कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्
(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)
कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन ‘आफ़ताब’ उपनाम से अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी अप्रतिम रचना “राख के नीचे…”।
राख के नीचे… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆
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राख की तमाम परतों के
नीचे तक जाकर देखा
वो गुरूर, वो रुतबा, वो रुआब
कहीं भी नज़र नहीं आया
*
जो कल तक आसमानों में
अपना नाम लिखते थे
उन्हीं चेहरों को धूलों में
बेकस और बेनिशाँ पाया
*
महलों की ऊँची दीवारों पर
जो गुरूर की नुमाइश थी
वक़्त की एक ही आँधी में
सब ख़ाक में मिल गई
तख़्तों के लिए लड़ने वाले
ख़ुद से ही शिकस्त खा गए
जो दुनिया जीतने निकला था
वो एक दिल भी जीत न पाया
*
सोने-चाँदी के बर्तनों में
सजे हुए थे जो रिश्ते
सूखी रोटी ने भी अक्सर
उनसे ज़्यादा स्वाद पाया
*
चेहरों पर नक़ाब डाले
जो उम्र भर चलते रहे
आईना जब सच बोल पड़ा
तो वो दर्द से कराह उठे
*
जनाज़ों के उस मेले में
सब एक बराबर थे
न कोई बादशाह ठहरा
न ही कोई फ़क़ीर पराया
*
बस नेकी की कुछ ख़ुशबू
कुछ देर फ़िज़ाओं में ठहरी
बाक़ी हर शोहरत को
ख़ाक ने चुपचाप दबाया
☆
~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’
© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्
पुणे
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





