हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१६ – कविता – ☆ बिना हँसे रोये क्या पाया… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता टेम पब्लिसिटी का भैये” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१६ 

☆ बिना हँसे रोये क्या पाया… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

जिनमें संवेदना नहीं,

वे कैसे रोयेगे

ओढ लबादे, ‘व्यर्थ सोच’ के

कैसे सोएंगे।

 

चेहरों पर जिनके

मुस्कान नहीं

सहज सरलता से

पहचान नहीं

जो गंभीर मुखौटे

ओछे बैठे हैं

प्रमुदित रहने का

है ज्ञान नहीं

शंकित मन जीवन में

कैसे खुशियाँ बोयेंगे…

 

जो न प्रकृति से

हँसना सीखे हैं

जो, जो भर

रोने से रोते हैं

हंसी-रुदन तो

जीवन के वरदान है

सुख-दुख बिन

जग के रस फीके हैं

बिना हँसे-रोए

क्या पाया है

जो खोएंगे…

 

है बसंत तो,

पतझड़ भी आएगा

दिवस बाद

अँधियारा भी छाएगा

मोर और संध्या में

जैसी समरसता है

हर्ष-शोक भी जीवन में

क्षमता लाएगा

सहज बनेंगे तब आंसू

तन मन को धोएंगे।….

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३७ ☆ मज़दूर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “क्यों?” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३७ ☆ मज़दूर ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

शहर के हर चौराहे पर

आज भी इकट्ठे होते हैं लोग

काम की तलाश में

कहीं भटकते नहीं है

बस खड़े रहते है

इस आस में कि कोई ज़रूरतमंद

आकर उन्हें ले जाएगा

अपने साथ लेकर चलते हैं

दिन भर का भोजन पानी

जैसे-जैसे दिन ऊपर चढ़ता है

उनकी आस उसी तरह

कम होती जाती है

सर्वहारा वर्ग आज भी

आशाओं और व्यवस्था के बीच

झूलता लटकता अपना और

अपने परिवार का बोझ ढोता

ज़िंदा है इस कायनात में

इन असंगठित लोगों के लिए

सरकारों की प्रतिबद्धता

सिमट कर रह जाती है सिर्फ़ काग़ज़ों में

जो शायद ही कोई

साकार रूप ले पाती है

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – डस्टबिन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – डस्टबिन ? ?

क्रोध, आक्रोश

प्रेम, आवेश

भय, चिंता

पौरुष के सारे प्रवाहों का

‘डस्टबिन’ होती है औरत,

स्त्री विमर्शकों का

मंथन जारी था..,

असहाय होता है डस्टबिन

एकत्रित करता है कूड़ा

और दुर्गंध से सना रह जाता है,

सुनो-

विमर्शक नहीं हूँ मैं

किंतु

चिंतन में उठती हैं लहरें

माटी सोखती है

सारा चुका हुआ

सारा हारा हुआ,

माटी देती है

हर बीज को

अपनी उष्मा

अपना पोषण,

बीज उल्टा पड़ा हो या सीधा

टेढ़ा या मेढ़ा

आम का हो

या बबूल का,

सारे विमर्शों से परे

माटी अँकुआती है जीवन

धरती को करती है हरा

धरती को रखती है हरा

हरापन-

प्राणवान होने का प्रमाण है,

माटी फूँकती है प्राण

मित्रो!

स्त्री माटी होती है

और दुनिया के

किसी भी शब्दकोश में

माटी का अर्थ

‘डस्टबिन’ नहीं होता।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ वक्त बड़ा निष्ठुर है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय कविता – वक्त बड़ा निष्ठुर है…!

☆ ॥ कविता॥ वक्त बड़ा निष्ठुर है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

राजा- रंक नहीं किसी की,

अनुनय-  विनय  सुनता है।

हरदम  ताने-बाने बुनता है,

ये  वक्त  बड़ा ही निष्ठुर है…!

कब  किसको  भूप बनाए,

कब  किसकी बैंड बजाए।

कैसे- कैसे  ये रंग दिखाए,

ये वक्त  बड़ा  ही निष्ठुर है…!

कब किसको सिर बिठाए,

कब किसको नाच नचाए।

कब  किसकी वाट लगाए,

ये  वक्त  बड़ा ही निष्ठुर है…!

कब  किसके भाग्य जगाए,

कब किसको  गले लगाए।

कब किसकी नाक कटाए,

ये  वक्त  बड़ा  ही निष्ठुर है…!

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४२ ☆ मुहब्बत का असर तो देखिए… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुहब्बत का असर तो देखिए “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४२ ☆

✍ मुहब्बत का असर तो देखिए… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जरा सी हैसियत बढ़ते ही माज़ी भूलने लगते

मगर हरकत से ये ज़रदार फौरी है बने लगते

 *

जो अपनी हैसियत से उठाते वज़्न हैं बढ़चढ़

उन्हीं के पाँव चादर से निकलकर झाँकने लगते

 *

मुहब्बत का असर तो देखिए वो दूर है मुझसे

मगर हर वक़्त आँखों के मुझे है सामने लगते

 *

जिन्होंने ज़िन्दगी की धूप में देखा नहीं तपके

यही वो लोग है जो मुश्किलों से भागने लगते

 *

बुजुर्गों की  करो इज्ज़त  तज़ुर्बों का खजाना है

मगर बूढ़ा समझ कर  लोग रुख को मोड़ने लगते

 *

उधारी प्रेम की कैची है जिसने भी कहा सच है

बिगड़ता रब्त है जब भी उधारी माँगने लगते

 *

नए इस दौर के मुंसिफ अना का पास भूले है

नहीं दोगे जो नज़राना ये पेशी टालने लगते

 *

भले दुश्मन है ऐसे दोस्त से जो घात में रहकर

गले मिलते ही  देखा है की गर्दन नापने लगते

 *

भलाई का अरुण अंजाम दुनिया में यही देखा

मसीहा जो बना उसमें ही कीलें ठोकने लगते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४७ – प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – प्रारब्ध।)

✍ प्रारब्ध… ☆ श्री हेमंत तारे  

कभी-कभी,

जीत कर भी,

विजेता,

होता नहीं, बहुत खुश,

क्यों कि,

पता है उसे

जीता नहीं है वो,

जीता है, प्रारब्ध उसका,

कमतर थी कूबत उसकी

अपने ही प्रतिद्वंदी से,

जो,

पराजित, कुंठित और अपमानित बैठा है

किसी ठौर ।

 

कुरूक्षेत्र में

पराजित हुआ कर्ण,

विजित हुआ अर्जुन,

प्रारब्ध था दोनो का, अपना – अपना,

अपनी – अपनी

योग्यता और कौशल्य से परे ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रश्नविहीन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆

✍ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

प्रतीक की कार्यालय में नौकरी लगी तो भंडार विभाग में लिपिक के रूप में और धीरे धीरे प्रमोशन पाकर अधीक्षक के पद तक प्रोन्नत हो गए। भंडार विभाग से उनका कहीं ट्रांसफर नहीं हुआ। भंडार विभाग के जरिए ही हर विभाग के हर सामान की खरीद हुआ करती थी और मरम्मत कार्य भी। पता नहीं क्यों किसी भी वस्तु का डैड स्टाक रजिस्टर नहीं मिलता था। शायद कोई देखता ही नहीं। हालांकि हर साल ऑडिट होता। विजिलेंस द्वारा भी इंसपेक्शन हुआ करता। लेकिन प्रतीक पर कभी आंच नहीं आई। हर अफसर के परिवार के लोग प्रतीक को जानते थे और बच्चे तो उनसे लिपट जाते थे। कुछ भी चाहिए प्रतीक अंकल मौजूद।

सभी अफसरों की वे नाक का बाल थे। नए अफसर कहीं से ट्रांसफर होकर आते तो प्रतीक उनकी सेवा में हाजिर। चैंबर के पर्दे साहब की मरजी के अनुसार बदल जाते । नया फर्नीचर आ जाता। नई डिजाइनदार टेबल व कुर्सियाँ। पुराने पर्दे व फर्नीचर कहां जाते किसी को पता नहीं।

एक डायरेक्टर आए कोलकाता से ट्रांसफर होकर। नाम था सदानंद कुरील। बहुत तेज तर्रार। उन्होंने पदभार संभाला तो दूसरे दिन प्रतीक उनके चेंबर में हाजिर। कुरील साहब ने उनकी तारीफ पूछी तो बताया मैं प्रतीक, अधीक्षक भंडार विभाग। कुरील साहब ने कहा, मैंने तो आपको बुलाया नहीं फिर कैसे चैंबर में सीधे आ गए। प्रतीक ने कहा कि आपके पी.ए. ने बुलाया। कुरील साहब ने पी.ए. को बुलाकर पूछा कि मैंने तो नहीं कहा कि भंडार अधीक्षक को बुलाओ, फिर ये यहां क्यों आए। पी.ए. ने कहा कि सर जो भी नए डायेक्टर आते हैं तो उन्हें नया फर्नीचर पर्दे आदि लगते हैं, इसलिए। अच्छा, कुरील साहब ने हुंकार भरी। अच्छा प्रतीक बाबू आप आ ही गए हैं तो बताइए, नए अफसरों के लिए क्या क्या मंगाते हैं और पुराना सामान कहां जाता है। अब तक की खरीद और पुराने सामान के निपटारे का रिकार्ड ले आइए।

प्रतीक की बोलती बंद। जी सर कहकर चैंबर से बाहर निकल आए। कई दिनों बाद तक वे नहीं आए तो कुरील साहब ने पी.ए. से प्रतीक को बुलाने को कहा। पी.ए. ने बताया कि वह अस्पताल में भरती हैं। कुरील साहब ने पी.ए. से उनकी छुट्टी और सिक रिपोर्ट का रिकार्ड मंगवाया। रिकार्ड देखकर कुरील साहब ने भंडार अधिकारी को बुलाया। उनसे पूछा कि प्रतीक आपके अधीक्षक हैं, उन्हें क्या हुआ है। भंडार अधिकारी का मुंह सूख गया। बोल नहीं पाए। कुरील साहब बोले चलिए प्रतीक को देखने अस्पताल चलते हैं। दोनों पहुंचे तो अस्पताल में अफरा तफरी मची थी। कुरील साहब को देखकर चिकित्सा अधिकारी और घबडा गए, तुतलाते से बोले, सर प्रतीक ने विष पान कर लिया। कुरील साहब बोले कि आप यहां क्या कर रहे हैं. जाइए उसे बचाइए। चिकित्सा अधिकारी भर्राए स्वर में बोले, नहीं बचा पाए सर। अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मी और प्रेस प्रतिनिधियों की भीड थी। हर एक का चेहरा प्रश्नविहीन।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४० ⇒ गया और बोधगया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गया और बोधगया।)

?अभी अभी # ९४० ⇒ आलेख – गया और बोधगया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं कभी गया नहीं गया, बोधगया नहीं गया। सुना है दोनों जगह ऐसी हैं, जहां मुक्ति मिलती है।

जो चला गया, उसे भी और जिसे जीवन का बोध हो गया, उसे भी। जिसे बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया। इसी स्थान पर बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी, वह बोधिवृक्ष यहीं है।

आखिर यह कैसा बोध है जो बोधगया में ही होता है। आप चाहें तो इसे आत्मबोध कहें, आत्म साक्षात्कार कहें, सेल्फ रियलाइजेशन कहें, यह होता तो हमारे अंदर ही है। यह बोधिवृक्ष भी हमारे अंदर ही है। अंदर की खोज के लिए बाहर का आलंबन तो लेना ही पड़ता है। चारों धाम की यात्रा अंतर्यात्रा के बिना कभी पूरी नहीं होती।।

मैं इतना अभागा, कभी प्रयागराज भी नहीं गया। गया हो या बोधगया, बद्रीनाथ धाम हो या हर की पेढ़ी, मुक्ति का द्वार तो गंगा ही है और गंगा, जमना और सरस्वती, तीनों नदियों का संगम भी प्रयागराज ही में है। हो गया न महाकुंभ। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक ही तो हैं ये तीनों नदियां। जिसमें सरस्वती यानी वैराग्य तो लुप्त है। बिना वैराग्य के कहां मुक्ति। बुद्ध का वैराग्य ही बोधगया है।

हां मैं कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद रॉक मेमोरियल जरूर गया हूं, कुछ समय के लिए ध्यानमग्न हो विवेकानंद भी बना, फिर वापस चला आया। काश विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह बोधिवृक्ष के नीचे बैठने से ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाए तो जीवन कितना आसान हो जाए। लेकिन यहां गुडविल नहीं, स्ट्रांग विल काम आती है। वैराग्य कोई जागीर नहीं, कि वसीयतनामे के जरिए चाहे जिसके नाम कर दी जाए।।

कबीर अक्सर ताने बाने की बात करते हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बात करते हैं। इड़ा, पिंगला को आप चाहें तो सूर्य चंद्र नाड़ी समझें अथवा प्रतीक रूप में ज्ञान और भक्ति रूपा गंगा जमना, लेकिन सुषुम्ना तो अदृश्य वही सुप्त नाड़ी है, जो वैराग्य रूपी सरस्वती नदी की प्रतीक है। तीनों का संगम ही महाकुंभ है जो इसी शरीर में सहस्रार है। जिसे अमृत कहा जाता है, वह वह मुक्ति है जो हमें जन्म मरण के बंधन से मुक्त करती है। देव असुर दोनों मूर्ख थे, जो मुक्त होने की अपेक्षा, स्वर्ग प्राप्ति के लिए, और अमर होने के लिए, अमृतपान करना चाहते थे।

कबीर को भी इसका बोध था और बुद्ध को भी। जीते जी जिसे इसका बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया, अमर हो गया वर्ना लगाते रहो डुबकी ज्ञान और भक्ति की गंगा में, बिना वैराग्य भाव के, करते रहो अमृत पान। जब छूटेंगे प्रान, यहीं गया में ही होगा पिंड दान।।

काश मुक्ति इतनी आसान होती ! काशी मरणोन्मुक्ति। काशी में तो केवल प्राण त्यागने से ही मुक्ति मिल जाती है। मैं मति का मारा तो कभी काशी भी नहीं गया। सोचता हूं, जीते जी ही एक बार काशी हो आऊं, प्रयागराज के संगम में स्नान करके बोधगया भी हो आऊं। मन में यह मलाल तो नहीं रहेगा, जीते जी मैं कहीं भी नहीं गया ; न गया, न बोधगया..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०५ – सुकून… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुकून।)

☆ लघुकथा # १०५ – सुकून श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

इस भाग दौड़ की जिंदगी में समझ में नहीं आता क्या करूँ क्या न करूँ?

आज पैदल चल रही हूँ तो यह रास्ता भी मुझे बहुत लंबा लग रहा है कमल जी अपने आप से बातें करते हुऐ आराम से धीरे-धीरे चल रही थी।

दीवार पर लिखे हुए सभी पोस्ट को ध्यान से पढ़ रही थी और आसपास की दुकानों के बोर्ड भी पढ़ रही थी। चलो अच्छा है आज गाड़ी खराब हो जाने से कुछ तो फायदा हुआ पता चल जाएगा कि कहाँ क्या मिलता है?

तभी अचानक  एक पोस्ट दिखाई दिया उसमें लिखा था कि चाय कॉफी के साथ यहाँ बातों का आनंद लें।

यह कैसी दुकान है कमल जी ने सोचा कुछ देर रुकने के बाद उनके मन में विचार आया चलो अंदर चल कर देखती हूँ घर जल्दी जाकर क्या करूंगी अकेली ही तो रहती हूँ बच्चों ने तो मुझे अकेला छोड़कर विदेश चले गए समय काटने के लिए पास के स्कूल में पढ़ाती हूँ।

उन्होंने देखा काफी सारे लोग बैठे हैं एक लाइब्रेरी है उसमें कुछ लोग ऑनलाइन पढ़ रहे हैं कुछ पेपर और किताबें पढ़ रहे है, चाय कॉफी और नाश्ता भी मिल रहा है।

तभी एक मुस्कुराती हुई महिला ने कहा -” मैडम आप क्या लेंगे लिए यहाँ बैठ जाइए।”

कमल जी ने कहा बहन जी कैसी जगह है इसके बारे में आप मुझे कुछ बताइए?

उसे महिला ने कहा मेरा नाम कविता है, हम पति-पत्नी यहां रहते हैं हमारा बहुत बड़ा घर था सड़क के किनारे हम अकेले रहते थे इसलिए हम लोगों ने सारी किताब कॉपी को एक जगह रख दिया और कुछ कंप्यूटर भी खरीद लिए हैं बच्चे पढ़ते हैं और जो हमारी तरह बुजुर्ग हैं वह भी यहां आते हैं हम सभी एक दूसरे के साथ अपना अनुभव बताते हैं और इतनी देर हम सब कैसे बैठ पाएंगे इसलिए यहाॅं पर चाय कॉफी नमकीन बिस्कुट सैंडविच और पकौड़ी मिलती है।

बाबाजी आप लोग तो बहुत अच्छे कार्य कर रहे हो मुझे तो यह पता ही नहीं था।

कविता ने कहा बहन क्या करें हमारी मजबूरी है और वक्त की मांग है आज के जमाने में किसी के पास समय नहीं है और हमारे पास समय ही समय है तो क्यों ना हम सभी को सुकून बाँटे।

कविता ने कहा ठीक कह रही हो बहन मुझे भी एक कप चाय पिला दो। कविता और रागिनी दोनों मुस्कुराने लगती हैं उनकी आंखों में एक चमक आ जाती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०५ ☆ गझल… आयुष्य ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०५ ?

गझल आयुष्य ☆  प्रभा सोनवणे ☆

हे पात्र नदीचे सुशांत.. अवखळ नाही

जगण्यात अता कुठलेही वादळ नाही

*

आयुष्य कधी थांबते का कुणासाठी ?

हृदयात जराही तसली  खळबळ नाही

*

तू ठेव तिथे लपवून तुझी गाऱ्हाणी

सरकार म्हणे आम्हाला कळकळ नाही

*

बाईस विचारा काय पाहिजे आहे ?

गावात तिच्या मुक्तीची चळवळ नाही

*

की मूग गिळावे आणि मूकच रहावे ?

मी त्यांच्या इतकी मुळीच सोज्वळ नाही

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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