हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१९ ☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाब : बहुत लाजवाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१९ ☆

☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जो नहीं है हमारे पास/ वो ख्वाब है/ पर जो है हमारे पास/ वो लाजवाब है’ शाश्वत् सत्य है, परंतु मानव उसके पीछे भागता है, जो उसके पास नहीं है। वह उसके प्रति उपेक्षा भाव दर्शाता है, जो उसके पास है। यही है दु:खों का मूल कारण और यही त्रासदी है जीवन की। इंसान अपने दु:खों से नहीं, दूसरे के सुखों से अधिक दु:खी व परेशान रहता है।

मानव की इच्छाएं अनंत है, जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं और सीमित साधनों से असीमित इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। इसलिए वह आजीवन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और सुक़ून भरी ज़िंदगी नहीं जी पाता। सो! उन पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। मानव ख्वाबों की दुनिया में जीता है अर्थात् सपनों को संजोए रहता है। सपने देखना तो अच्छा है, परंतु तनावग्रस्त  रहना जीने की ललक पर ग्रहण लगा देता है। खुली आंखों से देखे गए सपने मानव को प्रेरित करते हैं करते हैं, उल्लसित करते हैं और वह उन्हें साकार रूप प्रदान करने में अपना सर्वस्व झोंक देता है। उस स्थिति में वह आशान्वित रहता है और एक अंतराल के पश्चात् अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है।

परंतु चंद लोग ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थाम लेते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और उन्हें यह संसार दु:खालय प्रतीत होता है। दूसरों को देखकर वे उसके प्रति भी ईर्ष्या भाव दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अभावों से नहीं; दूसरों के सुखों को देख कर दु:ख होता है–अंतत: यही उनकी नियति बन जाती है।

अक्सर मानव भूल जाता है कि वह खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ जाना है। यह संसार मिथ्या और  मानव शरीर नश्वर है और सब कुछ यहीं रह जाना है। मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् यह अनमोल जीवन प्राप्त होता है, ताकि वह भजन सिमरन करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सके। परंतु वह राग-द्वेष व स्व-पर में अपना जीवन नष्ट कर देता है और अंतकाल खाली हाथ जहान से रुख़्सत हो जाता है। ‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक रह पाएगा’ और ‘यह दुनिया है एक मेला/ हर इंसान यहाँ है अकेला’ स्वरचित गीतों की ये पंक्तियाँ एकांत में रहने की सीख देती हैं। जो स्व में स्थित होकर जीना सीख जाता है, भवसागर से पार उतर जाता है, अन्यथा वह आवागमन के चक्कर में उलझा रहता है।

जो हमारे पास है; लाजवाब है, परंतु बावरा इंसान इस तथ्य से सदैव अनजान रहता है, क्योंकि उसमें आत्म-संतोष का अभाव रहता है। जो भी मिला है, हमें उसमें संतोष रखना चाहिए। संतोष सबसे बड़ा धन है और असंतोष सब रोगों  का मूल है। इसलिए संतजन यही कहते हैं कि जो आपको मिला है, उसकी सूची बनाएं और सोचें कि कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास उन वस्तुओं का भी अभाव है; तो आपको आभास होगा कि आप कितने समृद्ध हैं। आपके शब्द-कोश  में शिकायतें कम हो जाएंगी और उसके स्थान पर शुक्रिया का भाव उपजेगा। यह जीवन जीने की कला है। हमें शिकायत स्वयं से करनी चाहिए, ना कि दूसरों से, बल्कि जो मिला है उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। जो मानव आत्मकेंद्रित होता है, उसमें आत्म-संतोष का भाव जन्म लेता है और वह विजय का सेहरा दूसरों के सिर पर बाँध देता है।

गुलज़ार के शब्दों में ‘हालात ही सिखा देते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह होता है।’

हमारी मन:स्थितियाँ परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यदि समय अनुकूल होता है, तो पराए भी अपने और दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में अपने भी शत्रु का क़िरदार निभाते हैं। आज के दौर में तो अपने ही अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें तक़लीफ़ पहुंचाते हैं। इसलिए उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए जीवन में विवाद नहीं, संवाद में विश्वास रखिए; सब आपके प्रिय बने रहेंगे। जीवन मे ं इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म में सामंजस्य रखना आवश्यक है, अन्यथा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाएगा।

सो! हमें जीवन में स्नेह, प्यार, त्याग व समर्पण भाव को बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय बना रहे अर्थात् जहाँ समर्पण होता है, रामायण होती है और जहाल इच्छाओं की लंबी फेहरिस्त होती है, महाभारत होता है। हमें जीवन में चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। स्व-पर, राग-द्वेष, अपेक्षा-उपेक्षा व सुख-दु:ख के भाव से ऊपर उठना चाहिए; सबकी भावनाओं को सम्मान देना चाहिए और उस मालिक का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उसने हमें इतनी नेमतें दी हैं। ऑक्सीजन हमें मुफ्त में मिलती है, इसकी अनुपलब्धता का मूल्य तो हमें कोरोना काल में ज्ञात हो गया था। हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं, परंतु इच्छाएं नहीं। इसलिए हमें स्वार्थ को तजकर,जो हमें मिला है, उसमें संतोष रखना चाहिए और निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। हमें फल की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो हमारे प्रारब्ध में है, अवश्य मिलकर रहता है। अंत में अपने स्वरचित गा त की पंक्तियों से समय पल-पल रंग बदलता/ सुख-दु:ख आते-जाते रहते है/ भरोसा रख अपनी ख़ुदी पर/ यह सफलता का मूलमंत्र रे। जो इंसान स्वयं पर भरोसा रखता है, वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि जो नहीं है, वह ख़्वाब है;  जो मिला है, लाजवाब है। परंतु जो नहीं मिला, उस सपने को साकार करने में जी-जान से जुट जाएं, निरंतर कर्मरत रहें, कभी पराजय स्वीकार न करें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९१ – नवगीत – मकड़ी का जाल… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मकड़ी का जाल

? रचना संसार # ९१ – गीत – मकड़ी का जाल…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

जाल मकड़ी का बुना है,

खो गयी संवेदनाएँ।

द्वेष के फूटे पटाखे,

जल रहीं हैं नित चिताएँ।।

*

कर रहे क्रंदन सितारे,

चाँद भी खामोश रहता।

हर तरफ छाया तिमिर की,

अब नहीं कुछ होश रहता।।

आपदा की बलि चढ़े सब,

चल रहीं पागल हवाएँ।

*

शोक घर -घर हो रहा है,

मौत की छाया पड़ी है।

आँधियाँ सुनती नहीं कुछ,

झोपड़ी सहमी खड़ी है।।

छा रही है बस  निराशा,

टूटती सारी लताएँ।

*

भूलती चिड़िया चहकना,

साँस बिखरी कह रहीं अब,

कौन सुरक्षित इस जग में,

पीर अँखियाँ सह रहीं सब

संत्रासों की माया है ,

छा गईं काली घटाएँ।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१९ ☆ भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

संकट भारी आ पड़ा, धरा बचा लो आज।

मानव प्रकृति सहेजना, फिर शोभित सब काज।।

 *

बहुत बढ़ी अवहेलना, जगत हुआ है त्रस्त।

नर जीवन अनमोल है, इसे न करना पस्त।।

 *

होती फिर बंजर धरा, पर्वत जंगल नाश।

आने वाली पीढ़ियाँ, फिर ढोएँगी पाश।।

 *

नजर जहाँ भी जा रही, बहुधा प्लास्टिक ढेर।

रोक सको तो रोक लो, क्यों? करते हो देर।।

 

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०१ ☆ गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०१ ☆

गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम☆ श्री संतोष नेमा ☆

नारी  का  सम्मान  करें  हम |

दिल  से गौरवगान  करें  हम ||

साथ खड़े हों हर अवसर पर,

जगजाहिर पहचान करें  हम ||

*

सदियों  से  हम  जिसे  पूजते |

सुख-दुख जिसके साथ बाँटते ||

धर्मशास्त्र    गाते    यश-गाथा,

नतमस्तक   हम  वंदन  करते ||

हक़  के लिए विधान करें  हम |

नारी   का   सम्मान  करें   हम |

*

एक       तिहाई       भागीदारी |

विपक्षियों    ने   ना   स्वीकारी ||

संसद    में     प्रस्ताव   गिराया,

महिलाओं    में    गुस्सा   भारी ||

मत    इनके   संसद   में   गूँजें |

अब  इसका  संज्ञान  करें   हम ||

नारी   का   सम्मान   करें   हम |

*

जिसने  हक   इनका   ठुकराया |

उन्हें  समय ने  सबक  सिखाया ||

धैर्य –  धर्म     इनका    पहचानें,

किसने   इनका   मान   घटाया ||

अपने    दुश्मन   को    पहचानें |

कभी न अब अपमान  करें  हम ||

नारी   का   सम्मान   करें   हम |

*

साथ   समय  के  सदा  खड़ी  है |

हर  मुश्किल  से  सदा  लड़ी  है ||

छेड़ें   मत  “संतोष”  इन्हें   अब,

इनकी   जग  में  आन  बड़ी  है ||

देती    हैं   ये    सबको  इज्जत |

बस  इसका भी भान  करें  हम ||

 नारी   का  सम्मान   करें   हम |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  लोक कथा – लोक देवता।)

 

? लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

राजस्थान के पोकरण में तंवर वंशीय राजपूत राजा अजमल थेl राजा श्री कृष्ण जी के परम भक्त थेl इनका विवाह भाटी राजवंश की मीनल देवी से हुआl विवाह के कई वर्षो तक इन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआl भक्त की भक्ति देख कृष्ण जी प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहाl राजा ने कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखीl ईश कृपा से राजा को दो पुत्र प्राप्त हुएl वीरमदेव और रामदेव l रामदेव जी का जन्म भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की दूज को हुआl इनकी शादी सोढा राजपुतानी नेतलदे से हुआl

रामदेव जी ने समाज से जाती पाती, छुआछूत, सामाजिक कुरुतियों को जहाँ समाज से निष्कासित किया वहीं गरीबों एवं दलितों का उत्थान करने की प्रमुख भूमिका निभाईl यही कारण है कि देश के भिन्न प्रांतों के लोग देवता के रूप में उनकी पूजा करने लगेl मेघवाल समुदाय जो कि राजस्थान और गुजरात में खेती, पशुपालन, कांच के काम की कढ़ाई बुनाई के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं एक अनुसूचित जनजाति है, रामदेव जी ने उनके उद्धार हेतु कई काम कियेl

बाबा रामदेव ने जितना हिन्दु उत्थान हेतु काम किया उतना ही मुस्लिम समाज के उत्थान हेतु भी बहुत काम किये इसलिए इन्हें दोनों ही समुदाय के लोग मानते हैंl भादवा मेला जो कि बाबाजी के जन्मदिन दिवस पर लगता है उसमें दोनों ही समुदाय सम्मिलित होते हैंl ये हिन्दुओं के भगवान और मुस्लिम समुदाय के पीर हैंl

रामसा पीर ने समाज को शान्ति और चैन से जीने की सलाह दीl जहाँ भी आपको पंच रंग का ध्वज दिखे वहाँ आपको रामसा जी का मंदिर देखने को मिलेगाl इनके ध्वज में सफ़ेद रंग – पवित्रता, सादगी और शान्ति लिये, लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, साहस और क्रांति लिये, पीला रंग -त्याग सात्विकता, मंगल और आध्यात्मिक शक्ति लिये, नीला रंग- एकता और निष्ठा लिये और हरा रंग -शान्ति, भाईचारा और समृद्धि लिये होता हैl अर्थात ऊंच नीच का अंत और सभी में एक का ही वास हैl

रामसा जी को घोड़े पर बैठा दिखाते हैं क्यूंकि घोड़ा इनकी शक्ति और गति से लोगों तक पहुंचने का प्रतीक हैl

ऐसा कहा जाता है कि रूणिचा में राम सरोवर किनारे भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की ग्यारस को इन्होने जीवित समाधि लीl

रणुजा ना राजा, अजमलजी   ना बेटा, वीरामदे ना वीरा,

राणी हेतलना भरथार, म्हारो हेलो सांभड़ो जी

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २१ – कविता – मेरा रचयिता… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरा रचयिता।)

☆ शशि साहित्य # २१ ☆

? कविता – मेरा रचयिता…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बड़े मनोयोग से सुना रहे थे हम ,दास्तां अपनी,

चीत्कार सुन हड़बड़ा कर होश जो आया.

यह अजनबी मंजर नया नया सा था,

यह कुछ और नहीं!!!

अपने उन्ही शब्दों को,

लहुलुहान हो, चोट खाकर लौटते देखा..

 

ना टटोल मेरे मन को,

कि दोबारा सुनाऊं हाल,

अब तो खुद से भी कुछ कहने का अब मन नहीं..

 

शिकवा तो अब किसी से, कैसा भी नहीं.

हजारों साल से खड़े पत्थरों में,

धड़कनें सुनने की झूठी ख्वाहिश…

यह खता मेरी है, किसी और की तो नहीं..

 

मेरा सारा मनुहार, यूं व्यर्थ हो गया,

सींच कर खुद को,मेरे आंसुओं से,

वह और भी मजबूत हो गया.

अब मैं हूं और सिर्फ मेरा रचयिता,

वह अच्छा-अच्छा लिख रहा..

और मैं खुश होकर पढ़ रही.

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९१ – गुरू माऊली…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९१ – विजय साहित्य ?

☆ गुरू माऊली …!

=१= 

 पुस्तक माझी गुरू माऊली

ज्ञान शलाका,देई साऊली.

मुळाक्षरांनी, भरली पाटी

शब्द शारदा, प्रसाद वाटी.

 

=२=

गुरु माऊली, ग्रंथ कोंदणी

ज्ञान संपदा, शब्द गोंदणी.

भावमनीचे, आहे स्पंदन

मनामनांचे, दैवी मंथन.

=३=

ग्रंथगुरू हेहोय सारथी ,

घडवी ज्ञानी, नवीन पिढी

पुस्तक पेढी, उंची ठरवी

ध्येय पथाची, सुखद शिडी.

 =४=

ज्ञानलालसा, नि ज्ञानार्जन

अक्षरधन हे, मनी जपू

पुस्तक पेढी, सगुण शारदा,

तिन्ही त्रिकाळी तिजसी नमू

 =५=

अक्षरलेणी, अक्षरगाथा,

सरस्वतीच्या, चरणी माथा

पुस्तक पेढी, हवी संग्रही

ज्ञानदायीनी, अक्षर गाथा…!

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १७ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १७ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सत्संग-सज्जन प्रशंसा

परमेश्वर प्राप्तीसाठी नामस्मरण, भक्ती, सेवाभाव याबरोबरच सत्संग या गोष्टीला तितकेच महत्त्व दिल्याचे आपल्याला गाथेतील  अभंगांतून दिसून येते. उच्च समजल्या जाणाऱ्या ब्राह्मण वर्गातील काही  मंडळींकडून तुकाराम महाराजांना अतिशय त्रास दिला जात होता. आम्ही वेद पंडित, शास्त्राचा अभ्यास केलेले, म्हणून आम्हीच अध्यात्माचे जाणकार असे समजून जे समाजातील खालच्या वर्गाचे समजणाऱ्या लोकांना फार पीडा देत असत अशा पाखंडी वर्गावर तुकाराम महाराजांनी त्यांच्या अभंगातून चांगलेच ताशेरे मारले आहेत.

ब्राह्मण असो की वैश्य असो अथवा शूद्र, संत सज्जन कोणाला म्हणावे हे सांगताना तुकाराम महाराज म्हणतात,

हिरा ठेविता ऐरणी/ वाचे मारिता जो घणी /

 तोची मोल यावे खरा/ करणीचा होय चुरा//

 मोहरा तोची अंगे/ सूत न जळे ज्याचे संगे/

 तुका म्हणे तोचि संत/ सोसो जगाचे आघात//

संत कसे असतात तर, जो हिरा ऐरणीवर ठेवून मोठ्या हातोड्याने त्याच्यावर घाव घातला तरी फुटत नाही. तोच हिरा

मौल्यवान आहे दुसरे इतर बनावट काचेचे तुकडे असतात कारण ते घाव घालताच त्यांचा चुरा होतो. ज्याला सूत गुंडाळून अग्नीत टाकले असता सूत जळत नाही तोच खरा मोहरा होय. त्याचप्रमाणे जो जगाने दिलेले सर्व प्रकारचे उपद्रव शांतपणे सहन करतो त्याला संत म्हणावे.

ते संतांचा महिमा वर्णन करतात.

 सकळ चिंतामणी शरीर/ जरी जाय अहंकार समूळ आशा/

 निंदा हिंसा नाही कपट देह बुद्धी/ निर्मळ स्फटिक जसा.//

 मोक्षाचे तीर्थ न लगे वाराणसी/ येती तया पासी अवघे जन//

 तीर्थासी तीर्थ झाला तोची एक/ मोक्ष तेणे दर्शने//

 मन शुद्ध तया काय करीसी माळा/

 मंडित सकळा भूषणासी//

 हरीच्या गुणे गर्जताती सदा/

 आनंद तया मानसी//

 तन मन धन दिले पुरुषोत्तम/ आशा नाही कवणाची//

 तुका म्हणे तो परीसाहुनी आगळा/

 काय महिमा वर्णू त्याचा//

या अभंगात तुकारामांनी संतांची लक्षणे सांगितली आहेत. चित्त शुद्ध असलेल्या संतांबद्दल तुकाराम महाराज गौरवाने बोलत आहेत की ज्याचा अहंकार गेला  आहे, निंदा, हिंसा, कपट, देह बुद्धी याचा वास त्यांच्यात नाही तोच स्फटिकासारखा निर्मळ आहे, त्याचे सर्व शरीर चिंतामणीच आहे. मोक्ष देणारे तीर्थ काशी, तिची त्याला जरुरी नाही. कारण सर्व तीर्थांना पावन करणारा संत हाच तीर्थस्थान झालेला आहे. सर्व जग अशा पुरुषापाशीच येते. याच्या दर्शनानेच मोक्षाचा लाभ होतो. ज्याचे मन शुद्ध झाले आहे त्याला जपमाळेसारख्या बाह्य चिन्हांची काहीही जरुरी राहिलेली नाही. मन शुद्ध असल्यानेच तो सर्व भूषणांनी मंडित झालेला आहे. जे हरीचे गुणगान करत असतात ते निरंतर आनंदातच असतात.त्यांनी स्वतःला पुरुषोत्तमाच्या ठायी अर्पण केले आहे आणि जो कोणावरही आशा ठेवत नाही तो परिसापेक्षाही श्रेष्ठ आहे. त्याचा महिमा शब्दात वर्णन करता येत नाही. संतांच्या दर्शनाने तापत्रयांचा नाश होऊन विश्रांती मिळते.

 

 शुद्ध बीजापोटी/ फळे रसाळ गोमटी/

 मुखी अमृताची वाणी/ देह देवाचे करणी//

 सर्वांग निर्मळ/ चित्त जैसे गंगाजळ/

 तुका म्हणे जाती/ ताप दर्शनी विश्रांती

 

बीज शुद्ध असले की त्यातून उगवणारी फळे रसाळ आणि गोडच असतात, असं सांगून संत तुकाराम पुढे म्हणतात की ज्याच्या मुखात अमृततुल्य गोड शब्द आहेत आणि ज्याचा देह देवकार्यासाठी वापरला जात आहे, ज्याचे चित्त गंगाजळाप्रमाणे पवित्र आहे त्याच्या दर्शनाने त्रिविध ताप हरण होऊन चित्ताला विश्रांती मिळते.

 सोनियाचे ताट क्षीरीने भरिले/

 भक्षावया दिले श्वानालागी//

 मुक्ताफळ हार खराशी घातला/

 कस्तुरी सुकराला चोजविली//*

 वेद पारायण बधिरा सांगे ज्ञान/

 तयाची ते खूण काय जाणे//

 तुका म्हणे ज्याचे तोची एक जाणे/

 भक्तीचे महिमान साधू जाणे//

एक संत साधूच असा आहे की जो भक्तीचा महिमा जाणतो. सामान्यांना हे पटवून देण्यासाठी तुकाराम महाराज या अभंगात रोजच्या जीवनातील काही उदाहरणे देतात.

सोन्याच्या पात्रात खीर भरून ती कुत्र्याला दिली तर त्याचा काय उपयोग? त्याचप्रमाणे गाढवाच्या गळ्यात मोत्याचा हार घातला किंवा डुकराच्या नाकाला कस्तुरी लावली

तर त्याचा महिमा त्यांना कळणार आहे का? एखाद्या बहिर्‍याला(अज्ञानी) माणसाला वेदाचे ज्ञान कितीही देण्याचा प्रयत्न केला तरी ते त्याच्या बुद्धीला समजणार आहे का? जे खरे वर्म आहे ते ज्याचा तोच जाणू शकतो. याच कारणास्तव संतांची संगती धरावी असे तुकाराम महाराजांचे सांगणे आहे.

तुकाराम महाराजांना वैष्णवांचे दास होण्याची तळमळ लागली आहे. कारण ते म्हणतात.

 ते माझे सोयरे सज्जन सांगाती/

 पाय आठवीती विठोबाचे//

 येरा मानविधी पाळणा पुरते/

 देवाची ती भुते म्हणोनिया//

 सर्व भावे जालो वैष्णवांचा दास/

 करीन त्यांची आस उच्छिष्ठाची//

 तुका म्हणे जैसे आवडती हरिदास/

 तैसी नाही आस आणिकांची//

तुकाराम महाराजांच्या मनात हरिदासांविषयी अत्यंत आदर आहे. जे पांडुरंगाच्या चरणांचे चिंतन करतात ते सज्जन माझे सोयरे आहेत असे ते म्हणतात.

बाकीच्यांना मी फक्त विधीपालनापुरते आदराने वागवतो कारण सर्व भूतमात्र देवाच्याच रूपाचे असतात. काया, वाचा, मनाने मात्र तुकाराम महाराज वैष्णवांचे दास आहेत. त्यांच्या उच्छिष्टाची महाराज आशा धरतात. त्यांना हरिदास जितके आवडतात तितके इतर कोणीही आवडत नाही. या अभंगात पर्यायाने सज्जनांची संगती चांगली हे सांगण्याचा महाराजांचा आटोकाट प्रयत्न आहे.

संतांची महती सांगणारा हा आणखी एक अभंग आपण पाहूया.

 काय वाणू आता न पुरे हे वाणी/

 मस्तक चरणी ठेवीतसे//

संत महात्म्य वर्णन करताना महाराजांची वाणी अपुरी पडते. त्यांच्या चरणावर मस्तक ठेवून ते म्हणतात,

 थोरीव सांडली आपुली परिसे/

 नेणे सिवो कैसे लोखंडासी//

 जगाच्या कल्याणा संतांच्या विभूती/

 देह कष्टविति पर उपकारे//

 भुतांची दया हे भांडवल संता/

 आपुली ममता नाही देही//

 तुका म्हणे सुख पराविया सुखे/

 अमृत हे मुखे स्त्रवतसे//

लोखंड अति हीन आहे, त्याला मी कसा स्पर्श करू? असे मनात न आणता परीस त्याचे सोने करतो, त्याचप्रमाणे संतांनी माझ्या सारख्या हीनाचा स्वीकार केला आहे. संतांचे अवतार जगाच्या कल्याणा करताच असतात, ते आपला देह परोपकार करण्यासाठी कष्टवितात. सर्वांवर दया करणे, हे संतांचे स्वाभाविक भांडवल आहे व त्यांना स्वतःच्या देहाची ममता नसते.

ते संत लोकांच्या सुखामुळेच सुखी होतात आणि त्यांचे बोलणे अमृता सारखे मधुर असते. हरीच्या नामामृताचा ओघच त्यांच्या वाणी वाटे वाहत असतो.

पुढील भागात सज्जन प्रशंसे विषयी आणखी काही अभंगांचा आपण विचार करू.

क्रमशः… १६ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # हमारा बजाज… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # हमारा बजाज… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

आमच्या लहानपणी.. म्हणजे साठी च्या दशकात… चैत्र संपता संपता आणि वैशाखाची ओपनिंग सुरू झाली की फारतर जेष्ठ अर्धा अधिका पर्यंत… मराठी महिन्याच्यां गोंधळात न पडता सरळ इंग्रजी मंथचा विचार केला तर मार्च एंड पासून ते जून हाफ पर्यंत उन्हाळ्याचा सिझन सुरू असायचा… त्यावेळी सगळे ऋतू आपल्या वेळा काटेकोरपणाने पाळत असत… इतकचं काय माणसं, संस्था आस्थापना, शाळा, महाविद्यालये, रेल्वे, बस, विमानं इ इ. देखिल आपल्या वर्षभराच्या एकदा आखून दिलेल्या वेळापत्रकानुसार चालत असतं… वार्षिक परिक्षेचे पीर एप्रिलच्या मध्याला एकदा पाण्यात पडले कि सगळी शाळकरी मुलांचा जथ्था आपापल्या पालकांसह उन्हाळी सुट्टीसाठी म्हणून गावाकडे जायचा… शहरातील उन्हाळ्यापेक्षा गावात सौम्य आणि अधिक गारवा तसेच आंबा, काजू, फणस, जांभूळ चा मनसोक्त पाहुणचाराचा आस्वाद आनंद लुटून झाला कि मृगाची पावसाची पहिली सर पडायचा अवकाश कि सगळे आपल्या शहरात परतायचे… तेव्हा त्या दोन तीन महिन्यात इकडे सिलिंग फॅन हुप्प होऊन बसायचा… ते ए. सी. , कुलर वगैरे श्रीमंती सिंम्बाल चे फॅड अद्याप मध्यमवर्गीय कुटुंबात अवतरलेले नव्हते… आणि सिलिंग फॅन मात्र शहरात घराघरातून वर्षभर तिन त्रिकाळ घुमत असायचा… पर्यावरणाचा समतोल साधला गेल्याने उन्हाळी तापमान देखील आपला ठरलेल्या पाऱ्यापेक्षा कधी जास्त होतच नसे… तर सांगत होतो कि तेव्हा सिलिंग फॅन हि एकमेव घरटी गरज होती आणि टेबल फॅन खिशात खुळखळणाऱ्या जास्तीच्या पैशाची चैन समजली जायची… जिथे हम दो और हमारे दो चा मामला तिथे सिलिंग वरचा एकुलता एक हाॅल मधला नि बेडरूम मधला हमारा बजाज आपलं गारेगार वारं फिरवायचा… पण जिथं टिचभर जागेत मणभर माणसं असायची तेव्हा हा चैन म्हणून नावं ठेवलेला टेबल फॅन उपयोगात आणला जायचा.. प्रत्येकाच्या सोयीनुसार कोपऱ्यात फिरता वा खडा ठेवून वारं फिरवायचा… स्पीड ची बटनं चार असली तरी वारं भन्नाट देत असे… पण या टेबल फॅन चा उपयोग मात्र त्या उन्हाळ्यापुरता मर्यादित असे… त्यानंतर तो अडगळीत फळीवर (लाॅफ्टवर) त्याला गवसणी घालून ठेवला जाई तो परत पुढच्या उन्हाळ्यातच खाली उतरे… असं दोन दशके पुढची गेली आणि पुढे पुढे सगळा माहोलच बदलत गेला… त्याला काय होतयं या विचाराने बुद्धीला मांद चढले आणि माणसांची विचाराची दिशा विकृत झाली… त्याचा विपरीत परिणाम निर्सगावर झाला आणि तो देखील माणसासारखाच रंग बदलू लागला.. त्याच्या दैनंदिन वेळापत्रकाचलाच त्याने न जुमानता आपल्या मनाला स्वैर स्वातंत्र्य दिले… सगळे ऋतूंची मनमौजी सुरू झाली… कुणीही उठावं कधीही यावं आपल्याला हवं तसं वागावं.. राहावं, ओरबाडावं, नासधूस करावं नाहीतर हुलकावणी देत राहून तोंडच दाखवायचं नाही… आणि माणसालाच वेठीला धरून त्यालाच जाब विचारायचा… सर्व काही तुझ्या ताब्यात आहे याचा फुकाचा गर्व आहे ना तुला मग दाखव कि वेळेवर हवा तेव्हढा पाऊस, थंडी आणि उन्हाळा आणून… आहे का तुझा निर्सगावर अंकुश तुझा… लावतोस का शिस्त मला… तुला काय वाटलं हमारा बजाज सारखा बटणाच्या कळीवर चालू बंद करून हुकमत आमच्या वर मिळवता येईल काय… अरे तुमचा तो हमारा बजाज देखील काहीवेळा चालता चालता बंद पडतो.. मान टाकतो आणि कशी तुमची ऐन गरजेच्या वेळी काशी करून जातो… तेव्हा तुमची कशी होते चिडचिड… अगदी त्याच तालावर माझ्या या बेताल वागण्यानं देखील तुमच्याच बेजबाबदार पणाने माझ्याशी वागणूकीचा परिणाम तुम्हाला भोगायला लावण्याची किंमत मोजून घेत असतो… तुम्ही काय रे हमारा बजाज म्हणून त्या टेबल फॅन चेच गोडवे गात बसता… नि आम्हाला विसरता… ये हमने आपको करारा जवाब दिया है… तो बाजारातून जेव्हा हमारा बजाज नवा कोरा घरी घेऊन येता तेव्हा त्याच्या नवलाई पुढे सगळे घरदारनं घेरुन बसते आणि तो एकशे ऐंशीच्या कोनात फिरणारा टेबल फॅन मात्र अरे मला जरा मोकळीक द्याल तर मी हवा पसरवेन… कुणी आगाऊ कारटं त्या पात्यावर पेन्सिल, कागद धरून आवाजाची गंमत लुटत असतं.. नि माझ्या गतीला अवरोध झाल्याने मग माझी मतीच खुंटते नि कुठेतरी खरखर करणारा कानाला सहन न होणारा आवाज माझ्याकडून निघाला कि… अरे याला वापरून दहा वर्षे झाली म्हणजे याची गॅरंटी संपली आता त्याला भंगारात मोडीत घालून दूसरा नवा आणायला हवा… असं म्हणून पुन्हा तुम्ही नवा हमारा बजाजच आणता… आमच्या सारखे कैक बाजारात आले आणि गेले पण आमच्या सारखे आम्हीच कायम टिकून राहिलोय… हे तुमचं नि हमारा बजाज चं जन्मोजन्मीचं नातं असं अबाधित राहिले आहे.. जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी… ठंडा ठंडा कुल कुल..

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र ७०, ७१, ७२, ७३. ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ७०, ७१, ७२, ७३. ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले 

।। श्री नारद उवाच ।। 

नारद भक्ति सूत्रे ७० – – 

तन्मया : ||७०||

 अर्थ : भक्त भगवंतमय झालेले असतात.

विवेचन: विभक्त नाही तो भक्त अशी भक्ताची व्याख्या केली जाते. इथे तन्मय असा उल्लेख आहे. साधना पूर्णत्वास गेली की भक्त आणि भगवंत यांच्यात काही भेद रहात नाही. अशा साधकाचे वर्णन भगवंत गीतेत करतात.

*”नाही तृष्णा भय क्रोध माझ्या सेवेत तन्मय|*

*झाले ज्ञान-तपे चोख अनेक मज पावले||”*

(गीताई ०४. १०)

संताना ना कोणापासून भय असते, तर कोणासाठी त्यांच्या मनात क्रोध असतो. त्यांच्या मनात फक्त त्या भगवंताबद्दल निरतिशय प्रेम असते. जणू भगवंतच त्यांच्या ह्रदयात विराजमान असतो. आपल्याला हनुमानाची गोष्ट ठाऊक आहे. वेळ आल्यावर हनुमानाने आपली छाती विदीर्ण करून राम आपल्या हृदयात असल्याचे दाखवून दिले होते. अशी सर्व मंडळी ही सामान्य साधकांसाठी भक्तीचे आदर्श आहेत, प्रमाण आहेत.

प्रभू श्रीरामाला हनुमंताला बक्षिस देण्याकरता एकही गोष्ट योग्य वाटली नाही. शेवटी त्याने हनुमंताला आलिंगन दिले आणि त्याचे कौतुक पुढील शब्दांत केले आहे.

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।”

संत तुकाराम महाराज म्हणतात की साधना करता करता अशी वेळ आली की मला आता विठ्ठल माझा सोयरा वाटू लागला आहे. सोयरा अर्थात अगदी जवळचा.

ते एका अभंगात म्हणतात,

*”विठ्ठल सोयरा सज्जन सांगाती । विठ्ठल या चित्तीं बैसलासे ॥१॥ विठ्ठलें हें अंग व्यापिली ते काया । विठ्ठल हे छाया माझी मज ॥२॥ बैसला विठ्ठल जिव्हेचिया माथां । न वदे अन्यथा आन दुजें ॥३॥ सकळां इंद्रियां मन हे प्रधान । तें ही करी ध्यान विठोबाचें ॥४॥” तुका म्हणे या हो विठ्ठलासी आतां । नये विसंबतां माझें मज ॥५॥”*

(अभंग क्रमांक 497, सार्थ तुकाराम गाथा धार्मिक प्रकाशन संस्था)

 जय जय रघुवीर समर्थ

—–

भक्ति सूत्रे क्र. ७१ – 

*”मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं भूर्भवति ||७१||”*

अर्थसिद्ध भक्ताच्या माता, पिता व पूर्वजांना आनंद होतो. देव देवता आनंदाने नृत्य करतात आणि पृथ्वीला रक्षणकर्ता मिळून ती सनाथ होते.  

विवेचनदैनंदिन व्यवहारात एखादा मनुष्य जर श्रीमंत झाला, मोठा उद्योगपती झाला तर त्याचे कूळ तर उद्धरतेच, तसेच त्याच्या कर्तृत्वामुळे अनेक लोकांना रोजगार मिळत असतो.

परमार्थातील अंतिम पायरी म्हणजे भक्त आणि भगवंताचे एकरूप होणे. असे पूर्णत्व प्राप्त करणारे तसे मोजकेच असतात, पण ते असतात यात काही शंका नाही. भारतमातेच्या अशी अनेक नररत्ने जन्मास आली की ज्यांनी भगवंताची प्राप्ती करून घेतील आणि ही परंपरा अखंड राहील यात शंका असण्याचे कारण नाही.

एक गोष्ट आपण इथे लक्षात घेतली पाहिजे की जेव्हा एखाद्या जडजीवाला नरदेह प्राप्त होतो, तेव्हा भगवंताला सर्वात जास्त आनंद होतो कारण त्याला वाटते की आता मी याला नरदेह दिला आहे, तर आता हा साधना करून माझी (अर्थात भगवंताची) प्राप्ती करून घेईल, पण प्रत्यक्षात मात्र लाखो करोडो मध्ये एखादा जीव देवत्वापर्यंत पोचतो. मग ज्याप्रमाणे ऑलिंपिक पदक मिळविल्यावर ज्याप्रमाणे त्या देशातील सर्वांना आपल्या घरी दसऱ्याच्या दिवशी दिवाळी आल्यासारखे वाटतेज तसे साधकाच्या नातेवाईकांना, घरच्या लोकांना, पितरांना नव्हे तर देवदेवतांना ही तितकाच उत्कट आनंद होतो असे नारद मुनी आपल्याला सांगत आहेत.

अशा साधकाचे वर्णन संत तुकाराम महाराज आपल्या पुढील अभंगात करतात… 

*”निर्वैर होणें साधनाचें मूळ । येर ते विल्हाळ सांडीमांडी ॥१॥ नाहीं चालों येत सोंगसंपादणी । निवडे अवसानीं शुद्धाशुद्ध ॥२॥ त्यागा नांव तरी निर्वीषयवासना । कार्‍या कारणां पुरता विधि ॥३॥ तुका म्हणे राहे चिंतनीं आवडी । येणें नांवें जोडी सत्यत्वेंसी ॥४॥”*

साधकाच्या अंतरात देवत्व प्रगट झाले की तो सिद्ध होतो. देहाने मनुष्य दिसत असला तरी तो भगवंत झालेला असतो. बाहेरून त्या संताचा व्यवहार कदाचित अतिसामान्य असेल, पण अंतरात मात्र त्याचे अनुसंधान पक्के असते.

त्याच्या नजरेत सर्वजण समान असतात. ते अवतरण करतात, ते आपल्या सारख्या सामान्य जनांचा उद्धार करण्यासाठी. पूज्य ब्रम्हानंद महाराज म्हणायचे की दोन रुपयाचे तिकीट काढले की गोंदवले येथे सगुण ब्रह्म पाहायला मिळायचे. अशा संतांमुळे पृथ्वीवरील पाप नष्ट होते, पृथ्वी सनाथ होते.

जय जय रघुवीर समर्थ

—–

भक्ति सूत्रे क्र. ७२, ७३ – – 

 *”नास्ति तेषु जाति विद्यारूपकुलधनक्रियादि भेदः ॥७२॥”*

*”यतस्तदीय: ||७३||”*

अर्थश्रेष्ठ भक्तांमध्ये जातपात, विद्या (शिक्षण), रूप, कुळ, पैसा, करत असलेले काम इत्यादींवर आधारलेले भेद नसतात, कारण ते भगवतांचे एकनिष्ठ भक्त असतात.  

विवेचनही दोन्ही एकमेकांस साधारण पुरक आहेत म्हणून त्यांचे विवेचन एकत्र करीत आहे.  

भक्ति करणे म्हणजे भगवंतावर अकारण प्रेम करणे हे आपण पाहिले आहे. दैनंदिन व्यवहार करताना मनुष्याला कधी जाणता तर कधी अजाणता मनुष्याला विविध प्रकारचे भेद पाळावे लागतात, अन्यथा त्याला व्यवहार करता येत नाही. उदा. वाहन कोणतेही असले तरी त्या वाहनाला ठेवण्यासाठी वाहनतळच उचित ठरते. वाहन महागडे आहे म्हणून कोणी त्याला झोपण्याच्या खोलीत नेऊन ठेवत नाही, अर्थात ते उचितही नसते.

संत अर्थात पूर्णत्व पावलेला भक्त हा स्वतः देव झालेला असतो. संत कधीही कोणामध्ये भेद पाळत नाहीत, भेद मानीत नाहीत.  

आपल्याला सर्वांना ज्ञात असलेले एक गीत आहे. — – 

*”टाळ बोले चिपळीला नाच माझ्या संगं*

*देवाजीच्या दारी आज रंगला अभंग ॥धृ॥*

*दरबारी आले रंक आणि राव*

*सारे एकरूप नाही भेदभाव*

*गाऊ नाचू सारे होऊनी नि:संग||||”*

 या स्थितीला संत पोहचलेले असतात. कोणत्याही संताच्या स्थानी जावं, तिथे आपल्याला मुक्त प्रवेश मिळेल.

संतत्व प्राप्त केलेला मनुष्य व्यवहारातील भेद लक्षात घेऊन त्या त्या माणसांशी, त्या त्या प्राण्यांशी त्या त्या परीने वर्तन करतात.

श्रीगोंदवलेकर महाराजांच्या चरित्रात अशी अनेक उदा. आहेत. त्यातील एक दोन मी इथे सांगतो. एकदा चोरी करायला आलेल्या चोरांना श्रीमहाराजांनी पकडले. त्यांना पोलिसात न देता, पुन्हा चोरी करणार नाही या अटीवर त्यांना अनुग्रह देऊन कृपांकित केले. एका मनुष्य त्यांच्यावर विष प्रयोग करण्यासाठी आला होता. आपल्याला मारायला आलेल्या मनुष्याला सुद्धा श्रीमहाराजांनी अनुग्रह देण्याची तयारी केली होती. पण तो मनुष्य घाबरून पळून गेला. तेव्हा श्रीमहाराज म्हणून गेले, की त्याने चांगली संधी सोडली आणि स्वतःचे नुकसान करून घेतले. इतके दयासिंधुत्व संतच दाखवू शकतात. कारण स्वतः परमात्मा त्यांच्या अंतर्यामी कायम स्थित असतो.

प्रकृतीचे स्वतःचे असे विधिविधान आहे. त्यानुसार घटना घडत असतात. अमुक वेळेस पाऊस पडणार किंवा ऊन पडणार हे प्रकृतीच्या अधीन आहे. अनेक सामान्य माणसांना प्रश्न पडतो की संत अवतार घेतात, तर लोकांचे दुःख, दैन्य दूर का करीत नाहीत? या प्रश्नांची अनेक उत्तरे आजपर्यंत आपण पाहिली असतील, पण पुढील उत्तर मला अधिक उचित वाटते.

एकदा श्री रमण महर्षी यांना एकाने प्रश्न विचारला की तुम्ही आपल्या शक्तीचा इतरांच्यापी कल्याणासाठी उपयोग का करीत नाही? तर त्यावेळी रमण म्हणाले की आम्ही दोन कुठे आहोत, आम्ही एकच आहोत. अर्थात मीच परमात्मा आहे आणि मीच सर्व काही करीत आहे. त्यामुळे अनेक वेळा अनेक लोकांचा गोंधळ होऊ शकतो.

साधक जेव्हा सिद्ध होतो, तो गुरू स्वरूप होऊन जातो. तो जगदाकार होऊन जातो. एकदा श्रीमहाराजांना एका भक्ताने विचारले की आमच्या अनेक प्रश्नांचे तुम्ही इतक्या त्वरेने कसे उत्तर देऊ शकता? त्यावर श्रीमहाराज म्हणाले की मला तुमचा प्रश्न आधीच कळलेला असतो. जेव्हा तुमच्या मनात प्रश्न निर्माण होतो

तेव्हाच तो मला कळतो आणि जेव्हा तुम्ही येऊन मला प्रश्न विचारता, तोपर्यंत उत्तर शोधायला मला अवधी मिळतो. मग मी त्याचे उत्तर देऊ शकतो. अर्थात श्रीमहाराज आपल्या मनात उपस्थित असतात, नव्हे ते कायम आपल्या मनात असतात, असे म्हणता येईल. भगवंताची एक उपाधी मन अशीच आहे, नाही का?

*”जेथे नाम, तेथे माझा प्राण | ही सांभाळावी खुण ||”*

– – श्री गोंदवलेकर महाराज

भक्तीच्या पहिल्या पायरीवर भक्त देवाला म्हणत असतो की *तस्य एव अहम्*.

अर्थात त्याचे रूप, गुणवर्णन ऐकले आहे, पण प्रत्यक्षात तो कसा आहे हे माहित नाही. पण तो मला आवडतो.

भक्तीच्या दुसऱ्या पायरीवर भक्त देवाला म्हणतो की *तव एव अहम्*.

अर्थात भक्त भगवंताच्या सान्निध्यात असतो. भगवंत भक्ताच्या सोबतीला असतो. *”जेथे जातो तेथे तू माझा सांगाती”* अशी भक्ताची खात्री असते.

भक्तीच्या तिसऱ्या पायरीवर भक्त आणि देव एकच होत असतात. *”मी तू पणाची झाली बोळवण, एका जनार्दनी श्रीदत्त ध्यानची* अशी स्थिती असते. देव आणि भक्त एकमेकाला म्हणतात, *त्वम् एव अहम्*. ही तदियतेची स्थिती म्हणता येईल.

यापुढील स्थितीमध्ये भक्त देवाला म्हणतो भक्तीचे सुख भोगण्यासाठी मला भक्तच राहू दे नि तू भगवंत रहा.  

संत तुकाराम महाराज या स्थितीचे वर्णन पुढील प्रमाणे करतात.

*”नको ब्रह्मज्ञान आत्मस्थिती भाव | मी भक्त तू देव ऐसे करी ॥१॥ दावी रूप मज गोपिका-रमणा | ठेवीन चरणावरी माथा ॥२॥ पाहोनि श्रीमुख देईन आळिंगन | जिवे लिंबलोण उतरीन ॥३॥ पुसता सांगेन हितगुज मात | बैसोनि एकांत सुख गोष्टी || || तुका म्हणे यासी न लावी उशीर | माझे अभ्यंकर जाणोनीया ॥५॥”*

संदर्भ : अभंग क्रमांक २२७८, सार्थ तुकाराम गाथा धार्मिक प्रकाशन संस्था

 जय जय रघुवीर समर्थ

नारद महाराज की जय!!!

– क्रमशः भक्तीसूत्रे – ७०, ७१, ७२, ७३.

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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