हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-११ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – ८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-११ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

विपश्यना

विपश्यना एक प्राचीन और अद्भुत ध्यान पद्धति है। इसका शाब्दिक अर्थ है, देखकर लौटना। मतलब आओ, देखो, अनुभव करो और लौट जाओ, रुको मत।  यह “पशयन्ति” धातु से बना शब्द है। पशयन्ति याने देखना, विपशयन्ति याने विशेष देखना। विशेष के मायने चार आर्य सत्यों- दुख, दुख का कारण तृष्णा, दुख निरोध और आष्टांग मार्ग सहित सुख दुख की क्षणिक वेदना को तटस्थ भाव से देखना। विपश्यना आत्मनिरीक्षण की एक प्रभावकारी विधि है। यह प्राणायाम और साक्षीभाव का मिला-जुला रूप है। दरअसल, यह साक्षीभाव का ही हिस्सा है। साक्षी भाव मतलब जो कुछ घटित हो रहा है, आप उसके साक्षी हैं, न अतीत में हैं और न भविष्य में, सिर्फ़ उसी क्षण में हैं जिसमें hगुजर रहे हैं। चिरंतन काल से ऋषि-मुनि इस ध्यान विधि को करते आए हैं। भगवान बुद्ध ने इसको सरलतम बनाया। इस विधि के अनुसार अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना होता है। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करना। उन्होंने इसका अभ्यास लोगों से भी करवाया था।

विपश्यना बड़ा सीधा-सरल प्रयोग है। अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। प्रारंभिक अभ्यास में उठते-बैठते, सोते-जागते, बात करते या मौन रहते किसी भी स्थिति में बस श्वास के आने-जाने को नाक के छिद्रों में महसूस करें। अब तक आप अपनी श्वासों पर ध्यान नहीं देते थे लेकिन अब स्वाभाविक रूप से उसके आवागमन को साक्षी भाव से देखें या महसूस करें कि ये श्‍वास छोड़ी और ये ली। श्‍वास लेने और छोड़ने के बीच जो अंतर है, उस पर भी सहजता से ध्यान दें। जबरन यह कार्य नहीं करना है। बस, जब भी ध्यान आ जाए तो सब कुछ बंद करके इसी पर ध्यान देना ही विपश्यना है।

आप दूसरे चरण में बीच-बीच में यह भी देखें कि एक विचार आया और गया, दूसरा आया और गया…… यह क्रोध आया और गया….. आशा आई और गई…… निराशा आई और गई। किसी भी चीज से किसी भी स्थिति पर जुड़ना नहीं होना है। बस चुपचाप तटस्थ भाव से देखना है कि आपके मन, मस्तिष्क और शरीर में किस तरह की क्रिया और प्रतिक्रियाएं होती रहती है। देह और अनुभूतियों से विलग हो उन्हें देखना भर है।  

विपश्यना को करने के लिए किसी भी प्रकार के तामझाम की या एकांत में रहने की जरूरत नहीं। इसका अभ्यास भीड़ और शोरगुल में रहकर भी किया जा सकता है। बाइक चलाते हुए, बस में बैठे, ट्रेन में सफर करते, कार में यात्रा करते, राह के किनारे, दुकान पर, ऑफिस में, बाजार में, घर में और बिस्तर पर लेटे हुए कहीं भी इस विधि को करते रहो और किसी को पता भी नहीं चलेगा कि आप ध्यान कर रहे हैं।

शरीर और जीव के बीच श्‍वास ही एक ऐसा सेतु है, जो हमारे विचार और भावों को ही संचालित नहीं करता है बल्कि हमारे शरीर को भी जिंदा बनाए रखता है। श्वास जीवन है। बुद्ध कहते हैं कि यदि तुम श्वास को ठीक से देखते रहो, तो अनिवार्य रूपेण, अपरिहार्य रूप से, तुम शरीर से भिन्न अपने को जानने लगोगे। जो श्वास को देखेगा, वह श्वास से भिन्न हो गया, और जो श्वास से भिन्न हो गया वह शरीर से तो भिन्न हो ही गया। शरीर से छूटो, श्वास से छूटो, तो शाश्वत अनुभूति का अहसास होता है। उस दर्शन में ही उड़ान है, ऊंचाई है, उसकी ही गहराई है। बाकी न तो कोई ऊंचाइयां हैं जगत में, न कोई गहराइयां हैं जगत में। बाकी तो व्यर्थ की आपाधापी है।

इससे तनाव हट जाता है। नकारात्मक और व्यर्थ के विचार नहीं आते। मन में हमेशा शां‍ति बनी रहती है। मन और मस्तिष्क के स्वस्थ रहने से इसका असर शरीर पर भी पड़ता है। शरीर के सारे संताप मिट जाते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह कि यदि आप इसे निरंतर करते रहे तो स्वयं से साक्षात्कार होने लगता है और मोह कटने लगता है।

उपेक्षा-अपेक्षा

गौतम बुद्ध अधिक व्यावहारिक थे। घायल हंस की कथा आती है, जिसके संदर्भ में वे कहते हैं कि जरूरी यह नहीं है कि जिस तीर से हंस घायल हुआ, वह तीर कहां से आया, तीर चलाने वाला कौन था, उसने किस उद्देश्य से तीर चलाया? इन प्रश्नों के उत्तर ढूढऩे की अपेक्षा जरूरी है हंस को घाव से निजात दिलाने का प्रयत्न करना। ऐसे या वैसे लोग संसार में है या नहीं, संसार क्षणिक है या अनन्त, आत्मा और शरीर एक है या भिन्न-भिन्न, आत्मा है या नहीं, पुनर्जन्म है या नहीं। इन प्रश्नों को पाली साहित्य में अव्यक्तानि कहा गया है। इनके बारे में कुछ कहना ठीक नहीं, अत: ऐसे प्रश्नों पर भगवान बुद्ध मौन रह जाते थे। जिनका बोध यही था कि व्यक्ति ऐसे प्रश्नों में उलझकर विवाद को जन्म न दें। बल्कि अपना कर्तव्य आसानी से करता रहे। इन प्रश्नों की उपेक्षा करते हुए तटस्थ भाव से जीवन यापन करते किसी से कोई अपेक्षा न करे। अपेक्षा से ही तृष्णा जागती है।  

बोधि 

गौतम बुद्ध ने जिस ज्ञान की प्राप्ति की थी उसे ‘बोधि’ कहते हैं। माना जाता है कि बोधि पाने के बाद ही संसार से छुटकारा पाया जा सकता है। सारी पारमिताओं (पूर्णताओं) की निष्पत्ति, चार आर्य सत्यों की पूरी समझ और कर्म के निरोध से ही बोधि पाई जा सकती है। बोधि प्राप्ति से लोभ, दोष, मोह, अविद्या, तृष्णा और कथित आत्मा में विश्वास सब गायब हो जाते हैं।

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गोरखपुर

21 जून 2022 को गोरखपुर से भोपाल के लिए ट्रेन पकड़ने हेतु लुम्बिनी से गोरखपुर पहुँचना है। जिसके लिए पहले टैक्सी से 30 किलोमीटर सुनौली बॉर्डर जाना होगा। वहाँ से 95 किलोमीटर गोरखपुर है। गोरखपुर से शाम छै बजे भोपाल के लिए ट्रेन पकड़ना है।   

भैरहवा भारतीय सीमा पर नेपाल का आख़िरी बस्ती है। बॉर्डर पार करके भारत की सीमा में पहली बसावट सोनौली शहर है। बॉर्डर के नज़दीक पहुँचते ही गोरखपुर ले जाने वाले टैक्सी ड्राइवर पीछे पड़ने लगे।  हमारे मास्टर नेगोशीएटर जवाहर जी ने एक-दो को हड़का कर तीसरे ड्राइवर को कोने में ले जाकर गोरखपुर पहुँचाने हेतु दो हज़ार माँगने वले टैक्सी ड्राइवर से गोरखनाथ मंदिर दर्शन कराकर स्टेशन छोड़ने का सौदा सत्रह सौ में पटा लिया। टैक्सी में सामान रखकर बॉर्डर पर पहुँचे। भारतीय सिपाही ने पूछा कहाँ जा रहे हैं। हमारे भोपाल बताने पर उसने हमारे एक सदस्य को टेंट में बैठे एक पुलिसकर्मी के पास विवरण लिखने को भेजा। पाँच मिनट में काम निपट गया। 

दो दिन से खांसी परेशान कर रही थी। वहीं एक दवाई की दुकान दिख गयी। केमिस्ट को कहा- कॉफ़ सिरप दे दो। उसने पूछा कौन सा?, हमने कहा डॉक्टर जो सिरप मरीज़ों सबसे ज़्यादा लिख रहे हैं, वही दे दो। उसने मुस्कुरा कर सिप्ला कम्पनी की rexcof 116.00 मूल्य छपी शीशी 100.00 में पकड़ा दी। दो ढक्कन उँडेला तो अंदर से बाहर खुलने वाला खांसी ढक्कन बंद होने लगा। रास्ते में दशहरी आम की बहार आई थी। सड़क किनारे से डाल के पके साठ रुपए किलो के हिसाब से पाँच किलो आम ख़रीद कार की डिक्की को मालामाल कर दिया। अगला पड़ाव प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर था। साढ़े दस बजे हम गोरखनाथ मंदिर में थे।

गोरखपुर

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर में स्थित बाबा गोरखनाथ मंदिर के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा है। गोरखनाथ मन्दिर के वर्तमान महन्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी है। एक साधु से दिखते विद्वान व्यक्ति मिले। हमने नाथ सम्प्रदाय के बारे में पूछा। उन्होंने विस्तार पूर्वक पूरी कहानी सुना दी। हिन्दू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना के अंतर्गत विभिन्न संप्रदायों और मत-मतांतरों में ‘नाथ संप्रदाय’ का प्रमुख स्थान है। संपूर्ण देश में फैले नाथ संप्रदाय के विभिन्न मंदिरों तथा मठों की देख रेख यहीं गोरखपुर से होती है। नाथ सम्प्रदाय की मान्यता के अनुसार सच्चिदानंद शिव के साक्षात् स्वरूप ‘श्री गोरक्षनाथ जी’ सतयुग में पेशावर, त्रेतायुग में गोरखपुर, द्वापर युग में द्वारिका के पास हरमुज, तथा कलियुग में गोरखमधी, सौराष्ट्र में आविर्भूत हुए थे।  

उन्होंने चारों युगों में विद्यमान एक अयोनिज अमर महायोगी, सिद्ध महापुरुष के रूप में एशिया के विशाल भूखंड तिब्बत, मंगोलिया, कंधार, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, सिंघल तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने योग से मानवता को कृतार्थ किया था।  

यहां यह भी स्मरणीय है कि महान बालसंत ज्ञानेश्वर महाराज, जिन्होंने भगवद्गीता  पर सुप्रसिद्ध ग्रंथ “ज्ञानेश्वरी” लिखा,भी नाथपंथ से दीक्षित थे,तथा उनके सद्गुरु भी उनके सगे सहोदर भ्राता निवृत्तिनाथजी भी नाथपंथ से शिक्षित-दीक्षित थे।निवृत्तिनाथजी की समाधि भी नासिक ज्योतिर्लिंग से मात्र लगभग आधा पौन किलोमीटर नासिक नगर में ही में मुख्य बाजार की मेनरोड़ पर ही है।

नाथपंथी या नाथवंशी यह मूल रूप से नाथ समाज में श्रेष्ठ जोगी समाज से होते हैं! या यूँ कह सकते हैं कि वे शिव के वंशज होते है जो शिव शैवनाथ ब्राह्मण के नाम से भी जाने जाते हैं। एशिया के देशों नेपाल में 20%, भारत में 13 .5%, भूटान में 3% नाथ लोग मिलते हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, नेपाल, तिब्बत, बांग्लादेश और रंगून में नाथवंशियो के अनुयायी को मानने वाले लोग होते हैं।  

गोरक्षनाथ मंदिर गोरखपुर में अनवरत योग साधना का क्रम प्राचीन काल से चलता रहा है। ज्वालादेवी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए ‘गोरक्षनाथ जी’ ने भगवती राप्ती के तटवर्ती क्षेत्र में आकर तपस्या की थी और उसी स्थान पर अपनी दिव्य समाधि लगाई थी, जहाँ वर्तमान में ‘श्री गोरखनाथ मंदिर (श्री गोरक्षनाथ मंदिर)’ स्थित है। उज्जैन के भर्तृहरि का भी नाथ सम्प्रदाय से सम्बंध था। नाथ योगी सम्प्रदाय के महान प्रवर्तक ने अपनी अलौकिक आध्यात्मिक गरिमा से इस स्थान को पवित्र किया था, अतः योगेश्वर गोरखनाथ के पुण्य स्थल के कारण इस स्थान का नाम ‘गोरखपुर’ पड़ा। महायोगी गुरु गोरखनाथ की यह तपस्याभूमि प्रारंभ में एक तपोवन के रूप में रही होगी और जनशून्य शांत तपोवन में योगियों के निवास के लिए कुछ छोटे- छोटे मठ रहे, मंदिर का निर्माण बाद में हुआ। आज हम जिस विशाल और भव्य मंदिर का दर्शन कर हर्ष और शांति का अनुभव करते हैं, वह ब्रह्मलीन महंत श्री दिग्विजयनाथ जी महाराज जी की ही कृपा से अस्तित्वमान हुआ है। वर्तमान पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ जी महाराज के संरक्षण में श्री गोरखनाथ मंदिर विशाल आकार-प्रकार, प्रांगण की भव्यता तथा पवित्र रमणीयता को प्राप्त हो रहा है। पुराना मंदिर नव निर्माण की विशालता और व्यापकता में समाहित हो गया है। हमारे पहुँचने के दिन योग दिवस होने से सुबह ही योग दिवस कार्यक्रम हुआ था। पहले हमने मंदिर में योगियों की मूर्तियों के दर्शन किए। उसके बाद प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण करके चार बजे गोरखपुर रेल्वे स्टेशन पहुँच गये।

ट्रेन रवानगी का समय छै बजे का था। हमारी बहुत दिनों से गीता प्रेस जाने की उच्चतम इच्छा थी लेकिन अवसर नहीं बन पा रहा था। जवाहर जी ने गीता प्रेस का प्रस्ताव रखा। जवाहर जी के साथ विश्व प्रसिद्ध गीता प्रेस भ्रमण को गये। जवाहर जी ने गेट पर पहुँच कर इंटर्काम से मैनेजर साहिब से बात की तो उन्होंने सलाह दी कि हम लोग चित्र दीर्घा और पुस्तक भंडार देखकर उनके कार्यालय आ जायें।

हम गीता प्रेस के प्रबंधक लालमणि तिवारी से बात करके दंग रह गये। उन्होंने बताया अभी कुछ दिन पहले ही राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी का गीता प्रेस आना हुआ था। उन्होंने संस्था के प्रन्यासियों सहित उन्हें 24 जून 2022 राष्ट्रपति भवन आमंत्रित किया है कि विदेशों में दूतावासों के माध्यम से गीता प्रेस की किताबों को वहाँ के समाज में पहुँचाया जाये। उसी तारतम्य में तैयारी चल रही है। उन्होंने बताया कि रामचरितमानस और हनुमान चालीसा की माँग इतनी अधिक है कि कई कोशिशों के बावजूद पूरा नहीं किया जा सकता है। कोविड के बाद माँग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। रामचरितमानस की एक साल में एक करोड़ प्रतियाँ बिक जाती हैं।

हमने पूछा गीता प्रेस की किताबें बाज़ार से कम मूल्य पर कैसे मिलती हैं। उनका कहना था कि किसी भी किताब पर लाभ नहीं कमाया जाता। क़ीमत में स्थायी लागत (fixed cost) को भी शामिल नहीं किया जाता। चल लागत ही विक्रय मूल्य होता है। ट्रस्टी एक भी पैसा नहीं लेते और न किसी सुविधा का लाभ उठाते हैं। यहाँ तक कि अभी राष्ट्रपति भवन जाना है तो ट्रस्टी खुद के ख़र्चों पर जाएँगे। किसी प्रकार का कोई सरकारी या ग़ैर-सरकारी दान भी नहीं लिया जाता है।  

गीता प्रेस भ्रमण से हमारी एक बहुत पुरानी इच्छा पूरी हुई। हमारी इच्छा गीता प्रेस से छै खंडों में प्रकाशित 2700/- मूल्य की टीका सहित मूल महाभारत ख़रीदने की थी। बेचवाल किताबों का सेट निकलवा कर बिल काटने ही वाले थे, तभी पुस्तकों का बड़ा वज़नी पैकेट आ गया। जिसे ले जाने में दिक़्क़त हो सकती थी। उसमें 450/- भिजवाने का खर्चा जुड़वा कर 3150/- भुगतान करके इच्छापूर्ति सम्भव हुई। अब हम अपने घर पर “महाभारत पाठक मंच” बनाकर अध्ययन करने की दिशा में एक कदम बढ़ा चुके हैं।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ९ – कविता – क्यों ?… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “क्यों ?…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ९  ?

? कविता – क्यों ?… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

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तुम जो इतने पास रहे हो,

मैं धड़कन तुम साँस रहे हो।

 *

जीवन यह अँधियारा मेरा,

क्यों आलोक तलाश रहे हो।

 *

तुम जीवन की पुष्प-वाटिका,

गेंदा और पलाश रहे हो।

 *

मैं तो इक उजड़ा गुलशन हूँ,

क्यों माली बन फाँस रहे हो।

 *

मैं तो पत्रहीन तरु जैसा,

पाल घरौंदा आस रहे हो।

 *

मेरे दुख, मेरी पीड़ा का,

क्यों करते परिहास रहे हो।

 *

मेरे दरम्याँ पतझड़ हरदम

तुम बहार मधुमास रहे हो

 *

मैं निराश हूँ, मैं उदास हूँ,

फिर भी मन में वास रहे हो।

 *

तुम हो आशावादी इतने,

तम में दीप्ति तलाश रहे हो।

 *

ली न कभी ख़बर, न पूछा

क्यों ‘राजेश’ उदास रहे हो ?

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १८२ ☆ गीत – ।। जान लो एक दिन विश्वनायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १८२ ☆

☆ गीत ।। जान लो एक दिन विश्वनायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

जान लो एक दिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

विश्व शान्ति का एक परिचायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

भारत महान कहलाता संस्कार संस्कृति सहयोग कारण।

शांति से रहता भारत  कभी नहीं करता युद्ध अकारण।।

अपनी नीति कारण जन-जन नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जानलो एकदिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

चाल चरित्र और चेहरा भारत का विश्व अनुकरण करेगा।

भारत की पहल पर विश्व आतंकवाद निराकरण जनेगा।।

तीसरी बड़ीअर्थव्यवस्था सुखदायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जानलो एकदिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

परमाणु ऊर्जा को विनाश नहीं बल्कि उत्पादन मेंआएगा।

यदि जरूरत नभजलथल में सौ ऑपरेशन सिंदूर लाएगा।।

संपूर्ण मानवता के लिए फलदायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जानलो एकदिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

**

सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत विश्व में मिसाल बेमिसाल है।

वेद पुराण गीता रामायण की भी अनूठी संस्कारी ढाल है।।

सोने की चिड़िया सा नायक कमाल मेरा हिंदुस्तान बनेगा।

जान लो एक दिन विश्व नायक मेरा हिंदुस्तान बनेगा।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२४६ ☆ गजल – जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “गजल – जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २४६ ☆

☆ गजल – जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

जियो और जीने दो सबको यह सिद्धांत सुहाना है

निश्चित हो जन हितकारी है औं जाना पहचाना है

*

इसके द्वारा ही जग मे सुख शांति हमेशा आती है

किंतु आज आतंकवाद का उभरा नया जमाना है

*

निर्दोषो का खून हो रहा गाॅव गली शैतानी है

कब किसके संग कैसे क्या हो कोई नही ठिकाना है

*

जब होता सदभाव प्रेम है मिलता है आनंद तभी

हर बुराई को तज के मन से सहज भाव अपनाना है

*

तरस रहे है तडप रहे है दीन दुखी अंधियारों मे

स्नेह दीप ले सबको मन से सही राह दिखलाना है

*

बिन समझे जो भटक रहे है स्वार्थो के गलियारो मे

जीवन औ ममता का मतलब उन्हें साफ समझाना है

*

द्वेष हमेशा दुखदायी है प्रेमभाव सुखदाता है

आपस का संबंध मधुर कर जग को स्वर्ग बनाना है

*

सबको साथ लिये बढने से ही हो समृद्धि सहज

बैर भव रखने वालों को यह ही मंत्र पढाना है

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९९ ☆ अहं, क्रोध, काम व लोभ… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहं, क्रोध, काम व लोभ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९९ ☆

☆ अहं, क्रोध, काम व लोभ… ☆

‘अहं त्याग देने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है; क्रोध छोड़ देने पर वह शोक रहित हो जाता है; काम का त्याग कर देने पर धनवान हो जाता है और लोभ छोड़ देने पर सुखी हो जाता है’– युधिष्ठिर की यह उक्ति विचारणीय है। अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है क्योंकि जब तक उसमें ‘मैं’ अथवा कर्त्ता का भाव रहेगा, तब तक उसके लिए उन्नति के सभी मार्ग बंद हो जाते हैं। जब तक उसमें यह भाव रहेगा कि मैंने ऐसा किया और इतने पुण्य कर्म किए हैं, तभी यह सब संभव हो सका है। ‘जब ‘मैं’ यानि अहंकार जाएगा, मानव स्वर्ग का अधिकारी बन पाएगा और उसे इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति हो सकेगी’– प्रख्यात देवाचार्य महेंद्रनाथ का यह कथन अत्यंत सार्थक है। अहंनिष्ठ व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं हो सकता और कोई भी उससे बात तक करना पसंद नहीं करता। वह अपने द्वीप में कैद होकर रह जाता है, क्योंकि सर्वश्रेष्ठता का भाव उसे सबसे दूर रहने पर विवश कर देता है।

वैसे तो किसी से उम्मीद रखना कारग़र नहीं है। ‘परंतु यदि आप किसी से उम्मीद रखते हैं, तो एक न एक दिन आपको दर्द ज़रूर होगा, क्योंकि उम्मीद एक न एक दिन अवश्य टूटेगी और जब यह टूटती है, तो बहुत दर्द होता है’– विलियम शेक्सपियर यह कथन अनुकरणीय है। जब मानव की इच्छाएं पूर्ण होती है, तो वह दूसरों से सहयोग की उम्मीद करता है, क्योंकि सीमित साधनों द्वारा असीमित इच्छाओं की पूर्ति संभव नहीं होती। उस स्थिति में जब हमें दूसरों से अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं होता, तो मानव हैरान-परेशान हो जाता है और जब उम्मीद टूटती है तो बहुत दर्द होता है। सो! मानव को उम्मीद दूसरों से नहीं, ख़ुद से करनी चाहिए और अपने परिश्रम पर भरोसा रखना चाहिए… उसे सफलता अवश्य प्राप्त होती है। इसलिए मानव तो खुली आंखों से सपने देखने का संदेश दिया गया है और उसे तब तक चैन से नहीं बैठना चाहिए; जब तक वे साकार न हो जाएं–अब्दुल कलाम की यह सोच अत्यंत सार्थक है। यदि मानव दृढ़-प्रतिज्ञ व आत्म-विश्वासी है; कठिन परिश्रम करने में विश्वास करता है, तो वह भीषण पर्वतों से भी टकरा सकता है और अपनी मंज़िल पर पहुंच सकता है।

‘यदि तुम ख़ुद को कमज़ोर समझते हो, तो तुम कमज़ोर हो जाओगे; अगर ख़ुद को ताकतवर सोचते हो, तो तुम ताकतवर हो जाओगे’– विवेकानंद की यह उक्ति इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि मन में अलौकिक शक्तियाँ विद्यमान है। वह जैसा सोचता है, वैसा बन जाता है और वह सब कर सकता है, जिसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की होती। ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ दूसरे शब्दों में मानव स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। इसलिए कहा जाता है कि असंभव शब्द मूर्खों की शब्दकोश में होता है और बुद्धिमानों से उसका दूर का नाता भी नहीं होता। इसी संदर्भ में मैं इस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहूंगी कि प्रतिभा जन्मजात होती है उसका जात-पात, धर्म आदि से कोई संबंध नहीं होता। वास्तव में प्रतिभा बहुत दुर्लभ होती है और प्रभु-प्रदत्त होती है। दूसरी और शास्त्र ज्ञान व अभ्यास इसके पूरक हो सकते हैं। ‘करत- करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान’ अर्थात् अभ्यास करने पर मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है। जिस प्रकार पत्थर पर अत्यधिक पानी पड़ने से वे अपना रूपाकार खो देते हैं, उसी प्रकार शास्त्राध्ययन द्वारा मर्ख अर्थात् अल्पज्ञ व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है। स्वामी रामतीर्थ जी के मतानुसार ‘जब चित्त में दुविधा नहीं होती, तब समस्त पदार्थ ज्ञान विश्राम पाता है और दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।’ सो! संशय की स्थिति मानव के लिए घातक होती है और ऐसा व्यक्ति सदैव ऊहापोह की स्थिति में रहने के कारण अपने मनचाहे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर सकता।

इसी संदर्भ में मुझे स्मरण हो रहा है हज़रत इब्राहिम का प्रसंग, जिन्होंने एक गुलाम खरीदा तथा उससे उसका नाम पूछा। गुलाम ने उत्तर दिया – ‘आप जिस नाम से पुकारें, वही मेरा नाम होगा मालिक।’ उन्होंने खाने व कपड़ों की पसंद पूछी, तो भी उसने उत्तर दिया ‘जो आप चाहें।’ राजा के उसके कार्य व इच्छा पूछने पर उसने उत्तर दिया–’गुलाम की कोई इच्छा नहीं होती।’ यह सुनते ही राजा ने अपने तख्त से उठ खड़ा हुआ और उसने कहा–’आज से तुम मेरे उस्ताद हो। तुमने मुझे सिखा दिया कि सेवक को कैसा होना चाहिए।’ सो! जो मनुष्य स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, उसे ही दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।

क्रोध छोड़ देने पर मनुष्य शोक रहित हो जाता है। क्रोध वह अग्नि है, जो कर्त्ता को जलाती है, उसके सुख-चैन में सेंध लगाती है और प्रतिपक्ष उससे तनिक भी प्रभावित नहीं होता। वैसे ही तुरंत प्रतिक्रिया देने से भी क्रोध द्विगुणित हो जाता है। इसलिए मानव को तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, क्योंकि क्रोध एक अंतराल के पश्चात् शांत हो जाता है। यह तो दूध के उफ़ान की भांति होता है; जो पल भर में शांत हो जाता है। परंतु यह मानव के सुख, शांति व सुक़ून को मगर की भांति लील  जाता है। क्रोध का त्याग करने वाला व्यक्ति शांत रहता है और उसे कभी भी शोक अथवा दु:ख का सामना नहीं करना पड़ता। काम सभी बुराइयों की जड़ है। कामी व्यक्ति में सभी बुराइयां शराब, ड्रग्स, परस्त्री- गमन आदि बुराइयां स्वत: आ जाती हैं। उसका सारा धन परिवार के इतर इनमें नष्ट हो जाता है और वह अक्सर उपहास का पात्र बनता है। परंतु इन दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त होने पर वह शरीर से हृष्ट-पुष्ट, मन से बलवान् व धनी हो जाता है। सब उससे प्रेम करने लगते हैं और वह सबकी श्रद्धा का पात्र बन जाता है।

आइए! हम चिन्तन करें– क्या लोभ का त्याग कर देने के पश्चात् मानव सुखी हो जाता है? वैसे तो प्रेम की भांति सुख बाज़ार से खरीदा ही नहीं  जा सकता। लोभी व्यक्ति आत्म-केंद्रित होता है और अपने इतर किसी के बारे में नहीं सोचता। वह हर इच्छित वस्तु को संचित कर लेना चाहता है, क्योंकि वह केवल लेने में विश्वास रखता है; देने में नहीं। उसकी आकांक्षाएं सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं, जिनका खरपतवार की भांति कोई अंत नहीं होता। वैसे भी आवश्यकताएं तो पूरी की जा सकती हैं, इच्छाएं नहीं। इसलिए उन पर अंकुश लगाना आवश्यक  है। लोभ व संचय की प्रवृत्ति का त्याग कर देने पर वह आत्म-संतोषी जीव हो जाता है। दूसरे शब्दों में वह प्रभु द्वारा प्रदत्त वस्तुओं से संतुष्ट रहता है।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि जो मनुष्य अहं, काम, क्रोध व लोभ पर विजय प्राप्त कर लेता है; वह सदैव सुखी रहता है। ज़माने भर की आपदाएं उसका रास्ता नहीं रोक सकतीं। वह सदैव प्रसन्न-चित्त रहता है। दु:ख, तनाव, चिंता, अवसाद आदि उसके निकट आने का साहस भी नहीं जुटा पाते। ख़लील ज़िब्रान के शब्दों में ‘प्यार के बिना जीवन फूल या फल के बिना पेड़ की तरह है।’ ‘प्यार बांटते चलो’ गीत भी इसी भाव को पुष्ट करता है। इसलिए जो कार्य- व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे; वैसा दूसरों के साथ न करना ही सर्वप्रिय मार्ग है–यह सिद्धांत चोर व सज्जन दोनों पर लागू होता है। महात्मा बुद्ध की भी यही सोच है। स्नेह, प्यार त्याग, समर्पण वे गुण हैं, जो मानव को सब का प्रिय बनाने की क्षमता रखते हैं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ संजय दृष्टि – चौदह रत्न  — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण ☆ समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। आज से प्रत्येक शुक्रवार हम आपके लिए श्री संजय भारद्वाज जी द्वारा उनकी चुनिंदा पुस्तकों पर समीक्षा प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

? संजय दृष्टि –  समीक्षा का शुक्रवार # 26 ?

? चौदह रत्न  — कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण  ?  समीक्षक – श्री संजय भारद्वाज ?

पुस्तक का नाम – चौदह रत्न

विधा – कविता

कवयित्री – डॉ. ज्योति कृष्ण

प्रकाशन – क्षितिज प्रकाशन, पुणे

चौदह रत्न : धरोहर का स्मरण कराता संग्रह

? चौदह पौराणिक आख्यानों पर आधारित कविताएँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ?

समुद्र मंथन हमारे पुराणों में वर्णित एक प्रमुख घटना है। इस मंथन से चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी। इसी भाँति लम्बे समय के चिंतन-मनन के पश्चात कवयित्री डॉ. ज्योति कृष्ण का कविता-संग्रह ‘चौदह रत्न’ अब पाठकों के हाथ में है। संग्रह में मुख्य रूप से चौदह पौराणिक आख्यानों पर आधारित कविताएँ हैं।

संग्रह का आरम्भ श्री गणेश एवं सरस्वती वंदना से होता है। कवयित्री की कामना है कि माँ सरस्वती उनके घर में विराजें।

*

श्वेत कमल का छोड़के आसन,

चरणों को धरती पे धारो ज़रा।

रख दो मेरे सर पे ज्ञान का हाथ,

माँ, आज विराजो तुम मेरे ही घर में॥

 *

लयात्मकता का अपना प्रभाव होता है। लय के चलते रचनाएँ सरलता से कंठस्थ हो जाती हैं। यही कारण रहा कि हमारी श्रुति परंपरा में इसका बड़ा योगदान रहा। कंठस्थ साहित्य एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक सहज रूप से संप्रेषित हो जाता है। इसका यह प्रमाण देखिए-

*

सिद्ध स्वाभिमान की, पुत्री वृषभान की,

मुरली की तान की पुकार जैसी राधिका।

कानन में, कुँज में, कृष्ण की कलाई धरे,

कच्ची, कली कोरी, कचनार जैसी राधिका॥

*

श्री राम और श्री कृष्ण हमारे लोकनायक हैं। उनकी जीवनगाथा हमारे जीवन के कण-कण में है, क्षण-क्षण में है। श्री राम के लिए कहा गया है, ‘रमते कणे कणे इति राम:।’ जो कण-कण में रमता हो, वही श्री राम हैं। संग्रह की चौदह कविताओं में श्री राम के जीवन के विभिन्न प्रसंगों पर आधारित पर पाँच रचनाएँ हैं। इस रचना में श्री राम के प्रति कवयित्री का यह विश्वास देखिए-

*

अनुनय-विनय सब काम आ जाएँगे,

स्मरण करो तो सारे नाम आ जाएँगे,

छोड़कर अयोध्या का धाम आ जाएँगे,

हृदय से पुकार लो तो राम आ जाएँगे॥

*

वनवास के लिए निकले श्री राम भारद्वाज आश्रम पहुँचे थे। भारद्वाज मुनि से श्री राम ने पूछा था कि वे किस स्थान कहाँ रहें? भारद्वाज मुनि ने उन्हें नाना स्थान सुझाए। उसका एक उदाहरण देखिए-

*

जिनके मन में काम नहीं, क्रोध नहीं मद, मोह नहीं,

उसी हृदय में रहो जहाँ पर, लोभ नहीं और द्रोह नहीं।

जो मनुष्य नित विचार कर कहते प्रिय और सत्य वचन,

उसी हृदय में रहो सर्वदा सिय सहित तुम रघुनंदन॥

*

श्री राम यूँ ही पुरुषोत्तम नहीं हैं। वे मनुष्यता का मर्म हैं-

*

राम केवल नाम नहीं, सद्भाव है, सत्कर्म हैं ,

अंतस में विराजती इस मनुष्यता का मर्म हैं।

*

श्री राम कण-कण में हैं तो श्री कृष्ण चराचर में बसते हैं। वे सृष्टि का बीज तत्व हैं। श्रीमद्भागवद्गीता में स्वयं योगेश्वर का उवाच है-

*

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥

(अध्याय 10, श्लोक 39)

*

भावार्थ है कि चराचर का बीज कृष्ण हैं। उनके बिना किसी भी चर या अचर का अस्तित्व नहीं है। चराचर में विराजमान माधव के जीवन से प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सम्बंधित दो प्रसंग इन कविताओं में हैं। महाभारत से सम्बंधित प्रसंग भी इनमें देखने को मिलते हैं।

इन्हीं में एक प्रसंग अक्षय पात्र का है। सर्वविदित है कि केशव ने अक्षयपात्र द्वारा द्रौपदी एवं पांडवों की दुर्वासा मुनि के क्रोध से रक्षा  की थी। ब्रह्मांड के स्वामी का एक अन्न के एक दाने से तृप्त होना, जगत की तृप्ति है। इस भाव का यह प्रकटन देखिए-

*

इस कथा से केशव ने जग को दिया यही संदेश,

अन्न के प्रत्येक दाने की महत्ता है विशेष।

सारा ब्रह्मांड जिन योगेश्वर श्रीकृष्ण में व्याप्त है,

उनका भोजन करके तृप्त हो जाना पर्याप्त है।

*

श्री कृष्ण का जीवन 64 कलाओं में निपुणता का अनन्य उदाहरण है। कौन सोच सकता है कि जीवन के उत्तरार्द्ध में गीता का ज्ञान देनेवाला योगेश्वर, पूर्वार्द्ध में मनभावन कान्हा था। कान्हा का यह मनभावन रूप कवयित्री की इन पंक्तियों में अनुभव कीजिए-

*

सिर मोरपंख धारे, कारे नैन कजरारे,

मतवाले अलकों के झोल मनभावने॥

धूल-मिट्टी खाए, जसुमति रिसियाए,

बोले तोतले से मीठे-मीठे बोल मनभावने॥

*

मनभावन मनोहर रूप आगे चलकर अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक और मनुज के उत्थान का मानक बना।

*

अधर्म पर धर्म की विजय प्रतीक कृष्ण हैं,

पाप के कुचक्र का उत्तर सटीक कृष्ण हैं॥

……………………

जिनके बिन हर कथा अधूरी वह कथानक कृष्ण हैं,

मनुज के उत्थान का सर्वोच्च मानक कृष्ण हैं॥

*

गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य के साथ जो अन्याय किया, वह गुरुता के विरुद्ध था। शक्तिशाली की निर्बलता पर कवयित्री की यह अभिव्यक्ति देखिए-

*

अद्भुत, अद्वितीय, बेमिसाल थी वो दक्षिणा,

उससे भी बढ़कर वह निश्छल उसकी गुरुभक्ति थी।

एक परंपरा का दुरुपयोग करते-करते

निर्बल साबित हो गए वे श्रेष्ठ जिनमें शक्ति थी॥

*

कहा जाता है कि अंतर्मन से, करुण स्वर में, पूर्ण निष्ठा से ईश्वर को पुकारा जाए और ईश्वर न आएँ, यह हो ही नहीं सकता। गज और ग्राह के संघर्ष के संदर्भ में कवयित्री की ये पंक्तियाँ देखिए-

*

निश्छल मन करुण स्वरों में, जब हम उन्हें पुकारेंगे,

निस्संदेह विकट घड़ी से, हमको भगवान उबारेंगे।

*

इसी भाव का विस्तार इन पंक्तियों में शब्दबद्ध हुआ है-

*

जिनका स्वरूप निर्विकार है,उनके चरणों में नमस्कार है,

जो हरि गरुड़ पर सवार हैं, उनके चरणों में नमस्कार है।

*

मानव के भीतर देवता और दानव दोनों निवास करते हैं। यही कारण है कि एक देवव्रत और एक दुर्योधन हम सबके हिस्से में आया है। अपनी-अपनी शर-शय्या पर लेटे मनुष्य का यह चित्रण भीतर तक उतर जाता है-

*

एक देवव्रत छिपा हुआ है, हम साधारण मानव में भी,

किसी न किसी माँ गंगा के, हम सारे भी बेटे हैं।

और एक दुर्योधन भी आया है हम सबके हिस्से में,

इसीलिये हम अपनी-अपनी शर-शय्या पर लेटे हैं॥

*

भारतीय संस्कृति में गंगा, नदी मात्र नहीं अपितु माँ है। शिव ने जिसे जटा में धारण किया हो, जिसके जल का छिड़काव हर संस्कार में हमारी जीवन पद्धति का अंश हो, वह अमृतदायिनी मात्र नदी हो भी नहीं सकती। इस पयस्विनी की जो दुर्दशा हमने की है, कवयित्री उसके लिए माता से क्षमायाचना करती हैं-

*

अवनि पर अवतरित हो सब पाप तुमने धो दिए,

कृतज्ञता हमको दिखानी थी, मगर हम स्वार्थी हैं।

हमसे हुआ अपराध गंगे, भूल हमसे हो गई,

शर्म से गर्दन झुकी है, हम क्षमा के प्रार्थी हैं॥

*

संग्रह में माँ दुर्गा एवं महादेव की स्तुति पर आधारित रचनाएँ हैं। देवी-देवताओं की गाथा पर छोटी कविताएँ हैं। गंगा के प्रदूषण पर विमर्श है तो राधा रानी, गोपियों, बाँसुरी, माँ सीता, शबरी, कैकेयी पर भी चर्चा है।

कुल मिलाकर प्रस्तुत कविता संग्रह मूल रूप से आध्यात्मिक, धार्मिक आख्यानों पर आधारित है। यह काव्यात्मक प्रस्तुति आख्यानों को स्मृति में रखने में सहायक सिद्ध होगी। इसके माध्यम से संस्कृति से कट रही पीढ़ी हमारी धरोहर से परिचित भी हो सकेगी।

डॉ. ज्योति कृष्ण का प्रकाशित होने वाला यह पहली कविता संग्रह है। प्रकाशन का आरम्भ संस्कृति, दर्शन एवं आस्था पर आधारित रचनाओं से हो रहा है। यह शुभ लक्षण है। वे निरंतर लिखती रहें। कामना है कि उनकी आने वाली पुस्तकों के माध्यम से साहित्य एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार हो सके।

© संजय भारद्वाज  

नाटककार-निर्देशक

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत, writersanjay@gmail.com, sanjayuvach2018@gmail.com

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७१ – गीत – बावरा मन चाहता… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – बावरा मन चाहता…।

? रचना संसार # ७१ – गीत – बावरा मन चाहता… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

प्यारी कविता

प्यारी कविता सम सुख-सरिता,

तुम्हीं साधना हो मेरी।

हो अनुपम-अनुभूति हृदय की,

तुम्हीं भावना हो मेरी।।

*

कविता है दर्पण समाज की,

शत-शत है नमन  कामिनी।

चंदा सी हो श्यामल उज्ज्वल।

चिर कालिक दमक दामिनी।।

ओज दिव्य दिनकर जैसा है,

पूर्ण कामना हो मेरी।

*

सौम्य सुसंस्कृत भाषा कविता,

ज्ञान ज्योति पूजा थाली।

तोड़ रूढ़ियों को चलती है,

देवनागरी मतवाली।।

अनुशासन प्रिय प्रखर तूलिका,

तुम उपासना हो मेरी।

*

वाल्मीकि रसखान जायसी,

कवि भूषण पंत निराला।

रसमय मेघदूत वरदानी,

बच्चन-उर की  मधुशाला।।

सूर महादेवी मीरा की,

धवल कामना हो मेरी।

*

बहुरंगी सौन्दर्य प्रकृति का,

काव्यमयी  सुधा बिहारी।

कस्तूरी सौरभ उपवन की,

गीत छंद की फुलवारी।।

सदियों से भव भक्ति समाहित,

तुम्हीं याचना हो मेरी।

*

मुक्ति बोध के दीप जलाए,

हो इतिहास अमिट सारा।

वीरों की गाथा को गाती,

निर्मल गंगा की धारा।।

शुचिता की मानक परिभाषा,

तुम्हीं प्रार्थना हो मेरी।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०० ☆ कविता – विश्वास ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – कविता  – विश्वास।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३००  – साहित्य निकुंज ☆

☆ कविता – विश्वास  ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

चलन हो चुका है लिखने का तो अब

अदब कम, हुनर कम, तमाशा बहुत है।।

*

इरादा  है मिलन का तुमसे लेकिन

समझो तो तुम ये इशारा बहुत है

*

लगाई है उम्मीद हमने जो अब तुमसे

लगता है इसमे अब हताशा बहुत है।

*

हम पर किया है अपनो ने ही भरोसा

लगाई है उनने हमसे आशा बहुत है ।

*

न जाने क्यों लूटती  बेटी की अस्मत

जहां मे दिखावे का तमाशा बहुत है ।

*

करें हम अब किस पर इतना भरोसा

करीब से रिश्तों को तराशा बहुत है ।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८१ ☆ माँ पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है – माँ पर दोहे… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८१ ☆

☆ माँ पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

जग की तपती धूप में, माँ शीतल सी छाँव|

माँ की थपकी प्रिय लगे, सबसे सुंदर ठाँव||

*

सेवा करती मौन हो, करती नहीं सवाल|

विमुख न होती कर्म से, रखती सदा खयाल||

*

तुझसे माँ साँसे मिलीं, तू जीवन संगीत|

तू रिश्तों की है धुरी, तू निश्छल सी प्रीत||

*

तेरे चरणों में बसें, गीता और  कुरान|

तू ही जीवन दायिनी, तू ही है भगवान||

*

पाठ मिला संस्कार का, तुझसे मिलता ज्ञान|

तुम से घर की रौनकें, तुम ही घर की शान||

*

माँ मूरत है नेह की, माँ ही भजन अजान|

माँ से बढ़कर जगत में, दूजा नहीं महान||

*

जन्म दायिनी कोख का, करें न हम  अपमान|

माँ ईश्वर इस जगत में, माँ का रखिए मान||

*

रहते घर में जो सदा, मात -पिता के पास|

उनकी सेवा से मिटे, जीवन के संत्रास||

*

माँ की सेवा से मिले, हमें शांति संतोष|

उनके ही आशीष से, बढ़ता सुख का कोष||

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २७१ – एक चंद्र…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २७१ – विजय साहित्य ?

☆ एक चंद्र…! ☆

(अष्टाक्षरी)

☆

एक एक पान गेले

मागे डहाळी ठेवून

जीवनाच्या प्रवासात

आहे झाड ते टिकून…!

*

चैत्र पालवीत गेला

कसा सरून वसंत

एकट्याने सांभाळला

जीव अनादी अनंत…!

*

पिढ्या पिढ्या हेच घडे

जाते लेकरू सोडून

आठवांच्या पौर्णिमेला

जाते घरटे देऊन…!

*

किती आले किती गेले

जीवनात हे उन्हाळे

फांदी फांदीने जपले

सुख दुःख पावसाळे…!

*

एक चंद्र ॠतूरंगी

चैतन्याने फुलारतो

कवितेच्या रोमरोमी

अलगद विसावतो…!

*

एक चंद्र शरदाचा

मनी आशा जागवतो

तरू निष्पर्ण होताना

रोमरोमी फुलारतो…!

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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