ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की अंतिम चौपाई में अपने आप को हरि का भक्त कहा है और अंतिम मांग की है कि श्री हनुमान जी उनके हृदय में निवास करें। इस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास जी हनुमान जी पर दबाव डालकर मांग कर रहे हैं की वे हमेशा तुलसीदास जी के हृदय में निवास करें। इस सप्ताह की श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है-

तुलसीदास सदा हरि चेरा |

कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ||

इस चौपाई के संपुट पाठ निरंतर करने से प्रभु श्री राम और हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है।

“नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। मगर इस राशिफल के पहले इस सप्ताह के ग्रहों के गोचर पर नजर डाल लें।

इस सप्ताह सूर्य कन्या राशि में, मंगल और गुरु कर्क राशि में, बुध और वक्री शुक्र तुला राशि में, वक्री शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

आइए अब राशि वार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। उनके व्यापार में वृद्धि होगी। अविवाहित जातकों के लिए भी यह सप्ताह ठीक-ठाक रहेगा। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे। इस सप्ताह आपको अपने संतान से थोड़ा सहयोग मिल सकता है। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह ठीक-ठाक रह सकता है। जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 अक्टूबर विभिन्न कार्यों को करने हेतु उचित है। पांच और छः तारीख को आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि भी संभव है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह पहले से ठीक रहेगा। 9,और 10 तारीख को आपको कार्यों को करने में सतर्कता बरतनी चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन सफेद चावल का दान दें तथा शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रों का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। परिवार में आपके संबंध अपने भाइयों बहनों से ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपको अपने संतान से भी अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। इस सप्ताह आपको अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। आपको थोड़ी बहुत मदद भाग्य से भी मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए सात और 8 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। 11 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप पर प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपका,आपके जीवनसाथी का और आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। अर्थात जैसा चल रहा है वैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने आप पर पूरा विश्वास करके कार्यों को करना चाहिए। आपके कर्म ही आपकी मदद करेंगे। इस सप्ताह आपको अपने कार्यों को संपन्न करने के लिए भाग्य का सहारा नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से मदद प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभप्रद हैं। 9 और 10 तारीख को आपको धन की प्राप्ति भी हो सकती है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके लिए मिश्रित फलादेश लेकर आ रहा है। सामान्य तौर पर इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा, परंतु सप्ताह के कुछ दिनों में आपको खून संबंधी रोग जैसे डायबिटीज ब्लड प्रेशर आदि से सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए सप्ताह सामान्य रहेगा। भाई बहनों के साथ आपके संबंध सामान्य रहेंगे, अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तथा 11 अक्टूबर विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपको कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। इस सफलता के लिए आपको बड़ी चतुराई के साथ कार्य करना पड़ेगा। धन आने की भी अच्छी उम्मीद है। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े खट्टे और थोड़े मीठे रहेंगे। इस सप्ताह आपको भाग्य के स्थान पर अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। आपको जो भी सफलता मिलेगी अपके परिश्रम और लगन के कारण ही मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। 5 और 6 तारीख को आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपको धन प्राप्त होने की उम्मीद है। आपका आत्मविश्वास इस सप्ताह थोड़ा ऊंचा रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। परंतु संतान से बहुत ज्यादा सहयोग की उम्मीद ना करें। ‌आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपका भी स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। 7 और 8 तारीख को आपको सावधानी से अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन सफेद चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

तुला राशि

अगर आप अविवाहित हैं तो यह सप्ताह आपके लिए अच्छा हो सकता है। विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं। प्रेम संबंध बढ़ सकते हैं। पुराने प्रेम संबंधों में वृद्धि हो सकती है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह पहले जैसा ही रहेगा। धन आने की उम्मीद है। कचहरी के कार्यों में कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई सहयोग नहीं मिलेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 5, 6 और 11 अक्टूबर लाभदायक है। 9 और 10 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। आपको अपने संतान से भी इस सप्ताह सहयोग मिल सकता है। भाग्य से भी आपको इस सप्ताह मदद मिलेगी। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। कचहरी के कार्यों में धन व्यय हो सकता है। परंतु अत्यधिक प्रयास करने पर सफलता भी मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 अगस्त विभिन्न प्रकार के कार्यों में फल दायक हैं। 11 तारीख को आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान सूर्य को तांबे के पात्र में जल और लाल पुष्प डालकर जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको धन प्राप्त होने की उम्मीद है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक रहेगा। भाग्य से भी आपको थोड़ी बहुत मदद मिलेगी। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध खट्टे मीठे रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 परिणाम दायक है। 5 और 6 तारीख को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है। ‌

मकर राशि

कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। व्यापारियों को भी इस सप्ताह धन लाभ हो सकता है। भाग्य से भी आपको सामान्य मदद मिलेगी। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक-ठाक रहेगा। गलत रास्ते से धन आ सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 5, 6 और 11 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। 7 और 8 तारीख को आपको सावधान रह करके कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह भाग्य से आपको मदद मिलेगी। आप अपने शत्रुओं को थोड़े से प्रयास के उपरांत आसानी से समाप्त कर सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। दुर्घटनाओं से थोड़ा सा सावधान रहने की आवश्यकता है। परंतु इस सप्ताह कोई मेजर दुर्घटना नहीं हो सकती। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक रहेगा। 7 और 8 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उचित रहेगा। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा, अर्थात जैसा पहले था वैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से उचित मात्रा में सहयोग प्राप्त होगा। अल्प मात्रा में धन प्राप्त होने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त है। सात और आठ तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर आपको कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सम्राज्ञी… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ सम्राज्ञी… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

(दाशी ६+६+६+६ (२४))

☆

दिसला मज चंद्र खुळा मनमुराद हसताना

चांदणीस वाटेवर थांब जरा म्हणताना

* 

नयनानी केलेल्या भावखुणा कळल्यावर

दिलखुलास रमली ती दर्पणात बघताना

 *

ती हसली मग फसली प्रेमातच कायमची

स्वप्नाच्या दरबारी विनयाने फिरताना

* 

मनमौजी प्राणसखा आवडता स्मरताना

प्रेमाच्या झोक्यावर ती दिसली झुलताना

* 

गझलेला सापडले विश्वतिचे आवडते

जगण्याचे मनभावन गीतनवे रचताना

*

मंदधुंद वास किती आसपास दरवळतो

मिलनाच्या ओढीने अंतरात फुलताना

* 

गूढ गीत गाताना सूर नवा सापडला

बनली मग सम्राज्ञी संसारी मुरताना

☆

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “मित्रवर्य स्मित…” – लेखक : श्री सदानंद फडके, एक नूमवीय ☆ श्री मोहन निमोणकर ☆

श्री मोहन निमोणकर 

? विविधा ?

☆ “मित्रवर्य स्मित…” – लेखक : श्री सदानंद फडके, एक नूमवीय ☆ श्री मोहन निमोणकर ☆

मित्रवर्य स्मित..

अरे बांधवा,

तुला कळलंय का तू किती मोठा पराक्रम केलास?

या पराक्रमाची तुलना ही भीम पराक्रम अशीच केली पाहिजे.

आज तुझ्यावर पोस्ट लिहावयाचे कारण तू आमच्या संस्थेचा माजी विद्यार्थी आहेस. शिक्षण प्रसारक मंडळीच्या वेलींगकर इन्स्टिट्यूटचा तू माजी विद्यार्थी आहेस. अरे समोर आला असतास तर मिठीच मारली असती आणि पाठीवर शाबासकीची जोरदार थाप मारली असती..

ज्यावेळी दुबईला तू तुझ्या विमान कंपनीच्या समूहासह ज्याला (इंग्रजीमध्ये क्रू असं म्हणतात) असा जेव्हा विमानात प्रवेश केलास, त्यावेळेला टीमचा कप्तान या नात्याने ‘आपण सर्वजण आपल्यावर विसंबून राहिलेल्या या सर्व प्रवाशांना सुखरूपपणे त्यांच्या इच्छित स्थळी पोहचवू ‘ या आत्मविश्वासाने, Flydubai कंपनीच्या विमानात प्रवेश केला होतास. समूहातील सर्वांशी तुझे चांगले संबंध होतेच त्यातून अगदी जवळचा म्हणजे जो को-पायलट म्हटला जातो सहवैमानिक म्हणला जातो तो तर तुझ्या विश्वासातलाच..

दोघांचा समन्वय हा फार महत्त्वाचा कारण तुम्हा दोघांवर या १७४ प्रवाशांच्या जीविताची जबाबदारी होती. त्यांना सुखरूपपणे नेणे हे विमानाचा चालक म्हणून तर काम होतेच पण विमान कंपनीचा एक जबाबदारी जबाबदार अधिकारी म्हणूनही होते. विमान निघाल्यावर हवाई सुंदऱ्या विमान प्रवाशांना आपत्कालीन स्थितीत कसे वागायचे याचे शिक्षणही देऊ लागल्या. तू विमान चालवत होतास कॉकपिटमध्ये गेल्यावर नियमानुसार कॉकपिट चा दरवाजा आतून बंद करण्यात येतो. कारण कोणीही अगंतुक व्यक्तीने तेथे प्रवेश करु नये यासाठी ही खबरदारी घेण्यात येते. अगदी दोन विमान चालकांपैकी एकाला लघुशंकेसाठी जायचे असले तरी कॉकपिटच्या दरवाजाच्या बाहेर हवाई सुंदरी विमानात असलेल्या लोखंडी सरकत्या पेट्यां ची एक भिंत उभी करतात..

त्या भिंतीच्या मागे तीन तीन हवाई सुंदरी उभ्या राहतात

आणि मग आतला एक सहवैमानिक लघुशंकेसाठी स्वच्छतागृहात जातो. तेथून बाहेर पडल्यानंतर तो कॉकपिट मध्ये जातो कॉकपिटचा दरवाजा बंद करतो आणि मगच त्या हवाई सुंदऱ्या इतर प्रवाशांसाठी स्वच्छतागृहाचा मार्ग उपलब्ध करून देतात इतकी कडेकोट व्यवस्था आणि बंदोबस्त हा कॉकपिटच्या सुरक्षिततेसाठी केला असतो..

पण स्मित तुला काय माहिती की ज्याच्यावर मी थोड्या वेळाने विमानाचा भार थोड्या कालावधी करता का विना सोपवणार आहे त्याला कुठल्यातरी योजनेनुसार काही कृती या लवकर करायच्या आहेत त्या करण्यासाठी तो, विमान चालवण्यामध्ये एकाग्र झालेल्या तुझ्यावर पटकन धारदार शस्त्राने हल्ला करेल?

पण त्याने हल्ला तर केलाच शिवाय विमानाचा प्रवास धोकादायक होण्यासाठी तू हडबडून जाण्यासाठी अशी काही कृती केली की ज्यामुळे ते विमान सुसाट वेगाने जमिनीच्या दिशेने खाली येऊ लागले काही मिनिटातच किंवा क्षणातच हजारो फूट ते खाली आले दुसऱ्या बाजूने तू विमान सावरण्याचा प्रयत्न करत होतास आणि स्वतःचा बचाव करण्यासाठी प्रयत्न करत होता पण विश्वासघातकी सहका ऱ्याचे सपासप वारही चालू होते..

त्याही कालावधीत तू प्रसंगावधान राखून एक बटन असे दाबलेस की ज्यामुळे कॉकपिटचा दरवाजा उघडला गेला.

बाहेरच्या बाजूला असलेल्या सर्वांना तोपर्यंत कल्पना आली होती की कॉकपिट मध्ये काहीतरी गडबड आहे पण ती गडबड आहे का विमानातला बिघाड आहे हे समजत नव्हते. कॉकपिटचा दरवाजा उघडल्यावर मात्र व्यवसायाने प्लंबर असलेला ” यानीव हायुन” हा तुझ्या मदतीस आला..

त्याने पटकन काय केले तर त्या हल्लेखोर सहवैमानिकाला पटकन ताब्यात घेतले आणि कॉकपिटच्या बाहेर ढकलून दिले बाहेरच्या व्यक्तींनी तत्काळ त्याच्यावर झडप घातली आणि त्याला जेरबंद केले विशेषतः असाफ राजूआन आणि झिक्वा मेन्स यांनी प्रवाशांकडून मोबाईलच्या चार्जिंग केबलने आणि हेडफोनच्या वायरने त्याचे हातपाय बांधले असाफ राजवान हे एक व्यावसायिक आहेत आणि झिवा मेन्स हे बँकेचे कार्यकारी अधिकारी आहेत..

तोपर्यंत तू रक्तबंबाळ अवस्थेत झुंजतच होतास नंतर ज्यावेळी विमान प्रवाशांपैकी दोघजण हे तुझ्याच विमान कंपनीचे वैमानिक होते ते तुझ्यापाशी आल्यानंतर त्यांच्या ताब्यात विमान देऊन तू कॉकपिटच्या बाहेर आलास..

तुला हे माहित्ये का, की त्या सहवैमानिकाचे नाव अद्याप पावेतो जाहीर केलेले नाही केवळ तो ओमान या शांतता प्रिय देशातला आहे एवढेच सांगितले आहे. कारण खरे नाव कळले तर आपोआप आणखीन काही गोष्टी बाहेर येणार आहेत..

तुला हे माहित्ये आहे का, की इजराइलनेही दोन नवीन सहवैमानिक विमान चालवायला बसल्यावर तुझ्या विमान कंपनीला विनंती केली होती की वेळापत्रकानुसा ते विमान इजराइललाच येऊ द्यात पण कंपनीने ती विनंती नाकारली आणि विमान सौदी अरेबियाला उतरवले..

तुला त्याचे कारण माहिती आहे का, कारण आंतरराष्ट्रीय कायद्यानुसार हवेमध्ये उडणाऱ्या विमानामध्ये एखादा गुन्हा घडला तर ते विमान ज्या कंपनीच्या मालकीचे आहे ती कंपनी ज्या देशांमध्ये नोंदणीकृत असेल त्या देशाचा कायदा अंमल करतो व त्या देशातील कायद्यानुसार त्याचे वर गुन्हा दाखल करण्यात येतो किंवा ज्या देशांमध्ये ते विमान उतरवले गेले आहे त्या देशाच्या कायद्यानुसार अपराधी व्यक्तीविरुद्ध गुन्हा दाखल करण्यात येतो..

तुला हे माहित्ये का, शांतताप्रिय देशाचा ओमान सहवैमानिक गुन्हा करतो त्यामुळे त्याला शांतता प्रिय देशांमध्येच गुन्हा दाखल करून अटक करण्यात आल्याचे नाटक वठवण्यात येईल. तुला माहितीये का आता अनेक खोट्या कपोल कल्पित गोष्टी रचल्या जातील त्यामध्ये तुझे ओमानी सहवैमानिकाशी वैयक्तिक कारणावरून भांडण झाले असेही दाखवण्यात येईल..

पण या सर्व प्रश्नांची तुला त्यावेळी माहिती असण्याचे कारणच नव्हते कदाचित या प्रश्नांची उत्तरे पुढील अनेक महिने मिळणार नाहीत. कारण अनेक शांतता प्रिय देश तुझ्या पराक्रमामुळे नुसते चकीतच झाले नाहीत तर स्तंभित झाले आहेत..

अरे मित्रा, तू जर कॉकपिटचा दरवाजा उघडला नसतास तर काय झाले असते कल्पनाही करवत नाही. सरळ सरळ जमिनीच्या दिशेने गुरुत्वाकर्षणामुळे त्यामध्ये भर विमानाच्या वेगामुळे एक तर संपूर्ण विमान जमिनीच्या पृष्ठभागावर आदळले असते आणि तुझ्यासह सर्व समूहाचा आणि प्रवाशांचा दुर्दैवी मृत्यू ओढवला असता..

सर्वजण जळून खाक झाले असते काही शिल्लक राहिले नसते आणि मग नंतर जाहीर झाले असते एका हिंदुस्थानी विमान चालकाने नियोजनपूर्वक १७४ इजरायली नागरिकांचा बळी घेतला आणि हे सर्व बालंट भारतावर आले असते जेणेकरून

“हिंदुस्तानचा जागतिक भगवा आतंकवाद ” असा खोटा प्रचार करण्यात आला असता. हिंदुस्थानवर आणि भारत मातेवर नामुष्कीची वेळ आली असती. माथी एक कलंक लागला असता. जागतिक राजकारणाची जिओ पोलिटिकल सर्व समीकरणे बदलली असती. मित्र राष्ट्रे ही शत्रू राष्ट्रे झाली असती आणि खऱ्या शत्रू राष्ट्रांना अत्यानंद झाला असता..

आणि जर तसे झाले नसते तर ज्या क्रूरवर्म्याने विश्वासघातकी सहचालकाने तुझ्यावर हल्ला केला त्यानेच विमानाचे नियंत्रण स्वतःच्या हातात घेतले असते आणि ठरलेल्या योजनेनुसार कुठल्यातरी शांततावादी देशांमध्ये प्रवेश करून ते विमान त्याने हायजॅक केले आहे त्या विमानाचे त्याने अपहरण केले आहे असे जाहीर केले असते आणि त्या १७४ ज्यू नागरिकांच्या मोबदल्यामध्ये अतिरेक्यांच्या मागण्या समोर ठेवल्या असत्या..

पण स्मित तुझ्या प्रसंगावधानामुळे त्या शांततावादी अतिरेक्यांच्या षडयंत्राला तू तिलांजली दिलीस. त्यांचे सर्व अंदाज पोकळ ठरवलेस. त्यांच्या योजनांना सुरुंग लावलास.
स्मित तुझ्या प्रसंगावधानाला, तुझ्या शौर्यतेला, तुझ्या साहसाला त्रिवार मुजरा वैयक्तिक म्हणून तर करतोच आहे, परंतु शिक्षण प्रसारक मंडळीच्या छत्राखाली असलेल्या वेलींगकर इन्स्टिट्यूट, पोद्दार कॉलेज, रुईया कॉलेज, याशिवाय पुण्यातील स. प. महाविद्यालय, प्रा नारळकर मॅनेजमेंट इन्स्टिट्यूट, सोलापूरमधील हरीभाई देवकरण प्रशाला, तसेच प्रा. मंगळवेढेकर इन्स्टिट्यूट, पुण्यातील नू. म. वि. नावाने सुप्रसिद्ध असलेल्या सर्व शाळा, बी. एड. कॉलेजच्या सर्व आजी व माजी गुरुजनांचे सेवकांचे आणि विद्यार्थ्यांच्या वतीने मानाचा मुजरा करीत आहे. कारण आम्हा सर्वांची छाती अभिमानामुळे आज फुगून आली ती केवळ तुझ्यामुळेच..

स्मित तुझे नाव आल्यानंतर नावामुळे व आडनावामुळे हा कोणत्या जातीचा आहे कोणत्या धर्माचा आहे कोणत्या पंथाचा आहे याचा शोध लगेच सुरू झालाच काही जणांनी तुझ्या मच्चर या आडनावाच्या स्पेलिंग वरून उच्चार मच्छर असा केला. पण तू आज गरुडाचा पराक्रम दाखवला आहेस तुझे कौतुक करावे तेवढे थोडेच आहे..

तुझ्या वडिलांचे नाव उपेंद्र आहे पण उपेंद्रच्या पोटी जन्म घेतलेल्या स्मितने आज इंद्रासारखा पराक्रम गाजवला आहे.
भारतासाठी तू खरोखरच एक अनमोल रत्न आहेस परत एकदा तुझे त्रिवार अभिनंदन। शुभेच्छा. तुझ्यामुळे आपल्या संस्थेची मान उंचावली आहे हे सांगण्यास आम्हाला अभिमान वाटतो. धन्यवाद,

जय हिंद !

लेखक : श्री सदानंद फडके

प्रस्तुती : श्री मोहन निमोणकर

संपर्क – सिंहगडरोड, पुणे-५१ मो.  ८४४६३९५७१३.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “गुरुदक्षिणा…” ☆ श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला ☆

श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला

? जीवनरंग ?

☆ “गुरुदक्षिणा…” ☆ श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला ☆

नयन.

नयन नाव होतं त्याचं.

प्रचंड हुश्शार.

सातवीत सगळ्या तुकड्यांमधे पहिला आलेला तो.

आठवीत नेनेसरांच्या वर्गात.

हुश्शार मुलगा चांगलाच असायला हवा की नाही?

नयन नव्हता तसा.

प्रचंड उपद्रवी… भांडखोर… उर्मट… एखाद्या डाॅनसारखा कुप्रसिद्ध.

आपल्याच शिक्षकांना तोंडघशी पाडणारा… शिक्षकांची व्यवस्थित नक्कल करणारा.

निगरगट्टासारखा मार खायचा… वर फिदीफिदी हसायचा.

100% गाॅन केस… पोरं सोडा, शिक्षकसुद्धा वचकून असायचे त्याला.

दुसरा कुणी असता, तर कधीच एल. सी. हातात मिळालं असतं..

कारण एकच..

त्याची हुशारी.

 

स्काॅलरशीपच्या परीक्षेत सुद्धा जिल्ह्यात पहिला. शाळेला तो हवा होता आणि नकोही.

14 जून. शाळेचा पहिला दिवस. नेने सर ‘आठवी अ’ च्या वर्गावर निघालेले. मोकाशी सर घाईघाईने आले.

“नेने सर.. बेस्ट लक. पार्सल पाठवलंय तुमच्या वर्गात, नयन नावाचं. चांगला फोडून काढता जा त्याला.

त्याशिवाय सुधारणार नाही तो… “

नेने सर कसनुसं हसले. पाच वर्षांची त्यांची सर्विस. एकही दिवस हातात छडी घेतली नाही कधी.

ते काय फोडून काढणार?

खरं तर नेनेसर स्वतः अतिशय हुशार. शिकवण्याची पद्धतही वेगळी. पुस्तकाबरोबर पुस्तकाबाहेरचंही बरंच काही.

केमिस्ट्री शिकवायचे. रिअॅक्शन लक्षात ठेवण्याचं, त्यांचं स्वतःचं भन्नाट टेक्निक होतं. खरं तर केमिस्ट्रीसारखा बोर विषय. जीव ओतून शिकवायचे. मजा यायची. चिडलेलं तर त्यांना कधी कुणी बघितलेलंच नव्हतं. मारणं तर दूर की बात. चांगल्याचं जाहीर कौतुक. कुणी चुकलं तर तास संपल्यावर थांबवत. हलकेच समजावून सांगत. जाहीर पंचनामा कधीच नाही. या सगळ्याची रिअॅक्शन काय? .. नेने सर सगळ्यात पाॅप्युलर. त्यांच्या वर्गात कधीच गोंधळ नसायचा. पोरं मन लावून शिकायची. छान मार्कस् मिळवायची. वर्गातून ओरडण्याचा आवाज कधीच यायचा नाही. आलाच तर अधूनमधून हसण्याचा खिदळी आवाज.

थोडक्यात काय? नेनेसरांची त्यांच्या स्टुडन्टस्’शी व्यवस्थित केमिस्ट्री जुळायची.

पहिला दिवस. पहिला तास. अटेन्डन्स.

नयन दुसानीस… 

नेने सरांनी मान वर करून नयनला नीट बघितला.

.. हिरवे डोळे. डोक्यावर काटेरी केस. साळींदरासारखे. निर्मळ चेहरा. आणि ओठांवरचं छद्मी हास्य.

कुठली तरी संधी मिळावी, म्हणून वाट पाहणारी बाॅडी लँग्वेज. चेहऱ्यावर हुशारीचं तेज. पण त्याला कोंदण मग्रुरीचं.

… नेनेसरांनी सहज वाचला त्याचा चेहरा. एक्स्ट्रा एनर्जी आहे या पोरात. निचरा होत नाहीये. हा चेहरा मास्क आहे… काहीतरी लपवणारा… कळेल..

 

दुसऱ्या दिवशीपासून नयन फाॅर्मात. उपद्व्याप सुरू.

नेनेसरांनी लेक्चर संपल्यावर थांबवला त्याला.

“घरी कोण कोण असतं? “

‘वडील, भाऊ, आजी.. ‘

” आई? “

‘ हो, आईही आहे ‘… नयनचं नजर चोरणारं उत्तर.

नेनेसरांनी समजून घेतलं.

‘”तू सुधारला नाहीस तर तुझं नाही, माझं फेल्युअर असेल ते. एक डील करू यात. दिवसभरात तू चुकलास तर त्याची शिक्षा मी भोगेन. तू एखादी चांगली गोष्ट केलीस तर, शाळेच्या नोटीसबोर्डवर तसं लिहून ठेवेन. “

 

तसं रूटीनच सुरू झालं… नयननं वर्गात कचरा केला… नेनेसरांनी झाडू घेवून साफ केला.

नयननं बोर्डवर नेनेसरांचं ड्राॅईंग काढलं… नेनेसरांनी ते पुसलं नाही… शाळेच्या नोटीसबोर्डवर लिहिलं.

” नयन उत्तम चित्र काढतो. मधल्या सुट्टीत सगळ्यांनी, आठवी अ च्या वर्गात जाऊन बघावे. “

मधल्या सुट्टीत सगळी झुंबड वर्गात… नयनला थोडीशी लाज वाटली.

आंतरशालेय वक्तृत्व स्पर्धा… नयनला पहिलं प्राईझ. पुन्हा नोटीसबोर्डवर नयनचं कौतुक.

 

नयननं एक नवीनच सुरू केलंय. नेनेसर फळ्यावर लिहण्यासाठी वळले की, नयन गडगडाटी हसायचा.

सगळ्यांना माहिती होतं, कोण हसतंय ते.. नेनेसर काहीच झालं नसल्यासारखे पुढे शिकवीत राहिले.

नेमका प्रिन्सीपलसरांचा राऊंड. त्यांच्या कानावर हे हसणं गेलं. ते वर्गात शिरले.

” नेनेसर तुम्हाला ऐकू येत नाहीये का? अशानं शाळेत डिसीप्लीन राहील का? कोण आहे तो शोधून काढा. आणि घेऊन या माझ्याकडे. रस्टिकेट करतो त्याला. “

‘ नको सर.. माझे सगळे स्टुडन्टस् चांगलेच आहेत. आय विल मॅनेज सर.. ‘

” काय मॅनेज करताय? तुमची स्ट्रॅटेजी बदला.. नाहीतर तुम्हालाच सरळ खालच्या वर्गावर टाकतो. “

… प्रिन्सिपल सर ताडताड निघून गेले.

 

मान खाली घालून नेनेसरांनी ऐकून घेतलं.. नयन हादरला. त्याचे हिरवे डोळे दाटून आले. तास संपल्यावर टीचर्स रूममधे सरांच्या पायावर डोकं ठेवून ढसाढसा रडला.

सरांनी पाठीवर हात फिरवून म्हटलं, ” मला माहित्येय. तुझं दुःख काय आहे ते. माझी आईही, मी चार वर्षाची असतानाच गेली. तुझ्यासारखाच जगावर सूड उगवायचो मी. उशिरा कळलं, मी चुकत होतो.

नयनला चांगल्या गोष्टींसाठी लोकांनी लक्षात ठेवावं असं मला मनापासून वाटतं. अजून एक ऐकशील.

तुझी नवीन आई तेवढीच प्रेमळ आहे. तिला एक संधी दे.. कदाचित तुझ्या सख्ख्या आईची जागा ती घेवू शकणार नाही… पण तिचा सख्खा मुलगा तू नक्की होऊ शकशील.. “

 

त्या दिवसापासून…

नयन पार बदलून गेला. हुश्शार… हवाहवासा. आपला नयन. सगळ्यांचा लाडका. अगदी त्याच्या नवीन आईचाही.

नयन नववीत गेला.. तरीही नेनेसरांचा लाडका विद्यार्थीच राहिला. नेनेसरांना भेटल्याशिवाय रहायचा नाही.

 

बघता बघता नयन दहावीत..

दहावीत शाळेतून पहिला.. नेनेसर खूष… शाळा खूष.

आयआयटीच्या तयारीसाठी त्याला पुण्याला ठेवला त्याच्या बाबांनी..

पुढे तो आयआयटी खरगपूरला गेला..

…

आज किती तरी दिवसांनी नेनेसर वाचू शकत होते. बहुधा तीन वर्षांनंतर.

… ती नकोशी आठवण. शाळेच्या टेंपोमधनं नेनेसर, केमिस्ट्री लॅबसाठी मटेरियल घेवून येत होते.

टेम्पोला झालेला एक्सीडेंट… फुटलेल्या काॅन्सन्ट्रेटेड अॅसिडच्या बाटल्या… तो अॅक्सीडेन्ट नेनेसरांचे डोळे घेवून गेला. सगळीकडे अंधार. नेनेसरांना सवय झालेली.

” काही हरकत नाही. तीस वर्षे का होईना, जग बघितलंय मी. किती तरी जण जन्मापासून अंधाराशी दोस्ती करून जगत आहेत. “

तरीही..

नेनेसर काठी घेवून शाळेत यायचे. मस्त शिकवायचे. कुणीतरी स्टुडन्ट ते सांगतील तसं, फळ्यावर लिहायचे. केमिस्ट्री शिकवायला, नेनेसरांना डोळ्यांची गरजच नव्हती. शाळा नेनेसरांना सोडूच शकत नव्हती.

 

कालच नेनेसरांचं आॅपरेशन झालं. कुणीतरी डोनर नेनेसरांना आपले डोळे देवून गेला. आज सकाळीच डोळ्यांवरची पट्टी काढली.

… आणि हे पत्र. कितीतरी दिवसांनी नेनेसर अक्षरं वाचत होते.

“… आणखी काय लिहू सर? तुम्ही जगाकडे बघायची खरी दृष्टी दिलीत. हा ज्ञानदीप कधी विझता कामा नये. सेकंड ईयरलाच कळलं, मला कॅन्सर आहे. एक वर्ष हाताशी… सर थर्ड ईयरला टाॅप करण्यासाठीच अभ्यास केला. रिझल्ट लागेल तेव्हा मी नसेन….. माझे “डोळे” वाचतील तो रिझल्ट. भरपूर छळलंय तुम्हाला सर… पहिल्यांदा चांगलं काही करण्याची संधी मिळत्येय. सोडणार नाही… अशीच वाट दाखवत रहा.. न विझता. माझी ही गुरूदक्षिणा स्वीकारावी सर… “

 

पुढचं वाचवेना. अक्षरानं ओळख सांगितलेली. नेनेसरांनी पटकन् आरसा मागितला. आरशात बघितलं.

त्यांचे नवीन हिरवे डोळे पाझरत होते.

 

… नवीन डोळ्यांनी एकच प्रश्न केला.

” आता तरी नयनला, लोक लक्षात ठेवतील ना सर? “

 

सरांनी आठवणीचे डोळे मिटले. नयनचा हसरा चेहरा स्पष्ट दिसू लागला.

 

© कौस्तुभ केळकर नगरवाला

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ समुद्रस्नान की समुद्रदर्शन? ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

? मनमंजुषेतून ?

☆ “समुद्रस्नान की समुद्रदर्शन?”  ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

☆

समुद्र अत्यंत शक्तिशाली असतो हे त्याच्या आसपास जीवन व्यतीत करावे लागते त्या लोकांना चांगलेच ठाऊक असते!

मच्छीमार बांधवांना केवळ पोटासाठी समुद्राच्या पोटात खोलवर शिरावे लागते. एरव्ही ते सुद्धा समुद्राच्या नादी लागत नाहीत. पाण्यात होडी घालताना त्याला हात जोडून नमस्कार करतात. पाण्यातून किनाऱ्यावर सुखरूप आल्यावरही मागे वळून हात जोडतात. तिथे, ज्यांचा समुद्राशी कधीतरी संबंध येतो, त्यांनी समुद्राशी कसं वागलं पाहिजे?

भारतीय शास्त्रांत काही विशिष्ट तिथींचा अपवाद वगळता समुद्र स्नान निषिद्ध मानले आहे, यामागे काही कारणे असतीलच.

समुद्राचे केवळ दर्शन घेतल्यानेही मनाला आनंदाची अनुभूती येऊ शकते. परंतु समुद्र माणसाला आकर्षित करून घेतो, हेही खरे. पण म्हणून बेधडक त्याच्या अंतरंगात प्रवेश करणं योग्य नाही. आपल्या पुढे शंभर पावलं सपाट किनारा असताना आपल्यापर्यंत येणाऱ्या लाटेच्या पाण्यात घोट्यापर्यंत पाय भिजवून, हातात ते जल घेऊन तेच समुद्राला पुन्हा देऊन मागे वळावं… आणि किनाऱ्यावर वाळूत बसून तो महा सागर अनुभवावा!

समुद्राच्या पाण्यात निम्मी वाळूच तर असते आणि तीही अगदी बारीक. लाटेसरशी ती वाळू किनाऱ्यावर पसरत जाते. आणि पाणी मागे सरल्यावर तिथेच राहते काही वेळ. दुसरी लाट येताच पुन्हा समुद्रात जाण्यासाठी आतुर असते. त्यामुळे याक्षणी तुमच्या पायांखाली असलेली वाळू कधी निसटून जाईल हे सांगता येत नाही!

त्यात कोकणातील समुद्र किनारे बऱ्याच ठिकाणी उताराचे आहेत. स्थानिक नागरिकांशी दोन शब्द बोलल्यास सर्वकाही समजू शकते. पण कानांत वारे शिरलेल्या शहरी प्रजेला स्थानिकांशी बोलणं कमीपणाचं वाटू शकतं!

त्यात मुख्यतः पुरुषांना इथे पुरुषार्थ दाखवण्याची खुमखुमी येते. महाविद्यालयीन विद्यार्थ्यांच्या सहलींमध्ये दोन भिन्न लिंगी समूह एकत्रित असतील तर हिरो संप्रदाय काहीतरी सिद्ध करण्याच्या प्रपंचात गुंतून जातात.

तो दुचाकी जीवघेण्या वेगात आणि रीतीने दामटत असतो आणि त्याला मिठी मारून बसलेली ती रोमांचित होत असते… तो किती हिंमतवाला आहे.. हे ती शब्दांविनही व्यक्त करीत राहते… आणि त्याचा वेग आणि आवेगही वाढत जातो!

समुद्रकिनारही असेच दृश्य असते. किंबहुना नदी, धरणे, तलाव या ठिकाणीही हाच दुरंगी सामना दिसू शकतो.

नव्या मराठीत या अगोचरपणाला शायनिंग खाणे किंवा मारणे अशी संज्ञा आहे. याला कुटुंबासोबत आलेले पुरुषही अपवाद नाहीत!

आताशा reels साठी कोण काय कreel याचाही भरवसा देत येत नाही.

पाण्यातले साहसी क्रीडा प्रकार आयोजित करणारे व्यावसायिक तुमच्या जीवाला किती प्राधान्य देतात, ही तपासून पाहण्याची बाब आहे. लाइफ जॅकेट हे पाण्यात बुडण्यापासून काहीच मिनिटे वाचवते हे लक्षात घ्यावे. पण ही वस्तू महाग म्हणून व्यावसायिक पुरेशा संख्येने उपलब्ध करून देत नसतील बहुदा. आणि जे देतात त्या वस्तूंचा दर्जा की. तपासतो?

शिवाय आपण यात घबराट दिसतो म्हणूनही काही लोक ते अंगावर चढवत नाहीत. मनात प्रचंड भीती असताना जल प्रवासाचा आनंद एक पर्यटक म्हणून कसा घेता येतो हे समजत नाही. ज्यांना पोटासाठी हा प्रवास करावाच लागतो, त्यांच्याबद्दल काय बोलावे? केवळ नशिबावर हवाला ठेवून राहायचे हे त्यांच्या हाती.

जंजिरा किल्ल्यावर मोठ्या बोट मधून छोट्या तराफ्यांवर उतरणाऱ्या लोकांसाठी काय सुरक्षितता साधने असतात? त्यात मग ते तिथले नेहमीचे लोक तुम्हांला आणखी घाबरवून टाकायला सज्ज असतातच. काही विपरीत घडले तर जबाबदारी नावाची गोष्ट स्वीकारणार कोण आणि मेलेल्या माणसाला त्याचा काय उपयोग?

शालेय किंवा महाविद्यालयीन सहलींचे आयोजन करताना या पिढीच्या अतिरेकी साहसी वृत्तीला लगाम घालणं केवळ अशक्य असते. एका शिक्षकाच्या ताब्यात चार मुलं आहेत… आणि त्यातील एक जण त्यांच काहीही न ऐकता पाण्यात पुढे पुढे जात राहिला तर शिक्षक काय करू शकतात? तो विद्यार्थी जिवंत पाण्याबाहेर आला तरच शिक्षा करू शकणार.. एवढंच!

त्यामुळे समुद्र सहली मध्ये पाण्यात उतरू न देणे हा एकमेव नियम असणे आणि तो पाळणे हाच एकमेव उपाय.

मागील सर्व अपघातांचा इतिहास पाहता विद्यार्थी शिक्षकांच्या सूचनांकडे पूर्ण दुर्लक्ष करून पाण्यात पुढे गेल्याची उदाहरणे अधिक दिसतील. एकदा त्या प्रचंड समुद्रात, गर्दीत आणि गोंधळात प्रवेश केल्यावर नियंत्रण ठेवणं अशक्य गोष्ट असते! कमरेला दोर बांधून थोडे पुढे जाणे तुलनेने सुरक्षित असते.. पण तेवढा उद्योग का करावा? पण असा दोर सोबत कोण ठेवणार हाही प्रश्नच नाही का?

भरती ओहोटी चे वेळापत्रक अनेक किनाऱ्यांवर प्रदर्शित केलेले असते… त्याकडे गांभीर्याने न पाहणारे अतिशहाणे मग अलिबाग किल्ल्यावर सहा तास अडकून पडतात!

समुद्रातील वाळूत चालताना नेहमीच्या रस्त्यावर चालताना लागतो त्यापेक्षा दुप्पट वेळ लागतो हे समजून न घेतल्याने पाण्यातून मागे फिरणाऱ्या लोकांना समुद्र माफ नाही करू शकत. केवळ धम्माल करायला आलेली मुलं, महिला यांत मोठ्या संख्येने बळी गेलेले आहेत.

बाकी समुद्र hypnotize करतो, अमावास्या, पौर्णिमेला अशा घटना जास्त होतात… हे वादग्रस्त विषय असून ते पूर्वानुभवाचे सामान्यीकरण असू शकते.

एकदा अपघात घडून गेल्यावर तो त्या त्या व्यक्तींच्या, कुटुंबांच्या स्मृतिपटलांवर मोठा काळा डाग बनून राहतो… कायमचा!

त्यातून हाताशी आलेली, तरुण, एकुलती एक मुलं गमावणे किती क्लेशदायक असते.. हे अनुभवाशिवाय समजणार नाही!

समुद्राच्या पाण्याला पाय लावावेत, पाय लावल्याबद्दल हात जोडून क्षमा याचना करून मागे सरावं, हे उत्तम! दर्शन पुरेसं आहे समुद्राचं!

बाकी प्रत्येकास मनाजोगते जगण्याचा आणि मरण्याचा अधिकार आहेच!

परदेशातील समुद्रकिनारे, तिथले आधुनिक साधनांनी सुसज्ज जीवरक्षक, तिथल्या लोकांची जल साक्षरता याची आणि आपल्याकडच्या परिस्थितीची तुलना होऊ शकत नाही. आणि आपल्याकडे माणशी एक सुरक्षारक्षक नेमला तरीही लोक ऐकतीलच याची शाश्वती नाही! 

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ तिच्या हातचे पोहे…! ☆ शीला पतकी ☆

शीला पतकी 

? मनमंजुषेतून ?

☆ तिच्या हातचे पोहे…! ☆ शीला पतकी ☆

☆

परवा फेसबुक वर काही गोष्टी सर्च करत असताना एक व्हिडिओ पाहिला त्यामध्ये सोलापुरातील एक तरुण एक मनोरुग्ण अत्यंत किळसवाण्या अवस्थेत रस्त्यावर पडून होता आणि त्याला एक तरुण धरून उभा होता तो मनोरुगण असलेला तरुण त्याला विरोध करत होता पण याने त्याला नेटाने खाली बसवले. बरोबर आणलेल्या न्हाव्याच्या मदतीने त्याचे केस कापत होता. असंख्य जखमा डोक्यात झालेल्या… डोक्यातून जे बाहेर येत होतं ते बघण्याच्या पलीकडचं होतं… नंतर त्या मुलाला स्वच्छ वगैरे करून त्याने सिविल हॉस्पिटल मध्ये ऍडमिट वगैरे केल…

तो व्हिडिओ पाहिल्यानंतर मी त्या मुलाला फोन केला कारण तिथे नंबर होता आणि तो सोलापुरात असल्यामुळे ते लगेच शक्य झाले. मी त्याच्या कामाचे कौतुक केले कारण तरुणाईचा उद्धट जल्लोष पाहिल्यानंतर अशा तरुणाईची समाजा प्रति असलेली निष्ठा आणि संवेदनक्षमता पाहून मी भारावून गेले. मी त्या तरुणाला फोन केला आणि दुसऱ्या दिवशी भेटायला बोलावले. माझे नाव ऐकून तरी सोलापुरात बऱ्याच जणांना माहित आहे त्यामुळे त्याला आनंद झाला आणि दुसऱ्या दिवशी वेळ घेऊन तो माझ्या घरी भेटायला आला.

आशिष त्याचे नाव! त्याने आपला परिचय करून दिला आणि हे काम दहा वर्षापासून तो करतोय त्याच एक फाउंडेशन आहे त्याची नर्सिंग कोर्स झालेली बायको या कमी त्याला मदत करते अशी सर्व माहिती त्यांनी मला सांगितली.

या प्रसंगाची सुरुवात कशी झाली हे काम त्याने का निवडले अशी तपशिलावर चर्चा झाली तेव्हा त्यांनी सांगितले की… “सिद्धेश्वर मंदिरामध्ये दर्शन घेऊन येत असताना अनेक भिकारी… मनोरूगण असलेले,… रस्त्यावरच्या कचराकुंड्यामध्ये अन्न शोधणारी… अशी खूप मंडळी दिसतात… त्यातील एक मुलगी रस्त्यावरती कचराकुंडी जवळ अन्न शोधताना मला दिसली. मुलगी तरुण होती. वय साधारण वीस बावीस वर्षे आणि मी थोडा काळजीत पडलो नंतर मी पोलिसांना फोन केला पोलीस आले पण फारशी दखल घेतली नाही. त्यांनी मला दवाखान्यात नेण्यापर्यंत मदत केली ती मुलगी पूर्णपणे मनोरुग्ण होती काही बोलत नव्हती तीला काही स्मरत नव्हते. पत्नी समवेत जाऊन तिला घरी आणले अंघोळ वगैरे घालून स्वच्छ केले बायकोने आपली साडी नेसायला दिली आणि ती मुलगी इतकी सुंदर दिसायला लागली.. गोरीपान होती. आता या मुलीला कुठे सोडावे? हा प्रश्न निर्माण झाला पत्नी नर्स असल्यामुळे घरीच तिची सेवा आम्ही चालू केली. दोन एक महिने ती आमच्या घरी होती त्यानंतर पुनर्वसन करण्याचे माझ्याकडे काही साधना नाही आणि ऐपतही नव्हती मग मी अशा पुनर्वसन केंद्राचा शोध घेतला आणि कर्जत जवळ असे पुनर्वसन केंद्र मला आढळले तिथे जाऊन कार्य करीत असलेल्या ज्योतीताई नावाच्या मॅडमची मी संपर्क साधला त्यांना जाऊन भेटलो त्यानी पुनर्वसन करण्याचे मान्य केले आणि आम्ही तिला त्या ठिकाणी सोडूनआलो. आमच्या घरापासून दूर जाताना मात्र ती अत्यंत हळवी झाली कारण आमच्या आधाराची तिला सवय झाली होती. त्या केंद्रामध्ये तिचे पुनर्वसन.. तिच्यावर काही उपचार… हे चालू होतं. उत्तम खाणे पिणे मोकळी हवा या सगळ्याचा परिणाम तिच्या प्रकृती वरती झाला ती थोडीशी सुधारली काही काही गोष्टी तिला आठवायला लागल्या… ती असंबद्ध बडबडत असे.. त्यातून काही गोष्टी उलगडल्या जाऊ लागल्या… ती मुलगी ज्या गावची होती त्या गावचे नाव लक्षात आले. त्या गावातल्या काही खुणा… आपले वडील कोण होते… असं ती हळूहळू बोलायला लागली… त्या सगळ्याची जुळवा जुळव करून ती मुलगी ज्या गावची होती आणि तिने सांगितलेल्या खूणा… तिच्या वडिलांचा असलेला टेलरिंग चा व्यवसाय या सर्वांचा मी शोध त्या गावी जाऊन घेतला. अशी एखादी मुलगी कुणाची नाहीशी झाली का याचाही शोध घेतला… आणि मला एक कुटुंब असे सापडले यांचा टेलरिंगचाच व्यवसाय होता आणि त्यांची मुलगी आठ वर्षांपूर्वी हरवली होती. त्यांना त्या मुलीचा मी फोटो दाखवला काही गोष्टी जुळल्या मग त्या मुलीला घेऊन आम्ही त्या गावी गेलो त्या मुलीलाही हळूहळू सगळ्या गोष्टी आठवल्या त्या कुटुंबाला तरी विलक्षण आनंद झाला. संस्थेच्या नियमाप्रमाणे सर्व गोष्टींची पूर्तता करून आम्ही बाहेर पडलो. आम्ही येताना मात्र तिच्या डोळ्यात कृतज्ञता होती. कारण तिचे कुटुंब तिला पुन्हा मिळाले होते तरीही चाचपड होतीच पण आई-वडील मिळाल्यामुळे आम्ही निर्धास्त होतो.

थोड्या दिवसांनी फीडबॅक घेण्यासाठी मी पुन्हा त्या कुटुंबात गेलो तिला छान स्विकारले होते तिची काळजी घेतली होती ती आता पूर्वीपेक्षा सुंदर दिसत होती कारण तिची माणसं तिला भेटली होती. आमच्या गप्पा झाल्या सगळ्या कुटुंबाची बातचीत झाली. तिच्यामध्ये झालेल्या सुधारणा ने आम्ही समाधानी झालो. हे सर्व आम्ही बोलत असताना ती आतून ट्रेमध्ये पोह्याच्या डिश घेऊन आली आमच्या हातात तिने पोहे दिले. त्या क्षणाला मला झालेला आनंद मी वर्णन करू शकत नाही. जी मुलगी कचराकुंडीवर अन्नाचे कण वेचत वेड्यासारखी जगत होती त्या मुलीने आपल्या कुटुंबात परत प्रवेश मिळवला.. कुटुंबाचे प्रेम तिला मिळाले… घरातील बऱ्याच गोष्टी ती पुन्हा करायला शिकली होती… आज तिने माझ्यासाठी केलेल्या पोह्याला अमृताची चव होती. तिच्या हातचे पोहे खाऊन मी तृप्त झालो. डोळ्यात आलेल्या पाण्याने समोरचे काहीच दिसत नव्हते “… ही सर्व कथा सांगताना तो तरुण आजही भारावलेला होता आणि मला म्हणाला ताई 218 लोकांचे या पद्धतीने मी त्यांच्या कुटुंबात पुनर्वसन केले आहे आणि अनेकांना हॉस्पिटलमध्ये आणि पुनर्वसन केंद्रात पाठवले. जी माणसं माझ्या आवाक्याच्या बाहेर आहे त्यांच्यासाठी मी रोज संध्याकाळी खिचडी भात बनवतो किंवा दाल खिचडी बनवतो आणि ती नेऊन त्या ठिकाणी वाटतो. माझी बायको हे सर्व काम करते रोज संध्याकाळी तिथली सगळी वेडी माणसं आमची वाट पाहत असतात कारण त्यांच्या पोटात भूक असते आणि आमच्या हातात माया…! फक्त रविवारी मात्र आम्ही सुट्टी घेतो कारण आमचे कुटुंब आहे कुटुंबाला थोडा वेळ देणे गरजेचे आहे त्या दिवशी सुद्धा लोक तिथे येऊन उभे असतात आमची वाट बघत… आज संस्था लहान आहे पुरेसे कार्यकर्ते मिळाले लोकांकडून काही मदत मिळाली तर हे काम अखंड चालू ठेवण्याचा प्रयत्न मी करेन आणि त्यासाठी मी प्रयत्न करित असतो.

त्याला मी गरजा विचारल्या. आम्हाला रोज तांदूळ डाळ आणि तेल मसाले एवढं मिळालं तर आम्ही त्या लोकांना संध्याकाळचे जेवण देऊ शकतो यापेक्षा वेगळे जेवण त्यांना पचत नाही त्यामुळे हेच जेवण द्यावे लागते लोक आमचा वाढदिवस आहे, लग्नाचा वर्धापन दिन आहे म्हणून मिठाई वाटायला येतात पण त्याचा आम्हाला उपयोग होत नाही कारण ती या लोकांना पचत नाही आणि मग त्याचे वेगळेच परिणाम होतात. त्यामुळे आम्ही स्वतः आणलेली खिचडी त्यांना देतो..

या कामासाठी रस्त्यावरून रुग्ण प्रथम हॉस्पिटलमध्ये पोहोचवणे या कामाला आम्हाला रिक्षा मिळत नाही रिक्षावाले अशी माणसं रिक्षात घेत नाहीत पाचशे मीटर वरून सिविल मध्ये नेण्यासाठी मी दोनशे रुपये रिक्षावाले दिले आहेत तरी लोक न्यायला तयार नसतात आजारी पडलेले आडवे झालेले पेशंट रिक्षात घालून नेणे शक्य नसते यासाठी संस्थेला एक ॲम्बुलन्स घेण्याचा विचार आहे. काही कपडे पांघरूण विजार टी-शर्ट यांची गरज असल्याचे त्यांनी सांगितले. मी त्याला माझ्या माध्यमातून ॲम्बुलन्स मिळवून देण्याचा प्रयत्न करीन असे सांगितले आहे आता त्याच्या ॲम्बुलन्स साठी मी काही मदतीच्या सोर्सेसचा शोध घेत आहे आपल्याला काही माहीत असल्यास जरूर कळवा

आशिष ने सांगितलेली ही सर्व कथा ऐकून मी अगदीच स्तब्ध झाले तो म्हणाला तुमचे नाव खूप आहे तुम्ही मला मदत कराल याची मला खात्री आहे. जाताना त्याने मला नमस्कार केला म्हणाला तुम्ही मला आईच्या जागी आहात मी म्हणाले सामाजिक काम करणाऱ्या माझ्या अनेक मुला आज एका मुलाची भर पडली…!

आशिषला एक ॲम्बुलन्स मिळवून द्यायची हे माझ्या मनाशी ठरवले पाहुयात परमेश्वर किती साह्य करतो इतके छान काम करणार्या या तरुणाईला आमच्यासारख्या अनुभवी वयस्काने मदतीचा हात पुढे करावा यासाठी मी प्रयत्न करणार आहे बाकी सगळं परमेश्वराच्या हातात आपल्यालाही कुणाला असे मदतीचे सोर्सेस ठाऊक असल्यास जरूर कळवा.

©  शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका, सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “समिधाच सख्या या!!” – सत्यभामाबाई टिळक ! – लेख क्र. १७ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “समिधाच सख्या या!!” – सत्यभामाबाई टिळक ! – लेख क्र. १७ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

एक रात्र! केसरी वाडा शांत!! सगळे निद्राधीन… अशा वेळी राजद्रोहाच्या शिक्षेत मंडालेच्या तुरुंगात लोकमान्यांना ६ वर्षांचा कारावास झाल्याची बातमी सांगायला काकासाहेब खाडिलकर पोहोचले. पण खूप रात्र झाल्यामुळे रात्रभर घराबाहेर ओट्यावरच बसून राहिले. सत्यभामाबाईंनी सकाळी दरवाजा उघडला, आणि त्यांना पाहताच काकासाहेबांचा अश्रूंचा बांध फुटला. त्यावेळी अत्यंत धीरोदात्तपणे उच्चारलेले शब्द होते… ” तिकडे शिक्षा झाली हे सांगण्यासाठीच तुम्ही येथे आलात ना? मग असे बायकांसारखे रडत काय बसलात? शिक्षा काही चोरी, लबाडी सारख्या गुन्ह्यासाठी झालेली नाही. लोकांच्या कल्याणासाठी झटण्याच्या गुन्ह्यासाठी झाली आहे. हात-पाय गाळून बसण्यात काय अर्थ आहे? उठा… रडू नका. कामाला लागा. “

हे शब्द होते, आपल्या पतीच्या कार्याशी एकरूप झालेल्या… स्वातंत्र्य लढ्यात झोकून दिलेल्या एका झंझावाती वादळाच्या जीवनातील झुळुकेचे! पती धगधगती ‘मशाल ‘तर पत्नी ‘नंदादीप ‘! शांतपणे, अखंड तेवणारा!!

पतीच्या राष्ट्रभक्तीच्या धगधगत्या अग्नी कुंडात आपलं संपूर्ण जीवन हसत-हसत समर्पित करणारी ही समिधा म्हणजे… लोकमान्य टिळकांची पत्नी… सत्यभामाबाई! पूर्वाश्रमीच्या ‘तापीबाई ‘! कोकणच्या मुक्त हवेत, नारळी, पोफळी च्या सहवासात वाढलेली एक सुदृढ अंगापिडाची बाला! त्या काळानुसार बालविवाह होऊन टिळकांच्या घरात सून म्हणून पुण्यात आलेली. स्वभावाने अतिशय नम्र, अबोल, संस्कारी! अलौकिक अशा साधेपणाची मूर्ती!

लग्न करून आल्यावर लक्षात आले की, आपली लग्न गाठ ही एका राष्ट्रभक्ती ने उसळलेल्या झंझावाताशी झालीये. सत्यभामेनं ठरवूनच टाकलं त्या झंझावाताच्या वेगाशी, जोमाशी एकरूप होत, त्यातच विलीन व्हायचं, एका विधायक रूपात!!

आणि मग… सत्यभामाबाई टिळकांच्या मागे सावली सारख्या उभ्या राहिल्या. त्यांच्या शांत, मूक त्यागामुळे आणि समर्थ अशा साथीमुळेच टिळक कोणत्याही कौटुंबिक चिंतेशिवाय स्वातंत्र्य चळवळीत सर्वस्व देऊ शकले.

लोकमान्य टिळक नेहमी म्हणत,

” माझे संसाराकडे दुर्लक्ष असले तरी मुलांचे संगोपन आणि त्यांच्यावर सुयोग्य संस्कार करण्यास सत्यभामा समर्थ आहे. “

आणि खरंच सत्यभामाबाईंनी…

” आदर्श स्त्री जीवन हे मातृशक्तीतून प्रकटते “… हे आपल्या ६ अपत्यांचं सुयोग्य संगोपन करून सिद्ध च केले.

पुण्यातील केसरी वाडा सत्यभामाबाईंच्या शांत, मूक, मौन संघर्षाचा साक्षीदार आहे. वाड्यातलं ‘माजघर ‘ त्यांच्या संपूर्ण आयुष्याचं केंद्रस्थान आणि आश्रय स्थान होतं जणू काही!

त्या माजघराच्या परिघात राहूनच त्यांनी… राजकीय चर्चा, बैठका, क्रांतिकारकांची ये-जा, पै पाहुणे, केसरी वृत्तपत्राचे कर्मचारी… या सगळ्यांचं आदरातिथ्य, , जेवणाची सोय अगदी विनातक्रार करून ‘अन्नपूर्णा’ च सिद्ध केले.

माजघरातल्या क्रांतीची मूक नायिका होती ती!

त्याच माजघरात राहून… ब्रिटिश पोलिसांच्या अनेक धाडी, घरावर आलेली जप्ती, पतीला वारंवार होणाऱ्या तुरुंगवासाच्या शिक्षा… हे सगळं अत्यंत नि:शब्दपणे आणि धीरोदात्तपणे सहन केलं, पेललं ही आणि झेललं ही! मनातलं वादळ चेहऱ्यावर किंवा शब्दांतून व्यक्त नाही होऊ दिलं.

स्वतः अंधारात राहून लोकमान्यांना प्रकाश देत राहिल्या. त्यांच्या भव्य कार्या मागे शांतपणे, स्थिर राहून एखाद्या दीपस्तंभा सारखा आधार झाल्या त्या!!

टिळकांच्या आयुष्यातील ” ताई महाराज खटला “… हा अत्यंत वादग्रस्त आणि मानसिक त्रासाचा होता. या परिस्थितीत घराची अब्रू, पतीची पत सत्यभामाबाईंनी ढळू दिली नाही. मोठ्या संयमाने तोंड दिले. त्यावेळी टिळकांनी सत्यभामाबाईंना जे पत्र लिहिले होते ते त्या दोघांतील… मूक आणि घट्ट मानसिक नात्याचा पुरावा आहे.

सत्यभामाबाईंचं करारी आणि ठाम रूप ही दिसलं ते त्यांच्या त्याच माजघराच्या सीमेवर उभं राहिलेलं! घरात महत्त्वाचे दस्तऐवज आणि कागदपत्रे आहेत असे कळल्यावर, तपासाला आलेल्या इंग्रज अधिका-याला त्यांनी रणरागिणी च्या आवेशात सुनावले, ” घरातील स्त्रियांच्या खाजगी भागात प्रवेश करता येणार नाही. “… या तेजस्विनी च्या तेजापुढे ब्रिटिश अधिकारी ही नमला… मागे हटला!!

या तेजस्विनी चं त्यागमयी रूप ही दिसलं ते केसरी च्या सुरुवातीच्या खडतर, कठीण आणि आर्थिक अडचणीच्या काळात! त्यावेळी आर्थिक अडचण दूर व्हावी म्हणून स्वतः चे लग्नातील दागिने आणि कौटुंबिक चीजवस्तू हसतमुखाने गहाण ठेवल्या. हा आर्थिक त्याग खूपच मोठा म्हणावा असाच आहे!

एक महान राष्ट्र नेता घडण्यामागे केवळ वैचारिक संघर्ष पुरेसा नसतो तर तितकीच खंबीर साथ देणा-या धैर्याच्या मूर्ती ची गरज असते.

या धैर्यशील समिधेने आपल्या घराचा उंबरठा कधी ओलांडलाच नाही. बडेजावाची हौस नव्हतीच. दोन साधी पातळे, हातात दोन काळ्या बांगड्या, गळ्यात मंगळसूत्र! स्वतः ताक, दूध, फळे यावरच जास्तीत जास्त रहात. उपासच असत. मात्र माधुकरी मागणा-यांना ही अन्नपूर्णा भरभरून, भरपूर देई.

टिळकांना मंडालेच्या तुरुंगात ठेवलं आणि पहिल्यांदाच या धीरोदात्त, शांतपणे जळणा-या समईतल्या शुभ्र कळेचा जणू धीरच खचला. आपला पती काही आता परत येत नाही अशी त्यांच्या मनाची समजूत झाली. त्यांची जगण्याची आसक्तीच सुटली. औषध घेणे ही टाळू लागल्या. या सगळ्याचा परिणाम व्हायचा तोच झाला.

७ जून १९१२… या दिवशी सत्यभामा नावाची एक समिधा राष्ट्रभक्ती च्या धगधगत्या होमकुंडात समर्पित झाली… एक तेजस्वी प्राणज्योत मंडालेच्या दिशेने निघून गेली…

सत्यभामाबाई निवर्तल्यानंतर… एका परिचिताने त्यांचं एक रेखाचित्र बनवलं. त्यांच्या पुतण्याला ते खूप आवडलं, तो ते घेऊन लोकमान्यांकडे गेला… ते रेखा चित्र बघून टिळकांनी म्हंटलं,

” ती अशी नव्हतीच! … ती कशी होती हे फक्त मलाच ठाऊक आहे. “

असं म्हणतांना त्यांचे ओठ थरथरले, डोळ्यातलं पाणी उपरण्यानं टिपलं आणि शांत झाले.

… हेच तर ना ते पती-पत्नीतलं एकरूपत्व! परस्पर ऐक्य! आणि त्या बळावर होणारं पतीचं लोकोत्तर, लोकमान्य कार्य! हीच ती क्रांतीकारकांची ताकद!!

हीच ती समिधा जिचं समर्पित होणं बाळ गंगाधर टिळकांना थेट “लोकमान्य ” या उपाधीस पात्र ठरण्यास पूरक ठरलं!!!!!!

– लेख क्र. १७.

© प्रा.भारती जोगी

पुणे.

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ हे भूत की भयंकर आजार? – लेखक : डॉ. सुजित भरत पाटील ☆ प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? इंद्रधनुष्य ?

☆ हे भूत की भयंकर आजार? – लेखक : डॉ. सुजित भरत पाटील ☆ प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

रात्री २ वाजता १४ वर्षांची मुलगी विचित्र आवाज काढत अंगाचे लचके तोडत होती… भूत की भयंकर आजार?

रात्रीचे २ वाजले होते. माझ्या ड्युटी रूममध्ये फक्त पेशंटच्या फाईल्सची पाने उलटण्याचा आणि भिंतीवरच्या घड्याळाची टिक-टिक एवढाच आवाज होता. तेवढ्यात फोन खणखणला.

“डॉक्टर, लवकर खाली कॅज्युअल्टीमध्ये या! पेशंटच्या नातेवाईकांनी गोंधळ घातलाय आणि पेशंटची अवस्था… डॉक्टर, तुम्ही लवकर या! ” सिस्टरचा आवाज भीतीने थरथरत होता.

मी पायऱ्या उतरून कॅज्युअल्टीमध्ये पोहोचलो आणि नाकात कापूर, लिंबू आणि कसल्यातरी जळक्या पाल्याचा उग्र दर्प शिरला. तिथले दृष्य खरोखरच अंगावर काटा आणणारे होते. कॅज्युअल्टीतले इतर पेशंट्स आणि स्टाफ भीतीने कोपऱ्यात गोठून गेले होते.

स्ट्रेचरवर १४ वर्षांची राधा (नाव बदललेले आहे) लोळत होती. तिचे केस विस्कटलेले, कपाळावर अवास्तव मोठा कुंकवाचा टिळा आणि गळ्यात काळे-लाल दोरे. पण खरी दहशत तिच्या डोळ्यांत होती—ते पूर्णपणे पांढरे पडले होते. तिचे शरीर एखाद्या कमानदार पुलासारखे (Arching of back) ताठ झाले होते.

ती स्वतःच्याच अंगाचे लचके तोडत होती आणि तोंडातून एका अमानवीय, अस्पष्ट भाषेत गुरगुरत होती.

तिच्या आजूबाजूला तिचे नातेवाईक लिंबू आणि हळद फिरवत होते. एका मांत्रिकाने हातात कडूनिंबाचा पाला घेतला होता आणि “ए निघ… निघ बाहेर… ” असे ओरडत तो तिला फटके मारण्याच्या तयारीत होता. त्यांच्या नजरेत ती राधा नव्हती; ती राधाच्या शरीरात घुसलेली ‘बाहेरची बाधा’ होती.

माझ्या आतला डॉक्टर आणि रॅशनलिस्ट एकाच वेळी जागा झाला. मी तात्काळ सिक्युरिटीला खूण केली.

“हे बघा, ही हॉस्पिटलची इमर्जन्सी आहे. पेशंटचे आई-वडील सोडून बाकी सगळ्यांना बाहेर काढा. आणि या बुवांना सगळ्यात आधी बाहेर काढा! ” माझा आवाज कॅज्युअल्टीत घुमला.

राधाचे वडील धावत आले आणि माझ्या पाया पडू लागले, “डॉक्टर, साहेब… तिला काही आजार नाहीये, ही बाधा आहे! गेल्या आठ दिवसांपासून ती रात्रीची अचानक उठून हसायची, शून्यात बघायची. आज अमावस्येला अचानक ती हिंस्त्र झाली. आम्ही तिला मंदिरातूनच इथे आणलंय. तुमच्या औषधाने ही हडळ जाणार नाही! “

“मला माझं काम करू द्या, ” मी त्यांना बाजूला करत राधाच्या जवळ गेलो.

मी तिचे निरीक्षण सुरू केले. मॉनिटरवर तिचे तापमान १०३ डिग्री फॅरनहाईट आणि पल्स रेट १६० च्या वर धावत होता. तिचे हात-पाय एखाद्या अदृश्य शक्तीने पिरगळल्यासारखे वाकडेतिकडे होत होते.

पण माझ्या डोक्यात धोक्याची घंटा वाजली ती एका विशिष्ट लक्षणाने. ती अधूनमधून जीभ बाहेर काढून ओठ चावल्यासारखी आणि चघळल्यासारखी सलग हालचाल (Orofacial Dyskinesia) करत होती. मेंदूच्या आजारांचा अभ्यास माझ्या डोळ्यांसमोरून तरळला. ताप + मानसिक संतुलन बिघडणे + आणि ही विशिष्ट तोंडाची हालचाल…

हे भूत नव्हते, ही हडळ नव्हती… हा विज्ञानाच्या पुस्तकातला एक अत्यंत दुर्मिळ पण भयंकर ‘राक्षस’ होता.

“सिस्टर, हिचे हात-पाय सावधगिरीने रिस्ट्रेन करा जेणेकरून ती स्वतःला इजा करणार नाही. Midazolam चे इंजेक्शन द्या आणि ऑक्सिजन लावून Airway सुरक्षित करा, ” मी तातडीने ऑर्डर दिली.

इंजेक्शनमुळे राधाचा झटका थांबला. तिला PICU मध्ये शिफ्ट केल्यावर मी पालकांना माझ्या केबिनमध्ये बोलावले. राधाची आई हुंदके देऊन रडत होती.

“डॉक्टर, तिला घरी नेऊ द्या. इथे काही उपयोग नाही… ” वडिलांचा अजूनही हट्ट होता.

मी टेबलावर हात आपटत गंभीरपणे म्हणालो, “माझं नीट ऐका! तुमच्या मुलीला कोणतही भूत लागलेलं नाही. तिला ‘Anti-NMDA Receptor Encephalitis’ नावाचा मेंदूचा अत्यंत गंभीर आजार झाला आहे. जर तुम्ही तिला आता उपचारांविना घेऊन गेलात, तर उद्या सकाळपर्यंत ती जिवंत राहणार नाही.

आणि लक्षात ठेवा, ती अल्पवयीन आहे. अंधश्रद्धेच्या नावाखाली तिच्या जिवाशी खेळण्याचा अधिकार तुम्हाला नाही. तसे केल्यास मला आत्ता पोलिसांना बोलावून Medico-Legal Case (MLC) दाखल करावी लागेल. “

पोलिसांचे नाव आणि माझ्या ठाम बोलण्याने ते हादरले. मी थोडा मवाळ होत त्यांना समजावले, “तिची लक्षणं—विचित्र आवाज काढणं, हातवारे करणं, आणि आता आलेले झटके—हे सर्व मेंदूला आलेल्या सुजेचे प्रकार आहेत. तिच्या शरीरातील रोगप्रतिकारक शक्ती, जी बाहेरच्या जंतूंना मारायला हवी, ती चुकून तिच्याच मेंदूवर हल्ला करत आहे. तिच्या मेंदूत ‘शॉर्ट सर्किट’ झालंय. “

अखेर त्यांनी संमतीपत्रावर (Consent Form) सह्या केल्या.

आम्ही तातडीने तिचे MRI Brain आणि EEG (मेंदूचा आलेख) काढला. EEG मध्ये ‘Extreme Delta Brush’ नावाचा पॅटर्न दिसला—जो याच आजाराची विशिष्ट साक्ष देतो. अंतिम निदानासाठी तिच्या पाठीच्या कण्यातून पाणी (CSF) काढून तपासणीला पाठवले.

या आजाराचे एक प्रमुख कारण मुलींमध्ये अंडाशयात (Ovary) असणारी एक गाठ असू शकते, हे मला माहीत होते. मी पोटाची सोनोग्राफी (USG Pelvis) करवून घेतली आणि माझा संशय खरा ठरला. राधाच्या ओव्हरीत Teratoma नावाची गाठ होती. तीच गाठ तिच्या शरीरात या घातक अँटीबॉडीज तयार करत होती.

पुढचे २१ दिवस राधा PICU मध्ये मृत्यूशी झुंज देत होती. आम्ही डॉक्टर्सनी वेळ न दवडता उपचार सुरू केले.

  1. IVIG (Intravenous Immunoglobulin): सलाईनवाटे निरोगी अँटीबॉडीज शरीरात सोडल्या.
  1. High-dose Steroids: मेंदूची सूज कमी करण्यासाठी.
  1. सर्वात महत्त्वाचे: गायनॅक सर्जनच्या मदतीने ऑपरेशन करून तिच्या अंडाशयातील ती घातक गाठ (Ovarian Teratoma) काढून टाकली.

मांत्रिकाचे फटके आणि लिंबू-मिरची काम आले नाही, पण विज्ञानाची अचूक दिशा कामी येत होती.

 हळूहळू राधाची बडबड थांबली. १४ व्या दिवशी तिचा व्हेंटिलेटरचा सपोर्ट पूर्णपणे काढण्यात आला. तिने डोळे उघडले, गोंधळलेल्या नजरेने आजूबाजूला आणि मग आईकडे बघितले. तिचा आवाज क्षीण होता, पण त्यात माणुसकी होती.

“आई, खूप भूक लागलीये… आपण इथे का आलोय? “

 तिच्या आईने हंबरडा फोडला आणि ती राधाच्या गळ्यात पडली. जे काम अंधश्रद्धेने आणि नवसाने झाले नाही, ते एका वैद्यकीय निदानाने झाले होते.

 डिस्चार्जच्या दिवशी राधाचे वडील रडतच आम्हा डॉक्टरांच्या पाया पडायला लागले. “डॉक्टर, तुम्ही देव आहात. माझ्या अज्ञानामुळे मी माझ्याच पोरीचा जीव घ्यायला निघालो होतो. “

 मी त्यांना उठवत हसून म्हणालो, “आम्ही देव नाही, फक्त डॉक्टर आहोत जे पुराव्यावर आणि विज्ञानावर विश्वास ठेवतो. तुम्ही स्वतःला दोष देऊ नका. हा आजारच असा आहे की जो भल्याभल्यांना ‘बाधा’ वाटू शकतो. पण आज राधाला वेडी म्हणून साखळदंडाने बांधून ठेवण्यापासून आपण वाचवले, यातच सगळं आलं. “

 मित्रांनो, धडा एकच:

जेव्हा कधी एखाद्या व्यक्तीचे वर्तन अचानक बदलते, ती व्यक्ती शून्यात बघते, विचित्र आवाज काढते किंवा तिला झटके येतात—तेव्हा तिला मांत्रिकाकडे नेऊ नका. ती ‘बाहेरची बाधा’ नसून तो Neurological आजार असू शकतो.

पौगंडावस्थेतील मुलांमध्ये अचानक दिसणाऱ्या अशा गंभीर लक्षणांची माहिती प्रत्येक पालकाकडे असायला हवी. भविष्यातील संदर्भासाठी ही माहिती जपून ठेवा.

अज्ञान आणि अंधश्रद्धा हेच जगातले सर्वात मोठे भूत आहे, आणि विज्ञान हाच त्यावरचा एकमेव उतारा!

एक साधा गैरसमज कोणाचाही जीव धोक्यात घालू शकतो. वैज्ञानिक जाणीव आणि प्रबोधन घराघरांत पोहोचवण्यासाठी ही माहिती आपल्या माणसांपर्यंत नक्की पोहोचवा.

तुमच्या आसपास किंवा नात्यात अशी घटना कधी घडताना तुम्ही पाहिली आहे का, जिथे आजाराला ‘बाधा’ समजून वेळ वाया घालवला गेला? तुमचे मत नक्की मांडा.

 ┉❀꧁꧂❀┉

लेखक : डॉ. सुजित भरत पाटील, बालरोगतज्ज्ञ

पुणे

प्रस्तुती : श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र), मो – 9421225491

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ “माणसं मनातली..!” – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुति – शामला पालेकर ☆

शामला पालेकर

? वाचताना वेचलेले ?

☆ “माणसं मनातली..!” – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुति – शामला पालेकर ☆

मोगऱ्याचं फूल ओंजळीत घेतलं की त्याचा गंध मनाला, शरीराला प्रसन्न करून जातो.

सहवासातील माणसांचं देखील असंच असतं.

काही माणसं काही क्षणातच मनाला खूप आवडतात, आपली होऊन जातात.

तर, काही कितीही सहवासात राहिली, तरी त्यांची आतून ओढ नसतेच…

चेहरा बघण्यापेक्षा नेहमीच समोरच्याच्या मनात उतरून बघावं. शोधूनही तिथं माणूसपण सापडत नसेल, तर त्याचं सुंदर दिसणंही मग किळसवाणं वाटतं…

शरीराची सुंदरता वयाबरोबर संपते, तर मनाची सुंदरता शेवटपर्यंत टिकून राहाते.

शरीराला वय असतं, मनाला ते कधीच नसतं…

शेवटी काय, आपण व्यक्तीच्या स्वभावाच्या प्रेमात असतो, शरीर तर निमित्त मात्र असतं.

माणसाच्या स्वभावात गोडवा, शालीनता, प्रामाणिकपणा, आणि विनयशीलता असेल, तर त्याची काही क्षण जरी सोबत मिळाली तरी ती हवीहवीशी वाटते…

म्हणूनच बाहेर लक्ष दिव्याची सुंदर आरास असूनही, देवघरातील समईच्या तेजापुढं आपण नतमस्तक होतो…

आयुष्यात अशी माणसं कधी भेटली तर त्यांच्यावर जीवापाड प्रेम करावं!

आपल्या आवडत्या माणसाचं आपल्या सोबत असणं, ही आयुष्यातील सगळ्यात मोठी कमाई…

ती प्रत्येकाच्या वाट्याला येतेच असं नाही.

आजकाल अशी माणसं भेटतात तरी कुठे?

नशिबानं कधी भेटलीच तर हळुवार जतन करून ठेवावीत..!

कदाचित, पुन्हा भेटतील, न भेटतील…

 

लेखक :अज्ञात

प्रस्तुती : शामला पालेकर

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – पुस्तकांवर बोलू काही ☆ “स्ट्रेंग्थ टू स्ट्रेंग्थ” – इंग्लिश लेखक : आर्थर सी ब्रुक्स मराठी अनुवाद : मेधा इनामदार ☆ परिचय –  शुभा रुद्र ☆

शुभा रुद्र

? पुस्तकावर बोलू काही ?

☆ “स्ट्रेंग्थ टू स्ट्रेंग्थ” – इंग्लिश लेखक : आर्थर सी ब्रुक्स मराठी अनुवाद : मेधा इनामदार ☆ परिचय –  शुभा रुद्र ☆

पुस्तक : स्ट्रेंग्थ टू स्ट्रेंग्थ

लेखक : आर्थर सी ब्रुक्स 

अनुवाद : मेधा इनामदार

प्रकाशक : मायमिरर पब्लिशिंग हाऊस 

पृष्ठसंख्या:२५६

मूल्य- २९९

स्ट्रेंग्थ टू स्ट्रेंग्थ या पुस्तकाचा अनुवाद वाचतांना मनाला वेग येतो. हातात पुस्तक घेतले की वाचत राहावे वाटते.

जीवनाकडे कसं पहावं? विशेषतः पन्नाशीनंतर जीवन कसं असायला पाहिजे हे या पुस्तकात अतिशय व्यवस्थित मार्गदर्शन केलेलं आहे.

वयाचा एक टप्पा ओलांडल्यानंतर येणारी अस्वस्थता किंवा ‘आता पुढे काय? ‘ या याचे उत्तर या पुस्तकातून मिळते. अतिशय प्रगल्भ विचार या पुस्तकात वाचायला मिळतील. ‘क्रिस्टलाइज्ड इंटेलिजन्स’ आणि ‘उलटी बकेट लिस्ट’ या संकल्पना मांडल्या आहेत.

क्रिस्टलाइज्ड इंटेलिजन्स म्हणजे शिक्षण, अनुभव आणि सरावातून आयुष्यभर मिळवलेले ज्ञान आणि कौशल्ये वापरण्याची क्षमता होय.

यात शब्दसंग्रह, सामान्य ज्ञान, भाषेवरचे प्रभुत्व आणि जुन्या अनुभवांच्या आधारे समस्या सोडवण्याच्या कौशल्याचा समावेश होतो.

वाढ हे बुद्धिमत्तेचे स्वरूप वयपरत्वे कमी न होता, उलट अनुभवामुळे वाढत जाते किंवा स्थिर राहते.

साठवणूक ही बुद्धिमत्ता आपल्या दीर्घकालीन स्मृतीमध्ये साठवलेल्या माहितीवर अवलंबून असते.

याचं जीवना महत्व म्हणजे व्यावसायिक नैपुण्य मिळवण्यासाठी आणि सामाजिक संवाद प्रभावीपणे साधण्यासाठी या बुद्धिमत्तेचा मोठा वाटा असतो.

‘स्ट्रेंथ टू स्ट्रेंथ’: यशाकडून सार्थतेकडे जाणाऱ्या प्रवासाचे परीक्षण

हे पुस्तक वयानुसार येणाऱ्या बदलांना ‘संधी’ म्हणून कसे पाहावे, याचे एक प्रगल्भ तत्त्वज्ञान आहे.

तीन मुख्य पैलू प्रकर्षाने समोर येतात:

बुद्धिमत्तेचे संक्रमण: ‘वेगा’कडून ‘शहाणपणा’कडे

सहसा वयानुसार निर्णयक्षमता मंदावते, अशी एक भीती असते. ‘फ्लुइड’ विरुद्ध ‘क्रिस्टलाइज्ड’ इंटेलिजन्सचा मुद्दा ही भीती घालवून देतो. तरुणपणीची बुद्धिमत्ता ही धावण्याची असते, तर ज्येष्ठत्वातील बुद्धिमत्ता ही ‘साठवलेल्या अनुभवांचे दान’ करण्याची असते. ‘कर्ता’ होण्यापेक्षा ‘मार्गदर्शक’ होण्याचा जो सल्ला दिला आहे, तो आजच्या स्पर्धात्मक युगात निवृत्तीनंतरचे आयुष्य सन्मानाने जगण्यासाठी अत्यंत मोलाचा आहे.

समाधानाचे नवीन गणित: ‘बेरीज’ नव्हे तर ‘वजाबाकी’

‘बकेट लिस्ट’ ही संकल्पना नेहमी काहीतरी मिळवण्याशी संबंधित असते. परंतु, तुम्ही स्पष्ट केलेली ‘उलटी बकेट लिस्ट’ ही संकल्पना या परीक्षणाचे मुख्य आकर्षण आहे.

इच्छांची वजाबाकी: “खरे समाधान = आपल्याकडे जे आहे / आपल्याला जे हवे आहे” हे सूत्र साधे असले तरी क्रांतीकारी आहे.

जेव्हा आपण भौतिक सुखांच्या मागे धावणे थांबवतो, तेव्हाच आपल्याला ‘स्थितप्रज्ञ’ अवस्थेचा अनुभव येतो.

आध्यात्मिक आणि भावनिक गुंतवणूक

सारांशात ‘नातेसंबंधांची गुंतवणूक’ आणि ‘आध्यात्मिक वानप्रस्थाश्रम’ यावर दिलेला भर भारतीय संस्कृतीशी सुसंगत आहे. हार्वर्डच्या संशोधनाचा दाखला देऊन तुम्ही हे सिद्ध केले आहे की, अखेरच्या टप्प्यात बँक बॅलन्सपेक्षा ‘भावनिक बॅलन्स’ अधिक कामी येतो. मृत्यूची जाणीव ही नकारात्मक नसून, ती वर्तमानातील प्रत्येक क्षण (उदा. फुलाचे सौंदर्य) अधिक सजगपणे जगण्यास प्रवृत्त करते, हा विचार खूप सकारात्मक आहे.

‘यश’ हे बाह्य जगासाठी असते, पण ‘सार्थकता’ ही स्वतःच्या समाधानासाठी असते. बीथोव्हेनचे उदाहरण, मर्यादा या अडथळा नसून त्या नवीन सृजनाची दारे उघडू शकतात.

थोडक्यात सांगायचे तर: “धावणे थांबवून, चालण्याचा आणि आसपासचे सौंदर्य पाहण्याचा” आनंद मिळवून देतो.

हे पुस्तक वाचकाला भौतिक सुखाच्या पलीकडे जाऊन ‘मी कोण आहे? ‘ आणि ‘माझ्या जगण्याचा उद्देश काय? ‘ या प्रश्नांचा शोध घेण्यास प्रवृत्त करते. आनंद हा बाहेरून मिळवण्यापेक्षा तो स्वतःच्या दृष्टिकोनातून आणि इतरांच्या सेवेतून कसा मिळवता येतो, याचे मार्गदर्शन यात मिळते.

मिळवण्याच्या धडपडीत, राहून जातो जो स्वतःचा शोध,

कळत नाही कधी वाढतो, मनातला अस्वस्थ लोभ.

हव्यास सुटावा वस्तूंचा, आणि सोडून द्यावा खोटा थाट,

‘उलटी बकेट लिस्ट’ दाखवेल, समाधानाची नवी वाट.

नकोत आता ती ओझी, जी फक्त थकवा देतात मना,

त्यागून फोल दिखावा सारा, मुक्त जगूया प्रत्येक क्षणा.

रिते होताना हात आपले, अंतरी सुखाचा झरा फुटेल,

जेव्हा इच्छांचे ओझे सरून, खऱ्या आनंदाची गाठ सुटेल.

या पुस्तकाच्या अनुवाद करणाऱ्या मेधा इनामदार यांना मी पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा देते. असंच अनुवाद करून वाचकांपर्यंत मौल्यवान विचारांचा खजाना पोहचू दे, तुमची लेखणी अशीच चालू राहू दे.

परिचय : शुभा रुद्र

मो. 9657189569

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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