डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “दर्पण…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १४
दर्पण… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
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“अल्फाज़ लफ्ज़ लहज़ा नियंत्रण में नहीं है,
ज़िक्र भी चाहत का निमंत्रण में नहीं है l
लेकर के गहरी साँस,दिल से रूह ने कहा
क्यूँ मेरा अक़्स मेरे ही दर्पण में नहीं है ??
=2=
वो कौन है जो लाल बुझक्कड़ में नहीं है
अब ठोस इरादा किसी के प्रण में नहीं है
अपने सर पे ताज़ का वो ख़्वाब देखता
मैदान में जो है नहीं,जो रण में नहीं है !!
=3=
चाहत हो तो ख़ुदा की झलक झलके रूप में
फ़िर वैसी आभा किसी आकर्षण में नहीं है
जिस हुश्न से क़ुदरत ने नवाज़ा है आपको
कि वैसी क़ायनात किसी कण में नहीं है
=4=
वैसी कशिश रही न समर्पण में ज़रा भी l
वो जादू रूप के किसी भी क्षण में नहीं है ll
‘राजेश’ कहने क्यों लगी हैं आज अहिल्या
अब दम किसी भी राम के चरण में नहीं है !!
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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