श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नदी” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२८ ☆ नदी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

नदी सागर से नहीं मिलती

राह में दम तोड़ देती है ।

क्या यही इतिवृत्त मेरा

है पूछती सबसे

लिखा है बस भोगना

पैदा हुई जबसे

भोग कर भी कुछ नहीं कहती

धार अपनी मोड़ देती है।

ढो रहे ख़ामोशियाँ तट

चप्पुओं के गाँव

कहाँ जाकर के रुकेगी

छेदों वाली नाव

दर्द रेता होने का सहती

घाव सूखे छोड़ देती है।

समय कितना निर्दयी है

छीलता है खाल

बस गए हैं किनारों पर

बाढ़ के भूचाल

विकृति का रूप धर बहती

पत्थरों को फोड़ देती है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२६.१०.२५

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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