(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!
🌌 When the Younger Ones Rise, the Heart स्माइल्स 🥰 🌌
There comes a stage in life when our own achievements quietly step into the background. The medals we once cherished gather a little dust in memory, and the applause we once heard fades into a gentle echo. Yet life has a beautiful way of filling that space—with the achievements of the younger generation.
In truth, their success often gives us far greater joy than our own ever did. Their victories feel like a continuation of our hopes and dreams, and they bring a deep sense of pride and fulfilment.
A Proud Moment for Our Family🌷
It is with immense happiness that I share a very special moment from our family. My nephew, Vishal, was adjudged the Best Cadet in the Senior Division Army at the Republic Day Celebrations 2026 on the magnificent Kartavya Path in New Delhi.
It was a moment that touched my heart deeply. When the announcement was made calling out:
“Senior Under Officer Vishal Singh, Sarvashresht Cadet, Senior Division Army, Madhya Pradesh and Chhattisgarh Nideshalaya,”
I could not hold back my tears of joy. Standing before the Honourable Prime Minister, Narendra Modi, Vishal was decorated with a medal and presented with a trophy, baton and cheque. For our entire family, it was a moment of pride that will remain etched in our hearts forever.
Recognition Back Home 🌷
Soon after this honour, a felicitation ceremony was organised in Bhopal by the Chief Minister of Madhya Pradesh, Mohan Yadav, to recognise Vishal’s outstanding achievement.
While sharing his experience of the month-long camp in New Delhi, Vishal spoke with maturity and conviction. He said:
“NCC is not just limited to the uniform. It is a lifestyle of discipline, perseverance and dedication to the honour and pride of the country. The camp was a great learning experience and a reality check with cadets coming from all over the country.”
His words reflected not just pride in the uniform but also a deep understanding of responsibility towards the nation.
A Hope for the Future 🌷
As an elder in the family, my heart swells with pride when I see young people like Vishal walking on the path of discipline, service and dedication to the country.
May his journey ahead be bright and meaningful. May he continue to serve the nation with honour and inspire many others along the way.
And for people of my generation, moments like these remind us that while time may move us gently to the sidelines, the torch of excellence is being carried forward by capable and committed hands.
My heartfelt blessings and best wishes to Vishal for a glorious future in service to the nation.
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग- २६ ☆ श्री सुरेश पटवा
29 जुलाई को पूर्वाह्न दस बजे हरिद्वार से नैनीताल की यात्रा आरम्भ की। अब हमारी दाहिनी तरफ़ गंगा का तेज बहाव और बाईं तरफ़ हिमालय तराई से जुड़ी पहाड़ियाँ और उनसे निकलती पहाड़ी नदियाँ और इन पर बने पुलों से गुज़रते मनमोहक दृश्य की क़तार साथ लिए बढ़ चले।
आधा घंटा चलने के बाद उत्तर प्रदेश का बिजनौर जनपद लग गया। एक बड़ी बस्ती निज़ामाबाद आई। जिसकी बसावट इतिहास की एक बड़ी घटना से जुड़ी है। पानीपत का तीसरा युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ के बीच 14 जनवरी 1761 को वर्तमान पानीपत के मैदान मे हुआ जो वर्तमान समय में हरियाणा में है, इस युद्ध में तोपची इब्राहीम ख़ाँ गार्दी ने मराठों का साथ दिया था। दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया। अवध के तराई इलाक़े पर एक अफ़ग़ान सरदार नजीबुल्लाह का क़ब्ज़ा था। उसने अहमद शाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण कर दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने बुलाया था। उसने ही नजीबाबाद बसाया था।
नवाब नजीब-उद-दौला, जिसे नजीब खान के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रसिद्ध रोहिल्ला मुस्लिम योद्धा और मुगल साम्राज्य और दुर्रानी साम्राज्य दोनों का रणनीतिकार योद्धा था। नजीब-उद-दौला 18 वीं शताब्दी के रोहिलखंड में एक प्रसिद्ध रोहिल्ला आदिवासी प्रमुख था, जिन्होंने 1740 के दशक में बिजनौर जिले में नजीबाबाद बसाया और “नवाब नजीब-उद-दौला” की उपाधि धारण की। 1757 से 1770 तक वह देहरादून पर शासन करते हुए सहारनपुर का गवर्नर था। वह मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय के एक समर्पित सैनिक था; बाद में अपने करियर में उन्हें नवाब नजीब-उद-दौला के नाम से जाना जाने लगा। उस अवधि के कई स्थापत्य अवशेष नजीबाबाद में हैं, जिन्हें उन्होंने मुगल मंत्री के रूप में अपने करियर की ऊंचाई पर बनवाए थे। उन्होंने सफदरजंग को वजीर के रूप में उत्तराधिकारी बनाया।
नजीब-उ-दौला की मृत्यु के बाद, उनका पुत्र जबीता खान उनका उत्तराधिकारी बना। उनका कब्रिस्तान आज भी नजीबाबाद में है। नजीबाबाद में सुल्ताना डाकू या “द सुल्तान बैंडिट” का अड्डा था। जिसके खंडहर अभी भी नजीबाबाद में स्थित है। नजीबाबाद शहर को “हिमालय का प्रवेश द्वार” और “शहरों का शहर” के रूप में भी जाना जाता है।
उत्तर प्रदेश का पिछड़ापन उजागर होने लगा। दो घंटे चलने के बाद उत्तराखंड के ऊधमपुर ज़िले का इलाक़ा लगते ही साफ़ सफ़ाई और विकास के दर्शन हुए। एक ढ़ाबे पर खाना खाकर रामनगर की तरफ़ यात्रा शुरू की। अब मुरादाबाद जनपद लग गया।
मुरादाबाद उत्तर प्रदेश में एक ज़िला, आयुक्त और नगर निगम है। मुरादाबाद राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से 167 किमी की दूरी पर और राज्य की राजधानी लखनऊ से 344 किमी उत्तर-पश्चिम में रामगंगा नदी के तट पर स्थित है। मुगल बादशाह शाहजहां के तहत कटेहर के सिपाहसालार रुस्तम खान ने बादशाह के सबसे छोटे बेटे राजकुमार मुराद बख्श के नाम पर बस्ती का मुरादाबाद नाम रखा था। इसकी स्थापना के तुरंत बाद, बादशाह ने संभल को भी कटेहरा के अधीन कर दिया। मुरादाबाद को बाद में 1740 में अली मोहम्मद खान द्वारा रोहिलखंड राज्य में मिला दिया गया था। पहले रोहिल्ला युद्ध में रोहिलों के पतन के बाद 1774 में अवध राज्य के नियंत्रण में आ गया था और फिर 1801 में नवाब द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, रोहिलखंड क्षेत्र को रामपुर की रियासत और दो जिलों – बरेली और मुरादाबाद में विभाजित किया गया। उत्तर प्रदेश के उसी मुरादाबाद ज़िला की एक बड़ी बस्ती काशीपुर से उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले में प्रवेश किया।
अंग्रेज वन्य जन्तुओं की रक्षा करने के शौकीन थे। सन् 1935 में रामगंगा के इस अंचल को वन्य पशुओं के रक्षार्थ सुरक्षित किया गया। उस समय के गवर्नर मालकम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम ‘हेली नेशनल पार्क’ रखा गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इस पार्क का नाम ‘रामगंगा नेशनल पार्क’ रख दिया गया। विश्व में जिम कार्बेट नाम एक प्रसिद्ध शिकारी के रूप में प्रसिद्ध हो गया था। जिम कार्बेट जहाँ अचूक निशानेबाज थे वहीं वन्य पशुओं के प्रिय साथी भी थे।
आज यह पार्क इतना समृद्ध है कि इसके अतिथि-गृह में 200 अतिथियों को एक साथ ठहराने की व्यवस्था है। यहाँ आज सुन्दर अतिथि गृह, केबिन और टेन्ट उपलब्ध है। खाने का उत्तम प्रबन्ध भी है। ढिकाला में हर प्रकार की सुविधा है तो मुख्य गेट के अतिथि-गृह में भी पर्याप्त व्यवस्था है।
रामनगर रेलवे स्टेशन से 12 कि॰मी॰ की दूरी पर ‘कार्बेट नेशनल पार्क’ का गेट है। रामनगर रेलवे स्टेशन से छोटी गाड़ियों, टैक्सियों और बसों से पार्क तक पहुँचा जा सकता है। बस सेवाएँ भी उपलब्ध हैं। दिल्ली से ढिकाला तक बस आ-जा सकती है। यहाँ पहुँचने के लिए रामनगर कालागढ़ मार्गों का भी प्रयोग किया जा सकता है। दिल्ली से ढिकाला 297 कि॰मी॰ है। दिल्ली से गाजियाबाद- हापुड़- मुरदाबाद- काशीपुर- रामनगर होते हुए ढिकाला तक का मार्ग है। मोटर की सड़क अत्यन्त सुन्दर है।
पहाड़ी हिमालय का तराई क्षेत्र फिर शुरू हो गया। रामनगर पहुँच कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के गेट पर पहुँचे। जिप्सी की बुकिंग कर हल्की बूंदाबाँदी के बीच तीन घंटे पार्क भ्रमण किया। दोपहर के समय खुले क्षेत्र में हिरण, नीलगाय, मोर दिखे लेकिन राजा साहिब किसी गुफा में आरामतलबगीर थे।
फिर कॉर्बेट संग्रहालय देखा। उनके साहसिक जीवन और लेखन की यादों के साथ कुछ समय वहाँ गुज़ारा। अब हम एक बहुत ही शानदार इंसान जिम कार्बेट के इलाक़े में हैं। उनकी कहानी न सिर्फ़ रोचक बल्कि रोमांचक भी है।
एडवर्ड ज़िम कॉर्बेट (25 जुलाई 1875 – 19 अप्रैल 1955) एक ब्रिटिश शिकारी, वन्यप्रेमी, प्रकृतिवादी और लेखक थे, जिन्होंने भारत में कई आदमखोर बाघों और तेंदुओं का शिकार करके भोलेभाले ग्रामीणों को भययुक्त किया था। उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में कर्नल का पद धारण किया और उनको तात्कालिक आगरा और अवध के संयुक्त प्रांतों की सरकार द्वारा आदमखोर बाघों और तेंदुओं को मारने के लिए बुलाया जाता था।
जिम कॉर्बेट का जन्म कुमाऊं के नैनीताल शहर में ब्रिटिश परिवार में 25 जुलाई 1875 को हुआ था। वह क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट और उनकी दूसरी पत्नी मैरी जेन की आठवीं संतान थे। मैरी जेन के पहले पति आगरा के डॉ चार्ल्स जेम्स डॉयल थे, जिनकी मृत्यु 1857 के संग्राम में इटावा में हो गई थी। मैरी जेन अपने तीन बच्चों के साथ नैनीताल भाग कर जान बचाने में कामयाब रहीं। क्रिस्टोफर कॉर्बेट सैन्य सेवा से निवृत्त होने के बाद नैनीताल शहर के पोस्टमास्टर नियुक्त होकर 1862 में नैनीताल चले गए थे। उनकी पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। नैनीताल में उनकी मुलाक़ात मैरी जेन से हुई। दोनों ने शादी कर ली। उन दोनों के नौ बच्चे हुए, क्रिस्टोफर कॉर्बेट के रिश्तेदार के 1857 संग्राम में मारे गए, रिश्तेदारों के तीन बच्चे और मैरी जेन के तीन बच्चे इस प्रकार पंद्रह बच्चों के भीड़ भरे परिवार में ज़िम का उम्रदराज़ नम्बर ऊपर से चौदहवाँ था। परिवार नैनीताल में रहता था परंतु सर्दियों में तलहटी में चला जाता था, जहाँ उनके पास गाँव में “अरुंडेल” नामक एक झोपड़ी थी, जो अब कालाढुंगी के नाम से एक बड़ी बस्ती हो गई है।
1891 तक कुमांऊँ कमिश्नरी में कुमांऊँ, गढ़वाल और तराई के तीन जिले शामिल थे। उसके बाद कुमांऊँ को अल्मोड़ा व नैनीताल दो जिलों में बाँटा गया। ट्रैल, लैशिगंटन, बैटन, सर हेनरी रामसे आदि विभिन्न कमिश्नरों ने कुमांऊँ में समय-समय पर विभिन्न सुधार तथा रचनात्मक कार्य किए। जमीन का बंदोबस्त, लगान निर्धारण, न्याय व्यवस्था, शिक्षा का प्रसार, परिवहन के साधनों की उपलब्धता के कारण अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान कुमांऊँ की खूब उन्नति हुई। हेनरी रामसे के विषय में बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं- ‘उनको कुमांऊँ का बच्चा-बच्चा जानता है। वे यहाँ के लोगों से हिल-मिल गए थे। घर-घर की बातें जानते थे। पहाड़ी बोली भी बोलते थे। किसानों के घर की मंडुवे की रोटी भी खा लेते थे।’ अंग्रेजों ने शासन व्यवस्था में पर्याप्त सुधार किए, वहीं अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए कठोरतम न्याय व्यवस्था स्थापित की, जो अब नैनीताल के उच्च न्यायालय के रूप में साकार है।
मैरी जेन यूरोपीय लोगों के बीच नैनीताल के सामाजिक जीवन में बहुत प्रभावशाली महिला थीं और वह एक तरह की रियल एस्टेट एजेंट बन गईं। क्रिस्टोफर विलियम 1878 में पोस्टमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। 21 अप्रैल 1881 को दिल का दौरा पड़ने के कुछ सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। जिम तब छह वर्ष के थे और उनके सबसे बड़े भाई टॉम ने नैनीताल के पोस्टमास्टर के रूप में पदभार संभाला। बहुत कम उम्र से, जिम कालाढुंगी में अपने घर के आसपास के जंगलों और वन्य जीवन पर मोहित हो गया था। लगातार भ्रमण से उन्होंने अधिकांश जानवरों और पक्षियों को उनकी आवाज़ से पहचानना सीखा। समय के साथ वह एक अच्छा ट्रैकर और शिकारी बन गया। उन्होंने ओक ओपनिंग स्कूल में अध्ययन किया, जो नैनीताल में फिलेंडर स्मिथ कॉलेज, जिसे बाद में हैलेट वॉर स्कूल के रूप में जाना जाता है, और अब बिड़ला विद्या मंदिर, नैनीताल में विलय हो गया। उन्नीस साल की उम्र से पहले उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और बंगाल और उत्तर पश्चिम रेलवे में नौकरी कर ली। शुरू में एक ईंधन निरीक्षक के रूप में काम किया, और बाद में बिहार के मोकामा घाट पर गंगा के पार माल के ट्रांस-शिपमेंट के लिए एक ठेकेदार के रूप में काम किया। जिम कॉर्बेट ने मोकामा घाट पर रेलवे कर्मचारियों के लिए एक स्कूल शुरू किया।
अपने जीवन के दौरान जिम कॉर्बेट ने कई आदमखोर तेंदुओं और बाघों का पता लगाया और उन्हें गोली मार कर इलाक़े के बाशिंदों को डर से निजात दिलाई। लगभग एक दर्जन अच्छी तरह से प्रलेखित आदमखोर थे। कॉर्बेट ने अपनी पुस्तकों में मानव हताहतों का ब्योरा प्रदान किया है, जिसमें रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ, चंपावत टाइगर और द टेंपल टाइगर और कुमाऊं के आदमखोर शामिल हैं। ब्रिटिश और भारतीय सरकारों के रिकॉर्ड के अनुसार इन आदमखोर ने 1,200 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मार डाला था। इसलिए आदमखोरों को जीने का अधिकार नहीं था।
पहला नामित आदमखोर बाघ, चंपावत टाइगर अनुमानित 436 प्रलेखित मौतों के लिए जिम्मेदार था। 1910 में पनार तेंदुआ था, जिसने कथित तौर पर 400 लोगों को मार डाला था। 1926 में रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ था, जिसने आठ साल से अधिक समय तक बद्रीनाथ की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों को आतंकित किया, और 126 से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार बताया गया। उसके द्वारा मारे गए अन्य उल्लेखनीय आदमखोरों में तल्ला-देस आदमखोर, मोहन आदमखोर, ठक आदमखोर, मुक्तेसर आदमखोर और चौगढ़ बाघिन थे।
खतरनाक शिकारी खेल का पीछा करते हुए कॉर्बेट अकेले और पैदल शिकार करना पसंद करते थे। वह अक्सर एक छोटा कुत्ता रॉबिन के साथ शिकार करते थे, जिसके बारे में उन्होंने कुमाऊं के आदमखोरों किताब में लिखा था।
कॉर्बेट ने 1920 के दशक के अंत में अपना पहला कैमरा खरीदा और अपने दोस्त फ्रेडरिक वाल्टर चैंपियन से प्रेरित होकर सिने फिल्म पर बाघों को रिकॉर्ड करना शुरू किया। हालाँकि उन्हें जंगल का घनिष्ठ ज्ञान था, लेकिन अच्छी तस्वीरें प्राप्त करना एक कठिन काम था, क्योंकि जानवर बेहद शर्मीले थे।
उन्होंने कुमाऊं हिल्स में भारत के पहले राष्ट्रीय उद्यान, हैली नेशनल पार्क की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका नाम शुरुआत में लॉर्ड मैल्कम हैली के नाम पर रखा गया था। 323.75 किमी 2 (125.00 वर्ग मील) को कवर करने वाले हैली नेशनल पार्क के रूप में जाना जाने वाला एक आरक्षित क्षेत्र 1936 में बनाया गया था, जब सर मैल्कम हैली संयुक्त प्रांत के गवर्नर थे; और एशिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान अस्तित्व में आया। 1954-55 में रिजर्व का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क कर दिया गया और 1955-56 में इसका नाम बदलकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया। इंडोचाइनीज टाइगर का नाम जिम कॉर्बेट के नाम पर 1968 में व्रातिस्लाव माज़क द्वारा रखा गया था, जो दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले बाघ की नई उप-प्रजातियों का वर्णन करने वाले पहले व्यक्ति थे। 1968 में, बाघों की पांच शेष उप-प्रजातियों में से एक का नाम उनके नाम पर रखा गया था: पैंथेरा टाइग्रिस कॉर्बेटी, इंडोचाइनीज़ टाइगर, जिसे कॉर्बेट का बाघ भी कहा जाता है।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ऋतु वसंत…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २४
कविता – ऋतु वसंत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
=1=
क्या कविता-गीत लिखूँ तुम पर, तुम ख़ुद हो गीत-ग़ज़ल साथी
तुम कली हो तुम ख़ुद तितली हो, तुम ख़ुद हो खिला कमल साथी ll
=2=
इतना है प्रेम प्रगाढ़ मेरा, जीना तुम बिन दुश्वार मेरा
धड़कन कहती दिल भी कहता, तुम बिन हर पल है विकल साथी ll
=3=
अपना सर्वस्व न्यौछावर कर, तुम साथ निभाना सुख-दुःख में
फ़िर देखो सजा-सुसज्जित सा, अपने ख़्वाबों का महल साथी ll
=4=
शर्मो-हया के दल-दल में, देखो मैं दला सा जाता हूँ
बातें मैं न कर पाऊँगा, अब तुम ही करो पहल साथी ll
=5=
हो बहार जीवन में संगी, रहे न शिकवा-गिला कोई
हर लम्हा ख़ुशनुमा सजीला, जीवन जाए सम्हल साथी ll
=6=
जब दौर बुरा आये कोई, तब साथ मेरे रहना ऐसे
ज्यों परछाई रहती है, संग रहना तुम हर पल साथी ll
=7=
मुस्कान चाँदनी जैसी है, स्वर कोई मधुर कोकिला सा
दुनिया में चीज़ हसीं जितनी, लगती है तेरी नकल साथी ll
=8=
तुम हो सतरंगी इन्द्रधनुष, मेरे जीवन नभ-मण्डल पर
हुआ बसेरा मन में जबसे, दिल में मची हलचल साथी ll
=9=
ओझल यूँ न होना नज़र से, बस यही इल्तिज़ा है मेरी
दूर हुई तुम कुछ क्षण को भी, ये दिल न जाए मचल साथी ll
=10=
विकट क्षणों में जीवन के तुम, सदा निभाना साथ मेरा
बनना ऐसा मेरा सहारा, ज्यों ग्रंथों की रहल साथी ll
=11=
ऋतु वसंत आयी मादकमयी, रंग पर्व रंगीला
दिल निश्छल यह प्रेम अटल, यह इश्क़ रहे अव्वल साथी ll
=12=
फाल्गुन मादक मस्त अहा, रंगीला नशीला महीना
महुआ ज्यों मदमत्त होके, सब दूर करें अटकल साथी ll
=13=
जीवन क्यों बदरंग रहे, इस रंग-बिरंगी होली में
‘राजेश’ रंग दूँ गाल तेरे, तू साथ मेरे अब चल साथी ll
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कंधा और बोझ …“।)
अभी अभी # ९३६ ⇒ आलेख – कंधा और बोझ श्री प्रदीप शर्मा
हाथ जहां से शुरू होते हैं, उसे कंधा कहते हैं जितने हाथ उतने ही कंधे।
अक्सर हम जिन हाथों को मजबूत करने की बात करते हैं, वे खुद मजबूत कंधों पर आश्रित होते हैं।
अगर कंधा कमजोर हुआ, तो हाथ किसी काम का नहीं। फिल्म नया दौर में दिलीप साहब हाथ बढ़ाने की बात करते हैं। साथी हाथ बढ़ाना साथी रे। एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। यहां पूरा बोझ तो कंधों पर है, और श्रेय हाथ ले रहे हैं।
एक फिल्म आई थी जागृति। उसमें भी कुछ ऐसा ही गीत था। हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के। इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। यानी पूरा बोझ बेचारे मासूम बच्चों पर। क्या आपको उनके कंधों पर लदे भारी बस्ते का बोझ नजर नहीं आता। और पूरे देश का बोझ उन पर लादने चले हो। बच्चे की जान लोगे क्या।।
हम जब छोटे थे तो कुछ औरतों को सर पर टोकनी उठाए देखते थे। किसी में सब्जी तो किसी में बर्तन।
ये मोहल्ले में फेरी लगाती थी। बर्तन वाली औरतें घर के पुराने कपड़ों के एवज में नए घर गृहस्थी के बर्तन देती थी। एक तरह का एक्सचेंज ऑफर था यह।
कपड़े दे दो, बर्तन ले लो, पैसे दे दो, जूते ले लो, की तर्ज पर। याद कीजिए फिल्म, हम आपके हैं कौन।
ऐसी ही कोई कपड़े बर्तन वाली औरत राह चलते, हमें रोक लेती थी। बोझा जब जमीन पर होता है, तो उसे सर पर लादने के लिए किसी की मदद लेनी पड़ती है। जब वह हमसे मिन्नत करती, बेटा जरा हाथ लगा दो, बहुत भारी है, तो हम पहले आसपास देखते थे, लेकिन फिर अनिच्छा से ही सही, हाथ लगा ही देते थे। वाकई, बोझा बहुत भारी होता था। कुछ समय के लिए हम सोच में भी पड़ जाते थे, इतना वजन, यह औरत कैसे उठा लेती है, लेकिन फिर सजग हो, अपने रास्ते चल पड़ते थे। उसकी दुआ जरूर हमें सुनाई देती थी, जिसे हम भले ही अनदेखा कर देते थे, लेकिन मन में किसी को मदद की संतुष्टि का भाव फिर भी आ ही जाता था।।
किसके कंधों पर कितनी जिम्मेदारियों का और कितनी मजबूरियों का बोझ है, यह केवल वह ही जानता है। शरीर के बोझ से मन का बोझ अधिक भारी होता है, लेकिन आप मानें या ना मानें, वह बोझ भी यही कंधे ढोते रहते हैं।
किसी के झुके हुए कंधों से ही पता चल जाता है, यह बेचारा, काम के बोझ का मारा, कुछ लेते क्यों नहीं, हमदर्द का सिंकारा।
जब बच्चे थे, तो पिताजी के कंधे पर बैठकर घूमने जाते थे। बड़े खुश होते थे, हम कितने बड़े हो गए हैं। जब असल में बड़े हुए तो असलियत पता चली, हमारे कंधों पर कितना बोझ है।।
चलो रे, डोली उठाओ कहार, पीया मिलन की रुत आई। लेकिन आजकल कहां कहार भी डोली उठाते हैं। चार पहियों की चमचमाती कार से, ब्यूटी पार्लर से सज धजकर आई दुल्हन, विवाह मंडप में प्रवेश करती है। कंधों से अधिक, कानों पर डायमंड इयररिंग्स का बोझ।
जमाना कितना भी आगे बढ़ जाए, जब इंसान यह संसार छोड़ता है तो चार कंधों की अर्थी पर ही जाना पड़ता है। यानी जन्म से अंतिम समय तक कंधे का साथ नहीं छूटता। अर्थी का बोझ भी मजबूत कंधे ही उठा पाते हैं। हमने तो जिधर भी कंधा लगाया है, अर्थी उधर ही झुकी है। कहीं से लपककर मजबूत कंधे आते हैं, और अर्थी से अधिक हमें राहत महसूस होती है। ईश्वर ना करे, हमें कभी किसी को कंधा देना पड़े, बोझ के मारे, हमारा कंधा उतर भी सकता है।।
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – इस दुनियाँ में…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६० ☆
☆ इस दुनियाँ में… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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इस दुनियाँ में सबसे सुन्दर अनुपम भारत देश है
अपने में अपना सा प्यारा इसका हर परिवेश है ।।
इस दुनियाँ में…
पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण बिखरा अति सौंदर्य है
वन, मरूथल, पर्वत, नदियों मंदिरों में भी आश्चर्य है
प्राकृत सुषमा, हरे भरे खेतों में अजब मिठास है
हर प्रदेश का खान-पान कुछ भिन्न है, मोहक वेश है || 1 ||
इस दुनियाँ में…
उत्तर, ओड़ीसा, कर्नाटक अलग नृत्य संगीत है
खान पान जीवन पद्धति में सबकी अपनी रीति है
फिर भी सब हैं सरल भारतीय, संस्कृति अनुपम एक सी
गंगोत्री से रामेश्वर तक धार्मिक भाव विशेष है || 2 ||
इस दुनियाँ में…
राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत हर मन की पावन चाह है
प्रगति हिमालय सी संवृद्धि हो जैसे सिन्धु अथाह है
जीवन सबका निर्मल मन पावन हो कर्मठ भावना
भारत का युग युग से “बंधुता’ प्रेम रहा संदेश है ||3||
☆ प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को पांचवां सविता कथा सम्मान – अभिनंदन ☆
सविता कथा सम्मान का यह पांचवां वर्ष है। इसे प्रतिवर्ष चयनित महिला कथाकार को दिया जाता है। इसे श्रीमती सविता दानी की स्मृति में प्रारंभ किया गया है। यह देश का विशिष्ट सम्मान है। इस वर्ष इसे प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को दिया जा रहा है। सोनी पांडेय आजमगढ उत्तर प्रदेश में निवास करती हैं।
अन्विति पत्रिका, पहल और सविता कथा सम्मान आयोजन समिति के द्वारा आयोजित यह सम्मान समारोह आज 7 मार्च 2026 को संध्या 7 बजे डा हीरालाल कला वीथिका, रानी दुर्गावती संग्रहालय, भंवरताल जबलपुर में संपन्न होगा। प्रसिद्ध शिल्पकार व लेखिका शम्पा शाह, भोपाल यह पुरस्कार प्रदान करेंगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवियत्री सविता भार्गव करेंगी। कार्यक्रम का संचालन कथाकार श्रद्धा श्रीवास्तव करेंगी।
जबलपुर शहर के इस प्रतिष्ठा आयोजन में आप सादर आमंत्रित हैं। कृपया अवश्य पधारें। कार्यक्रम में शामिल होने का आग्रह राजेन्द्र दानी, शरद उपाध्याय, योगेन्द्र श्रीवास्तव, विवेक चतुर्वेदी, कुंदन सिद्धार्थ, हिमांशु राय व सभी साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं ने किया है।
ई- अभिव्यक्ति परिवार की ओर से कथाकार सोनी पांडेय जी को इस विशिष्ट उप्लब्धि के लिए हार्दिक बधाई
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈