सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – दहकता मन…।
रचना संसार # ७५ – गीत – दहकता मन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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दुनिया है टकसाल विरह की
पीर-वेदना भारी है।
दहक रहा है मन भी मेरा,
किस्मत की बलिहारी है।
छाई है हर तरफ उदासी,
अपने हुए पराए हैं।
किसको हम दोषी ठहराएँ,
दुश्मन अपने जाए हैं।।
आँधी-तूफानों का डेरा,
रात बड़ी अँधियारी है।
दुनिया है टकसाल विरह की,
पीर-वेदना भारी है।।
जीवन की बगिया सूनी है,
विरह गीत कोयल गाती।
छलनी करती नागफनी सी,
मन को आहत कर जाती।।
देख दृगों की बहती धारा,
बरखा भी तो हारी है।
दुनिया है टकसाल विरह की,
पीर -वेदना भारी है।।
रूखे-सूखे नैना प्यासे
पलकें भीनी-भीनी हैं।
पीड़ा का गहरा सागर है
खुशियाँ किसने छीनी हैं।।
उठती-गिरती लहर-लहर में,
सिमटी दुनिया सारी है।
दुनिया है टकसाल विरह की
पीर-वेदना भारी है।।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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