हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गीत – भरे हर्ष से तन-मन ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत – भरे हर्ष से तन-मन ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

अनाचार से जो भिड़ते हैं, उनका खिलता जीवन। 

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

*

सदाचार है मानवता-पथ, रीति-नीति सिखलाए। 

साँच-झूठ में भेद बताता, जीवन-सुमन खिलाए।। 

सदाचार को जो अपनाते, उनका महके आँगन। 

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

*

सदा कर्म की महिमा न्यारी, चमत्कार होता है। 

अनुपालन है जहाँ न्याय का, वहाँ सुयश बहता है।। 

रौनक के मेले लग जाते, जीवन बनता मधुवन। 

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

*

झूठ-कपट से टकराता जो, उसका महके जीवन। 

कर्मपथिक जो दिव्य बने वह, भीतर से हो पावन।।

करे लोक-मंगल जो नित ही,  वह बरसाता सावन।

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।।

*

साहस, शौर्य सँजो जो बढ़ता, लक्ष्य सहज पाता है।

पराक्रमी मानव हर पल ही, मंजिल दुलराता है।।

देशभक्त जो बना सदा ही,  चहके उसका आँगन।

व्यथा, वेदनाएँ मिट जातीं, भरे हर्ष से तन-मन।। 

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५० – आलेख – बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५० 

☆ आलेख – बच्चों की नजर बदलिए, नजरिया बदल जाएगा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

“कल से प्रार्थना सभा में एक लड़के को एक कहानी सुनानी होगी। ” शिक्षक ने यह कहा मगर पहले दिन एक ही लड़के ने नाम लिखवाया। दूसरे दिन प्रार्थना सभा में पहले लड़के ने कहानी सुनाई। तब दूसरा बोल उठा, ” सर! मैं भी कहानी सुना सकता हूं?”

” हां। क्यों नहीं,” शिक्षक ने कहा और लड़के ने कहानी सुना दी।

तीसरे दिन 5 बच्चे कहानी सुनाने के लिए तैयार हो गए। अंतत शिक्षक को कहना पड़ा, ” एक दिन में तीन से ज्यादा लड़के कहानी नहीं सुनाएंगे। “

बच्चों को स्वप्रेरित कीजिए—

बच्चे एक दूसरे से हौड़ करते हैं। उन्हें एक दूसरे से बढ़-चढ़कर काम करने में मजा आता है। यह स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इसे हम स्वप्रेरणा भी कह सकते हैं। जिसकी वजह से बच्चे बढ़-चढ़कर कहानी सुनाने में भाग लेने लगे थे।

इस स्वप्रेरणा की बदौलत बच्चे अगले दिन से पुस्तकों में से कहानी ढूंढने लगे थे। कुछ माता-पिता से कहानी सुनकर आते। धीरे-धीरे बच्चों में एक से बढ़कर एक कहानी सुनाने की होड़ होने लगने लगी। जो बेहतर कहानी सुनाता उसे शिक्षक शाबाशी देते। हरेक बच्चे की कहानी सुनाने की किसी ना किसी बात की शिक्षक प्रशंसा करते। इससे सभी बच्चे स्व प्रेरित हो रहे थे।

इस तरह प्रार्थना सभा में कहानी सुनाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया। इसका असर यह हुआ कि जो बच्चे पढ़ना-लिखना भी नहीं जानते थे वे कहानी सुनाने में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे।

उन्हें पुस्तकालय तक स्वतः ले जाइए—

कुछ बच्चे तो स्वयं पुस्तकालय में जाने लगे। कुछ बच्चों ने शुरु-शुरु प्रश्न किया था, ” सरजी! कहानी कहां मिलेगी ? हम भी सुनाना चाहते हैं,” तब शिक्षक ने कहा, ” अपनी पाठ्यपुस्तक में या पुस्तकालय की किसी पुस्तक में मिलेगी। चाहो तो मम्मी-पापा या दादा-दादी से भी कहानी सुनकर यहां सुना सकते हो। “

बचे हुए बच्चे शिक्षक की इस प्रेरणा से पुस्तकालय तक पहुंचने लगे। उन्हें यह नहीं कहना पड़ा कि तुम पुस्तकालय की पुस्तकें पढ़ो। वह स्वयं पुस्तकालय की पुस्तकें टटोलने व पढ़ने लगे। उन्हें अब पढ़ने में मजा आने लगा था। क्योंकि उन्हें एक-दूसरे से बेहतर कहानी प्रार्थना सभा में सुनानी थी।

बच्चों में प्रतियोगिता करवाइए—

कौन बढ़िया कहानी सुना सकता है? जैसे प्रश्न उन्हें प्रतियोगिता के लिए उकसाते हैं। तब वे स्वयं ही एक दूसरे से प्रतियोगिता करने लगते हैं। एक छात्र ने अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाई तो दूसरा उससे अच्छे हाव-भाव के साथ कहानी सुनाने की चेष्टा करता है। यही स्वत: चलने वाली प्रक्रिया है। प्रार्थना सभा में इसकी होड़ को आसानी से देखा जा सकता है।

मोहल्ले को आनंद का मैदान बनाइए—

शाम के समय मोहल्ले में इस तरह की गतिविधियां कराई जा सकती है। कभी चुटकुले प्रतियोगिता रखी जा सकती है। बच्चे चुटकुले ढूंढने या पढ़ने के लिए किताबों का सहारा ले सकते हैं। ऐसे समय पर प्रतियोगिता स्थल पर कुछ पुस्तकें, अखबार, चुटकुले की पुस्तकें रखी जा सकती है। आधे घंटे का यह कार्यक्रम मोहल्ले को आनंद से भर सकता है। बच्चों में उत्साह और संचार के लिए बहुत ही बढ़िया गतिविधि है।

बच्चों का कवि सम्मेलन करें—

आप साप्ताहिक या मासिक रूप से इस गतिविधि का आयोजन किया जा सकता है। किसी भी कवि की रचना या कविता उसके नाम सहित सुनाना होगी। यह शर्त रखी जा सकती है। मोहल्ले के दो चार व्यक्ति को जज बनाया जा सकता है। प्रतियोगिता में पांच ₹ का प्रवेश शुल्क लिया जा सकता है। यह एकत्रित शुल्क प्रतियोगिता इनाम के तौर पर विजेता को भी दिया जा सकता है।

सुंदर लेखन प्रतियोगिता करवाएं—

हर बार अलग-अलग प्रतियोगिता करवाने से रोचकता व उत्साह बना रहता है। कभी सुंदर-लेखन प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इसमें सबसे सुंदर लिखने वाले को विजेता घोषित किया जा सकता है। कभी आप श्रुत-लेखन प्रतियोगिता करवा सकते हैं। इसमें सबसे अच्छे अक्षर, जिसमें कम से कम गलती हो उसे विजेता घोषित कर सकते हैं।

नाटक का आयोजन करवाएं—

बच्चों को नाटक के लिए तैयार करें। उनसे कहे- उनके लिए नाटक प्रतियोगिता आयोजन किया जा रहा है। उन्हीं में से एक निर्देशक बनाएं। वही अपना काम निभाए।

इस तरह अलग-अलग प्रतियोगिता करवाई जा सकती है। इन सब बातों से बच्चों की नजर बदल जाएगी। पांच-छह माह इसे करके देखिए। उसका नजरिया बदल जाएगा। तब आप यह कभी नहीं कहेंगे कि बच्चे पढ़ने से दूर हो रहे हैं। बस, पहल आपको करनी है। चाहे आप रचनाकार हो, शिक्षक हो, माता-पिता हो या अभिभावक हो। तब देखिए आप कहेंगे कि बालक पढ़ने से दूर नहीं हुए हैं आपने उन्हें पढ़ने से दूर कर दिया था।

—– 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

17-04-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०९ ☆ बाल कविता – संस्कार तो मां ही देती… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०९ ☆ 

☆ बाल कविता – संस्कार तो मां ही देती ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

लाड़-प्यार बच्चों से करना,

पर सिर पर तुम नहीं चढ़ाना।

देर अगर यदि हो जाएगी तो,

खूब पड़ेगा फिर पछताना।।

 *

संस्कार तो मां ही देती,

वह ही प्रथम गुरु है।

बनना और बिगड़ना हाथों,

उससे जीवन शुरु है।

 *

मोबाइल जो हाथ हैं देते,

बचपन का छिन जाए बाना।

 **

नरक बनाना है यदि घर को,

बच्चे की जिद पूरी करना।

ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा बनेगा,

अपनों से ही दूरी करना।

 *

जीवन में यदि खुशियां लानी,

कथनी करनी एक बनाना।

 **

मां का त्याग खूब फलता है,

वे ही बच्चे अच्छे बनते।

पिता भी अच्छे यदि बन जाएं,

बच्चे भी सद्गुण को चुनते।

 *

बच्चों से नहीं हिंसा करना,

बस केवल उनको समझाना।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ फूल ☆ वनिता संभाजी जांगळे ☆

वनिता संभाजी जांगळे

?  कवितेचा उत्सव ?

☆ फूल ☆ वनिता संभाजी जांगळे ☆

प्रत्येक फूला -फूलास असतो

फूलण्याचा आनंद

वारा दूरवर वाहून नेतो

दरवळणारा सुगंध

एक दिवसाच्या आयुष्याची

कधी फूलास नसते चिंता

सुकलेल्या पाकळ्यांची फूल

कधी मांडत नाही व्यथा

फूलून सदाची हसावे

काट्या -कुट्यांत सजून रहावे

कधी हारामध्ये गुंफून घ्यावे

कधी पायरीचे प्राजक्त व्हावे

हाच फूलास फूलण्याचा छंद

क्षणभर फुलण्याचा सुध्दा

फूल जपत असते आनंद

 

©  वनिता संभाजी जांगळे (घागरे)

जांभुळवाडी-पेठ, ता. – वाळवा, जिल्हा – सांगली

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ महावस्त्राचे पदर – भाग ९ : काका (कुटुंबाचा भक्कम आधारस्तंभ) ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? विविधा ?

महावस्त्राचे पदर – भाग ९ : काका (कुटुंबाचा भक्कम आधारस्तंभ) ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

(‘या लेखमालेचे आतापर्यंत आठ भाग झाले आहेत. त्यात पहिली सुरुवात अर्थातच विश्वातील सर्वात महत्त्वाचे नाते म्हणजे आईपासून झाली. नंतर क्रमाक्रमाने बाबा, आजी, आजोबा, मामा, मावशी आणि आत्या या नात्यांचा विस्तार आपण पाहिला. हे सगळे नात्यांचे एकेक रेशमी पदर आहेत. ते उलगडण्याचा आणि त्यांची झळाळी दाखवण्याचा आपण प्रयत्न केला. असाच एक समृद्ध पदर म्हणजे काका. त्यांच्याबद्दलच आज जाणून घेऊ या.)

‘काका’ म्हटलं की वडिलांसारखीच माया करणारी एक प्रेमळ व्यक्ती डोळ्यांसमोर येते. पूर्वी एकत्र कुटुंब पद्धती होती. घरात अनेक माणसे असत. त्यात वडील, काका आदी मायेची माणसे एकत्र असत. एकत्र शेती करणे, व्यवसाय करणे, आई-वडिलांकडे लक्ष देणे या गोष्टी ते आपुलकीने करीत असत. कधी आवश्यकतेनुसार एखादा भाऊ नोकरीनिमित्त शहरात गेला, तर दुसरा भाऊ शेती किंवा व्यवसाय सांभाळत असे; पण त्यांच्या प्रेमात कधी अंतर पडत नव्हतं. अशा वेळी काकांचं हे नातं रक्ताच्या पलीकडे जाऊन प्रेम, कर्तव्य आणि माणुसकी यांचं सुंदर प्रतीक बनतं. अशी नाती कुटुंबाला समृद्ध बनवतात.

आमची गावाकडे थोडीशी शेती होती. माझे वडील त्यांची शहरातील नोकरी सोडून शेती करण्यासाठी गावाकडे आले आणि तेथेच स्थायिक झाले. माझे दोन्ही काका नोकरीनिमित्त शहरात होते. एक काका मोठे आणि दुसरे लहान; माझे वडील मधले. काका कधी कधी सुट्टी मिळाली की गावी येत असत. काका आले की आम्हाला कोण आनंद व्हायचा! मग काकांबरोबर दोन-चार दिवस मजा असायची. कधी सुट्टीत काकांकडे राहायलाही जायचो.

काकांच्या प्रेमाचे अनेक प्रसंग आजही आठवतात. त्यांनी शहरात राहूनही खेड्यात राहणाऱ्या आणि शेतीत राबणाऱ्या माझ्या वडिलांना वेळोवेळी मदत केली. कारण शेती थोडी असल्याने फार पैसा पदरात पडत नव्हता. कधी ओला दुष्काळ, तर कधी कोरडा दुष्काळ! पीक चांगले आले तर बाजारात भाव पडलेले असायचे. अशा वेळी काका पैसे पाठवून मदतीचा हात देत. एकदा तर माझे वडील खूप आजारी झाले होते. आमचं गाव म्हणजे एक छोटं खेडं असल्याने वैद्यकीय उपचारांची सोय नव्हती. तेव्हा काका गावी येऊन वडिलांना आपल्या सोबत घेऊन गेले. त्यांना चांगल्या दवाखान्यात दाखल केले, त्यांची शुश्रूषा केली. असे अनेक प्रसंग आहेत. त्यामुळे काका म्हणजे मदतीचा हात, काका म्हणजे प्रेम या गोष्टी मनात पक्क्या झाल्या. पण काकांनी प्रेम लावले तसेच संस्कारही केले, शिस्तही लावली. त्यांच्याजवळून अनेक गोष्टी शिकायला मिळाल्या. म्हणून नात्यांच्या महावस्त्रातील अतिशय महत्त्वाचा असा हा पदर आहे. माझ्या वडिलांनी देखील त्यांच्या पुतण्यांवर जीवापाड प्रेम केलं. त्यांच्या आजारपणात त्यांच्या जवळ राहून सुश्रुषा केली.

मला दोन भाऊ, दोघेही माझ्यापेक्षा लहान. त्यामुळे माझ्या मुलांना लहानपणापासून त्यांचे प्रेम लाभले. त्यामुळे काका म्हणजे त्यांची अतिशय जिव्हाळ्याची व्यक्ती. घरात कुठलेही कार्य असो, काका सगळ्या प्रसंगात खंबीरपणे उभे राहायचे. एखादी जबाबदारी त्यांच्यावर सोपवली की मी निश्चिंत असायचो. सायकल शिकवणारे, पहिल्यांदा पोहायला घेऊन जाणारे, जत्रेत फिरवणारे किंवा छोटीशी चूकही समजावून सांगणारे काका माझ्या मुलांच्या बालपणाच्या आठवणींचं केंद्र आहेत. माझी मुलगी जेव्हा जीवावरच्या आजारातून उठली, तेव्हा या दोन्ही भावांच्या डोळ्यातील पाणी मी पाहिले आहे. तिच्या लग्नात माझ्यासारखेच पाणी या दोघांच्या डोळ्यांत तिला सासरी पाठवताना होते. अशा वेळी नात्याची खोली, उबदारपणा आणि महत्त्व जाणवते.

अनेक भारतीय कुटुंबांत काकाला वडिलांप्रमाणेच आदराचे स्थान दिले जाते. काका हे केवळ नातं नसतं, तर ती कुटुंबाची एक भक्कम ढाल असते. दुर्दैवाने ऐनवेळी कुटुंबातील कर्ता पुरुष म्हणजे मुलांचे वडील जग सोडून गेले, तर विस्कटलेल्या घराला सावरणारे आणि वडिलांची जागा घेऊन पुतण्या-पुतणीचा स्वतःच्या मुलांप्रमाणे सांभाळ करणारे अनेक काका आपण समाजात पाहिले आहेत. मुलांचे शिक्षण, त्यांचे संस्कार आणि त्यांच्या पायावर उभे राहीपर्यंत स्वतःचे सुख बाजूला ठेवून कर्तव्य निभावणारे काका हे ‘ पितृतुल्य ‘ असण्याचे खरेखुरे प्रमाण असतात.

आपल्या संस्कृतीत ‘काका’ हे संबोधन रक्ताच्या नात्यापलीकडेही आदराने दिलं गेलं आहे. समाजासाठी आणि राष्ट्रासाठी झटणाऱ्या थोर व्यक्तींना समाजाने प्रेमाने ‘काका’ किंवा ‘काकासाहेब’ म्हणून गौरवले आहे. वारकरी संप्रदायातील थोर संत गोरोबा कुंभार यांना आपण आदराने ‘गोरोबा काका’ म्हणतो, तर संपूर्ण जीवन समाजासाठी अर्पण करून स्वदेशीचा पुरस्कार करणारे गणेश वासुदेव जोशी ‘सार्वजनिक काका’ म्हणून ओळखले जातात. थोर गांधीवादी विचारवंत व लेखक काका कालेलकर, स्वातंत्र्यलढ्यातील नेते व साहित्यिक काकासाहेब गाडगीळ, टिळकांचे विश्वासू सहकारी व झुंजार पत्रकार काकासाहेब खाडिलकर, तसेच बालकांवरील प्रेमापोटी भारताचे पहिले पंतप्रधान पंडित नेहरू हे ‘चाचा (काका) नेहरू’ म्हणूनच जनमानसात अमर झाले. अगदी आमच्या चाळीसगावमध्येही वैद्यकीय सेवेसोबतच शैक्षणिक कार्य करणारे, अगदी वाघ, सिंहासारख्या वन्य प्राण्यांवर जिवापाड प्रेम करत पुण्याच्या पेशवे पार्कला स्वतः पाळलेली ‘सोनाली सिंहीण’ देणारे डॉ. वा. ग. पूर्णपात्रे यांनाही सर्वजण आदराने ‘काका’ म्हणूनच ओळखत असत.

इतिहासात राघोबादादांसारखी क्वचितच काही व्यक्तिमत्त्वे दिसतात ज्यांनी काकाच्या प्रेमळ नात्याला कलंक लावला आहे; पण सांस्कृतिक परंपरेत काका हे प्रेम, संरक्षण आणि कर्तव्याचं प्रतीकच आहे. आपल्या संस्कृतीत काका म्हणजे नेहमीच कुटुंबाचा आधारवड आणि समाजाचा मार्गदर्शक राहिला आहे. आज विभक्त कुटुंब पद्धतीमुळे एकत्र राहणं कमी झालं असलं, तरीही काका या नात्याबद्दलची आत्मीयता, जिव्हाळा आणि आदर तितकाच जिवंत आहे. नात्यांच्या या भरजरी महावस्त्रातील ‘काका’ नावाचा पदर कुटुंबाला सुरक्षिततेची ऊब, एकतेची ताकद आणि प्रेमाचा आधार देतो. हा पदर जेवढा जपला जाईल, तितकीच आपली नाती अधिक घट्ट, समृद्ध आणि सुंदर होत जातील.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ राघवची व्यथा… ☆ राधिका माजगावकर पंडित ☆

राधिका माजगावकर पंडित

? जीवनरंग ?

☆ राघवची व्यथा… ☆ राधिका माजगावकर पंडित

प्रवाश्यांचा प्रवास सुखकर, आरामशीर करणाऱ्या सगळ्या अडचणींना तोंड देत हंसतमुखाने, जबाबदारीने सामोरं जाणाऱ्या राघवची, वाहनचालकाची ही कथा आणि व्यथा आहे.

जागरणामुळे तांबारलेले डोळे, कमालीचा थकवा आणि थंडीमुळे थरथरणाऱ्या शरीराला सांभाळत राघव घरात शिरला सीता काळजीने पुढे येत म्हणाली, “अहो काय झालं? तब्येत बरी नाही का?

“हे बघ सीता आधी अंथरूण घाल मला शांतपणे झोपू दे आणि हो! आईने शिवलेल्या गोधडीची मला आता खूप आवश्यकता आहे “स्वारी दमली आहे हे समजून तिने सासूबाईंची गोधडी त्याच्या अंगावर घातली.

आणि मग आईच्या मायेच्या, गोधडीच्या उबेत तो शांत शांत झोपला. डे ड्युटी, नाईटड्युटी करून सतत वाहन चालवताना राघवच्या डोळ्यासमोर एकच ध्येय होतं, आई बाबांना गावाकडे औषध पाण्याला दरमहा पैसे पाठवायचेत. त्यांना सुखात ठेवायचं आहे. मुलांना शिकवायचय आणि काटकसरीने संसार करणाऱ्या बायकोसाठी सोन्याचं साधसं मंगळसूत्र आणायचेय. तिच्या डौलदार मानेवर एखादं गंठण किती शोभून दिसेल नाही का! दर वेळी काळे मणी ओऊन ती अगदी साध्या वाट्यांचं मंगळसूत्र वापरते.

विचार करताकरता तो झोपेच्या अधीन झाला पुरेशी झोप झाल्यावर उठला. नित्यनेमानी डायरी लिहिण्यासाठी पुढे सरसावला. मनातलं शब्दात उतरवताना जणू काही महामंडळच त्याच्या पुढे उभं आहे आणि तो महामंडळाचं लक्ष वेधून घेत होता, त्यांना विनवणी करीत होता असंच वाटलं. तो मनात म्हणत होता साहेबजरा आमच्याकडेही बघा आमची कथा आणि व्यथाही जाणून घ्या ना सरकार.

काय सांगू तुम्हाला कालच्या काय, आधीच्या वस्तीच्या, मुक्कामाच्या ठिकाणाच्या रात्री अतिशय क्लेशदायी ठरल्यात.

रहाण्याची असुविधा. पांघरुणाचा अभाव आणि डासांची वाढती, संख्या, सोबतीला जीवघेणी थंडी. आम्ही एस. टी. वाहक आणि चालक, प्रवाशांना जबाबदारीने त्यांच्या घरी पोहोचवतो पण शेवटचा स्टॉप, रात्र झाल्याने आमचं ‘मुक्काम पोस्ट’ते गावचंअसतं.

मान्य आहे आमचा विचार करून आम्हा कर्मचाऱ्यांना, महामंडळाकडून आधी पांघरायला चादर मिळायची. पण 2019 पासून तीही रद्द करण्यात आली. मग सांगा बरं कडाक्याच्या थंडीत घरून नेलेली पांघरूणे पण अपुरी पडल्यावर आम्ही कसं करावं? पलंग नाही गैरसोईच्या खोलीत डासांचा मारा चुकवत आम्ही रात्र संपण्याची वाट बघत बसतो.

पहाटे जरा कुठे डुलकी लागली तर वेळेवर गाडी सोडायच्या ड्युटी मुळे खडबडून जागे होऊन एस. टी. बसकडे धाव घेतो कारण स्टॉप वर प्रवासी आमची वाट बघत बसलेले असतात.

आबाल वृद्धांना, आईच्या कुशीत झोपलेल्या बाळांना दमल्या भागल्या बायाबापड्यांना, वेळेवर घरी पोहोचवायचं असतं मग त्यांचे हाल होऊ नयेतं, त्यांचा प्रवास सुखाचा व्हावा म्हणून आळस झटकून ड्युटी साठी आम्हाला चंद्रबळ आणून होशियार व्हावचं लागतं पण खरं सांगू! देह थकला, @ना की मनही अस्थिर होतं पण वाहन चालवताना जागरूक राहून वाटेत येणारे अनपेक्षित अडथळे टाळून, प्रवाशांना सुखरूप मुक्कामी सोडायचं असतं, त्यामुळे आपली ड्युटी जागरूकतेची जबाबदारीची आहे याची जाणीव ठेवून आम्ही थकलो असलो तरी सीटवर बसून स्टेअरिंग हातात घेतो. आणि ड्युटी साठी सज्ज होतो.

राज्यात थंडीचा कडाका वाढलाय विदर्भ, मराठवाडा, महाराष्ट्र गोठलाय आमची हालत काय सांगू राव! गावांमधून काही ठिकाणी झोपायला जागा नसते कडाक्याच्या थंडीमुळे अंगण ओसरीचा पण आधार घेता येत नाही. मग काय झोपतो गाडीतच. पण तिथेही सैरावैरा इकडून तिकडे धावणारे डास आमच्यावर हल्ला करतात,

झोपण्याची सोय नाही, शौचालय नाही उघड्यावर नैसर्गिक विधी पार पाडावे लागतात.

पण आमचे हाल बघून एखादी आजी, एखादी वहिनी, ताईमाई आम्हाला प्रेमाने आलं, दारचा गवती चहा टाकून तुटक्या कानाच्या कपातून घोटभर गुळाचा चहा देते. तेव्हा मात्र आम्ही कृतकृत्य होतो.

आणि तो अतिशय मायेने अगत्याने दिलेला चहा आमच्यासाठी अमृत ठरतो. एखादी मावशी दारच्या वालाच्या, भुईमुगाच्या शेंगा, पेरू, सीताफळं भरभरून देते. तेंव्हा मनात येतं गरिबीतही यांच्यात एवढी दानशूरता येते कुठून?

महामंडळानेही ह्यांचा आदर्श उचलावा. सरकारने सोयी केल्यात ना मग आम्हालाही गणवेशाचे कापड, शिलाई, उलन ब्लॅंकेट, गरम जर्सी, पावसाळ्यासाठी रेनकोट छत्री द्या ना राव!

मनातले भाव शब्दात उतरवून राघवने डायरी बंद केली आणि जुना झालेला गणवेश घालून तो ड्युटीसाठी सज्ज झाला.

एसटी स्टँड कडे पळत जाणाऱ्या त्याला सीता सूचना देत होती, “अहो डबा वेळेवर खा. पाण्याच्या दोन बाटल्या दिल्यात बाहेरचं पाणी पिऊ नका. थकल्यावर थर्मास मधला चहा घ्यायला विसरू नका हं ” खळखळून हसत राघव म्हणाला अग हो हो! किती सुचना! तिकडे आई-बाबांचे वेगळच, आई म्हणत होती, “सुनबाई देवापुढे दिवा लाव सांजच्याला पोरगं सुखरूप घरी येऊ दे. ” बाबा ओरडून सांगत होते, “सांभाळून गाडी चालव रे बाबा प्रवासी सुखाने त्यांच्या घरी पोहोचू देत. ” असं हे आई-बाबांच्या मायेचं बायकोचा प्रेमाचं गाठोडं सांभाळत राघव त्याच्या रथावर एसटी बसवर आरुढ झाला.

आता तो कुणाचा लेक नव्हता बायकोचा नवरा नव्हता तर फक्त भगवद्गीतेचा अर्जुनाचा सारथी झालेला श्रीकृष्ण होता अशा ह्या आजच्या काळातील श्रीकृष्णाला, वाहन चालकाला माझा सादर प्रणाम 

© राधिका माजगावकर पंडित

सन सॅटॅलाइट पुणे – 51  

मो. 8451027554

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझ्या मनातील सल : एक न घडलेली भेट☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

विभावरी कुलकर्णी

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☆ माझ्या मनातील सल : एक न घडलेली भेट ☆ विभावरी कुलकर्णी

आयुष्याच्या प्रवासात अनेक गोष्टी घडतात आणि अनेक घडायच्या राहून जातात. ज्या घडतात त्या आठवणींच्या कप्प्यात जमा होतात; पण ज्या राहून जातात, त्या मनात एक हलकीशी कळ आणि अस्वस्थता सोडून जातात. त्यालाच आपण ‘सल’ म्हणतो. नशिबाचा खेळ, वेळेचे गणित आणि स्वतःचा आळस किंवा दुर्लक्ष यामुळे अनेकदा आपण अशा काही क्षणांना मुकतो, ज्यांची भरपाई आयुष्यभरात कधीच होऊ शकत नाही. माझ्याही आयुष्यात असाच एक सल कायमचा घर करून राहिला आहे. महाराष्ट्राचे लाडके व्यक्तिमत्त्व, आमचे दैवत ‘भाई’ अर्थात पु. ल. देशपांडे यांची न घडलेली भेट.

‘पुलं’ हे नाव केवळ महाराष्ट्रासाठी एक लेखक, नाटककार किंवा कलाकार नाही, तर तो एक आनंदोत्सव होता. आमच्या पिढीचे बालपण आणि तारुण्य पुलंच्या समृद्ध लेखनाने, त्यांच्या निखळ विनोदाने आणि त्यांनी निर्माण केलेल्या जिवंत पात्रांनी नटलेले होते. ‘बटाट्याची चाळ’, ‘व्यक्ति आणि वल्ली’, ‘अपूर्वाई’ यांसारख्या कलाकृतींमधील माणसे वाचनात आली की मनातील सगळा ताण पळून जायचा. आजही निराशेच्या मनस्थितीत त्यांचे जादूचे लेखन वाचले किंवा ऐकले की, मनस्थिती बदलून जाते.

पुलंचे शब्द म्हणजे निव्वळ कागदावरची शाई नव्हती, तर तो मनाला तजेला देणारा आणि जगण्यावर प्रेम करायला शिकवणारा अमृतप्रवाह होता.

माझ्याबाबतीत सर्वात दुर्दैवाची आणि मनात टोचणारी गोष्ट म्हणजे, मी कित्येकदा त्यांच्या पुण्यातील घराच्या अगदी जवळून गेले आहे. त्यांच्या निवासस्थानाजवळून जाताना दरवेळी मनात यायचे, “आज आत जावे, भाईंना लांबून का होईना एकदा डोळे भरून पहावे, त्यांच्या चरणांना स्पर्श करावा. ” पण दरवेळी मनात एक संकोच आडवा यायचा. इतका मोठा माणूस, आपण अचानक कसे जायचे? किंवा “अरे, आजही वेळ घाईचा आहे, पुढच्या वेळी नक्की जाऊ, ” असा विचार करून मी तो बेत पुढे ढकलत राहिले.

“आज भेटू, उद्या भेटू” असे म्हणत दिवस निघून जात होते. घर अगदी जवळ असूनही आणि मनात अलोट प्रेम असूनही, केवळ ‘उद्या’वर ढकलण्याच्या वृत्तीमुळे ती भेट लांबणीवर पडत गेली. आणि मग एक दिवस ती दुर्दैवी बातमी आली… भाई हॉस्पिटल प्रयाग मध्ये एडमिट आहेत. हे खात्रीने सांगणारी व्यक्ती म्हणजे आमच्या वाड्यात राहणारी सख्खी शेजारीण, जी त्या हॉस्पिटल मध्ये नर्स म्हणून कार्यरत होती. तिथेही त्या दिवसात त्यांना बघायला आलोट गर्दी व्हायची. मोठे दिग्गज (पुढारी, नट, वक्ते) व सामान्य व्यक्ती ज्यांनी त्यांच्यावर प्रेम केले असे सगळेच दवाखान्यात गर्दी करायचे. आणि पुढच्या चार दिवसात ती पोकळी निर्माण करणारी बातमी आली, भाई आपल्याला सोडून गेले.

त्या दिवशी मला स्वतःचा खूप राग आला. मनात एक प्रचंड मोठी चूक घडल्याची जाणीव झाली. ज्या माणसाने आपल्या लेखनाने लाखो-करोडो लोकांच्या आयुष्यात आनंदाचे कारंजे फुलवले, ज्याच्या एका वाक्याने चेहऱ्यावर हसू फुलत होते, त्याला प्रत्यक्ष भेटण्याची, त्याच्याबद्दल कृतज्ञता व्यक्त करण्याची संधी माझ्या हातात होती; पण मी ती गमावली होती. ती न घडलेली भेट माझ्या मनावर असा एक कायमचा ओरखडा उमटवून गेली, जो आज इतक्या वर्षांनंतरही तसाच ताजा आहे.

आपण अनेकदा म्हणतो, “जाऊ दे, नशिबात नव्हते, आपला योग नव्हता. ” स्वतःचे समाधान करण्यासाठी किंवा मनाला समजावण्यासाठी हे शब्द ठीक आहेत; पण अंतरात्म्याला ठाऊक असते की, तिथे नशिबापेक्षा आपलाच हलगर्जी कारणीभूत होतो. ती रुखरुख आयुष्यभर मनात राहते. “माझ्याकडून असे कसे घडले? मी का नाही गेले? ” ही स्वतःला दिलेली दूषणे आणि हीच चूक पुन्हा पुन्हा आठवून होणारी घालमेल म्हणजेच हा सल.

पुण्यात त्यांच्या नावाचे एक उद्यान आहे. त्यांच्या साहित्यातील व सांस्कृतिक योगदानासाठी त्यांचे नाव या देखण्या उद्यानाला देऊन त्यांचा सन्मान केला आहे. त्या उद्यानात जेव्हा जाण्याचा प्रसंग येतो तेव्हा मनातील सल जाणवत राहतो 

पुलंच्या या न घडलेल्या भेटीने मला आयुष्याचा एक खूप मोठा धडा शिकवला. आपल्या जवळच्या, प्रिय किंवा आपण आदर करत असलेल्या माणसांना भेटण्यासाठी किंवा त्यांच्याबद्दल प्रेम व्यक्त करण्यासाठी ‘उद्या’ची वाट पाहायची नसते. कारण काळ कोणासाठीच थांबत नाही आणि निघून गेलेली वेळ किंवा माणूस कधीच परत येत नाही.

आजही जेव्हा जेव्हा मी पुलंचे पुस्तकाचे पान उघडते किंवा त्यांचे भाषण ऐकते, तेव्हा त्यांचा हसरा चेहरा डोळ्यांसमोर येतो आणि त्याच वेळी मनातील ती जुनी जखम पुन्हा ओली होते. घराच्या दारापर्यंत पोहोचूनही आत न जाण्याची ती चूक, ती न घडलेली भेट… हा माझ्या मनातील असा सल आहे, जो आयुष्यभर माझ्यासोबत राहील आणि मला वेळेचे अन् माणसांचे महत्त्व सातत्याने आठवून देत राहील.

© विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ इंद्रायणी काठी… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

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☆ इंद्रायणी काठी… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

लहानपणी मला एक अभंग फार आवडायचा. त्यावेळी आजच्यासारखी गाणे ऐकण्यासाठी साधने नव्हती. कधी काळी रेडिओवर हा अभंग लागला की मी जीवाचे कान करून ऐकत असे. त्यावेळी त्या अभंगातला अर्थ फारसा कळत नसे. पण अभंगातील गोडवा आणि तळमळ मनाला स्पर्शून जात असे. तो अभंग होता जगद्गुरू संत तुकाराम महाराजांचा

चंदनाचे हात पाय ही चंदन, परिसा नाही हीन कोणी अंग

दीपालाही पाठी पोटी अंधकार, सर्वांगे साकर अवघी गोड

तुका म्हणे तैसा सज्जनापासून, पाहता अवगुण मिळेचिना ।।

सुमन कल्याणपूर यांनी आपल्या विलक्षण गोड आवाजात हा अभंग अजरामर केला आहे. आजही हा अभंग लागला की मी त्यात हरवून जातो. मग समोरचा माणूस माझ्याशी कितीही महत्वाचे बोलत असला तरी माझे त्याकडे लक्ष नसते. मग कधी कधी, “ अहो, मी काय म्हणतो? कुठे हरवलात? ” यासारखी वाक्ये ऐकण्याची मी तयारी ठेवतो. असो.

इंद्रायणीचा काठच सुपीक! जिथे तिच्या काठावर शेती, मळे बागबगीचे फुलले; तिथेच, त्याच काठावर विठ्ठल भक्तीचेही मळे फुलले. एक मळा फुलवला ज्ञानोबा माउलींनी आणि दुसरा तुकोबांनी. या मळ्यामध्ये विठ्ठल भक्तीचे अमाप पीक आले. आणि अवघ्या महाराष्ट्रातील जनता येथून विठ्ठल भक्तीचे बीज नेऊ लागली तरी ते कमी न होता उलट वाढतच गेले. इंद्रायणीच्या काठीच भागवत धर्माचा पाया रचला गेला. एकाने पाया रचला आणि दुसऱ्याने कळस.

ज्ञानदेवे रचिला पाया, तुका झालासे कळस ।।

दोघाही संतांच्या शिकवणुकीत विलक्षण साम्य. दोघानाही समाजातील दांभिकतेची चीड. दोघानाही सर्वसामान्यांच्या उद्धाराची तळमळ. भागवत धर्माच्या रत्नजडीत मुकुटात हे दोन अमुल्य हिरे जडवलेले आहेत. समाजातले वाईट, अमंगल नष्ट व्हावे हीच आस या दोघांच्या मनी. असे करताना समाजातील वाईट, दुष्ट व्यक्ती नष्ट होऊ नये तर त्यांची दुष्ट वृत्ती नष्ट व्हावी म्हणून दोघेही प्रयत्नशील. ज्ञानोबा आपल्या पसायदानात म्हणतात-

 जे खळांचीची व्यंकटी सांडो, तया सत्कर्मी रती वाढो ।

 भूता परस्परे पडो, मैत्र जीवांचे ।।

आणि तुकोबाराय म्हणतात, 

 मेणाहुनी मऊ आम्ही विष्णुदास, कठीण वज्रास भेदू ऐसे ।

 भले तरी देऊ कासेची लंगोटी, नाठाळाचे माथी हाणू काठी ।।

अशा या सर्व संतांच्या शिकवणुकीत साम्य आहे. असे म्हणतात की परमेश्वराला सर्वत्र जाता येत नाही, म्हणून त्याने आई निर्मिली. तसेच मी म्हणेन की परमेश्वराला सर्वाना समजावणे शक्य नव्हते, म्हणून त्याने संतांची निर्मिती केली. सर्व संतांचे हृदय हे आईचेच हृदय. मातेच्या ममतेने संतांनी समाजाचे पालन पोषण केले. माता प्रसंगी बालकाला रागावतेही पण ते त्याच्या हितासाठी. तसे तुकोबा कधी कधी कठोर झाले. पण ते समाजातील अंधश्रद्धा, रूढी, दुष्ट चालीरीती यावर प्रहार करताना. आणि त्या काळात अशा प्रकारे लोकांना समजावून सांगण्याची आवश्यकता होती. लोक आपले कर्तव्य विसरले होते, गुलामगिरीची वृत्ती अंगी भिनली होती, ढोंगीपणा, बुवाबाजी यासारख्या गोष्टीना ऊत आला होता. लोक देवाची खरी भक्ती विसरले होते आणि नवस सायास करू लागले होते. अशा वेळी ‘ नवसे पुत्र होती, तरी का करणे लागे पती ‘ यासारखे परखड बोल तुकोबांनीच समाजाला ऐकवले. दांभिकतेवर प्रहर करताना ते म्हणतात-कथा करोनिया दावी प्रेमकळा, अंतरी जिव्हाळा कुकर्माचा तुळसी खोवी कानी दर्भ खोवी शेंडी, लतिका धरी बोंडी नासिकाची ।

टिळे टोपी माळा देवाचे गबाळे, वागवी ओंगळे पोटासाठी

गोसाव्याच्या रूपे हेरी परनारी, तयाचे अंतरी कामलोभ ।

कीर्तनाचे वेळी रडे, पडे, लोळे, प्रेमेविण डोळे गळताती

तुका म्हणे ऐसे भाषेचे महंत, त्यापाशी गोविंद नाही नाही ।

तुकोबांची दुसरी पत्नी आवली. कजाग आणि कर्कश मावली. आणि तुकोबा विठ्ठल भक्त. एवढेच आम्ही जाणतो फक्त. पण खरे म्हणजे असे नव्हते. आवली असेल कजाग आणि कर्कश पण तुकोबांवर तिचे अतिशय प्रेम. म्हणतात ना ज्या व्यक्तीवर आपले प्रेम असते त्या व्यक्तीवरच आपण रागावतो. ते जेवल्याशिवाय ती तोंडात अन्नाचा कणही घेत नसे. आणि तुकोबांची योग्यता ती जाणून होती.

घरामध्ये खायला काही नसायचे. मुलेबाळे, पत्नी उपाशी. अशा परिस्थितीत एखाद्याला आपल्या संसारासाठी थोडा स्वार्थ सुचला असता तर ते क्षम्यच होते. पण तुकोबांनी त्यांच्याकडे चालून येणारा नजराणा नाकारला. शिवरायांनी त्यांच्याबद्दल अतीव आदराने तो पाठवला होता. पण ‘ काय उणे आम्हां विठोबाचे पायी ‘ या भावनेतून तो नम्रपणे नाकारला. त्यांनी त्या नजराण्यावर तुळशीपत्र ठेवले आणि म्हटले-

सोने आणि माती, आम्हा समान हे चित्ती

तुका म्हणे आले, घरी वैकुंठ सगळे.

आणि त्यांनी त्या नजराणा घेऊन आलेल्या सरदारांबरोबर निरोप पाठवला, ‘ शिवाजीराजांना सांगा! तुम्ही स्वतः आमच्याहून थोर आहात. तुम्ही आहात म्हणून देहू गावावर परचक्र आलेले नाही. हाच नजराणा मोलाचा. आम्हाला द्रव्य काय करायचे? आम्हाला काय उणे आहे?

असे हे निरिच्छ तुकोबाराय. त्यांचे अभंग तरले कारण ते खऱ्या अर्थाने ‘अ-भंग’ होते. काळाच्या कसोटीवरही ते टिकून राहिले. ते अजरामर आहेत आणि राहतील. वर्षानुवर्षे समाजाला मार्गदर्शन करीत राहतील.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ऊरुग्वे आणि ‘इंडियन काऊ’… माहिती संकलक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – बिल्वा शुभम् अकोलकर ☆

बिल्वा शुभम् अकोलकर

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☆ ऊरुग्वे आणि ‘इंडियन काऊ’… माहिती संकलक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – बिल्वा शुभम् अकोलकर 

उरुग्वे हा एक असा देश आहे, जिथे प्रत्येक व्यक्तीकडे सरासरी चार गायी आहेत, आणि कृषी क्षेत्रात तो जगात पहिल्या क्रमांकावर आहे!! हा फक्त ३३ लाख लोकसंख्येचा देश आहे आणि तिथे १ कोटी २० लाख गायी आहेत!

प्रत्येक गायीच्या कानात एक इलेक्ट्रॉनिक चिप बसवलेली आहे, ज्यामुळे प्रत्येक गाय कुठे आहे याचा मागोवा घेता येतो. एक शेतकरी कापणीच्या यंत्रामागे बसून काम करत असताना, दुसरा पिकाची आकडेवारी पाहण्यासाठी स्क्रीनवर डेटा जोडत असतो.

देशातील गोळा केलेल्या सर्व डेटाचा वापर करून प्रति चौरस मीटर पिकाचे विश्लेषण करतात. २००५ मध्ये, ३३ लाख लोकसंख्येचा हा देश ९० लाख लोकांसाठी अन्न उत्पादन करत होता, आणि आज तो २ कोटी ८० लाख लोकांसाठी अन्न उत्पादन करतो!

उरुग्वेच्या या यशस्वी कामगिरीमागे देश, शेतकरी आणि पशुपालकांचा अनेक दशकांचा अभ्यास आहे. संपूर्ण कृषी क्षेत्रावर देखरेख ठेवण्यासाठी ५०० कृषी अभियंत्यांना तैनात करण्यात आले आहे, आणि ते ड्रोन व उपग्रहांच्या साहाय्याने शेतकऱ्यांवर लक्ष ठेवतात. जेणेकरून ते विहित शेती पद्धतींचा अवलंब करत आहेत याची खात्री करता येते. म्हणजेच, देशाच्या अनेक पटींहून अधिक लोकसंख्येसाठी धान्य, दूध, दही, तूप आणि लोणी यांचे उत्पादन करणे.

सर्व धान्य, दूध, दही, तूप आणि लोणी यांची सहजपणे निर्यात केली जाते आणि प्रत्येक शेतकरी लाखो रुपये कमावतो. एका व्यक्तीचे किमान उत्पन्न दरमहा १, २५, ००० रुपये किंवा वार्षिक १, ९०, ००० डॉलर्स आहे!!

या देशाचे राष्ट्रीय चिन्ह सूर्य आहे, आणि प्रगतीची राष्ट्रीय चिन्हे गाय आणि घोडा आहेत! उरुग्वेमध्ये गाय मारल्यास तात्काळ मृत्युदंडाची शिक्षा आहे! या गायप्रेमी देशाचे अभिनंदन!!

सर्वात महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे ही सर्व जनावरे भारतीय वंशाची आहेत, ज्यांना तिथे ‘इंडियन काऊ’ म्हणून ओळखले जाते!!

लेखक / माहिती संग्राहक : अज्ञात 

प्रस्तुती :  बिल्वा शुभम् अकोलकर

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ‘ते‘ निळं फूल – माहिती संग्राहक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती : डॉ. ज्योती गोडबोले ☆

डॉ. ज्योती गोडबोले 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ‘ते‘ निळं फूल – माहिती संग्राहक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती : डॉ. ज्योती गोडबोले

न्यूयॉर्कच्या कॅफेमध्ये गाजणारं ‘ते’ निळं फूल: आपल्या अंगणातल्या गोकर्णीची जागतिक भरारी

आपल्याला वाटतं की आपल्या मनाची एकाग्रता आणि स्मरणशक्ती ही फक्त प्रयत्नांवर किंवा नशिबावर अवलंबून असते? पण तसं नसतं एकाग्रता हा केवळ मनाचा खेळ नसून ते एक जैविक गणित आहे, जे निसर्गातील एका साध्या फुलाने सोडवता येऊ शकतं. आपण महागड्या बदाम आणि अक्रोडच्या मागे धावतो, पण खऱ्या शक्तीचा स्रोत आपल्या घरामागील अंगणात किंवा रानावनात दुर्लक्षित राहिला आहे.

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न्यूयॉर्कमधील एका अतिशय आलिशान रेस्टॉरंटमध्ये तुम्ही बसला आहात. तुमच्यासमोर एक निळ्या रंगाचं पेय येतं, त्यात लिंबाच्या रसाचा एक थेंब पडताच त्याचा रंग जांभळा होतो. तिथले लोक याला ‘बटरफ्लाय पी’ (Butterfly Pea) म्हणतात आणि एका कपसाठी अनेक डॉलर्स मोजतात. पण हे तेच फूल आहे ज्याची भारतात शतकानुशतके ‘शंखपुष्पी’ नावाने ओळख आहे आणि आपण सगळे त्याला ‘गोकर्ण’ म्हणून ओळखतो.

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ताज्या जागतिक ट्रेंड्सवर नजर टाकली, तर एक गोष्ट स्पष्ट होतेय की पाश्चात्य जग आता ‘फंक्शनल बेव्हरेजेस’ (Functional Beverages) कडे मोठ्या प्रमाणावर वळलं आहे. अमेरिकेच्या बाजारपेठेत सध्या ब्राह्मी आणि अश्वगंधा मिश्रित पेयांची लाट आली आहे. याच लाटेवर आता गोकर्णाचा चहा स्वार झाला आहे. पुढच्या दोन वर्षांत हे गोकर्णाचे फूल जागतिक स्तरावर एक ‘सुपरफूड’ म्हणून धुमाकूळ घालणार आहे.

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गोकर्णाच्या चहाचा आता जागतिक बाजारपेठेने ‘लाईफस्टाईल ड्रिंक’ म्हणून स्वीकार केला आहे. भारतात मोठ्या प्रमाणावर उगवणारं हे फूल आता केवळ औषध राहिलेलं नाही. या फुलाच्या अर्कापासून बनवलेला चहा, सौंदर्य प्रसाधने आणि आरोग्यदायी पेये यांची मागणी युरोप आणि अमेरिकेत प्रचंड वाढली आहे.

या वाढत्या मागणीमुळे एक मोठी व्यापारी संधी निर्माण झाली आहे. केवळ या फुलाची शेतीच नाही, तर त्यातून अर्क काढणे (Extraction), सप्लिमेंट्स बनवणे आणि व्हॅल्यू-ॲडेड प्रॉडक्ट्स तयार करणे या क्षेत्रांत मोठी गुंतवणूक होत आहे. स्टार्टअप्ससाठी हे एक सुवर्णक्षेत्र ठरू पाहत आहे. ज्याप्रमाणे हळदीचं दूध ‘हळदी लॅटे’ होऊन जगात गाजलं, तसंच आता आपल्या अंगणात वाढणारे गोकर्ण ‘ब्लू टी’ किंवा ‘पर्पल मॅजिक’ म्हणून घराघरांत पोहोचत आहे.

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आणि गोकर्णाची लागवड फार कठीण नाही हा अनुभव तुम्हालाही आला असेलच. बारा महिने हिरवीगार, भरपूर फुलं देणारी, थोडी मातीच्या ओलाव्याची माया मिळाल्यावर सुखाचा संसार थाटणारी वेल म्हणजे गोकर्णीची! एकदा ही वेल बागेत लावला की त्याची वाढ चक्क ‘ऑटॉ पायलट मोड’ वर होते. माळ्याकडून खत वगैरे अशी फारशी अपेक्षा नसते. वेळच्यावेळी फुलांनी बहरते आणि फुलपाखरांना आमंत्रण देते. तशी ही बहुप्रसवा म्हणावी अशी वनस्पती आहे. फुलागणिक एक शेंग उगवते. जरा उन्हाने तापली की शेंग फुटून पाच दहा बिया मातीत पडतात. थोड्याच दिवसात अंकुर येतात, ते आसपासच्या कोणत्याही दुसर्‍या झाडाच्या आधाराने वाढतात. असं साधं सोपं लाइफ सायकल फारच कमी बघायला मिळतं.

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गोकर्णाला अपराजिता ब्लूबेल्व्हाइन, विष्णुकांता, ब्ल्यू-पी, बटरफ्लाय-पी आणि डार्वीन-पी अशा बर्‍याच नावानी ओळखलं जातं. पण ‘गाईच्या कानासारखी दिसणारे’ या अर्थाने गोकर्ण हेच नाव एकदम अर्थवाही वाटते.

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गोष्ट अशी आहे की, आपल्याकडे असलेल्या खजिन्याची किंमत आपल्याला तेव्हाच कळते जेव्हा जग त्याचं कौतुक करायला लागतं. गोकर्ण हे केवळ एक फूल नसून ते मानसिक आरोग्यासाठीचं एक नैसर्गिक वरदान आहे. आजच्या धावपळीच्या युगात, जिथे प्रत्येक जण तणावाखाली आहे, तिथे हे निळं फूल मन:शांतीचा मार्ग दाखवत आहे.

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ताज्या किंवा सुकवलेल्या गोकर्णाच्या पाकळ्या पाण्यात टाकल्या की निळ्या रंगाचा आरोग्यदायक चहा तयार होतो. हा चहा थंड किंवा गरम कसाही घ्या. गोडी आवश्यक असेल तर मध घाला, चव आणखी वाढवायची असेल तर लिंबू पिळून घ्या. या फुलांमध्ये अँथोसायनीन हे रसायन असते. अँथॉस म्हणजे फूल आणि सायनीन म्हणजे निळा -जांभळा रंग अशी या शब्दाची उत्पत्ती आहे. एक गंमतीदार वैशिष्ट्य असे की अँथोसायनीनचा रंग ज्या पाण्यात मिसळाल त्या पाण्याच्या pH प्रमाणे बदलतो. लिंबू पिळले की चहा अ‍ॅसीडीक होतो आणि नीळा चहाचा रंग गुलाबी होतो. पण एक गोष्ट लक्षात ठेवा, हे फूल कितीही औषधी असलं तरी गंभीर आजारांच्या बाबतीत डॉक्टरांचा सल्ला घेणं नेहमीच हिताचं असतं. आरोग्य हीच खरी संपत्ती आहे आणि निसर्गाकडे या संपत्तीच्या अनेक चाव्या आहेत.

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मग विचार करा, ज्या फुलाला आपण वर्षानुवर्षे केवळ देवाच्या पूजेत किंवा कुंपणावर पाहिलं, ते जागतिक बाजारात एक नवा ट्रेंड घडवू शकतं, ही कल्पनाच थक्क करणारी नाही का? आपल्या आजूबाजूला अशा कितीतरी वनस्पती असतील ज्यांच्याकडे आपण ‘फक्त एक गवत’ म्हणून पाहतोय, पण कदाचित त्या जगाचं पुढचं मोठं ‘इनोव्हेशन’ ठरू शकतील?

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माहिती संग्राहक : अज्ञात

प्रस्तुती : डॉ. ज्योती गोडबोले 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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