श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २०१ – मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है… ☆
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जीवन को जीना है सीखा,
हर गहरे तल में झाँका है।
मैंने सत्-साहित्य पढ़ा है,
उसके भावों को बाँचा है।।
लिखना पढ़ना शौक रहा है,
शब्दों से शृंगार किया है।
भावों के सागर में डूबा,
जग को कुछ संदेश दिया है।।
पहन मुखौटे जो आये हैं,
उनके चेहरों को भाँपा है।
चाहा नहीं हैं मुझको फिर भी,
सबको प्रेम सदा बाँटा है।।
कर्तव्यों के डगर चले हैं,
आदर्शों के पाठ पढ़ेे हैं।
अधिकारों को पाकर फिर भी,
नहीं कभी भी हम अकड़े हैं।।
जीवन भर मैंने खोजा है,
कोई ऐसा मिला नहीं है।
जिसको मैं दुनियाँ में कह दूँ,
इससे बढ़कर सगा नहीं है।।
जिसने मुझको जनम दिया है
उनसे ही जीना सीखा है।
उंगली पकड़ राह दिखलायी,
लगते प्रिय ही मात-पिता हैं।।
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© मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”
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