☆ तसंच जाऊ नको..! लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती : श्री मिलिंद जांबोटकर☆
आपले संस्कार, आपली संस्कृती.
घरी आलेल्या कुणालाही ‘तसंच’ पाठवायचं नाही आणि आपण कुणाकडे जाताना ही ‘तसंच’ जायचं नाही हा आमच्या घरचा शिरस्ता!
या ‘तसंच’मध्ये जगभरचा पाहुणचार सामावलेला होता.
माझे कुणी मित्रमैत्रीण ठरवून आले की बटाटेवडे कर, अचानक आले तर त्यांच्या आवडीचा गोडाचा शिरा नाहीतर सांजा कर.. अगदीच वेळ नसेल तरी धडपडत उठून किमान “सफरचंदाची एक फोड तरी खा” म्हणत ती हातावर दे.
आई-बाबांचे ऑफिसमधले कुणी पाहुणे आले तर किमान चहा तरी कर.
नातेवाईकांपैकी कुणी येणार असेल तर खास आवडी-निवडी जप हे सारं कसे अध्याहृतच होतं.
हे सगळं करताना आई-आजीच्या चेहऱ्यावर कधी आठी यायची नाही, कधीही श्रम दिसायचे नाहीत, आणि त्यांचं स्मितहास्य पण लोपायचं नाही… इतकं ते सारं अगदी सहज होतं! सहज होतं म्हणूनही ते सुंदरपण होतं!
पाहुण्यांसाठी असलेल्या ह्या नियमाला एक पोटनियमही होता. आपल्याच घरातून निघतानाही ‘तसंच’ निघायचं नाही. घरातल्या सर्व माणसांसाठीही एक उपनियम होताच!
सकाळचा चहा पिऊन झालेला असला तरी, “‘तशीच’ जाऊ नको ग कॉलेजला! ” असं म्हणत आजी तूपसाखर लावलेली एक पोळी घेऊन माझ्या मागे उभी असायचीच.
मनसुखानी नावाचा प्रोफेसर त्यावेळी आम्हां मुलींमध्ये भारीच फेमस होता. आमच्या गप्पांतून आजीला हे कळलं असावं. आणि मग..
“आजी, उशीर होतोय ग.. नकोय मला.. मी जाते तशीच, ” असं म्हणण्याचा अवकाश…
ती त्या मनसुखानीच्या नावाने बोटं मोडायची.
“त्या मनसुखानीला म्हणावं एवढी पोळी खाल्ल्याशिवाय माझी आजी काही मला ‘तशीच’ सोडत नसते. बाकी तू तुझं बघ, ” असा तिचा राग उफाळून यायचा पण घरातून निघताना ‘तसंच’ जायचं नाही हा तिचा नियम आम्हाला पाळायलाच लागायचा.
आपण कुणाकडे जातानाही ‘तसंच’ जायचं नाही हा या सगळ्याचा व्यत्यास.. तोही तितकाच खरा होता. आत्याकडे जाताना खास ठेवणीतल्या लोणच्याची बाटली भरली जायची. मावशीला आवडतात म्हणून घारगे व्हायचे.. एक ना दोन! यातलं काहीच नाही जमलं आणि अचानक कुणाकडे जावं लागलं तर जाता जाता द्राक्षं घे.. चिकू घे, असलं काही न काही त्या करायच्या.
हे सगळे सोपस्कार आई-आजी पाळायच्या इथपर्यंत ठीक! पण मी माझ्या शाळा-कॉलेजच्या वयात काही कामासाठी कोणाकडे एकटीच जातेय तरी या ‘तशीच’ जाऊ नको गं, म्हणायच्या आणि मग मात्र माझी चिडचिड व्हायची. मी कधी ऐकायचे, पण अनेकदा त्या-त्या वयातल्या न ऐकण्याच्या नादात ‘तशीच’ निघून जायचे. लहान आहे.. मोठी होईल तेव्हा कळेल, असं म्हणून सोडूनही द्यायच्या!
एकदाच आजीने या चिडचिडीवरचा उतारा केला.
मला म्हणाली, “कपभर चहाही न देता कुणाला ‘तसंच’ पाठवशील किंवा रिकाम्या हाताने कोणाकडे जाशील.. तर आपल्या घरातलं काही जाणार नाही.. पण पत मात्र जाईल. ज्याला ऐपत आहे, त्याने आपली पत सांभाळावी. ”
आजही माझ्या आणि माझ्यासारख्या अनेक घरातून ‘तसंच’ कुणी जात नाही. आणि आपणही ‘तसंच’ कुणाकडे जात नाही.
काय करणार..?
आजीचे नाते सांगणारी मौल्यवान विद्यापीठं शब्द पेरून आपल्या आसपासच वावरत असतात ना.
☆
लेखक : अज्ञात
प्रस्तुती: श्री मिलिंद जांबोटकर
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित। पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता जमीन से जुड़ा।
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ शिक्षक की असली पहचान: अंक नहीं, आत्मविश्वास ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
☆
परिणाम घोषित होने के बाद पूरी कक्षा में हलचल थी। कोई अपने नब्बे प्रतिशत पर खुश था, कोई एक-दो अंकों के लिए उदास।
पीछे की सीट पर बैठा अर्जुन अपनी उत्तर-पुस्तिका बंद किए चुप था।
शिक्षिका उसके पास आईं और बोलीं, “क्या हुआ?”
“मैम, सिर्फ़ 52 आए हैं। मुझसे नहीं होगा।”
शिक्षिका ने उत्तर-पुस्तिका खोली, कुछ उत्तर देखे और मुस्कुराईं, “52 अंक यह बताते हैं कि इस बार कहाँ कमी रह गई। यह नहीं बताते कि तुम कहाँ तक जा सकते हो।”
अर्जुन ने पहली बार उनकी ओर देखा।
“लेकिन मैम, सब मुझसे आगे हैं।”
शिक्षिका ने कहा, “तुम्हारी दौड़ उनसे नहीं है। अगली बार बस आज वाले अर्जुन से थोड़ा आगे निकलना।”
वर्षों बाद उसी छात्र ने एक समारोह में उनसे मिलकर कहा—
“मैम, उस दिन आपने मेरे अंक नहीं बदले थे… आपने मेरे बारे में मेरी सोच बदल दी थी।”
शायद शिक्षक की सबसे बड़ी सफलता इसी एक वाक्य में छिपी है।
हर वर्ष शिक्षक दिवस पर फूल, संदेश और शुभकामनाएँ शिक्षकों तक पहुँचती हैं। लेकिन यह दिन केवल सम्मान का अवसर नहीं, बल्कि एक गहरा आत्ममंथन भी है- क्या हम विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए तैयार कर रहे हैं, या जीवन के लिए भी?
आज जानकारी की कमी नहीं है। पुस्तकें हैं, इंटरनेट है, वीडियो हैं और कुछ ही क्षणों में किसी भी विषय पर उत्तर मिल सकता है। इसलिए शिक्षक की भूमिका अब केवल जानकारी देने वाले व्यक्ति की नहीं रही। उसका असली काम है-विद्यार्थी को सोचना सिखाना, प्रश्न पूछने का साहस देना और असफलता के बाद भी स्वयं पर विश्वास बनाए रखना सिखाना।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था—“सच्चे शिक्षक वे हैं, जो हमें अपने लिए सोचने में सहायता करते हैं।”
हर कक्षा में प्रतिभा एक जैसी दिखाई नहीं देती। कोई बच्चा तुरंत उत्तर देता है, कोई धीरे समझता है। कोई मंच पर सहज बोलता है, कोई उत्तर जानते हुए भी हाथ उठाने से डरता है। कई बार सबसे अधिक जरूरत उसी बच्चे को होती है, जो चुपचाप पीछे बैठा है और मन ही मन यह मान चुका है कि वह दूसरों जितना अच्छा नहीं है।
यहीं शिक्षक की संवेदनशीलता की परीक्षा होती है।
एक वाक्य-
“तुमसे नहीं होगा”
किसी बच्चे के भीतर वर्षों तक बैठ सकता है।
और एक दूसरा वाक्य-
“अभी नहीं हुआ, लेकिन तुम सीख सकते हो”
उसी बच्चे की दिशा बदल सकता है।
शिक्षक शायद अगले दिन वह बात भूल जाए, लेकिन विद्यार्थी उसे जीवन भर याद रख सकता है।
इसीलिए शिक्षक की शक्ति केवल विषय के ज्ञान में नहीं, उसके शब्दों के चयन में भी होती है।
विद्यार्थी वर्षों बाद शायद यह भूल जाए कि किस अध्याय में कौन-सा सूत्र था, लेकिन उसे याद रहता है कि गलती करने पर शिक्षक ने उसे पूरी कक्षा के सामने शर्मिंदा किया था या अलग बुलाकर समझाया था। उसे यह भी याद रहता है कि असफल होने पर किसी ने उसकी क्षमता पर प्रश्न उठाया था या उसके भीतर फिर कोशिश करने की हिम्मत जगाई थी।
कई बार शिक्षक अनजाने में विद्यार्थी की भीतरी आवाज़ बन जाता है।
जीवन की किसी मुश्किल घड़ी में वही आवाज़ भीतर से कहती है-
“एक बार और कोशिश करो।”
“गलती अंत नहीं है।”
“तुम सीख सकते हो।”
“तुम्हारी एक असफलता तुम्हारी पूरी पहचान नहीं है।”
शिक्षक का काम आसान नहीं है। पाठ्यक्रम, परीक्षाएँ, परिणाम, प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ और हर विद्यार्थी की अलग गति—इन सबके बीच स्वयं शिक्षक भी थकता है। लेकिन शायद शिक्षक दिवस उसे यही याद दिलाता है कि उसकी मेहनत का पूरा मूल्य केवल परिणाम-पत्र में नहीं दिखता।
किसी बच्चे ने पहली बार मंच पर बोलना शुरू किया।
किसी ने असफलता के बाद पढ़ाई नहीं छोड़ी।
किसी ने तुलना से बाहर निकलकर अपनी क्षमता पहचानी।
किसी ने केवल सफल पेशेवर नहीं, अच्छा इंसान बनने की कोशिश की।
इन सबमें कहीं न कहीं शिक्षक की छाप होती है।
इसलिए शायद हर शिक्षक को कभी-कभी स्वयं से पूछना चाहिए—
क्या मेरी कक्षा में बच्चे गलती करने से डरते हैं या सीखने के लिए तैयार रहते हैं?
क्या मैं केवल अच्छे अंक लाने वालों को पहचानता हूँ, या उस विद्यार्थी को भी देखता हूँ जो अंदर ही अंदर हार मान रहा है?
और सबसे महत्वपूर्ण-
मेरे विद्यार्थी मेरी कक्षा से केवल अंक लेकर निकलते हैं, या अपने भीतर थोड़ा अधिक विश्वास लेकर भी?
क्योंकि शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके कितने विद्यार्थियों ने सौ में सौ अंक पाए।
उसकी असली पहचान शायद उस विद्यार्थी में होती है जो वर्षों बाद लौटकर कहता है—
“जब मुझे खुद पर भरोसा नहीं था, तब आपने मुझे भरोसा करना सिखाया था।”
ज्ञान रास्ता दिखाता है।
लेकिन आत्मविश्वास उस रास्ते पर चलने का साहस देता है।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – त्रिशंकु…
स्थितियाँ हैं कि
जीने नहीं देती और
जिजीविषा है कि
मरने नहीं देती..,
सुनो सत्यव्रत!
अपवाद भी
कालांतर में,
परंपरा सिद्ध हुए,
जगत में
तुम अकेले
त्रिशंकु नहीं हुए!
(राजा सत्यव्रत के हठ के चलते महर्षि विश्वामित्र ने उसे सदेह स्वर्ग भेजने का यत्न किया था। इंद्र ने उसे नीचे ढकेल दिया पर कुपित विश्वामित्र ने धरती पर गिरने नहीं दिया। मान्यता है कि सत्यव्रत औंधा होकर निराधार लटका रहा और त्रिशंकु कहलाया।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
शुक्रवार दि. 4 सितंबर (जन्माष्टमी) से गुरुवार 10 सितंबर तक गोविंद साधना संपन्न होगी।
‘गोविंद साधना’ का जाप मंत्र होगा- ॐ कृष्णाय नमः.।। इसके साथ ही मधुराष्टकम् का पाठ करेंगे।
आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
Heritage ~ A DREAM SET SAILS…~
☆
We’re happy to inform that yesterday, on the timeless, sacred Ganga at Varanasi, a dream finally touched the waters… Our ship MV RAGHUVANSH was launched. What began as an idea has now taken shape in steel—and found its way to the river. From imagination to creation… from a dream to a ship… from a ship to a journey. And this is only the beginning… The dream has not ended… it has only begun to sail— hopefully, with many siblings to follow, upon the timeless, sacred Ganga… and many more waterbodies…!
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय संस्मरण – “प्रार्थना कक्ष की दीवारे सर्व धर्मी – इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२९ ☆
संस्मरण – प्रार्थना कक्ष की दीवारे सर्व धर्मी – इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
हैरो, लंदन का इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर एक स्थान, जिस भवन में आज आरती होती है, मंत्र गूँजते हैं, दीप जलते हैं और भारतीय संस्कृति से जुड़े आयोजन होते हैं, वहाँ कभी Baptist चर्च था, बाद में वह भवन Salvation Army का आराधना स्थल भी रहा। आज यही स्थान सिद्धाश्रम का मंदिर और सामुदायिक केंद्र है।
इस धार्मिक वैभिन्य के इतिहास में कोई धार्मिक टकराव नहीं दिखाई दिया। लगा प्रार्थना कक्ष की दीवारों का धर्म मानवीयता ही होता है। धर्म मनुष्य के मन में होता है, ईंट पत्थर में नहीं।
एक ही छत ने अलग-अलग समय में अलग-अलग आस्था के लोगों की प्रार्थनाएँ सुनीं। भाषा बदली, पूजा की विधि बदली, आस्था की अभिव्यक्ति बदली, लेकिन प्रार्थना में उस अदृश्य परम शक्ति से तादात्म्य स्थापित करने की मनुष्य की वही तलाश बनी रही।
यही बात भारत के संदर्भ में भी सोचने को विवश करती है। हम कभी-कभी धर्मस्थलों की दीवारों के नीचे दबे इतिहास को खोजते-खोजते वर्तमान की शांति से बहुत दूर निकल जाते हैं। कौन-सा भवन पहले क्या था, किसका था और किसने क्या बनाया, ये प्रश्न इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें वर्तमान के वैमनस्य का कारण बनना चाहिए? हमें इन्हें अदालतों में हल करना पड़ रहा है!
लंदन में यह भवन उसी तरह के इतिहास का एक शांत उत्तर देता दिखाई देता है। किसी ने अतीत को मिटाकर वर्तमान नहीं बनाया , वर्तमान ने अतीत को अपने भीतर समेट लिया।
लंदन की बहुधार्मिक समभावी संस्कृति का यह पक्ष मुझे विशेष रूप से आत्मीय लगा। अपनी आस्था को पूरी श्रद्धा से जीना और दूसरे की आस्था के लिए भी स्थान छोड़ना।
सिद्धाश्रम की गतिविधियाँ भी पूजा तक सीमित नहीं, समुदाय और मानवता की सेवा से जुड़ी हुई हैं।
हमारे यहाँ भी तो प्रार्थना का मूल भाव है, सर्वे भवन्तु सुखिनः। फिर धर्म की आत्मा से अधिक उसकी जमीन, दीवार और इतिहास के स्वामित्व को लेकर, प्रतिक्रिया में लोग इतने बेचैन क्यों हो जाते हैं?
जिस स्थान पर आज कोई आरती कर रहा है, वहाँ कल किसी और ने प्रार्थना की थी, तो क्या ईश्वर कल वहाँ कम थे और आज अधिक हैं? शायद नहीं।
ईश्वर नहीं , केवल भक्तों के उन्हें पूजने के रास्ते बदलते है।
सिद्धाश्रम के इस भवन के इतिहास ने यही छोटी-सी, लेकिन गहरी बात सिखाई। आस्था को मन में रखिए, इतिहास को इतिहास में और वर्तमान को प्रेम से जीना ही पूजा है। इसी को सह-अस्तित्व कहते हैं।
22 Palmerston Road, मंदिर से लौटते हुए लगा कि इस भवन में आज दैदीप्य भारतीय संस्कृति का दीप केवल सनातन आस्था का दीप नहीं है। वह उन तमाम प्रार्थनाओं की निरंतरता का दीप है, जिन्हें इन दीवारों ने वर्षों से अपने भीतर सँजोया है।
मंदिर-मस्जिद-गिरजे बदलते रहते हैं,
प्रार्थना करने वाला मन वही रहता है।
इस इतिहास को समझने के उपरांत हैरो , लंदन के इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर में 5 सितंबर की शाम कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद लौटते हुए वह शाम मेरे लिए लंदन में इतिहास, आस्था और सह-अस्तित्व को एक ही छत के नीचे देखने की शाम थी।
फिर मिलूँगा, लंदन की किसी ऐसी ही कहानी के साथ, जिसे सबने देखा है, पर शायद अनदेखा कर दिया है।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – मुख्य अतिथि का भाषण।)
☆ चुभते तीर # १३४ – व्यंग्य – मुख्य अतिथि का भाषण☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
शास्त्री नगर की ‘साहित्य कला परिषद’ का वार्षिक उत्सव बिना किसी रोड़े के पूरा हो जाए, ऐसा होना सूरज के पश्चिम से निकलने जैसा असंभव था। इस बार का मुख्य आकर्षण थे प्रसिद्ध लेखक और विचारक डॉ. पी. एन. त्रिपाठी, जिन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। त्रिपाठी जी का एक ही असूल था—भाषण जितना लंबा और उबाऊ होगा, उनकी विद्वत्ता उतनी ही गहरी मानी जाएगी।
सभागार खचाखच भरा हुआ था। पहली पंक्ति में बैठे संस्था के अध्यक्ष गुप्ता जी बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे। शाम के सात बज चुके थे, और आयोजकों को डर था कि अगर भाषण आठ बजे से आगे खिंचा, तो पूरा हॉल खाली हो जाएगा क्योंकि पास के मैरिज हॉल में मुफ़्त का शाही भोजन तैयार हो रहा था।
त्रिपाठी जी मंच पर आए। उन्होंने अपने भारी-भरकम चश्मे को नाक पर टिकाया, कागजों का एक मोटा पुलिंदा मेज़ पर रखा और बोलना शुरू किया। विषय था: ‘आधुनिक समाज में नैतिक मूल्यों की गिरती हुई दीवारें और हमारी वैचारिक जिम्मेदारी’।
शुरुआती पंद्रह मिनट में ही ऑडिटोरियम में बैठे आधे लोगों की पलकें भारी होने लगीं। बीस मिनट बीतते-बीतते पीछे की पंक्ति के दो सदस्य गहरी नींद में खर्राटे लेने लगे। गुप्ता जी ने मंच के कोने में खड़े सचिव को इशारा किया कि किसी तरह भाषण समेटा जाए।
सचिव ने हिम्मत करके एक छोटी सी पर्ची पर लिखा—’सर, समय कम है, कृपया अंतिम निष्कर्ष पर आएं’—और उसे बड़ी चालाकी से पानी के गिलास के नीचे सरका दिया।
त्रिपाठी जी ने गिलास उठाया, पर्ची देखी, चश्मा ठीक किया और ज़ोर से बोले, “हमारे अध्यक्ष जी ने मुझे याद दिलाया है कि समय सीमा समाप्त हो रही है। लेकिन क्या विचार कभी समय के पाबंद हो सकते हैं? नहीं! इसलिए मैं अपने भाषण का दूसरा भाग प्रस्तुत करने जा रहा हूँ!”
यह सुनते ही दर्शकों के बीच एक ठंडी सी हरकत हुई। कई लोग उठकर भागने की ताक में दरवाज़े की तरफ देखने लगे। गुप्ता जी का पसीना छूटने लगा। अगर मेहमान भाग गए, तो अगले साल का चंदा डूब जाएगा।
तभी बिजली अचानक गोल हो गई। पूरा हॉल अंधेरे में डूब गया।
लोग राहत की सांस लेने ही वाले थे कि त्रिपाठी जी की गर्जती हुई आवाज़ गूंजी, “अंधेरा मेरे विचारों की रोशनी को नहीं रोक सकता! मैं बिना माइक के भी जारी रखूँगा!” और वे अंधेरे में ही अपने कागज़ पढ़ने लगे।
तभी पीछे के दरवाज़े से एक छोटे बच्चे की मासूम आवाज़ गूंजी, “पापा! बाहर शाही पनीर और गुलाब जामुन खत्म हो रहे हैं, कैटरिंग वाले कह रहे हैं कि सिर्फ़ दस प्लेट बची हैं!”
फिर क्या था! बिजली आने से पहले ही पूरे हॉल में ऐसी भगदड़ मची कि पंद्रह सेकंड के अंदर पूरी जनता ऑडिटोरियम से बाहर मैरिज हॉल की तरफ दौड़ पड़ी। जब तीन मिनट बाद जनरेटर चालू हुआ, तो मंच पर केवल त्रिपाठी जी खड़े थे और सामने पूरे हॉल में सिर्फ़ खाली कुर्सियाँ उनका इंतज़ार कर रही थीं।
त्रिपाठी जी ने खाली हॉल की तरफ देखा, मुस्कराए और पानी का घूंट पीकर बोले, “देखा गुप्ता जी? मेरे भाषण का प्रभाव इतना तीव्र था कि लोग सत्य की खोज में तुरंत क्रियाशील हो गए!”
पीछे छुपे गुप्ता जी ने बाहर आकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाना शुरू कर दिया, यह सोचते हुए कि कम से कम गुलाब जामुन बचाने का विचार एकदम सटीक निकला।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मा मू…“।)
अभी अभी # १०८८ ⇒ आलेख – मा मू श्री प्रदीप शर्मा
नाम बड़े और दर्शन खोटे!
मामू में ऐसा कुछ नहीं था, वह एक साधारण इंसान था, जो अपने नाम के अनुरूप उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुका था, जहां उसे मामू कहकर ही पुकारा जा सकता था।
गेहूंआ रंग, दमकता चेहरा, आधा सपाट और आधे सर पर, मिले जुले काले सफेद बाल, दोहरा, औसत कद काठी का कसरती बदन, आंखों में अनुभव की चमक, बस एक नज़र में यही उसकी पहचान थी।
मेरे पूर्व निवास ४४, नारायण बाग के गृह स्वामी के यहां उसका आना जाना था। बैंक, सरकारी दफ्तर और कार्यालयों के अधिकारियों के घरों में उसकी हैसियत एक प्लंबर कम इलेक्ट्रीशियन कम कारपेंटर की थी। उसे घर अथवा दफ्तर की मरम्मत का कोई भी कार्य निश्चिंत होकर सौंपा जा सकता था। जानकार लोगों की निगाह में मामू एक ऐसे हरफन मौला इंसान का नाम था, जो आपका कोई भी काम जिम्मेदारी के साथ पूरा करने की क्षमता रखता था।।
मामू कोई अलादीन का चिराग तो था नहीं, कि घिसा और हाजिर, लेकिन बिजली के उपकरण फ्रिज, मिक्सर, पानी की मोटर, फ्यूज, और शॉर्ट सर्किट के अलावा घर की मरम्मत, और रंग रोगन में भी उसी को हाजिर होना पड़ता था। छोटी मोटी तोड़फोड़ और कारीगरी में भी वह उस्ताद था। मजदूरों को लाना, मोलभाव करना और उनकी निगरानी का दायित्व भी वह स्वेच्छा से ही उठाता था।
मामू पर घर के हर सदस्य का अधिकार था, क्योंकि मामू भी एक तरह से हमारे घर का ही सदस्य जो हो गया था। फुर्सत में बातों बातों में इंसान जब खुलता है तो उसकी खूबियां भी उजागर होती है। मामू B.Sc. पास आउट था, और अपने जमाने का एक अच्छा फुटबॉल खिलाड़ी था। बीड़ी, सिगरेट, पान गुटका और शराब जैसे व्यसनों से कोसों दूर, एक औसत मुस्लिम परिवार का होते हुए भी उसने अपने एक लड़के को सॉफ्टवेयर इंजिनियर और एक को वकालात के काबिल बनाया।।
मामू, जब तुम्हारे बच्चे इतने काबिल हैं, फिर तुम्हें क्यों अब इस तरह काम करना पड़ता है, जैसे प्रश्नों का उसके पास एक ही जवाब होता था, ऊपर वाले ने हाथ पांव काम करने के लिए दिए हैं। अपना काम तो सभी करते हैं। दूसरों के काम तो केवल खुशनसीब ही आते हैं। इतनी बड़ी दुनिया अब मेरा परिवार हो गया है। आप सबकी समस्या, मुझे अपनी समस्या लगती है।
बस पांव उठ जाते हैं और मैं चला आता हूं। Work is worship! काम ही मेरे लिए इबादत है।
सब दिन समान नहीं होते।
मामू को घुटनों की समस्या हो गई। आंखों में भी अब वह रोशनी नहीं रही। हमारा भी वह आशियाना छूट गया। इल्म और ईमान जहां मिल जाते हैं, वहीं एक इंसान पैदा हो जाता है। हम सबके जीवन में भी मामू, बाबू भाई और जफर भाई जैसे इंसान आते रहते हैं। कौन कहता है दुनिया में अच्छे लोग नहीं, अच्छाई नहीं। आज भी हर कारीगर में मेरी आंखें मामू को तलाशती हैं, लेकिन ऊपर वाला एक जैसे दो इंसान कहां बनाता है। कामयाब इंसान तो बहुत देखे, लेकिन मामू जैसा नेकदिल, ईमानदार इंसान नहीं देखा।।