हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ खिसियानी बिल्ली जूता नोचे ☆ श्री धर्मपाल महेंद्र जैन ☆

श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

संक्षिप्त परिचय

(सुप्रसिद्ध एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री धर्मपाल जी का जन्म रानापुर, झाबुआ में हुआ। वे अब कैनेडियन नागरिक हैं। प्रकाशन :  “गणतंत्र के तोते”, “चयनित व्यंग्य रचनाएँ”, “डॉलर का नोट”, “भीड़ और भेड़िए”, “इमोजी की मौज में” “दिमाग वालो सावधान” एवं “सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?” (7 व्यंग्य संकलन) एवं Friday Evening, “अधलिखे पन्ने”, “कुछ सम कुछ विषम”, “इस समय तक” (4 कविता संकलन) प्रकाशित। तीस से अधिक साझा संकलनों में सहभागिता। स्तंभ लेखन : चाणक्य वार्ता (पाक्षिक), सेतु (मासिक), विश्वगाथा व विश्वा में स्तंभ लेखन। नवनीत, वागर्थ, दोआबा, पाखी, पक्षधर, पहल, व्यंग्य यात्रा, लहक, समकालीन भारतीय साहित्य, मधुमती आदि में रचनाएँ प्रकाशित। श्री धर्मपाल जी के ही शब्दों में “अराजकता, अत्याचार, अनाचार, असमानताएँ, असत्य, अवसरवादिता का विरोध प्रकट करने का प्रभावी माध्यम है- व्यंग्य लेखन।” आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य खिसियानी बिल्ली जूता नोचे।)

☆ व्यंग्य – खिसियानी बिल्ली जूता नोचे ☆ श्री धर्मपाल महेंद्र जैन ☆

भगवान किस रूप में कहाँ आते हैं, कब आते हैं और वहाँ क्या छोड़ जाते हैं, कौन जान सकता है! उनकी लीला आरपार है, वे ही जानें। दशरथ पुत्र भरत उनकी पादुकाएँ उठा लाए थे तो वे संसार सागर से तिर गए थे। बस इसी आशा में मैं नई चरण पादुकाएँ उठा लाता हूँ, और अपनी जीर्ण-शीर्ण पादुकाओं को वहाँ सेवानिवृत्त कर आता हूँ।

अब जो पादुकाएँ मिलती हैं वे काष्ठ की नहीं होतीं, चाम्र की होती हैं। वे भले अपवित्र हों पर चमकदार होती हैं। माल चमकदार हो तो उसकी पवित्रता कौन देखता है। भगवन् पादुकाओं को पॉलिश करवा-करवा कर इतना भव्य रखते हैं कि मेरी एक नज़र उन पर पड़ती है तो फिर नहीं उठती। मैं अपने पाँवों में चरण पादुकाएँ धारण करने के बाद ही नज़र उठा पाता हूँ, ताकि मैं यह सुनिश्चित कर सकूँ कि जो प्रसाद मैंने ग्रहण किया है, उस पर किसी और की नज़र तो नहीं है। यदाकदा ही ऐसा होता है कि उन मनभावन पादुकाओं को और कोई क्लेम करने आता हो। पर कोई आ भी जाए तो मैं जी भर कर हँसता हूँ। कहता हूँ ‘सॉरी सर’। धन्य हो अंग्रेज़, हमें सॉरी कहना सिखा गए। अन्यथा ऐसे मौकों पर खिसियानी बिल्ली को जूता नोचना पड़ता।

नई चरण पादुकाएँ पहन कर प्रभु निवास पर जाना मुझे नहीं सुहाता। पिछले सप्ताह जब अपने नए ‘हश पपीज़’ जूते पहन मैं प्रभु दर्शन को पहुँचा तो मैंने दायाँ जूता पूर्व दिशा में और बायाँ जूता पश्चिम दिशा में खोला। ताकि किसी दर्शनार्थी का मन नए जूते पर डोल भी जाए तो उसे दूसरा जूता सहज सुलभ नहीं हो। यद्यपि यह तरकीब काम कर गई, जूते यथास्थान ही रहे पर प्रभुदर्शन में मेरा चित्त न लगा। बार-बार मेरा चित्त प्रवेश द्वार के पूर्व और पश्चिमी कोनों में भटकता रहा। प्रभु ने पूछा भी, वत्स क्या बात है आज तुम व्यथित हो, कुछ माँग नहीं रहे? मैं इतना ही कह पाया – प्रभु मेरे नए जूतों का ध्यान रखना। प्रभु हँस कर चले गए। मैंने मूर्खतावश ऐसा दुर्लभ अवसर जूतों की रक्षा में गवाँ दिया। तब मैं प्रभु से जूतों का भरा-पूरा स्टोर भी माँग लेता तो प्रभु तथास्तु कह देते। बाबा को जब यह वाकया बताया तो वे बहुत खिन्न हुए। उपदेश देने लगे, ‘बेटे तुम्हें स्वर्ग मिल सकता था, तुम जूतों की रखवाली में यह जनम गवाँ आए मूर्ख।’ अब कोई मैं अकेला मूर्ख तो हूँ नहीं जो जूतों के चक्कर में स्वर्ग गवाँ रहा हूँ। उस दिन के बाद से मैं कभी नए जूते पहन कर प्रभु दर्शन के लिए नहीं गया, न प्रभु वहाँ आए। प्रभु बड़े नटखट हैं, भक्तों की कैसी परीक्षा लेते हैं! नए जूतों में मन रमा था तो आशीर्वाद देने प्रकट हो गए। अब उनसे मिलने जाते-जाते जूते घिस गए हैं, वे प्रकट ही नहीं होते।

जूतों के चक्कर में मैंने प्रभु को खो दिया तब से जूतों से वितृष्णा हो गई है। अब घर से बिना जूते पहने प्रभुदर्शन को जाता हूँ। रुआँसा घर लौटता हूँ तो ध्यान कहीं और होता है। घर आ कर पता लगता है कि मैं नंगे पाँव गया था, ढँके पाँव आया हूँ। घर में समान नंबर के जूतों का स्टोर बन रहा है, सब प्रभु की माया है। प्रभु मैं तो पुण्य कमाने आ रहा था, जूते कमा रहा हूँ। बाबा पूछते हैं कितनी पनौती इकट्ठी करेगा? जिसे मैं प्रभु प्रसाद समझ रहा था वह पनौती कैसे हो गई?

आज लौट रहा था तो एक सज्जन ने पूछा, “बड़े अच्छे जूते हैं, कहाँ से ख़रीदे?”

“यहीं से लिए थे।”

“ये तो मेरे जूते हैं।”

“आप ले लीजिये।”

“फिर आप क्या करेंगे?”

“मैं खाली हाथ आया था, खाली पैर चला जाऊँगा।”

मैंने एक वाक्य में उन्हें सारा जीवन दर्शन समझा दिया।

नई चरण पादुकाओं ने मुझे हमेशा धर्म संकट में डाला है। मुझे याद है, मेरे पाँवों में नए जूते थे, विवाह वेदी पर बैठने के लिए जूते खोलने थे। प्रियतमा वरमाला लिए खड़ी थीं पर मेरा सारा ध्यान जूतों पर ही था। जूते खोलूँ तो लूट जाऊँ, न खोलूँ तो कुआँरा रह जाऊँ। जूतों के चक्कर में सर्वप्रिय सलोनी सालियाँ खूँखार शेरनियाँ लग रही थीं। उनकी हँसी ने मेरे दिल को और उनकी तीखी निगाहों ने मेरे नए जूतों को छलनी-छलनी कर दिया था। मैंने सोचा भी दुल्हन को जाने दूँ, अपनी इज्ज़त, जूतों को बचा लूँ। भला हो बाबा का, मेरी दुविधा ताड़ गए और जूते उतरवा दिए। अन्यथा पहले भगवान गवाएँ थे, अब दुल्हन को गवाँ देता।

जैसे ऑफिस में घुसते ही बॉस अपनी कुर्सी पर बिराज जाते हैं, घर में घुसते ही जूते अपना नियत स्थान सम्हाल लेते हैं। पहली फुरसत में आदमी उन्हें कीचड़-माटी रहित कर, पुनः पॉलिश से चमका देता है। मुख और मन मलिन हो तो कुछ नहीं, जूते और बाल चमचमाते रहना चाहिए। 

हमारे गाँव और शहर के बीच एक नदी है। प्रभु की जटा से जितनी सिमटी गंगा निकलती है, उसकी धारा यहाँ वैसी ही पतली है। पर नदी का पाट सरकारी आश्वासनों जैसा चौड़ा है। गर्मी में जब पानी चाहिए नदी सूखी पड़ी होती है। झमाझम बारिश में जब चारों तरफ पानी ही पानी होता है, नदी भी पूरे आवेग में बहती है। बाढ़ में पुलिया बहा ले जाती है। ग्रामवासी अपनी चरण पादुकाएँ सिर पर रख या दिल से लगा कर नदी पार कर रहे होते हैं। तब भी आदमी को ख़ुद से ज़्यादा अपनी चरण पादुकाओं का ध्यान रहता है।

चरण अब पादुकाओं में बंद रहते हैं। आशीर्वाद की ज़रूरत में मैं बड़े-बूढ़ों के चरण स्पर्श करना चाहता हूँ तो उनकी पादुकाएँ ही दिखती हैं। आशीर्वाद की जगह जूते ही मिलते हैं। लगता है जूते मिलने की परम्परा हमारी संस्कृति से जुडी है। मेरे कवि मित्र बिना बुलाए ही कवि सम्मेलनों में नंगे पाँव जाते हैं। बिना मानदेय के जाते हैं और जब लौटते हैं तो जूतों की चार-छः जोड़ियाँ उपहार में ले कर आते हैं। उपहार का उपहास करना उन्हें अच्छा नहीं लगता। उनका मानना है कि प्रसिद्ध व्यक्तियों को ही जूते पड़ते हैं। वे बताने लगे, “पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार ने जॉर्ज बुश के ऊपर जूता दे मारा, पहला निशाना चूका तो उसने दूसरा जूता भी दे मारा। दो जूते पा कर अमेरिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश दुनिया भर में इतने प्रसिद्ध हो गए कि कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता, राष्ट्रपति ट्रम्प भी नहीं। पत्रकार की चर्चा तो कुछ महीनों में बंद हो गई पर जॉर्ज बुश जूते खाने के लिए अमर हो गए। याद रखें, जूते मारने वाले से जूते खाने वाला बड़ा होता है और उसे हमेशा याद रहता है कि उसे जूता पड़ा था।”

मुझे कवि मित्र की बात में दम लगा। दुनिया भर में लाखों व्यंग्यकार रोज ही तमाम विसंगतियों तथा कुप्रवृत्तियों पर तंज कसते हैं। देर रात तक कॉमेडी शोज़ चलाते हैं। लोग व्यंग्य को भी हँस कर टाल देते हैं, इन सबका कोई गंभीर नोटिस नहीं लेता। व्यंग्यकार ने शाब्दिक जूतों की बजाय भौतिक जूते चलाए होते तो दुनिया अलग हो सकती थी।

कुछ भी हो, इन दिनों फटे-पुराने जूतों की माँग बढ़ गई है, बड़े चुनाव आने वाले हैं। विरोधियों को जूते की माला पहना कर सम्मानित करने के लिए फटे-पुराने जूते ही चाहिए। नए जूतों से सम्मान को गरिमा नहीं मिलती।

क्या कहा आपने, आपके जूते नहीं मिल रहे। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए, मैं आता हूँ।

बुश दुनिया भर में इतने प्रसिद्ध हो गए कि कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता, राष्ट्रपति ट्रम्प भी नहीं। पत्रकार की चर्चा तो कुछ महीनों में बंद हो गई पर जॉर्ज बुश जूते खाने के लिए अमर हो गए। याद रखें, जूते मारने वाले से जूते खाने वाला बड़ा होता है और उसे हमेशा याद रहता है कि उसे जूता पड़ा था।”

मुझे कवि मित्र की बात में दम लगा। दुनिया भर में लाखों व्यंग्यकार रोज ही तमाम विसंगतियों तथा कुप्रवृत्तियों पर तंज कसते हैं। देर रात तक कॉमेडी शोज़ चलाते हैं। लोग व्यंग्य को भी हँस कर टाल देते हैं, इन सबका कोई गंभीर नोटिस नहीं लेता। व्यंग्यकार ने शाब्दिक जूतों की बजाय भौतिक जूते चलाए होते तो दुनिया अलग हो सकती थी।

कुछ भी हो, इन दिनों फटे-पुराने जूतों की माँग बढ़ गई है, बड़े चुनाव आने वाले हैं। विरोधियों को जूते की माला पहना कर सम्मानित करने के लिए फटे-पुराने जूते ही चाहिए। नए जूतों से सम्मान को गरिमा नहीं मिलती।

क्या कहा आपने, आपके जूते नहीं मिल रहे। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए, मैं आता हूँ।

♥ ♥ ♥ ♥

© श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

संपर्क – 22 Farrell Avenue, North York, Toronto, ON – M2R1C8 – Canada

वेब पृष्ठ : www.dharmtoronto.com

फेसबुक : https://www.facebook.com/djain2017

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३३ ☆ # “यह कैसा समभाव है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “यह कैसा समभाव है…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३३ ☆

☆ # “यह कैसा समभाव है…” # ☆

☆

जिंदगी तूने दिए

यह कैसे घाव है

धूप ही धूप है

नहीं कोई छांव है

 

जख्म है रिसते हुए

अरमान हैं पीसते हुए

छटपटाती काया है

लहूलुहान पांव है

 

पेड़ कट रहे हैं

जंगल घट रहे हैं

बंजर हो गई है धरा

खुश होते राव है

 

प्रकृति का तांडव है

असहाय सा मानव है

फट रहे हैं बादल

विलुप्त होते गांव है

 

सागर में उफान है

लहरों में तूफान है

मांझी दुविधा में है

भंवर में फसी नांव है

 

यह उजड़ती हुई बस्तियां

चुपचाप खड़ी हस्तियां

बिक रहा है हर कोई

लग रहे बड़े-बड़े दांव है

 

यहां घुट रही हर सांस है

यहां टूट रही है आस है

तू फिर भी है खामोश खड़ा

यार, यह कैसा समभाव है ?

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ संग संग चलना है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘संग संग चलना है…‘।)

☆ कविता – संग संग चलना है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

रुकता नहीं, ये वक्त कभी भी,

तुम्हें भी संग संग चलना है,

ऋतु बदले, ये मौसम बदले,

संग संग तुम्हें बदलना है,

नदिया निकले, उद्गम से और,

गांव शहर से निकलती है,

खेतों की सब फसलें सिंचती,

प्राण दायिनी बनती है,

नदी पूर पर जब आती,

जन धन सभी बहा ले जाती,

नदी से छेड़ नहीं करना है,

तुम्हें भी संग संग चलना है,

ईश्वर ने संसार रचाया,

पर्वत पे पेड़ों को लगाया,

सूरज चांद सितारों से,

इस धरती का रूप सजाया,

प्रकृति को है, नहीं छेड़ना,

साथी बन कर रहना है,

तुम्हें भी संग संग चलना है.

कैसे नदिया छल छल करती,

सागर से मिलने बहती है,

नहीं पूछती राह किसी से,

न ही राह भटकती है,

प्राणदायनी, सतत प्रवाहिनी,

संग संग तुम्हें भी बहना है,

तुम्हें भी संग संग चलना है.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०५ ☆ व्यंग्य – उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा ☆

‘अखिल भारतीय उत्कोच-स्वीकारक महासंघ’ की एक आपात्कालीन बैठक हुई। कारण यह था कि रिश्वतखोरी का एक मामला सनसनीखेज़ हो गया था। यों तो रिश्वतखोरी अब सनसनीखेज़ रही नहीं। रिश्वतखोरी में पकड़े जाने की कोई खबर छपे तो लगता है अखबारों को खबरों का टोटा पड़ गया।

लेकिन इस बार मामला सनसनीखेज़ इसलिए हो गया कि एक आदमी सामान्य कुर्ता, धोती, जूते पहने एक दफ्तर में घुसा। जब बाहर आया तो कपड़े जूते गायब थे। सिर्फ चड्डी बाकी थी। यह भी सामान्य बात थी, ऐसा तो होता ही है। लेकिन बाहर खड़े चपरासी ने झपटकर उसकी चड्डी भी उतार ली। आदमी मादरज़ात नंगा हो गया। कोई शर्मदार आदमी था। लगता है रिश्वत के अदब- कायदे का अभ्यास नहीं था। वह पच्चीस कदम दूर  नीम के पेड़ तक गया और वहीं ढेर हो गया। उसका हार्टफेल हो गया। इस युग में शर्मदारों का यही हश्र होता है।

बात ने तूल पकड़ा। अखबारों ने मामले को उछाला। लिखा कि अब हद हो गयी, पानी सर के ऊपर से गुज़र गया, रिश्वतखोरी कोढ़ है, कैंसर है, समाज के लिए अभिशाप है, वगैर:वगैर:। वही बातें जो सदियों से दुहराई जा रही हैं।

मजबूरन ‘अखिल भारतीय उत्कोच- स्वीकारक महासंघ’ की कार्यकारिणी की आपात्कालीन बैठक बुलायी गयी।

महासंघ के अध्यक्ष पवित्र नारायण बोले, ‘भाइयो, यह बैठक बुलाने का कारण यह है कि हमारे समाज-सेवा के काम में एक बाधा उत्पन्न हो गयी है। एक आदमी हमारे महासंघ के सदस्यों से सेवा प्राप्त करके कार्यालय से बाहर निकला और वहीं स्वर्गवासी हो गया। वैसे मृत्यु से बढ़कर मामूली और अनिवार्य घटना मनुष्य के जीवन में दूसरी नहीं है। फिर, जहां सौ काम सफलता से होते हैं वहां एकाध गड़बड़ी भी होती है। लेकिन अखबार वाले खामखां मामले को उछाल रहे हैं। हमें बदनाम कर रहे हैं। इसीलिए यह बैठक बुलायी है कि हम विचार करें कि अपने काम करने के तरीके में कौन सा परिवर्तन करें कि इन ऐरे-गैरे लोगों को मुंह खोलने का मौका न मिले।’

कार्यकारिणी के एक सदस्य दयाराम बोले, ‘इस बात का क्या प्रमाण है कि वह आदमी रिश्वत देने के कारण मरा? हो सकता है उसे रक्तचाप या दिल की कोई बीमारी रही हो।’

पवित्र नारायण बोले, ‘पोस्टमार्टम से यह बात पता चली है कि वह किसी रोग का रोगी नहीं था। वह अकस्मात मानसिक धक्के से मरा।’

दूसरे सदस्य दीनानाथ बोले, ‘यह कहां साबित होता है कि वह मानसिक धक्का रिश्वत का ही था? हो सकता है उसे किसी पारिवारिक समस्या या दुश्चिंता का धक्का लगा हो।’

महासंघ के महासचिव करुणानिधान बोले, ‘अरे भई, बेपर की मत हांको।  सब ने उसे दफ्तर से नंगे निकलते और मरते देखा।’

दयाराम और दीनानाथ चुप हो गये। अध्यक्ष पवित्र नारायण का जीवन उत्कोच की कृपा से सभी सिद्धियों और फलों से भर चुका था। एक तरह से वे अघा चुके थे। बोले, ‘मेरे खयाल से हमारे कुछ सदस्य आजकल अति करने लगे हैं। कई लोग रातों-रात करोड़पति बन जाना चाहते हैं। इसीलिए हमारे महासंघ की बदनामी होती है। मैं सोचता हूं अब हमें कुछ समय के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए कि लोगों को यह भ्रम हो कि हमें राष्ट्र की चिन्ता है। हमारे ऊपर जो कीचड़ उछाला जा रहा है उसे साफ करना भी ज़रूरी है। इस संबंध में मैं आपसे सुझाव आमंत्रित करता हूं।’

कार्यकारिणी के एक सदस्य धर्मदास काफी रिश्वत खा चुकने के बाद अब धीरे-धीरे अध्यात्म की ओर मुड़ रहे थे। वे उठकर बोले, ‘मेरा सुझाव है कि हमें गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों से रिश्वत लेना बन्द कर देना चाहिए।’

एक दूसरे सदस्य नेकराम चिढ़ कर बोले, ‘तुम रहे मूसर के मूसर। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की लिस्ट कहां से लाओगे? फिर हमारे देश में यह खराब प्रवृत्ति है कि एक वर्ग को जो सुविधा दी जाए वह दूसरे वर्ग भी मांगने लगते हैं। उससे हम भारी संकट में पड़ जाएंगे। हम हमेशा समानता और गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों पर चले हैं और उन्हीं पर अटल रहेंगे।’

‘मूसर’ संबोधन से नाराज़ होकर धर्मदास नेकराम से उलझ गये। थोड़ी देर तूतू- मैंमैं हुई। अध्यक्ष महोदय ने उन्हें शान्त किया।

नेकराम खड़े होकर बोले, ‘मेरे खयाल से तो हमें अपनी कार्य प्रणाली में परिवर्तन करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हर मिनट हजारों लोग मरते हैं, इसके लिए विचलित होने की ज़रूरत नहीं है। हमारा तौर तरीका ठीक है इसीलिए हमारी सदस्य-संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी हुई है। जो रिश्वत नहीं लेता उस पर लोग हंसते हैं। इसलिए मेरी समझ में तो इस बैठक की ही कोई ज़रूरत नहीं थी। वी आर सिंप्ली वेस्टिंग अवर प्रेशस टाइम। इतनी देर में तो हम जनता के सहयोग से दस बीस हजार  रुपये खड़े कर लेते।’

पवित्र नारायण सिर हिला कर बोले, ‘नहीं नहीं, कुछ न कुछ तो करना होगा। मेरे खयाल से हम सरकार को प्रस्ताव भेजें कि हम रिश्वतखोरी छोड़ने को तैयार हैं, बशर्ते कि सरकार हमें वैसा ही ‘नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस’ दे जैसा वह प्राइवेट प्रैक्टिस न करने वाले डॉक्टरों को देती है।’

दयाराम बोले, ‘नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस किस आधार पर तय होगा?’

अध्यक्ष ने जवाब दिया, ‘पद के हिसाब से तय हो जाएगा।’

नेकराम अपना हाथ उठाकर बोले, ‘मुझे इसमें एतराज़ है। मैं अफसर न होते हुए भी किसी अफसर से ज्यादा रिश्वत पैदा करता हूं। इसलिए पद के हिसाब से अलाउंस लेने के प्रस्ताव को मैं तुरंत रिजेक्ट करता हूं।’

अध्यक्ष महोदय सोच में पड़ गये। बोले, ‘अच्छा तो फिलहाल ऐसा करते हैं कि महासंघ की ओर से ‘उत्कोच त्याग पखवाड़ा’ घोषित करते हैं। इस पखवाड़े में कोई सदस्य रिश्वत नहीं लेगा। इस पखवाड़े का जोरदार प्रचार किया जाए।’

दीनानाथ बोले, ‘कोई अपनी मर्जी से दे तब भी न लें?’

अध्यक्ष बोले, ‘बिलकुल नहीं।’

दीनानाथ का मुंह बिगड़ गया।

एक और घाघ सदस्य दस्युदास चुपचाप बैठे मुंह में पान की जुगाली कर रहे थे। रिश्वत लेने के मामले में वे घोर सिद्धांतवादी थे। बाप का काम भी बिना रिश्वत लिये नहीं करते थे। उन्हें अब तक की सारी बातें निरर्थक और हास्यास्पद लग रही थीं।

एकाएक वे चोंच ऊपर उठाकर बोले, ‘हम फालतू बातों में अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहे हैं। आज की बैठक में हमें सिर्फ उस महान आदमी की मौत का शोक करना चाहिए जो हमारा कल्याण करते हुए काम आया। बेचारा कमज़ोर दिल का था। ऐसे कमज़ोर दिल वालों को आज की दुनिया में जन्म नहीं लेना चाहिए। सब लोग उठें और एक मिनट का मौन धारण करके दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।’

अध्यक्ष महोदय प्रस्ताव से निरुत्तर हो गये। सब उठकर आंख मूंद कर खड़े हो गये। एक मिनट तक ईश्वर से प्रार्थना करते रहे कि वह सब प्राणियों को रिश्वत का धक्का सहने की शक्ति प्रदान करे।

मौन के बाद दस्युदास बोले, ‘हम एक शोक-प्रस्ताव दुखी परिवार को भेजें। सुना है मरने वाला पांच हजार रिश्वत देकर मरा था। भला आदमी था। महासंघ उसके प्रति कृतज्ञ है। मेरा प्रस्ताव है कि उस पांच हजार में से दो हजार रुपया  सहानुभूति-राशि के रूप में दुखी परिवार को दिया जाए और इस बात का बाकायदा प्रचार हो ताकि हमारे महासंघ के बारे में लोगों के भ्रम दूर हों।’

यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत हो गया। दस्युदास आगे बोले, ‘शोक प्रस्ताव के बाद कोई कार्यवाही नहीं होती, इसलिए आज की बैठक समाप्त की जाए। पखवाड़ा अखवाड़ा मनाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए दो-चार माह बाद फिर बैठक रखी जाए।’

फिर एक आंख दबाकर बोले, ‘तब तक मामला ठंडा भी हो जाएगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ७७ – ऋचाएँ… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– ऋचाएँ…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ७७ — ऋचाएँ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

किसी शब्द — स्रष्टा ने पेड़ों की छालों में सहस्रों ऋचाएँ लिखी थीं। एक ऋषि ने उन सारी ऋचाओं का अर्थ समझ लिया। वह जानता था भविष्य में मनुष्य के हाथों पेड़ कटेंगे। पेड़ कटने से ऋचाएँ नष्ट हो जातीं। ऋषि इन ऋचाओं को नष्ट होने नहीं देता। उसने इन्हें कंठाग्र करना शुरु किया। वह साधना से वर्षों जी कर लोगों को यह अभ्यास करवाता। ये ऋचाएँ जन – जन के कंठ में पहुँच कर अनंत हो जातीं।

 © श्री रामदेव धुरंधर
20 – 09 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०७ – श्राद्ध पक्ष के निमित्त ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३०७ ☆ श्राद्ध पक्ष के निमित्त… ?

पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक श्राद्धपक्ष चलता है। इसका भावपक्ष अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और कर्तव्य का निर्वहन है। व्यवहार पक्ष देखें तो पितरों को  खीर, पूड़ी व मिष्ठान का भोग इसे तृप्तिपर्व का रूप देता है। जगत के रंगमंच के पार्श्व में जा चुकी आत्माओं की तृप्ति के लिए स्थूल के माध्यम से सूक्ष्म को भोज देना लोकातीत एकात्मता है। ऐसी सदाशय व उत्तुंग अलौकिकता भारतीय दर्शन में ही संभव है। यूँ भी सनातन परंपरा में प्रेत से  प्रिय का अतिरेक अभिप्रेरित है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने की ऐसी परंपरा वाला श्राद्धपक्ष संभवत: विश्व का एकमात्र अनुष्ठान है।

इस अनुष्ठान के निमित्त प्राय: हम संबंधित तिथि को संबंधित दिवंगत का श्राद्ध कर इति कर लेते हैं। अधिकांशत: सभी अपने घर में पूर्वजों के फोटो लगाते हैं। नियमित रूप से दीया-बाती भी करते हैं।

दैहिक रूप से अपने माता-पिता या पूर्वजों का अंश होने के नाते उनके प्रति श्रद्धावनत होना सहज है। यह भी स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपने दिवंगत परिजन के प्रति आदर व्यक्त करते हुए उनके गुणों का स्मरण करे। प्रश्न है कि क्या हम दिवंगत के गुणों में से किसी एक या दो को आत्मसात कर पाते हैं?

बहुधा सुनने को मिलता है कि मेरी माँ परिश्रमी थी पर मैं बहुत आलसी हूँ।…क्या शेष जीवन यही कहकर बीतेगा या दिवंगत के परिश्रम को अपनाकर उन्हें चैतन्य रखने में अपनी भूमिका निभाई जाएगी?… मेरे पिता समय का पालन करते थे, वह पंक्चुअल थे।…इधर सवारी किसी को दिये समय से आधे घंटे बाद घर से निकलती है। विदेह स्वरूप में पिता की स्मृति को जीवंत रखने के लिए क्या किया? कहा गया है,

यद्यष्टाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो: जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।

अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी का अनुसरण करते हैं। भावार्थ है कि अपने पूर्वजों के गुणों को अपनाना, उनके श्रेष्ठ आचरण का अनुसरण करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

विधि विधान और लोकाचार से पूर्वजों का श्राद्ध करते हुए अपने पूर्वजों के गुणों को आत्मसात करने का संकल्प भी अवश्य लें। पूर्वजों की आत्मा को इससे सच्चा आनंद प्राप्त होगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५० – हिंग्लिश गजल ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी  – हिंग्लिश गजल।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५० ☆

☆ हिंग्लिश गजल ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

दोस्तों की दोस्ती ही बेस्ट है

डिश अनोखी है अनोखा टेस्ट है

.

फ्लैट-बंगलों की इसे जरुरत नहीं

रहे दिल में हार्ट इसका नेस्ट है

.

एनिमी से लड़े अर्जुन की तरह

वज्र सा स्ट्रांग सचमुच चेस्ट है

.

टूट मन पाए नहीं संकट में भी

दोस्ती दिल जोड़ने का पेस्ट है

.

प्रोग्रेस इन्वेंशन हिलमिल करे

दोस्ती ही टैक्निक लेटेस्ट है

.

जिंदगी की बंदगी है दोस्ती

गॉड गिफ्टेड ‘सलिल’ यह ही फेस्ट है

.

जीव को ‘संजीव’ करती दोस्ती

कोशिशों का, परिश्रम का क्रेस्ट है

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१७.९.२०२५संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

 

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “डर” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

वह साहब सुबह उठा। नहा धोकर , नाश्ता कर ऑफिस के लिए तैयार होने लगा कि अचानक एक जूते का तस्मा कसते कसते टूट गया। इतना समय नहीं बचा था कि बाज़ार जाकर नये तस्मे खरीद लाता। गाड़ी आकर गेट पर लग गयी थी। ड्राइवर हार्न बजाए जा रहा था। जैसे तैसे जूतों के पुराने तस्मे कसे और यह सोचकर रवाना हुआ कि शाम को लौटते वक्त नये तस्मे खरीद लेगा।

दिन भर ऑफिस में बैठे बैठे उसका ध्यान बार बार अपने एक टूटे तस्मे पर जाता रहा। वह मेज़ के पीछे जूतों को ज्यादा से ज्यादा छिपाने में लगा रहा। दूसरे कर्मचारी देखेंगे तो क्या सोचेंगे? फिर वह अपने पर मुस्कुराया भी कि हम ज़िंदगी भर यही सोचते रहते हैं कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचेंगे? दूसरे हमारी कोई कमी या कमज़ोरी देख लेंगे तो कैसा लगेगा? इस बात पर गौर किया उसने।

ऑफिस से छुट्टी हुई। साहब गाड़ी में सवार सीधे एक बढ़िया मार्केट में पहुंचे। बड़े बड़े शो रूम। चमचमातीं , दूधिया लाइट्स। बाहर मज़ेदार पकवान की रेहड़ियां। खूब भीड़। साहब एक शो रूम में घुसा। सेल्समैन भागा आया -कहिए साहब? कौन से ब्रांड के नये डिजायन के जूते दिखाऊं?

-मुझे जूते नहीं , सिर्फ तस्मे चाहिएं। अभी सोफे पर बैठते बैठते कहा साहब ने।

सेल्समैन ने चौंक कर देखा -साहब। यहां सिर्फ नये जूते बिकते हैं। साॅरी। आप अगले शो रूम में पता कीजिए।

दूसरे शो रूम वाले सेल्समैन ने सोफे पर बैठने का अवसर भी नहीं दिया।

तुरंत कहा -आप भी कमाल करते हो? जाइए। यहां कोई तस्मे एक्स्ट्रा नहीं बेचे जाते। आप चाहो तो नये जूते खरीदने के लिए बैठ सकते हो। नहीं तो समय खराब मत कीजिए।

शो रूम और भी थे। चमचमाते पर बिना पुराने जूतों के। वहां पुराने का कोई काम नहीं। एक शो रूम के सेल्समैन ने सबसे ज्यादा होशियारी दिखाई -क्या रखा है इन पुराने डिजाइन के जूतों में जिसके तस्मे ढूंढते फिर रहे हो? नये दिखाता हूं। खरीदिए और सारी प्राॅब्ल्म साल्व। न रहेंगे पुराने जूते न ढूंढेंगे तस्मे।

बाहर आया। देखा कि रेहड़ियों पर लोग पेपर ग्लास या पेपर प्लेट्स में मज़े में खा पी कर डस्टबिन में फेंक पैसे चुकता कर जा रहे हैं। अचानक तस्मों ने जैसे मुंह चिढ़ा कर कहा -बाबू मोशाॅय , समझे नहीं क्या? यह है नया कल्चर। यानी -यूज एंड थ्रो। ओल्ड से नो मोह। समझे क्या?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # २४ – कथा-कहानी – राघव और विश्वास ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ राघव और विश्वास ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

सुबह से रात तक सड़क पर अपनी गाड़ी दौड़ाते दौड़ाते राघव बुरी तरह से थक जाता था। अपने ऑटो को चार्जिंग में लगाकर खाना पीना खाकर जब वह बिस्तर पर लेटता तो उसे यह पता भी नहीं चलता कि वह जिंदा भी है। प्रत्येक दिन की भांति आज भी वह घर पहुंचा, लेकिन आज उसके लेटने का दिन नहीं था।

मुनमुनिया बुखार से तप रही थी, साथ ही साथ उसे उल्टी भी हो रही थी। अपनी मुनमुनिया को लेकर राघव और रज्जो दोनों अस्पताल की ओर भागे। पूरे दिन की कमाई के अलावा यही कोई तीन-चार सो रुपए और भी घर में थे। कुल मिलाकर लगभग 1000 ₹1200 से अधिक नहीं था।

जैसे-जैसे राघव का ऑटो आलमबाग की तरफ पढ़ रहा था, सुंदर सी मुनमुनिया की साँसे लम्बी -लंबी चलने लगी।

जरा पीछे मुड़कर देखो तो मुनमुनिया के पापा! देखो न हमारी मुनमुनिया कैसे कर रही है? इसकी सासे उल्टी चल रही है मुनमुनिया के पापा!.. राघव ने पीछे मुड़ देखा तो उसके होश उड़ गए। उससे अब ऑटो चलाए बन नहीं रहा था। किसी तरह से वह नहरिया चौराहे के पास एक बड़े नर्सिंग होम के पास पहुंचा। अस्पताल के रिसेप्शन पर बात की तो मरीज के रजिस्ट्रेशन करने की बात कही गयी। पूरे ₹500 तो रजिस्ट्रेशन में ही खर्च हो गए। अभी शेष इलाज बाकी था। राघव के पसीने छूट रहे थे आखिर वह करें तो क्या करें। इधर पैसे की तंगी उधर मुनमुनिया के लिए एक-एक पल भारी हो रहा था। राघव ने अपने कई ऑटो वाले साथियों को फोन मिलाया लेकिन लगभग सभी ने उटपटांग बातों के सिवाय कुछ भी मदद नहीं की। कई तो नशे में बुरी तरह से धुत होकर गालियां भी दे रहे थे।

राघव को अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। मुनमुनिया की हालत बिगड़ती चली जा रही थी। उसे वेंटिलेटर पर रखने के सिवाय कोई उपाय शेष नहीं बचा था। बड़े डॉक्टर का इंतजार था।

सर…इनके पास तो पैसे रुपए बिल्कुल नहीं है। कैसे उका इलाज किया जाए। वैसे जरुरी इंजेक्शन वगैरह तो दे दिया गया है लेकिन बच्चे की हालत ठीक नहीं है। बच्चे को अटेंड क़र रहे नर्स और अटेंडेंट ने डॉ विश्वास से यह बातें कहीं।

इस बच्चे को तत्काल वेंटिलेटर पर ले चलो। इसके अकाउंट में अभी ये ₹5000 डिपॉजिट करो, ऐसा कहते हुए डॉ. विश्वास ने नोटों की एक गड्डी नर्स के हाथ में पकड़ा दी। नर्स, अटेंडेंट और रज्जो तीनों हक्के – बक्के थे। रज्जो को विश्वास नहीं हो रहा था उसे लगा कि शायद डॉक्टर के रूप में भगवान ही आ गये। अस्पताल की ओ पी डी की बेंच पर सिसकी भरते हुए उस ऑटो ड्राइवर को डॉक्टर विश्वास ने देखक़र पहचान लिया था, जिसने एक दिन मुश्किल हालत में डॉक्टर साहब और उनके बेटे को एयरपोर्ट पहुंचाया था।

तेलीबाग और उतरेटिया के बीच जाम की स्थिति अत्यंत ही खराब थी। लगभग एक घंटे से कोई भी गाड़ी टस से मस नहीं हो रही थी। डॉ विश्वास को अपने बेटे को छोड़ने एयरपोर्ट जाना था। उनकी फ्लाइट के टेक आफ करने का समय धीरे-धीरे, नजदीक आ रहा था, लेकिन जाम खुलने का नाम नहीं ले रहा था।

हर हाल में हमें फ्लाइट पकड़ना ही होगा नहीं तो मेरा कैरियर बर्बाद हो जाएगा एक बीस बाइस वर्ष के बच्चे को ऐसा कहते हुए राघव ने सुना तो उसके कान खड़े हो गए।

क्यों साहब, बाबू ऐसा क्यों कह रहे हैं। कार की बगल में से गुजर रहे राघव ने डॉ विश्वास से पूछ लिया था।

डॉ विश्वास ने जब सारी बातें राघव से बताई तो राघव ने हाथ जोड़क़र कहा.. साहब आप अपनी कार को थोड़ा सासाइड में दबा कर इधर ही खड़ी कर दीजिए। जाम कब खुलेगा कुछ पता नहीं। मेरे साथ आईये न साहब…मैं कुछ करता हूं। राघव ने हाथ में साहब की अटैची उठाई और गली-गली होते हुए तीनों राघव के घर पहुंच गए।

यहां से गली-गली होते हुए राघव का ऑटो तेजी के साथ एयरपोर्ट की ओर भाग रहा था। सिक्योरिटी वालों ने एयरपोर्ट के पास पहुंचने ऑटो को रोका तो डॉक्टर साहब ने फ्लाइट छूटने का हवाला दिया तो उसे जाने का मौका मिला। डॉक्टर विश्वास का बेटा चेकिंग करने के बाद एयरपोर्ट के अंदर जा चुका था। उसके सपनों की उड़ान के पंख टूटने वाले थे कि राघव सचमुच राघव बन क़र आ गया था।

आज समय स्वयं को दुहरा रहा था। डॉक्टर विश्वास भगवान बन क़र आज मुनमुनिया का इलाज कर रहे थे। यह विश्वास तो राघव को भी नहीं हो रहा था।

☆

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-५ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – २ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भाग-५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

250 ईसा पूर्व तक दक्षिणी नेपाल के क्षेत्र मौर्य साम्राज्य के प्रभाव में आ गए थे। ठकुरी राजाओं का शासन उत्तरी नेपाल तक सीमित हो गया। सम्राट अशोक ने लुंबिनी की तीर्थयात्रा की और बुद्ध के जन्मस्थान पर एक स्तंभ बनवाया, जिस पर अंकित शिलालेख नेपाल के ठीक से दर्ज इतिहास के लिए शुरुआती बिंदु हैं। अशोक ने काठमांडू घाटी का भी दौरा किया और वहां गौतम बुद्ध की यात्रा की स्मृति में स्मारकों का निर्माण कराया। चौथी शताब्दी ईस्वी तक, नेपाल का अधिकांश भाग गुप्त साम्राज्य के प्रभाव में था। चौथी से ग्यारहवीं सदी तक कई राजाओं द्वारा विखंडित रूप से शासित रहा।

हिमालय की तराई प्रदेशों में एक समय 500 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व तक जैन और बौद्ध धर्म का बोलबाला था। उसी समय सम्राट अशोक के शासन में धर्मचक्र प्रवर्तन से तिब्बत, सिक्किम, भूटान, चीन, जापान, श्रीलंका और ब्रह्मदेश अर्थात् बर्मा में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, परंतु क्या कारण था कि नेपाल में सनातन धर्म के साथ हिंदू राष्ट्र अस्तित्व में रहा आया जो अभी-अभी धर्म निरपेक्ष देश बना है। जबकि भारत में धर्म निरपेक्ष राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र से पुनर्स्थापित करने के प्रयास हो रहे हैं। इस प्रश्न का जवाब इतिहास के झोंके में छुपा है। जिस समय बौद्ध धर्म हिमालय पर स्थित देशों में फैल रहा था उस समय नेपाल देश ही नहीं बना था। ईसा से पूर्व दूसरी सदी में हिंदू धर्म का पुनः उद्भव हुआ। जो गुप्त काल (350-550 ईस्वी) में खूब फला फूला। मध्य युग में गंगा के मैदान में इस्लामिक प्रचार-प्रसार और प्रतारणा से त्रस्त होकर हिंदू क्षत्री प्रयागराज और काशी के पंडितों को लेकर तराई से होकर इन पहाड़ों में आए। काठमांडू, पाटन और भक्तपुर राज्य स्थापित किये। जिनके दरबार के अवशेष अभी भी मौजूद हैं। उन्होंने शिव का पशुपतिनाथ स्वरुप और विष्णु का आरम्भिक स्वरूप पूजना आरम्भ किया। पूरा नेपाल मांसाहारी है। जबकि वैष्णव पंथ में मांसाहार प्रचलित नहीं है। नेपाल में पुष्टिमार्गी वैष्णव पंथ नहीं पहुँचा इसलिए शाकाहार की प्रवृत्ति भी नहीं आई।

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15 जून 2022 को सुबह छै बजे नई दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही बोगी में कुलियों की भीड़ चढ़ गई। उन्होंने दरवाज़ों की तरफ़ पहुँचने के रास्ते अवरुद्ध कर दिए। जवाहर जी थोड़ी देर नजारा देखते रहे। फिर उनका इम्पल्स-स्विच ऑन हुआ और उन्होंने कुलियों को झिड़का तो रास्ता क्षण भर में साफ़ हो गया। जवाहर जी का व्यवहार बहुत पारदर्शी है। वे मन में कुछ भी नहीं रखते। तुरंत निपटान उनकी विधि है। नई दिल्ली स्टेशन पर अहमदाबाद से उनके छोटे भाई हीरा लाल कर्णावत जी भी आ जुड़े। सोलह नम्बर प्लैट्फ़ॉर्म के बाहर निकलकर एक इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में दो घंटे के लिए ठहराव टिकट लेकर वह हुए, जिसे फ़्रेश होना कहते हैं। फिर नेपाल के नामकरण और प्राकृतिक स्थिति पर चर्चा करते रहे।

इग्ज़ेक्युटिव लाउंज में तैयार होकर जन आहार केंटीन से डोसा खाया, जिसका स्वाद दिल्लीयाना था, दक्षिण का स्वाद यहाँ मिल भी नहीं सकता। नौ बजे के लगभग सामान खींचकर एयरपोर्ट मेट्रो की तरफ़ चल दिए। तक़रीबन आधा किलोमीटर चले। भीड़ को धकियाते और लोगों से धक्के खाते मेट्रो का टिकट लिया। पहले सिक्का मशीन को दिखाना पड़ता था। अब डिजिटल कार्ड स्कैन करके प्रवेश मिलने लगा है। 

एयरपोर्ट लाइन में भूमिगत और एलिवेटेड मेट्रो स्टेशन दोनों का मिश्रण है। एयरपोर्ट मेट्रो में सवार हो गये। जो शिवाजी स्टेडीयम तक सुरंग में चली, फिर धौलाकुआँ से सतह पर आकर दिल्ली के नज़ारे दिखने लगे।  इसके बाद अंतर्देशीय उड़ान अड्डा T-1 आता है। फिर मेट्रो इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पहुँचती है। वहाँ T-2 और T-3 टर्मिनल हैं जहां से आप दुनिया के किसी भी देश की उड़ान भर सकते हैं। बस आपके पास टिकट और पासपोर्ट-वीज़ा होना चाहिए। हम बिना वीज़ा के ही पहुँच गये। उन्होंने भी नहीं पूछा क्योंकि नेपाल जाने के लिए भारतीयों को वीज़ा की छूट है। टर्मिनल से अंदर घुसने के बाद A,B,C……..H,I,J… काउंटर बने हैं। आपकी उड़ान जिस काउंटर से अनुमत है वहीं से जाना होता है। नियत समय से पूर्व पहुँच गये। ख़ाली समय में नेपाल के भूगोल को खंगाल निकाला।

नेपाल चारों तरफ़ से ज़मीनी देशों से घिरा देश है। जिसकी कोई भी सीमा समुद्र से नहीं लगती है। यह मुख्य रूप से हिमालय के बीच में स्थित है। इसके दक्षिण में गंगा के मैदान के कुछ हिस्से हैं। उत्तर में यारलुंग त्सांगपो, जिसे तिब्बती में यारलुंग ज़ंगबो भी कहा जाता है जो कि चीन में स्थित ब्रह्मपुत्र नदी की ऊपरी धारा है। त्सांगपो नदी को हम तिब्बत की गंगा कह सकते हैं। वह हिमालय के उत्तरी ढलान से अनेकों नदियों का जल ग्रहण करती है। विश्व की सबसे ऊँची चोटियों पर पिघलते बर्फीले ग्लेशियर का कंचन पानी लेकर सिक्किम और भूटान के उत्तर से भारत उत्तर-पूर्व अंचल से गुवाहाटी में घुसकर बंगला देश से होकर बंगाल की खाड़ी में विश्राम करती है। यह तिब्बत की सबसे लंबी और चीन की पांचवीं सबसे लंबी नदी है। ऊपरी भाग को डांगके ज़ंगबू भी कहा जाता है जिसका अर्थ है “घोड़ा नदी।” नेपाल के उत्तर में ही चीन का तिब्बत है। दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में भारत की सीमा लगी है। जबकि यह बांग्लादेश से सिलीगुड़ी कॉरिडोर द्वारा संकीर्ण रूप से अलग है और भारतीय राज्य सिक्किम द्वारा भूटान से अलग है। नेपाल में उपजाऊ मैदान, पाइन वनाच्छादित पहाड़ियाँ और दुनिया के दस सबसे ऊँचे पहाड़ों में पृथ्वी का सबसे ऊँचा माउंट एवरेस्ट सहित कई शिखर शामिल हैं। नेपाल एक बहु-जातीय, बहुभाषी, बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक राज्य है, जिसमें नेपाली आधिकारिक भाषा है। काठमांडू देश की राजधानी और सबसे बड़ा शहर है। नेपाल का राष्ट्रीय वाक्य “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” है।

हम चेक-इन करके मायग्रेशन काउंटर पर पहुँचे। वहाँ बहुत लम्बी क़तार थी। दस काउंटर के स्थान पर मात्र तीन पर मायग्रेशन जाँच का कार्य चल रहा था। बहुत भीड़ होने से उकताहट का माहौल था। एक घंटा खड़े रहने के बाद सुरक्षा जाँच को पहुँचे। वहाँ भी भीड़ थी। अंत में सारी जाँच उपरांत स्टेट बैंक क्रेडिट कार्ड धारक होने के नाते मात्र दो रुपयों में तीन हज़ार के लंच हेतु स्पेशल लाउंज में प्रवेश मिल गया। आप सोच रहे होंगे कि यह तीन हज़ार का लंच क्या होता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे बाज़ार में एक शर्ट का कपड़ा तीन सौ रुपए में मिलता है, वहीं रेमंड की शॉप पर तीन हज़ार का शर्ट भी मिलता है। वहाँ चाय-कॉफ़ी से लेकर सभी प्रकार के ड्रिंक और भोजन की व्यवस्था उपलब्ध थी। हमने फ़्रूट के साथ दूध-ब्रेड उठाईं। थोड़ी देर में काउंटर समेटे जाने लगे। पता चला कि वह ब्रेकफ़ास्ट था, लंच तो अब परोसा जाने वाला है। हमने जूस का गिलास भरा। नज़दीक ही स्कॉच काउंटर पर भीड़ लगी थी। जितनी चाहो उतनी पी लो। तब हमें तीन हज़ार के लंच का रहस्य समझ में आया। कर्णावत बंधु शुद्ध शाकाहारी और मद्य व्यसन से दूर रहते हैं। उन्हें खाने की तल्लीनता में छोड़ हमने जूस में एक पैग डलवा लिया। दो घंटे समस्त प्रकार के आनंद के बाद विमान में चढ़ने गेट नम्बर 1-B पर पहुँच गये। 

विमान में कुल 186 सीट थीं। हमें सबसे पीछे 184 नम्बर की 31-D सीट मिली। हम जाकर बैठ गये। हमारे बाद अंतिम दो सीट और थीं। उनके आने पर हमने उठकर उन्हें जाने देना पड़ा। वे दोनों सवारियाँ खाते पीते घर की लगेजनुमा थीं। वे किसी तरह कुर्सियों में समा गईं। उनके बेल्ट नहीं लग पा रहे थे। विमान परिचरिका की दुबली-पतली देह ने लम्बी दूरी तय करके उनके बेल्ट कसे। सभी विमान परिचारिकाएँ नवयौवना थीं। उन्होंने हिंदी और अंग्रेज़ी में सुरक्षा निर्देश अभ्यास दुहराये। विमान कप्तान के कभी न समझ आने वाले कुछ शब्द बुदबुदाये। विमान ने दो बजकर तीस मिनट पर उड़ान भरी। विमान गुड़गाँव शहर के ऊपर उठकर मेरठ मुरादाबाद के ऊपर से होकर हिमालय की तराई की तरफ़ उड़ता रहा। विमान तलहटी की सबसे बाहरी सीमा जिसे शिवालिक हिल्स या चुरिया रेंज कहा जाता है, जो 2,300 से 3,280 फीट ऊँचाई पर स्थित है, को चूमता बढ़ता रहा। चौड़ी, निचली घाटियाँ जिन्हें इनर तराई घाटियाँ (भीतरी तराई उपत्यका) कहा जाता है, के ऊपर से विमान उड़ता रहा। दाहिनी तरफ़ गंगा का मैदान दिखने लगा। उसके बाद थोड़ी दूर ऊँची उड़ान भरकर हिमालय की चोटियों को पार करके नेपाल की वायुसीमा में प्रवेश कर गया। काठमांडू की घाटी दिखने लगी। विमान 1440 किलोमीटर की दूरी एक घंटा तीस मिनट में पूरी करके चार बजे काठमांडू उतरा। विमान से दिखती लुभावनी हरीतिमा ने मन मोह लिया।

काठमांडू में हमारा स्वागत बहुत आत्मीय तरीक़े से हुआ। जवाहर जी के पूर्व परिचित नेपाली मूल के श्री भरत शर्मा एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। एक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कार्यक्रम में जवाहर जी से उनकी ऑनलाइन मुलाक़ात तीन दिन पूर्व ही हुई थी। वे चीन में हिंदी पढ़ाते हैं। पशुपतिनाथ मंदिर में वहाँ के प्रधान भाट से उनके घरेलू रिश्ते हैं। प्रधान भाट कर्नाटक के भाट ब्राह्मण हैं। वे पशुपतिनाथ मंदिर प्रांगण की चार सदस्यीय व्यवस्थापक समिति के प्रधान हैं।

जवाहर जी ने नेपाल की स्थानीय सिम लेकर सबसे पहले भरत शर्मा जी को फ़ोन किया। वे दस मिनट में हवाई अड्डा पहुँच गये। उन्होंने हमें एक-एक रंगबिरंगा मफ़लर भेंट स्वरूप गले में पहना कर स्वागत किया। हमारे रुकने का प्रबंध कमल पोखरी चौक स्थित जैन मंदिर आवास गृह में किया गया था। उन्होंने नेपाली भाषा में एक टैक्सी तय करके उसे भारतीय मुद्रा में पाँच सौ रुपए जिनका नेपाली मूल्य आठ सौ रुपए था, भुगतान कर दिए। हम लोग चार बजे के लगभग कमरे में थे। दो कमरे तीन हज़ार भारतीय मुद्रा में मिल गये। आधा घंटा कमर सीधी करके एक टैक्सी पकड़ कर पशुपतिनाथ मंदिर पहुँचे। नेपाल में टैक्सी बहुत महँगी हैं। गाड़ियों की क़ीमत भारत से चार गुणा अधिक हैं। पेट्रोल दो सौ रुपए लीटर है। पहाड़ी रास्ते होने से ऑटो नहीं चलते।

भरत शर्मा जी वहाँ हमारी राह देख रहे थे। उन्होंने जिस तरह के दर्शन कराए वह शायद ही किसी को नसीब होते हों। वे पहले नागराज वासुकि के दर्शन कराने ले गए। पशुपतिनाथ जी के दर्शन पूर्व वासुकि की अनुमति की परम्परा है। इस बीच हम मोबाईल ऊपर की जेब से नीचे पैंट की जेब में रख रहे थे तो एक सेवादार ने आई-फ़ोन यह कहते हुए हमसे छीन लिया कि हम मंदिर प्रांगण की फ़ोटो निकाल रहे थे। थोड़ी देर के लिए हम घबरा गये। हमारा समस्त लेखन मोबाईल में ही है। उसका चला जाना याने हमारी सारी सम्पत्ति का लुट जाना। तुरंत की फ़ोटो चेक की गईं और हमारी गलती के लिए हमसे पशुपतिनाथ से माफ़ी माँगने को कहा गया। गलती हुई या नहीं, यह बेमानी था, हमने सिर झुकाकर माफ़ी माँगी। बहुत मिन्नतों और शर्मा जी की मशक़्क़त से मोबाईल वापस मिला।  

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, नेपाल का नाम एक प्राचीन हिंदू ऋषि से लिया गया है जिसे विभिन्न विद्वानों द्वारा मुनि नेमी कहा जाता है। हालांकि नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन इसकी आबादी मुख्य रूप से हिंदू है। पशुपतिनाथ को एक राष्ट्रीय देवता के रूप में पूजा जाता है। बागमती नदी के तट पर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर को नेपाल के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। भगवान पशुपतिनाथ के रूप में भगवान शिव आराध्य देवता हैं। इसका मुख्य आकर्षण भगवान शिव के चार मुखों को प्रदर्शित करने वाला एक अनूठा शिव लिंग है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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