(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बिरज की ग्वालन की व्यथा…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३ ☆
कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ कविता ☆ स्त्री-वजूद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
वजूद स्त्री का तुम क्या परखोगे?
अनुपस्थिति में तुम्हारी उपस्थिति
माथे पे दर्शायें रखती हूं
कहते हो जिसे देखकर तुम ‘ब्याहता’
सिन्दूर की लाली बना चंद्र सा तुम्हें माथे पे बिठाकर रखती हूं
छोटी-बडी खुशियां क्या?
सौन्दर्य ख्वाहिश और अतंस के पोरों पोर तक सौंप
दूजे आंगन को देखो मैं स्त्री इठलाती हूं
वजूद तेरा चलाने को
पीड़ा सह जाती हूं
धो लेती मैल कपडों संग व कैक्टस गमले में लगा लेती हूं
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अभिनंदन करें हम…!
☆ ॥ कविता॥ अभिनंदन करें हम…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आस्था और ग्रीन मोटिवेशन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २६७ ☆आस्था और ग्रीन मोटिवेशन… ☆
आस्था… यह केवल पूजा की थाली में रखे दीपक की लौ नहीं होती,
आस्था वह शक्ति है जो मनुष्य को अंधेरों में भी रोशनी ढूँढने की प्रेरणा देती है।
और हरियाली… यह केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं,
यह धरती का प्राण, प्रकृति की धड़कन और हमारे जीवन की ऊर्जा है।
आस्था और हरियाली जब एक साथ जुड़ते हैं,
तो मनुष्य के भीतर एक अद्भुत शक्ति जन्म लेती है।
यही शक्ति है ग्रीन मोटिवेशन।
आस्था हमें जोड़ती है, हरियाली हमें जीवित रखती है
जब हम किसी मंदिर, किसी वृक्ष, या किसी पवित्र स्थल पर जाते हैं,
तो मन अपने आप शांत हो जाता है। क्यों?
क्योंकि प्रकृति के साथ किया गया हर संपर्क,
हमें हमारे मूल से जोड़ता है।
धरती माता से जुड़ी यह भावना ही आस्था है।
और जब इसी आस्था में हम हरियाली का संकल्प जोड़ते हैं,
तो यह आस्था केवल व्यक्तिगत नहीं, समाज का बल बन जाती है।
हर पौधा एक प्रार्थना है, हर वृक्ष एक आशीर्वाद
यदि हम समझ लें कि—
“पेड़ लगाना सिर्फ पर्यावरण का काम नहीं, यह पूजा का एक रूप है।”
तो हर मनुष्य का दृष्टिकोण बदल जाएगा।
एक पौधा लगाना मतलब
धरती को दिया गया श्रद्धा का दीप,
एक वृक्ष को बचाना मतलब
आने वाली पीढ़ियों के लिए आशीर्वाद छोड़ देना।
आस्था का असली अर्थ ही यही है —
जहाँ हम रहते हैं, जिस हवा को साँस लेते हैं,
उसको पवित्र, सुरक्षित और जीवनदायी बनाना।
ग्रीन मोटिवेशन: आत्मा को जगाने वाली प्रेरणा
ग्रीन मोटिवेशन बाहरी नहीं,
यह भीतर उठने वाला वह भाव है जो कहता है—
“मैं बदलूँगा, तो संसार बदलेगा।”
जब मन में आस्था हो और हाथों में कर्म…
तब कोई कठिनाई बड़ी नहीं लगती।
आज का समय हमसे यही मांग करता है कि
हम अपनी आस्था को केवल मंदिर की सीढ़ियों तक न रखें,
बल्कि हर पेड़, हर पौधे, हर पत्ते तक पहुँचाएँ।
धरती हमारी माता है, और माता को केवल पूजा नहीं, सुरक्षा चाहिए
हम रोज़ माँ को प्रणाम करते हैं,
पर उसी धरती-माता के आँगन में
यदि कूड़ा फेंक दें, पेड़ काट दें,
तो यह कैसी आस्था?
सच्ची भक्ति वही है जिसमें
हम धरती को हरा-भरा रखें,
हवा को स्वच्छ और जीवन को संतुलित बनाएँ।
जब आप पौधा लगाते हैं,
धरती आपको आशीर्वाद देती है—
स्वास्थ्य का, मानसिक शांति का, और समृद्धि का।
अन्ततः आस्था यदि दीपक है, तो हरियाली उसकी लौ
आस्था हमें दिशा देती है।
हरियाली हमें जीवन देती है।
और इन दोनों का संगम ही
एक सुंदर, स्वस्थ और संतुलित भविष्य बनाता है।
आपके मन में जो हरियाली के प्रति सम्मान और प्रेम है,
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “रोयें कैसे…” ।)
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अपने से ही एक युद्ध” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १२५ ☆ अपने से ही एक युद्ध ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२९ ☆
ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे…।)
लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
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कर लेते थे दीदार बन्द आंखों से कभी
अब वो बीनाई न रही, ये उम्र का सितम होगा
*
फिज़ा में तहलील महक का इशारा है
तू परीशाँ न हो, वो यहीं कहीं, आस-पास होगा
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सुना है के वो घिरा रहता है रकीबों से
जो वफ़ादार होगा वो ही ईश्क में क़ामयाब होगा
*
लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे
किया है ईश्क, तो भरपूर भरोसा भी जताना होगा
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मलाल न कर ये वक्त भी गुजर जायेगा
चन्द लम्हों कि है बात, अब शम्स जलवागार होगा
*
इतना बेबस भी न हो, कुछ कदम और चल,
यकीन कर, अगले ख़म पर वाके मयकदा खुला होगा
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तू खुशहाल है “हेमंत”, ये महज इत्तेफ़ाक नही
बहुत किया है धूप का सफ़र, ये उसका असर होगा
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बीनाई = आंखों की रोशनी, फिज़ा = वातावरण, तहलील = घुली हुई, रकीब = मुहब्बत में प्रतिद्वंदी, पोशिदा = छिपा हुआ, शम्स = सूरज, ख़म = मोड, वाके = स्थित