आचार्य भगवत दुबे
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२८ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २७ ☆ आचार्य भगवत दुबे
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आज जिन्हें अधिकार मिले हैं,
करने अत्याचार मिले हैं,
अपराधी बेखौफ घूमते,
उनसे, थानेदार मिले हैं।
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नहीं इश्क का जब जुनून था,
मेरे जीवन में सुकून था,
उफनाया तो रोक न पाया,
नई आशिकी, नया खून था।
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चाल वो दुश्मनी की चलते हैं,
पैंतरे नित-नये बदलते हैं,
एक दिन तो, पनाह माँगी थी
आज छाती पे मूंग दलते हैं।
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कतरा-कतरा जुबान रखता है,
चश्मदीदी बयान रखता है,
घाव, अपनी जुबान खोलेगा
जुल्म की दास्तान रखता है।
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स्वार्थ में इन्सानियत, ईमान बेचे जा रहे,
अब दया, आशीष औ‘ सम्मान बेचे जा रहे,
राजनैतिक मंडियों में मजहबी व्यापार है,
आज दौलत के लिए भगवान बेचे जा रहे।
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रेशमी रिश्ते न तोड़ो फूलकर अभिनन्दनों में,
सूत्र नाजुक हैं मगर दृढ़शक्ति रक्षाबन्धनों में,
सद्गुणों की हो सुरभि तो दुष्ट भी वश में रहेंगे,
विष चढ़ा पाते नहीं हैं नाग जैसे चन्दनों में।
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अब प्रगति तो फाइलों परचों में है,
लूट, हत्या, बेबसी चरचों में है,
आदमी पशु से अधिक बदतर हुआ
राष्ट्र गिरवी, कर्ज औ’ खर्चों में है।
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© आचार्य भगवत दुबे
82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





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