(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – मुख्य अतिथि बनने के अचूक उपाय।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०२ – व्यंग्य – मुख्य अतिथि बनने के अचूक उपाय ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
साहित्यिक आयोजनों की सबसे बड़ी और कड़वी खूबी यह होती है कि वहाँ मुख्य अतिथि का चयन ज्ञान के तराजू पर तौलकर नहीं, बल्कि आयोजकों द्वारा अपने स्वार्थ की मलाई चाटने के उपक्रम से तय किया जाता है। मंच पर बैठे उस तथाकथित मसीहा को बुलाने के पीछे एक पूरा व्यापारिक गणित छिपा होता है। मसलन यदि वह सरकारी गलियारों में तगड़ी पैठ रखता है, तो आयोजक मंडल उसके तलवे इस उम्मीद में चाटता है कि भविष्य में उनके कई रुके हुए सरकारी टेंडर, जमीन के कागजात और अवैध निर्माण के काम मक्खन की तरह पूरे हो जाएँगे। यदि वह मुख्य अतिथि किसी बड़ी धनराशि वाले साहित्यिक सम्मान की मानद समिति में बैठा है, तो आयोजक उसे पान-इलायची खिलाकर मन ही मन उस मलाईदार पुरस्कार और उसकी मोटी रकम को हथियाने का चक्रव्यूह रच रहे होते हैं। अगर मुख्य अतिथि महोदय किसी नामचीन अखबार या पत्रिका के बड़े संपादक निकल गए, तो मंच पर उनकी आरती इस लालच में उतारी जाती है कि अगले रविवार के अंक में आयोजकों की दो कौड़ी की घिसी-पिटी रचनाएँ पहले पन्ने पर सज जाएँगी। और यदि वह व्यक्ति ज्ञान से पूरी तरह पैदल लेकिन नोटों से लबालब भरा कोई धनाढ्य सेठ हुआ, तो उसे मंच पर केवल इसलिए बिठाया जाता है ताकि कार्यक्रम के तंबू, कुर्सियों, समोसों और मुख्य अतिथि के खुद के बुके का खर्च ‘स्पॉन्सर’ के रूप में उसी की जेब से हँसते-हँसते झटक लिया जाए। आज की शाम भी कुछ ऐसी ही स्वार्थ-गंगा में गोता लगाने वाली थी, जहाँ हिंदी जगत के महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की स्मृतियों में एक विराट गोष्ठी का आयोजन किया गया था, जहाँ मुख्य अतिथि को निराला के ‘छंद’ से ज्यादा अपनी ‘साख’ और आयोजकों के ‘धंधे’ से सरोकार था। लब्बोलुआब यही है कि मुख्य अतिथि का चयन उसके रुतबे के वजन को देखकर किया जाता है। मंच के केंद्र में विराजमान मुख्य अतिथि महोदय की शारीरिक मुद्रा किसी मध्ययुगीन सम्राट से कम नहीं लग रही थी। उन्होंने एक पैर पर दूसरा पैर इस तरह से चढ़ा रखा था मानो पूरी दुनिया का भूगोल उनके एक घुटने के नीचे दबा हो। उनके चेहरे पर छाई गंभीर रहस्यमयी मुस्कान को देखकर नीचे बैठे श्रोता भ्रम में थे कि वे कविता की गहराई समझ रहे हैं या फिर मन ही मन रात के भोजन के मेनू का हिसाब लगा रहे हैं। वे बार-बार अपने कुर्ते की आस्तीन को ऊपर चढ़ाते और सामने खड़े कैमरामैन को तिरछी नजरों से देखकर एक ऐसी फोटोजेनिक मुद्रा धारण कर लेते जिसे देखकर अच्छे-अच्छे अभिनेता भी पानी भरने लगें। उनकी आँखों में एक ऐसा आत्मसंतोष तैर रहा था जो केवल उसी व्यक्ति के चेहरे पर आ सकता है जिसने जीवन में कभी किसी पुस्तक के दो पन्ने लगातार पलटने का कष्ट न उठाया हो। जब भी कोई वक्ता मंच पर निराला जी के छंदों की विवेचना करता तो मुख्य अतिथि महोदय इस तरह से अपना सिर हिलाते मानो निराला जी रोज़ सुबह उनके घर आकर अपनी कविता का पहला ड्राफ्ट उन्हें सुनाते थे और उनसे हरी झंडी मिलने के बाद ही उसे छपने के लिए भेजते थे। सच्चाई यह थी कि उन्हें निराला जी के बारे में उतनी ही जानकारी थी जितनी एक साधारण बिल्ली को अंतरिक्ष विज्ञान के सिद्धांतों के बारे में होती है मगर अपनी इस अज्ञानता को वे अपनी राजसी मुखमुद्राओं के पीछे इस तरह छिपा रहे थे कि सारा सभागार उनके इस मौन पानाडित्य के सामने नतमस्तक दिखाई दे रहा था।
जब मुख्य अतिथि महोदय को भाषण के लिए आमंत्रित किया गया तो उन्होंने सबसे पहले अपने चश्मे को उतारकर जेब से निकाले रेशमी रूमाल से अत्यंत धीमेपन के साथ साफ करना शुरू किया क्योंकि मंच पर आने के बाद सीधे बोलना शुरू कर देना नौसिखियों की निशानी माना जाता है। उन्होंने पोडियम पर दोनों हाथ टिकाए और पूरे सभागार को इस तरह से निहारा जैसे कोई शेर अपनी शिकारगाह में हिरणों के झुंड को देखता है। उन्होंने अपने कंठ को दो-तीन बार साफ किया और एक गंभीर भारी आवाज में बोले “साथियों जैसा कि आप जानते हैं निराला जी कवि थे, कवि ही नहीं बल्कि बड़े कवि थे, जैसा कि मेरे पूर्व वक्ताओं ने कहा भी है, वे बहुत अच्छी कविताएँ लिखते थे इसलिए उनकी कविताएँ पाठ्यक्रमों में भी पढ़ाई जाती हैं।” इस ऐतिहासिक उद्घाटन वाक्य को सुनते ही अग्रिम पंक्ति में बैठे कुछ चाटुकारों ने इस तरह से तालियाँ बजाईं मानो उन्हें ब्रह्मांड का कोई परम सत्य मिल गया हो। मुख्य अतिथि महोदय ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्रोताओं को सम्बोधित किया “अब जो कविताएँ विद्यालयों, महाविद्यालयों में पढ़ाई जाती हों, वो अच्छे तो होंगी ही और जब कवितायें अच्छी होंगी तो इन्हें लिखने वाला कैसा होगा, आप सब लोग एक साथ बताइये।” इस पर पूरी भीड़ ने अपनी बची-कुची चेतना को समेटते हुए एक स्वर में चिल्लाकर उत्तर दिया “अच्छा”। मुख्य अतिथि ने मंच पर पानी का गिलास उठाया और एक घूंट पीकर ऐसे देखा मानो उन्होंने कोई बहुत बड़ा युद्ध जीत लिया हो और इस सीधी साधी बात को निराला साहित्य का सबसे बड़ा शोध पत्र बनाकर पेश कर दिया हो।
इसके बाद मुख्य अतिथि महोदय ने अपने भाषण के उस तरकश से तीर निकालना शुरू किया जिसके दम पर वे जीवन भर बिना एक भी पन्ना पढ़े हर बड़े मंच के मसीहा बने फिरते थे। उन्होंने बिना पढ़े मंच लूटने का पहला अचूक नियम लागू किया जिसे साहित्य की भाषा में विषयांतर की कला कहा जाता है। उन्होंने कहा “मित्रों, असली कवि वह नहीं होता जो केवल महलों की बात करे बल्कि असली कवि वह होता है जो धरती से जुड़ा हो और निराला जी तो इतने जमीनी थे कि उन्होंने कुकुरमुत्ते पर भी कविताएँ लिखी हैं, उन्हें कुकुरमुत्तों से बहुत प्रेम था, जहाँ भी उन्हें कुकुरमुत्ता दिखता वे वहीं कविताएँ लिखने बैठ जाते थे।” इस अद्भुत और अलौकिक रहस्योद्घाटन को सुनकर सभागार के अंतिम छोर पर बैठे एक बुजुर्ग साहित्यकार के हाथ से उनकी डायरी छूटकर नीचे गिर गई मगर मुख्य अतिथि महोदय अपनी ही रौ में बहते जा रहे थे। उन्होंने बिना ज्ञान के मंच पर दहाड़ने के उस शाश्वत नियम का प्रदर्शन किया जिसके तहत वक्ता अपनी अज्ञानता को समय की कमी का बहाना बनाकर एक गरिमापूर्ण विदाई में बदल देता है। उन्होंने अपनी कलाई घड़ी की तरफ बेहद नाटकीय अंदाज में देखा और चेहरे पर एक गहरी चिंता की लकीरें खींचते हुए बोले “मित्रो मैं निराला पर और भी बहुत कुछ बोलता मगर समय बहुत हो चुका है और आप सब भी ऊब गए होंगे इसलिये आज बस इतना ही, आगे फिर कभी आप मौका देंगे तो उनके बारे में ऐसी ऐसी बातें बताऊँगा जो स्वयं निराला जी को भी पता नहीं रही होंगी। जय हिन्द, जय भारत।”
मुख्य अतिथि महोदय का यह भाषण दरअसल उन तमाम अकादमिक सूत्रों का एक जीवंत संकलन था जो बिना किसी तैयारी के किसी भी गोष्ठी को पूरी तरह से वश में करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। जब किसी वक्ता को विषय की हवा भी न लग रही हो तो उसका सबसे पहला अचूक फॉर्मूला यही होता है कि वह अपने पूर्ववर्ती वक्ताओं के नामों की एक लंबी सूची तैयार करे और उन सभी की बातों का अंधाधुंध समर्थन करना शुरू कर दे। दूसरा नियम यह कहता है कि जब आपके पास कहने को कुछ न हो तो आप जनता से सीधे सवाल पूछना शुरू कर दें जिससे श्रोताओं को लगता है कि वे किसी व्याख्यान में नहीं बल्कि किसी सामूहिक विमर्श का हिस्सा हैं और वे उत्साह में आकर तालियाँ पीटने लगते हैं। तीसरा सूत्र यह है कि विषय से जुड़े किसी भी एक अजीबो-गरीब शब्द को पकड़कर उसे पूरे भाषण का केंद्र बिंदु बना दिया जाए जैसा कि महोदय ने कुकुरमुत्ते के साथ किया जिससे गंभीर चर्चा भी एक झटके में बेहद लोक-लुभावन और मनोरंजक बन जाती है। चौथे नियम के अनुसार वक्ता को अपनी शारीरिक भाषा को इतना आक्रामक और आत्मविश्वास से भरपूर रखना चाहिए कि सुनने वाले को अपने ही ज्ञान पर शक होने लगे कि कहीं उसने ही निराला जी को गलत तो नहीं पढ़ लिया है। पाँचवाँ और सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि भाषण के अंत में एक ऐसा रहस्यमयी सस्पेंस छोड़ दिया जाए जिससे लोगों के भीतर यह उत्सुकता बनी रहे कि इस व्यक्ति के पास ज्ञान का कोई ऐसा गुप्त खजाना है जो आज समय की कमी के कारण बाहर नहीं आ पाया और इस तरह एक अज्ञानी व्यक्ति भी मंच से परम ज्ञानी बनकर विदा होता है।
इस पूरे तमाशे के दौरान मंच के ठीक नीचे बैठी जनता की हालत देखने लायक थी जो इस अद्भुत बौद्धिक जुगाली को पचाने की कोशिश में लगातार अपनी आँखें मटका रही थी। सामने की पंक्ति में बैठे विभागाध्यक्ष महोदय अपनी गर्दन को इस तरह से हिला रहे थे मानो वे मुख्य अतिथि के हर एक खोखले वाक्य की गहराई में डूबकर सीधे पाताल लोक पहुँच चुके हों। कुछ नौजवान छात्र जो केवल समोसों और चाय के लालच में इस गोष्ठी की शोभा बढ़ाने आए थे वे इस कुकुरमुत्ता पुराण को सुनकर अपनी हँसी को रोकने के लिए अपने मुँह पर रूमाल दबाए बैठे थे। मुख्य अतिथि महोदय का आत्मविश्वास इस स्तर पर पहुँच चुका था कि वे अपनी हर एक मूर्खतापूर्ण पंक्ति के बाद जनता की तरफ इस तरह देखते थे मानो वे उनसे अपनी इस अभूर्व वैचारिक खोज के लिए किसी राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद कर रहे हों। उन्होंने अपने भाषण के दौरान अपने दोनों हाथों को हवा में इस तरह से लहराया जैसे वे निराला जी की कविताओं के सारे छंदों को हवा में ही पकड़कर सीधे जनता की झोली में डाल रहे हों। पूरी सभा में तालियों की गड़गड़ाहट इस बात का प्रमाण नहीं थी कि लोगों को उनका भाषण पसंद आया था बल्कि वह इस बात का सामूहिक उत्सव था कि आखिरकार यह महाभाषण समाप्त हुआ और अब मंच से मुक्ति मिलने का समय आ गया है।
साहित्यिक मंचों पर अपनी धाक जमाने का एक और अचूक नुस्खा यह भी होता है कि आप विषय के मूल तत्व को छुए बिना उसके चारों तरफ शब्दों की ऐसी जलेबी बनाना शुरू कर दें कि सुनने वाला खुद ही रास्ता भटक जाए। मुख्य अतिथि महोदय ने इस कला में भी महारत हासिल कर रखी थी क्योंकि उन्होंने निराला जी के दर्शन या उनकी प्रगतिशीलता पर एक शब्द भी बोले बिना केवल उनकी पाठ्यपुस्तकीय उपस्थिति को आधार बनाकर अपना पूरा महल खड़ा कर दिया था। जब वे बोल रहे थे तो उनकी आँखें कभी छत की कड़ियों को निहारतीं तो कभी अचानक सामने बैठे किसी सीधे-साधे श्रोता पर टिक जातीं जिससे वह बेचारा डर के मारे अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करके बैठ जाता कि कहीं मुख्य अतिथि जी अगला सवाल सीधे उसी से न पूछ लें। इस प्रकार का भाषण दरअसल उन लोगों के लिए एक वरदान की तरह होता है जो बिना किसी अध्ययन के समाज के हर क्षेत्र में अपनी चौधराहट कायम रखना चाहते हैं और अपनी अज्ञानता को एक आभूषण की तरह पहनकर घूमते हैं। मंच पर बैठे अन्य विशिष्ट अतिथि भी इस कला से भली-भाँति परिचित थे इसलिए वे भी मुख्य अतिथि की हर एक हास्यास्पद बात पर अपनी आँखें बंद करके इस तरह से मुस्कुरा रहे थे मानो वे किसी महान सूफी संत के प्रवचन का आनंद ले रहे हों।
इस अभूतपूर्व भाषण के समापन के बाद जब मुख्य अतिथि महोदय वापस अपनी सोफ़ानुमा कुर्सी पर आकर बैठे तो उनके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो केवल किसी बड़े साम्राज्य को जीतने के बाद किसी राजा के चेहरे पर आ सकती है। उन्होंने तुरंत जेब से अपना चमचमाता हुआ मोबाइल निकाला और सामने खड़े फोटोग्राफर को इशारा किया कि वह उनके इस विजयी मुद्रा की कुछ तस्वीरें विभिन्न कोणों से खींच ले ताकि वे इसे तुरंत अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा कर सकें। उन्होंने मंच पर रखे पानी के पूरे गिलास को एक ही सांस में खाली कर दिया मानो कुकुरमुत्ते पर दिए गए इस ऐतिहासिक भाषण ने उनके भीतर के सारे ज्ञान के सोतों को पूरी तरह से सुखा दिया हो। नीचे बैठे श्रोता अभी भी इस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे थे कि उन्होंने निराला जी के बारे में क्या सुना और क्या समझा मगर मुख्य अतिथि को इसकी कोई परवाह नहीं थी क्योंकि उनका काम मंच लूटना था जो वे बेहद शालीनता और धूर्तता के साथ बखूबी अंजाम दे चुके थे। पूरा वातावरण इस समय एक ऐसे अजीबोगरीब सन्नाटे और दबी हुई हँसी के बीच झूल रहा था जिसकी कल्पना शायद स्वयं निराला जी ने भी अपनी सबसे क्लिष्ट कविताओं को लिखते समय कभी नहीं की होगी।
कार्यक्रम के ठीक बाद वीआईपी लाउंज में मुख्य अतिथि महोदय के लिए विशेष जलपान की व्यवस्था की गई थी। वहाँ पहुँचते ही शहर के एक अति-उत्साही पत्रकार ने हाथ में माइक लेकर मुख्य अतिथि को घेरा और बड़े ही भोलेपन के साथ पूछा “सर आज का आपका व्याख्यान तो निराला साहित्य की नई दिशा तय करने वाला था लेकिन क्या आप हमारे दर्शकों को बताएँगे कि निराला जी का वह कौन सा कुकुरमुत्ता था जिससे वे सबसे ज्यादा प्रभावित थे और क्या आज के दौर में भी वह कुकुरमुत्ता प्रासंगिक है?” मुख्य अतिथि महोदय ने अपने कुर्ते को झटका, अपनी मूंछों पर ताव दिया और अत्यंत आत्मविश्वास के साथ पत्रकार के कंधे पर हाथ रखकर बोले “देखिए भाईसाहब, निराला जी मूल रूप से वनस्पति विज्ञान के बहुत बड़े डॉक्टर थे और उन्होंने जिस कुकुरमुत्ते की खोज की थी उसे आजकल के लोग अंग्रेजी में मशरूम कहते हैं, इसीलिए मैं रोज़ सुबह उठकर मशरूम का सूप पीता हूँ ताकि मेरे भीतर भी निराला जैसी काव्य ऊर्जा बनी रहे और रही बात प्रासंगिकता की तो आज बाज़ार में मशरूम दो सौ रुपये किलो बिक रहा है, इससे बड़ी प्रासंगिकता भला और क्या हो सकती है।” यह सुनते ही पास खड़ा वेटर समोसे की प्लेट समेटकर वहीं जमीन पर बैठ गया और पत्रकार महोदय अपना माइक छोड़कर लाउंज के कोने में जाकर दीवार पर सिर पीटने लगे जबकि मुख्य अतिथि महोदय बड़े चाव से काजू कतली चबाते हुए अगले किसी गोष्ठी में कबीरदास पर बोलने के लिए इंटरनेट पर उनके पिता का नाम खोजने में व्यस्त हो चुके थे।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपकी भावप्रवण रचना – पानी की आस।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – माँ… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘नभ से ओझल होते खग‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १३ ☆
कविता – नभ से ओझल होते खग ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
आज फिर लगा कि वे दिन जल्द लौटेंगे
जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l
कि फिर खिड़की पर टुकटुक करती चिड़िया दिखेगी l
मुड मुड, उड़ उड़ जोर जोर से
शीशे से लड़ती दिखेगी l
खो चुकी हैं चहचहाटें जिंदगी की रफ़्तार में l
जहाँ तहाँ मोबाईल टॉवर, पेड़ कट रहे अंधाधुंध l
खामोश हो गये सारे खग संघर्ष के तूफान में ll
एक समय ऐसा भी था जब लौट आते थे पंछी घरोंदो में अपने l
पर आज फिर शाम होते ही वहाँ भी बंजर वसुधा मिली l
सूरज की लाली उषा से मिलकर प्रातः बातें आज भी करती हैं l
पुष्कर की झिलमिल बूंदे पुष्प कमल की पंखुड़ियों पर मोती आज भी जड़ती है l
मंद मंद इठलाती शीतल हवा कानों में आज भी कुछ कहती है l
पर प्रातः काल के नील गगन से खग ओझल हो रहे हैं l
ये देख मन उद्विग्न हुआ और फिर अंतर्मन से आवाज आई कि वे दिन जल्द ही लौटेंगे जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सपनों को तुम ना सोने देना…।)
☆ शशि साहित्य # २७ ☆
कविता – सपनों को तुम ना सोने देना… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हुस्न और इश्क…“।)
अभी अभी # १०२३ ⇒ आलेख – हुस्न और इश्क श्री प्रदीप शर्मा
ऐ हुस्न ज़रा जाग, तुझे इश्क जगाए ! और अगर हुस्न नहीं जागे, तो इश्क क्या करे। बस, ठंडी आहें भरे। हुस्न जब सोता है, बड़ा मासूम होता है। जागता है, सीधा आईने के पास जाता है। आइना नहीं, हुस्न नहीं। आईने की कोई सूरत नहीं होती, हुस्न को अपनी ही सूरत पर गुमान होता है, गुरूर होता है। हुस्न को यकीन है, आइना झूठ नहीं बोलता।
अगर हुस्न जाग जाए, और इश्क सो जाए, तो इश्क को कौन जगाए। हुस्न एक आग है, जिसमें वह खुद नहीं जलता। सुबह का सूरज उसी हुस्न की एक आग है। वह एक ऐसा आफताब है, जिसे देख कुदरत अंगड़ाई लेती है। इश्क जाग उठता है। इश्क सुबह के सूरज की इबादत करता है। फूल खिलते हैं, कलियां मुस्कुराती हैं, भंवरे गुनगुनाते हैं। हुस्न का जलवा ही सूर्योदय है।।
जैसे जैसे सूरज आसमान पर चढ़ता है, उसका हुस्न परवान चढ़ता है। वह तपकर आग का गोला हो जाता है। हमने जलवा दिखाया तो जल जाओगे। आप उस जलवे से आंख नहीं मिला सकते। हुस्न की आग से नज़रें मिलाई नहीं जाती, नजर झुकाकर भी इश्क किया जाता है।
हुस्ने जाना इधर आ, आइना हूं मैं तेरा। इश्क हुस्न को परदे में रखना चाहता है, उसे पूजना चाहता है। उसके हुस्न को किसी की नजर ना लगे, उसे ताले में बंद करना चाहता है। घूंघट के पट खोल रे, तुझे पिया मिलेंगे। जो हुस्न आग है, आफताब है, पाक साफ है, क्या उससे नज़रें मिलाना इतना आसान है।।
बाल कृष्ण ने मिट्टी क्या खाई, माता यशोदा ने गुस्से में जो नंदलाला का मुंह खोला, तो होश खो बैठी। वहां कृष्ण की लीला थी या जलवा था। माया अपना काम कर गई। यशोदा जान तो गई, लेकिन किसी को बताने की स्थिति में भी नहीं रही।
अर्जुन ने भी देखा था सारथी नटवर श्रीकृष्ण के हुस्न का जलवा कुरुक्षेत्र में, जब वह शस्त्र छोड़, शरणागत हो गया था।
कृष्ण का विराट स्वरूप जब सामने आया तो होश उड़ गए।।
हुस्न से चांद भी शरमाया है।
सूरज अगर आग है तो चंद्रमा
शीतलता का प्रतीक ! चंद्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं। सूरज की ही परछाई है वह। ये जमीं चांद से बेहतर नजर आती है हमें। चांद से बेहतर ही है यह जमीं, क्योंकि यहां सूरज की रोशनी है, जीवन है, प्राण है, प्रेम है, शांति है। जहां भी तेज है, ओज है, रोशनी है, प्रकाश है, सब सूरज का ही जलवा है। हुस्न के कई रूप हैं, कई रंग हैं। कोई सच्चा आशिक ही उसको पहचान पाता है।
सुंदरता में प्रेम है, भक्ति है, समर्पण है। सब में रब तो बाद में होगा, क्यों न सब रब में ही समा जाए। पहले किसी से दिल तो लगे, फिर शुरू हो दिल्लगी। हुस्न का जलवा हो, तो हम भी कर लें बंदगी ;
☆ # अडला हरी नि शाळेपेक्षा स्पेशल ट्यूशन बरी… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर☆
शी. आई मला किनई नुसती शाळा ते घर नि घर ते शाळा दिवसभर करण्यात बोअर होतयं… रोजचं जा लडदू आणि ये लडदू करण्यात काही थ्रील वाटत नाही बघं… आणि तसंही शाळेत कुठल्याही विषयाच्या टिचर तरी कुठे त्यांच्या तासाला बाय हार्ट शिकवतात… अर्धेअधिक पुस्तक आणि गाईडचं रेफर करून आम्हाला वाचून सांगतात… मग तो मराठीचा तास असूदे नाही तर गणित नाही तर गेलाबाजार सायन्स… सगळ्या टिचरची शिकवण्याची एकच काॅपीपेस्ट मेथड असते… हं या टाॅपिकला यावर्षी च्या पेपरला व्ही. व्ही. आय. एम. पी. मार्क करा आणि त्यातला तो पाचवा प्रश्न यावेळेस विचारला जाण्याची शक्यता आहे… तेव्हा फक्त त्याचं उत्तर तेव्हढं लक्षात ठेवा.. बाकी या लेसन मध्ये काही नाही… आता उद्या दुसरा लेसन आपण बघणार आहोत… आतापर्यंत आपले अकरा लेसन या प्रकारेच तुम्हाला शिकवून झाले आहेत… सगळ्यांना समजलेलं तर आहेच आणि ज्यांना काही डिफिकल्टी असतील तर त्यांनी माझ्या स्पेशल ट्यूशनला ॲडमिशन घेऊन क्लिअर करून घ्यावी… शाळेत तासाला विषयाचा सिलॅबसच जेमतेम पूर्ण होईपर्यंत मारामार तिथे डिफिकल्टी कुठून साॅल्वह करता येणार… आणि माझ्या स्पेशल ट्यूशनमधे नव्वद मिनिटाचा तास असल्याने तुमच्याकडे वेळ देता येतो… शिवाय टेस्ट सिरीजमध्ये विषय चांगला पक्का होऊन डिसटिंक्शन मार्क मिळतात… हा माझा लौकिक आहे… तेव्हा तुम्ही मुलांनी आपल्या पेरेंटसना या क्लासला जायचे आहे म्हणून सांगा. जे येतील त्यांचं भविष्य उज्ज्वल झालंच म्हणून समजा आणि जे येणार नाहीत ते या विषयात फेल झालेच म्हणून समजा… चाॅईस ईज युवर… असं शाळेतला उठसुठ जो तो टिचर आम्हाला रोजच ही
टेप वाजवून दाखवतो… आणि पंचेचाळीस मिनिटाच्या तासात फक्त दहा मिनिटात विषय गुंडाळला जातो बाकी सगळं ट्यूशनमधे सांगितलं जाईल म्हणतात… मग मम्मी आम्ही घरी तरी अभ्यास कशाला आणि का करायचा… का उगाच आताच माथेफोड करायची… सगळी परीक्षेची काळजी जर स्पेशल ट्यूशनमधे घेतली जाणार आहे तर शाळेत तरी कशाला जायचं… तिकडे बाहेरच्या बाहेर ट्यूशन जाॅइन केललं काय वाईट… परीक्षेच्या प्रश्न पत्रिकेची नक्कल उत्तरासकट हाती मिळत असेल तर शाळेची गरज काय… आणि कोण आता ते सेल्फ स्टडीज च्या ओल्ड ट्रॅडिशनला फाॅलो करेल… ट्यूशनची फी एकदा भरली कि आपलं फ्युचर सेफ होते… फर्स्टक्लास विथ मेरिटचं भलंमोठ्ठं सर्टिफिकेट हाती येतं तेव्हा तर याचसाठी केला होता अट्टाहास हेच ओठी येतं… (हो ते तेव्हढचं.. डोक्यात काय घुसलयं कोणत्या देवाला ठाऊक).. पण आताच्या डिजीटल जमान्यात उसका भी डर नही… कारण डर के आगेही गुगल कि… चुकलं चुकलं… अपनीही जीत होती है… नाहीतरी तुम्ही माझ्यासाठी या शाळेतल्या आणि पुढच्या काॅलेजच्या शिक्षणासाठी किती खर्च करत राहणार आणि सगळ्यात महत्त्वाचं या वेळखाऊ सव्यापव्यसात माझा टाईम किती बरबाद होईल… ते मला चालायचं नाही… मला त्या टाईम स्लाॅट मधे कुछ तो क्रिएटिव्ह करायचं आहे.. जसं कि पब जी ग्राफिक्स सुपरफास्ट कसं होईल… बंद तिजोरी कशी उघडता येईल… सायलेंट बाॅम्ब कसा बनवता येईल… वगैरे वगैरे.. या सगळ्या गोष्टी काय शाळेत किंवा काॅलेजच्या धड्यात मिळतात काय… त्यासाठी गुगल सर्च करावं लागतं आणि तसं गुगलच आता महागुरू असल्याने बाकी गुरूंची सुट्टी झालीय… माझा आता पाचवीच्या वार्षिक परिक्षेचे सगळे पेपर विथ आन्सर गुगलवरच तर अपलोड झालेले आहेत.. त्याला गुगल पे ने फी भरली कि आपल्याला ॲक्सेस मिळतो… आणि येथून पुढे हिच प्रोसेस फाॅलो केली कि जीवन में खुशीयाही खुशीया आ जाएगी… तेव्हा पप्पा नि मम्मी तुम्ही फक्त पैसै तयार ठेवा… बाकी मी बघून घेतो… आणि लवकरच तुम्हाला माझ्या तर्फे यशसिध्दीचा आनंदाचा मेवा देतो…