हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा”” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

(आज पिता दिवस पर एक लघुकथा )

शहर के फुटपाथ से लगे बिजली के खम्भे अपनी पीली रोशनी से सारे शहर को चमकातेथे, किन्तु उन्ही खम्भों के नीचे खड़े भिखारियों की खुली हथेलियों पर अंधेरा ही रहता। उनकी हथेलियाँ तो तभी चमकतीं जब कोई दाता उन पर  छोटे या बड़े  पैसों का सिक्का रख देता। तब, ये हथेलियाँ सिक्कों के अनुपात में 25, 40 या 100 पाॅवर के बल्ब के समान चमक उठती। ऐसी ही एक हथेली का नाम रमदू था। यह नाम उसे कब, किसने और कैसे दिया, कोई नहीं जानता। स्वंय रमदू भी नहीं। बचपन से लेकर आज तक इसी खम्भे के नीचे खड़े होकर भीख माँगते-माँगते उसे साठ वर्ष हो गए।

कुछ महीनों से वह सुबह दस बजे और शाम पाँच बजे एक-एक घण्टे के लिए चौराहे पर चला जाता। इस समय चौराहे पर ट्रैफिक जाम रहता। पाँच-पाँच मिनट तक हरा सिग्नल नहीं होता। कारों की लाइनें लग जाती। रमदू इन्हीं कारों के शीशे में अपनी हथेली फैला देता। उसकी अनुभवी आँखें कार व कार मालिकों को पहचानने लगी थीं। अतः उसकी हथेली प्रायः खुली नहीं आती थी। जब ट्रेफिक कम हो जाता, वह अपने खम्भे के पास आ जाता। यदि वहाँ कोई दूसरा भिखारी खड़ा होता तो वह चीख-चीखकर, गालियाँ देकर उसे भगा देता। अक्सर भिखारी उसे देखते ही उसका खम्मा छोड़ देते।

उस दिन भी रमदू ने रुकी हुई कारों में से एक कार में अपनी हथेली फैला दी। क्षणभर के बाद ही उसे लगा कि आज उसने गलत कार चुनी है। इस कार ने कई बार उसे निराश लौटाया है। सेठ बुलाकीदास बड़े कंजूस और चिड़चिड़े व्यक्ति थे।

रमदू अपनी हथेली खींच ही रहा था कि सेठ बुलाकीदास ने उसं रुकने का संकेत दिया और मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकालकर उसकी हथेली पर रख दिया। रमदू ने अपनी लम्बी जिन्दगी में सिर्फ़ सुना भर था कि सौ का नोट कारवालों के पास होता है। आज वह न केवल उसे इतने करीब से देख रहा था, बल्कि उसकी गर्म छुअन भी महसूस कर रहा था। एक अजीब से स्वप्न की तरह कभी सेठ को और कभी नोट को देख रहा था। सेठ ने मुसकुराते हुए कहा- “डरो नहीँ बाबा, रख लो। असली है। जाओ मौज करो। आज मैं पहली बार इस उम्र में बाप बना हूँ। अभी-अभी अस्पताल से खबर आई है कि मेरी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया है। वहीं जा रहा हूँ। बच्चे के लिए दुआ करो बाबा। जाओ मौज करो।”

बुढ़ापे में बाप बनने की कितनी खुशी होती है कि आदमी यह भी भूल जाता है कि वह अपनी खुशी किसके सामने व्यक्त कर रहा है। रमदू ने नोट को अपनी मुट्ठी में कैद कर बन्द मुट्ठी से ही सेठ को हाथ जोड़े। सिग्नल हरा हो गया। रमदू ने सेठ पर दुआ भरी नजर डाल अपना हाथ खींच लिया। कारों के समान रमदू भी सरकते-सरकते सड़क पार की। वह तेजी से अपने खम्भे की ओर बढ़ने लगा। उसका चेहरा मारे खुशी के सेठ बुलाकीदास के चेहरे की तरह चमकने लगा। उसकी मुट्ठी में सौ का नोट है,  उसकी चाल में एक सेठपन आ गया ।

उसने देखा कि उसके खम्भे के नीचे एक मरियल-सा भिखारी खड़ा है। पर आज उसके चेहरे पर गुर्राहट की जगह। मुस्कुराहट खेल रही थी। वह दबे पाँव उस भिखारी के पीछे खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला और पीछे से उस भिखारी की खुली हथेली पर रख दिया। मरियल-से भिखारी ने चौंककर देखा तो वह काँपने लगा। रमदू मुस्कुरा रहा था। उसे मुस्कुराते देखकर वह भय और आश्चर्य से कभी सिक्के को, तो कभी रमदू को देख रहा था। गाली के बजाय रमदू से सिक्का जो मिला। रमदू ने हँसते हुए कहा- “डरो नहीं, आज दिनभर यहीं डटे रहो। तुम भी मौज करो। अपुन आज इस उम्र में पहली बार बाप बना है।” यह कह वह जेब में रखे सौ के नोट को यूँ थपथपाने लगा, मानो वह सौ का नोट नहीं, एक नन्हा-सा शिशु हो।

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर# ११० – लेखक की बेईमानी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– लेखक की बेईमानी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य – भँवर # ११० — लेखक की बेईमानी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

वयोवद्ध सनत से पढ़ना तो छूट ही जाता, लेकिन उन्होंने जारी रखा। बच्चे उनकी रुचि के अनुसार पुस्तकें खरीद लाते थे। चालीस साल पहले की बात थी सनत अपने आंगन में फूल बो रहे थे। तभी एक मोटर खराब हो जाने पर उनके घर के सामने रुकी थी। सनत ने स्वयं मोटर ठीक कर दी थी। उन्होंने एकाकी आदमी को अतिथि स्वरूप चाय पिलायी थी। इस परिवार और घर से प्रभावित आदमी के पूछने पर उन्होंने संघर्षों से भरा अपना जीवन और पारिवारिक अनुराग उसे बताया था। वही लिखा गया था और आज सनत वही पढ़ रहे थे। आदमी से जब बात हुई थी सनत पढ़ने में कमजोर ही थे। उन्होंने कहा था पढ़ना आता नहीं है। आदमी जो एक सुविख्यात लेखक था उनकी अनपढ़ता का लाभ उठा कर उनकी अद्भुत जीवन यात्रा और आदर्श परिवार की कहानी को अपने विशद संस्मरण के नाम से लिखा था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।

लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।

– हूं।

लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।

– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।

– हूं।

लड़की तेज चलती गयी।

बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।

क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?

चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।

पर्दा हटा और ,,,,

लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।

– चाय नहीं लोगे?

लड़का चुप बैठा रहा।

लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।

लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।

– चाय नहीं लोगे?

लड़की ने पूछा।

– फिर कब आओगे?

– अब नहीं आऊंगा।

– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?

और वह खिलखिला कर हंस दी।

लड़के ने पलट कर देखा,,,

लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।

लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।

लड़के में हिम्मत नहीं थी कि उसकी अवज्ञा करता।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ एक कप चाय का जादू ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

माँ ने रसोई से आवाज़ दी- “बेटा, चाय बना दूँ?”

रवि ने थके हुए स्वर में कहा- “हाँ माँ… आज बहुत थक गया हूँ।”

कुछ देर बाद माँ ने उसके हाथ में चाय का कप थमा दिया।

रवि ने एक घूंट लिया।

फिर मुस्कुराकर बोला-

“माँ, पता है… जब भी जिंदगी उलझती है, मुझे लगता है बस एक कप चाय मिल जाए, सब ठीक हो  जाएगा।”

माँ हँस पड़ीं- “चाय में ऐसा क्या है?”

रवि ने कप को देखते हुए कहा- “चाय में सिर्फ दूध, पानी और पत्ती नहीं होती माँ…

उसमें आपका अपनापन, दोस्तों की बातें, बारिश की यादें और मन को सुकून देने वाला थोड़ा-सा प्यार भी घुला होता है।”

माँ चुप रहीं।

और रवि चाय के घूंट के साथ दिनभर की थकान पीता रहा।

तभी उसे लगा- हम सिर्फ चाय नहीं पीते,

उसके साथ रिश्तों की गर्माहट भी घूंट-घूंट पीते हैं।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – थाली और भूख।)

☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शहर के एक आलीशान विवाह समारोह में स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी कतार लगी थी। लोग प्लेटों में जरूरत से ज्यादा खाना भर रहे थे। कोई आधा खाकर छोड़ देता, तो कोई बिना छुए ही डस्टबिन में डाल देता।

भीड़ के बीच खड़े एक शिक्षक यह सब चुपचाप देख रहे थे। तभी उनकी नजर डस्टबिन के पास खड़े एक दुबले-पतले बालक पर पड़ी, जो बची हुई रोटियों को बड़ी उम्मीद से देख रहा था।

शिक्षक उसे अपने पास ले आए और भोजन की थाली देकर बोले,

“लो बेटा, पेट भरकर खाना।”

बालक ऐसे खाने लगा, मानो कई दिनों से भूखा हो। थोड़ी देर बाद उसने दो रोटियाँ चुपचाप अपनी थैली में रख लीं।

शिक्षक ने मुस्कराकर पूछा,

“और भूख लगेगी क्या?”

बालक की आँखें झुक गईं—

“नहीं मास्टर जी… ये मेरी छोटी बहन के लिए हैं। वो घर पर भूखी है। हमारे घर में तो दो जून की रोटी भी हर दिन नहीं बनती…”

बालक की बात सुनकर शिक्षक की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सामने देखा—कुछ लोग नई प्लेट लेने जा रहे थे, जबकि पुरानी प्लेटों में भरा खाना डस्टबिन में पड़ा था।

शिक्षक ने गहरी साँस लेते हुए कहा—

“अजीब पढ़ाई है इस समाज की… डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, पर इंसानियत हर साल फेल हो रही है।”

“यहाँ लोग स्टेटस दिखाने के लिए खाना छोड़ देते हैं, और कोई भूख छिपाने के लिए आँसू पी जाता है।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ – बाल मजदूर (कलूवा) ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बाल मजदूर (कलूवा)”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ ☆

🌻लघु कथा🌻 🪔 बाल मजदूर (कलूवा) 🪔

मिट्टी के दिये बनाये जा रहे थे। लगभग पचास मजदूरों का समुह काम कर रहा था। अपनी माँ के साथ नन्हा कलूवा जो अभी सिर्फ दस वर्ष का हुआ था। आज अपनी माँ के साथ जिद्द से दिये बनाने आ गया था।

ठेकेदार देखते ही बोला— “इसे लेकर आई हो काम क्या करोगी?”

“नही साहेब सब कर लूंगी ये चुपचाप बैठा रहेगा।”

“चल तू भी दिये बना। यदि बना लिया तो नगद राशि भी दूंगा और सबके कपड़ों के साथ महिने भर का राशन भी दूंगा।”

कलूवा मिट्टी ले नन्हें नन्हें हाथों से दिये बनाने लगा। देखते- देखते दिये की ढेरी लगा दिया।

आसपास के सभी मजदूर कहने लगे – “भगवान ही हमें हिम्मत ताकत देता है। आज कलूवा की माँ को नई साड़ी मिल जायेगी। बरसों से तरस  गई थी।”

“कलूवा जैसा दीपक होने के बाद हमारे घर तो उजाला ही होगा।”

ठेकेदार ने मिट्टी से सने नन्हें कलूवा को ह्रदय से लगा लिया।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– मंत्री जी, बड़ा कहर ढाया है ,,,आपने।

– किस मामले में भाई?

– अपने इलाके के एक मास्टर की ट्रांस्फर करके।

– अरे , वह मास्टर? वह तो विरोधी पार्टी के लिए भागदौड़,,,

– क्या कहते हैं हुजूर?

– उस पर यही इल्जाम है।

– ज़रा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे?

– क्यों?

– अपनी आंखों से उस मास्टर को देख लीजिए। जो चल कर आप तक तो पहुंच नहीं पाया। बदकिस्मती से उसकी दोनों टांगें बेकार हैं। और भागदौड़ करना उसके बस की बात कहां? जो अपने लिए भागदौड़ नहीं कर सकता, वह किसी के विरोध में क्या भागदौड़ करेगा?

– अच्छा भाई। तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान बहुत कच्चे होते हैं और आंखें तो होती ही नहीं। खैर। आपने कहा है तो मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा।

खिसियाए हुए मंत्री जी ने कहा जरूर लेकिन आंखों में कहीं पछतावा नहीं था।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५५ – लघुकथा – संशय ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५५ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ संशय ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

महेंद्र को उम्मीद थी कि, वे एक दिन उसके घर जरूर आयेंगें । वह पलक पावड़े बिछाए उनका बराबर इंतजार करता रहता था । अपने मन में वह तमाम ख्वाहिशों को बुनता और सोचता कि अगर वे उनके घर आये तो वह अपनी टूटी चारपाई पर एक फटा ही सही लेकिन सुन्दर साफ बढ़िया सा चादर बिछायेगा। छोटी सी कटोरी में गइया के थोड़े से दूध में जमी मीठी दही खिलायेगा।

कई बार उसे ऐसा लगता था कि वे आज उसके घर की तरफ आ रहे हैं, बस चंद पलों में आ ही जायेगे, ये सब सोच कर उसका मन बाँसो उछलने लगता था ।

वह स्वयं तो रोज उनके घर जाता, उनको नमस्ते कर हालचाल भी पूछता, उनके हर दुख सुख में अपने सामर्थ्य के हिसाब से खड़ा रहताl

पिछले दिनों जब उनके घर में उनका लड़का करोना से बीमार था, तब उनके अपने लोग दूर से झाँक कर चले गए थे, लेकिन महेन्द्र इन बातों से बेफिक्र न सिर्फ उनके घर गया था, बल्कि उनका हाल चाल पूछते हुए बोला था कि बाबूजी, भईया ठीक हो जायेगे, मैंने भईया के लिए हनुमान जी से मन्नत मांगी है ।

भला हो कोरोना का, शायद वह भी उसके प्रेम और समर्पण को समझ गया था, यही कारण था कि चौदह दिन बीतने के बाद उसका नन्हका भी पहले की तरह स्वस्थ होकर किलकारी भर रहा था।

लेकिन महेन्द्र को एक बात समझ में आ रही थी कि वे उसके घर तो नही आते है लेकिन उनके मन में मेरे बाबू के प्रति ममता और प्यार तो जरूर है।

आखिर वे मेरे घर क्यों नही आते है, इस बात का उसे उत्तर नहीं मिल रहा था ।

एक जब उसने थोड़ा दिमाग लगाया, तो उसे हल्का हल्का समझ में आया कि इसमे तो पद और कद का मामला है, जिसके बढ़ने और घटने का संकट या संशय है । बस..बस.. बस यही बात है कि वह नही आते है ।

चलो उनके इस संशय – संकोच पर भी आंच न आये । वे भले ही न आएं, लेकिन उनकी यशकीर्ति और ऊंचाइया छुए, अंततः वह ऐसा सोच कर खुश हो गया थाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२५ ☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कॉलेज के दिनों की बात है। उन दिनों पर्यावरण संरक्षण पर हमें बड़े प्रेरक पाठ पढ़ाए जाते थे। अध्यापक बताते थे कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के आधार हैं। उनकी बातें मेरे मन में इतनी गहराई से उतर गईं कि मैंने निश्चय कर लिया है जीवन में जहाँ भी अवसर मिलेगा, मैं वृक्ष अवश्य लगाऊँगा।

उस दिन के बाद वृक्षारोपण मेरे लिए केवल एक सामाजिक कार्य नहीं रहा, बल्कि एक भावनात्मक दायित्व बन गया। किसी के जन्मदिन पर, किसी के विवाह के अवसर पर या किसी शुभ कार्य के आरंभ में मैं एक पौधा अवश्य लगाता। मुझे विश्वास था कि यदि प्रत्येक व्यक्ति एक-एक वृक्ष भी लगाए, तो धरती की हरियाली कभी समाप्त नहीं होगी।

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। देखते ही देखते कई वर्ष बीत गए। एक दिन मुझे उस गाँव जाने का अवसर मिला जहाँ वर्षों पहले मैंने आम का एक पौधा लगाया था। गाँव पहुँचते ही लोगों ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत किया और खाने के लिए ताज़े आम लाकर रख दिए। आमों का स्वाद अद्भुत था। बातचीत के दौरान किसी ने मुस्कराकर कहा, “ये उसी वृक्ष के फल हैं जिसे आपने वर्षों पहले लगाया था।”

यह सुनते ही मैं कुछ क्षणों के लिए मौन रह गया। मेरी आँखें अनायास उस वृक्ष को खोजने लगीं। सामने एक विशाल आम का वृक्ष खड़ा था, जिसकी शाखाएँ फलों से लदी हुई थीं। मुझे लगा जैसे वह वृक्ष मुझे पहचान रहा हो। बरसों पहले मेरे हाथों से मिट्टी में रोपा गया छोटा-सा पौधा आज एक विशाल वृक्ष बनकर न केवल फल दे रहा था, बल्कि अनेक लोगों को छाया और सुख भी बाँट रहा था। उस क्षण मेरे हृदय में जो संतोष और प्रसन्नता थी, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

लेकिन उसी यात्रा में एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जिसने मन को उदासी से भर दिया। सड़क के किनारे मैंने बरगद, पीपल और आँवले के कई पौधे लगाए थे। मैं उत्सुक था कि वे अब बड़े वृक्ष बन चुके होंगे और राहगीरों को छाया दे रहे होंगे। परंतु जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि सड़क चौड़ी करने के लिए उन सभी वृक्षों को काट दिया गया था। जहाँ कभी हरियाली लहराती थी, वहाँ अब केवल धूल, पत्थर और कंक्रीट दिखाई दे रहे थे।

उन कटे हुए ठूँठों को देखकर ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे अपने परिवार के सदस्य छीन लिए हों। मन भारी हो गया। एक ओर उस आम के वृक्ष की सफलता का आनंद था, तो दूसरी ओर कटे हुए वृक्षों का दर्द। उसी क्षण मुझे अनुभव हुआ कि वृक्ष केवल पेड़ नहीं होते, वे हमारी स्मृतियों, भावनाओं और भविष्य से जुड़े होते हैं।

घर लौटकर मैंने अपने आँगन में लगे उन वृक्षों को देखा जिन्हें मैंने स्वयं रोपा था। वे हवा में झूम रहे थे। उनकी हरी पत्तियाँ मानो मुझे संदेश दे रही थीं-“जो हमें जीवन देता है, हम उसे कई गुना लौटाते हैं।”

मैंने उसी दिन फिर एक संकल्प लिया कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वृक्षारोपण का कार्य कभी नहीं छोड़ूँगा। कटे हुए वृक्षों का दुःख मनाने से अधिक आवश्यक है नए वृक्ष लगाना। क्योंकि वृक्ष केवल हमें ऑक्सीजन नहीं देते, वे आशा देते हैं, जीवन देते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर संसार छोड़ जाते हैं।

आज भी जब उस आम के वृक्ष की याद आती है, तो ऐसा लगता है मानो वह मुझे आशीर्वाद दे रहा हो। तब मेरे मन से एक ही बात निकलती है-वृक्ष लगाना प्रकृति की सेवा ही नहीं, बल्कि आने वाले कल के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६१ ☆ ऐतिहासिक लघुकथा – सत्य का साहस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय ऐतिहासिक लघुकथा ‘सत्य का साहस। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६१ ☆

ऐतिहासिक लघुकथा – सत्य का साहस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆ 

दरबार खचाखच भरा हुआ था। पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री, नारायणराव की हत्या के संदर्भ में अपना निर्णय सुनानेवाले थे।

सत्ता के लोभ में रघुनाथराव ने अपने भतीजे नारायण राव की हत्या करवा दी थी। जनता सच जानती थी लेकिन जल में रहकर मगर से बैर कैसे करे? पेशवा के खिलाफ आवाज उठाने का साहस भी किसी में नहीं था। नारायणराव की हत्या से मन ही मन व्यथित कुछ लोगों ने पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री के पास जाकर न्याय की गुहार लगाई।

राम शास्त्री अपने निष्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने रघुनाथराव पर लगे आरोपों की गहरी जाँच-पड़ताल की और पेशवा के दरबार में अपना निर्णय सुनाया –‘मैं पेशवा राज्य का प्रधान न्यायधीश हूँ। तमाम तथ्यों के आधार पर प्रमाणित होता है कि रघुनाथराव और आनंदीबाई ने मिलकर योजनाबद्ध तरीके से नारायणराव की हत्या करवाई है। सत्य सबके सामने है। महाराष्ट्र की जनता ही आपको दंड देगी, अब मैं आपके राज्य में नहीं रह सकता।‘ यह कहकर वह निडर न्यायधीश वहाँ से चला गया।

पेशवा रघुनाथराव अपने सिंहासन पर बैठे राम शास्त्री को दृढतापूर्वक जाते हुए देखते रह गए।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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