हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०९ – श्रद्धा सुमन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– श्रद्धा सुमन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०९ — श्रद्धा सुमन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

भारतीय आप्रवासी मजदूरों में से बहुतों ने मॉरिशस में साहसिक जीवन शैली की छाप छोड़ी थी। मैंने उन पर आधारित खूब लिखा है। मैं अपने शब्द लेखन को उनके प्रति श्रद्धा सुमन मानता हूँ। आज मैं आप्रवासी भारतीय मजदूर हल्कू को शब्दों का श्रद्धा सुमन समर्पित कर रहा हूँ। जवान अविवाहित हल्कू बिहार से आया था। वह बेल्ज़ामें नाम के आततायी फ्रांसीसी गोरे जमींदार का बंधुआ सा मजदूर था। उसने किसी तरह युक्ति से बेल्ज़ामें की हत्या की और दूसरे इलाके में भाग गया। उसने वहीं बस कर शादी कर ली। नब्बे बरस के बुढ़ापे में उसकी मृत्यु के दिन उसकी पत्नी ने कहा उसे मालूम था वह एक नीच को जान से मार कर यहाँ आया था। इतने बरस दर बरस दोनों समानता के स्तर पर बड़े ही प्रेमल पति पत्नी हुए। आज जाने वाला उसका पति उसके लिए देवता बन कर चला। इनकी संतान नहीं थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अस्पताल में एक उच्च पद पर कार्यरत महिला ने बच्ची को जन्म दिया । अस्पताल की सबसे सीनियर महिला डाॅक्टर आई और उस।अधिकारी को बुरा सा मुंह बना कर कहने लगी-हमने सोचा था कि आप पढ़ी लिखीं हैं और आपने अल्ट्रासाउंड करवा रखा होगा । पर हमें क्या मालूम था कि आपने भगवान् भरोसे सब कुछ छोड़ रखा है ।

महिला अधिकारी चौंकी । फिर पूछा -यदि मैंने पहले से सब कुछ करवा रखा होता तो फिर क्या फर्क पड़ता?

– कम से कम हमारे स्टाफ को तो इनाम मिल जाता । महिला डाॅक्टर ने बड़ी बेशर्मी से कहा ।

– बस । इसी कारण आपने मेरी नवजात बच्ची का स्वागत् नहीं किया ?

– हां । हमारे स्टाफ को कुछ ऐसी ही उम्मीद थी आपसे ।

– कोई बात नहीं । आप स्टाफ को बुलाइए ।

सारा स्टाफ आ गया और महिला अधिकारी ने सबको इनाम दिया लेकिन उसके बाद अपने पति को बुलाकर अपना सारा सामान समेट लिया । पति ने पूछा -ऐसा क्यों कर रही हो ?

महिला अधिकारी ने पति के गले लगकर रोते कहा -इस अस्पताल में मैं एक पल और नहीं रहूंगी क्योंकि इन लोगों ने मेरी बच्ची का स्वागत् नहीं किया ।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५४ – लघुकथा ☆ पिता की चिंता ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की चिंता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

ट्रेन में बड़ी भीड़ थी, लेकिन देवीदयाल को अपनी बिटिया के घर जाना जरुरी था। बेटी की ससुराल की तरफ से आयी एक खबर ने देवी दयाल को डरा दिया था । उन्हें हर हाल में आज ही अपनी बेटी की ससुराल जाना था । ट्रेन में बहुत भीड़ थी, लेकिन उन्हें हर हाल में ट्रेन पर चढ़ना ही था।

आइए बाबूजी, आप ऊपर आ आइए,यह कहते हुए उस युवक ने देवीदयाल की बांह को पकड़कर ट्रेन के अंदर खींच लियाl बाबूजी आपने अपने इन्हीं हाथों से सुधा का हाथ मेरे हाथ में दिया थाl आप सुधा की चिंता मत कीजिए, उसे कोई भी इस घर से निकाल नहीं सकताl अब वह मेरे पास ही रहेगीl देवीदयाल ने युवक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,बेटा..मेरी यात्रा का उद्देश्य पूरा हो गया, अब अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “भरोसा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆

✍ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

शंकर दयाल जी के रिटायर होने में दो साल बाकी रह गए हैं। उनका बड़ा बेटा राम रतन अभी बारहवीं क्लास में है। दसवीं में अच्छे अंक लाने पर भी बारहवीं में बड़ी मुश्किल से एडमिशन हुआ।

बारहवीं में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की और बिना कोचिंग क्लास के पचानवे प्रतिशत अंक लेकर आया। उसके पिता बहुत खुश हुए। साइंस बायोलॉजी में से उसने साइंस और मैथ्स लिया ताकि वह तकनीकी क्षेत्र में यानी इंजीनियरिंग क्षेत्र में जा सके, परंतु इंजीनियरिंग में एडमिशन से पहले नीट की परीक्षा पास करनी होती है। वह नीट की परीक्षा में शामिल हुआ, परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की। उसे पूरी उम्मीद थी की अच्छे अंकों से में पास हो जाएगा। लेकिन रिजल्ट आने से पहले पता चला की नीट का पेपर लीक हो गया और परीक्षा फल रोक दिया गया। यह देख कर उसका दिल बैठ गया। शंकर दयाल को भी चक्कर आने लगे कि इतना पैसा और मेहनत और नतीजा कुछ नहीं। भविष्य अंधकारमय लग रहा है।

ऐसी स्थिति में वह क्या करें यह समझ नहीं आ रहा। शंकर दयाल भी बहुत दुखी हुए कि उनके बेटे ने इतनी मेहनत की लेकिन वह किसी काम नहीं आई। व्यवसाय करने के लिए उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वह कोई दुकान खोल सके या कोई अन्य व्यवसाय शुरू कर सके। उनकी समझ में नहीं आ रहा है। बड़े बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने बेटी का विवाह टाल दिया। छोटा बेटा जो दसवीं में है उसके लिए क्या करें आगे पढ़ाई किस तरह करें। इसी सोच में डूबे थे कि उनकी पत्नी आई कहा चलो खाना खा लो। ईश्वर सब ठीक करेंगे उनका ही भरोसा है। जो सबके साथ होगा वही हमारे साथ होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन की छाँव।)

☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गर्मियों के दिन के 12:00 बजे थे  बालकनी में झूले में बैठकर रामचंद्र जी अखबार पढ़ रहे।

और अपने गांव को और पुराने दिनों को याद कर रहे थे।

तभी उनकी पत्नी कमला ने आवाज दिया- “अंदर आ जाओ दोपहर में बाहर क्यों बैठे हो  लू चल रही है?”

“कच्चे आम का पन्ना बनाया है अंदर आओ बैठकर पी लो यह गाँव नहीं है जो आम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे?”

रामचंद्र जी ने कहा कमल-” तुम्हें तो पता है कूलर, ए.सी सूट नहीं करता।”

रामचंद्र जी ने गंभीर स्वर में कहा- “कमला इधर आओ मेरे पास बैठो चलो हम गाँव चलते हैं कुछ दिनों के लिए।”

कमला ने कहा- “अब गाँव में क्या रखा है घर की साफ सफाई करनी पड़ेगी बेटे बहू के साथ यही जब रहते हैं हम ठंड में चलेंगे। “

रामचंद्र जी ने कहा- “देखो कमला तुम बातें मत बनाओ तुम्हें नहीं जाना तो मैं जा रहा हूँ यहाँ तो पेड़ फल हुए आम देखने को तरस जा रहा हूँ।”

वैसे तुम्हारी बातों से मुझे शीतल छाया मिलती है लेकिन यहाँ पर घूमने फिरने भी कहाँ  जाऊॅं पार्क में जाओ तो इतनी भीड़ है।

कमला ने मुस्कुराते हुए कहा-

“क्या तुम्हें गाँव में भी छाँव मिलेगी वहां भी तो विकास हो रहा है।”

रामचंद्र जी ने कहा- इस नव विकास के ऑंधी में जीवन की छाँव खोती जा रही है, उनकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ – 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा 2 जून रोटी समारोह ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ ☆

🌻लघु कथा🌻 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ 

एक शानदार होटल में बड़े – बड़े पोस्टरों में रोटी की सुंदर सुंदर तस्वीरें लगा दिखाई दिया। डीजे बजाये जा रहे थे। बढ़िया डेकोरेशन चमचमाते टेबिल कुर्सीयाँ और मदमस्त लोग।

सुरमई शाम और हल्की सी बारिश के बीच मौसम खुशनुमा हो चला। परिवार सहित लोग आते जाते दिखे।

जो आसपास से निकल रहे थे बस भिन्न- भिन्न सजी रोटियों की तस्वीरें देख ठिठक जा रहे थे।

एक महिला दो बच्चों को लिए धीरे- धीरे दरवाजे पर पहुंच गई।

नया होटल खुला है क्या?

एक जोरदार ठहाका–

किसी ने कहा — इसे कौन बुला लिया। इस सेलिब्रेशन में।

महिला ने फिर पूछा — यदि होटल नया है तो किफायती दाम में आज रोटी मिल जायेगी। थोड़े से पैसे है मेरे पास बच्चों का पेट भर जायेगा।

धक्का देते किसी ने कहा — यहाँ दो जून रोटी सेलिब्रेशन हो रहा है। रोटी नही मिलेगी।

दोनों बच्चे पोस्टर पर ललचाते हुए हाथ फेर रहे थे। उनका पसीना शायद दो जून की रोटी के लायक नही बहा था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “आज के हालात” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “आज के हालात” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

2/4 कुछ दिन पहले सोना (Gold) खरीदने की ताकत नहीं होने पर कड़का होने की शर्मिंदगी महसूस होती थी … अब मुझे देश भक्त होने का अभिमान होता है, गर्व होता है ।

आने वाला कल 🙂

मैं, आप और हम जैसे करोड़ों देशभक्तों के बल पर भारत  फिर से अपने स्वर्णिम युग में लौटेगा। फिर से सोने की चिड़िया कहलायेगा। और एक वर्ष बाद हर कड़के स्वर्णता सैनानी क़ो गोल्ड मेडल दिया जायेगा।

(कृपया इस मेसेज को अपने मोबाइल से पैदल-पैदल फारवर्ड करें।)

डीजल बचाइये और सेहत बनाइये✌️

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०८ – अनिवार्य निर्णय… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– अनिवार्य निर्णय…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०८ — अनिवार्य निर्णय — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

एक सुनी सुनायी कहानी पर मेरा विश्वास होने से उसे लिख रहा हूँ ताकि वह सुनी सुनायी न रह कर शब्दों के घेरे में सदा के लिए अडिग रह जाए। धरती रहने से मनुष्य भी तो रहेंगे। यह कहानी मनुष्य के साथ रहे और रह कर उन्हें विवेचन के लिए विवश करे कि किस तरह उन्हें ठगा जाता है और वे होते हैं कि ठगी को शायद भगवानी प्रसाद मान कर स्वीकार कर लेते हैं। नीच अधम साधु नदी के किनारे बैठ कर अपने पाँव धो रहा था। वह आत्म केन्द्रित भाव से इस चिंतन में पड़ा हुआ था कि क्या लोगों से विश्वासघात करने के लिए वह पैदा हुआ था? तभी नदी में एक विशाल धारा प्रकट हुई जो उसे बहा ले गयी। वक्त को यही इंतजार था वह किसी मोड़ पर कमजोर तो पड़े। अन्यथा भक्तों के घेरे में वह बहुत बलिष्ठ होता था। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ मातृत्व ☆ मोहम्मद जिलानी ☆

मोहम्मद जिलानी

(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रतिनिदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – मातृत्व.)

🌱 लघुकथा – मातृत्व🌷

“मां! आखिर तू नाराज़ किस बात से है? दो साल हो गए, तेरा गुस्सा किसी न किसी बहाने हम दोनों पति-पत्नी पर फूटता है। तू चाहती क्या है?” 

सुरेंद्र के स्वर में झुंझलाहट से ज़्यादा थकान थी।

“मैं क्या चाहती हूं, ये तुझे बखूबी मालूम है।” कह कर कमला ने मुंह फेर लिया।

“मां, जो हो नहीं सकता, उसे बार-बार दुहराने से क्या फायदा?” 

“तो सुन ले बेटा! मैं चाहती थी कि तू मेरी पसंद की लड़की से ब्याह करें। पर तूने अपनी ज़िद में उससे शादी की, जिसे मैं पहले ही दिन से नकार चुकी थी।”

“मां, सुनिधि शुरू से तुम्हारी सेवा में दिन रात लगी रहती है… फिर भी तुम हर दिन उसे किसी न किसी बात पर कोसती हो।” 

“बात तो सही है। पर छुरी कितनी भी तेज़ हो, उससे कोई अपना गला तो नहीं कटवाता न?”

सुरेंद्र की आंखें सख्त हो गईं।

“तू अच्छी तरह से जानती है कि मैं तेरा एकलौता बेटा हूं। आज तक तेरी हर बात मानी है। पर इस बार तेरी ज़िद नहीं मान सकता।”

कमला गुस्से में खड़ी हो गई। आवाज़ में अंगारे थे—

“तो सुन सुरेंद्र, अब इस घर में या तो वो रहेगी या मैं।”

यह सुनकर सुरेंद्र भीतर तक हिल गया। खुद को संभालकर धीमे से बोला— 

“ठीक है। मैं कल ही वकील से मिलकर सुनिधि से तलाक की कार्रवाई शुरू करवाता हूं।” 

एक पल रुककर, डूबे हुए स्वर में आगे कहा— “पर मां, इस वक्त उस पर ये सब करना घोर अन्याय होगा… क्योंकि वो मां बनने वाली है। कभी भी खुशखबरी आ सकती है।”

‘मां बनने वाली है’ — ये चार शब्द कमरे की गरम हवा में ठंड़े झोंके की तरह लहरा गये। कमला के चेहरे पर हास्य के रंग छा गये। कड़क आवाज़ एकदम से शांत हो गयी।

आधी रात को सुरेंद्र का मोबाइल बजा। दूसरी तरफ से उसकी सास की आवाज़ आई— “जवाई बाबू… अभी-अभी सुनिधि ने बेटे को जन्म दिया है। तुम बाप बन गए हो।”यह सुनकर सुरेंद्र खुशी से उछल पड़ा। “क्या? यह सच?” 

“अरे! क्या हुआ?” कमला ने हड़बड़ाकर पूछा। 

सुरेंद्र की आंखें चमक उठीं। गर्व से भरकर बोला— “मां, तू दादी बन गई है।”

यह सुनते ही कमला का बुझा चेहरा ऐसे दमक उठा, जैसे किसी ने दिया जला दिया हो। सारा गुस्सा, सारी कड़वाहट एक पल में बह गई। 

“चल उठ! अभी के अभी अस्पताल चलना है। मुझे मेरे पोते का मुंह देखना है।” खुशी से अधीर कमला ने बेटे को लगभग धकेल ही दिया।

अस्पताल पहुंचते ही कमला लपककर वार्ड में घुसी। अपने नन्हे पोते को गोद में उठाया और उसका माथा चूमने लगी.

अपने पति और सास को यूं खुशी से सराबोर देख सुनिधि के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान तैर गई। पर उसकी आंखें भर आईं और

मन ही मन सोच रही लगी—”क्या एक नारी को परिवार और समाज में इज़्ज़त, प्यार और मान पाने के लिए ‘मां’ बनना  ज़रूरी है?”यह

सोचते-सोचते उसकी नज़रे सामने दीवार पर टंगी बाल-कृष्ण और यशोदा मैया की तस्वीर पर जाकर ठहर गई।

© मोहम्मद जिलानी

संपर्क – चंद्रपुर (महाराष्ट्र) मो 9850352608 (व्हाट्सएप्प), 8208302422

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “कार्यवाही” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

हमारा जानने वाले परिवार पर आफत आ गयी। कोई ट्रक उनके घर के पास से निकलता हुआ उनकी चारदीवारी तोड़ गया। चारों ओर समाचार। पुलिस ने कार्यवाही शुरू की। कुछ दिन बाद हम उनके गर गये। पूछा क्या बना पुलिस कार्यवाही का?

-हमने अपनी अर्जी वापस ले ली।

-क्यों?

-पुलिस कार्यवाही के नाम पर आती और चार पानी पीकर चली जाती। हम काम काज करें कि इनकी आवभगत? बस। इसीलिए हमने अर्जी वापस ले ली। अर्जी वापस लेने में ही हमारी भलाई थी।

हम उनकी समझ व अनुभव पर मुस्कुरा दिए।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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