श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३९ ☆
☆ कविता ☆ ~ जो रस था गांव की माटी में ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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क्यों कहां खो गयीं संस्कृतियाँ
खोये वे अपने मानदंड
खो गई धरोहर पुरखों की
क्यों हुए आज इतने उद्दंड
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भोजन करने के नीति नियम
के पीछे वैज्ञानिक कारण था
व्रत फलाहार नियमों में था
व्रत के उपरांत ही पारण था
*
पर आज हर तरफ लोप हुआ
भोजन की पंगत नहीं रही
सब खड़े-खड़े भोजन करते
साधु की संगत नहीं रही
*
तामस भोजन का चलन चला
छूटा घी, खांड, दूध, दही
चूल्हा, चौका, अइला, घईली
खोयी घर की कंहतरी, रही
*
ताजा गन्ना,शरबत खोया
खोया भाजी, भूना हो रहा
तिल वाली तिलकुट कहाँ गयी
बयना का तिलवा कहाँ रहा
*
ये सभी व्यंजन अमृत थे
थे प्यार के रस में पगे हुए
रिश्ते भी अमृत जैसे थे
थे आपस में थे बंधे हुए
*
श्रेयस उस रस को ढूंढ रहा
जो रस था गांव की माटी में
नीरस जीवन, रुखे रिश्ते
होते शहरी परिपाटी में
♥♥♥♥
© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





