(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सॉनेट – आशा ताई।)
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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“गेहूँ के साथ घुन पिसता है” आपने अक्सर सुना होगा। इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच जारी घमासान युद्ध में विश्व भर में यह कथन सार्थक हुआ। नष्ट हुए तेल ठिकानों, अवरुद्ध आपूर्ति मार्गों ने न सिर्फ तेल और गैस के दाम विश्व भर के देशों में बढ़ा दिए हैं वरन चिंताजनक कमी पैदा कर दी। यद्यपि फिलहाल युद्ध विराम हो गया है पर युद्ध के बादल अभी छंटे नहीं हैं। युद्ध में बुरे फंसे ट्रंप को अपमानित कराकर आखिर “कम्बल ने उन्हें छोड़ दिया” फिर भी अगले पल वे क्या करेंगे, उन्हें खुद भी नहीं पता, कह नहीं सकते कि कब वे फिर से “कम्बल पकड़ लें”। युद्ध के परिणाम कहीं साइकिल और चूल्हा युग के दर्शनों से वंचित, पैदल चलने से परहेज करने वाली नई पीढ़ी को इसका अनुभव न करा दें। आरोप – प्रत्यारोप के साथ – साथ “तू तू – मैं मैं” की पक्ष – विपक्ष की राजनीतिक बयानबाजियों, हुल्लड़, प्रदर्शनों से तो सभी परिचित हैं। विपक्ष तो सदा ही सरकार को कमजोर, अदूरदर्शी, नाकाम साबित करने के लिए मुद्दों और अवसरों की तलाश में लगा रहता है। यद्यपि हमारे देश की सरकार काफी समय से चीख – चीख कर कह रही थी कि अभी हमारे सामने पेट्रोल, डीजल का संकट नहीं है और अब तो युद्ध विराम भी हो गया है, गैस की थोड़ी समस्या है किंतु इसके समाधान के प्रयत्न भी जारी हैं। पर जो सरकार की बात सुन और समझ कर जनता को भी समझाए क्या आप उसे विपक्ष कहेंगे ? विपक्ष सरकार को नकारा साबित करने निरंतर अपने कदम कठोर करता जा रहा है, सरकार ने इस समस्या से निपटने पहले कदम, फिर कठोर कदम और अति कठोर कदम उठाना शुरू कर दिए हैं।
गैस सिलेंडर प्राप्त करने के लिए गृहणियां अपने – अपने पतियों – पुत्रों से गैस एजेंसियों की ओर कदम उठाने और वहां पहुंचकर जब तक गैस न मिले अंगद की तरह पैर जमाए रखने की हिदायत दे रही हैं। लोगों का सूर्योदय – सूर्यास्त गैस एजेंसियों के समक्ष लगी लाइन में हो रहा है। कुछ अच्छी पत्नियां तो गैस की लाइन में लगे अपने पति को टिफिन पहुंचाते हुए भी देखी गईं। सरकार तेल और गैस के लिए लगी लाइनें देख कर चिंतित होती रही है और विपक्ष खुशियां मनाता रहा, विपक्ष चाह रहा था कि लाइन बढ़ती जाएं, लोगों में टकराव शुरू हो। डीजल – पेट्रोल पंपों में भी उपभोक्ताओं को जरूरत से ज्यादा तेल लेने प्रयासरत देखा गया। जो इसमें सफल हो जाता उसकी खुशी देखते ही बनती। विपक्ष गैस, डीजल – पेट्रोल की किल्लत का ठीकरा सरकार पर फोड़ रहा है। उसका कहना है कि सरकार के मुखिया ट्रंप के चमचे हैं वे ईंधन की आपूर्ति के लिए प्रयास करने की जगह घुइयां छील रहे हैं।
टीवी चैनलों में डिवेट जारी है। सरकार और विपक्ष के प्रतिनिधि एक दूसरे का चीर हरण कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह परिस्थितियों से निपट रही है, उसके पास 2 माह का पर्याप्त स्टॉक है और कच्चे तेल के जहाज आ रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार का झूठ बताता रहा। उसका कहना है कि ऐसा है तो गैस, पेट्रोल के लिए लंबी कतारें क्यों लगी ? इसके विपरीत सरकार का कहना है कि पेट्रोल, डीजल, गैस की कमी की अफवाह फैलाकर लोगों की लाइन लगवाने का काम विपक्ष ने किया। जनता उलझन में है कि किसकी बात को सही माने ! कुछ लोगों का कहना है कि सरकार 5 राज्यों के होने वाले चुनावों तक रुकी है फिर देश में तेल और गैस की मारा मारी भी होगी और दाम भी बढ़ेंगे। सरकार तो सरकार है क्या नहीं कर सकती। कुछ लोग कह रहे हैं कि यदि हम थाली, घंटा बजाकर, दिया और टॉर्च जलाकर कोरोना को भगा सकते हैं तो हमें अमेरिका, इजरायल, ईरान का युद्ध परमानेंट रुकवाने के लिए भी इसी तरह के कुछ प्रयोग करना चाहिए। आश्चर्य है, जिन लोगों को दीवाली के पटाखों से प्रदूषण का खतरा नजर आता था, पृथ्वी की ओज़ोन परत फटती नजर आती थी, जो पटाखों की मनाही के लिए देश – विदेश में हाहाकार मचाने लगते थे वे सब ईरान, इजरायल, अमेरिका के आतिशी युद्ध पर मौन रहे। एक बात और बता दूं मेरे पड़ोसी वर्मा जी जब – तब मेरे पास आकर मुझसे युद्ध रुकवाने का आग्रह करते रहे, कहते थे आप पत्रकार हैं, सक्षम हैं, आपको इस सिलसिले में मोदी जी से बात करना चाहिए। अच्छा हुआ युद्ध विराम हो गया, ट्रंप कम्बल से छूटे, हमारी सरकार को राहत मिली, विपक्ष नए मुद्दे की तलाश में लग गया और वर्मा जी ने भी मेरा पीछा छोड़ा।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डिजिटल उपवास।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९० – व्यंग्य – डिजिटल उपवास☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
धरमपुरा गांव के स्वघोषित समाजशास्त्री ‘फरेब सिंह’ ने जब प्रधानी के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश की, तो उन्होंने गांव वालों को एक नया और डरावना सपना दिखाया—’डिजिटल नरक’। फरेब सिंह का चुनावी घोषणापत्र किसी धार्मिक ग्रंथ और सॉफ्टवेयर मैनुअल का मिला-जुला खिचड़ी था। उन्होंने तर्क दिया कि गांव की बदहाली का कारण सड़कें नहीं, बल्कि मोबाइल के भीतर बैठा वह ‘अदृश्य राक्षस’ है जो सबका डेटा और पुण्य एक साथ चबा रहा है। उन्होंने वादा किया कि जीतते ही वे पूरे गांव में ‘डेटा-जामर’ लगवाएंगे और हर ग्रामीण को एक ‘एनालॉग शांति कार्ड’ देंगे। उनका दावा था कि जो उन्हें वोट देगा, उसके स्मार्टफोन से निकलने वाली ‘नेगेटिव ऊर्जा’ को वे एक विशेष सरकारी फिल्टर के जरिए बिजली में बदल देंगे, जिससे गांव के मंदिर की लाइटें मुफ्त में जलेंगी। गांव के लोग, जो रील बनाने और देखने के चक्कर में अपनी फसल और अक्ल दोनों गंवा रहे थे, अचानक ‘डिजिटल वैराग्य’ के इस क्रांतिकारी विचार पर लट्टू हो गए।
प्रचार के अंतिम सप्ताह में फरेब सिंह ने गांव के तालाब के पास एक ‘सोशल मीडिया विसर्जन कुंड’ बनवाया। यह वास्तव में एक गहरा गड्ढा था जिसके चारों ओर टूटे हुए कंप्यूटर के कीबोर्ड और माउस लटकाए गए थे। उन्होंने घोषणा की कि जो भी ग्रामीण अपनी ‘फेसबुक की बुराइयां’ और ‘व्हाट्सएप के झूठ’ इस कुंड में मानसिक रूप से विसर्जित कर फरेब सिंह को वोट देने का संकल्प लेगा, उसका अगला सात जन्म तक किसी भी ‘स्कैम कॉल’ या ‘लोन मैसेज’ से पाला नहीं पड़ेगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘गपोड़ी लाल’ चिल्लाते रहे कि गांव को मुफ्त इंटरनेट चाहिए, लेकिन फरेब सिंह ने उन्हें ‘असुर’ घोषित कर दिया जो जनता की निजता को खतरे में डालना चाहता है। गांव के बुजुर्गों को लगा कि फरेब सिंह साक्षात कलियुग के यमराज से उनका स्मार्टफोन बचाने आए हैं। लोग अपनी फटी धोतियों के कोने में चिपके पुराने हैंडसेटों की पूजा करने लगे ताकि फरेब सिंह की ‘सुरक्षा ढाल’ उन्हें मिल सके।
मतदान के अगले दिन जब फरेब सिंह की भारी मतों से जीत हुई, तो पूरा गांव अपना ‘डेटा-मुक्ति प्रमाण पत्र’ लेने उनके दरवाजे पर कतारबद्ध हो गया। फरेब सिंह ने बड़े इत्मीनान से अपनी नई चमचमाती गाड़ी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक डाक टिकट जैसा कागज थमा दिया, जिस पर लिखा था— “डेटा ही माया है।” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, यह क्या है? हमारा नेटवर्क तो अब भी गायब है और मोबाइल में कुछ नहीं चल रहा!” फरेब सिंह ने अपनी नई आईफोन की स्क्रीन चमकाते हुए गंभीर स्वर में कहा— “मूर्खों! नेटवर्क गायब नहीं हुआ, मैंने गांव के टावर का किराया डकार कर उसे अपने नाम आवंटित करवा लिया है। अब तुम सब ‘डिजिटल उपवास’ करो ताकि मेरा निजी बिजनेस बिना किसी रुकावट के तेज चल सके। तुमने डेटा छोड़ा, मैंने उसे पकड़ लिया; यही तो असली समाजवाद है!” जनता सन्न खड़ी अपने पत्थर जैसे मोबाइल देख रही थी और फरेब सिंह अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ाकर ‘हाई-स्पीड’ घोटाले की नई फाइल जमा करने शहर की ओर कूच कर गए।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपनापन…“।)
अभी अभी # ९७१ ⇒ आलेख – अपनापन श्री प्रदीप शर्मा
प्रेम में अगर ढाई अक्षर होते हैं, तो अपनापन में पाँच ! यानी ढाई से दो गुना। प्रेम को तो परिभाषित किया गया है, लेकिन अपनेपन को परिभाषित करना इतना आसान नहीं।
फेसबुक पर अपने बारे में लिखने का मौका कम ही आता है ! परिचय को रिश्ते में बदलने में वक्त तो लगता है। केवल विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित रिश्ते में अपनेपन का अहसास होना ही फेसबुक की खूबी है।।
कल 1 अप्रैल था ! कई लोग 1 अप्रैल को पैदा होते हैं। मैं भी उनमें से एक हूँ ! जब छोटे थे, तो जन्मदिन सिर्फ माँ को याद रहता था। माँ हलवे से मुँह मीठा करती थी। पिताजी कुछ न कुछ लेकर ज़रूर घर आते थे। कभी कोई खिलौना, कभी नये कपड़े, तो कभी सायकल।
समय के साथ जन्मदिन का स्वरूप बदलता चला गया। जन्मदिन, स्कूल, दफ़्तर और परिचितों की सीमाएं पार करता हुआ फेसबुक तक पहुँच गया। कल फेसबुक पर बधाई देने वालों का ताँता लग गया।।
पहली बार अपनेपन का अहसास हुआ ! अपरिचय से परिचय का रिश्ता जब इतना मजबूत होने लगता है, तो सब अपने लगने लगते हैं। रोज सुबह ” अभी अभी ” से अपनों की पहचान हुई। अपनों को नापने का कोई मापदंड नहीं होता। आश्चर्य हुआ, खुशी भी हुई। इतनों में अपनेपन का अहसास हुआ।
शब्द भाव प्रकट करते हैं। भाव दो शब्दों में भी प्रकट किए जा सकते हैं, और 200 में भी ! मेरे लिए भाव अधिक महत्वपूर्ण है। कहीं कहीं तो मौन से भी अपनेपन की अभिव्यक्ति होती है। प्रकट रूप से व्यक्त हर शब्द का मैं सम्मान करता हूँ, उसके पीछे छुपे गहन अर्थ को समझना सबके बस की बात नहीं, अतः कभी कभी व्यक्ति के भाव को पूरा सम्मान भी नहीं मिल पाता।
जाने अनजाने हुई इस भूल के लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ।।
अभी अभी का यह सिलसिला आपके प्यार और आशीर्वाद का ही फल है। मेरे जीवन भर की उपलब्धि केवल यह अभी अभी ही है। जन्मदिन के अवसर पर आप सबने मुझे अपनेपन का अहसास कराया। कुछ का मैं धन्यवाद कर पाया, कुछ का नहीं। सभी के द्वारा व्यक्त भावों, उद्गार और जन्मदिन पर प्रेषित शुभकामनाओं हेतु मैं सबका पुनः आभार प्रकट करता हूँ।
आपके इस अपनेपन के कारण मुझे कभी अपनी उम्र का अहसास नहीं हुआ। ज़िन्दगी जीने का इससे बेहतर जरिया मुझे नज़र नहीं आया। मित्रों, हितैषियों और शुभचिन्तकों की इतनी बड़ी तादाद है कि मैं उनका व्यक्तितगत रूप से आभार नहीं प्रकट कर सकता।
अंत में जगजीतसिंह के शब्दों में केवल इतना ही कहूँगा –
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “प्रकाश पुंज…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मुझे, उपग्रह ही रहने दो…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # १०३ ☆ मुझे, उपग्रह ही रहने दो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – ७ – कॅसेट – ☆ विभावरी कुलकर्णी ☆
आज घर आवरताना एक जुनी कॅसेट सापडली आणि त्या फितीप्रमाणेच मनही भूतकाळातील आठवणींत गुंडाळले गेले. माझ्या लहानपणी ज्यांच्याकडे रेडिओ, टेप-रेकॉर्डर, टीव्ही असेल किंवा घरात नळ, गॅस आणि झोपायला गादी-कॉट असेल, तर त्या घराकडे ‘फार श्रीमंत’ लोक म्हणून बघितले जायचे. “त्यांचे काय बाबा, मोठे लोक आहेत ते! ” असा एक विशिष्ट आविर्भाव त्यामागे असायचा.
अशा काळात एके दिवशी वडिलांनी एक मोठा बॉक्स घरी आणला. (आमच्यासाठी बॉक्स उघडणे ही सुद्धा एखाद्या दिवाळीपेक्षा कमी नसे! ) तो बॉक्स उघडताना वाड्यातील सगळे ‘बालवीर’ तिथे जमले. प्रत्येकाच्या चेहऱ्यावर आनंद आणि कमालीची उत्सुकता होती. मोठी माणसे कडेकडेने उभी होती. त्यातील स्त्रियांच्या चेहऱ्यावर संमिश्र भाव होते—कौतुक, थोडी असूया, प्रचंड उत्सुकता आणि थोडी हळहळ! अखेर विविध सूचनांच्या भडिमारानंतर तो बॉक्स उघडला गेला आणि आतून एक मस्त काळा, चमकदार, अनेक बटणे असलेला ‘पाहुणा’ घरात प्रविष्ट झाला. तो म्हणजे ‘टू-इन-वन’.
प्रथम त्यातले काहीच कळेना, पण हळूहळू त्या पाहुण्याशी परिचय वाढत गेला आणि नवनवीन गुपिते कळू लागली. रेडिओ तसा ओळखीचा होता, पण त्यातील ‘कॅसेट प्लेअर’ ही गोष्ट अगदीच नवीन होती. कॅसेट आत कशी फिरते, याचेही तासनतास निरीक्षण झाले. त्यातून येणारा आवाज आणि आपल्याला हवी तीच गाणी लावता येणे, हे सर्व जादू वाटण्यासारखे होते.
पण माझे बालकुतूहल मला शांत बसू देईना! या कुतूहलापोटी घरात कोणी नसताना अनेक वस्तू खोलून पाहण्याचे ‘प्रताप’ मी केले आहेत. ती कॅसेट नेमकी वाजते कशी? मग एकदा संधी साधून मी ती उलट-सुलट करून पाहिली. तिला ‘A’ आणि ‘B’ अशा दोन बाजू असतात आणि दोन्हीकडे वेगळी गाणी कशी वाजतात, हा माझ्यासमोर मोठा प्रश्न होता. अशाच एका गाफील क्षणी त्यातील काळी रिबन बाहेर आली! आता नक्की ओरडा मिळणार, या भीतीने मी घामाघूम झाले. पण शक्कल लढवून कॅसेटच्या चाकात करंगळी घातली, ती गोल फिरवली आणि रिबन हळूहळू आत गेली. तेव्हा कुठे माझा जीव भांड्यात पडला.
नंतर समजले की आपल्याला हव्या त्या गाण्यांच्या कॅसेट्स दुकानात मिळतात. मग काय, एक कोरी कॅसेट घ्यायची, घरातील सर्वांनी एकत्र बसून आवडीच्या गाण्यांची यादी करायची आणि ती दुकानदाराकडे द्यायची. हा एक नवा खेळच सुरू झाला. जुनी गाणी पुसून नवीन गाणी भरता येतात, हे समजल्यावर तर आनंदाला पारावार उरला नाही. त्यावेळी ‘TDK’ आणि ‘SONY’ च्या कॅसेट्स सर्वात उत्तम असतात, हे तांत्रिक ज्ञानही मिळाले. पु. ल. देशपांडे, व. पु. काळे, शंकर पाटील यांचे कथाकथन आणि गाण्यांचे कार्यक्रम या कॅसेट्समुळे थेट घरात अवतरले. “एकदा घ्या आणि पुन्हा पुन्हा ऐका” या सुविधेमुळे रेडिओच्या सवयीच्या लोकांना स्वतःच्या बोटावर आवडते गाणे वाजवताना राजेशाही थाट वाटायचा.
आनंदात गाणी ऐकणे चालू असताना अचानक ‘खटक’ असा आवाज होऊन टेप बंद पडायचा. मग सर्वांची नजर संशयाने माझ्याकडे वळायची. मी आपला शक्य तितका ‘बावळट’ चेहरा करून, “मी तर आज टेपला हातही लावला नाही, ” असे पटवून द्यायचे. कॅसेट बाहेर काढली की त्यातून लांबच लांब रिबन बाहेर आलेली असायची. तिथे माझा जुना अनुभव उपयोगी पडायचा; फक्त यावेळी करंगळीऐवजी पेन्सिलचा वापर करून ती रिबन गुंडाळून पुन्हा आत बसवली जायची. एकदा तर रिबन तुटलीच! पण सेलोटेपचा बारीक तुकडा लावून ती जोडण्याचे धाडस मी केले आहे. हे काम ज्यांनी केले असेल, त्यांना एखादा सर्जन ऑपरेशन करताना किती टेन्शनमध्ये असतो, याचा नक्कीच अनुभव आला असेल.
आज काळ बदलला आहे. आता सगळं काही ‘ढगात’ (Cloud) आहे, ‘तू-नळी’ (YouTube) आहे आणि आपले गुगल बाबा तर आहेतच! एका क्लिकवर हवे ते गाणे मिळते आणि प्रत्येकाच्या कानात हेडफोन्स असतात. पण त्या काळी गाण्यांचा आणि जेवणाचा ‘मेन्यू’ एकत्र ठरायचा. त्या सहभोजन आणि सहश्रवणात जी सामूहिक मजा होती, ती केवळ त्या काळातील पिढीलाच ठाऊक!
आज त्या एका जुन्या कॅसेटमुळे तो सगळा काळ डोळ्यांसमोरून पुन्हा एकदा झरझर फिरून गेला.