(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “प्रेम का प्रतिदान” ।)
(स्वांतःसुखाय लेखन को एक स्वरूप देने के प्रयास में इस रचना की रचना कोविड के समय में की गई थी.
आज पुनर्पाठ में एक दुःस्वप्न पर आधारित और २४ अप्रैल २०२० को प्रकाशित कथा “स्विच ” पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ । यह आश्चर्य और विडम्बना है कि हम एक लम्बी मानवीय त्रासदी को सहन करने के बाद मानवीय संवेदनाओं और त्रासदी को भूल गए हैं । आखिर वह स्विच कौन सा है ? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिये और पसंद आये तो मित्रों से शेयर भी कीजियेगा। अच्छा लगेगा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति # 16 ☆
☆ कथा कहानी – स्विच ☆ हेमन्त बावनकर ☆
आज के अखबार की हेडलाइन्स ने चौंका दिया… देश के सभी धार्मिक स्थल के भक्त-निवासों को अस्पताल के वार्ड में तब्दील करने का निर्णय… तालों में बंद ईश्वर की मौन अनुमति… सभी देवी देवताओं और नेताओं की बड़ी-बड़ी मूर्तियों के दानदाताओं द्वारा उतनी ही या उससे अधिक राशि अस्पताल और जनसेवाओं के लिए दान में देने का निर्णय…
बड़ा अजीब माहौल है… कोई मेरी ओर देख ही नहीं रहा… सब अपने आप में मशगूल हैं। मैं सोसायटी गेट से बाहर निकल रहा हूँ… गार्ड रोकना चाह रहा है… किन्तु, मैं अपने में ही मशगूल हूँ… बाहर निकल गया हूँ… सब कुछ शांत… पूरी सड़क सुनसान… सिर्फ दूध और दवा की दुकान खुली है और दारू की बन्द है… मुझे चिंता होने लगी है कि सरकार के आय का बड़ा स्रोत बन्द है तो जनता पर व्यय कैसे होगा ?… शायद दान से… वेतन में कटौती से… महंगाई भत्ते पर रोक से… पर पेंशनरों का तो सहारा ही यही है… कम से कम पेंशनरों को तो बख्श देते… बुढ़ापे में… पेंशनरों की वित्तीय समस्या का निर्णय वो लोग क्यों लेते हैं जो स्वयं का वेतन स्वयं निर्धारित करते हैं… पेंशनरों की समस्या का हल करने की समिति में कोई पेंशनर ही नहीं है… समस्या कटौती की नहीं है… समस्या भविष्य की योजना की है… कहते हैं बीमा करा लो… राष्ट्र का बीमा क्यों नहीं ?… सभी का स्वास्थ्य बीमा क्यों नहीं?… राष्ट्र का स्वास्थ्य बीमा क्यों नहीं ?… हमारा पेंशन फंड है… राष्ट्र का पेंशन फंड क्यों नहीं?…
मैं दुबारा देखता हूँ… मैंने सही देखा है दारू की दुकान बन्द है… सड़क के किनारे फिल्मों के पोस्टर गायब हैं… सारे शहर में डॉक्टर, नर्सों, सफाई कर्मियों, पुलिसवालों के मुस्कराते चेहरों वाले पोस्टर लगे हैं। बड़े बड़े नेताओं के पोस्टर लगे हैं… सब में एक कॉमन बात दिखाई दे रही है, सब पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है COVID-19 और सबने मास्क पहन रखा है…
सारी की सारी सड़क साफ हो गई है… कहीं कोई कचरा नहीं… कोई प्लास्टिक बैग / पन्नियाँ नहीं… गैर पालतू जानवर आराम से घूम रहे हैं… जरा भूखे जरूर लग रहे हैं… किन्तु, काटने नहीं दौड़ रहे… आज तालाब के किनारे वॉकिंग ट्रैक पर कोई वाक नहीं कर रहा… तालाब का पानी शीशे की तरह साफ कैसे हो गया?… कहीं धूल नहीं… हवा में प्रदूषण नहीं… ये क्या तालाब के किनारे मंदिर में बहुत बड़ा ताला लगा है… पुजारी का अता-पता नहीं है… तो पूजा कौन करता है? आगे अस्पताल खुला है… सब मुझे शक की नज़र से देख रहे हैं… जैसे गेट पर मेरी प्रतीक्षा के लिए हाथ में लेजर से बुखार नापने का यंत्र लिए नर्स खड़ी है और कुछ नर्सिंग स्टाफ… उन्हें लगा मैं अंदर जाऊंगा… उन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ता हूँ… तिरछी नजर से देखता हूँ… शायद वे निराश हो गए…
आगे मॉल में एक मल्टीप्लेक्स है… बाहर बहुत बड़ा पोस्टर लगा है… पूरे पोस्टर पर लिखा है COVID-19… शायद साइंटिफिक फंतासी फिल्म हो… सोचता हूँ देख ही लूँ… मॉल में इक्का दुक्का लोग घूम रहे हैं… दुकानें बन्द हैं… मल्टीप्लेक्स खुले हैं… सीधे सिनेमा हाल के गेट तक पहुँच जाता हूँ… कोई रोकता क्यों नहीं ?… सिनेमा हाल में चला जाता हूँ… शायद फिल्म शुरू हो गई है… अंधेरे में खाली सीट टटोलते हुए एक किनारे की खाली सीट पर बैठ जाता हूँ… फिल्म शुरू हो चुकी है… विदेश का कोई शहर है… अफरा तफरी मची हुई है… शायद कोई महामारी फैल रही है… बीच बीच में कोई वाइरस पूरे स्क्रीन पर उछल कूद मचाते रहता है… लोग एक दूसरे से हाथ मिला रहे हैं… गले लग रहे हैं… फ्लाइट पकड़ कर दूसरे देश जा रहे हैं… खुद भी बीमार हो रहे हैं… औरों को भी बीमार कर रहे हैं… अब तो मौतें भी हो रही हैं…
अचानक स्क्रीन पर आंकड़े आने लग गए…पहले विदेशों के… फिर अपने देश के… आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं… अचानक जाना माना टी वी एंकर स्क्रीन पर आ गया… एक एक कर वक्ता आने लगे… बहस चालू हो गई… अरे! ये फिल्म में टी वी एंकर कैसे घुस गया… यहाँ भी टी आर पी… हाल में रोशनी बढ़ने लगी… सबने मास्क लगा रखा था… दस्ताने पहन रखे थे…
एंकर चीख चीख कर कह रहा था… अपनी सुरक्षा स्वयं करें… सार्वजनिक स्थानों पर मत जाएँ… मास्क पहन कर रहें… घर से बाहर न निकलें… घबरा कर उठ खड़ा होता हूँ… और अपने आपको बीच सड़क पर पाता हूँ…आवाज एंकर की नहीं थी… पुलिसवाले अपनी गाड़ी में माइक पर चीख चीख कर कह रहे थे… लॉक डाउन में घर से बाहर न निकलें… सरकारी नियमों का कड़ाई से पालन करें…अचानक पुलिस मुझे घेर लेती है… मैं बेतहाशा भागने लगता हूँ… तेज…और तेज…इतना तेज कि जिंदगी में नहीं दौड़ा…पुलिस के बूटों की आवाज कम होने लगती है… पलट कर देखता हूँ… कोई भी नहीं… चैन की सांस लेता हूँ जैसे ही पलटता हूँ… ये क्या?… एक इंस्पेक्टर खड़ा है और कुछ पुलिस वाले… पुलिस वाले जैसे ही डंडा उठाते हैं…इंस्पेक्टर रोक देता है… उम्र का लिहाज कर रहा हूँ… दुबारा नहीं छोडूंगा… हाथ जोड़ माफी मांग कर घर लौट आता हूँ…
घर पर कोई नहीं दिखते… बाबूजी बहुत याद आ रहे हैं… सीधे उनके कमरे में जाता हूँ… बाबूजी खिड़की के किनारे अपनी कुर्सी पर बैठकर अपनी डायरी लिख रहे हैं… वे मेरी ओर नाराजगी से देखते हैं… शायद उन्हें मेरा बाहर जाना अच्छा नहीं लगा… उनके कदमों में बैठ कर पाँव पकड़ कर माफी मांगने लगता हूँ…अरे ये क्या? बाबूजी तो हैं ही नहीं… बाबूजी तो वास्तव में हैं ही नहीं… तो वो कौन थे…उठ कर देखता हूँ बाबूजी की डायरी वैसे ही खुली पड़ी है… बाजू में उनका चश्मा… और डायरी में कलम… पढ़ने की कोशिश करता हूँ… अपनी आदत के अनुसार एक लाइन छोड़ कर सुंदर हस्तलिपि में एक एक पंक्तियाँ… पढ़ने की कोशिश करता हूँ… उनकी सर्वाधिक प्रिय पुराने फिल्मी गानों की एक-एक पंक्तियाँ… सब पंक्तियों के अंत में आँसुओं की कुछ बूंदें…
गांधीजी के जन्म के 150वें वर्ष पर…
आज है दो अक्तूबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान…
नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…
नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ…
आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की…
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा…
ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी…
हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के…
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा…
डायरी उठाने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढ़ाता हूँ तो सब कुछ गायब… डायरी… चश्मा… कलम… सब कुछ… आँखें भर आती हैं… गला रुँध जाता है… रोने की कोशिश करता हूँ… गले से आवाज ही नहीं निकलती… गले से सिसकियाँ निकलने लगती हैं…
सुनिये… सुनिये… श्रीमति जी मुझे हिला कर नींद से उठा रही हैं… पूछ रही हैं… क्या हुआ? इतनी देर से क्यों रो रहे हैं? श्रीमति से लिपट कर रो पड़ता हूँ…
सोच रहा हूँ… आखिर यह स्वप्न है या दुःस्वप्न? ईश्वर ने इस जटिल मस्तिष्क की रचना भी कितने जतन से की होगी। लोग कहते हैं कि सोचना बंद कर दो। अरे भाई! आपको सारे शरीर में कहीं कोई ऐसा स्विच दिख रहा है क्या कि- ऑफ कर दूँ और सोचना बंद हो जाए? यह तो मस्तिष्क में ही कहीं होगा तो होगा । यदि होगा तो जाते समय अपने आप ऑफ हो जाएगा…
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आप घर कह रहे जिसे मेरा…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – शाश्वत सत्य…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “बेटे…“।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८१ ☆
लघुकथा ☆ बेटे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
कहानी –
सूरज की तपिश ठंडी होती जा रही थी और प्रकाश लालिमा में बदल कर सुमधुर वातावरण बनाता जा रहा था तभी राम नारायण अपने चिर-परिचित बरगद के नीचे बिछी बैंच पर बैठते जा रहे थे। वे बैठ भी नहीं पाए थे कि आवाज आई, “अरे राम, आ गए?”, उन्होंने एक नजर डाली और ओठों पर मुस्कान लाने का प्रयास करते हुए बैठ गए। तभी मनजीत सिंह उनके पास आ गए। यह उनके शाम की चौपाल की जगह थी, जहाँ रोज इकट्ठे होते और चर्चा किया करते। मनजीत ने राम नारायण का चेहरा उदास देखा तो पूछा कि सब खैरियत है न, चेहरा लटका क्यों है?
राम नारायण कुछ उत्तर देते कि उससे पहले कई आवाजें आसमान में तैर गईं। दोनों ने देखा चौपाल के अन्य साथी मुश्ताक, जोसेफ, गौतम, जहांगीर, महावीर, फ़ीरोज़ व एरियल हँसते बोलते चले आ रहे हैं। राम नारायण और मनजीत को शांत देखकर वे भी सहम गए और चुपचाप बैठ गए। एरियल ज्यादा देर शांत न रह सके । वरी सांई कुछ तो बोलो। मनजीत ने चुप्पी तोडी और बोले ,”राम प्रा के बड़े बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई है।” “बस” एरियल चिहुंके। राम नारायण बोले, “भाई हिंदू धर्म में बेटों का बड़ा महत्व होता है खास कर बड़े बेटे का, क्योंकि वही पिता को मुखाग्नि देता है, पिंडदान करता है और पिता को मोक्ष दिलाता है। इसलिए बेटों का बहुत महत्व है। बेटों को बुढ़ापे की लाठी माना जाता है। इससे बेटी का महत्व कम नहीं होता, वरन् वह कन्यादान का अवसर प्रदान करके माता पिता का जीवन सफल बनाती है।”
इस पर मुश्ताक बोले, ” इस्लाम धर्म में बेटा बेटी दोनों को अल्लाह की नेमत माना जाता है। बेटी को रहमत और बेटे को नेअमत बताया गया है। रहमत का मतलब अल्लाह की दया है और नेअमत अल्लाह का इनाम है। बेटों को बुढ़ापे का सहारा तो माना जाता है क्योंकि बेटियाँ पराए घर चली जाती हैं।” मुश्ताक चुप हुए ही थे कि जोसेफ बोल पडे, ” ब्रदर ईसाई धर्म में बेटा बेटी में कोई आध्यात्मिक अंतर नहीं माना जाता। दोनों ईश्वर की संतान हैं।” आगे एरियल बोले, ” यहूदी धर्म में सबसे बड़े बेटे को धार्मिक महत्व ज्यादा मिलता है। उसे पिता की विरासत में अन्य संतान की अपेक्षा दोगुना हिस्सा मिलता है। धार्मिक कर्तव्यों के लिए बेटों का होना जरूरी माना जाता है। लेकिन अब अंतर आ गया है। बेटियाँ भी धार्मिक कर्तव्यों में हिस्सा लेने लगी हैं।”
“ओ बादशाहो, गुरु ग्रंथ साहिब में स्त्री पुरुष समानता पर बहुत जोर दिया गया है। इसलिए सिख धर्म में बेटा बेटी में कोई भेद नहीं होता।” गुरमीत सिंह ने अपनी सहज बुलंद आवाज में कहा। गौतम ने कहा, “बौद्ध धर्म में आदमी को मोक्ष स्वयं के कर्मों से मिलता है। बेटा बेटी का इससे कोई संबंध नहीं। हां, उन दोनों का अपना अपना महत्व तो होता ही है।” महावीर बोले, “जैन धर्म में भी बेटा बेटी में कोई भेद नहीं है।” सबकी बातें सुनकर फ़ीरोज़ गंभीरता से बोले, “पारसी धर्म में धर्म और पहचान दोनों पिता से चलती हैं। इसलिए पुत्र का महत्व ज्यादा है। उसे वंश चलाने वाला माना जाता है। लेकिन अब बेटियों को बराबर महत्व दिया जाने लगा है।”
चौपाल खत्म होने का समय हो गया। सबने उठते उठते कहा भाइयों समाज में स्त्री विमर्श पर खूब चर्चा होती है पर पुरुष विमर्श पर नहीं होती। वृद्धों पर बेटों के अत्याचार की चर्चा भी खूब होती है परंतु उनके त्याग, तनाव, भावना व श्रम की चर्चा नहीं होती। जब बेटा बेटी बराबर हैं तो हर क्षेत्र में बराबरी रहनी चाहिए। दोनों में किसी भी स्तर पर भेद नहीं देखना चाहिए। और एक दूसरे से हाथ मिला कर सभी अपने अपने घर चल दिए।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – एक फूल और एक नई राह।)
☆ लघुकथा # १३१ – एक फूल और एक नई राह☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
अनंत चतुर्दशी के दिन शहर की सड़कें गणपति विसर्जन की तैयारियों से गुलजार थीं। कहीं ढोल-नगाड़े बज रहे थे, कहीं श्रद्धालु जयकारे लगा रहे थे—“गणपति बप्पा मोरया!”
सीता मंदिर से पूजा करके लौट रही थी। हाथ में पूजा की थाली थी, लेकिन मन वर्षों से एक अनकही पीड़ा से भरा था। विवाह को कई साल बीत चुके थे। हर दूसरे दिन कोई न कोई पूछ ही देता—“अभी तक कोई खुशखबरी नहीं?” वह मुस्कुराकर बात टाल देती, मगर हर सवाल उसके भीतर एक खालीपन छोड़ जाता।
आज मंदिर में उसने माँ गौरी के सामने बस इतना कहा था—“माँ, मेरी गोद भरना मेरे हाथ में नहीं है, पर मुझे किसी के काम आने का अवसर जरूर देना।”
वह सड़क पार करने ही वाली थी कि अचानक भीड़ के बीच एक छोटा बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया।
“माँ… माँ…!”
लोग अपनी-अपनी धुन में आगे बढ़ रहे थे। बच्चा घबराकर इधर-उधर देख रहा था।
सीता उसे सड़क किनारे ले आई। पानी पिलाकर प्यार से पूछा, “तुम्हारी माँ कैसी दिखती हैं?”
बच्चा सुबकते हुए बोला, “लाल साड़ी… माथे पर बड़ी बिंदी…”
सीता ने आसपास नजर दौड़ाई। कुछ ही मिनटों बाद एक महिला बदहवास-सी दौड़ती हुई आई।
“मेरा बेटा! मेरा बेटा कहाँ है?”
बच्चा सीता का हाथ छोड़कर माँ की ओर दौड़ पड़ा।
महिला ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“बहनजी, आपने आज मेरी जान बचा ली। भीड़ में इसका हाथ छूटा तो लगा सब कुछ खत्म हो गया।”
सीता ने मुस्कुराकर कहा, “बच्चा मिल गया, बस यही बड़ी बात है।”
बच्चा माँ की बाँहों से झाँककर बोला, “आंटी, धन्यवाद!”
सीता कुछ क्षण उसे देखती रही। उसके चेहरे पर बरसों बाद सहज मुस्कान आई।
वापस लौटते समय सड़क किनारे फूलों की दुकान दिखाई दी। उसकी नजर लाल गुड़हलों पर पड़ी। उसने दो फूल खरीदे और थाली में रख लिए।
घर पहुँचते ही पति ने पूछा, “आज देर कैसे हो गई?”
सीता ने सारी घटना सुना दी।
कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली, “आज मुझे एक बात समझ आई।”
“क्या?”
“माँ होना केवल बच्चे को जन्म देना नहीं है। किसी रोते हुए बच्चे का हाथ थामना भी माँ होना है।”
वह रुकी, फिर धीमे स्वर में बोली, “हमारी गोद भरेगी या नहीं, मैं नहीं जानती। लेकिन अगर किसी बच्चे को माँ, घर और अपनापन चाहिए… तो क्या हम उसे अपना नहीं सकते?”
पति ने उसकी ओर देखा और उसका हाथ थाम लिया।
“इस बारे में आज से साथ मिलकर सोचेंगे।”
सीता की आँखें भर आईं। उसकी नजर थाली में रखे दो लाल गुड़हलों पर टिक गई।
सुबह वह एक फूल लेने निकली थी, शाम तक उसके हाथ में दो फूल थे।
एक उसकी बरसों पुरानी इच्छा का प्रतीक था, दूसरा शायद नई राह का संकेत।
बाहर गणपति विसर्जन की जयकार गूँज रही थी—”गणपति बप्पा मोरया!”
सीता ने आँखें बंद कर लीं।
आज उसने कोई मन्नत नहीं माँगी।
बस मुस्कुराकर कहा— “बप्पा, आज समझ गई… माँ बनने के लिए गोद भरना जरूरी नहीं, किसी का हाथ थामना जरूरी है।”
आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वे कमी के नहीं, एक नई शुरुआत के आँसू थे।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६४ ☆
☆ बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “समय चक्र के सामने…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३६ ☆
☆ समय चक्र के सामने…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है कवि – श्री आशुतोष झुड़ेलेजी द्वारा लिखित “काश! मैं बादल होता” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१६ ☆
☆ “काश! मैं बादल होता” – कवि – श्री आशुतोष झुड़ेले ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/
कृति -काश! मैं बादल होता
कवि – आशुतोष झुड़ेले
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)
☆ जीवन को देखने की सहज दृष्टि – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कविता के लिए हमेशा किसी असाधारण घटना की जरूरत नहीं होती। एक खाली मेज़, उड़ती पतंग, पहली बारिश की खुशबू, किसी मित्र की स्मृति या मन में उठती कोई छोटी-सी शिकायत भी कविता का कारण बन सकती है। आशुतोष झुड़ेले ‘ओ रे कबीरा’ का संग्रह ‘काश! मैं बादल होता’ इसी सहज अनुभूति से निकली 51 कविताओं का संसार है। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि ये कविताएँ जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, त्योहारों, घटनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों से बनी हैं।
इस संग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि कवि कविता लिखने से अधिक जीवन को पकड़ने की कोशिश करता है। ‘बग़ीचे की मेज़’ इसका सुंदर उदाहरण है। सामान्य-सी दिखाई देने वाली एक मेज़ कवि की दृष्टि में अनेक जीवन-कथाओं की साक्षी बन जाती है। वहाँ बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं, प्रेमी युगल हैं, अकेलेपन की तलाश में आए लोग हैं और अपने हिस्से के लिए संघर्ष करते चेहरे भी। अंततः वही मेज़ खाली होती है और कवि को लगता है,“यहीं तो मेरी मुलाक़ात आज उम्मीद से होने वाली है।” वस्तु को जीवन के रूपक में बदल देना इस कविता की उपलब्धि है।
संग्रह में स्मृति एक महत्वपूर्ण संवेदनात्मक आधार है। ‘चुरा ले गए’ में कवि उन चीजों की तलाश करता है जो आधुनिक जीवन में धीरे-धीरे हमसे छूटती जा रही हैं, सुबह की ताजगी, शाम की सादगी, पहली बारिश की खुशबू, बगीचे के फूल और आँगन की मिट्टी। “कुछ लोग पहली बारिश की ख़ुशबू चुरा ले गए” केवल एक सुंदर बिंब नहीं, संवेदनाओं के क्षरण की ओर बड़ा संकेत है।
इसी क्रम में ‘पतझड़ के भी रंग होते हैं’ जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी सौंदर्य खोजती है। पतझड़ यहाँ अंत नहीं, देखने की नई दृष्टि है। सूखे पत्तों, गिरे फूलों और पुराने गीतों में भी रंग और स्मृति बची हुई है। यह कविता संग्रह के आशावादी स्वर को पहचान देती है।
‘पतंग सी जिंदगी’ में जीवन की उड़ान और उसकी डोर का सुंदर साम्य है। पतंग दूर जाती है, लौटती है, हवा से संघर्ष करती है, फिर भी डोर से जुड़ी रहती है। स्वतंत्रता और संबंधों के बीच मनुष्य की स्थिति को कवि ने एक परिचित लोक-प्रतीक में सहजता से बाँधा है।
आशुतोष की कविता केवल निजी अनुभवों तक सीमित नहीं रहती। ‘भीड़ की आड़ में’ सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा प्रश्न करती है। धर्म, जाति और सामूहिक पहचान के पीछे छिपकर मनुष्य अपने दोषों से बचने की कोशिश करता है। कविता का निष्कर्ष आत्ममंथन की ओर ले जाता है,दोष किसी भीड़ का नहीं, अंततः मनुष्य का अपना है।
‘हम सोचते हैं’ इसी तेवर को व्यंग्य में बदलती है और हमारी सामाजिक स्मृति तथा आत्ममुग्धता पर चोट करती है।
‘दर दर गंगे’ में सांस्कृतिक आस्था और पर्यावरणीय चिंता साथ दिखाई देती हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा में कवि उस नदी की पीड़ा दर्ज करता है जिसे हम माँ कहते हैं, जिसकी आरती करते हैं, पर जिसकी रक्षा का दायित्व भूल जाते हैं। “बहाती जा रही बस आँसू” जैसे बिंब श्रद्धा को जिम्मेदारी से जोड़ देते हैं। इस तरह के कई नवाचारी रूपक कवि की अनुभव जन्य भाषा ,भाव , शब्द सामर्थ्य के परिचायक हैं। यद्यपि यह कवि की पहली ही कृति है, उनके व्यक्तित्व की तरह व्यापक सुगठित सरल तथा परिपक्व है।
‘भोपाल’ संग्रह की अत्यंत छोटी, किंतु गहरी कविता है। “हवा क्या होती है, पूछो भोपाल से…” जैसे लगातार प्रश्न एक त्रासदी को केवल घटना न रहने देकर सामूहिक स्मृति में बदल देते हैं। शब्द कम हैं, लेकिन उनके पीछे भय, अन्याय और जीवन-मृत्यु का पूरा अनुभव उपस्थित है। भोपाल गैस त्रासदी पर केंद्रित यह कविता महत्वपूर्ण संवेदी, दस्तावेजी रचना बन पड़ी है।
रिश्तों की नाजुकता भी कवि की प्रमुख चिंता है। ‘डोर’ में समय और संबंध दोनों को ऐसे धागे की तरह देखा गया है जो लंबा होने पर अपना सिरा खो देता है और तनिक से झटके में टूट भी सकता है। ‘रिश्ते’ कविता अपेक्षा और उपेक्षा के बजाय देने और कर्म को महत्व देती है। ‘शिकायत थी मुझको’ में शिकायतों की पूरी सूची अंततः आत्मबोध सामने लाती है। कबीरा का मुस्कुराकर ‘मूरख’ कहना कविता को उपदेश नहीं, आत्मव्यंग्य बना देता है।
खुद पर व्यंग्य कर पाना एक सामर्थ्यवान कवि की पहचान है।
‘पहचानो तुम कौन हो?’ संग्रह की उल्लेखनीय रचनाओं में है। भेड़ों के बीच पला शेर का बच्चा स्वयं को भेड़ समझता रहता है। अपनी वास्तविक पहचान से अपरिचित यह शेर हमारे भीतर छिपी संभावनाओं का रूपक बन जाता है। कविता का प्रश्न इसलिए केवल शेर से नहीं, पाठक से भी है, हम अपने बारे में जो मानते हैं, क्या वास्तव में वही हैं?
संग्रह की भाषा उसकी अपनी पहचान है। हिंदी के साथ उर्दू और लोकभाषा के शब्द सहजता से आते हैं। पुनरावृत्ति, संवाद और लोकलय कई कविताओं को मंचीय प्रभाव देते हैं। ‘तू है गज’ में लगातार दोहराया गया संबोधन हाथी को भारतीय सांस्कृतिक स्मृति, शक्ति, करुणा और अस्तित्व के व्यापक प्रतीक में बदल देता है।
‘काश! मैं बादल होता’ की कविताएँ बड़े दार्शनिक निष्कर्षों का दावा नहीं करतीं। वे छोटे अनुभवों से छोटी-छोटी रोशनियाँ चुनती हैं। यही इनकी विशेषता है। कहीं स्मृति है, कहीं व्यंग्य, कहीं सामाजिक सरोकार, कहीं पर्यावरण की चिंता और कहीं आत्मसंवाद। कवि बादल बनकर उड़ना चाहता है, पतंग बनकर लौटता है, खाली मेज़ पर उम्मीद खोजता है और अंततः स्वयं से ही पूछता है, “पहचानो तुम कौन हो?”
कविताएं पढ़कर समझ आता है कि आशुतोष जी साहित्य के एक अच्छे पाठक हैं, तथा कला संस्कृति उनकी अभिरुचि है, जो रचनाओं में मुखर हुई दिखती है।
कविता यहाँ जीवन से अलग कोई सजाया हुआ संसार नहीं, बल्कि जीवन को थोड़ी देर ठहरकर देखने की कला है। ‘काश! मैं बादल होता’ इसी ठहरने, देखने और फिर भीतर कुछ बदल लेने का सहज आमंत्रण है।
कवि की आगामी रचना यात्रा के पड़ाव की प्रतीक्षा रहेगी।