श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बदलाव” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १२९ ☆ बदलाव ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
☆
सारी चौपाल गुमसुम बैठी है
सभी के चेहरे बुझे हुए हैं
पंच से लेकर सरपंच तक
मूक दर्शक की तरह
कर रहे हैं आचरण सूझ नहीं रहा
इस कर्मकांड से निजात पाना
हल्कू की लड़की मुँ ह काला
करके जो लौट आई है
और बार बार यही कहती है
मैंने नहीं किया है कोई गुनाह
शहर से लेकर गाँव तक
फैल गई है खुलेपन की हवा
इस हवा में जल रहे हैं सारे वजूद
सारी व्यवस्था परंपरा, और आदमी का ग़ुरूर
सहमते माहौल में बात के लिए
नहीं रह गया है कोई मुद्दा
शब्द भाषा के स्तर पर सभी दृष्टिकोण
लगने लगे हैं बेमानी
और मैं ठगा सा देखता हूँ बदलाव
इस बदलाव के माने क्या हैं?
***
© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव
सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)
मो.07869193927,
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






