डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “रिसते हुए रिश्ते“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # ११ ?

? कविता – रिसते हुए रिश्ते… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

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भूल गए और कहते हो, ये अपनापन है

रिश्तों में ना गर्माहट ना कोई तपन है

 *

बचपन में जो सिखलाया था, वह सब भूले

अब रिश्ता बस सुविधाओं का अनुबंधन है

 *

थोथे वादे, भाषण सारे और प्रलोभन

मुफ़्त बाँटने की बातें बस आयोजन है

 *

लक्ष्य तुम्हारा क्या है, हमने जान लिया है

साध्य नहीं इंसा, आसन का बस साधन है

 *

सिक्कों में बिकते देखे  हैं हमने सपने

महज़ नफ़े ही नफे़ के सौदों में चिंतन है

 *

भीड़ में भी चेहरा तन्हा-सा, बुझा-बुझा है

मन के भीतर उम्मीदों का मरा हिरन है

 *

भरता हुआ कुलाँचे बचपन कहाँ खो गया

जीवन में ‘राजेश’, जहाँ देखो उलझन है

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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