हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०५ ☆ भावना के दोहे  – माँ ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी जी को समर्पित – भावना के दोहे  – माँ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०५ – साहित्य निकुंज ☆

डॉ गायत्री तिवारी 

☆ भावना के दोहे – माँ ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

माँ का आँचल साथ है, मिलती शीतल छाँव।

बच्चों की मुस्कान माँ, चरणों में है ठाँव।।

 *

 माँ का प्यार मिले हमें, माँ ममता की छाँव ।

आँचल माँ का ओढ़कर, साथ घूमे हम गाँव।।

 *

माँ का आँचल हैं नहीं, याद करें दिन रात।

संस्कार अच्छे दिए, यही करें हम बात।।

 *

वो दिन हम भूले नहीं, छोड़ा माँ ने साथ।

लहर- लहर आँचल उड़ा, उठता सिर से हाथ।।

 *

जब जब देखा स्वप्न में, प्यार भरी मुस्कान।

पाकर अपने साथ में, आ जाती है जान।।😢

 *

आँचल की करें कल्पना, है वो बड़ा विशाल।

सुख – दुख बसते सब यहाँ, बना यही है ढाल।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ७ – कविता – सर- ए- आईना… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सर- ए- आईना…‘।)

☆ शशि साहित्य # ७ ☆

? कविता – सर- ए- आईना…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

तू है तो बरस के सारे, मौसम पर हक मेरा है.. 

यह खुशियां मेरी, सारे रंगीन नज़ारे मेरे हैं..

जगमगा रहा है तारों से,

यह लहराता हुआ, आंचल मेरा है..

तितलियां कर रही अठखेलियाँ,

फूलों से महकता गुलशन  मेरा है..

खुद को तलाशने निकली,

सही राह वो मेरी है..

साथ तेरे, मेरा हुआ तो,

धुंधलके सारे खो गए,

उगता हुआ ये, नया आफताब मेरा है..

वार दिया तुझ पर हर पल,

अक्षय ज्योत सा प्रेम है मेरा..

बेखौफ होकर हर बात कह सकूं,

कोई और नहीं, यह “अक्स ” है मेरा…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८७ ☆ बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक – बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८७ ☆

☆ बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

प्रेम भरा जिसने जीवन में, गुरु पद उन खों दें हों

राधे राधे जपा कृष्ण ने, मैं भी अब जप लें हों

जाकी शरण सबहिं जन चाहें, शरण तिहारी जें हों

पूजा पाठ भजन न जानू, प्रेमहिं मन भर लें हों

जब भी मिल हैं श्याम सलोने, देखत ही हरषे हों

भटक रहा है मन माया में, ओखों अब समझें हों

मन “संतोष” धन्य दर्शन से, जनम सफल कर लें हों

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ चरित्र… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

(डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु से साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, दो कविता संग्रह, पाँच कहानी संग्रह,  दो  उपन्यास “फिर एक नयी सुबह” और  “औरत तेरी यही कहानी” प्रकाशित। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। हाल ही में आशीर्वाद सम्मान से अलंकृत । आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता चरित्र… ।)  

☆ कविता ☆ चरित्र… ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ ☆

चरित्र की बात जब भी कही

लोग अच्छे या बुरे की

व्याख्या करने लगे

ज़्यादा बात करने पर

उदाहारण देने लगे

मर्यादा पुरुषोत्तम राम, सीता औ

रावण, लंका भेदी विभीषण का

इतना कम नहीं, धृतराष्ट्र गांधारी को भी नहीं छोड़ा

नहीं बख्शा विदुर को भी करते रहेंगे बतियानेवालें

कई सिर्फ ज्ञान का प्रचार मात्र करना चाहते

कर्मजीवी जानते स्वयं काम करना

कृष्ण, कंस, सभी असुर औ’ द्रौपदी का

दर असल नहीं जानते लोग चरित्र के बारे में

स्वभाव और चरित्र होते अलग अलग

हर नर में बसते नारायण

पाये जाते दोगले चरित्रवाले इन्सान

कई लोग होते सीधे-साधे

जब तक अनुभव नहीं होता

नहीं बता पाता कोई भी इस बारे में

मन की आभा है चरित्र

पवित्रता की मूरत है चरित्र

हम सिर्फ बात करते है आत्मा की

आत्मा-परमात्मा का खेल ही चरित्र

कौन आंक पाया कोई चरित्र को?

कौन निर्धारित कर पाया चरित्र ?

इन्सान का चरित्र कैसा है?

कौन समझ पाया है?

कोई नहीं दे पाया

चरित्र या चरित्रहीन की परिभाषा

कैसे कह सकते हो चरित्रहीन?

नारायण बसते हर व्यक्ति में

निर्धारण करना है मुश्किल

अच्छा या बुरा फिर भी लोग

कह देते आसानी से चरित्रहीन

न जानता उसकी तकलीफ़

नहीं जा पाता उसकी तह तक

नहीं जानते हर व्यक्ति की परेशांनी

पत्थर में हीरा, फूल में कीड़ा पाया जाता

जैसा मित्र वैसा चरित्र कहते नहीं थकते

नदी भी कब पवित्र होती है

प्रदूषित तो नदी भी हो चुकी है

अरे! चांद में भी दाग है

तो भला इन्सान क्या बिसात?

कई व्यक्ति की बातों में गरल

तो कई सीधे मुंह पर बोलनेवाले

किसे अच्छा या बुरा कहेंगे?

हर व्यक्ति का चरित्र अलग- अलग

नारायण ने किया निर्धारित

☆

© डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

सम्प्रति : लेखिका व कवयित्री, सह प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, रामैय्या इन्स्टिट्यूट ओफ बिजनेस स्टडीस, गोकुला, बेंगलूरू

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सेलेक्टिव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सेलेक्टिव ? ?

अधिकांशतः उनका लेखन

केंद्रित होता है स्त्री देह पर,

मन, अंतर्द्वद्व, भावना, वेदना

तो बहुत दूर, जाने क्या है

उन आँखों में कि उभरता ही नहीं

प्रतिबिम्ब, स्त्री के हाथ, पैर,

कंधे, कान, घुटने, टखने,

पेट, पीठ का,

वे आँखें देखती हैं,

…देखती नहीं, वे आँखें घूरती हैं

प्राकृतिक लज्जा को ढके

कुछ ‘सेलेक्टिव‘ हिस्सों को,

कोई बता रहा था-

चर्चित होने के लिए ‘

सेलेक्टिव‘ होना ज़रूरी होता है..,

पर मेरी बात यहाँ समाप्त नहीं हुई है,

सुनो प्रसिद्धि-पिपासुओ !

मैं कलम चलाते रहना चाहता हूँ,

लिखते रहना चाहता हूँ,

लेखक बने रहना चाहता हूँ,

मैं लेखन पर चर्चा कर सकता हूँ

पर चर्चित होने के लिए

‘सेलेक्टिव’ लिख नहीं सकता !

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८० ☆ गीत – आया नूतन वर्ष… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८० ☆ 

☆ आया नूतन वर्ष…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

जोश नया है , नई उमंगें

आया नूतन वर्ष।

जो भी हुआ विगत को भूलें

मन में भर लें हर्ष।।

 

कालचक्र है मौसम जैसा

रोज बदलता है रहता।

संघर्षों में छिपी सफलता

अंतस में झरना बहता।

 

ध्यान , योग ही देता आया

जीवन में उत्कर्ष।

जोश नया है , नई उमंगें

आया नूतन वर्ष।।

 

सेहत अपना साथ निभाए

इससे खुशियाँ हैं आतीं।

खान – पान का ध्यान रहे तो

राहें भी हैं मुस्कातीं।

 

सोच समझकर खर्च करें तो

कभी न सिर पर कर्ज।

जोश नया है , नई उमंगें

आया नूतन वर्ष।।

 

सपने ऐसे पालो मन में

श्रम से पूरे हो जाएं।

लक्ष्य नेक हो , रहे भरोसा

नहीं अपेक्षा मन आएं।

 

धैर्य , शांति मृदु बानी से

होता रहे विमर्ष।।

जोश नया है , नई उमंगें

आया नूतन वर्ष।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०९ – कविता – ☆ ये लोकतंत्र या शोकतंत्र… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “ये लोकतंत्र या शोकतंत्र…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०९ ☆

☆ ये लोकतंत्र या शोकतंत्र… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

वे पाँच साल में याचक बनकर आते हैं

फिर शासक बनकर याचक हमें बनाते हैं

यह कितना अजब खेल है

क्या सचमुच ही ये लोकतंत्र

पर इसके पीछे कितना है विश्वासघात

कितना छल है कितना षड्यंत्र।

 

सब अपनी मर्जी के मालिक

सबके अपने-अपने विभाग

सारी सुविधाओं के भोगी

भाषण में इनके हमें मिले

बलिदान त्याग

कुछ के स्विस बैंकों में खाते

जो कुछ भी ऊपर से पाते

कलपुर्जों के इस कलयुग में

इन सेवा करने वालों के है

ब्लैक मनी के जटिल तंत्र,

कितना छल है कितना षड्यंत्र।।

 

आते हैं संकट इन पर तब

नैतिकता पाठ पढ़ाते हैं

आरोपों से मुँह घुमा फिरा कर

जनता को बहलाते हैं

चक्की में इस महंगाई के

बूढी होती तरुणाई के

दयनीय प्रजा क्या समझ सके

ये राजनीति के कुटिल मंत्र,

कितना छल है कितना षड्यंत्र।।

 

आयोगों पर आयोग बिठा

फिर उन्हें नियंत्रित स्वयं करें

कुछ अपने कुछ उनके प्यादे

कुछ उदासीन कुछ आत्मनिष्ठ

सेवा निवृत कुछ लोग भरें

आयोगों के इस जंगल में जंगल

वोटों के मचते दंगल में

तत्परता से है जुटा तंत्र

कितना छल है कितना षड्यंत्र

सचमुच ही क्या यह लोकतंत्र।।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश कि एक ग़ज़ल # १३० ☆ कड़वी हर एक हक़ीक़त  ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय ग़ज़ल  “कड़वी हर एक हक़ीक़त ” ।)       

✍ जय प्रकाश की एक ग़ज़ल  # १३० ☆ कड़वी हर एक हक़ीक़त ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆ 

आँखों में शर्मो हया रख

थोड़ा तो वादे वफ़ा रख ।

 *

जुर्म की गिरह में मत बँध

जुर्मों को देके सज़ा रख ।

 *

लोग तो हँसेंगे सुनकर

दर्दों को दिल में छुपा रख।

 *

कड़वी हर एक हक़ीक़त

जख्मों की पास दवा रख ।

 *

नेकी बस काम आएगी

ग़ैरों से ख़ुद को जुदा रख।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३५ ☆ बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३५ ☆

✍ बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

ये ख़ुदा ने की कमी अच्छी नहीं

चार दिन की चाँदनी अच्छी नहीं

 *

हर समय की बेबसी अच्छी नहीं

आंखों में  इतनी नमी अच्छी नहीं

 *

बोलना इंसाफ़ की जब माँग हो

आपकी ये ख़ामुशी अच्छी नहीं

 *

सब्र रखिये जब मुसीबत सर पड़ी

देखिये यूँ हड़बड़ी अच्छी नहीं

 *

कुछ शरीफ़ों का सलीका सीखिए

शर्ट की कॉलर खड़ी अच्छी नहीं

 *

अंधभक्ति हो के हो ला-उम्मती

ज़ीस्त ऐसी शेख़ जी अच्छी नहीं

 *

कान के तुम साथ रखना ध्यान भी

हर खबर उड़ती हुई अच्छी नहीं

 *

तू मकाम अपना रियाज़त से बना

इन्हिसारी वक़्त की अच्छी नहीं

 *

खानदानों तक अगर ये जा रही

दोस्त ऐसी दिल्लगी अच्छी नहीं

 *

पास अपनी तुम अना के दो भुला

इस तरह की आज़जी अच्छी नहीं

 *

और के अश्क़ों से जो भीगी हुई

ज़िंदगी में वो ख़ुशी अच्छी नही

 *

छीन लेती है ये ज़र ज़ेवर जमीं

अय अरुण ये काहिली अच्छी नहीं

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४१ – वॉट्सएप्प, इन दिनों…! ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता – वॉट्सएप्प, इन दिनों…!)

✍ वॉट्सएप्प, इन दिनों…! ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

न कबीर, रहीम, रसखान के दोहे,

न ग़ालिब कि गजलें,

न कामायनी पर चर्चा,

और

न कोई यात्रा वृतांत।

किसी

लुटि पिटी बेवा सा लगता है

वॉट्सएप्प, इन दिनों ।

 

सुना है,

ये सब साझा करने वाले हाथ

फरमा रहे हैं आराम

क्योंकि,

ज़ेरे ईलाज

और

दाखिले अस्पताल है

इन दिनों

दोस्त मेरा ।

 

यकीं है मुझे

दिन, दो दिन में

फिर वॉट्सएप्प पर

ताजा दम

लौटेगा,

दोस्त मेरा ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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