डॉ. रामेश्वरम तिवारी
संक्षिप्त परिचय
- हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
- नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रुग्ण मानसिकता…!
☆ लघुकथा ☆ रुग्ण मानसिकता…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(आज के समय में दम तोड़ती हुई संवेदना से उपजी लघुकथा…!)
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रमिया जिन साहब के घर झाड़ू-पोंछे और बर्तन साफ़ करने का काम करती है। उनकी उम्र यही कोई अस्सी और मेम साहब की लगभग पचहत्तर की होगी। पति-पत्नी दोनों पढ़े-लिखे और सेवानिवृत्त हैं। बेटा और बेटी लक्ष्मी जी की कृपा से साधन-सम्पन्न हैं।
पिछले दिनों रमिया के साहब की आधी रात के लगभग अचानक साँस हलक में अटकने से पलक झपकते निधन हो गया। मेम साहब ने रमिया को मोबाइल लगाकर दुखद समाचार दिया कि साहब नहीं रहे हैं। वह भागी-भागी साहब के घर पहुँची और रात भर मेम साहब के आँसू पोंछती रही।
मेम साहब आँसू बहाते हुए बोली- ‘हाय राम! देख, तो री! रमिया… मेरे दाँए पड़ोसी को कैंसर और बाँए पड़ोसी को हार्ट की बीमारी है, बावजूद उनको कुछ नहीं हुआ और मेरे अच्छा-ख़ासा, खाता-पीता, चलता-फिरता आदमी मेरी आँखों के सामने चल बसा।
यह सुनकर कम पढ़ी-लिखी, पर समझदार रमिया ने अपना सर दीवार से ठोक लिया और सोचने लगी… क्या कथित शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग ऐसी रुग्ण मानसिकता के होते हैं जो अपनों की मौत पर बीमार पड़ोसियों के मरने की कामना करते हैं…!
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© डॉ. रामेश्वरम तिवारी
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