मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “द नेक्स्ट कॉन्व्हर्सेशन” – इंग्रजी लेखक : जेफरसन फिशर – मराठी अनुवाद : दीपक देवधर ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “द नेक्स्ट कॉन्व्हर्सेशन” – इंग्रजी लेखक : जेफरसन फिशर – मराठी अनुवाद : दीपक देवधर ☆ परिचय –  श्री हर्षल सुरेश भानुशाली ☆

पुस्तक : द नेक्स्ट कॉन्व्हर्सेशन

 – – वाद नको संवाद साधा

आंतरराष्ट्रीय बेस्ट सेलर

लेखक : जेफरसन फिशर

अनुवाद: दीपक देवधर

प्रकाशक : माय मिरर पब्लिशिंग हाऊस, पुणे 

पृष्ठे: २८८

किंमत – ३५०₹ 

तुमचं पुढचं संभाषण तुमचं आयुष्य बदलू शकतं, जर तुम्हाला नेमकं काय आणि कसं बोलायचं हे समजलं तर. लेखक जेफरसन फिशर त्यांच्या सोप्या आणि थेट पद्धतीने सांगतात की, वाद कमी करून संवाद कसा वाढवायचा. तणावपूर्ण प्रसंग असो, हाताळण्यास कठीण व्यक्ती असो किंवा तापलेली चर्चा असो, कोणत्याही परिस्थितीत शांत आणि ठामपणे कसं बोलावं हे या पुस्तकात सांगितलं आहे. योग्य वेळी योग्य शब्द वापरायला शिकलात तर तुमची नाती आणि तुमचं आयुष्य दोन्ही अधिक चांगलं होऊ शकतं.

या पुस्तकातून तुम्हाला काय मिळेल?

वाद जिंकण्याऐवजी संवाद जिंकण्याचं तंत्र

तणावपूर्ण परिस्थितीत शांत आणि आत्मविश्वासाने उभं राहण्याचे मार्ग

स्पष्ट मर्यादा (boundaries) कशा आखाव्यात आणि ठामपणे कसं बोलावं

कमी बोलून जास्त परिणाम साधण्याची कला

संघर्षाचं रूपांतर वादात न होऊ देता तो सोडवण्याच्या प्रभावी पद्धती

मी हे पुस्तक का लिहिलं? लेखकाच्याच शब्दात

मी हे पुस्तक तीन कारणांमुळे लिहिलं आहे,

१. कारण माझ्या सोशल मीडियावरच्या फॉलोअर्सनी याची मागणी केली. माझ्या मते, हे पुस्तक खरं तर त्यांचंच आहे.

२. कारण मला जे माहीत आहे, ते तुम्हाला सांगायचं आहे, ज्यामुळे तुमचा पुढचा संवाद थोडा अधिक चांगला होऊ शकेल.

३. आणि तिसरं, माझ्या आयुष्यातील एक भाग माझ्या मुलांसाठी आणि कुटुंबासाठी, जपून ठेवण्यासाठी.

पण हे पुस्तक उघडण्यापूर्वी एक गोष्ट तुमच्यासमोर स्पष्टपणे मांडू इच्छितो. या पुस्तकातली संवादकौशल्यं ही कुठूनतरी उधार घेतलेली तत्त्वं नाहीत. काहीसा शास्त्रीय अभ्यास, मानसशास्त्र, मेंदूविज्ञान किंवा वर्तनशास्त्र यासारख्या क्षेत्रांमधून आलेले काही संदर्भ असतीलही, पण बाकी सगळं मी स्वतःच्या आयुष्यातून, माझ्या बोलण्याच्या आणि ऐकण्याच्या अनुभवांतून शिकलेलं आहे.

हे पुस्तक तुम्हाला कशी मदत करेल?

मी जरी एक खटला चालवणारा वकील असलो तरी या पुस्तकात तुम्हाला कायद्याचा कुठलाही भाग सापडणार नाही.

हे पुस्तक वकिलीबद्दल नाही, वकिलांबद्दलही नाही.

हे पुस्तक आहे, धाडसाने, उघडपणे बोलायला शिकण्याबद्दल. जे तुमच्या मनात आहे, ते मोकळेपणाने बोलताना जी थोडी भीती वाटते, ती स्वीकारूनही बोलायला शिकण्याबद्दल. जे वाटतंय तेच बोलणं आणि जे बोलताय तेच वाटणं.

ही गोष्ट आहे सोयीपेक्षा धाडस निवडण्याची, जरी हे करताना तुमचा आवाज कापत असला तरीही.

स्पष्ट बोलणं याचा अर्थ दुसऱ्याच्या भावना न जपणं असा नाही. थेट बोलणं म्हणजे स्वतःचा आणि समोरच्याचा आदर ठेवून, आपल्या गरजा स्पष्टपणे मांडण्याचं आत्मविश्वासाने घेतलेलं पाऊल.

ठामपणे बोलण्यासाठी तुमचं व्यक्तिमत्त्व आग्रही असण्याची गरज नाही, योग्य शब्दच तुमचं काम करतील.

हेच शब्द, हेच मार्गदर्शन हे पुस्तक तुम्हाला देईल.

 

परिचय : श्री हर्षल सुरेश भानुशाली

पालघर 

मो. 9619800030

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६४ – बुन्देली कविता – ”बे महुआ-मूसर की दै रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६४ ☆

☆  बुन्देली कविता – “बे महुआ-मूसर की दै रय“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

बे महुआ-मूसर की दै रय 

कइयो ने कै ऐंसी  कै रय  

* 

लै उधार भय नौ-दो ग्यारा 

इत्ते दिन तुम कहौ कितै रय 

 *

हैं दुख-दर्द हमाये संगी 

हम नईं इतै अकेले रै रय 

 *

जुन होरा  भूँजत छाती पै 

हर चुनाव में उन्हें जितै रय 

 *

हाल गरीबों के का पूँछत 

ओइ निचो रय, ओइ सुखै रय 

 *

बाप-मताइ कर्जा लै खें 

बिटिया खों ससरार पठै रय 

 *

पोल खोल हैं ओइ तुमाई 

‘भगवत’ जी खों जाँग दिखै रय

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४३ – जीरो बैलेंस – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – जीरो बैलेंस।)  

☆  चुभते तीर # १४३ – व्यंग्य  – जीरो बैलेंस ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

अग्रणी राष्ट्रीयकृत बैंक की मुख्य शाखा के बाहर सीमेंट की ठंडी सीढ़ियों पर बहत्तर साल के परमानंद जी हर शुक्रवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में हरे रंग की एक पुरानी बैंक पासबुक और तांबे जैसा घिसा हुआ दो रुपये का एक सिक्का हमेशा चमकता रहता था। आज अट्ठाईस अगस्त को जन धन योजना के राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन दिवस के अवसर पर जब सुरक्षा गार्ड ने उन्हें मुख्य द्वार पर बैठा देखा तो अपनी बंदूक संभालते हुए ठहाका लगाकर बोला कि “बाबा जब आज पूरे देश में करोड़ों नए खाते खुलने और डिजिटल लेनदेन का जश्न मनाया जा रहा है तो इस पुरानी पासबुक को रोज़ अपनी छाती से चिपकाकर यहाँ क्या भीख मांगने का नया स्वांग रचते हो।” परमानंद जी अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को धोती के छोर से साफ करते और बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह खाली पासबुक केवल कागज़ का पुलिंदा नहीं है बल्कि इस पूरे चमकते हुए बैंकिंग तंत्र की वो जमीनी हकीकत है जिसे तुम्हारे ये बड़े-बड़े डिजिटल स्क्रीन कभी नहीं दिखा पाएंगे।” आसपास खड़े तमाम दलाल और खाताधारक उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में दादा की मति मारी गई है जो जीरो बैलेंस के खाते को अपनी जागीर समझकर पूरे बैंक प्रशासन से हिसाब चुकता करने चले आए हैं।” परमानंद जी किसी की बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस पासबुक के पन्नों को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप वीआईपी गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।

बैंक शाखा के सभी बाबू और अधिकारी परमानंद जी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें एक हठी बुजुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। बैंक का बड़ा कैशियर जब भी नोटों की गड्डियों का बंडल लेकर मुख्य प्रबंधक के केबिन की तरफ बढ़ता तो परमानंद जी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस ज़ीरो बैलेंस वाले खाते में कोई सरकारी सब्सिडी की राशि आई।” कैशियर गुस्से में काउंटर की खिड़की खटखटाते हुए डांटकर कहता कि “अरे बाबा जब तक सरकार ऊपर से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का पैसा नहीं भेजेगी और सर्वर से हरी बत्ती नहीं जलेगी तब तक खाता खाली ही रहेगा और तुम इस दो रुपये के सिक्के को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” परमानंद जी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस दो रुपये के सिक्के को पासबुक के पहले पन्ने पर दबाकर रखने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे जो हर बार फिसलकर उनकी गोदी में गिर जाता था। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते थे कि शायद बाबा अपने किसी पुराने कर्ज़ की माफी के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन किसी को भी उस खाली पासबुक और वित्तीय समावेशन के इस भव्य आयोजन के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी थाह नहीं लग पा रही थी।

दोपहर में अचानक वित्त मंत्रालय के क्षेत्रीय निदेशक महोदय प्रधानमंत्री जन धन योजना के राष्ट्रीय दिवस पर आयोजित मेगा क्रेडिट कैंप और वित्तीय साक्षरता मेले की समीक्षा करने बैंक पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए गुब्बारे और नीले बैनर लगाए जाने लगे ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और हर गरीब को बैंकिंग तंत्र की मुख्यधारा से जोड़ने पर लंबा भाषण देने के बाद जब निदेशक महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र सीढ़ियों पर शांत बैठे परमानंद जी पर पड़ी जिनकी गोद में वही हरी पासबुक रखी थी। अपनी संवेदनशील और जनप्रिय छवि का प्रदर्शन करने के लिए निदेशक महोदय तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर परमानंद जी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “बाबा आज के इस ऐतिहासिक वित्तीय दिवस पर हम हर गरीब को आर्थिक आज़ादी की बधाई देते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको बैंकिंग सुविधाओं का लाभ नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” परमानंद जी ने अपनी पथराई आँखों से निदेशक महोदय को देखा और अपने कांपते हाथों से वह हरी पासबुक आगे बढ़ाते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस पासबुक के अंतिम पन्ने पर छपी लाल स्याही की मुहर का सच पहचान लीजिए।”

निदेशक महोदय ने जब उस पासबुक को हाथ में लेकर खोला तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि उस पर दर्जनों बार न्यूनतम बैलेंस न होने और एसएमएस सेवा शुल्क के नाम पर खाते से पैसे कटने की लंबी फेहरिस्त छपी थी। परमानंद जी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस घिसे हुए दो रुपये के सिक्के पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब बारह साल पहले जब आपने ढोल बजाकर मेरा ज़ीरो बैलेंस खाता खोला था तो कहा था कि यह गरीब का अपना बैंक है। लेकिन पिछले पाँच सालों में मेरी बीमारी की दवाई के लिए जमा की गई पाई-पाई आपके बैंक ने पेनल्टी और सर्विस चार्ज के नाम पर चुपचाप काट ली और जब खाता बिल्कुल खाली हो गया तो मुझे लाइन से धक्का देकर बाहर निकाल दिया। मेरी बूढ़ी पत्नी आज भी घर में बिना दवा के दर्द से कराह रही है क्योंकि उसके हिस्से के पैसे आपके इस डिजिटल तंत्र ने निगल लिए। मैं आज यह आखिरी दो रुपये का सिक्का आपके बैंक को दान करने आया हूँ ताकि आपके इस मुनाफ़ाखोर तंत्र को बता सकूँ कि जिस गरीब को तुम वित्तीय समावेशन का सपना दिखाते हो उसी गरीब की जेब काट कर तुम्हारी ये आलीशान शाखाएं खड़ी हुई हैं।” यह सुनते ही निदेशक महोदय का सिर शर्म से झुक गया और पूरा बैंक परिसर गहरे सन्नाटे में डूब गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ऊहापोह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ऊहापोह… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

ढूँढ़ो, तलाशो,

अपना पता लगाओ,

ग्लोब में तुम जहाँ हो

एक बिंदु लगाकर बताओ,

अस्तित्व की प्यास जगी,

खोज में ऊहापोह बढ़ी

कौन बूँद है, कौन सिंधु है..?

ग्लोब में वह एक बिंदु है या

ग्लोब उसके भीतर एक बिंदु है..?

?

© संजय भारद्वाज   

रात्रि 10.11 बजे, 25.9.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ११०६ ⇒ मुक्तिबोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मुक्तिबोध…“।)

?अभी अभी # ११०६ ⇒ आलेख – मुक्तिबोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बोध जानकारी को कहते हैं, ज्ञान को कहते हैं । जो बंधन में जकड़ा है, जब तक उसे इस बात का अहसास नहीं हो, कि मुक्ति भी एक अवस्था है, जो स्वाभाविक और सनातन है,तब तक वह मुक्त होने की सोच भी नहीं सकता । कोल्हू का बैल हो अथवा तांगे में जुतने वाला घोड़ा,उनका प्रारब्ध नियत है,वे हमेशा जुतने के लिए तत्पर रहते हैं,सृष्टि के चक्र की तरह उनका भी एक जीवन चक्र होता है, जिसमें कोई अप्रत्याशित नहीं घटता, रोज सुबह होती है, शाम होती है,जिंदगी यूं ही तमाम होती है । कहीं कोई घटना नहीं, उमंग नहीं, उत्साह नहीं, आशा निराशा, शिकवा शिकायत, मलाल नहीं । आप चाहें तो इसे समर्पित आत्म समर्पण भी कह सकते हैं । शायद इसी में उसकी मुक्ति लिखी हो ।

अब हम एक आजाद पंछी को लेते हैं,जिसके जन्म से ही पर हैं,परवान है,ऊंची उड़ान है। उसकी मां उसे उड़ना सिखाती है,वह उड़ेगा नहीं तो जिंदा कैसे रहेगा,अपना पेट कैसे भरेगा । एक उड़ती चिड़िया कभी आपके पास नहीं फटकती,उसे केवल दाने की तलाश रहती है । यही दाना कभी कभी उसके लिए जी का जंजाल बन जाता है जब कोई बहेलिया उसे अपने जाल में फांस लेता है। वह मुक्त होने के लिए, आजाद होने के लिए बैचेन होती है फड़फड़ाती है, उसके प्राण छटपटाते हैं ।।

जीव की भी यही अवस्था है । कहीं वह कोल्हू का बैल है तो कहीं किसी के जाल में फंसा हुआ एक आजाद पंछी । कहीं नियति ने उसे बांध रखा है और कहीं वह अपने स्वभावगत संस्कारों के कारण संसार के जंजाल में उलझा पड़ा है । जब तक उसे आत्म बोध नहीं होता, तब तक मुक्तिबोध कैसे संभव है ।

यह आत्म बोध और मुक्तिबोध आखिर क्या बला है और बोध क्यों जरूरी है । हम पढ़े लिखे समझदार,बुद्धिमान,आजाद खयाल उड़ते हुए पंछी हैं । हमारे भी अरमान हैं, उमंग है, आशा, उत्साह, सुनहरे सपने और महत्वाकांक्षा है, इसमें आत्मबोध और मुक्तिबोध का क्या काम । अनावश्यक रूप से जीवन को जटिल और दूभर क्यों करना। जिन्हें आत्मबोध हो गया क्या वे मुक्त हो गए ।।

तुलसीदास जी तो कह भी गए हैं,बड़े भाग,देवताओं को भी दुर्लभ, मानुस तन पायो ! हम भी खुश, धरती पर ही स्वर्ग पा लिया ! लेकिन नहीं, फिर कोई ज्ञान दे गया । यह संसार तो माया है । सच्चा सुख तो स्वर्ग में है जिसके लिए सच बोलना पड़ता है, माता पिता की और गाय की सेवा करनी पड़ती है । दान पुण्य करोगे तो स्वर्ग की प्राप्ति होगी ।

हम भी समझ गए । न तू जमीं के लिए है न आसमां के लिए । तेरा वजूद है, सिर्फ दास्तां के लिए । जितने पुण्य कमाए हैं, उतना ही स्वर्ग मिलेगा । पैसा खत्म तो खेल भी खत्म । मुक्ति का मार्ग केवल आत्म बोध है, मुक्ति बोध है ।।

क्या है यह मुक्ति की बीमारी, किससे मुक्त होना है हमें,अपने आपसे या अपने परिवार से,अथवा इस संसार से । क्या बिना आत्म बोध के मुक्तिबोध संभव नहीं । और अगर हमें मुक्तिबोध हो भी गया, तो इससे हमें क्या फ़ायदा । हम जीवन में वहीं कुछ इन्वेस्ट करते हैं, जहां कुछ फायदा हो । शेयर मार्केट वाले हैं, दूर की सोच रखते हैं। धीरूभाई के टाइम से रिलायंस के शेयर हमारे पास हैं। हम दूसरे मुकेश हैं, अनिल के बड़े भाई ।

ये आत्मबोध और मुक्तिबोध के बारे में सुना बहुत है,सोचा भी है,थोड़ा बहुत इसमें भी इन्वेस्ट कर दें, शायद अगले जन्म में काम आ जाए । कोई अच्छी कंसल्टिंग एजेंसी हो, कोई भरोसे वाला दलाल हो, तो जो भी कंसल्टेशन, कमीशन अथवा दलाली होगी, हम देने के लिए तैयार हैं । आत्मबोध के बारे में जो ज्यादा नहीं पढ़ा, हां, थोड़ा बहुत मुक्तिबोध के बारे में जरूर पढ़ा है । वैसे हम बड़े जिज्ञासु और पिपासु भी हैं, जहां हमारा फायदा होता है, उधर का रुख कर ही लेते हैं ।।

 

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३६ – समय चक्र के सामने… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “समय चक्र के सामने…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३६ ☆

☆  समय चक्र के सामने… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

बच्चे हर माँ बाप को, लगें गले का हार।।

समय चक्र के सामने, फिर होते लाचार।।

*

समय अगर प्रतिकूल हो, मात-पिता हों साथ।

बिगड़े कार्य सभी बनें, कभी न छोड़ें हाथ।।

*

जीवन का यह सत्य है, ना जाता कुछ साथ।

आना जाना है लगा, इक दिन सभी अनाथ।।

*

मन में होता दुख बहुत, दिल रोता दिन रात ।

आँखों का जल सूखकर, दे जाता  आघात ।।

*

जीवन का दर्शन यही, हँसी खुशी संग साथ ।

जब तक हैं संसार में, जियो उठाकर माथ ।।

*

तन पत्ता सा कँापता, जर्जर हुआ शरीर ।

धन दौलत किस काम की, वय की मिटें लकीर ।।

*

जीवन भर जोड़ा बहुत, जिनके खातिर आज ।

वही खड़े मुँह फेर कर, हैं फिर भी नाराज ।।

*

छोटे हो छोटे रहो, रखो बड़ों का मान ।

बड़े तभी तो आपको, उचित करें सम्मान ।।

*

दिल को रखें सहेज कर, धड़कन तन की जान ।

अगर कहीं यह थम गयी, तब जीवन बेजान।।

*

परदुख में कातर बनो, सुख बाँटो कुछ अंश।

प्रेम डगर में तुम चलो, हे मानव के वंश ।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ 🌿Words of the Buddha 🪷 ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🌿Words of the Buddha 🪷

[A deva:]🤔

With what is the world tied down?

With the subduing of what is it freed?

With the abandoning of what

are all bonds cut through?

 

​[The Buddha:]☺️

With desire the world is tied down.

With the subduing of desire it’s freed.

With the abandoning of desire

all bonds are cut through.

 

[एक देवता:]🤔

संसार किस चीज़ से बँधा है? किसके दमन से मुक्त होता है? किस चीज़ के त्याग से सभी बंधन कट जाते हैं?

 

[बुद्ध:]☺️

इच्छा से संसार बँधा है। इच्छा के दमन से मुक्त होता है। इच्छा के परित्याग से सभी बंधन कट जाते हैं।

 

​[Devatā:]🤔

Kena baddho loko, kassa vinayāya muccati?

Kassassu pahaṇena, sabbāni bandhanāni cutāni?

 

​[Bhagavā:]☺️

Icchāya baddho loko, icchāya vinayāya muccati.

Icchāya pahānena, sabbāni bandhanāni cutāni.

 

#Buddha 🪷

(From the Icchā Sutta (“Desire Sutta”), found in the Saṃyutta Nikāya (SN 1.69 / S i 40) of the Pāli Canon.)

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१६ ☆ “काश! मैं बादल होता” – कवि – श्री आशुतोष झुड़ेले ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है कवि – श्री आशुतोष झुड़ेलेजी द्वारा लिखित  “काश! मैं बादल होता” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१६ ☆

☆ “काश! मैं बादल होता” – कवि – श्री आशुतोष झुड़ेले ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

कृति -काश! मैं बादल होता

कवि – आशुतोष झुड़ेले

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ जीवन को देखने की सहज दृष्टि – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कविता के लिए हमेशा किसी असाधारण घटना की जरूरत नहीं होती। एक खाली मेज़, उड़ती पतंग, पहली बारिश की खुशबू, किसी मित्र की स्मृति या मन में उठती कोई छोटी-सी शिकायत भी कविता का कारण बन सकती है। आशुतोष झुड़ेले ‘ओ रे कबीरा’ का संग्रह ‘काश! मैं बादल होता’ इसी सहज अनुभूति से निकली 51 कविताओं का संसार है। कवि स्वयं स्वीकार करता है कि ये कविताएँ जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, त्योहारों, घटनाओं और रोजमर्रा के अनुभवों से बनी हैं।

इस संग्रह को पढ़ते हुए लगता है कि कवि कविता लिखने से अधिक जीवन को पकड़ने की कोशिश करता है। ‘बग़ीचे की मेज़’ इसका सुंदर उदाहरण है। सामान्य-सी दिखाई देने वाली एक मेज़ कवि की दृष्टि में अनेक जीवन-कथाओं की साक्षी बन जाती है। वहाँ बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं, प्रेमी युगल हैं, अकेलेपन की तलाश में आए लोग हैं और अपने हिस्से के लिए संघर्ष करते चेहरे भी। अंततः वही मेज़ खाली होती है और कवि को लगता है,“यहीं तो मेरी मुलाक़ात आज उम्मीद से होने वाली है।”  वस्तु को जीवन के रूपक में बदल देना इस कविता की उपलब्धि है।

संग्रह में स्मृति एक महत्वपूर्ण संवेदनात्मक आधार है। ‘चुरा ले गए’ में कवि उन चीजों की तलाश करता है जो आधुनिक जीवन में धीरे-धीरे हमसे छूटती जा रही हैं, सुबह की ताजगी, शाम की सादगी, पहली बारिश की खुशबू, बगीचे के फूल और आँगन की मिट्टी। “कुछ लोग पहली बारिश की ख़ुशबू चुरा ले गए” केवल एक सुंदर बिंब नहीं, संवेदनाओं के क्षरण की ओर बड़ा संकेत है।

इसी क्रम में ‘पतझड़ के भी रंग होते हैं’ जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी सौंदर्य खोजती है। पतझड़ यहाँ अंत नहीं, देखने की नई दृष्टि है। सूखे पत्तों, गिरे फूलों और पुराने गीतों में भी रंग और स्मृति बची हुई है। यह कविता संग्रह के आशावादी स्वर को पहचान देती है।

‘पतंग सी जिंदगी’ में जीवन की उड़ान और उसकी डोर का सुंदर साम्य है। पतंग दूर जाती है, लौटती है, हवा से संघर्ष करती है, फिर भी डोर से जुड़ी रहती है।  स्वतंत्रता और संबंधों के बीच मनुष्य की स्थिति को कवि ने एक परिचित लोक-प्रतीक में सहजता से बाँधा है।

आशुतोष की कविता केवल निजी अनुभवों तक सीमित नहीं रहती। ‘भीड़ की आड़ में’ सामाजिक विडंबनाओं पर तीखा प्रश्न करती है। धर्म, जाति और सामूहिक पहचान के पीछे छिपकर मनुष्य अपने दोषों से बचने की कोशिश करता है। कविता का निष्कर्ष आत्ममंथन की ओर ले जाता है,दोष किसी भीड़ का नहीं, अंततः मनुष्य का अपना है।

‘हम सोचते हैं’ इसी तेवर को व्यंग्य में बदलती है और हमारी सामाजिक स्मृति तथा आत्ममुग्धता पर चोट करती है।

‘दर दर गंगे’ में सांस्कृतिक आस्था और पर्यावरणीय चिंता साथ दिखाई देती हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक की यात्रा में कवि उस नदी की पीड़ा दर्ज करता है जिसे हम माँ कहते हैं, जिसकी आरती करते हैं, पर जिसकी रक्षा का दायित्व भूल जाते हैं। “बहाती जा रही बस आँसू” जैसे बिंब श्रद्धा को जिम्मेदारी से जोड़ देते हैं। इस तरह के कई नवाचारी रूपक कवि की अनुभव जन्य भाषा ,भाव , शब्द सामर्थ्य के परिचायक हैं। यद्यपि यह कवि की पहली ही कृति है, उनके व्यक्तित्व की तरह व्यापक सुगठित सरल तथा परिपक्व है।

‘भोपाल’ संग्रह की अत्यंत छोटी, किंतु गहरी कविता है। “हवा क्या होती है, पूछो भोपाल से…” जैसे लगातार प्रश्न एक त्रासदी को केवल घटना न रहने देकर सामूहिक स्मृति में बदल देते हैं।  शब्द कम हैं, लेकिन उनके पीछे भय, अन्याय और जीवन-मृत्यु का पूरा अनुभव उपस्थित है। भोपाल गैस त्रासदी पर केंद्रित यह कविता महत्वपूर्ण संवेदी, दस्तावेजी रचना बन पड़ी है।

रिश्तों की नाजुकता भी कवि की प्रमुख चिंता है। ‘डोर’ में समय और संबंध दोनों को ऐसे धागे की तरह देखा गया है जो लंबा होने पर अपना सिरा खो देता है और तनिक से झटके में टूट भी सकता है।  ‘रिश्ते’ कविता अपेक्षा और उपेक्षा के बजाय देने और कर्म को महत्व देती है।  ‘शिकायत थी मुझको’ में शिकायतों की पूरी सूची अंततः आत्मबोध  सामने लाती है। कबीरा का मुस्कुराकर ‘मूरख’ कहना कविता को उपदेश नहीं, आत्मव्यंग्य बना देता है।

खुद पर व्यंग्य कर पाना एक सामर्थ्यवान कवि की पहचान है।

‘पहचानो तुम कौन हो?’ संग्रह की उल्लेखनीय रचनाओं में है। भेड़ों के बीच पला शेर का बच्चा स्वयं को भेड़ समझता रहता है। अपनी वास्तविक पहचान से अपरिचित यह शेर हमारे भीतर छिपी संभावनाओं का रूपक बन जाता है।  कविता का प्रश्न इसलिए केवल शेर से नहीं, पाठक से भी है, हम अपने बारे में जो मानते हैं, क्या वास्तव में वही हैं?

संग्रह की भाषा उसकी अपनी पहचान है। हिंदी के साथ उर्दू और लोकभाषा के शब्द सहजता से आते हैं। पुनरावृत्ति, संवाद और लोकलय कई कविताओं को मंचीय प्रभाव देते हैं। ‘तू है गज’ में लगातार दोहराया गया संबोधन हाथी को भारतीय सांस्कृतिक स्मृति, शक्ति, करुणा और अस्तित्व के व्यापक प्रतीक में बदल देता है।

‘काश! मैं बादल होता’ की कविताएँ बड़े दार्शनिक निष्कर्षों का दावा नहीं करतीं। वे छोटे अनुभवों से छोटी-छोटी रोशनियाँ चुनती हैं। यही इनकी विशेषता है। कहीं स्मृति है, कहीं व्यंग्य, कहीं सामाजिक सरोकार, कहीं पर्यावरण की चिंता और कहीं आत्मसंवाद। कवि बादल बनकर उड़ना चाहता है, पतंग बनकर लौटता है, खाली मेज़ पर उम्मीद खोजता है और अंततः स्वयं से ही पूछता है, “पहचानो तुम कौन हो?”

कविताएं पढ़कर समझ आता है कि आशुतोष जी साहित्य के एक अच्छे पाठक हैं, तथा कला संस्कृति उनकी अभिरुचि है, जो रचनाओं में मुखर हुई दिखती है।

कविता यहाँ जीवन से अलग कोई सजाया हुआ संसार नहीं, बल्कि जीवन को थोड़ी देर ठहरकर देखने की कला है। ‘काश! मैं बादल होता’ इसी ठहरने, देखने और फिर भीतर कुछ बदल लेने का सहज आमंत्रण है।

कवि की आगामी रचना यात्रा के पड़ाव की प्रतीक्षा रहेगी।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९४ – देश-परदेश – कहीं खुशी कहीं ग़म ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९४ ☆ देश-परदेश – कहीं खुशी कहीं ग़म ☆ श्री राकेश कुमार ☆

यू पी आई उपयोग पर प्रथम बार टैक्स की घोषणा हुई हैं, इसके दूरगामी परिणाम भी होंगे। कुछ लोग इसका विरोध भी कर रहें है, कुछ खुशियों मना रहें हैं। खुशी और गम सिक्के के दो पहलू होते हैं। जीवन में भी खुशियां और गम साथ साथ ही चलते हैं।

उपरोक्त ए आई द्वारा निर्मित फोटो भी गृहणी की खुशी को लेकर हैं। अखिल भारतीय महिला समाज की प्रवक्ता ने भी इस बात को लेकर हर्ष व्यक्त किया हैं। घर के पुरुष अब अपनी जेबों में कुछ ना कुछ धन राशि छोड़ देंगे, जिसे घर की महिला अपनी पूंजी बना लेगी। भारतीय महिलाओं के नोट बंदी के समय दिए गए सहयोग से सभी परिवार लाभान्वित हुए थे।

फुटकर दुकानदार भी प्रसन्न है, खुले पैसे की कमी से वो जबरन टॉफी इत्यादि की बिक्री कर अतिरिक्त लाभ कमा लेंगे। हमारे मोहल्ले के कुछ दुकानदारों ने तो चिल्लर के बदले अपने कागज के कूपन भी छपवा लिए हैं, ताकि ग्राहक से झगड़ा/ बहस नहीं हो।

यातायात पुलिस कर्मी खुशी के मारे फूले नहीं समा रहें हैं। रिश्वत की राशि अब आसानी से नगद में मिल जाएगी। रेलवे या अन्य सरकारी विभाग जैसे बिजली, पानी के बिल जमा करने के स्थान पर कार्यरत लोग अब रोज़ दिवाली मनाएंगे। उनके पास छूटे पैसे क्या पांच और दस के नोट भी वापिस करने के लिए नहीं होते हैं। चिल्लर की कालाबाजारी करने वाले, आने वाले दिनों की मांग को देखते हुए सक्रिय होने लगे हैं।

निजी क्षेत्र के बड़े शोरूम आदि में अतिरिक्त कैशियर की भर्ती के विज्ञापन पेपर में  छपने लग गए हैं। छोटे रबर बैंड बनाने वाले यूनिट्स ने नगद राशि के आदान प्रदान में अप्रत्याशित वृद्धि को देखते हुए, रबर बैंड की मांग वृद्धि की पूर्ति के लिए कमर कस ली हैं।

दूसरी तरफ अर्थशास्त्र के जानकारों का मानना है, कि आगामी त्योहारों को देखते हुए टैक्स लागू करने की तारीख़ एक माह बढ़ाई भी जा सकती हैं।

स्विगी, जोमेटो, जेप्टो आदि जैसे “घर पहुंच सेवा” में कार्यरत यूनिट्स के शेयर में गिरावट होनी भी शुरू हो गई हैं। पेटीएम ने अपने अधिकतर स्टाफ को एक माह का नोटिस दे दिया हैं। उनका ऑफिस भी अब कम/ छोटे स्थान पर जाने की तैयारी में हैं।

आगे आगे देखें होता है, क्या ?

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆  समीक्षक – श्री अनिल कुमार अस्थाना ☆

श्री अनिल कुमार अस्थाना

☆ पुस्तक समीक्षा ☆

☆ ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆  समीक्षक – श्री अनिल कुमार अस्थाना ☆

☆

पुस्तक समीक्षा: ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी)

 लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव

☆ प्रेम का मनोविज्ञान -बदलाव की बयार-“कोई नाम न दो” – सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी द्वारा रचित पुस्तक ‘ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध लोक कथाएं (नानी कहे कहानी)’ का अध्ययन करने का सुखद अवसर प्राप्त हुआ। भले ही इन कहानियों का परिवेश मूलतः ब्रिटिश है, परंतु ये सभी कहानियां किसी न किसी रूप में हमारी दादियों द्वारा भारत में सुनाई जाने वाली कथाओं की ही आत्मीय अनुभूति कराती हैं।

लेखक ने विदेशी लोक कथाओं में छिपे उन तत्वों को उकेरा है जो भारतीय जनमानस से गहराई से जुड़ते हैं:

रॉबिन हुड और शेरवुड का जंगल : यह कहानी पूरी तरह से भारतीय ऐतिहासिक परिवेश से मेल खाती प्रतीत होती है। यह उस कालखंड का स्मरण कराती है जब पहले मुगल और फिर ब्रिटिश शासक जनता से जबरन लगान वसूलते थे। इसके साथ ही, यह प्रसंग बरबस ही इस बात की याद दिलाता है कि कैसे भारत शासन ने जमींदारी प्रथा को समाप्त कर ग्रामीण जनता को इस शोषण से बड़ी राहत दिलवाई थी।

राजा आर्थर और जादुई तलवार: यह कथा भारतीय महाकाव्य महाभारत के उस गौरवशाली प्रसंग की याद दिलाती है, जहां अर्जुन मछली की आंख पर अचूक निशाना लगाते हैं।

वर्तमान परिदृश्य में, यह पुस्तक आज की युवा पीढ़ी और बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय कहानियों से परिचित कराने का एक अत्यंत सार्थक माध्यम है।

इस पुस्तक की विषयवस्तु से प्रेरित होकर, मैंने यह निर्णय लिया है कि मैं कल्याण में रह रही अपनी 4 वर्षीय भांजी ‘अन्वी’ को ये बाल-कहानियां अवश्य सुनाऊंगा।

विदेशी लोक कथाओं को इतने सहज और ग्राह्य रूप में प्रस्तुत करने के लिए लेखक श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी को हार्दिक बधाई।

☆

©  श्री अनिल कुमार अस्थाना

जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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