हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२८ – बाल कथा – चतुराई धरी रह गई! – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बाल कथा – “चतुराई धरी रह गई!” की समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२८ ☆

☆ बाल कथा – चतुराई धरी रह गई! ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

चतुरसिंह के पिता का देहांत हो चुका था. उस ने अपने छोटे भाई कोमलसिंह को बंटवारा करने के लिए बुलाया, “बंटवारे के पहले खाना खा लेते है.” खाने परोसते हुए चतुरसिंह ने कोमलसिंह से कहा.

कोमलसिंह ने जवाब दिया, “ भैया ! बंटवारा आप ही कर लेते. मुझे अपना हिस्सा दे देते.बाकि आप रख लेते. मुझे बुलाने की क्या जरुरत थी ?”

“नहीं भाई. मै यह सुनना बरदाश्त नहीं कर सकता हूँ कि बड़े भाई ने छोटे भाई का हिस्सा मार लिया,” कहते हुए चतुरसिंह ने भोजन की दो थाली परोस कर सामने रख दी.

एक थाली में मिठाई ज्यादा थी. इस वजह से वह थाली खालीखाली नजर आ रही थी. दूसरी थाली में पापड़, चावल, भुजिए ज्यादा थे. वह ज्यादा भरी हुई नज़र आ रही थी. मिठाई वाली थाली में दूधपाक, मलाईबरफी व अन्य कीमती मिठाइयाँ रखी थी.

“ जैसा भी खाना चाहो, वैसी थाली उठा लो,” चतुरसिंह ने कहा, वह यह जानना चाहता था कि बंटवारे के समय कोमलसिंह किस बात को तवज्जो देता है.ज्यादा मॉल लेना पसंद करता है या कम.

चूँकि कोमलसिंह को मीठा कम पसंद था. इसलिए उस ने पापड़भुजिए वाली थाली उठा ली, “भैया मुझे यह खाना पसंद है,” कहते हुए कोमलसिंह खाना खाने लगा.

चतुरसिंह समझ गया कि कोमलसिंह को ज्यादा मल चाहिए. वह लालची है. इस कारण उस ने ज्यादा खाना भरी हुई थाली ली है. इसे इस का मज़ा चखाना चाहिए. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने बंटवारे के लिए नई तरकीब सोच ली.

खाना खा कर दोनों भाई कमरे में पहुंचे. चतुरसिंह ने घर के सामान के दो हिस्से कर रखे थे.

“ इन सामान में से कौनसा सामान चाहिए ?” चतुरसिंह ने सामने रखे हुए सामान की ओर इशारा किया.

एक ओर फ्रीज़, पंखें, वाशिंग मशीन रखी थी. दूसरी ओर ढेर सारे बरतन रखे थे. चुंकि कोमलसिंह के पास फ्रीज़, पंखे,वाशिंग मशीन थी. उस ने सोचा कि भाई साहब के पास यह चीज़ नहीं है. इसलिए ये चीज़ भाई साहब के पास रहना चाहिए.

यह सोचते हुए कोमलसिंह ने बड़े ढेर की ओर इशारा कर के कहा, “मुझे यह बड़ा वाला ढेर चाहिए.”

चतुरसिंह मुस्कराया, “ जैसी तेरी मरजी. यूँ मत कहना कि बड़े भाई ने बंटवारा ठीक से नहीं किया,” चतुरसिंह अपनी चतुराई पर मंदमंद मुस्कराता हुआ बोला . जब कि वह जानता था कि उसे ज्यादा कीमती सामान प्राप्त हुआ है.

कोमलसिंह खुश था. वह अपने बड़े भाई की मदद कर रहा था.

“अब इन दोनों ढेर में से कौनसा ढेर लेना पसंद करोगे ?” चतुरसिंह ने अपने माता की जेवरात की दो पोटली दिखाते हुए कहा.

कोमलसिंह ने बारीबारी दोनों पोटली का निरिक्षण किया, एक पोटली भारी थी, दूसरी हल्की व छोटी. उस ने सोचा कि चतुरसिंह बड़े भाई है. इसलिए उन्हें ज्यादा हिस्सा चाहिए.

“ भैया ! आप बड़े है. आप का परिवार बड़ा है, इसलिए आप बड़ी पोटली रखिए,” कोमलसिंह ने छोटी पोटली उठा ली, “यह छोटी पोटली मेरी है.”

“ नहींनहीं भाई, तुम बड़ी पोटली लो, “ चतुरसिंह ने बड़ी पोटली कोमलसिंह के सामने रखते हुए कहा.

“ नहीं भैया, आप बड़े है, बड़ी चीज़ पर आप का हक बनता है,” कहते हुए कोमलसिंह ने छोटी पोटली रख ली.

चतुरसिंह चकित रह गया. उस ने बड़ी पोटली में चांदी के जेवरात रखे थे. छोटी पोटली में सोने के जेवरात थे. वह जानता था कि कोमलसिंह लालच में आ कर बड़ी पोटली लेगा. जिस में उस के पास चांदी के जेवरात चले जाएँगे और वह सोने के जेवरात ले लेगा. मगर, यहाँ उल्टा हो गया था.

अब की बार चतुरसिंह ने चतुराई की , “ कोमलसिंह इस बार तू बंटवारा करना. नहीं तो लोग कहेंगे कि बड़े भाई ने बंटवारा कर के छोटे भाई को ठग लिया, “ चतुरसिंह ने कोमलसिंह को ठगने के लिए योजना बनाई .

कोमलसिंह कोमल ह्रदय था. वह बड़े भाई साहब का हित चाहता था. बड़े भाई के ज्यादा बच्चे थे. इसलिए वह चाहता था कि जमीन का ज्यादा हिस्सा बड़े भाई साहब को मिले. इसलिए वह चतुरसिंह को अपने पैतृक घर पर ले गया.

“भाई साहब ! यह अपने पैतृक मकान है. पिताजी ने आप के जाने के बाद इसे बनाया था,” कोमलसिंह ने कहा.

चतुरसिंह ने देखा कि एक ओर दो मकान और तीन मंजिल भवन खड़ा है, दूसरी ओर एक दुकान के पास से अन्दर जाने का गेट है. यानि एक ओर बहुमंज़िल भवन के साथ दो दुकान बनी हुई थी. दूसरी ओर एक दुकान और पीछे जाने का गेट था.

चतुरसिंह नहीं चाहता था कि जेवरात की तरह ठगा जाए इसलिए उस ने कहा, “ कोमलसिंह तुम ही बताओ. मुझे कौनसा हिस्सा लेना चाहिए ?”

“ भाई साहब, मेरी रॉय में तो आप दूसरा हिस्सा ले लेना चाहिए,” कोमलसिंह ने कहा तो चतुरसिंह चकित रह गया.

छोटा भाई हो कर बड़े भाई को ठगना चाहता है. खुद बहुमंजिल मकान और दो दुकान हडप करना चाहता है. मुझे एक दुकान और छोटासा बाड़ा देना चाहता है. यह सोचते हुए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमलसिंह, मेरा परिवार बड़ा है, इसलिए मै चाहता हूँ कि यह बहुमंजिल मकान वाला हिस्सा में ले लूँ.”

इस पर कोमलसिंह ने कहा, “ भैया ! आप हिस्सा लेने से पहले यह दूसरा हिस्सा देख ले.” कोमलसिंह ने चतुरसिंह से कहा. वह चाहता था कि बड़े भाई को ज्यादा हिस्सा मिलें. क्यों कि दूसरे हिस्से के अंदर १० मकान और लंबाचौडा खेत था, साथ ही बहुत सारे मवेशी भी थे.

मगर, चतुरसिंह ने सोचा कि छोटा भाई उसे ठगना चाहता है. इसलिए चतुरसिंह ने कहा, “ कोमल, मुझे कुछ नहीं देखना है, यह दूसरा हिस्सा तेरे रहा, पहला हिस्सा मेरे पास रहेगा.”

“भैया ! एक बार और सोच लो,” कोमलसिंह ने कहा , “ आप को ज्यादा हिस्सा चाहिए, इसलिए आप यह दूसरा हिस्सा ले लें.”

चतुरसिंह जानता था कि खाली जमीन के ज्यादा हिस्से से उस का यह बहुमंजिल मकान अच्छा है. इसलिए उस ने छोटे भाई की बात नहीं मानी. सभी पंचो के सामने अपनेअपने हिस्से का बंटवारा लिख लिया.

“ भैया. एक बार मेरा हिस्सा भी देख लेते,” कहते हुए कोमलसिंह चतुरसिंह को अपना हिस्सा दिखने के लिए दुकान के पास वाले गेट से अंदर गया.

आगेआगे कोमलसिंह था, पीछेपीछे चतुरसिंह चल रह था. जैसे ही वे गेट के अंदर गए, उन्हें गेट के पीछे लम्बाचौड़ा खेत नजर आया. सामने की तरफ १० भवन बने हुए था. कई मवेशी चर रहे थे.

यह देख कर चतुरसिंह ढंग रह गया, “कोमल यह हिस्सा पापाजी ने कब खरीदा था ?”

“ भैया ! आप के जाने के बाद,” कोमलसिंह ने बताया, “ इसीलिए मै आप से कहा रहा था कि आप बड़े है, आप को बड़ा हिस्सा चाहिए, मगर, आप माने नहीं,”

मगर, अब चतुरसिंह क्या करता ? उस की चतुराई की वजह से वह स्वयम ठगाया जा चूका था. वह चुप हो गया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ७८ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ७८ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- सहस्त्रबुद्धे आजोबांना असं प्रसन्न हसताना मी प्रथमच पहात होतो. पण त्यांच्या चेहऱ्यावरचं ते स्मित क्षणभरच टिकलं. दुसऱ्याच क्षणी ते विरून गेलं. तो प्रसंग पुन्हा जगत असल्यासारखे ते एकटक समोर पहात राहिले. त्यांचा चेहरा विदीर्ण झाला. मनाला झालेल्या खोलवर जखमेला नकळत धक्का लागावा तशी ती जखम भळभळून वहात राहिली.)

हा कसा एक नंबरचा हट्टी आणि तक्रारखोर माणूस आहे हे मला पटवून देताना त्या दिवशी नेमकं काय घडलं हे प्रभुदेसाईंनीही आधी मला सांगितलेलं होतंच. त्यानुसार त्या सकाळी प्रभूदेसाई नुकतेच केबिनमधे येऊन बसले होते. तेवढ्यांत त्या ब्रँचचे एक अतिशय महत्त्वाचे ठेवीदार सपत्निक केबिनमधे आले. त्यांना मोठ्या रकमेची ठेव बँकेत ठेवायची होती. त्यांचं हसतमुखाने स्वागत करून त्यांना वेगवेगळ्या डिपॉझिट स्किम्सची माहिती देत असतानाच हे सहस्त्रबुद्धे केबिनमधे घुसले. त्यांच्या कामाबद्दल तावातावाने बोलू लागले. प्रभूदेसाईंनी त्यांना शांतपणे ‘माझ्या हातातलं काम संपलं कीं तुम्हाला बोलावून घेतो मग आपण बोलू. तोवर तुम्ही थोडावेळ बाहेर बसा.. ‘ असं सांगताच ते खवळले. त्यांना कसं शांत करावं प्रभूदेसाईंना समजेचना. तेवढ्यांत ब्रॅंचचे अकाऊंटंट घाईघाईने आत आले. आजोबांना समजावत बाहेर घेऊन गेले आणि त्यांचं जे काही काम होतं ते पूर्ण करून दिलं असं प्रभुदेसाई म्हणाले होते. यानुसार त्यांच्या म्हणण्याप्रमाणे सारा दोष आततायी आणि विक्षिप्त असणाऱ्या सहस्त्रबुद्धे आजोबांचाच असूनही उलट त्यांनीच सूडबुद्धीने प्रभूदेसाईंबद्दल तक्रार केलेली होती.

या पार्श्वभूमीवर तीच घटना आज सहस्त्रबुद्धे आजोबा सांगत असताना हाच सगळा प्रसंग दुखावलेल्या अंतःकरणातून आपसूक झेपावत येणाऱ्या शब्दांतून उत्स्फूर्तपणे व्यक्त होत होता आणि बोलताना आजोबा दु:खातिरेकाने व्याकूळ झाले होते!

“त्यादिवशी मी महत्त्वाच्या कामासाठी लवकर बँकेत गेलो, तेव्हा सफाई करणाऱ्या शिपायाखेरीज दुसरं कुणीही आलेलं नव्हतं” सहस्त्रबुद्धे सांगू लागले.. *”* मी मुद्दामच लवकर गेलो होतो. कारण माझं काम तसंच महत्त्वाचं होतं. माझी बायको नुकतीच गेली होती. त्या धक्क्यातून मला सावरणं शक्यच नव्हतं. अचानक एक हात मोडलेल्या अपंगासारखी माझी अवस्था होऊन गेली. त्यातूनही कसंबसं सावरत मी माझी दैनंदिन कामं सुरू केली. आम्हा दोघांच्या जॉईंट नावाने असलेली बँक खाती, ठेवी यांच्यावरचं तिचं नाव कमी करून मुलीचं नाव वाढवून घेणं, त्यासाठी अधू मनाने दहा हेलपाटे घालणं.. माझ्या वयाचा विचार करता खूप दमवणारं आणि त्रासदायक होतं. माझी मुलगी मला प्रत्येक ठिकाणी जबाबदारीनं घेऊन जायची, माझी काळजी घ्यायची त्यामुळे दोन-तीन बँकांमधे विखुरलेली ही कामं हातावेगळी करणं मला शक्य झालं होतं. पण युनिट ट्रस्ट आॅफ इंडियाच्या एका युनिट स्कीम मधे गुंतवलेल्या मोठ्या रकमेचे पैसे परत मिळवणं या ना त्या कारणाने अवघड होऊन बसलं होतं. ते काम अखेरच्या टप्प्यावर असताना सर्व युनिटसच्या रिडम्शन फाॅर्मच्या मागं माझी सही करून व ती सही आमचं खातं ज्या बॅंकेत आहे त्या बँकेतील अधिकाऱ्याकडून अॅटेस्ट करून घेऊन प्रस्ताव त्वरित पाठवण्याची सूचना मला यूटीआयने दिली होती. त्यानुसार मी माझी सही करून अटेस्टेशन घेण्यासाठी त्या दिवशी सकाळी मुद्दामच लवकर बँकेत गेलो होतो. लगेचच बँकेतले कर्मचारीही एकेक करून ब्रॅंचमधे येत असतानाच ब्रँच मॅनेजर प्रभूदेसाईही आत आले. केबिनजवळ बाहेर ठेवलेल्या सोफ्यावरच मी त्यांची वाट पहात बसलो होतो. मी उठून त्यांना नमस्कार केला पण त्याची दखलही न घेता ते केबिनमधे निघून गेले. मला याबद्दलही काही वाटलं नाही कारण ते गडबडीत असणार हे मी गृहीत धरलं होतं. तरीही त्यांचं रोजचं रुटीन सुरू होण्यापूर्वी आपलं हे काम करून घ्यावं म्हणून मी त्यांच्या केबिनमध्ये गेलो. त्यांनी त्रासिकपणे माझ्याकडं पाहिलं. मला थोडावेळ बाहेर बसायला सांगितलं. मी त्यांच्या बोलावण्याची वाट पहात बाहेर येऊन बसलो. माझं लक्ष आत केबिनकडंच होतं. तेवढ्यांत त्यांचा फोन वाजला तेव्हा नाराजीने फोनकडे पहात त्यांनी उभ्या उभ्याच स्वतःचा ड्रॉवर उघडला. आत ठेवलेल्या उदबत्तीच्या पुड्यातून एक उदबत्ती आणि काडेपेटी काढून त्यांनी ती उदबत्ती पेटवली. मागेच भिंतीवर लटकवलेल्या देवांच्या फोटोंना ओवाळत राहिले, दोनदोनदा नमस्कार केला, मग टेबल आणि स्वतःच्या खुर्चीकडे पहात ती उदबत्ती ओवाळून मागच्या फळीजवळ खोचून ठेवली आणि स्वतःच्या खुर्चीवर स्थानापन्न झाले. आता तरी ते मला बोलावतील असं वाटलं तेवढ्यांत घाईघाईने बँकेत आलेलं एक जोडपं केबिनमधे गेलं. त्यांना पहाताच तत्परतेने उठून त्यांचं हसतमुखाने स्वागत करीत प्रभुदेसाईंनी अतिशय अदबीने त्यांना बसायला सांगितलं. दोन मिनिटांच्या माझ्या कामासाठी मी मनापासून त्यांच्या बोलावण्याची वाट पहात इथं ताटकळत बसलेलो आहे हे त्यांच्या गावीच नव्हतं. त्यांची अॅटॅस्टेशनची सही घेऊन मला पोस्टात जाऊन तिथेही रजिस्टर करण्यासाठी रांगेत तिष्ठत उभं रहावं लागणार होतं. आत जाऊन त्यांना सही करण्याची विनंती करण्याखेरीज दुसरा पर्यायच नव्हता. पण मी ‘आत येऊ कां? ‘ असं विचारून दारात क्षणभर उभा राहिलो तेव्हा मला त्यांनी आत बोलावून काय काम आहे एवढं विचारणंच मला अपेक्षित होतं. पण तेही त्यांनी केलं नाही.
“बाहेर बसा. महत्त्वाचं काम करतोय ना मी? मी बोलावलं की आत या असं सांगितलं होतं ना तुम्हाला? मी कामात आहे दिसत नाही कां? ” म्हणाले. एका वयोवृद्ध ग्राहकाशी हा माणूस या पद्धतीने वागूच कसा शकतो? .. या विचाराने मी अस्वस्थ झालो. कसाबसा राग आवरत मी त्यांच्यासमोर जाऊन उभा राहिलो.

“तुम्ही बँकेत यायच्या आधीपासून गेला अर्धा तास मी तुम्ही बोलावण्याची वाट पहात बसून होतो. साधं माझी सही ऍटॅस्ट करून द्यायचं एक मिनिटाचं काम आहे फक्त. तेवढ्यासाठी एक तास बसून ठेवणार आहात कां मला? “

मी चिडून विचारलं आणि सोबतच्या एनव्हलपमधून मी मागे सही केलेला यूटीआयचा रिडम्शन फॉर्म काढून मी तो त्यांच्यासमोर ठेवला. त्यांनी चिडून माझ्याकडे पाहिलं, तो फॉर्म उचलला, त्यावरील डिपॉझिटर्सच्या नावांमधला मी आणि माझी बायको असा दोघांच्या नावाचा उल्लेख पाहिला आणि अतिशय उर्मटपणे तो फाॅर्म माझी सही अॅटेस्ट न करताच माझ्याकडे भिरकावला.

“जॉईंट आहे ना हो ही इन्व्हेस्टमेंट? मग? दोघांच्या सह्या नकोत कां? फक्त तुमची एकट्याचीच सही आहे यावर. बघाs नीट. बायकोचीही सही घेऊन या. त्याशिवाय अॅटॅस्टेशन करता येणार नाहीss” विजयी मुद्रेने ते म्हणाले. माझ्या तळपायाची आग मस्तकात जाऊन पोचली.

“बायकोची सही आणायला वर जाऊ कां आताss तिच्या मागं? ” मी ओरडलो. ” नीट वाचाs तोs रिडम्शन-फाॅsर्म. माझ्या बायकोची डेट आॅफ डेथ आहे त्यावर. आणि सोबत डेथ सर्टिफिकेटही. बायको मेलीsय माझीss. इथल्या माझ्या खात्यातच जमा होणाराय ही सगळी रक्कम नंतर. म्हणून आलोय तुमच्या दारात. खातं तुमच्या बँकेत आहे म्हणून भीक मागतोय तुमच्याकडं….. ” मी असंच किती वेळ बोलत होतो मला माहित नाही. नैराश्य आणि टोकाच्या संतापाने मी बेभान झालो होतो…. ”

ते बोलायचं थांबले तसं सुन्न होऊन ऐकत राहिलेला मी भानावर आलो. त्या दिवशी नेमकं काय झालं होतं हे सांगताना संतापाने बेभान झालेल्या प्रभूदेसाईंनी सांगितलेली घटना आणि आज सहस्त्रबुद्धे आजोबांनी भावविवश होत सांगितलेली घटना या दोन्ही एकच होत्या पण दोघांच्या सांगण्यातले क्रम आणि संदर्भ यामधली तफावत लक्षणीय होती. आज ते सगळं या आजोबांच्या तोंडून ऐकल्यानंतर आधी न जाणवलेला प्रभुदेसाईंच्या सांगण्यामागचा त्यांचा स्वतःच्या बचावाचा पवित्रा मला ठळकपणे जाणवला आणि अर्थातच खटकलाही. या उलट आजोबांच्या प्रत्येक शब्दातून पाझरणारी त्यांच्या मनातली वेदना आणि सात्विक संताप माझ्या मनावर ओरखडे ओढून गेला!
‘सत्य’ माणसागणिक कसं रंग बदलणारं असू शकतं याचा मन अस्वस्थ करणारा अनुभव मी घेत होतो! त्यादिवशी नेमकं काय घडलं याच्या प्रभूदेसाईंनी आधी रेखाटलेल्या चित्रातले बेरंग मला आता अधिकच खुपू लागले. सहस्रबुद्धे हे अतिशय हेकेखोर, सतत तक्रारी करणारे, बँकेतल्या मॅनेजर व स्टाफशी बोलताना कसलाही विधिनिषेध न बाळगणारे असं प्रभूदेसाईंनी केलेलं सहस्त्रबुद्धे आजोबांचं वर्णन वस्तुस्थितीचा विपर्यास करणारं तर नसेल? कारण..

“हा एक नंबरचा हेकेखोर, हट्टी आणि तक्रारखोर माणूस आहे ” असं प्रभूदेसाई म्हणाले होते. याउलट आजोबांनी स्वतःची कैफियत मांडताना कुणावरही थेट दोषारोप न करता राष्ट्रीयकृत बँकांच्या शाखांकडून ग्राहक सेवेबाबत होणाऱ्या दुर्लक्षाबद्दलची वस्तुस्थिती अतिशय नेमक्या शब्दांत पोटतिडकीने मांडली होती आणि हे करीत असताना त्याबाबतचा त्यांच्या मनातला सात्विक संताप टोकदारपणे जाणवलाही होता!

त्यांच्या तक्रारखोर स्वभावाबद्द्लचा माझ्या मनातला संभ्रम दूर करण्यासाठी त्याबाबत सहज सहस्त्रबुद्धे आजोबांना बोलतं केलं तेव्हा त्यांनी जे सांगितलं ते ऐकून तर त्यांच्याबद्दलचा माझ्या मनातला आदर अधिकच दुणावला….!!

तरीही या सगळ्यांत आपण भावनिक दृष्ट्या गुंतत चाललोय हे जाणवताच मी भानावर आलो. सहस्त्रबुद्धे आजोबांना समजून घेणं ठीक आहे, पण ते तक्रार करण्यामागच्या त्यांच्याच भूमिकेवर ठाम राहिले तर? त्यांनी तक्रार मागे नाही घेतली तर? नाही नाही.. असं होऊन चालणार नाही.. हा तिढा सुटायलाच हवा. तोही समाधानकारक आणि लवकरात लवकर. हे शक्य होईल?

मन असं शक्याशक्यतेच्या हिंदोळ्यावर झुलत असताना मला नेहमीच ‘त्या’ची आठवण येते. आत्ताही आलीच. ‘तो’आहे. पहातोय सगळं. मग काळजी कसली? या विचाराचा स्पर्श होताच मग थोडं शांत झालं.

या दोन दिवसात मनापासून केलेल्या प्रयत्नांती खूप कांही गवसलं होतं पण ते घट्ट धरून कसं ठेवायचं तेच समजत नव्हतं! अनिश्चितता या क्षणी तरी संपलेली नव्हती!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०१ – कविता – ☆ मन तो सब का होता है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “मन तो सब का होता है…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०१ ☆

☆ मन तो सब का होता है… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

मन तो सब का होता है

बस, एक पहल की जरूरत है।

*

निष्प्रही, भाव – भंगिमा

चित्त में,मायावी संसार बसे

कैसे फेंके यह जाल, मछलियां

खुश हो कर, स्वयमेव  फंसे,

ताने-बाने यूं चले, निरन्तर

शंकित  मन  प्रयास  रत है

बस एक पहल की जरूरत है।

*

ये, सोचे, पहले  वे  बोले

दूजा सोचे, मुंह ये, खोले

जिह्वा से दोनों मौन, मुखर

-भीतर एक-दूजे को तोले

रसना कब निष्क्रिय होती है

उपवास, साधना या व्रत है

बस एक पहल की जरूरत है।

*

रूकती साँसे किसको भाये

स्वादिष्ट लालसा, रोगी को

रस, रूप, गंध-सौंदर्य, करे 

-मोहित,विरक्त-जन, जोगी को

ये अलग बात,नहीं करे प्रकट

वे अपने मन के, अभिमत हैं

बस एक पहल की जरूरत है।

*

आशाएं,  तृष्णाएं  अनन्त

मन में जो बसी, कामनायें

रख इन्हें, लिफाफा बन्द किया

किसको भेजें, न समझ आये

नही टिकिट, लिखा नहीं पता

कहाँ पहुंचे यह ,बेनामी खत है

बस एक पहल की जरूरत है।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२२ ☆ धूप स्वेटर पहन कर आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “धूप स्वेटर पहन कर आई”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२२ ☆ धूप स्वेटर पहन कर आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

हवाओं में

घुल रही ठिठुरन

धूप स्वेटर पहनकर आई।

 

ओस ने गीला किया

फूलों का लो तन

कँपकँपी के पाँव ने

जकड़ा है तन-मन

 

शिराओं में

दौड़ती सिहरन

धुँध कुहरे को पकड़ लाई।

 

खेत में फैली ख़ुशी

अँकुराए हैं दिन

मेंड़ कहती कान में

धरती बनी दुल्हन

 

मचानों पर

बैठ अपनापन

फूँकता है सगुन शहनाई।

 

नदी बैठी घाट पर

सुड़कती है चाय

रात लेकर चाँद को

कहे टाटा बाय

 

कुनकुनी सी

सूरज की किरन

चुभ रही काँटे सी पुरवाई।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३३ – शायद बादलों के परे भी… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – शायद बादलों के परे भी…।)

✍ शायद बादलों के परे भी… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

नभ के वितान पर

शुभ्र- श्वेत जलधर का डेरा

खो जाता है जिस में सबकुछ

हाँ सबकुछ

विमान भी, जो उड़ रहा हो ऊंचाई पर ।

 

जानता है व्योम

अपरिमित है विस्तार उस का

पर,  है कोई शक्ति कहीं

जो रच रही, लीलाएं  सभी

उसके

चाहे- अनचाहे,  जाने- अनजाने ।

 

होता है बहुत कुछ हूबहू वैसा

चाहते हैं हम जैसा

लेकिन

होता है कुछ ऐसा भी

चाहता है वो जैसा

जो बसता है,  शायद बादलों के परे भी

या फिर,

यहीं कहीं,  मेरे आपके आसपास ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२६ ☆ सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२६ ☆

✍ सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

जो बोले आपका सानी नही है

समझ लो शख़्स बेमानी नही है

* 

न भूँखा नंगा हो दुनिया में कोई

सहर ऐसी कभी आनी नहीं है

 *

बनेंगे बे-बज़ह दुश्मन हजारों

मधुर गर आपकी वाणी नहीं है

 *

हवस दौलत की कब मिटती है उनकी

समझते दुनिया जो फ़ानी नहीं है

 *

बचा लो ज़िंदगी को फिर न रहना

अगर पीने को जो पानी नहीं है

 *

जुटा कर चार गीदड़ शेर घेरो

ये कोशिश बोल बचकानी नहीं है

 *

मिले अवसर भुना लो अक्लमंदी

घटा मौके की फिर छानी नहीं है

 *

करो तालीम हासिल हो जहाँ से नहीं है

गँवाया वक़्त नादानी नहीं है

 *

बड़े बूढ़ों की सुन लो ध्यान देकर

कोई यूं बात समझानी नहीं है

 *

इसे मन की निगाहों से  निहारो

ख़ुदा की जात जिस्मानी नहीं है

 *

कई है रंग के ये गुल का गुच्छा

हयात अपनी परेशानी नहीं है

 *

दगा करना रहा फ़ितरत में उसकी

उसे कोई पशेमानी नहीं है

 *

हसीं कितनी वहाँ कुदरत अभी तक

जहाँ इंसां की निगरानी नहीं है

 *

सदाक़त का न छोड़ो साथ यारो

 भले ही इसमें आसानी नहीं है

 *

पका न सब्र का फल उम्र बीती

अरुण को सब्र अब खानी नहीं है

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४१ ☆ लघुकथा – देश प्रेम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “देश प्रेम… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४१ ☆

✍ लघुकथा – देश प्रेम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

देश प्रेम दिखावा नहीं होता

हृदय से प्रेम का संचार होता है।

 

देश की जमीन पर

अधिकार के भाव,

चेहरे के कुत्सित भाव

अहंकारी मूंछों पर ताव,

नहीं कर सकता प्रेम प्रदर्शन

न ही उपजता देशप्रेम का भाव।

 

संसाधनों पर अधिकार कर

बढ़ते मिथ्या अहंकार पर

समझ – समझ दिखाना

मुफ्त के माल पर गढ़ी नज़र

देशप्रेम नहीं करने दे सकती

दिल में कोई जज्बा नहीं भर सकती,

ऐसे लोग देश क्या

किसी से प्रेम नहीं करते।

 

देशप्रेम ही करना है प्यारे

देश को समझना होगा,

मानव, फल फूल, वृक्ष,

नदी, नालों से प्रेम करना होगा,

देश से प्रेम करना और कहना,

अंतर समझना होगा।

 

लोगों से बैर

पृकृति के विरुद्ध

आचरण करना,

मासूम लोगों की

जान लेना

देशप्रेम नहीं होता,

देशप्रेम एक जज्बा होता है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९० – देवदूत… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – देवदूत।)

☆ लघुकथा # ९० – देवदूत ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

झाड़ू लगाने वाली झुमरी जोर-जोर से  घंटी  बजा रही है।

अंदर से एक आवाज – “आई कौन है, जोर-जोर से घंटी क्यों बजा रहा है और सुबह सुबह मेरी नींद क्यों खराब कर दी, कोई चैन से मुझे सोने नहीं देता?”

राम किशोर ने गेट का ताला खोला।

“तुम कौन हो और यहाँ क्यों आई हो?”

बाबा काकी से कह दो कि चाय पिला दे ठंड बहुत लग रही है?

रामकिशोर ने कहा – “काकी की तबीयत बहुत खराब हो गई है, उससे शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया है, मैं कृष्णकांत का दोस्त हूं।”

झुमरी ने गहरी सांस लेते हुए कहा – “बाबूजी एक ग्लास पानी तो पिला देना।”

रामकिशोर ने कहा- “बेटा अंदर आकर पानी पी लो और चाय बनाओ तुम भी पियो और मुझे भी पिलाओ।”

“अरे बाबू जी आपने सुबह से कुछ नहीं खाया क्या?आपको तो बहुत जोर से खांसी आ रही है?”

“माजी मुझे रसोई नहीं छूने देती, मैं बाहर  झाड़ू लगाती थी और कभी-कभी घर को भी झाड़ू पोछा लगा देती थी।”

रामकिशोर ने कहा- “कोई बात नहीं बेटा अगर तुम्हारे पास समय हो तो चाय हम तुम दोनों पीते हैं और रोटी सब्जी बना दो तो मैं खा लूंगा क्योंकि मुझे खाना बनाना नहीं आता और यहाँ किसी के टिफिन वाले को ढूंढने जा रहा था इस उम्र में घर का खाना ठीक रहता है पर क्या करूं मुझे कोई खाना देने वाला नहीं है।”

“बाबूजी आप मेरे हाथ का छुआ हुआ खाना खाएंगे क्या?” झुमरी ने धीमे स्वर में कहा।

रामकिशोर जी ने कहा – “हां क्यों तेरे हाथ में क्या खराबी है? बाहर होटल में और टिफिन वाले कौन हैं और उनकी जात क्या पता?”

“ठीक है बेटा तू मेरे लिए भगवान बन कर आई हो।”

“बाबा, क्या आप अपने घर में भी अकेले रहते हो?” झुमरी ने उत्सुकता में पूछा।

हां क्या करूं बेटा, मेरे बेटा बहू बाहर विदेश में रहते हैं और मैं अकेला अपने घर में रहता हूं।”

“बाबा मैं आपके लिए अडूसा के पत्ते लेकर आती हूं। आपकी खांसी,बलगम, ज्वार और घुटनों का दर्द सब ठीक हो जाएगा।” 

“भगवान काकी को जल्दी अच्छा कर दे।”

झुमरी और काका दोनों की आंखों से आंसू निकल गए।

“भगवान अच्छे लोगों को इतनी तकलीफ क्यों देता है?” झुमरी कहती कहती रसोई में खाना बनाने लगती है।

राम किशोर मन ही मन सोचते हैं कि भगवान सबको सहारा देता है इस बच्ची के कारण मेरी खांसी भी ठीक हो जाएगी। यह तो सचमुच देवदूत है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २९० ☆ पुरूष… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २९० ?

☆ पुरूष… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆

तू खरंच एक महान पुरूष आहेस,

मीच खूप यद्किंचित,

मी विचारला होता तुला,

तुझ्या सिगारेटचा ब्रँड,

तेव्हा तू म्हणालास,

“तसले कोणतेच,

नाद किंवा छंद नाहीत मला !”

असा तू स्वच्छ, सात्विक,

सद्गुणीच !

 

लोक म्हणतात,

तुला काहीच गरज नाही,आध्यात्माची ,

तू स्वतःच आध्यात्म आहेस,

इतका निष्कलंक!

 

तुझी कडवट भाषा,

पुरूषी अहंकार,

अनुभवूनही, मी मानलेच,

तुझे महानपण,

पुरूषोत्तमच तू !

 पण मी खूप वेगळी आहे,

तुझ्यापेक्षा—

सर्वसामान्य!

म्हणून नाहीच पोहचू शकले,

मी कधीच….

तुझ्या उंचीपर्यंत!!

 

 इतकेच  विधिलिखित दोघांचेही  !

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२३ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २३ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२३ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २३ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

देखा न ख्वाब कोई, हर गम रहे जगाते, 

विपदा की आग, मेरे आँसू रहे बुझाते, 

सारी मुसीबतें तो मेहमान बनके आयीं 

स्वागत में अपनी पलकें, कैसे न हम बिछाते।

0

जिसके लिये गाँव से आया, 

शहरों में वह चैन न पाया, 

सारे सुख-वैभव हैं लेकिन 

मिली न अपनेपन की छाया।

0

किसने हरियालियों को खाया है, 

बाग लोहे का ऊग आया है, 

आज वीरान हो गये जंगल 

कोई बिल्डर जरूर आया है।

0

बात केवल न मुँहजुबानी कर, 

तोड़ पत्थर को पानी-पानी कर, 

जिसकी खुशबू से सारा जग महके 

अपनी वाणी को रातरानी कर।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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