(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सामयिक गीत – पुरुष दिवस।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५७ ☆
☆ सामयिक गीत – पुरुष दिवस☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
☆ लघुकथा ☆ 🇮🇳 जय हिंद की सेना 🇮🇳 ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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( लघुकथा )
बिटिया बिलख बिलख कर रोये जा रही थी। जबसे शहीद पिता के शव के गांव पहुंचने की खबर मिली, उसके आंसू थमने के नाम ही नही ले रहे थे।
मां का तो और भी बुरा हाल था। वह दहाड़े मारकर जमीन पर लोटलोट कर रो रही थी। उसके जीवन की गाड़ी थम गई थी। चूड़ियों के खनक गुम हो गयी थी।
पिछले महीने हवलदार जगदेव जब छुट्टी में गाँव आये थे तो अपनी घरइतीन सुखमणि से अपनी एकलौती बिटिया के हाथ पीले करने की चिंता, और उसके लिए एक सुयोग्य वर ढूंढने की बात करते-करते उनकी पूरी रात गुजर गई थी। अपने माई और बाबूजी के बीच हुई चर्चा को, सुमन ने जब से सुना न जाने क्यों उसके दिल में उसके सपनो के राजकुमार के आने की धमक सुनाई देने लगी थी।
लेकिन आज सब कुछ शांत था। न किसी पति-पत्नी के मध्य कोई चर्चा थी न किसी बेटी के दिल में किसी के आने की धमक थी। बस था तो सिर्फ सिर्फ एक कारूणिक मंजर, जहां एक शहीद का शव एक तख़्त पर लिटाया गया था। गांव के हर एक व्यक्ति की आंखों में उस शहीद का चेहरा चमक रहा था लेकिन खुली आंखों से देखने के शव के साथ उसका चेहरा मौजूद नहीं था।
सेना की टुकड़ी के द्वारा मातमी धुन बजायी जा रही थी। बंदूको से सलामी दिए जाने की रस्म पूरी हुई तो सुमन ने रोते रोते अंजुली भर फूल पिता के चरणों में रख दिए।
शव को अपने साथ ले आने वाले कैप्टन राघवेंद्र यह सब कुछ देख रहे थे। भीड़ में खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने जब रोते -रोते यह कहा कि अब जगदेव की बिटिया के लिए वर कौन ढूढ़ेगा। उसके हाथ पीले कब होंगे, बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र के मन में करुणा और मानवता के बादल उमड़ने लगे। सुमन अपने पिता के शव को देखकर दहाड़े मारकर रो रही थी और बेहोश हुए जा रही थी। एक बार तो ऐसा लगा कि सुमन पूरी तरह से बेहोश होकर जमीन पर गिर जाएगी लेकिन बगल में खड़े कैप्टन राघवेंद्र ने उसका हाथ थाम लिया। बेहोश सुमन को कैप्टन के मजबूत बाहों ने जमीन पर गिरने से रोक लिया।
कैप्टन राघवेंद्र के दिल में उमड रहे मानवता और करुणा के बादल शांत नदी के नीर के रूप में बदल गए थे। यहां से उनके मन में चिंतन प्रारंभ हो गया था।
इस दर्दनाक घटना के बीते कई महीने गुजर गए। आज बहुत दिनों बाद शहीद हवलदार जगदेव के घर पर मातमी धुन की जगह शुभ मंगल शहनाई की धुन बज रही थी। बरात शहीद के घर की तरफ पहुंची, तो भीड़ में खड़ा हर कोई व्यक्ति दूल्हे के चेहरे को देखना चाहता था।
पर यह क्या !! आज गाँव का हर कोई यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित और खुशी से झूम रहा था जब कैप्टन राघवेंद्र फौजी वर्दी में नहीं बल्कि दूल्हे के वेश में सुमन का हाथ था में जयमाल मंडप की तरफ बढ़ रहे थे।
लोगो ने जब अपनी स्मृतियों को खंघाला तो उन्हें बीते दिनों का वह दृश्य दिखाई दे रहा था, जब दूल्हे के वेश में खड़े इस नौजवान ने फौजी के वेश में बेहोश होकर जमीन पर गिर रही सुमन का हाथ थामा था।
बटालियन की वही टुकड़ी आज एक बार फिर शहीद हवलदार जगदेव के दरवाजे पर बाराती के भेषभूषा में खड़ी थी। लाल जोड़े में सजी सुमन ने कैप्टन राघवेंद्र के गले में वरमाला डाला तो कैप्टन राघवेंद्र ने एक जयमाला सुमन को भी पहना दिया। हवलदार जगदेव के दरवाजे पर खड़ी भीड़ ने भारत माता की जय के उद्घोष के साथ फूलों की वर्षा की तो कैप्टन राघवेंद्र और सुमन ने भी शहीद हवलदार जगदेव के चित्र पर पुष्पांजलि की। शहनाई की धुन बज रही थी। प्रत्येक दिशाओं में मंगल मंगल हो रहा था और एक अनोखा दृश्य उभर कर आ रहा था।
भारतीय सेना के एक जवान ने आज सीमा पर नहीं बल्कि समाज के बीच एक अलग मिसाल पेश करते हुए, सबका दिल जीत लिया था। सबकी नज़रें नम थी और सभी कैप्टन राघवेंद्र को हृदय से बधाई दे रहे थे।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१३ ☆ श्री सुरेश पटवा
लेह के आसपास
02 जुलाई 2022 को नाश्ता करने के बाद लेह के आसपास भ्रमण को निकले। होटल में पता चला कि जयपुर से आये पर्यटकों को आक्सीजन की कमी के कारण साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है। लेह समुद्र तल से तक़रीबन 12,000 फुट ऊँचाई पर है। अब हमें 13,000 फुट पर जाना था। हमने पेपर नैप्किन में कपूर की एक-एक गोली रखकर सभी साथियों को इस निर्देश के साथ पकड़ा दी कि वे इसे थोड़ी-थोड़ी देर में सूंघते रहें। इससे उन्हें घुमावदार चढ़ाई वाले रास्तों पर मितली की परेशानी नहीं होगी और आक्सीजन की कमी भी न होगी। जब भी किसी स्थान के विभिन्न पर्यटन केंद्रों पर घूमने जाना हो तो टैक्सी वाले एक तरीक़ा अपनाते हैं कि सबसे नज़दीक के स्थलों पर पर्यटकों का अधिक समय खर्च कराने की जुगत में रहते हैं। लंच तक उसी स्थान के आसपास तीन बज जाएँ और इतने थक जाएँ कि लम्बी दूरी के स्थान पर जाने लायक़ न रहें या जाने को अनिछुक हो जायें। हमने टैक्सी चालक को लेह से सत्तर किलोमीटर दूरी पर स्थित अलची गोम्पा स्थल पर सबसे पहले चलने को कहा। थोड़ी आनाकानी के बाद वह सहमत हो गया। उसने गाड़ी में डीज़ल भरवा लिया।
लिकिर गोंपा
वाहन तेज गति से लेह-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 01 पर चल पड़ा। सबसे पहले 52 किलोमीटर पर हमारा पड़ाव लिकिर गोंपा था। यह लेह के पश्चिम में 3700 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी पहाड़ी पर सुरम्य रूप से स्थित है। यह तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग्पा संप्रदाय द्वारा लद्दाख के पांचवें राजा, ल्हाचेन ग्यालपो (ल्हा-चेन-रग्याल-पो) की कमान के तहत 1065 में लामा दुवांग चोसजे ने स्थापित किया गया था। वर्तमान में लगभग 120 बौद्ध भिक्षु इस मठ में रहकर साधना करते और धर्म चक्र प्रवर्तित करते हैं। यहाँ लगभग तीस छात्रों वाला एक स्कूल है। जिसमें बौद्ध धर्म सम्बन्धी शिक्षा तीन भाषाओं, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी में प्रदान की जाती है। इसे केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान चलाता है।
मठ में दो सभा मंडप हैं, जिन्हें दुखांग के नाम से जाना जाता है। जीवन सतत दुख का अंग है। उससे मुक्त होने के लिए निर्वाण सुखांग है। दुखांग में बोधिसत्व (जिसने सत्य जान लिया है), अमिताभ (जिसकी अमिट आभा है) शाक्यमुनि ( शाक्यों में जो मुनि है), मैत्रेय (भविष्य के बौद्ध) और पीली टोपी संप्रदाय के संस्थापक त्सोंग खापा की बड़ी मूर्तियाँ हैं। एक केंद्रीय प्रांगण के दाईं ओर ध्यान केंद्र स्थित है जिसमें सात-सात लामाओं के बैठने की छह पंक्तियाँ और लिकिर के प्रमुख लामा के लिए एक सिंहासन है।
मठ में एक संग्रहालय है जिसमें पुरानी पांडुलिपियों का भंडार है। उल्लेखनीय थंका पेंटिंग संग्रह और पुरानी वेशभूषा और मिट्टी के बर्तन हैं। छत पर बैठे मैत्रेय की 75 फीट ऊंची सुनहरे रंग की मूर्ति है। यह बुद्ध मूर्ति 1999 में बनकर तैयार हुई है। बाईं दीवार में 35 इकबालिया बुद्धों के चित्र हैं, जबकि दाहिनी दीवार में शाक्यमुनि की एक छवि है। एक सीढ़ी हॉल से बाहर निकलती है, जो प्रमुख लामा का कमरा ज़िनचुन की ओर जाती है। जिसमें मुख्य रूप से थंका और लामाओं की छवियां और अवलोकितेश्वर की पत्नी तारा की अभिव्यक्तियाँ हैं।
हमारा समूह दो भागों में बँट गया। इस कारण से ज़रूरत से अधिक समय इस मठ में व्यतीत हुआ। हमें आज दस पर्यटन स्थलों का भ्रमण करना था इसलिए सभी को समूह में साथ रहने और प्रत्येक स्थल पर समय निर्धारण करने की हिदायत दी गई।
अलची गोम्पा
अगला पड़ाव सिंधु नदी के दक्षिण तट पर 3,100 मीटर (10,200 फीट) की ऊंचाई पर लेह से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अलची मठ है। सिंधु नदी की सहायक नदियों के किनारे बीस किलोमीटर चलकर अलची गोम्पा पहुँचे। गोम्पा या गोम्बा या गोन्पा तिब्बती शैली में बने एक प्रकार के बौद्ध-मठ के भवन या भवनों के समूह को कहते हैं। तिब्बत, भूटान, नेपाल और लद्दाख़, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम व अरुणाचल प्रदेश क्षेत्रों में कई स्थानों पर गोम्पा बने हैं।
अलची गोम्पा को लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश के लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के तहत संचालित लेह जिले के अलची गांव में मंदिरों के मठ परिसर (चोस-खोर) के रूप में जाना जाता है। इस परिसर में निचले लद्दाख क्षेत्र के अलची गांव में चार अलग-अलग बस्तियां हैं। जिनमें विभिन्न अवधियों के स्मारक हैं। इन चार बस्तियों में लिकिर मठ द्वारा प्रशासित अलची गोम्पा सबसे पुराना और सबसे प्रसिद्ध कहा जाता है।
अलची परिसर के निर्माण का श्रेय 10 वीं शताब्दी में प्रसिद्ध विद्वान-अनुवादक रिनचेन ज़ंगपो (958-1055) को दिया जाता है, साथ ही लामायुरु मठ, वानला, मांग-ग्यू और सुमदा का नाम भी उनके नाम के साथ जुड़ा है। दसवीं शताब्दी के दौरान, गुगे के तिब्बती लामा-राजा येशे- Ö ने ट्रांस हिमालय क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रसार करने के लिए 21 विद्वानों को क्षेत्र आवंटित करके मठ निर्माण की पहल की थी। हालांकि, कठोर जलवायु और विषम स्थलाकृतिक परिस्थितियों के कारण, केवल दो ही जीवित रहे, उनमें से एक सम्मानित विद्वान और अनुवादक रिनचेन जांगपो थे। जिन्होंने लद्दाख क्षेत्र और हिमाचल प्रदेश और सिक्किम सहित भारत के अन्य क्षेत्रों में बौद्ध मठों की स्थापना की थी। अपने प्रवास के दौरान, वे नेपाल, भूटान और तिब्बत के पड़ोसी देशों में भी गए। जांगपो को “लोहत्सावा” या “महान अनुवादक” के नाम से जाना जाने लगा। उन्हें बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में 108 मठों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म को संस्थागत रूप दिया। इन मठों को तिब्बती बौद्ध धर्म के वज्रयान का मुख्य आधार माना जाता है। जांगपो ने पौराणिक 108 मठों में दीवार पेंटिंग और मूर्तियां बनाने के लिए कश्मीरी कलाकारों को लगाया। इनमें से केवल कुछ ही मठ बचे हैं, लद्दाख में अलची मठ परिसर को उनके द्वारा बनाए गए सभी मठों में प्रथम स्थान का गौरव प्राप्त है।
निचले लद्दाख क्षेत्र में अलची तीन गांवों में एक हिस्सा है जो ‘स्मारकों के अलची समूह’ का गठन करते हैं; अलची से सटे अन्य दो गाँव मंग्यू और सुमदा चुन हैं। इन तीन गांवों में स्मारकों को “अद्वितीय शैली और कारीगरी” कहा जाता है, लेकिन अलची मठ परिसर सबसे प्रसिद्ध है। यह एक मात्र मठ है जो पहाड़ी पर स्थित न होकर निचले धरातल पर है। मठ में उस समय के बौद्ध और हिंदू दोनों राजाओं के कलात्मक और आध्यात्मिक विवरण चित्रों में परिलक्षित होते हैं। ये लद्दाख की कुछ सबसे पुरानी पेंटिंग हैं। परिसर में बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और विस्तृत लकड़ी की नक्काशी और बारोक शैली में कला-कार्य भी हैं।
मठ परिसर में तीन प्रमुख मंदिर हैं: दुखांग (असेंबली हॉल), सुमत्सेक और मंजुश्री का मंदिर , सभी 12 वीं और 13 वीं शताब्दी की शुरुआत के बीच के हैं। चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके अलावा, अलची परिसर में दो अन्य महत्वपूर्ण मंदिर हैं, अनुवादक का मंदिर जिसे ‘लॉटसभा लखंग’ कहा जाता है और एक नया मंदिर जिसे ‘लखंग सोमा’ कहा जाता है। दुखंग या असेंबली हॉल और एक तीन मंजिला मुख्य मंदिर (gTsug-lag-khang), है, जिसे सुमत्सेग (gSum-brtsegs) कहा जाता है। कश्मीरी शैली में बनाया गया एक चौर्टेंस भी परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तीसरे मंदिर को मंजुश्री मंदिर (‘जाम-दपाल ल्हा-खांग) कहा जाता है। यहाँ दो सौ रुपए प्रवेश शुल्क जमा कराया जाता है। प्रवेश टिकट लेकर तीनों मंदिरों के दर्शन किये।
निम्मू गाँव
लद्दाख़ की मुख्य नदी सिंधु की मुख्य धारा का उद्गम तिब्बत में मानसरोवर झील के पास है। ज़ांस्कर पर्वत श्रृंखला से इसकी एक सहायक ज़ांस्कर नदी निकलती है। यह लद्दाख के पूर्वोत्तर भाग से होकर बहती है। इस क्षेत्र में ठंड के कारण सर्दियों जम जाती हैं। ज़ांस्कर नदी निम्मू (निमो) गांव में सिंधु नदी में मिलती है। हम निम्मू गाँव पहुँचे। निम्मू चाय-समोसा और चोल-पूरी के लिए बहुत प्रसिद्ध है। निम्मू में रुककर दोपहर का खाना निपटाया और चाय पी।
निम्मू गांव के पास कई पर्यटन स्थल हैं, जिनमें बाजगो, लिकिर और अलची मठ शामिल हैं। यहां का तापमान गर्मियों में 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर सर्दियों में -29 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। इतनी कठोर जलवायु और चरम मौसम की स्थिति के कारण बहुत कम वनस्पति आच्छादन है। यहाँ एक जलविद्युत ऊर्जा संयंत्र है जिसे निमु-बाजगो बांध के नाम से जाना जाता है। बाजगो मठ नदी किनारे देखते निकले।
सिंधु नदी भारतीय उपमहाद्वीप को जीवनदायिनी वरदान है। हिमालय महापर्वत उत्तर दिशा से ब्रह्मपुत्र महानद को तिब्बत से बंगलादेश तक पहुँचाता है। वहीं दक्षिण में तिब्बत और पामीर के पठार से अनेकों नदियों को मिलाकर सिंधु महानद को अरब सागर तक पहुँचाता है। मानो हिमालय भारतीय महाद्वीप को दोनों हाथों से सहेज रहा हो।
सिंधु नदी का कुल जल ग्रहण क्षेत्र 11,65,000 वर्ग किमी से अधिक है। लद्दाख में इसकी बायीं ओर की सहायक नदी ज़ांस्कर है, और मैदानी इलाकों में इसकी बाएँ किनारे की सहायक नदी पंजनाद हैं, जो पंजाब की पाँच नदियों, अर्थात् ब्यास, सतलुज, झेलम, रावी, और चिनाब, के क्रमिक संगम से बनती है। सिंधु उत्तरी भाग में एक पहाड़ी झरने से शुरू होकर हिमालय, काराकोरम और हिंदू कुश पर्वतमाला में ग्लेशियरों और नदियों से पोषित होकर समशीतोष्ण जंगलों, मैदानों और शुष्क ग्रामीण इलाकों के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करती है। इसकी दाहिने किनारे की सहायक नदियाँ श्योक, गिलगित, काबुल, कुर्रम और गोमल नदियाँ हैं। सिंधु नदी लद्दाख की रीढ़ है; सभी प्रमुख स्थान शे, लेह, बासगो और टिंगमोसगैंग नदी के करीब स्थित हैं।
यह ज़ांस्कर घाटी का क्षेत्र है। सुरू नदी ज़ांस्कर श्रेणी की पश्चिमी और उत्तरी सीमा बनाती है। सुरु कारगिल के उत्तर में थोड़ी दूरी पर द्रास और शिंगो नदियों के संयुक्त जल को प्राप्त करने के बाद बाल्टिस्तान के मरोल में सिंधु में शामिल हो जाता है, जो अब नियंत्रण रेखा के पाकिस्तान की ओर है। रंगदम मठ और जूलिडोक का परिचर गांव सुरु घाटी में अंतिम बसा हुआ क्षेत्र है; यह बकरवाल नामक खानाबदोश चरवाहों का भी गंतव्य है, जो हर गर्मियों में जम्मू क्षेत्र में ट्रेकिंग करते हैं। रंगदम, हालांकि पेन्सी-ला के उत्तरी किनारे पर, सुरू के बजाय सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ज़ांस्कर का हिस्सा माना जाता है।
ज़ांस्कर घाटी रंगदम से पेन्सी-ला में 4400 मीटर तक ऊँची हो जाती है। कारगिल सुरू घाटी का एकमात्र शहर, 1947 से पहले व्यापार कारवां के मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जो श्रीनगर, लेह, स्कर्दु और पदुम से लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर कमोबेश समान दूरी पर था।
हिमालय के उत्तरी भाग में भारी हिमाच्छादित फ्लैंक के तल पर ज़ांस्कर और सुरु घाटियाँ एक बड़ा ट्रफ़ बनाती हैं। ज़रा देखें ज़ांस्कर नदी कैसे आकार लेती है। ज़ांस्कर घाटी में दो नदियाँ, स्टोड (डोडा) और लुंगनाक (ज़ाराप लिंगती) के कुंड हैं। लुंगनाक की मुख्य सहायक नदियों में से एक ज़ाराप है, जो उत्तरपूर्वी हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों और घाटियों को त्सो मोरीरी (झील) के उत्तर-पश्चिम में सिर्फ 20 किलोमीटर दूर से आती है। बारा-लाचा-ला के उत्तर में थोड़ा दूर यह लिंगटी और एक अन्य सहायक नदी से जुड़ती है; इसके बाद यह उत्तर-पश्चिम की ओर बहती है और अचानक एक दर्रे से होकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है और फुगताल गोम्पा से होते हुए शिंगो-ला से उतरती कारग्याक नदी में मिल जाती है, जो हिमाचल प्रदेश से आती है। स्टोड पेन्सी-ला के नीचे द्रांग-ड्रंग ग्लेशियर पिघला हुआ पानी ले जाता है, और लुंगनाक के पास एक विस्तृत खुली घाटी में बहता है। ज़ांस्कर में भारी हिमपात होता है, पेन्सी-ला केवल जून में खुलता है और अक्टूबर के मध्य में फिर से अवरुद्ध हो जाता है। पूरी घाटी वस्तुतः वृक्षविहीन है। ज़ांस्कर नदी के रूप में इन सबका संयुक्त जल ज़ांस्कर रेंज में एक दर्रे के माध्यम से उत्तर की ओर बहता है, मध्य लद्दाख में निम्मू के नज़दीक में सिंधु नदी में शामिल होता है। उसी संगम के सामने आधा घंटा गुज़ारा।
ग्रीष्मकाल के दौरान, ज़ांस्कर नदी और भी प्रफुल्लित होती है और सर्दियों के दौरान यह हरे रंग में बदल जाती है जबकि सिंधु नीला हो जाता है। सिंधु नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 1) और ज़ांस्कर नदी में राफ्टिंग (जोखिम ग्रेड 2) लोकप्रिय आउटडोर खेल हैं। ज़ांस्कर और सिंधु नदियों का संगम इसके करीब स्थित है। निम्मू सभी रिवर राफ्टिंग समूहों के लिए एक पड़ाव है और सिंधु नदी में सालाना अखिल भारतीय रिवर राफ्टिंग अभियान के लिए मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।
हमने सिंधु नदी और ज़ांस्कर नदियों के संगम पर हिमाच्छादित शिखरों का अवलोकन किया। दो पहाड़ों के बीच बहती नीली-हरी सिंधु नदी का मटमैली ज़ांस्कर नदी के साथ संगम हम देख रहे हैं। रंगों के इस जादुई संगम के चारों ओर अनगढ़ सूखे पहाड़ों ने इसकी जीवंतता को और बढ़ा दिया है। सूर्य की आभा में जुड़ा नीले आसमान से उतरती पहाड़ियाँ – सचमुच भूमि की चुप्पी कितनी प्यारी है। फड़फड़ाते झंडे के साथ उभरते प्रार्थना के स्वरों ने सहूलियत बिंदु के साथ एक शांति जोड़ दी। पूरे वातावरण ने सम्मोहन से आगाह किया कि आप सब कुछ भूलकर मंत्रमुग्ध कर देने वाले परिदृश्य को हृदय में बसा लें।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “रिसते हुए रिश्ते…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २४८ ☆
☆ इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अनदेखे फलित सपने। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०० ☆
☆ अनदेखे फलित सपने… ☆
‘कुछ लोग उन चीज़ों को देखते हैं; जिनका अस्तित्व है और पूछते हैं कि वे ऐसी क्यों हैं? मैं उन चीज़ों के स्वप्न देखता हूं; जो कभी नहीं थीं और कहता हूं–वे क्यों नहीं हो सकतीं?’ जार्ज बर्नार्ड शॉ का यह कथन उनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचायक है कि संसार में जिन वस्तुओं का अस्तित्व है; उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करना सामान्य सी बात है। वास्तव में जिनका अस्तित्व नहीं है,जो कल्पना व स्वप्न हैं; जिनका अस्तित्व कभी नहीं था; उनके बारे में भी अपनी धारणा बनानी चाहिए कि वे क्यों नहीं हो सकतीं? ऐसी कल्पना विलक्षण प्रतिभा का धनी व्यक्ति ही कर सकता है। इस कथन को सार्थक करती हैं दुष्यंत की पंक्तियां– ‘कौन कहता है/ आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता/ एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ संसार में असंभव कुछ भी नहीं है। जो नहीं है,उसके बारे में चिंतन व शोध करना और उसे सबके के समक्ष प्रकट कर देना ही चमत्कार है। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण व एडिसन का बल्ब की खोज व अन्य वैज्ञानिकों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उन वस्तुओं के अस्तित्व व रूपाकार को स्पष्ट करना किसी अजूबे से कम नहीं है। ऐसे कार्य प्रभु-प्रदत्त प्रतिभा,दृढ़ निश्चय व अथक परिश्रम द्वारा संभव हो सकते हैं। इसमें सबसे अधिक योगदान रहता है आत्मविश्वास का; जो हमें निरंतर कर्म करने की प्रेरणा देता है तथा बीच राह से लौटने नहीं देता; न ही थककर निराशा का दामन थामने देता है।
सपने में होते हैं, शजो हम खुली आंखों से देखते हैं,क्योंकि वे हमें सोने नहीं देते और बंद आंखों से देखे गए सपनों का कोई अस्तित्व नहीं होता। अब्दुल कलाम की यह सोच मानव मन को ऊर्जस्वित करती है और वह इंसान तब तक चैन से नहीं बैठता; जब तक उसके सपने साकार नहीं हो जाते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत सार्थक है कि ‘मनुष्य युद्ध में सहस्त्रों पर विजय प्राप्त कर सकता है, लेकिन जब वह स्वयं पर विजय पा लेता है; सबसे बड़ा विजयी होता है,क्योंकि उसे आत्मावलोकन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जीवन में कठिनाईयाँ तो हमसाये की भांति हमारे अंग-संग रहती हैं। यदि हम उन्हें कष्टकारी मानते रहेंगे,तो वे हमें असीम पीड़ा व दु:ख पहुंचाएंगी। यदि हम उन्हें परछाई के रूप में स्वीकार लेंगे तो वे हमारा पथ- प्रशस्त करेंगी और हम आत्मविश्वास के बल पर दाना मांझी की भांति पर्वत काटकर बीस किलोमीटर लंबी सड़क अकेले ही बना पाने का साहस जुटा पाएंगे। वास्तव में चुनौतियां हमें प्रेरणा देती हैं और जब हम उन्हें जीवन का हिस्सा स्वीकार लेते हैं; वे हमारी पथ-प्रदर्शक बन निरंतर कार्य-रत रहने को प्रेरित करती हैं। सो! उनसे मुक्ति पाने का उपाय,उनकी सहज-स्वीकार्यता ही है।
बाबा आमटे बचपन में मन के अनुकूल न होने पर नाराज़ हो जाते थे,जो उनकी माता को बहुत अखरता था। एक बार वे पतझड़ के मौसम में उन्हें बगीचे में ले गयीं और दिखाया कि वृक्ष अपने पत्तों का त्याग कर रहे हैं और उनके स्थान पर नए पत्ते आकार ग्रहण कर रहे हैं। सो! मानव को भी सुखद जीवन जीने के लिए मन के दुराग्रह व धारणाओं का त्याग करके संबंधों को नवीन ढंग से सींचना चाहिए और अपने अप्रिय अनुभवों को पुराने पत्तों की भांति त्याग देना चाहिए। आमटे पर उक्त सीख का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे तुरंत अपने नाराज़ मित्र से मिलने पहुंच गए। वास्तव में यही जीवन है; सृष्टि का क्रम है। जीवन-मृत्यु का सिलसिला तो निरंतर चलता रहता है। संतोषानंद जी की यह पंक्तियां ‘जीवन का मतलब तो आना और जाना है/ परछाइयाँ रह जाती रह जातीं, रह जाती निशानी है।’ आज तक कोई भी इस रहस्य को नहीं जान पाया है कि इंसान कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है? धन-दौलत, महल-चौबारे व सगे-संबंधी सब यहीं धरे रह जाते हैं; केवल उसके कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है। इसलिए मानव को सत्कर्म व सबसे प्रेम-पूर्वक व्यवहार करने की सीख दी गई है।
मालवीय जी के मतानुसार ‘जो मनुष्य अपनी निंदा सुन लेता है; वह सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर लेता है अर्थात् वह सामर्थ्य केवल उसी व्यक्ति में होता है; जिसमें अहं भाव नहीं होता। टैगोर का ‘एकला चलो रे’ संदेश भी अनुकरणीय है कि ‘जो लोग बने-बनाए रास्ते पर न चलकर अपनी राह का निर्माण ख़ुद करते हैं; वे ही मील के पत्थर स्थापित करते हैं।’ टैगोर की भांति वे अपने सृजन अर्थात् कृत-कर्मों से कभी भी संतुष्ट नहीं होते। जीवन के अंतकाल में जब टैगोर बीमार पड़ गए थे तो विनोबा भावे उन्हें देखने गए और उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की। उन्होंने पचपन हज़ार गीतों की रचना कर इतिहास रच दिया है तथा टेनिसन, शैले आदि गीतकारों को भी पीछे छोड़ दिया है। परंतु उन्होंने यह उत्तर दिया कि ‘वे संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि अभी वे उन गीतों का सृजन नहीं कर पाए हैं; जो वे करना चाहते थे। वास्तव में वे गीत, जो गाये नहीं गए; आज भी उनके ज़हन में हैं,अधूरे हैं।’
सृजन एक साधना है और उत्तम साहित्यकार निरंतर साधना-रत रहता है और उसके हृदय में उत्कृष्ट सृजन का भाव सदैव विद्यमान रहता है। प्रत्येक साहित्यकार एक नयी कृति के सृजन को पाठकों तक पहुंचाने के मध्य प्रसव-पीड़ा से गुज़रता है। उस स्थिति में समाज के हर व्यक्ति की पीड़ा उसकी पीड़ा बन जाती है और वह उसे आत्मसात् कर जब तक उसकी अभिव्यक्ति नहीं कर लेता; चैन से नहीं बैठ सकता। उसे उन पात्रों के दर्द को जीना पड़ता है और जब तक वह अनुभूत पीड़ा उसी रूप में पाठकों के हृदय को आंदोलित नहीं करती; उसका सृजन सार्थक नहीं होता। काव्य-शास्त्र में यह विधा साधारणीकरण कहलाती है और नाटक में त्रासदी को देखते हुए जब दर्शकों के नेत्रों से अश्रुपात होने लगता है और वे उस क़िरदार की मनोदशा में पहुंच जाते हैं,तो वह सृजन सफल माना जाता है; जिसे पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में विरेचन की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। सोहनलाल द्विवेदी जी की ये पंक्तियां ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती/ लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती’ अर्थात् जो लहरों से डरकर किनारे पर बैठे रहते हैं; उनकी नौका कभी भी पार नहीं उतर सकती। सो! मानव को निरंतर प्रयासरत चाहिए।
किंग ब्रूसली ने एक मकड़ी को अपने जाले से बार-बार गिरते व चढ़ते देख उससे प्रेरणा प्राप्त की और पुन; युद्ध करने पर उन्हें विजय प्राप्त हुई। सो! जीवन में निरंतर संघर्ष-रत रहना चाहिए; कभी पराजय को स्वीकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि ‘मन के हारे हार है,मन के जीते जीत।’ वैसे भी जो हम सोचते हैं और जैसा हमारा नज़रिया होता है; वही घटित हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि नज़रें बदलने से नज़ारे बदल जाएंगे और नज़रिया बदलने से ज़िंदगी बदल जाएगी; जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा। अंत में स्वरचित पंक्तियों के माध्यम से मैं यह कहना चाहूंगी कि ‘मौसम भी बदलते हैं/ दिन रात बदलते हैं/ यह समां बदलता है/ जज़्बात बदलते हैं/ यादों से महज़ मिलता नहीं/ दिल को सुक़ून/ ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं,परंतु सृष्टि का क्रम अनवरत चलता रहता है। इसलिए ‘दु:खों से मत घबरा मानव/ यह समां भी गुज़र जाएगा।’ रात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर नयी आशा व नवीन स्वप्न लेकर दस्तक देती है और हमें ऊर्जस्वित करती है। इसलिए आशा का दामन थाम रखिए; जीवन में अप्रत्याशित करिश्में हो जाएंगे; जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)
संजय दृष्टि – समीक्षा का शुक्रवार # 26
कौन रोया रात भर? — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज
पुस्तक का नाम : कौन रोया रात भर?
विधा : कविता
कवयित्री : डॉ. ज्योति कृष्ण
प्रकाशन : क्षितिज प्रकाशन, पुणे
अनुभव में पगी नवोदित रचनाएँ☆ श्री संजय भारद्वाज
‘कौन रोया रात भर’ कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होनेवाला दूसरा संग्रह है। चूँकि उनका पहला और दूसरा कविता संग्रह एकसाथ ही प्रकाशित हुए हैं, अत: एक अर्थ में वे नवोदित हैं। दूसरा पहलू यह कि वे दीर्घकाल से लेखन कर रही हैं, अत: उनकी रचनाओं में जीवन का अनुभव उतरा है। फिर वे मनोविज्ञान की विद्यार्थी रही हैं, फलत: मनोभावों को बेहतर अनुभव करना और अनुभूति को कविता के माध्यम से अभिव्यक्ति देना, इस कविता संग्रह में प्रखरता से दृष्टिगोचर होता है।
अनुभव जब शब्दों में उतरता है तो कुछ इस तरह अभिव्यक्त होता है-
वक़्त अपने साथ भी बिता लीजिए,
फ़ुर्सत मिले तो कुछ गुनगुना लीजिए।
अनुभव की एक और बानगी देखिए-
पार उतरने वालों ने मूल्य नहीं दिया,
अब स्वयं दे रहा नदी पर पहरा पानी है।
आयु के साथ चेहरे पर झुर्रियों का आना प्राकृतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में अनुभव से उपजे दर्शन के दर्शन कुछ यूँ होते हैं-
दुखी मत होना ख़ुुद को आईने में देखकर,
सारे सिलवटें तब्दील हो जाएँगी राख में।
सिलवटों का राख होना जीवन की नश्वरता का प्रतीक हो सकता है। साथ ही यह आशावाद का उदाहरण भी हो सकता है। कारण स्पष्ट है कि विसर्जन के बाद ही सृजन होगा।
अनुभवी जानता है कि समय अपना लेखा-जोखा यहीं पूरा कर लेता है। कविता में कुछ इस तरह उतरा है यह लेखा-जोखा-
किसने क्या किया और क्यों किया,
सबसे सवाल-जवाब कर लेगा।
हमें ज़रूरत नहीं है जोड़ने-घटाने की,
व़क्त सारा हिसाब कर लेगा।
शिक्षित होने का अर्थ केवल साक्षर होना नहीं होता। नेह, अपनत्व न हो तो निरा अक्षर ज्ञान किसी काम का नहीं।
शिक्षित होने का इतना प्रमाण काफ़ी है मुझे,
मेरे मानस पर तुम्हारा स्नेह का हस्ताक्षर हो।
दाम्पत्य का प्राणतत्व है प्रेम। इसमें अनुकूलता, प्रतिकूलता, सहमति, असहमति सबका इंद्रधनुष अंतर्निहित होता है । इस इंद्रधनुष के अनेक रंगों को अपनी लेखनी की स्याही में भरकर कवयित्री कुछ चित्र उकेरती हैं-
1)
अपने मज़बूत इरादों से तुम हामी भरवा ही लेते हो,
लेकिन अब इच्छा है मेरी आनाकानी तुम तक पहुँचे।
2)
सोचा था कि कुछ पढ़ूँगी देर रात तक जाग कर,
और उनकी ख़्वाहिश थी कि बंद करके किताब रख दूँ।
सामान्यतः दो ध्रुवों का आत्मीय समन्वय होता है दाम्पत्य। यही दाम्पत्य का आकर्षण है और सहधर्मिता का सौंदर्य भी। इसकी यह बानगी देखिए-
बंधन होता है अगर सात जन्मों का, तेरे मेरे साथ का ये पहला जनम है।
जब तक साथ है, हाथों में ये हाथ है, हाथ ये छुड़ा ले नहीं किसी में भी दम है।
शब्दों का अपना सामर्थ्य है, अपने अर्थ हैं, अपनी अभिव्यक्ति है, तथापि मौन की मुखरता का आयाम विस्तृत होता है।
अंतर्मन के द्वंद्व को, समझ सका है कौन।
वाणी जब सकुचा गई, मुखर हो गया मौन॥
फिर स्त्री का मानिनी रूप अपनी ख़ामोशी को मनवाना भी चाहता है।
जिन्हें फ़र्क पड़ता हो मेरी ख़ामोशियों से,
मना लेें वे मुझे आकर, रूठे हुए हैं हम।
प्रेम की विशेषता है रूठना, मनाना, एक दूसरे की भावना को समझना और उसे मान देना। राधा रानी रूठती थीं तो कृष्ण मनाते थे। सिक्के का दूसरा पहलू है कि कृष्ण मनाते थे तो राधा रानी रूठती थीं।
हम इक्कीसवीं सदी का नागरिक होने का कितना ही ढोल पीट लेें पर घर-परिवार, समाज में स्त्री को उसका समुचित स्थान और सम्मान देने में हमारा हाथ तंग ही रहा है। इस विसंगति की अभिव्यक्ति कवयित्री के शब्दों में कुछ इस तरह से स्थान पाती है-
परिवार को अपनी ममता और स्नेह से बाँध रखा,
रिश्तों की इस गर्माहट के प्रति रही है सर्द दुनिया।
सामूहिक थे तो परिवार थे, एकल हुई तो ‘फैमिली’ हो गए। समूह से एकल होने की यात्रा ने विश्व के किसी भी अन्य समुदाय की अपेक्षा भारतीय समाज को अधिक प्रभावित किया है। ऐसे में सामूहिकता का आनंद और सुरक्षा चक्र देख चुकी कवयित्री का युवाओं को स्पष्ट संदेश है-
घोसलों में अपने लौट कर परिंदे भी आते हैं,
भूल मत कभी करना, घर अलग बसाने की।
एकल होना यानी जड़ों से कटना, अपनों से कटना। जो अपनों का ना हो सका, उसका किसी अन्य से जुड़ सकने का विचार ही अतार्किक है।
दूसरों में क्या जुड़ेंगे, जुड़ न पाए अपनों से जो,
बढ़ रहा है सामर्थ्य लेकिन भावनाएँ घट रही हैं।
एकल से एकाकी होता है मनुष्य। फिर इच्छा जागती है कि कोई जाने, पूछे उसके दुख को। इस पीड़ा की यह अभिव्यक्ति देखिए,
हमें भी ख़्वाहिश है कि मन के बोझ को हल्का करें,
पूछोगे तो बता देंगे कि क्यों इतने उदास हैं।
स्त्री को दो घरों की ज्योति यूँ ही नहीं कहा जाता है। डॉ ज्योति कृष्ण का मायका बिहार है जबकि उनकी ससुराल उत्तर प्रदेश है। दोनों राज्यों के भौगोलिक और सांस्कृतिक दर्शन पर उनकी कविताएँ इस संग्रह में हैं। यह सम्बंधों के लिए उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है तो मायके और ससुराल के प्रति उनके ममत्व को भी अभिव्यक्त करता है।
इस संग्रह में प्रकृति की सुंदरता, उसकी अठखेलियोेंं का वर्णन है। कहीं वसंत का ख़ुमार शब्द पाता है, कहीं वर्षा की बयार की सौंध से कहन महक उठती है। कहीं काम की तलाश में गाँव से शहर की ओर होते पलायन का चित्रण है तो कहीं पर्यावरण पर चिंता शब्दों में ढलती है। इस संग्रह में माँ से सम्बंधित कविता है, पिता पर आधारित कविता है, अपने मकान से मध्यम वर्ग के जुड़ाव को दर्शाया गया है। संग्रह में मनुष्य की वाणी के महत्व पर रचना है तो देशभक्ति की वीणा की झंकार भी है।
पेड़-पौधों लता-गुल्मों से पर्यावरण हरा रहे,
विनाश से बची रहे, दीर्घायु धरा रहे।
सामूहिक हो या एकल, रिश्तो में वह प्रगाढ़ता नहीं रही जिसके चलते रिश्तों को रिश्ता कहा जाता था। सांप्रतिक स्थिति का यह सटीक बिम्बात्मक वर्णन देखिए-
रिश्तों की रौनकें आबाद अगर रहतीं,
घरों में मकड़ियों के जाले नहीं होते।
कहा जाता है, ’बेसिक्स नेवर चेंज।’ कितनी ही प्रौद्योगिक उन्नति हो जाए, सुख, सुविधा के साधन आ जाएँ, मूलभूत कभी नहीं बदलता। इसकी यह बानगी देखिए-
ज़िंदगी एक मोड़ पर थक कर बैठ जाती है,
अगर चलते रहना है तो पाँव से रिश्ता रखना।
‘य: क्रियावान स पंडित:।’ बिना उद्यम, बिना श्रम के कभी कोई परिणाम नहीं मिलता।
सोचा बहुत कुछ, किया कुछ नहीं,
तभी हाथ मेरे, लगा कुछ नहीं॥
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारा संविधान हमारा मार्गदर्शक है। कवयित्री को संविधान की प्रस्तावना मानो कंठस्थ है। इस संदर्भ में वे कहती हैं-
संविधान की हर पंक्ति सर आँखों पर,
प्रस्तावना के शब्द ज़बानी याद रहेें।
सृजन मनुष्य को विचार देता है। विचार मेेंं मनुष्य को चमत्कृत करने की क्षमता छिपी होती है। उसके चिंतन और मनन का कैनवास बड़ा हो जाता है। इस संदर्भ में शब्दों का यह चमत्कार देखिए-
जाने कौन चुपके से, ख़्वाब अपने रखकर गया,
चौकसी करनी पड़ेगी अब हमें सिरहाने की।
डॉ. ज्योति कृष्ण की कविता यात्रा जीवन के सारे खट्टे- मीठे अनुभवों को जोड़कर चलती है। उनकी रचनाएँ स्वयं को जलाकर रोशनी करने की मानिंद हैं।
एक छंद मिला उस पार नदी के,
एक पर्वत के पार मिला।
पुष्प-पराग से अक्षर निकले,
शब्दों को शृंगार मिला॥
*
भाव मिले सागर के अंदर,
भाषा स्वर्ण खदानों से।
सब जोड़ा तब जाकर कवि के,
अंतस को उद्गार मिला॥
प्रस्तुत पुस्तक का मुखपृष्ठ प्रसिद्ध चित्रकार संदीप राशिनकर ने बनाया है। यह चित्र शीर्षक को बहुआयामी बनाता है।
जीवन के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित हुए कवयित्री के अंतस के उद्गारों के इस संग्रह के लिए कहा जा सकता है कि ‘देर आयद, दुरुस्त आयद।’ कामना है कि उनका यह संग्रह उन्हें साहित्य के क्षेत्र में समुचित प्रतिष्ठापना दे।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – विश्वासों की होरी…।
रचना संसार # ७२ – गीत – विश्वासों की होरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्यार ।)