(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। उनके “साप्ताहिक स्तम्भ -साहित्य निकुंज”के माध्यम से आप प्रत्येक शुक्रवार को डॉ भावना जी के साहित्य से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ. भावना शुक्ल जी की स्व. माँ की स्मृति में एक भावप्रवण कविता “सपना”। )
(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की स्वतन्त्रता दिवस पर एक सामयिक कविता “एक सुखद संयोग ”।)
एक सुखद संयोग
70 वर्ष के पश्चात्
धारा 370 व 35 ए
के साथ-साथ वंशवाद
पड़ोसी देशों के हस्तक्षेप से छुटकारा
आतंकवाद से मुक्ति
एक सुखद संयोग
हृदय को आंदोलित कर सुक़ून से भरता
स्वतंत्रता दिवस से पूर्व स्वतंत्रता
15 अगस्त से पूर्व 5 अगस्त को
दीपावली की दस्तक
जो अयोध्या में 14 वर्ष के पश्चात् हुई थी
दीवाली से पूर्व दीपावली
पूरे राज्य में प्रकाशोत्सव
काश्मीर की 70 वर्ष के पश्चात्
गुलामी की ज़ंजीरों से मुक्ति
फांसी के फंदे की भांति
दमघोंटू वातावरण से निज़ात
निर्बंध काश्मीर बन गया केंद्र शासित राज्य
विशेष राज्य का दर्जा समाप्त
लद्दाख के लोगों की
लंबे अंतराल के पश्चात् इच्छापूर्ति
लद्दाख…एक केन्द्र-शासित प्रदेश
एक लम्बे अंतराल के पश्चात्
स्वतंत्र राज्य के रूप में प्रतिष्ठित
भाषा व समृद्धि की ओर अग्रसर
मात्र चोंतीस वर्षीय युवा सांसद
नामग्याल का भाषण सुन
पक्ष-विपक्ष के नेता अचम्भित
मोदी जी,अमित जी व लोकसभा अध्यक्ष
हुए उसके मुरीद
जश्न का माहौल था
पूरे लद्दाख व काश्मीर में
लहरा रहा था तिरंगा झण्डा गर्व से
आस बंधी थी कश्मीरी पंडितों की
उमंग और साध जगी थी
वर्षों बाद घर लौटने की
अपनी मिट्टी से नाता जोड़ने की
उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था
जो छप्पन इंच के सीने ने कर दिखाया
उसकी कल्पना किसी के ज़ेहन में नहीं थी
परन्तु हर बाशिंदा आशान्वित था
एक दिन भारत के विश्व गुरू बनने
व अखण्ड भारत का साकार होगा स्वप्न
अब देश में होगा सबके लिए
एक कानून,एक ही झण्डा
न होगी दहशत, न होगा आतंक का साया
मलय वायु के झोंके दुलरायेंगे
महक उठेगा मन-आंगन
सृष्टि का कण-कण
भारत माता की जय के नारे गूंजेगे
और वंदे मातरम् सब गायेंगे
डा. मुक्ता
पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी, #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com
(प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की रक्षा बंधन के अवसर पर उनकी विशेष कविता वीर बिजूखा और जुगनू जो उन्होने उन वीर जवानों के लिए लिखी है जो अपना जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित कर चुके हैं। रक्षा बंधन पर उनकी विशेष स्मृतियाँ हैं जो हम आपसे साझा कर रहे हैं। उनके ही शब्दों में –
“हमारी स्कूल महाराणी चिमणाबाई हाईस्कूल, बड़ोदा, गुजरात से जहाँ मैंने पढ़ाई की, हर साल सैनिकों के लिए राखी और पत्र भेजे जाते हैं और विद्यार्थी स्वयं राखी बनाते हैं । राखी के संग मैंने यह कविता लिखकर भेजी है। हे माँ भारती के वीर सपूतों! मेरे शूरवीर भाईयों आपको मेरे शत शत प्रणाम हैं। आपके लिए आपकी बहन की ओर से कविता के रूप में मनोगत प्रस्तुत है। ” – सौ. सुजाता काळे )
(रक्षा बंधन के विशेष पर्व पर प्रस्तुत है श्री मच्छिंद्र बापू भिसे जी अपनी बहनों के लिए रचित कविता “राखी की सौंधी सुगंध“। इस रचना के बारे श्री भिसे जी के ही शब्दों में
“मेरी सगी बहन तो नहीं है परंतु मेरी ५ चचेरी बहनों का बहुत प्यार मिला. अब वह तो सरुराल चली गई. कभी वह आती हैं तो कभी पतियाँ. परंतु राखी के पर्व पर भाई का इंतजार करना बहन के लिए सौगात से कम नहीं होता है. अपनी बहनों के इंतजार में रची यह रचना. आपको पसंद जरुर आएगी. यह संदेश मेरी उन सभी बहनाओं के लिए है जो अपने भाई से दूर तो है परंतु दिल के करीब…..” – श्री मच्छिंद्र बापू भिसे)
(अग्रज एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।
कुछ दिनों से कई शहरों में बड़े पैमाने पर सिंथेटिक दूध, नकली पनीर, घी तथा इन्ही नकली दूध से बनी खाद्य सामग्री, छापेमारी में पकड़ी जाने की खबरें रोज अखबार में पढ़ने में आ रही है। यह कविता कुछ माह पूर्व “भोपाल से प्रकाशित कर्मनिष्ठा पत्रिका में छपी है। इसी संदर्भ में आज के साप्ताहिक स्तम्भ “तन्मय साहित्य ” में प्रस्तुत है कविता “किसे पता था….?”। )
का e-abhivyakti में हार्दिक स्वागत है। आपकी अभिरुचिअध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ साहित्य वाचन, लेखन एवं समकालीन साहित्यकारों से सुसंवाद करना- कराना है। यह निश्चित ही एक उत्कृष्ट एवं सर्वप्रिय व्याख्याता तथा एक विशिष्ट साहित्यकार की छवि है। आप विभिन्न विधाओं जैसे कविता, हाइकु, गीत, क्षणिकाएँ, आलेख, एकांकी, कहानी, समीक्षा आदि के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं एवं ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। आप महाराष्ट्र राज्य हिंदी शिक्षक महामंडल द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी अध्यापक मित्र’ त्रैमासिक पत्रिका के सहसंपादक हैं। आपने हमारे आग्रह पर यह साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज प्रारम्भ करना स्वीकार किया है, इसके लिए हम आपके आभारी हैं। आज प्रस्तुत है उनकी कविता “खुशी तुझे ढूंढ ही लिया”।
(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जीसुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता “चले जाने तलक”। )
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 4