध जैसा खास होता अपने मन का जीतना

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४७ ☆ कविता – हस्ती नहीं मिटती… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता  – “हस्ती नहीं मिटती… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४७ ☆

✍ कविता – हस्ती नहीं मिटती… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कुछ थीं ऐसी बातें

कुछ थीं ऐसी जरूरतें

कुछ थीं विवशताएँ

कुछ खुशियाँ भी थीं।

 

कुछ मनपसंद

कुछ नापसंद

कुछ किसी की पसंद

कुछ किसी को पसंद।

 

कुछ चहेते चेहरे

कुछ अनचहेते चेहरे

कुछ अपने

कुछ पराये

कुछ अपने साथ

कुछ सबके साथ।

 

कुछ जीते चले गए

कुछ जीकर चले गए

कुछ अकेले जिए

कुछ साथ-साथ जिए।

 

कुछ तो बात है जीने में

कि हस्ती नहीं मिटती।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२९ – खनके चिड़ियों के कंगन ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण रचना “खनके चिड़ियों के कंगन“।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२९ – खनके चिड़ियों के कंगन ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

आँख ऊषा ने खोली

खनके चिड़ियों के कंगन

*

किरणें रहीं टटोल

गेह के कोने-कोने को

रातों के प्रहरी उलूक

जाते हैं सोने को

आंगन में आगया, महकता

सुरभित वृंदावन

*

करती हवा ठिठोली

कलियों ने घूँघट खोले

सगुनौती पढ़ रहा

मुँडेरों पर कागा बोले

बड़े-बड़े हो गये

खुशी से, फूलों के लोचन

*

छन्द किसानों ने लिख डाले

हल से धरती पर

स्वप्न ऊगने लगे सुनहरे

बंजर पड़ती पर

धरती पर उतार लाये

ज्यों कृषक गंध मादन

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आत्ममुग्ध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आत्ममुग्ध ? ?

हवा से फूलकर

गुब्बारा  कुप्पा हुआ,

पिन चुभने भर की देर थी

किया-धरा धराशायी हुआ,

आत्ममुग्धता की हवा भरती है

तब सच की पिन चुभती है,

फूटा गुब्बारा बिना दाम का

आत्मघाती मोह किस काम का?

?

© संजय भारद्वाज  

प्रात: 10:06 बजे, 2.11.20

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०२ – सदियों से हमने किया… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सदियों से हमने किया”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०२ – सदियों से हमने किया… ☆

☆

सदियों से हमने किया, विश्व शांति का जाप।

जल थल नभ पाताल के, दूर किये संताप।।

 *

वैदिक मंत्रों को जपा, औ गाया नित गान।

आदिकाल से तब बनी, भारत की पहचान।।

 *

विश्व शांति सद्भावना, से ही जग उद्धार।

खुशहाली की थाप संग,संकट हटें हजार।।

 *

संस्कृतियाँ बसती रहीं, सदा मिला सम्मान।

अतिथि देव होता यहाँ, जग जाहिर पहचान।।

 *

शांति शक्ति आराधना, हिन्दुस्ताँ के स्त्रोत।

भारत का दर्शन रहा, सदियों उड़े कपोत।।

 *

पवन मेघ गिरि वृक्ष सब, ईश्वर के उपहार।

इन सबकी आराधना, संस्कृति के आधार।।

 *

विक्रमादित्य चाणक्य से, सूरवीर गंभीर।

राणा साँगा क्षत्रपति, पोरुष से हैं वीर।।

 *

अवतारों की भूमि है, ऋषियों का यशगान।

भारत में मिलकर सभी, गाते मंगल गान।।

 *

राम कृष्ण गौतम शिवा, नानक व महावीर।

भारत धरती धन्य है, सूफी संत फकीर।।

 *

वेद और उपनिषद में, विश्व शांति संदेश।

ज्ञान योग विज्ञान में, पारंगत यह देश।।

* 

राष्ट्रसंघ में छा गया, अपना अनुपम देश।

लुभा रहा है विश्व को, भारत का गणवेश।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मांदियाळी… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ मांदियाळी… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

☆

विठ्ठलाने द्यावे

अमृताचे घोट

शंकराने प्यावे

ओमरुप लोट.

*

कधी योग येतो

ऐसा मनी संत

भरोनीया देतो

प्रेम ते अनंत.

*

म्हणोनी करावा

एक वेळ काला

कृष्ण शिव ब्रम्ह

भक्ती भाव झाला.

*

तैसे भेटे मित्र

मांदियाळी वारी

गीता ज्ञान भक्ता

मार्गशिर्षा दारी.

 ☆

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६४ – मूर्तियाँ चुप है ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – मूर्तियाँ चुप है…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६४ – मूर्तियाँ चुप है ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

लेनिन

गाँधी

मूर्तियाँ चुप हैं

श्यामा प्रसाद मुखर्जी

सुभाष और

पेरियार

तोड़ी जा रही हैं मूर्तियाँ

एक के बाद एक ।

मूर्तियाँ चुप हैं

शायद आँखें नम हों ।

और बकबका रहे हैं लोग

नहीं नहीं

ये वो लोग हैं

खण्डित हैं जिनके विचार और चरित्र

इनके मन का आवेश

बना देना चाहता है

खण्डित मूर्तियों का देश ।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६३ – “जैसे हवा कहा करती है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “जैसे हवा कहा करती है–...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “जैसे हवा कहा करती है-...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

गुजरा जब-जब तेरे घर  से ।

देहरी तनी तनी मिलती थी-

और किबाड़ दिखे ज्यों फरसे ॥

* 

खूँटी हँसी उड़ाती देखी

मुँह बिचकाते देखे आले ।

बाहर से दिखते आँगन की

सीमाओं पर लटके ताले ।

 *

कठिन रास्ता था वह जैसे –

आ  उलझे हम किसी भँवर से ॥

 **

जहाँ खड़े होते थे सज कर

वहाँ मौन पसरा था उत्कट ।

वहीं प्रतीक्षा कहती आयी

अटकी अटकी आँखों के तट ।

 *

जैसे हवा कहा करती है

आहिस्ता सोई अरहर से ॥

 **

तेरे चौबारे की ठंडक में

पहचाना आकुल क्षण था ।

जिसकी तह में कहीं न कहीं

एक अघोषित संरक्षण था ।

 *

बुझा बुझा जो रहा किये था –

शंकित, किसी अपरिचित डर से ॥  

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

26-11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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