हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४९ ☆ कविता – सत्येंद्र के पद… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी रचना  – “सत्येंद्र के पद… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४९ ☆

✍ कविता – सत्येंद्र के पद… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

☆

राधे श्री चरनन शरण में  लीजो।

निज दर्शन हर जग नारि में दीजो ।।

*

आतम तत्व तुम्हीं हो राधे, परमातम है कान्हा।

यह परतीति हृदय मम कीजै, करूं युगल प्रणामा।।

*

 काम क्रोध मद मत्सर जो हो, जारि देउ तुम राधे।

 राधे श्याम दोउ हृदय बिराजो क्षमा करहु अपराधे।।

*

जग बौरानौ भयौ आज कोरोना सबकूं मारे डारै ।

 काल कूट सम भय बिराजो जग जीवित ही मारै।।

*

करि कृपा कटाक्ष श्री राधे, हर लीजे कष्ट हमारे।

मैं जनम जनम जपूं हमेशा, जय श्री राधे राधे।।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३१ – नींद जाने कब खुलेगी ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण कविता “नींद जाने कब खुलेगी “।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३१ – नींद जाने कब खुलेगी ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

बोतलें बिकने लगी हैं

आज पानी की,

गन्ध गायब हो न जाए

रातरानी की!

कैद कूलर में हुई शीतल पवन,

घट गया अमराइयों में

स्वार्थ अपना ही अगन

अस्मिता खतरे में,

छप्पर-छाँव-छानी की!

आंचलिकता है अछूतों की तरह,

रौब है अँग्रेजियत का

रातपूतों की तरह

आ रसोई तक गई

चप्पल लखानी की!

खेत सूखे और प्यासे हैं कुएँ,

बाँझ लतिका, तरू नपुंसक

मेघ सन्यासी हुए

नींद जाने कब खुलेगी ?

राजधानी की!

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

संपर्क – 82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पराकाष्ठा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पराकाष्ठा ? ?

वह नहीं लिख पाया

आज कुछ भी,

आश्चर्य!

उसके लेखन पर

आती रहीं

प्रतिक्रियाएँ तब भी,

शब्दों की भवभूति में

दोनों की अगाध

आस्था होती है,

अ-लिखा बाँच लेना

सर्जक-पाठक

के संबंधों की

पराकाष्ठा होती है!

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 6:30 बजे, 11 अप्रैल 2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०४ – गीत – नए वर्ष में खुशहाली का… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण “गीत – नए वर्ष में खुशहाली का…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०४ – गीत – नए वर्ष में खुशहाली का… ☆

☆

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

जन गण मन को स्वस्थ निरोगी,

सुखदाई परिवेश मिले।

 *

जीवन सबका जगमग दमके,

सुख की हर बदली बरसे।

छल-छद्मों की गिरें दिवालें,

नेह प्रेम चहुँ दिश सरसे।

 *

मानव पर यदि तम घिर जाए,

कभी न उसको क्लेश मिले ।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

नये वर्ष में सुख यश वैभव,

नित नूतन संगीत बजे।

नई सर्जना नई चेतना,

मधुर-मधुर नवगीत सजे।

 *

मिले सभी को तरुवर छाया,

निष्कंटक पथ कानन  हो।

अन्तरघट में बजे बाँसुरी,

मन-भावन वृंदावन हो।

 *

द्वार तुम्हारे चलकर पहुँचें,

कृष्ण-सखा योगेश मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

मिले सुजन-सान्निध्य सभी को,

कलयुग में द्वापर युग हो।

सत्य न्याय का शंखनाद हो,

राम राज्य-सा सतयुग हो ।

 *

हम विकास के पथ पर सबको,

लेकर साथ सदा बढ़ते।

मित्र सुदामा बने अगर तो,

उनका भी मंगल करते।

 *

भटके राही के चिंतन को, 

यथा उचित निर्देश मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

शांति और सद्भाव शीलता,

सदियों से सबकी चाहत।

है वसुधा परिवार हमारा,

दीन दुखी का हो स्वागत।

 *

गीता की अमरित वाणी को,

जग में फिर सम्मान मिले।

हो अखंड कण-कण भारत का,

विश्व गुरू का मान मिले।

 *

पुनर्जन्म जब हो धरती पर,

हमको भारत देश मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

 *

पाँच सदी पश्चात हमारे

राम-लला घर आए हैं।

विश्व जगत में छाईं खुशियाँ,

घर-आँगन मुस्काए हैं।

 *

दो हजार चौबीस शुभंकर

रामराज्य परिवेश मिले।

काशी विश्वनाथ का मंदिर

मथुरा का आदेश खिले।

 *

सत्य सनातन की वाणी को

जागृति का हुँकार मिले।

नए वर्ष में खुशहाली का,

मंगलमय संदेश मिले।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ तर्ज: “जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ तर्ज: “जीते भी लकड़ी, मरते भी लकड़ी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

☆ 

कौन है मेरा, कौन है तेरा

प्रभु ही जाने, जग का फेरा।

 

जहाँ से आए, वहीं जाएँगे,

जग की यारी, छोड़ जाएंगे।

ना कोई रिश्ता, ना कोई नाता,

इंसान अकेला ही जाएगा।

 

कोई ना छोटा, ना ही बड़ा है,

पद–पैसे से इंसान तुला है।

करो ना ईर्ष्या, वैर किसी से,

धन–माया सब छोड़ जाएगा।

 

क्षणभंगुर है ये जग सारा,

मिट्टी का है तन बेचारा।

आज जो अपना लगता सभी को,

यादों में बस ये रह जाएगा।

 

कर ले भलाई, कर ले सेवा,

साथ चलेगी यही तेरी मेवा।

नाम–रूप सब रह जायेंगे,

कर्म ही राह दिखाएगा।

☆

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६६ – शब्द नहीं रहे शब्द – संतान: कैसे हो संस्कारवान ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – संतान: कैसे हो संस्कारवान…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६६ – संतान: कैसे हो संस्कारवान ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

यह युग का प्रभाव है

कि आज

संस्कारों का अभाव है ।

सब दौड़ रहे हैं

भौतिकता की दौड़ में

होकर अंधे

छीलते जा रहे हैं

दूसरों के कंधे ।

सब

सुख-सुविधा पाने को

आकुल व्याकुल हैं

भटक रहे हैं

आशा के आसमान से गिरकर

मृगतृष्णा के खजूर में

लटक रहे हैं।

हमारी लोलुपता

देखती है संतान

फिर कैसे हो संस्कारवान ?

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६५ – “तैरने लगती कुहर के…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “तैरने लगती कुहर के–...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “तैरने लगती कुहर के–...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

शहर से आयी हुई है

सुरा पी कर सुन्दरी

ठण्ड को पहने हुये यह

कँप कँपाती जनवरी

 

पीठ के बस्ते में रख

लायी कई  रिश्ते

सोम मंगल बुध जैसे

पुराने फरिश्ते

 

रिझाने स्कूल के हो

गेट पर ठहरी हुई

आन उतरी सुनहरी

सुहानी कोई परी

 

बाँटती  है वर्फ को

हरतरफ अपनों में

लोग हो जाते चमत्कृत

कई सपनों में

 

तैरने लगती कुहर के

भँवर क्रम में

अँधियारी सुसज्जिता

मनोहारी बाँसुरी

 

यहाँ मौसम मिन्नतें

करता रहा होगा

पूछती ठंडक कि कुछ

तो कहा होगा

 

कुछ पढ़ाने लग गये

है संविधान ऋतु का

काँपते हाथों में जिनके

बस गई है थरथरी               

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

02-01-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संतुलन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – संतुलन ? ?

लालसाओं का

अथाह सिंधु,

क्षमताओं का

किंचित-सा चुल्लू,

सिंधु और चुल्लू का

संतुलन तय करता है

सिमटकर आदमी का

ययाति रह जाना

या विस्तार पाकर

अगस्त्य हो जाना!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “उनका नया साल” – छः कविताएँ ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक । प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर  आपकी कविताएँ “उनका नया साल”का सार्थक विमर्श ।

☆ “उनका नया साल” – छः कविताएँ ☆  श्री जयपाल ☆

☆

=1=

जिनकी छाती पर

शताब्दियों के दर्द का कैलेंडर लटका है

उनके माथे पर

नया साल लिखने से क्या होगा !

 

=2=

उनके लिए

साल नया हो या पुराना

ईश्वर की तरह होता है

जो कहीं दिखाई नहीं देता

 

=3=

साल के पहले ही दिन

नंगे पैर भीख मांगता बच्चा

नये साल में प्रवेश कर रहा है

नंगे पैर ही उसे पार करना है

नए साल का जश्न

 

=4=

बच्चा देखता है

नये साल का कैलेंडर

पेट दबाकर

मां देखती है

पिछले साल का कैलेंडर

आंसू छिपाकर

 

=5=

नये साल में पसर गया है

पिछले साल का सन्नाटा

लोग कहते हैं

साल बदल गया है !

 

=6=

घर में टांग लिया है

नए साल का कैलेंडर

समाज में टंगा है

हजारों साल पुराना कैलेंडर

 

© श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “भूखा बच्चा” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “भूखा बच्चा” पर चर्चा।

☆ कविता  ☆ भूखा बच्चा ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

 

बच्चा झोपड़ी के

बाहर खड़ा

आते जाते

लोगों को

वाहनों को

भरी नजरों से

ताक रहा था

और बाट जोह रहा था

कोई आएगा

भोजन कपड़े कम्बल रजाई

देगा और सर्दी जल्दी

निकल जाएगी

इसी आस में

टक टकी लगाए

खड़ा रहता है

पूरा दिन

☆

श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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