हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आज की विभिषिका ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ आज की विभिषिका ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

चलें मिसाइल ध्वंस है, बम की है भरमार।

जानें कैसा हो गया, अब तो यह संसार।।

*

आग लगी धनहानि है, बरबादी का दौर।

घातक सबके मन हुए, नहीं शांति पर गौर।।

*

अहंकार में विश्व है, भाईचारा लुप्त।

दिन पर दिन होने लगा, नेहभाव सब सुप्त।।

*

अमरीका इजरायला , और आज ईरान।

नहीं नियंत्रित आज ये, धारें मिथ्या मान।।

*

मध्य-पूर्व में आग है, जीना हुआ मुहाल।

जानें क्योंकर विश्व में, होता रोज़ बवाल।।

*

घातक सबके मन हुए, ख़ूनी हैं अंदाज़।

कपटी सब ही लग रहे, आवेशित आवाज़।।

*

रोक नहीं सकता इन्हें, सारे धारें क्रोध।

नहीं आज इनको रहा, मानवता का बोध।।

*

हिंसा से मिलता नहीं, कुछ भी जग में सोच।

धन-जन की बर्बादियां, करुणा के पग मोच।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उस भील स्त्री की तरह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – उस भील स्त्री की तरह ? ?

पटरियों पर रेल सरपट दौड़ती

अनगिनत निगाहें

झोपड़ी के आगे ठहरती,

तीखे नयन नक्शवाली

गहरी साँवली निर्धन भीलनी,

वक्ष खुले रखती पर

पीयूष पान करते शिशु को ढकती,

निर्वसन आँखें अपलक निहारती

खुले यौवन को कामांध तकती,

पत्थर के सीने पर पटरियाँ

वात्सल्य से लिपट जाती

नवांकुर सींचने के आनंद में

आँखें मींचे मंद-मंद वह मुस्कराती,

रथ पर चढ़ने से रेल में चलने तक

प्रस्तरयुग के डॉटकॉम इरा में ढलने तक

वीभत्स हुई भावना, विकृत हुई वासना

पवित्र रही कामना, विस्तृत हुई उपासना,

माटी से माटी बतियाती रही

रेल आती रही, रेल जाती रही,

नयी संतानें जन्म पाती रही,

आज की माँ कल की लोरी सुनाती रही,

दौर बदला पर नहीं बदला

हथेलियों से भविष्य को थपथपान,ा

अपना जीवनसत्व उसे पिलाना,

आते कल को रास्ता दिखाना

भविष्य के लिये आस्था जगाना,

सच देखता, सच सुनता हूँ

इसलिए कहता हूँ

काल-पात्र-परिस्थिति के परे

मेरी कविता है उस भील स्त्री की तरह।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अकेला ? ☆ भावानुवाद – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? कविता ?

☆ अकेला? ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

(श्री सुहास रघुनाथ जी की मराठी कविता “एकटा ?” का उनके ही  द्वारा हिंदी भावानुवाद. आप उनकी मराठी कविता इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं 👉 मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ एकटा? ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆)

 

“आप अकेले ही रहोगे? “

जब तुम पूछती हो, तब,

सचमुच मुझे आती है हंसी!

 

कहा हूँ मैं अकेला?

साथ में होते हैं ना

ये शब्द, कल्पना और

हमारे ख्वाब!

सचमुच,

हम अकेले ही आये हैं

और अकेले ही जाएंगे

वैसे कितना भी कहो ,

किन्तु, वह सच नहीं है !

 

पैदा होते ही, होते हैं साथ

ख्वाब हमारे उज्वल भविष्य के

और जाते समय

होती है हमारे पास

जीवन भर के यादों की गठरी !

तो बताओ, कैसा हूँ मैं अकेला?

 

भीड़ में तो अकेला नहीं

और एकांत मे भी

मैं अकेला नहीं होता,

मेरे अंदर होती है

एक नगरी ख्वाबों की

और

साम्राज्य स्मृतियों का

तो बताओ

मैं अकेला कैसा?

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८५ – नवगीत – हार-जीत… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हार-जीत

? रचना संसार # ८५ – गीत – हार-जीत…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हम अपनों से हार रहे,

जग की कैसी अजब रीत रे।

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत रे।।

 

सुरभित उर की हैं साँसे,

मादक सावन का समीर है।

जलकण बन आँखे बरसे,

प्रतिपल पिया मिलन अधीर है।।

सेज सजी है सपनों की,

निशदिन गाते प्रेम गीत रे।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

खिली कली भँवरे हँसते,

यौवन इठला रहा आज है।

साँस- साँस है नाच रही,

बतला सजन ये क्या राज है।।

व्याकुल है आलिंगन को,

ऋतु में  कैसी बढ़ी शीत रे ।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

 तिल -तिल मैं तो नित्य जली,         

 अगन लगाती प्रेम ज्वाल भी।

 आँख मिचौली खेलें सब,

  पूछें नहीं कोई हाल भी ।।

  मिलन यामिनी आयी अब,

  घूँघट पट खोलते मीत रे ।।

 

 हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१३ ☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

यादों में बस झूलता, मेरा प्यारा गाँव ।

खूब मजा लेते सभी, ठंडी ठंडी छाँव।।

 *

मिलजुलकर रहते सभी, कच्चे ईट मकान।

साथ सुख – दुख बांट रहे, उनकी है पहचान।।

 *

चलो गाँव की ओर सभी, मिले वहाँ सुख चैन।

याद बहुत आती मुझे, ठंडी – ठंडी रैन।।

 *

आती गर्मी देख लो, तपन बढ़ेगी खूब।

संगी साथी गाँव में, नहीं लगेगी ऊब।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९५ ☆ गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९५ ☆

गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी☆ श्री संतोष नेमा ☆

लेकर हाथ कनक  पिचकारी |

होली   खेलें   कृष्ण   मुरारी ||

झूम-झूम   कर   नाचे   राधा,

निरखें  सखियाँ     बारी-बारी ||

लेकर हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

मिटी  सभी  आपस  की  दूरी।

हुई   कामना   सबकी  वी पूरी।

रँग    खुशी  के  बिखर  रहे  हैं, 

मिली   प्रेम   की   है   कस्तूरी।

 लगे न  युवती आज    कुँवारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

आज   शत्रु  भी  लगता  भाई।

होली    ने    दुश्मनी    मिटाई ।

पढ़ते  आज  सभी  मिल मानो,

सधे   प्रेम   के    अक्षर    ढाई।   

मन   भाए   हैं।  हृदय  बिहारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फूला     टेसू     भी    इतराये |

रंगों    का   मतलब  समझाये।

मन   भाती  फूलों   की  होली ,

रंग – रसायन     हमें  न   भाये।

गारी  आज  लगे  अति   प्यारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फागुन  बौरा  कर  ज्यों  आया |

रंग   प्यार   के  अद्भुत   लाया ||

ढोल – मृदंग  चंग   सब   बाजें,

सबका   हृदय    देख    हर्षाया।   

मिलता  है  “संतोष”  सभी  को,

आज    उड़ेलो    मस्ती    सारी ||

लेकर  हाथ  कनक   पिचकारी |

रँग    खेल   रहे   कृष्ण  मुरारी ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मनवा बैरी…’।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हृदय हो रहा वैराग्य का,

ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,

दौर है आज और अभी में जीने का,

पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,

दुनिया ठहरी निपट निराली,

क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,

अति वृहद विशाल जगत में,

क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,

पल पल बदलती दुनिया में,

ठीक नहीं, तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,

दुश्वार मगर बहुत यह काम,

खुद को समझा लेने का..

खुशियां भर लो जीवन में,

अल्प समय है जीने का…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ खार… ☆ सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’ ☆

सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’

(ई-अभिव्यक्ति में राजस्थान के साहित्य जगत से सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’ का स्वागत. आप लेखन की विभिन्न विधाओं जैसे कविता, कहानी, लघुकथा, लेख, नाटक, संस्मरण, दोहे, नवगीत, हाइकु आदि. में विशेष अभिरुचि है. प्रकाशित पुस्तकों में टोह, एहसास के गुँचे एवं खरोंच (काव्य संग्रह) लोकप्रिय हैं। आपकी रचनाओं का हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं जैसे हिंदी चेतना, अनन्य, कविता कोश, सेतु, अमर उजाला काव्य, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर आदि वेबसाइट एवं पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन होता रहता है। डिजिटल साहित्य की दुनिया में आपकी उपलब्धियों में वेबसाईट / ब्लॉग-1.गूँगी गुड़िया,2.अवदत अनीता, ब्लॉग चर्चाकार: चर्चामंच ब्लॉग विशेष रूप से चर्चित हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘खार…’।)

? कविता – खार… ✍️  सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’ ? ?

🫟🫟

मरुस्थल ने

एक ही बात दोहराई

कि

सूरज ने नहीं,

एक महीन सुराख़ ने

समंदर को सोख लिया।

 

वह सुराख़

पुराना घाव बन जाता है,

जो

कभी पूरी तरह भरता नहीं।

 

वह बस त्वचा बदल लेता है।

भीतर

लावा की पतली नसें

धीरे-धीरे चलती रहती हैं।

 

कभी अचानक

कोई स्मृति

अँगुली रख देती है वहाँ

और त्वचा के नीचे

खारे पानी की एक झील

हल्की-सी काँप उठती है।

 

उसे दवा नहीं चाहिए

उसे बस

एक

अदृश्य ठंडा फाहा चाहिए

जो रिसते हुए स्थान पर

अपना माथा रख दे

और कहे-

“तुम बिखरी नहीं हो,

तुम बस बहुत देर तक

आँधी में खड़ी रही।”

 

पर यहाँ

आकाश ताँबे का है,

धरती तपे हुए शंख-सी।

 

हवा-

अपने ही फेफड़ों में

अटकी हुई साँस है।

 

वह

जो कर्तव्य की लौ में

अपने स्पर्श को तपाकर रखता है,

प्रेम को

अनुशासन की अलमारी में

तह कर देता है।

 

उसकी चुप्पी

लोहे का दरवाज़ा नहीं,

एक ऐसा कुआँ है

जिसकी गहराई में

पानी तो बहुत है

पर रस्सी छोटी है।

 

वह

हर दिन

जिम्मेदारियों की थाली में

अपनी साँस परोसता है,

और रात को

आईने में देखता है

आँखों के नीचे

रेत क्यों जमा है?

 

कभी-कभी

वह अपने ही भीतर

एक मरुस्थल पार करता है।

पाँव जलते हैं,

पर कहीं दूर

धुँधला-सा

एक हरा बिंदु दिखता है।

 

उसी क्षण

मौन में

एक महीन दरार पड़ती है

जैसे शंख के भीतर

मोती बनने की पहली किरकिराहट।

 

उसके होंठ नहीं खुलते,

पर भीतर

कोई कहता है-

“सब ठीक होना

घटना नहीं,

धीरे-धीरे उगना है।”

 

और तब

तपती रेत के नीचे

एक अदृश्य बीज

अपने कठोर खोल को

अंदर से धकेलता है।

 

मौन

शोर से नहीं फूटता,

वह तब फूटता है

जब वह

अपने ही घाव पर

हवा बनकर बैठ जाता है।

 

और उसी क्षण

मरुस्थल की लकीरों में

एक नई रेखा जुड़ जाती है

नसीब की नहीं,

निर्णय की।

© सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’

जयपुर, राजस्थान ईमेल: anitasaini.poetry@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अन्नपूर्णा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अन्नपूर्णा ? ?

खरी दुनिया की

किसी भाषा का कोई शब्द

नहीं लिख पायेगा

वह भाव

जो देखा मैंने

अपने नवजात शावकों

के साथ

अलसाई पड़ी

बकरी की आँखों में,

इन शावकों का बीजारोपण

करनेवाले नर साथी

के अंत से अज्ञात नहीं है वह,

इन्हें, इनसे पहले और

इनके बाद जने जानेवाले शावकों

विशेषकर नर शावकों का भविष्य

उसकी पुतली की कोर में दबे

ललिया गये आतंक में दीखता है,

तब भी निरंतर जनती है

वह शावक

तन में प्राण रहने या

जनने की क्षमता समाप्ति पर

उसी अंत पर पहुँचने तक,

मनुष्यो और मनुष्यों की संतानो!

मुझे दिखता है दृश्य

स्वर्ग से उतरते

उस उड़नखटोले का

जो निश्चित ही

नहीं भेजा गया है

मेरे-तुम्हारे-हमारे या

हम में से किसी के लिए,

ये भेजा गया है

उस बकरी के लिए

जो मेरे-तुम्हारे-हमारे लिए

आजीवन बनी रही अन्नपूर्णा,

और

अन्नपूर्णा का स्वर्ग जाना

किसी भी पंथ में

वर्जित नहीं है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८९ ☆ गीत – तुझको चलना होगा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८९ ☆ 

☆ गीत – तुझको चलना होगा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

धीरे – धीरे बढ़ो मुसाफिर

जीवन है अनमोल।

दुख चाहे जितने भी आएं

मुख में मिश्री घोल।।

 

चलना ही जीवन की नियति

तुझको चलना होगा।

जागो ! उठो दूर है मंजिल

देख स्थिति ढलना होगा।

 

सत, असत की बल्लरियों में

देख कहाँ है झोल।।

 

लक्ष्य बनाकर बढ़ना पथ पर

औ’ स्वयं विश्वास करो।

मृत्यु तो जीवन का गहना

मत रोना कुछ हास करो।

 

पंछीगण को देख निकट से

भोर में भरें किलोल।।

 

जो सोया है, उसने खोया

आँख खोल मत डर प्यारे।

अपनी मदद स्वयं जो करते

उस पर ही ईश्वर वारे।

 

परिभाषा जीवन की अद्भुत

सदैव तराजू तोल।।

 

संशय, भ्रम में नहीं भटकना

यह जीवन नरक बनाते।

द्वेष – ईर्ष्या वैर भाव भी

सदा अँधेरा यह लाते।

 

सच्चाई की जीत लिखी है

आगे होगा गोल।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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