डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७३ ☆ 

बाल कविता – परियाँ कहतीं ‘वो ईश्वर है’ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

रोज हवाएँ बदला करतीं,

कभी पश्चिमी,कभी पूर्वी।

जाने इनको कौन चलाता,

कभी दक्खिनी,कभी उत्तरी।

 *

कभी बहें ये शीतल-शीतल,

कभी आग-सी बरसाती हैं।

कभी बहें ये तूफानी-सी,

कभी प्यार से सरसाती हैं।

 *

टिमटिम तारों-सी नभ में तो,

कभी पूर्ण उजियारी जैसी।

कभी बादलों के सँग मस्ती,

कहीं निपट अँधियारी जैसी।

 *

कोई तारा तेज चमकता,

कोई बिल्कुल मंदा-मंदा।

जाने क्या व्यापार हो रहा,

लगता जैसे गोरखधंधा।

 *

तारे भी दिन-रात चल रहे,

अटल दीखता बस ध्रुव तारा।

मण्डल दिखे सप्तऋषियों का,

दीख रहा गतिमय नभ सारा।

 *

कभी गरजकर बादल बरसें,

कहीं प्रलय-सी है आ जाती।

कहीं नहीं बरसे जल बिल्कुल,

धरा प्यास से ही मर जाती।

 *

कभी-कभी ये बादल राजा,

इंद्रधनुष को हैं ले आते।

रूप दिखाकर ये मनभावन,

पल दो पल में ही खो जाते।

 *

कहीं श्रृंखलाएँ गिरिवर की,

कोई ऊँची , कोई छोटी।

कहीं पठारों की मृतकाएँ,

कहीं दलदली बेहद खोटी।

 *

कहीं जंगलों की अमराई,

जिसमें पशुओं का विचरण है।

किस्म-किस्म के वन तरुओं पर,

पक्षि गणों का मृदु कलरव है।

 *

कहीं बह रहीं नदियाँ कल-कल,

कहीं मनोरम झरने प्यारे।

इन्हें देखकर प्यार उमड़ता,

प्यास बुझा सुख देते सारे।

 *

सागर कहीं महासागर हैं,

खारे जल से अटे हुए हैं।

अनगिन जीव रहा करते हैं,

मोती,माणिक छिपे हुए हैं।

 *

कहीं सुगन्धित धरा नहाए,

अन्न,फलों को रोज लुटाए।

प्राणों को नवजीवन देकर,

सप्त-सुधा रस है बरसाए।

 *

चलो! चलें परियों से पूछें,

कौन सभी का है निर्माता।

परियाँ कहतीं “वो ईश्वर है-

सबका चालक,जीवन दाता।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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