(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. सुलभा कोरे जी द्वारा लिखित “शिव और शिवालय – ज्ञात से अज्ञात तक…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०१ ☆
☆ “आपकी अरु” – लेखिका… अर्चना नायडू ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
कृति : आपकी अरु
कहानी संग्रह
प्रकाशक इंडिया नेट बुक्स , नोएडा
लेखिका : अर्चना नायडू
☆ स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध करती कहानियाँ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ई. अर्चना नायडू जी द्वारा रचित कहानी संग्रह ‘आपकी अरु’ समकालीन हिंदी साहित्य में एक ताजीऔर मानवीय संवेदनाओं से भरपूर कृति है।
यह संग्रह वर्तमान परिवेश की स्त्री विमर्श लेखन केंद्रित जीवंत समस्याओं और मानवीय रिश्तों के सूक्ष्म जालों को बड़ी ही कुशलता से बुनता है। पुस्तक की अनूठी विशेषता इसकी केंद्रीय पात्र ‘अरु’ है। लेखिका ने एक ही नाम के माध्यम से स्त्री के विभिन्न आयु वर्गों किशोरी, युवती, और प्रौढ़ा, की मानसिक अवस्थाओं और उनके संघर्षों का प्रभावी चित्रण किया है। एक तरह से उपन्यास ही है आपकी अरु । अरु के बिंब तथा परिवेश में हम आप और पाठिकाएं स्वयं के ही कई स्वरूप देख समझ सकते हैं । यह किताब महीने से ज्यादा मेरी तकिया के निकट टेबल पर अपनी स्थिति बदलती रही है।इसकी कहानियों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संस्कार, आधुनिकता का द्वंद्व और टूटते-जुड़ते रिश्तों की कसक दिखाई देती है। अर्चना जी का लेखन ‘मालती जोशी’ जी की परंपरा को आगे बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है, जहाँ सादगी ही सबसे बड़ा अलंकार है।
’लिव-इन रिलेशनशिप’, कहानी में लेखिका ने इस आधुनिक मुद्दे को पारिवारिक दृष्टिकोण से देखा है। जब अरु को पता चलता है कि उसका बेटा आदित्य और सौम्या एक साथ रहते हैं, तो वह क्रोध करने के बजाय समझदारी और सहजता दिखाती है। वह सौम्या से कहती है “तुमने बिरला मंदिर नहीं देखा है न, चलो हम परसों चलते हैं… हम मंदिर में ही तुम दोनों की इंगेजमेंट कर देते हैं। क्यों ठीक है न मेरी बहू रानी!”, यह संवाद पीढ़ीगत अंतराल को सहानुभूति से पाटने का सुंदर उदाहरण है।
इसी प्रकार ’पुनर्मिलन बनाम रीयूनियन’ कहानी दबी हुई प्रेम भावना और वर्तमान कर्तव्य के बीच के संतुलन को दर्शाती है। कॉलेज के पुराने साथी ऋषि कुमार से मिलने पर अरु के मन में उद्वेलन होता है, लेकिन वह एक आदर्श भारतीय स्त्री की तरह अपनी भावनाओं को अनुशासित रखती है। अंत में वह कंधे पर सिर रखकर मौन स्वीकृति देती है, जो भारतीय समाज की ‘प्रेम को दबाकर जीने वाली स्त्री’ के यथार्थ को स्पष्ट करता है।
’आपकी अरु’ (शीर्षक कहानी) , कहानी पिता-पुत्री के निश्छल प्रेम और कर्तव्यपरायणता पर आधारित है। पिता की मृत्यु के शोक के बीच भी अरु अपनी परीक्षा देने जाती है क्योंकि उसके भाई ने कहा था, “अगर अरु यह एग्जाम देगी तो यह पापा के लिए अंतिम श्रद्धांजलि होगी”। अरु तनाव में भी अपनी जिम्मेदारी पूरी करती है, जो उसके चरित्र की दृढ़ता को रेखांकित करता है।
कहानी लेखन का आर्ट इन कहानियों में परिलक्षित होता है। अर्चना नायडू की शैली सरल, सुबोध और प्रवाहमयी है। उनके वाक्य छोटे और स्पष्ट हैं, जो पाठक को पात्रों के साथ सीधे संवाद का अनुभव कराते हैं। उन्होंने ‘यथार्थ’ को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। भाषा में एक सहज लय है, जो कहानी को पानी की धार की तरह बहने में मदद करती है। उनके पास समृद्ध शब्द भंडार तथा अभिव्यक्ति की क्षमताएं हैं।
इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त विरोधाभासों और विडंबनाओं को दूर कर एक सकारात्मक राह दिखाना है। लेखिका का लक्ष्य केवल समस्या बताना नहीं, बल्कि ‘व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ना’ और खत्म होते जा रहे मानवीय मूल्यों को बचाना है। ये कहानियाँ एक बेहतर मनुष्य बनने की मर्मस्पर्शी शिक्षा देती हैं।
’आपकी अरु’ केवल कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह बदलते हुए समाज का दर्पण है। जिस सहजता से अर्चना नायडू जी ने स्त्री मन की परतों को लिपि बद्ध किया है, वह आने वाले समय में निश्चित ही उन्हें कथा-साहित्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाएगा। भविष्य में यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक मार्गदर्शिका सिद्ध होगी जो आधुनिकता की चकाचौंध में भी अपनी जड़ों और संस्कारों की मिठास को जीवित रखना चाहते हैं। इस लेखन में मानवता को जोड़ने की जो प्रबल संभावना है, वह निसंदेह इसे एक दीर्घजीवी कृति बनाती है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं अर्चना जी के इस सारस्वत प्रयास के साथ हैं। इंडिया नेट बुक्स से डॉ संजीव कुमार चुनिंदा साहित्य प्रकाशित कर रहे हैं, उन्हें भी बधाई।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण “आम और खास”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६३ ☆
🌻संस्मरण 🌻 आम और खास ☆
बचपन की घटना याद हो आई। गर्मी का मौसम, तपती दुपहरी और भरे पूरे परिवार में एक कमरे में लगा हुआ एक तीन बाँहों वाला पंखा।
जो बहुत खास था। कुछ खास मौके पर चलता था और जब चले तब बड़े थोड़े ऊंचे जगह पर बैठे जैसे तखत, पलंग, जो मध्यम थे वह स्टूल, बेंच, छोटी चौपाई। और हम बच्चे दरी या चटाई बिछा है तो भी ठीक, नहीं तो लिपा- पुता घर का सुंदर महकता हुआ वह कमरा, जानते हैं इसकी कीमत क्यों थी क्योंकि वह खास था जहाँ पर बड़े बुजुर्गों का साया था, भोजन कक्ष जहाँ से दादी और माँ की चूड़ियों की आवाज, रुतबे से बाबा और चाचा बाबा की आवाज, पिताजी अपनी सादगी और कुशल वाकपटुता से पूरे परिवार के लिए एक रामलाल की भांति प्यारे।
जाने कहाँ गए वो दिन अब न वह जगह बची और न लोग। कहते हैं 80- 100 वर्षों के बाद घर बदल जाता है, गाँव बदल जाते हैं, लोग बदल जाते हैं, बोली बदल जाती है, और संस्कार संस्कृति भी बदल जाती है और तो और जो खास होता है वह आम होते देर नहीं लगती।
वैसा ही हाल कुछ पंखे का हो गया। गर्मी पहले से और बेहतर हो गई है। और पंखे खास से आम हो गए हैं। न उनमें परिवार है और न वह ठंडक वाली हवा।
आज हर कमरे में एक पंखा और ए सी लगा हुआ है। देखा जाए सब कहते हैं यह वह खास वाला है परंतु मुझे लगता है यह खास नहीं यह तो आम हो गया है। जो हर कमरे पर है परंतु कमरे में वह नहीं है जो खास होते हैं।
बस मन की बातें थी। जो थोड़ी सी बात आप सभी के साथ साँझा कर ली। हृदय के साथ उन सभी बीती बातों को गर्मी में आम से खास और खास से आम होते देखा गया। आप सभी के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ और बहुत-बहुत अभिनंदन। खास बने रहियेगा– शीतल, ठंडक, धीरज, श्रद्धा, निष्ठा और संस्कार को लिए। ममता, सेवा पूजन, परहित, जनहित, दया, करुणा संस्कृति को लेकर आम बने रहियेगा।
सदैव प्रभु कृपा बरसती रहेगी। जिसमें मै, मेरा को जगह न मिले, हमारे- अपने को खास बनाते रहियेगा।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७५ ☆ देश-परदेश – जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना ? ☆ श्री राकेश कुमार ☆
बचपन से ये ही सब सुनते आ रहें हैं।सयाने कहा करते थे,उस गली का रास्ता क्यों पूछना, जहां जाना ही नहीं हैं ? अपने काम से मतलब रखो, अपने उद्देश्य की तरफ ध्यान लगाओ आदि।
विगत कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार से संपूर्ण विश्व से पल पल की खबर कुछ क्षणों में हम सबकी स्क्रीन पर रहती हैं।
आज चुनाव परिणाम आने हैं, सभी लोग टीवी पर बड़ी खबर / ब्रेकिंग न्यूज सुन सुन कर अपने आप को अपडेट कर रहें हैं।
सड़कों पर भीड़ बिल्कुल भी नहीं है, सरकारी दफ्तर/ बैंक आदि खुले है,परंतु ग्राहक नगण्य हैं।दोपहर में जब सब्जी के ठेले पर पहुंचे, तो विक्रेता गिड़गिड़ाने लगा, बोला सुबह से बोहनी नहीं हुई हैं। सस्ते भाव में सब्जी खरीद लेवें, गर्मी से सब्जी खराब हो जाएगी। हमने भी उसकी आपदा से अवसर निकाल कर आवश्यकता से अधिक सब्जी खरीद ली है।
सुबह एक मित्र को फोन किया तो बोला कल बात करना आज चुनाव परिणामों में व्यस्त हैं। एक अन्य मित्र को फोन किया, वो तुनक कर बोला तुम्हे कोई काम नहीं है, क्या ? आज चुनाव का मज़ा लो।हमने उसको बताया एक अन्य मित्र की तबियत बहुत नाज़ुक बनी हुई है, उसकी कुशल क्षेम पूछने अभी चलते हो क्या ? उसने आज के लिए मना कर दिया।
आज के चुनाव परिणाम पूर्व और दक्षिण के दो दो राज्यों के आने हैं। हम यहां उत्तर भारत में रहते हैं। उन चारों राज्यों में हमारा कोई संबंधी भी नहीं रहता है। हम जीवन में कभी वहां गए भी नहीं हैं, फिर वहां के परिणामों से हमें क्या लेना देना ? मोहल्ले के एक परिचित कुछ समय से बीमार हैं, वहां कभी झांका तक नहीं है। बाकी पूरी दुनिया की ख़बर हमें रहनी चाहिए।
मुकेश जी का पुराना गीत “जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा, उस गली से हमें गुजरना नहीं” के बोल अब बेमानी हो चुके हैं। आजकल तो हम लोग किसी भी गली में जाकर नया बलमा बना लेते है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संगत पंगत की …“।)
अभी अभी # ९८६ ⇒ आलेख – संगत पंगत की श्री प्रदीप शर्मा
संगत पंगत की कर लीजे ! संतों का सत्संग तो हमने बहुत कर लिया, संतों का रंग भी हम पर चढ़ भी गया, और इतना चढ़ा कि हमें धर्म और राजनीति दोनों की समझ आ गई।
आज के संत पलायन वादी नहीं, वे पहाड़ों में कंदराओं में जाकर नहीं बैठ जाते, वे दीमक को मौका ही नहीं देते, कि वे मधुमक्खी की तरह देह से चिपककर, उनके तपस्वी, ओजस्वी, आभायुक्त और विरक्त शरीर का अलंकार बनें।
वे भी निष्काम कर्म का पालन करते हुए, इस मायावी जगत में रहकर मानव मात्र के कल्याण के लिए कृत संकल्पित रहते हैं।
ग्राम्य सभ्यता ने ही हमें समय पर उठना बैठना, चलना फिरना सिखाया। हम प्रकृति के इशारों पर सूर्योदय के पहले ही सुख की नींद त्याग, दिशा मैदान के लिए निकल जाते थे। चलते चलते ही नीम और बबूल की पतली टहनी तोड़ी और कोलगेट टूथ ब्रश तैयार।
रफ और टफ वातावरण में नित्य कर्म, हमारी दैनिक दिनचर्या का ही एक अंग था। बुजुर्गों के साथ, प्रसाधन का संसाधन, मात्र धोती लोटा होता था, कुएं, बावड़ी और नदियों की कोई कमी नहीं थी।।
बस समझिए, वहीं से पंगत की संगत शुरु हो गई थी।
संयुक्त परिवार के सभी बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते थे। नानी, दादी और ताऊजी हमें उंगली पकड़कर शादियों में जीमने ले जाते थे। अपना लोटा ग्लास ही हमारा निमंत्रण पत्र होता था।
नर्सरी केजी, की ट्रेनिंग के पश्चात् हम शहर आ गए, गली, मोहल्लों और बाड़ों में बस गए। सिगरी न्यौते के बुलावे के लिए, नाई घर पर आता था। बाहर साइकिल पर से ही मौखिक निमंत्रण दे, चला जाता था। समय, स्थान और प्रयोजन। हमें तो सिर्फ जीमने से मतलब था।।
घरों में तब रसोई गैस का आगमन नहीं हुआ था। चूल्हे के साथ सिगड़ी का भी उपयोग शुरू हो चुका था। सिगरी न्यौते का अर्थ, घर में उस रोज सिगड़ी नहीं जलेगी। घर के सभी सदस्य, जिनमें अतिथि देव, साले बहनोई सभी शामिल होते थे, सादर आमंत्रित थे।
आज जिसे हम भंडारा कहते हैं, वही पहले पंगत कहलाती थी। जब तक एक पंगत नहीं उठ जाती थी, दूसरी नहीं लगती थी।
बाकायदा पानी और बुहारी से धर्मशाला के फर्श को स्वच्छ किया जाता था। फिर बारी आती थी, पत्तल दोने की। पत्तल उल्टी सीधी होती थी, उसे परखकर सीधा किया जाता था। दोने फूटे ना हों, इसका विशेष खयाल रखा जाता था। पहले रायता फैलता था, आजकल जान बूझकर फैलाया जाता है।।
पंगत का अपना एक मेनू होता था। आलू का साग, पूड़ी, नुक्ती सेंव और लड्डू। मौसम के हिसाब से खीर अथवा रायता। आप जितना खाते, उतनी ही अधिक आपकी मनुहार होती। जो ठूंस ठूंस कर खाते थे, उनकी तो बात ही कुछ और थी, लेकिन जो नहीं खाते थे, उन्हें भी ठूंस ठूंस कर खिलाया जाता था। लेकिन तब के लोग कुछ अलग ही मिट्टी के बने थे, वे पंगत में ना करना जानते ही नहीं थे।।
पंगत का एक अनुशासन होता था। नमः पार्वती पतये हर हर महादेव के जयघोष के साथ, पहले अन्नदेव को प्रणाम किया जाता था, उसके बाद ही पंगत शुरू होती थी। सामूहिक संगत का आनंद आता था पंगत में। पंगत के बीच में से नहीं उठा जाता था। जब सबका भोजन हो जाता था, उसके बाद ही पंगत से उठकर हाथ धोया जाता था।
लगता है, अब पंगत और संगत के दिन लद गए। बफैलो की तरह खड़े खड़े खाना ही हमारी नियति बन गया है। सात्विक भोजन का स्थान मोमोज, मंच्यूरीअन, पिज्जा और पास्ता ने ले लिया है। हम कहते हैं गिद्ध भोज, और उसमें शामिल भी होते हैं।
कितने बदल गए आजकल मजबूरी में महात्मा गांधी।।
वैसे जब आयोजन बड़े बड़े रिजॉर्ट और पंच सितारा होटलों में होंगे, तो काहे की पंगत। लेकिन हां, वहां संगत के लिए कॉकटेल पार्टियां हैं न। वैसे भी लाखों की ज्वैलरी, हजारों के सूट, टाई और चमचमाते जूते पहन, कौन किसी पंगत का रुख करता है। यह मन्नू भंडारी का महाभोज है, किसी पंगत की संगत नहीं ..!!
दि. ३/४/२०२६ या ई-अभिव्यक्ती मध्ये खालील लेख आला आहे. तो वाचल्यानंतर मला माझी एक कविता येथे द्यावी असे वाटले. प्रथम तो लेख व नंतर माझी कविता आपल्यासाठी.
☆ निवांत एकांत… लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – स्वाती मंत्री ☆
मंदिराच्या पायऱ्या चढताना हातातील फुलांच्या हारापेक्षाही मनातील मागण्यांचे ओझे जास्त जड असते..
प्रत्येक पाऊल एका अपेक्षेने पडत असते आणि प्रत्येक नमस्कारात काहीतरी पदरात पाडून घेण्याची धडपड असते..
आपण देवाकडे जातो ते बहुधा स्वतःला अपूर्ण समजूनच..
कुणाला धन हवे असते, कुणाला यश, तर कुणाला केवळ मनाची शांती..
पण या मागणारे आणि देणारे यांच्या गर्दीत एक निराळाच प्रवाह वाहत असतो.
तो म्हणजे त्या जिवांचा, ज्यांनी मागणे सोडून दिले आहे..
ज्यांच्या डोळ्यांत आता आसवांची जागा एका संथ शांततेने घेतली आहे..
माणूस जेव्हा स्वतःच्याच अंतर्मनाच्या गाभाऱ्यात डोकावतो, तेव्हा त्याला उमजते की खरी श्रीमंती बाहेरून काही मिळवण्यात नसून आत जे आहे त्यात तृप्त राहण्यात आहे.
हे जगणे सोपे नसते..
या तृप्तीला एक सूक्ष्म दुःखाची किनार असते. हे दुःख एखाद्या जुन्या जखमेसारखे नसते, तर ते एका अशा जाणीवेचे असते की आता आपल्याला जगाकडून काहीही नको आहे..
ज्याला काही नको असते, तोच खऱ्या अर्थाने ‘सुखी आत्मा’ असतो..
पण या वैराग्यात एक प्रकारची एकाकीपणाची सावली असते..
जग जेव्हा धावत असते, ओरडत असते, तेव्हा हा माणूस आपल्याच हृदयाच्या कोपऱ्यात शांत बसून स्वतःच्या अस्तित्वाचा उत्सव साजरा करतो..
ही तृप्ती आनंदापेक्षाही जास्त गंभीर आणि मौनापेक्षाही जास्त सखोल असते..
अशा वेळी बाहेरच्या मूर्तीसमोर हात जोडण्याचं भानही उरत नाही, कारण साऱ्या जगाला व्यापणारा तो विधाता स्वतःच्याच निवांत एकांतात सामावलेला असतो..
हे एक नितांत सुंदर सत्य आहे..
*
लेखक: अज्ञात
प्रस्तुती: स्वाती मंत्री
—–
☆ कविता – 😀 देवा, 🙏🌹🙏 ☆
☆
आले कशी कळेना, दारी तुझ्या दर्शनास
नसताच कारण आणि इच्छा जराही मनात😞
तरीही आस उगा मनात, भेटशील इथे तू खचित!
वाटले…! वाटले पाहू तरी, असतो कसा तो देव!
भ्रमनिरास माझा देवा नक्कीच तू केला😢
साधून ते तुजला, आनंद कुठला मिळाला?
रांगेत मी भक्तांच्या, तू वेढ्यात सुरक्षारक्षकांच्या
तिथेच भक्ती माझी टिचकली, जी बळेच होती मी जपलेली 🙃
ढकलाढकली अन् धक्काबुक्की ती अशी
आले क्षणभर तव सामोरी कशीबशी
तशाच धक्क्याने नेले क्षणात दूरदूर
तनाने तसे मनानेही खूप खूप दूर दूर 👎👎
सांगते हात जोडुनि शपथ घेउनि तुझी, 🙏🙏
हात जोडण्यासही जमलेच नाही, त्या एका क्षणात! 😢
किंचितही वळून ना पाहिले पुन्हा
परी
सोडला श्वास सुटकेचा, संपला सोहळा दर्शनाचा
आली कीव तुझीच! वाटले, हवी तुलाच सुटका
येथुनि
निघाले तडक जरी माघारी… तरी…
तरी पावलांमागोमाग हा कसला भास? 🤔🤔🤔
आलास की काय सोडुनि तू तुझ्या राउळास?
संशय खरा की खोटा, छळतो मनाला
परी त्या क्षणापासुनिवाटते निश्चिंत माझ्या मनाला👍🙏😀🙏
(आशाला नाशिकला आदिवासी वसतिगृहात सहज प्रवेश मिळाला. आशा तिथे राहून कॉलेजला जाऊ लागली. तिला हे शहर अतिशय आवडलं. आशाला सुलभा स्वप्नाचे ड्रेस देई. आशा ते आपल्या मापाचे करून मस्त वापरत असे. जन्मजात या लोकांना सगळ्यांशी आणि परिस्थितीशी जुळवून घ्यायची असलेली सवय तिला इथे उपयोगीच पडली. आशा बघता बघता बीकॉम झाली. तेही छान मार्क्स मिळवून.)
इथून पुढे ––
आशाला लगेचच राखीव कोट्यातून बँकेत नोकरी मिळाली….. त्यांच्या आदिवासी समाजातली ही पहिली पदवीधारक मुलगी. आशाने सुलभाच्या घरी येऊन नेमणूक पत्र सगळ्यांना दाखवलं. सुलभाच्या पायावर डोकं ठेवलं. गहिवरून म्हणाली, ” बाई, हे सगळं श्रेय तुम्हाला जातं. कोण कुठली दरिद्री आदिवासी मुलगी. तुम्ही भेटला नसतात तर मी तशीच कुजत पडले असते हो त्या पाड्यात. कसे उपकार फेडू तुमचे? ”
सुलभाच्या घरातल्या लोकांनाही गहिवरून आलं. सुलभाच्या सासू सासऱ्यांनी तिला हजार रुपये बक्षीस दिले. , स्वप्नाने सुंदर पर्स. आणि सुलभाने दहा हजार रुपये.
“अशीच मोठी हो बाळा. आता स्वतःच्या पायावर उभी राहिलीस. शाबास तुझी. ”
“बाई, हेच माझं खरं घर आहे. मी तुम्हाला कधीही विसरणार नाही बाई. ” आशा निघून गेली.
आशाला सुलभा बँकेत भेटायची. छानशी साडी नेसलेली, चटपटीतपणे काम करणारी, क्लायंटशी अदबीने बोलणारी आशा बघून सुलभाला फार आनंद व्हायचा.
एक दिवस अचानक आशा सुलभाच्या घरी आली. ” बाई थोडा वेळ आहे का बोलायला? ”
आशा थोडी अस्वस्थ दिसत होती.
“ ये ये ग आशा. बस. आज निवांत आहे बघ मी. कोणी नाहीये घरी. ” सुलभा म्हणाली. आशाच्या हातात पोह्याची डिश देत तिने उत्सुकतेने विचारलं, “ सांग काय काम काढलंस? ”
“ बाई कसं सांगू? ”आशा थोडी थांबली. ” बाई, आमच्या शेजारीच एक कंपनी आहे. तिथला एक मुलगा नेहमी बँकेत येत असतो. खूप छान आहे तो. इंजिनिअर, दिसायला रुबाबदार. मला तो नेहमी भेटायचा बोलायचा. मी गुंतत गेले त्याच्यात. तोही माझ्या प्रेमात पडलाय असं वाटलं मला. तो पण होता माझ्या प्रेमात
एक दिवस बोलताना मी माझे मागचे दिवस त्याला सांगितले. ”
तो दचकलाच.. “ झोपडीत? तू झोपडीत रहात होतीस? “
मग काहीही न लपवता मी त्याला सगळं सांगितलं… “ मी नकुशा मोरे आहे, आदिवासी आहे. ”
त्याने हे ऐकलं आणि माझ्याशी सगळे संबंधच तोडून टाकले.
मला म्हणाला “मला वाटलं तू मोरे म्हणजे आमच्यापैकीअसणार.. माफ कर मला आशा. पण आमच्याघरी अशी तुझ्यासारखी आदिवासी मुलगी चालणारच नाही. माझे आजीआजोबा अजून हयात आहेत. या लग्नाला ते जन्मात परवानगी देणार नाहीत. मी त्यांच्या इच्छेविरुद्ध तुझ्याशी लग्न करणार नाही. ”..
… “ आणि असं म्हणून तो सरळ उठून निघून गेला. मी अगदी उध्वस्त झालेय हो. मला काही सुचत नाहीये “ आशा हुंदके देऊन रडायला लागली.
सुलभाने तिला जरा शांत होऊ दिलं. “हे बघ आशा, उत्तम झालं तू त्याला सगळं खरं खरं सांगितलंस.
अग, नंतर काहीतरी वाईट घडण्यापेक्षा हा आधीच नाही म्हणाला हे किती चांगलं झालं. अशी रडू नकोस. वाईट तर मुळीच वाटून घेऊ नकोस. सगळं छान होईल तुझं. देवाने जो कोणी तुझ्यासाठी नेमलेला असेल ना, तो वेळ झाली की समोर येऊन उभा राहील बघ. ” सुलभाने आशाचे डोळे पुसले.
आशा म्हणाली ”बाई, मी आता ती नकुशा म्हणूनही जगत नाहीये आणि आशा म्हणून जगतेय तरी मला माझी जन्माची ओळख असे नवीन आयुष्य जगू देत नाहीये. काय करू मी? ”
“आशा, होईल सगळं नीट. आत्तापर्यंत नाही का सगळं सोसलंस? जिद्दीने शिकलीस, नोकरी मिळवलीस, तसाच छानसा जोडीदार चालत येईल बरं समोर. शांत हो बघू.”
“ बाई, त्याचं नाही हो वाईट वाटलं मला. माझं लग्न नाही झालं तरीही चालेल पण आता मी ठरवलं आहे.. मी आदिवासी आहे हे कळल्यावर सुद्धा जो मला हो म्हणेल त्यालाच मी स्वीकारीन. ” आणि ती शांतपणे निघून गेली.
– – – त्यानंतर बरेच दिवस गेले.
सुलभाच्या मुलीचं.. स्वप्नाचं लग्न ठरलं. तिच्याच कंपनीत मोठ्या पोस्टवर असलेल्या सागर मुजुमदारशी स्वप्नाने लग्न ठरवलं. अत्यंत आनंदात थाटामाटात स्वप्नाचं लग्न लागलं आणि आता लॉनवर रिसेप्शन चाललं होतं. स्वप्नाच्या आणि सागरच्या ऑफिसमधली बरीच मित्र मैत्रिणी जमून हसत जेवत गप्पा मारत बसले होते. सागरच्या मित्रांखेरीज इतर आणखी बरेच लोकही आले होते. घरचंच लग्न असल्यामुळे आशा सुंदर साडी नेसून, हसतमुखाने वावरत होती. स्वप्नाच्या आजीआजोबांकडे जातीने लक्ष देत होती. त्यांना काय हवं नको बघत होती.
… एक काळासावळा रुबाबदार मुलगा तिच्याकडे सतत बघत होता. आशाचं त्याच्याकडे लक्षच नव्हतं. न राहवून तो शेवटी आशाजवळ येऊन बसला.
“ मी इथं बसलो तर चालेल का? ” त्यानं विचारलं.
“ बसा ना. जेवण झालं का तुमचं? काउंटरवरची गर्दी जरा कमी झालीय. घेऊन या डिश हवं तर. ”आशा म्हणाली.
“ हो हो जातो ना. आणि तुम्हाला गेले दोनतीन दिवस बघतोय मी या लग्नात. मी सागरच्या कंपनीतच आहे. त्याच्याच टीममध्ये. तुम्ही स्वप्नाच्या बहीण आहात का? ”
“ नाही हो मी बहीण नाही पण बहिणीपेक्षा जास्त जवळची आहे या घराच्या ”. एवढं बोलून आशा कोणीतरी हाक मारली म्हणून तिथून निघून गेली.
दोन दिवसांनी सुलभा आशाच्या बँकेत आली. अचानक बाईना बघून आशाला आश्चर्य आणि खूप आनंद झाला.
“ बाई, आज इकडे कुठे? ”
“ अग जरा तुझ्याकडे काम होतं. कामावरून घरीच ये आज. ” इतकंच बोलून सुलभा निघून गेली.
बँक सुटल्यावर आशा सुलभाच्या घरी गेली. स्वप्ना लग्न होऊन गेल्यामुळे घर कसं उदास वाटत होतं. आजीआजोबा निमूट हॉल मध्ये बसले होते.
“ ये ग बाळा “… सुलभाने तिला बोलावलं. ” अगं तुझ्यासाठी एक मुलगा थांबलाय. त्याला तुझ्याशी बोलायचं आहे… शंकर, बाहेर ये ना. ”
आशाने वळून बघितलं तर स्वप्नाच्या लग्नात तिच्या शेजारी बसलेला तोच तरुण होता.
सुलभाने ओळख करून दिली. ” हा सागरचा मित्र शंकर जाधव. मी जरा बाहेर जातेय. , तुम्ही बोला. ”
शंकरला बघून आशा बुचकळ्यात पडली. याचं आपल्याकडे काय काम असावं असं वाटलं तिला.
तिचा संभ्रम शंकर बघत होता.
“हे बघ आशा. मी तुला सागर स्वप्नाच्या लग्नात दोनतीन वेळा बघितलं. मला तू फार आवडलीस.
… आशाने त्याला मधेच थांबवलं… “ हे बघा. मी आशा मोरे आहे पण मी… “
तिचं वाक्य पूर्ण होण्याच्या आधीच तो म्हणाला.. “ तू आदिवासी आहेस. मला सगळं माहीत आहे. स्वप्नाने सगळं सांगितलं आहे मला. आता मी सांगतो ते ऐक आणि मगच ठरव तुला काय करायचे आहे ते.
.. मी शंकर जाधव आहे खरा पण मलाच माहीत नाही मी कोण आहे ते. मी लहान असताना कोणीतरी मला अनाथाश्रमाच्या पायरीवर आणून सोडलं असं आश्रमाचे चालक म्हणतात. मी तेव्हा दोन वर्षांचा असेन. मी अनाथाश्रमात वाढलो. चालकांनी मला शंकर जाधव असं नाव दिलं. हेही माझं खरं नाव नाहीच ना?
कोण जाणे मी कोण आहे.. कोणाचा आहे? मी धडपड करत शिकलो. आश्रमातून दहावीनंतर फक्त रहाण्यापुरता आसरा मिळाला मला. रात्रंदिवस अपार कष्ट केले, लहान मोठ्या नोकऱ्या केल्या. देवाने बाकी काही नाही तरी तीव्र बुद्धी मात्र दिली होती. त्या जोरावर सगळीकडे यश मिळवत इंजिनिअर झालो.
कसा ते विचारू नकोस. शिकवण्या घेऊन, कुठे मेसचे हिशेब लिहून फी जमवली. मग माझ्या मेरिटवर या कंपनीत ही चांगली नोकरी मिळवली. उत्तम पगार आहे मला. आणि माझ्या गरजाच अत्यंत कमी असल्याने मी फ्लॅट बुक करू शकलो. मिळेल तो येत्या वर्षात….. आशा, तुला निदान आईवडिलांनी नाव तरी दिलं. मग ते नकुशा का असेना. मला नाव देणारी आईच सोडून गेली….. बघ विचार कर. मला तू नाही म्हणालीस तरी वाईट नाही वाटणार. तुला आला तसे अनुभव मलाही आलेच आहेत. मला नकाराचं फारसं काही वाटत नाही हल्ली. तू थोडा वेळ घे.. पण लवकर सांग तुझं उत्तर. हल्ली जीव टांगणीला लागला की त्रास होतो. ”
शंकर बोलायचा थांबला. त्याच्या काळ्याभोर डोळ्यात अश्रू तरळत होते.
आशा उठली. त्याचा हात हातात घेऊन म्हणाली, ” माझं भाग्य म्हणून असा प्रामाणिक हुशार जोडीदार मला मिळतोय. मला तुझ्या जातीशी.. अनाथपणाशी काहीही कर्तव्य नाही शंकर. माणूस म्हणून तू फार खरा आहेस रे. , दुर्मिळ असतात अशी माणसं. बाई मला म्हणाल्याच होत्या. तुला तुझा जोडीदार एक दिवस नक्की मिळेल… शंकर, करूया आपण लग्न. दोन दुःखी जीव एकत्र आले की सुख नक्कीच पायघड्या घालत येईल आपल्याकडे. ”
– तितक्यात सुलभा परत आली.. आशाने न राहावून एकदम तिला मिठीच मारली…
… ” बाई आजपर्यंत माझं सगळं सगळं भलं तुम्हीच केलंत. “.. आणि आशा खाली वाकली.. आणि स्वतःच्याही नकळत शंकरही. दोघांनी सुलभाला जोडीने नमस्कार केला.
… दोघांना जवळ घेताना सुलभाच्या डोळ्यातून आनंदाश्रू मुक्तपणे वहात होते