(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कल्पना का सत्य…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ७३ — कल्पना का सत्य —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मैं यह वृत्तांत कल्पना से लिख रहा हूँ, लेकिन मुझे वास्तविक लग रहा है। पिंजड़े में बंद कबूतरी के मर जाने से कबूतर बड़ा उदास रहता था। घर के मालिक ने एक दिन भूल से पिंजड़ा खुला छोड़ दिया और कबूतर उड़ गया। चार दिन बाद वह लौटा। बात ऐसी थी कबूतर ने खुली प्रकृति में अदम्य शक्ति वरण कर ली थी। वह पिंजड़ा उड़ा ले जाने आया था। अब से जोड़ा कबूतर यहाँ बंद न हो।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – स्मृतियाँ
“मेरा दावा है कि स्मृतियाँ केवल मेरी धरोहर हैं”, उसने कहा।
“मैं सहमत हूँ”, उसने माना।
“कितनी आसानी से मान लिया! कभी मेरी कोई स्मृति आकर तुम्हें बेचैन नहीं करती? भीतर जमी बर्फ़ को पिघलाती नहीं? ठहरे पानी में हलचल नहीं मचाती?” इस बार उसके स्वर में आक्रोश था।
“अतीत की कोख से स्मृतियाँ जन्म लेती हैं। जिसने जीवन उसी समय के साथ जिया हो, उसी समय में जिया हो, अतीत को जड़ जमाने ही न दी हो, स्मृतियाँ भला उसकी धरोहर कैसे हो सकती हैं?”..एक उसाँस के साथ उसने उत्तर दिया।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना संपन्न हुई। अगली साधना की सूचना शीघ्र ही दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “अनुत्तरदायित्व… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # २९ ☆
लघुकथा – अनुत्तरदायित्व… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
दीक्षित जी बाहर निकल ही रहे थे कि उनकी पत्नी शीला की आवाज आई, “सुनो, आज स्कूल वैन नहीं आई है जरा उर्वशी को स्कूल छोड़ आओ।” दीक्षित जी थोड़ा ठिठके, उनका अपने मित्रों के साथ बैठने का समय हो रहा था। उन्हें खड़े देखकर शीला बोली, “क्यों क्या हो गया। कभी कभी तो घर की जिम्मेदारी उठा लिया करो।” बहू बेटे काम पर चले जाते हैं। दिन भर मैं घर संभालती हूँ। बाई है तो क्या। रिटायर होने का मतलब घर से, काम से और पेट से रिटायर होना तो नहीं होता न।” दीक्षित जी मोबाइल निकाल कर कोई नंबर ढूढने लगे।
तभी शीला चिल्लाई, “अरे बच्ची तैयार खड़ी है और तुम हिल ही नहीं रहे। स्कूल में वह लेट हो जाएगी। एक दिन तुम गप्पा गुट में लेट हो जाओगे तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।” …..”और हां, लौटते समय कुछ सब्जी लेते आना, घर में कुछ नहीं है।” दीक्षित जी ने उर्वशी का स्कूल बैग उठाया और उसे साथ लेकर नीचे उतरने लगे। नीचे आकर स्कूटर उठाया और स्कूल के लिए चल दिए। लेकिन रास्ते में एक बैंच पर बैठे अपने ज्येष्ठ मित्रों से इशारा करते गए कि मैं अभी आता हूँ।
अपनी पोती को स्कूल छोड़ कर दीक्षित जी आए और सीधे अपने मित्रों के पास चले गए। ऐसा लग रहा था जैसे उनसे बहुत कुछ छूट गया हो। परंतु यह भूल गए कि शीला ने यह कहा था कि लौटते समय कुछ सब्जी लेते आना। रिटायर होने के बाद वे समझते थे कि घर से व घर की जिम्मेदारियों से भी रिटायर हो गए हैं। कुछ तनाव व खीज के साथ वे मित्र-अड्डे पर पहुंचे। मित्र लोग ठहाका मार रहे थे। एक ने पूछा,” दीक्षित जी क्या आज स्कूल वैन नहीं आई?” ” हाँ यार, ये वैन वाले पैसे तो पूरे लेते हैं पर कभी भी बिना बताए आते नहीं।” दूसरे मित्र ने कहा, “ऐसा नहीं है उसने तुम्हारे बेटे को बोल दिया होगा।” ” हो सकता है” कहकर दीक्षित जी मुंह लटका कर बैठे रहे। कोई किस्सा कहानी नहीं, कोई अतीत की बात नहीं। उसी उदासी में उठकर घर की ओर चल दिए।
फ्लैट में घुसते ही शीला बोली, “स्कूल छोड़ कर अब आ रहे हो। और सब्जी?” सब्जी शब्द सुनकर दीक्षित जी अवाक् रह गए। उन्हें अफसोस होने लगा कि वे अपने घर परिवार के प्रति कितने अनुत्तरदायी होते जा रहे हैं। बेटे बहू काम पर निकल जाते हैं पर उन्हें पता नहीं चलता , क्योंकि बिस्तर पर पड़े रहते हैं, नाती पोते स्कूल जाते हैं तो भी उन्हें पता नहीं चलता, क्योंकि तब स्नान, पूजा पाठ में लगे रहते हैं। नाश्ता करने के बाद मित्रों के साथ जा बैठते हैं और दोपहर में आकर खाना खाकर आराम करते हुए सो जाते हैं। शाम को उठते हैं तो चाय पीकर फिर मित्रों के साथ निकल जाते हैं और रात में लौटकर आते हैं तो खाना खा कर सो जाते हैं। यह अलग बात है कि खाना खाते समय बहू बेटे और बच्चों से बात हो जाती है।
उन्हें लगा कि बाहर जाकर मित्रों के साथ बात करते समय जो कहा जाता रहता है कि आजकल बेटे बहू के पास वृद्धों के लिए समय नहीं है, सच नहीं है। सच तो यह है हम वृद्धों ने अपने आपको रिटायरमेंट शब्द की आड़ में ढंक लिया है और काम करने से कतराने लगे हैं। उन्हें बहू बेटे का संघर्ष तो दिखता ही नहीं। उनका उत्तरदायित्व दिखता है पर अपना नहीं। दीक्षित जी उठकर घर की ओर चल दिए। चलते समय हृदय में एक संकल्प सा गूँज रहा था कि वे अब घर के प्रति अनुत्तरदायी नहीं रहेंगे।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अनमोल बंधन।)
रागिनी पुराने फोटो एल्बम देख रही थी। एल्बम की एक-एक फोटो को घंटों निहार रही थी और अतीत की यादों में खो गई थी…
अभी 2वर्ष पहले की ही तो बात है उसके इकलौते भाई को ब्रेन हेमरेज हो गया था। दिन रात उसकी याद में आंसू निकलने लगे। वह सोचने लगी कि राखी में क्यों ना भैया के नाम से राखी में भगवान कृष्ण के मंदिर में जाकर उन्हें ही बंधा दूं।
अचानक वह अतीत से वर्तमान में आ गई और तैयार होकर मंदिर की ओर अपने कदम जल्दी से बढ़ने लगी साथ ही उसने मिठाई भी खरीद ली। दुकान में मिठाई खरीद रही थी तो अचानक उसने देखा कि दुकान में अंकल जी का बेटा बैठा हुआ था जो उसे अपने भाई की तरह ही लग रहा था। पीछे से उसने देखा, उसके मुंह से निकल गया अमित।
उसने कहा दीदी कुछ चाहिए क्या आपको मेरा नाम अमित नहीं अजय है। भैया मैंने मिठाई ले ली है और राखी भी लेकिन तुम मुझे बिल्कुल अपने भाई की तरह लग रहे हो।
आँसू भर कर बोली “भैया”।
इतनी दर्द है जीवन में, क्या-क्या बोलूं? कोई बात नहीं और दुकान से जाने लगी। तभी अजय ने कहा कोई बात नहीं दीदी आप मुझे यह धागा बांध दीजिए क्या मैं आपके भाई जैसा नहीं हूँ?
रागिनी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा आंसू तो अभी निकल रहे थे पर इन आंसू के साथ मुस्कान थी। उसने उसे राखी बांधी और मिठाई खिलाया उसने पैर छूकर एक सुंदर सा पर्स उसे दिया और बोला दीदी मेरी भी कोई बहन नहीं है पिताजी का अकेला ही बेटा हूं इंजीनियर की पढ़ाई बेंगलुरु से कर रहा हूं, अभी छुट्टियों में आया हूं। दुकान से घर के लिए कुछ सामान लेकर आया था कि सभी को अपनी बहन को उपहार देना होगा। शायद आपके लिए ही खरीदा था।
मुझे भी इतना सुंदर रिश्ता मिल गया।
भैया तभी तो लोग भाई बहन के बंधन को अनमोल बंधन कहते हैं।
ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामेश्वरम तिवारीजी का स्वागत.
संक्षिप्त परिचय
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा पुनः मूषको भव।
☆ लघुकथा – पुनः मूषको भव☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
एक दिन बैठे-बिठाए सुबह सवेरे गौरीनंदन गणेश को न जाने क्या झख सूझी कि उन्होंने अपने वाहन मूषक की सेवा से प्रसन्न होकर, उसको मनुष्य होने का वरदान प्रदान कर, चंद दिनों के लिए मृत्युलोक की सैर करने के लिए भेज दिया।
मृत्युलोक में भ्रमण करते हुए मूषक महाशय आर्यावृत में स्थित अवंतिका के परम प्रतापी, लोकप्रिय, न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी और महाकाल की पुण्य नगरी पहुँच गया। अपनी उदार मानवतावादी दृष्टिकोण और चारित्रिक विशेषता का निर्वहन करने वाले सम्राट को जब इस बात का पता चला कि मूषक उसके आराध्य शिव के प्रथम पूज्य विघ्न-विनाशक, लम्बोदर का वाहन है, तो उन्होंने उसको अपनी राज्य सभा में उच्चतम पद पर आसीन कर दिया।
मूषक को राज्य सभा में उच्चतम पद मिलते ही वह अपनी असली पहचान को भूलकर अपने आपको सर्वशक्तिमान प्रभु समझने लग गया। उसने पद की मान-मर्यादा और गरिमा को ताक पर रखकर माननीय न्यायालय और अन्य सभासदों के विरुद्ध अनर्गल आरोप लगाना, प्रलाप करना शुरू कर दिया। अपनी औक़ात को भूलकर देश के अशुभ चिंतकों के साथ मिलकर साज़िशों के ताने-बाने बुनने में लग गया। खुद सिंहासन बत्तीसी पर बैठने की दुरभिसंधि और जुगाड़ बिठाने लग गया।
रिद्धि और सिद्धि दाता का वाहन होने के कारण खुद को बुद्धिमान होने का गुमान हो गया। यानी पद का मद इस कदर उसके सिर पर चढ़ा कि कृपालु, दयालु सम्राट विक्रमादित्य को पदच्यूत करने के लिए दुश्मनों के हाथ की कठपुतली बनकर शकुनि की तरह चालें चलने लग गया।
सम्राट विक्रमादित्य थोड़े दिन तो मूषक महोदय की कारस्तानियों को चुपचाप नज़रअंदाज़ करते रहे, पर जब पानी सिर के ऊपर चढ़ने लगा, उसकी दिनों-दिन बेजा हरकतें बढ़ने लगीं, ख़ुफ़िया सूत्रों से उसकी कारगुज़ारियों की खबरें मिलने लगी, तो उन्होंने बगैर आगा-पीछे सोचे एक झटके में पद से त्याग-पत्र देने को मजबूर कर दिया। बेचारा मूषक जो कि खुद विक्रमादित्य के स्थान पर सम्राट बनने का ख्वाब पाले बैठा था, पर तब तक मूषक के मनुष्य बने रहने की अवधि ख़त्म हो चुकी थी। वह धड़ाम से सैंकड़ों किलोमीटर नीची अतल अँधेरी गहरी खाई में जा गिरा और तत्काल ‘’पुनः मूषको भव’’ की नियति को प्राप्त हो गया।
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा भूल सुधार।
रक्षाबंधन विशेष – लघुकथा – भूल सुधारसुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा
छोटी-छोटी गलियों को पार करने के बाद झोपड़पट्टी नुमा मकान की कतार दिखाई दी. दिए गए पते को खोजते हुए वह अपनी बहन के घर पर पहुंचा.दरवाजा बंद था. घर का ढांचा बयां कर रहा था कि यहां रहने वालों की आर्थिक स्थिति कितनी कमजोर है. छोटी सी खिड़की खुली थी जिससे अंदर से बच्चों के जोर-जोर से चिल्लाने शोर करने की आवाज आ रही थी. उत्सुकता वश वह वहीं खड़ा उन आवाजों को सुनने लगा. एक बच्चा दूसरे से कह रहा था – “अच्छा बता, अभी मामा आएंगे तो हम सबके लिए क्या लाएंगे..?” दूसरा बोला – “मम्मी के लिए साड़ी, हमारे लिए खूब सारे फल, मिठाई, चॉकलेट्स, खिलौने..,.”
“इतना सारा सामान सचमुच मामा लाएंगे ?” पहले बच्चे ने पूछा.
“क्यों नहीं लाएंगे ? अरे तुझे पता नहीं आज राखी है. मामा पहली बार हमारे घर आ रहे हैं उनके पास बहुत पैसे हैं. उनका घर भी हमारे घर से बहुत बड़ा और अच्छा है. “बाहर खड़े भाई का सकपकाहट से बुरा हाल था. अच्छी भली नौकरी है लेकिन वह तो जेब में एक लिफाफे में ₹500 का नोट ही रख कर लाया था बहन को राखी का उपहार देने. अपनी सोच पर वह स्वयं ही शर्मिंदा हो गया. क्या आर्थिक स्थिति को देखकर रिश्ते निभाए जाते हैं? इससे पहले कि दरवाजा खुले वह फौरन पलट गया. तेज तेज कदमों से वापस गाड़ी की ओर बढ़ा और उसे स्टार्ट कर बाजार की तरफ मुड़ गया. साड़ी, मिठाई, फल, चॉकलेट्स तथा खिलौने खरीदने.
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – ककनूस-
‘साहित्य को जब कभी दफनाया, जलाया या गलाया जाता है, ककनूस की तरह फिर-फिर जन्म पाता है।’
उसकी लिखी यही बात लोगों को राह दिखाती पर व्यवस्था की राह में वह रोड़ा था। लम्बे हाथों और रौबीली आवाज़ों ने मिलकर उसके लिखे को तितर-बितर करने का हमेशा प्रयास किया।
फिर चोला तजने का समय आ गया। उसने देह छोड़ दी। प्रसन्न व्यवस्था ने उसे मृतक घोषित कर दिया। आश्चर्य! मृतक अपने लिखे के माध्यम से कुछ साँसें लेने लगा।
मरने के बाद भी चल रही उसकी धड़कन से बौखलाए लम्बे हाथों और रौबीली आवाज़ों ने उसके लिखे को जला दिया। कुछ हिस्से को पानी में बहा दिया। कुछ को दफ़्न कर दिया, कुछ को पहाड़ की चोटी से फेंक दिया। फिर जो कुछ शेष रह गया, उसे चील-कौवों के खाने के लिए सूखे कुएँ में लटका दिया। उसे ज़्यादा, बहुत ज़्यादा मरा हुआ घोषित कर दिया।
अब वह श्रुतियों में लोगों के भीतर पैदा होने लगा। लोग उसके लिखे की चर्चा करते, उसकी कहानी सुनते-सुनाते। किसी रहस्यलोक की तरह धरती के नीचे ढूँढ़ते, नदियों के उछाल में पाने की कोशिश करते। उसकी साँसें कुछ और चलने लगीं।
लम्बे हाथों और रौबीली आवाज़ों ने जनता की भाषा, जनता के धर्म, जनता की संस्कृति में बदलाव लाने की कोशिश की। लोग बदले भी लेकिन केवल ऊपर से। अब भी भीतर जब कभी पीड़ित होते, भ्रमित होते, चकित होते, अपने पूर्वजों से सुना उसका लिखा उन्हें राह दिखाता। बदली पोशाकों और संस्कृति में खंड-खंड समूह के भीतर वह दम भरने लगा अखंड होकर।
फिर माटी ने पोषित किया अपने ही गर्भ में दफ़्न उसका लिखा हुआ। नदियों ने सिंचित किया अपनी ही लहरों में अंतर्निहित उसका लिखा हुआ। समय की अग्नि में कुंदन बनकर तपा उसका लिखा हुआ। कुएँ की दीवारों पर अमरबेल बनकर खिला और खाइयों में संजीवनी बूटी बनकर उगा उसका लिखा हुआ।
ब्रह्मांड के चिकित्सक ने कहा, ‘पूरी तन्मयता से आ रहा है श्वास। लेखक एकदम स्वस्थ है।’
अब अनहद नाद-सा गूँज रहा है उसका लेखन।अब आदि-अनादि के अस्तित्व पर गुदा है उसका लिखा, ‘साहित्य को जब कभी दफनाया, जलाया या गलाया जाता है, ककनूस की तरह फिर-फिर जन्म पाता है।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “मामा जी… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 28 ☆
लघुकथा – मामा जी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
अपने पिता को न देख पाने का दुख मामा जी को देखकर दूर हो जाता था । मयूर के लिए मामा जी ही सब कुछ थे। उसकी पढ़ाई लिखाई और जरूरतों की पूर्ति मामा जी ही करते थे। एक लिहाज से मां और मामा जी मयूर के जीवन के आधार थे। मयूर पढ़ने में होशियार था इसलिए मामा जी उसे अपने बेटे से भी ज्यादा चाहते थे। कभी कभी मामीजी इसे पसंद नहीं करती परंतु अपनी विधवा ननद की मजबूरियों तथा मयूर की होशियारी और अच्छे व्यवहार की वजह से कुछ बोलती नहीं थी। मयूर का घर का नाम बंटी था और मामा जी हमेशा बंटी ही कह कर पुकारते थे। शायद ही कभी मयूर कहकर पुकारा हो।
मयूर जवान हो गया और अपने ही शहर की एक कंपनी में एकाउंटेंट बन गया। मामा जी से सहायता लेने में कमी आती गई और धीरे धीरे बंद हो गई। मामा जी का पुत्र अचानक छोटी सी बीमारी के कारण चल बसा था और मामा जी शरीर से ही नहीं मन से भी कमजोर हो गए। उनकी याददाश्त कम हो गई। आमदनी भी कम हो गई। कपड़े लत्तों का भी ध्यान नहीं रहता। फिर भी मयूर से कोई सहायता स्वीकार नहीं करते थे।
एक दिन चलते चलते वे उस कंपनी के अहाते में चले गए जहां मयूर काम करता था। पता नहीं कैसे उन्हें याद आ गया कि बंटी इसी कंपनी में काम करता है। उनमें कुछ उत्साह का संचार हुआ। पर बंटी का नाम मयूर है यह उन्हें याद नहीं आया। और जो मिलता उससे पूछते कि बंटी कहां है, मुझे उससे मिलना है। मयूर का ऑफिस दूर नहीं था और बाहर होने वाली बातचीत सुनाई देती थी । मयूर ने बंटी शब्द सुना तो चौंक गया। बड़बड़ाया “मामा जी”, उठकर खिड़की से झांक कर देखा। उसके मामा जी ही थे, परंतु वे इतने मैले कुचले कपड़े पहने हुए थे कि बाहर निकल कर उनसे मिलने की उसे हिम्मत नहीं हुई। हृदय में हलचल मची हुई थी कि उसके पालनहार मामा जी उसके सामने हैं और वह मिलने से कतरा रहा है। मामा जी धीरे धीरे अहाते से बाहर निकले और फिर कभी भी मयूर के सामने नहीं आए।
आज भी मयूर बंटी सुनने को तरस रहा है और अपने आप पर पछता रहा है। जब कोई मैले कपड़े पहने कोई वृद्ध उसे दिखाई देता है तो मामा जी समझ मन ही मन प्रणाम करता रहता है।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सब का हिस्सा।)
रानी अपने बच्चों के साथ खाना खा रही थी साथी पतिदेव भी बैठे थे।
रानी के पति अरुणेश ने कहा – “आज बच्चों तुम्हारी मां ने कितनी अच्छी सब्जी बनाई है। क्या भाग्यवान मुझे थोड़ी सी मिल सकती है।“
– “हां सब्जी तो बहुत अच्छी है” – बच्चों ने भी कहा।
तभी रानी ने अपनी कटोरी में से सब्जी अपने पति की थाली में डालना चाहा।
“क्या बात है क्या अंदर कढ़ाई में नहीं है?” अरुणेश ने पूछा।
“नहीं मैंने थोड़ी ही बनाई थी यह सोचकर कि आप सभी को अच्छी लगे ना लगे।“
“कोई बात नहीं हम सभी कम ही खाएंगे। आज से एक बात याद कर लो अपने हिस्से की चीज कभी किसी को मत दिया करो। तुम इस घर की मालकिन हो, ऐसे अपना हिस्सा सबको देने लग जाओगी तो कैसे काम चलेगा? जब बच्चे बड़े हो जाएंगे, कहीं बाहर चले जाएंगे तो आखिर हम तुम अकेले रहेंगे। तुम्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान देना बहुत जरूरी है और आज से एक बात और याद रखो। जब भी कोई सामान खरीदना सबके लिए तो साथ में अपने लिए जरूर खरीदना तुम अपने को क्यों भूलती हो?”
“नहीं तो जीवन में तुम अकेली रह जाओगी। सब का हिस्सा है तो क्या तुम्हारा नहीं है?”
(साहित्यकार सुश्री श्रद्धा जलज घाटे जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. अल्प परिचय स्वरुप – आपने भारतीय स्टेट बैंक में 34 वर्ष सेवाएं देने के पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृति ली। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। साहित्य साधना सतत जारी। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम लघुकथा रिश्तों की आस।)
“मम्मी! नानी हाउस कब चलेंगे? अब तो राखी भी आने वाली है।”
“बेटा! नाना-नानी तो रहे नहीं। आप उसे अब मामा हाउस कहा करिए।”
इतना कहते ही मैं चार माह पहले की स्मृति में खो गई। माँ को दुनिया छोड़े अभी दो माह ही हुए थे, कि पिताजी भी हमें छोड़कर चले गए। भरा घर एकदम से सूना हो गया।
चलते समय भाभी ने बहुत अपनत्व से कहा कि “दीदी! ये माँ के सभी आभूषण हैं। जो मन करे लेते जाइएगा।”
“भाभी! मुझे तो बस ताउम्र पीहर की शीतल बयार चाहिए।’’ रुंधे गले से यह कहकर मैं माँ और पिताजी की एक सुंदर सी तस्वीर ले आई।
आज सुबह भाई का फोन आया। “प्रिया! ये मेरा और तुम्हारी भाभी का राखी पर बुलावा है। तुम्हारे आने की मैंने टिकिट्स करवा दी हैं।’’
स्नेह की पहली शीतल बयार से मन में बड़ा सुकून मिला।
तभी भाई आगे बोले- “इस बार दो-चार दिन रुककर जाना। कुछ पेपर्स, सर्टिफिकेट वग़ैरह हैं जिन पर तुम्हारे साइन होना हैं।’’
” ठीक है भाई।”
पर साइन की बात सुनकर मेरे हृदय को ज़ोर का धक्का लगा। मन कई प्रकार की आशंकाओं से घिर गया।
भाई आगे बोले- ‘’प्रिया! दरअसल माँ-पिताजी की स्मृति में मेधावी छात्रों के इनाम और कुछ प्रतियोगिताएं रखी हैं। सर्टिफिकेट माँ -पिताजी के नाम से ही रहेंगे, पर संस्था चाहती है कि “सौजन्य से” में मेरा भी नाम हो, पर मैं चाहता हूँ कि मेरे साथ तुम्हारा भी नाम हो।’’
“प्रिया! आखिर हम एक ही वृक्ष की दो टहनियां हैं। वे जितने मेरे थे उतने ही तुम्हारे भी थे।’’
” बस! अब जरा जल्दी से आ जाना। बच्चों को भी बुआ का इंतजार है।” कहते हुए भाई भावुक हो गए। उनकी बातें सुनकर मेरी आँखें भी भर आईं।