आचार्य भगवत दुबे
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता “झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है” ।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३० – झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है ☆ आचार्य भगवत दुबे
☆
ग्रीष्म ने जब भी जलाये गाँव मेरे
पीर की अनुभूति से
परिचय हुआ है।
धूप में मज़दूर जब नंगे बदन थे,
देखकर आतप्त तब मेरे नयन थे।
सर्वहारा एक मुझमें तप रहा था,
खुद मेरे अहसास को
विस्मय हुआ है!
पाँव में छाले, किसी के फूटते थे,
वो गिरें तो अंग मेरे टूटते थे।
रंग जब अट्टालिकाओं पर चढ़े हैं,
झोंपड़ी के कत्ल का
संशय हुआ है!
साँस जब फूली श्रमिक की, धमनियों की,
आँख भर आयी, विटप की फुनगियों की।
भ्रूण अँकुराये लता की कोख में जब,
हार में भी जीत का
निश्चय हुआ है!
☆
https://www.bhagwatdubey.com
© आचार्य भगवत दुबे
३ दिसंबर २०१२
82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




