हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३ – कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बिरज की ग्वालन की व्यथा…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३ ☆

? कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

दो दिन बीते ,कान्हा नहीं पहुंचे,

काहे नहीं आया, माखन चोर.. ?

🍚

ए ललना.. तू कहां रह गयो,!

 अब तक क्यों ना आयो रे..

अब तो मैंने नीची कर दी,

क्या मटकी हाथ ना आई रे…

राह तक रही मोरी अखियां,

क्यों बिसरा दी मोरी गलियां..

बेसुध हो रहे प्राण हमारे,

बाट जोहते चांद सितारे,

खो गई रुनझुन पायल से,

बयार ना आई अमराई से..

कान्हा अब तो आजा तू..

ना करुं कभी शिकायत,

अब तोरी मेहतारी से…‍‍।

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ स्त्री-वजूद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ कविता ☆ स्त्री-वजूद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

वजूद स्त्री का तुम क्या परखोगे?

अनुपस्थिति में तुम्हारी उपस्थिति

माथे पे दर्शायें रखती हूं

कहते हो जिसे देखकर तुम ‘ब्याहता’

सिन्दूर की लाली बना चंद्र सा तुम्हें माथे पे बिठाकर रखती हूं

छोटी-बडी खुशियां क्या?

सौन्दर्य ख्वाहिश और अतंस के पोरों पोर तक सौंप

दूजे आंगन को देखो मैं स्त्री इठलाती हूं

वजूद तेरा चलाने को

पीड़ा सह जाती हूं

धो लेती मैल कपडों संग व कैक्टस गमले में लगा लेती हूं

तकिया- कुशन मे कवर चढा़ कर

बहुत-सी बातों पे मौन मोहर लगा देती हूं

हहहहहह

ब्याहता हूं

स्त्री हूं

अपनी उपस्थिति सदा छुपा लेती हूं

चार भागों में बाँट भाग्य बनके सृष्टि

हर रिश्ता मन से निभा लेती  हूं

माना, हुआ जन्म निराश

थे बाबा

कलाई भरा भाई का तब

वचनबद्ध भाई हुआ तब

अंतिम-सांसो का संवाद हुआ था तब

सांसों के डोर जब तक टूटें ना

हर बेटी का अधिकार

तेरहवीं मे भी मायका पे होगा तब तक’

रीति-रिवाज के नामों पे

मिलना जुलना होगा

मामा भात भरेगा भाई नाना के नहीं रहने पे तब

दहलीज़ भाई का अधिकार

बहन का जन्म मृत्यु तक अटल सत्य है यह

बेटी के जन्म पे प्रांगण

मौन रहता है हरबार

फिर भी, सुनो एक बात

मै-ब्याहता

हूं स्त्री

तुलसी हूं

वृंदा हूं

निश्चित रूप से कर्त्तव्य वेदी पे चढ़ कर

हिस्से की अपनी दूभ लेकर अपनी

‘बेटी-कुल, खानदान’

का फर्ज निभा जाऊंगी

शुरू किया जो सफ़र गुड़िया से

उफ्फफ

प्रातःकाल से स्वीकृति लेकर सुनो

जेठ की दोपहर की तपिश

भावनात्मक संबंध निभाऊगी

छूटीं छिपी मौन रहेगा वजूद मेरा सदा

मैं स्त्री

स्वयं को खो कर तेरे

नाम से जानी जाऊंगी

पग फेरी के अग्नि से लेकर

मणिकर्णिका तक तेरे हाथों से मुक्ति पाऊंगी।

~ अभिव्यक्ति की स्याही ~

☆

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – घनीभूत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – घनीभूत ? ?

कंठ से फूटता नहीं शब्द

अवाक हो जाता है यकायक,

सोचता हूँ;

कितनी घनीभूत होती होगी

वाणी का अपहरण

करनेवाली पीड़ा,

जो हरे को कर देती है ठूँठ,

अच्छे बोलते-चलते को

कर देती है मूक !

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिनंदन करें हम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अभिनंदन करें हम…!

☆ ॥ कविता॥ अभिनंदन करें हम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

अपनी मातृभूमि का, पुण्यभूमि का,

वंदन करें  हम, अभिनंदन  करें हम।

॰

जहाँ पाप-नाशनी सुरसरि बहती हैं,

दुष्ट- दुर्जनों के अत्याचार सहती है,

उसकी रज का सिर लेपन करें हम।

॰

जिसके उत्तुंग शिखर नभ को छू रहे,

जिससे वन-उपवन महक ख़ुश्बू रहे,

उसके लिए सर्वस्व अर्पण करें हम।

॰

इसकी गरिमा का गुणगान करें हम,

आजादी  ख़ातिर बलिदान करें हम,

जीवन  को  सुरभित चंदन करें हम।

॰

जहाँ भिन्न जाति-धर्मी,जन रहते हैं,

मिल-जुलकर बहुवर्णी जन रहते हैं,

देश हितार्थ जिएँ-मरें प्रण करें हम।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २६७ ☆ आस्था और ग्रीन मोटिवेशन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आस्था और ग्रीन मोटिवेशन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २६७ ☆ आस्था और ग्रीन मोटिवेशन… ☆

आस्था… यह केवल पूजा की थाली में रखे दीपक की लौ नहीं होती,

आस्था वह शक्ति है जो मनुष्य को अंधेरों में भी रोशनी ढूँढने की प्रेरणा देती है।

और हरियाली… यह केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं,

यह धरती का प्राण, प्रकृति की धड़कन और हमारे जीवन की ऊर्जा है।

आस्था और हरियाली जब एक साथ जुड़ते हैं,

तो मनुष्य के भीतर एक अद्भुत शक्ति जन्म लेती है।

यही शक्ति है ग्रीन मोटिवेशन।

आस्था हमें जोड़ती है, हरियाली हमें जीवित रखती है

 

जब हम किसी मंदिर, किसी वृक्ष, या किसी पवित्र स्थल पर जाते हैं,

तो मन अपने आप शांत हो जाता है। क्यों?

क्योंकि प्रकृति के साथ किया गया हर संपर्क,

हमें हमारे मूल से जोड़ता है।

धरती माता से जुड़ी यह भावना ही आस्था है।

और जब इसी आस्था में हम हरियाली का संकल्प जोड़ते हैं,

तो यह आस्था केवल व्यक्तिगत नहीं, समाज का बल बन जाती है।

 

 हर पौधा एक प्रार्थना है, हर वृक्ष एक आशीर्वाद

 

यदि हम समझ लें कि—

“पेड़ लगाना सिर्फ पर्यावरण का काम नहीं, यह पूजा का एक रूप है।”

तो हर मनुष्य का दृष्टिकोण बदल जाएगा।

एक पौधा लगाना मतलब

धरती को दिया गया श्रद्धा का दीप,

एक वृक्ष को बचाना मतलब

आने वाली पीढ़ियों के लिए आशीर्वाद छोड़ देना।

आस्था का असली अर्थ ही यही है —

जहाँ हम रहते हैं, जिस हवा को साँस लेते हैं,

उसको पवित्र, सुरक्षित और जीवनदायी बनाना।

 

 ग्रीन मोटिवेशन: आत्मा को जगाने वाली प्रेरणा

 

ग्रीन मोटिवेशन बाहरी नहीं,

यह भीतर उठने वाला वह भाव है जो कहता है—

“मैं बदलूँगा, तो संसार बदलेगा।”

जब मन में आस्था हो और हाथों में कर्म…

तब कोई कठिनाई बड़ी नहीं लगती।

आज का समय हमसे यही मांग करता है कि

हम अपनी आस्था को केवल मंदिर की सीढ़ियों तक न रखें,

बल्कि हर पेड़, हर पौधे, हर पत्ते तक पहुँचाएँ।

 

धरती हमारी माता है, और माता को केवल पूजा नहीं, सुरक्षा चाहिए

 

हम रोज़ माँ को प्रणाम करते हैं,

पर उसी धरती-माता के आँगन में

यदि कूड़ा फेंक दें, पेड़ काट दें,

तो यह कैसी आस्था?

सच्ची भक्ति वही है जिसमें

हम धरती को हरा-भरा रखें,

हवा को स्वच्छ और जीवन को संतुलित बनाएँ।

जब आप पौधा लगाते हैं,

धरती आपको आशीर्वाद देती है—

स्वास्थ्य का, मानसिक शांति का, और समृद्धि का।

 

अन्ततः आस्था यदि दीपक है, तो हरियाली उसकी लौ

 

आस्था हमें दिशा देती है।

हरियाली हमें जीवन देती है।

और इन दोनों का संगम ही

एक सुंदर, स्वस्थ और संतुलित भविष्य बनाता है।

आपके मन में जो हरियाली के प्रति सम्मान और प्रेम है,

वह स्वयं में एक साधना है।

ईश्वर आपको यह पुण्य भाव सदैव देता रहे।

आपका हर कदम किसी पौधे की तरह

फलता-फूलता रहे।

आस्था भी बने, हरियाली भी रहे

और जीवन हर दिन अधिक उजला होता जाए।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७५ ☆ बाल गीत – मुझे सुनाओ नई कहानी… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७५ ☆ 

☆ गीत – मुझे सुनाओ नई कहानी… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

 मीठा-मीठा बोलो नानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

चीख-चीख कर कभी न बोलो।

वाणी में मिश्री-सी घोलो।

मैं बच्चा करता नादानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

मम्मी डाँटें , तुम भी डाँटो।

मेरा प्यार कभी मत बाँटो।

चलो पार्क में हवा सुहानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

नाना कभी-कभी हैं आते।

लेकिन मेरे मन को भाते।

कभी न करते वे मनमानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

मूड रखें सब हरदम अच्छा।

सभी बड़ों से सीखे बच्चा।

नाना घूँट-घूँट पीते हैं पानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

मम्मा , नानी संग न खेलें।

नाना के संग चलती रेलें।

नाना – सा ना कोई सानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०४ – कविता – ☆ … ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “रोयें कैसे…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०४ ☆

☆ रोयें कैसे… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

सब के सम्मुख रोयें कैसे

मौन सिसकते सोयें कैसे।

*

खारे आँसू नमक हो गए

बिना प्रेम जल धोयें कैसे।

*

आना जाना है उस पथ से

उसमें काँटे बोयें कैसे।

*

खेत काट ले जाते कोई

घर में धान उगोयें कैसे।

*

अंतस में जो घर कर बैठी

उन यादों को खोयें कैसे।

*

एक अकेलापन अपना है

इसमें शूल चुभोयें कैसे।

*

जब निद्रा ही नहीं रही तो

सपने कहाँ सँजोएँ कैसे।

*

सबके बीच बैठकर बोलो

अपने नैन भिगोयें कैसे।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२५ ☆ अपने से ही एक युद्ध ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “अपने से ही एक युद्ध” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२५ ☆ अपने से ही एक युद्ध ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

वह आँखों में लिए सपने

निकल पड़ा है सड़कों पर

उसके सीने में मची हुई है हलचल

प्यार के रंग में सना हुआ

कुछ बन पाने की चाह लिए

एक उत्साह और उमंग के साथ

कि मिलेगी उसे भी मंजिल

पैरों से मिट्टी को उछालता हुआ

अपने वजूद के सामने बौना करता

दुनिया के तमाम अवरोधक

और सहसा बिखर गया वह सपना

टूट गईं उम्मीद की वे लड़ियाँ

आज वह सिर्फ़ एक चेहरा है

जो अक्सर भीड़ में खोकर भी

बहुत अकेला है

अब न उसके पास सपने हैं

और न ही वे आँखें जिन में समाई थी

सारी कायनात संपूर्ण सृष्टि

वह लड़ रहा है अपने से ही एक युद्ध

निरंतर साँसों के शेष होने तक

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२९ ☆ ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२९ ☆

✍ ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

नाम के सिर्फ ये फ़क़ीर हुए

शाह जैसे सभी वज़ीर हुए

 *

वक़्त कैसे गुज़र गया था वो

जब मैं राँझा वो मेरी हीर हुए

 *

बाँटते मुँह को देख उजियारा

लोग सूरज के यूँ सफीर हुए

 *

अपना घर फूंक राह दिखलाने

दूसरे फिर नहीं कबीर हुए

 *

काम आते नहीं गरीबों के

दिल के छोटे बहुत अमीर हुए

 *

ज़िंदा ग़ालिब अदब में है अब भी

शायरी की वो यूँ नज़ीर हुए

 *

मैं हूँ मक़तल में सर है जाने को

लोग  मुझको नहीं बशीर हुए

 *

दफ़्न कर लाश एक लाबारिस

कौन कहता है तुम हक़ीर हुए

 *

कैसे उम्मीद में वफ़ा की करूँ

आँख तुम फेरने में कीर हुए

 *

वक़्त पर काम दे दुआ हरदम

आप बेवक़्त ही अधीर हुए

 *

शायरी के कई घरानों में

कोई ग़ालिब तो कोई मीर हुए

 *

रूह सबकी अज़र अमर होती

खाक़ होने सभी शरीर हुए

 *

शौक़ ही शौक में किये जो शुरु

उस नशे के वही असीर हुए

*

शक्ल उनकी ख़ुदा बदल जाती

रूह से जिनके गुम ज़मीर हुए

* 

उनके गालों पे जो मले जाते

हम अरुण वो नहीं अबीर हुए

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३६ – लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे…।)

✍ लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

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कर लेते थे दीदार बन्द आंखों से कभी

अब वो बीनाई न रही, ये उम्र का सितम होगा

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फिज़ा में तहलील महक का इशारा है

तू परीशाँ न हो, वो यहीं कहीं, आस-पास होगा

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सुना है के वो घिरा रहता है रकीबों से

जो वफ़ादार होगा वो ही ईश्क में क़ामयाब होगा

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लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे

किया है ईश्क, तो भरपूर भरोसा भी जताना होगा

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मलाल न कर ये वक्त भी गुजर जायेगा

चन्द लम्हों कि है बात, अब शम्स जलवागार होगा

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इतना बेबस भी न हो, कुछ कदम और चल,

यकीन कर, अगले ख़म पर वाके मयकदा खुला होगा

 *

तू खुशहाल है “हेमंत”, ये महज इत्तेफ़ाक नही

बहुत किया है धूप का सफ़र, ये उसका असर होगा

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बीनाई = आंखों की रोशनी, फिज़ा = वातावरण, तहलील = घुली हुई, रकीब = मुहब्बत में प्रतिद्वंदी, पोशिदा = छिपा हुआ, शम्स = सूरज, ख़म = मोड, वाके = स्थित

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© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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