श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३६ ☆

☆ कविता ☆ ~ हमारे राम ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

हें राम ! आपके जीवन ने,

जीने का अर्थ बताया है़।

जीवन कैसे जिया जाता,

ऐसे जी कर दिखलाया है़ ॥

*

वैराग, त्याग औऱ नित्य नियम

जीवन गाथा का पन्ना है़।

न जाने, हमने क्या पहना,

सच मे सच्चा यह गहना है़ ॥

*

वाणी की मृदुल, मधुरता का

सच अर्थ आप ने बतलाया।

वन गमन सहज स्वीकार किया,

ऐसा साहस कर दिखलाया ॥

*

कुलगुरु को पिता तुल्य जाना,

सेवक को भी सम्मान दिया।

केवट से चरण धुलाए जब,

दिल मे अपने स्थान दिया ॥

*

ऊँच नीच का भेद नही है़,

 राम आप की नजरों मे।

मतंग शिष्य सब दंग हुऐ,

जब पहुचे शबरी के आश्रम मे ॥

*

हनुमान राम के नेह मिलन ने

नई कहानी लिख डाली।

जन औऱ वन जीवन निकट हुऐ

मित्रता अनोखी रच डाली ॥

*

सागर की लहरें शान्त हुईं,

जब राघव का सानिध्य मिला।

मद, अहंकार सब लोप हुऐ,

ज्ञान अनोखा दिव्य मिला ॥

*

मद औऱ नम्रता खूब लड़े,

सच औऱ झूठ जब टकराये।

चकराया माथा, कपिदल का

जब रावण के निकट राम आये ॥

*

संघार पूर्व सम्मान दिया,

क्योकि वह राजा ज्ञानी था।

वध किया राम ने पापों का,

क्योकि वह अति अभिमानी था ॥

*

राघव- रावन का युद्ध नही,

अधर्म, धर्म से हारा था।

इस महा युद्ध का सच जानो,

सत ने असत्य को मारा था ॥

*

लंका से चलने के पहले,

अपनी सच्चाई दिखलाई थी।

विभीषण को जब लंका सौपा, तॊ

यह सबसे बड़ी विदाई दी ॥

*

राम अयोध्या मे आये

तब रामराज अवध आया।

राजधर्म का गूढ़ अर्थ,

मर्यादा पुरुषोत्तम ने बतलाया ॥

♥♥♥♥

#कैसे_हैं_मेरे_राम

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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