हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९५ – गीत – पूरब से चल रहीं हवाएँ… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण गीत “पूरब से चल रहीं हवाएँ…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९५ – गीत – पूरब से चल रहीं हवाएँ…  ☆

(राधेश्याम छंद)

☆

पूरब से चल रहीं हवाएँ।

दीप्तिमान हो गईं दिशाएँ।।

कहलाएँ सोने की चिड़िया ।

फसलें खुशियों की लहराएँ।।

*

हर आँखों के आँसू पौंछें।

भारत के ध्वज को फहराएँ…

**

दुनिया भर के बने चहेते।

अंतरिक्ष की सैर कराते ।।

कीर्तिमान कर बढ़ते जाते।

सूर्य चाँद पर कदम बढ़ाते।।

*

दिशा दिखाएँ मानवता की ।

सबको उन्नति राह सुझाएँ…

**

क्षमताओं में कब हैं पीछे।

महाशक्तियों से हम आगे।।

जाग उठे हैं भारत वासी।

अब प्रगति के बुनेंगे धागे।।

*

बनीं पाँचवीं अर्थ व्यवस्था।

विश्व गुरू बन राह दिखाएँ…

**

दुश्मन सीमा पर है छलता।

करता नित प्रति कारिस्तानी।।

समझाने पर नहीं समझता।

कैसा है वह पाकिस्तानी।

*

मेघ गर्जना करते देखो।

अरि-मर्दन को भुजा उठाएँ….

**

दुनिया में बदनाम रहा है।

चीन हमारा बना पड़ोसी।।

करे हमेशा सीनाजोरी।

धरा हड़पने का है दोषी।।

*

बहिष्कार हो सामानों का।

उसकी आर्थिक शक्ति ढहाएँ…

**

विश्व पटल पर मान बढ़ा है।

सम्मानों का ताज गढ़ा है।।

नहीं युद्ध यह धरा बुद्ध की।

राम राज्य का पाठ पढ़ा है।।

*

हिलमिल कर सबको है रहना।

सारे जग को हमीं लुभाएँ…

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

30/8/24

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५६ – बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५६ – बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया… ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

☆

चाँदनिया ऐसी लगै, ऊजर उन्ना होय।

जैसे कर असमान तुम, ओखों रहीं सुखोय।।

*

दूबर पातर छरछरी, अरी भरी रस रूप।

बानबूट से दिनन में, मिली मुठी भर धूप।।

*

देखत ही गड़ जाय जो, ऐसी पाई दीठ |

तार तार बस्तर करै, निकरै नई मजीठ।।

*

दसन हँसन दूनी करै, करै दाँती काम |

अचरज मानों अधर में, अकसर करै मुकाम।।

*

गोरे मों पे फबत है, बेंदी रंग बिरंग।

ड्योड़ी पे का तिल खड़ो, देख दिवैया दंग।।

*

अधर असरफी हो गये, नैना भये गुलेल।

अब बिनकी का पूँछ नें, बिन के हाथ नकेल।।

*

सुन्दरि जल बिच फँस गई, कसी-कमल की नाल।

भृंगन दल बादल भये, कमल-कली बेहाल।।

*

धन निरधन कौ का कहौं, ऐंसे ऊ के भाग |

निधन धनी को होत है, निरधन पीबै आग।।

*

दै गई न्यौता चंदनिया, आन करौ असनान।

गोरी सें गोरी भयी, जानत सकल जहान।।

*

बेसुध सोई बाँह में, छाँह घनेरी जान।

पल में बीतत रैन जा, पल में होत भियान।।

*

आंगन अँकुरा उठ रये, भये भील के बान |

धुपछैयां सी पैर कें,तानै रैत कमान ॥

*

स्यामल सारी पैर कें,अँगना में मँडराय।

बिजुरी सी बिदकत फिरै, बादर सी बर्राया।।

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५६ – “साखी सारे दृष्टिवंत…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “साखी सारे दृष्टिवंत...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “साखी सारे दृष्टिवंत...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

चोटी जैसे कटि प्रदेश पर

लगा रही ठुमके ।

और रिझाने विवश झूमते

कानों के झुमके ॥

 

माथे की सलवटे सरल

भूगोल रहीं समझा ।

वहीं गाल पर लहराई

कुछ लट करतीं साझा ।

 

और गले से नीचे ठहरे

गोलाई पढ़ते –

कठिन वक्ष थे समझ रहे

नव रिश्ते कुमकुम के ॥

 

जहाँ नाभि तक, उदर

भंवर इतिहास बताती है ।

“साखी सारे दृष्टिवंत”

आलेख सुझाती है ।

 

एक मधुर अतिरेक भौंह से

उतर पसर जाता –

जैसे ढक्कन खुले रह गये

हों मादक रम के ॥

 

लगा पीठ की तरफ कई

दर्पण हों आतुर पर ।

रोक रहा आँचल बिम्बों को

लहरा लहरा कर ।

 

वहाँजहाँ केवल कल्पित

सहमे मुहावरे हैं –

ठीक वहाँ हाथों ने थामे

बिन्दु कई चमके ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

0 2 – 11 – 2025

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लेखन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लेखन ? ?

जीवन की वाचालता पर

ताला जड़ गया,

मृत्यु भी अवाक-सी सुनती रह गई,

बगैर ना-नुकर के

उसके साथ चलने का मेरा फैसला,

जाने क्या असर था कि

दोनों एक साथ पूछ बैठे-

कुछ अधूरा रहा हो तो

थोड़ी देर रुकूँ?

मैंने कागज़ के माथे पर

क़लम से तिलक किया,

कहा-

बस आज के हिस्से का लिख लूँ,

…तो चलूँ!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३८ ☆ # “शब्दों में वो मर्म है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “शब्दों में वो मर्म है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३८ ☆

☆ # “शब्दों में वो मर्म है…” # ☆

☆

अब कहां हमारे शब्दों में

वह मर्म है

खोखली रचनाएं

खोखला लेख किए कर्म है

 

होड़  है बाजार में

कैसी मूर्तियां गढ़ें

बुत बनाकर हाकिम की

नजर में चढ़े

सुबह शाम रहें

उनके चरणों में पड़े

बेवजह क्यों

इस व्यवस्था से लड़े

भाट बनकर यशोगान करना ही

अब धर्म है

 

बिकने वाली कलम के

कई खरीददार है

अब लेखन निष्पक्ष नहीं

व्यापार है

धारा के विरुद्ध लिखने वाला

गुनहगार है

कसीदे पढ़ने वालों को

मिलता”पुरस्कार” है

सिक्कों की खनक में डूबने वालों को

कहां शर्म है

 

शब्दों के धनी

यहां कई रचनाकार है

गरीबों का दुख वंचितों की पीड़ा

ही उनका आधार है

सामंती व्यवस्था के विरुद्ध

लिखते बार-बार है

उन पर होते हैं जानलेवा हमले

यह व्यवस्था की हार है

डर जाए जो इन हादसों से

वह अधर्म है

 

किसी न किसी को तो

लड़ना ही पड़ेगा

सुलझाने समस्या

आगे बढ़ना ही पड़ेगा

यह जुर्म है तो

हमें करना ही पड़ेगा

शब्दों की चोट कर

इतिहास गढ़ना ही पड़ेगा

आगे बढ़ो दोस्तों

अभी लोहा गर्म है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ चन्दा के जैसे चमकेगी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘चन्दा के जैसे चमकेगी…‘।)

☆ कविता – चन्दा के जैसे चमकेगी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

सुंदर कविता लिख दूं, मैं भाल पर तुम्हारे,

बिंदिया के जैसी चमकेगी वो भाल पर तुम्हारे,

*

खुशियों की सारी नेमत लिख दूं, ‍

चन्दा के जैसे चमकेगी सुर्ख गाल पर तुम्हारे,

*

सहेज लूं, मुस्कराहट तुम्हारी, पहरा लगा दूं,

तैनात रहे हर पल होठों पर, तुम्हारे,

*

झटकना मत, जुल्फों को, बारिश के मौसम में,

मोती टूट जाएंगे, छुपे हैं जो जुल्फों में तुम्हारे,

*

हंसी तो आ रही होगी, मेरी बातों पर,

हंसोगे गर तो, फूल बरसेंगे, राहों पर तुम्हारे.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ वह मानव रूप में…!… ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – वह मानव रूप में…!

☆ ॥ कविता॥ – वह मानव रूप में…!… ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

दुख में सुख में जो सम रहे,

वह मानव रूप में देवता है।

॰

जो अविचल चलता रहता,

स्याह रात में जलता रहता,

वह अपना लक्ष्य भेदता है।

॰

जो  भेद-भावना से उठकर,

स्वयं जलधर-सा बरसकर,

वह धरा को तृप्त करता है।

॰

सदैव सबका हित सोचता,

दुखीजनों के आँसू पोंछता,

वह  काव्य अमर रचता है।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५४ – नवगीत – देव उठनी एकादशी (गन्ना ग्यारस) ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – नवगीत – देव उठनी एकादशी (गन्ना ग्यारस)।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५४ ☆

☆ नवगीत – देव उठनी एकादशी (गन्ना ग्यारस) ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

देव सोये तो

सोये रहें

हम मानव जागेंगे

राक्षस

अति संचय करते हैं

दानव

अमन-शांति हरते हैं

असुर

क्रूर कोलाहल करते

दनुज

निबल की जां हरते हैं

अनाचार का

शीश पकड़

हम मानव काटेंगे

भोग-विलास

देवता करते

बिन श्रम सुर

हर सुविधा वरते

ईश्वर पाप

गैर सर धरते

प्रभु अधिकार

और का हरते

हर अधिकार

विशेष चीन

हम मानव वारेंगे

मेहनत

अपना दीन-धर्म है

सच्चा साथी

सिर्फ कर्म है

धर्म-मर्म

संकोच-शर्म है

पीड़ित के

आँसू पोछेंगे

मिलकर तारेंगे

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

२८ -११-२०१४

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मुखर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मुखर ? ?

(कविता-संग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता।’)

चलो अबोला तोड़ें,

देर तक बतियाएँ,

उसने कहा था…!

सदियों का मेरा मूक प्रेम,

आज बहुत आहत हुआ था!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८१ ☆ गीत – ।। राष्ट्र के लिये समर्पण ही, उनका अभिमान था।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८१ ☆

☆ ।। राष्ट्र के लिये समर्पण ही, उनका अभिमान था।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆ 

।। 1।।

भारत   के    लौह   पुरुष

सरदार   पटेल  नाम   था।

भारत में  रियासतों    को

मिलाना उनका काम  था।।

भारत   प्रथम उप  प्रधान

मंत्री भारत रत्न थे    वह।

राष्ट्र के लिये समर्पण   ही

उनका       अभिमान  था।।

।। 2 ।।

केवडिया गुजरात में  बनी

मूर्ति विश्व की सबसे  बड़ी।

सरदार वल्लभभाई के दम

पर भारत की इमारत खड़ी।।

उस लौह पुरुष की  जयंती

पर उनको शत शत   नमन।

जिसने भारत की  आज़ादी

के लिए थी    लड़ाई   लड़ी।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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