ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 फरवरी से 1 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (23 फरवरी से 1 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

 जय श्री राम। पंडित अनिल पांडे का आप सभी को नमस्कार। पिछले सप्ताह मैंने आपसे वादा किया था कि मैं आगे से आपको प्रतिदिन श्री हनुमान चालीसा के सिद्ध दोहे एवं चौपाइयों के संपुट पाठ से होने वाले लाभ के बारे में बताऊंगा। आज अभी मैं आपको श्री हनुमान चालीसा के द्वितीय दोहे के बारे में बताऊंगा। वीडियो के अंत में आपको श्री हनुमान चालीसा के प्रथम चौपाई के संपुट पाठ से होने वाले लाभ के बारे में आपको अवगत कराने का प्रयास किया जाएगा।

श्री हनुमान चालीसा का द्वितीय दोहा है :-

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरो पवन कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु कलेश विकार।।

इस दोहे के संपूर्ण पाठ से बल बुद्धि और विद्या प्राप्त होती है।

आईये अब इस सप्ताह के ग्रहों की स्थिति के बारे में बात कर लेते हैं।

इस सप्ताह सूर्य, मंगल, बुद्ध, राहु और शुक्र कुंभ राशि में गोचर करेंगे। बुध कुंभ राशि में ही 26 तारीख के 10:09 रात से वक्री हो जाएगा। वक्री गुरु मिथुन राशि में और शनि मीन राशि में विचरण करेंगे। इस प्रकार पांच ग्रहों का कुंभ राशि में इस सप्ताह मिलन होने जा रहा है जो एक अद्भुत संयोग है। इस संयोग के बारे में एक अलग से वीडियो बनाया गया है जिसका लिंक इस वीडियो के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दिया हुआ है।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

आपके संतान को लाभ होगा। शत्रुओं को आप प्रयास करने पर पराजित कर सकते हैं। धन लाभ में कमी होगी। आपको अपना व्यवहार इस सप्ताह अपने जीवनसाथी एवं बिजनेस पार्टनर के प्रति ठीक रखना चाहिए। कचहरी के कार्यों में आप सावधान रहें। भाई बहनों के साथ नरम-गरम संबंध बनेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 28 फरवरी तथा 1 मार्च विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए सफलता दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। 24 और 25 फरवरी को अगर आप प्रयास करेंगे तो आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपको अपने अधिकारियों से व्यवहार कुशलता रखनी चाहिए। आपको अपनी वाणी पर कंट्रोल करना चाहिए अन्यथा कार्यालय में आपकी स्थिति खराब हो सकती है। पिताजी को कष्ट हो सकता है। माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। थोड़ा सा धन आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 फरवरी कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए उपयोगी है। 23 फरवरी को आपको बड़ी सतर्कता के साथ कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। भाग्य से आपको कम मदद मिल पाएगी। धर्म के कार्यों में मन नहीं लगेगा। अगर पहले से आपके पेट में कोई परेशानी है तो वह भी दूर हो सकती है। कचहरी के कार्यों में सचेत रहें। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहें। इस सप्ताह आपके लिए 26 और 27 फरवरी कार्यों को करने के लिए मददगार है। 24 और 25 फरवरी को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की संभावना है। व्यापार के प्रति आपको सजग रहना चाहिए। दुर्घटनाओं के प्रति आपको सचेत रहने की आवश्यकता है। भाग्य से मामूली मदद प्राप्त हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 28 फरवरी तथा 1 मार्च कार्यों को करने के लिए लाभदायक है। 26 और 27 फरवरी को आपको अपने कार्यों के प्रति सतर्क रहना चाहिए अन्यथा आपके कार्य नहीं हो पाएंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। व्यापार में लाभ होने की संभावना है। अविवाहित जातकों के लिए अच्छा समय है। युवकों के लिए भी यह समय ठीक है। विवाह के नए-नए संबंध आएंगे। नए-नए प्रेम संबंध बनेंगे। आपके स्वयं का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य खराब हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 फरवरी कार्यों को करने में परिणाम दायक हैं। 28 फरवरी और 1 मार्च को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक है। आपके पिताजी और माताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आप अपने शत्रुओं को थोड़े से प्रयास से इस अवधि में पराजित कर सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सावधानी की आवश्यकता है। आपके स्वास्थ्य में समस्या आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 26 और 27 फरवरी विभिन्न प्रकार के कार्यों को सफलतापूर्वक करने के लिए शुभ है। 23 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की संभावना है। भाग्य से मदद मिल सकती है, परंतु आपको भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए। अपने परिश्रम पर भाग्य से ज्यादा विश्वास करना चाहिए। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। व्यापार में कमी हो सकती है। कचहरी के कार्यों में कोई भी रिस्क ना लें। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 28 फरवरी तथा 1 मार्च कार्यों के करने के प्रति फल दायक हैं। 24 और 25 फरवरी को आपको बड़ी होशियारी के साथ कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। कार्यालय में उनकी स्थिति ठीक-ठाक रहेगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सचेत रहने का है। आपकी प्रतिष्ठा में हानि हो सकती है। माता जी को कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 तारीख कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। 23, 26 और 27 फरवरी को आपको सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको भाग्य से लाभ हो सकता है। आपके क्रोध में वृद्धि होगी। कार्यालय में आपको कष्ट हो सकता है। शत्रुओं से सावधान रहना है। अविवाहित जातकों के विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 26 और 27 फरवरी कार्यों को करने के लिए उचित हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके साथ कोई दुर्घटना होना संभव नहीं है। अगर दूसरों की गलती से कोई दुर्घटना हो जाती है तो आपको चोट नहीं आएगी। धन आने की संभावना है। परंतु धन प्राप्त करने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके संतान को कष्ट हो सकता है। भाग्य से ज्यादा मदद मिलने की उम्मीद नहीं है। आपको अपने परिश्रम पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 23 और 28 फरवरी तथा 1 मार्च कार्यों को करने के लिए प्रभावशाली है। युवकों के लिए 28 फरवरी और 1 मार्च को उनके प्रेम संबंधों में भी वृद्धि होगी। 26 और 27 फरवरी को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इससप्ताह आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। माता और पिता जी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। आपके आत्मविश्वास में कमी आएगी। आपका स्वास्थ्य खराब हो सकता है। व्यापारियों का व्यापार ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। उनको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 फरवरी कार्यों को करने के लिए फल दायक हैं। 28 फरवरी और 1 मार्च को आपको सावधान रहकर कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। जन प्रतिनिधियों को प्रयास करने पर उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके भाइयों और आपके जीवनसाथी को कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 26 और 27 फरवरी विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए लाभदायक है। 28 फरवरी और 1 मार्च को आपको कोई भी कार्य करने के पहले पूरी सावधानी बरतना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र की तीन माला का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

अब मैं आपको श्री हनुमान चालीसा के प्रथम चौपाई ” जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुं लोक उजागर। “। के संपुट पाठ से होने वाले लाभ के बारे में बताता हूं।

इस चौपाई के संपट पाठ एवं हनुमत कृपा से ज्ञान, विभिन्न प्रकार के गुण और आत्मिक बल की प्राप्ति होती है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ आश्रम… ☆ सौ. ज्योती कुळकर्णी ☆

सौ. ज्योती कुळकर्णी 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ आश्रम☆ सौ. ज्योती कुळकर्णी ☆  

(अनलज्वाला – ८/८/८)

परंपरेने चालत आले चारी आश्रम

नव्या युगाची नवी कमाई का वृद्धाश्रम?

*

नव युगातले नवे स्विकारत पुढेच जावे

तुम्ही शोधले मूल ठेवण्या मग बालाश्रम

*

दाखविती ही मुले तुम्हाला जर वृद्धाश्रम

तुमचे घर जर, तुम्ही दाखवा यौवन आश्रम

*

वीट कुठे हो तुम्हास आला संसाराचा?

नुसते बोलू नका तुम्ही घ्या संन्यासाश्रम!

*

पिढी नवी का घडवायाची तुम्हास येथे?

येथेच तुम्ही निर्माण करा मग कष्टाश्रम

© सौ. ज्योती कुळकर्णी

अकोला

मोबा. नं. ९८२२१०९६२४

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ संकल्प… ☆ सौ शालिनी जोशी ☆

सौ शालिनी जोशी

🔅 विविधा 🔅

☆ संकल्प☆ सौ शालिनी जोशी

‘संकल्प’ हा संस्कृत शब्द सम् अधिक कल्प. सम् म्हणजे चांगला आणि कल्प म्हणजे इच्छा, प्रतिज्ञा किंवा निश्चय म्हणून कोणताही चांगला म्हणजे हितकारक निश्चय हा संकल्प असतो.

परमात्मा एकटाच सर्व विश्वाला व्यापून होता. तेव्हा ‘एकोsहं बहुस्याम’ ‘एकटाच आहे बहु व्हावे ‘असे स्फुरण त्याला झाले. हाच पहिला संकल्प. याला ‘हरी संकल्प’ म्हणतात. यातूनच पुढे सृष्टीची रचना झाली. म्हणजे संकल्पाचे मूळ परमात्म्याकडे जाते. सहजच ते आपल्यापर्यंत आले. म्हणूनच कोणत्याही धार्मिक विधी पूर्वी संकल्प करून त्या देवतेला कार्यपुर्तीसाठी प्रार्थना केली जाते म्हणजे तो सिद्धीला जातो इच्छापूर्ती होते.

परमात्म्याचा संकल्प तत्काळ सिद्धीला गेला. आपल्यासाठी मात्र संकल्प आणि सिद्धी यामध्ये जमीन आसमानाचे अंतर. म्हणजे बराच काळ, कष्ट, प्रतीक्षा, संयम आणि सातत्याची गरज. समर्थ मनोबोधात सांगतात ‘सत्य संकल्प जीवी धरावा’ ‘ पाप संकल्प सोडून द्यावा’ म्हणजे संकल्पचे दोन प्रकार. परिणाम चांगला घडवणारा सत्य संकल्प. जसा ध्रुवाने अढळपद प्राप्तीचा केला. बालपणी तपश्चर्या आणि बराच काळ चांगले राज्य केल्यावर त्याला अढळपद प्राप्त झाले. एकलव्याने द्रोणाचार्यांच्या प्रतिमेला पुढे ठेवून श्रेष्ठ धनुर्धर बनण्याचा संकल्प केला. मोठ्या कष्टाने त्याने आपले ध्येय साधले. संकल्प सिद्धीला पोहोचला. हे सत्य संकल्प. पण दुर्योधनाने ‘सुईच्या टोकावर राहील एवढीही जमीन पांडवाना देणार नाही’ असा संकल्प केला आणि तो युद्धाला कारण झाला. कौरवांचा नाश झाला हा पाप संकल्प. चाणक्य, शिवाजी महाराज यांचे संकल्प देशोध्दाराला कारण झाले. आर्य चाणक्याने नंदाच्या सभेत ‘तुझे भ्रष्टाचाराने बरबटलेले राज्य नाश करून समर्थ असा राजा सिंहासनावर बसवेपर्यंत शेंडीला गाठ मारणार नाही’ अशी प्रतिज्ञा केली ‘ती पूर्ण करून दाखवली. अडीच तपाचा कालावधीमध्ये गेला. पण संकल्प पूर्ण झाला. तसेच शिवाजी महाराजांनी स्वराज्य स्थापनेची प्रतिज्ञा पूर्ण केली. हे सत्य संकल्प. अशा प्रकारे संकल्प करण्याचे स्वातंत्र्य प्रत्येकाला आहे.

गीतेत संकल्प हा शब्द बरेच वेळा आला आहे

१) न ह्यसन्न्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन।(गी६/२)

२) सर्व संकल्पसंन्यासी योगारुढस्तदोच्यते। (गी६/४)

येथे संकल्प म्हणजे कामनायुक्त इच्छा असा अर्थ आहे त्यांचा त्याग येथे सांगितला आहे.

पूर्वी स्त्रिया चातुर्मासाच्या निमित्ताने काही व्रते करीत ते संकल्पच. संकल्पच यशाला कारण होतो. आताही कोणी एव्हरेस्ट चढण्याचा, कोणी खाडी पार करण्याचा, कोणी समाज सुधारण्याचा, कोणी अनाथांना सांभाळण्याचा, तर कोणी प्राण्यांची काळजी घेण्याचा संकल्प करतात. अशा प्रकारे संकल्पाना मर्यादा नाही. ज्याला जो आवडेल, झेपेल, पचेल, रुचेल पण दुसऱ्याला त्रासदायक होणार नाही. तो त्याने अवश्य करावा. रोज काही वाचण्याचा, लिहिण्याचा, पाठांतराचा, व्यायाम करण्याचा, काही नियम करून त्याप्रमाणे वागण्याचा संकल्प नेहमी चांगलाच असतो. त्यामुळे शिस्त लागते. शरीराला म्हणाला वळण लागते. मनाची चंचलता कमी होते. अशा प्रकारे संकल्प करावा. सिद्धीचा आनंद भोगाव व सुखी व्हावे.

सध्या भ्रष्टाचार मुक्त भारत हा मोठा संकल्प आपल्या देशापुढे आहे.

©  सौ. शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ संस्कारांचे बीज… (अनुवादित) – भाग – १ ☆ श्री मकरंद पिंपुटकर ☆

श्री मकरंद पिंपुटकर

? जीवनरंग ❤️

☆ संस्कारांचे बीज… (अनुवादित) – भाग – १ ☆ श्री मकरंद पिंपुटकर ☆

आज शनिवार होता, बस पहाटे नेहमीप्रमाणे निघाली होती. हा प्रवास किशनजींना काही नवीन नव्हता, दर शनिवारी पहाटे जयपूरहून निघायचं, आधी खाटूश्यामजींचे दर्शन घ्यायचं, मग तिथून पुष्करला ब्रह्माजींचं मंदिर आणि संध्याकाळपर्यंत जयपूरला परत. गेली चाळीस वर्षे किशन यादव शनिवारी याच रूटने ट्रॅव्हल्सची बस चालवायचे. प्रत्येक आठवड्याच्या शेवटी. प्रत्येक जत्रेसाठी. प्रत्येक नवसासाठी.

४७ किलोमीटरचा मैलाचा दगड जवळ येत होता, आणि किशनजींना बसच्या मागच्या आरश्यात प्रखर हेडलाईट्स दिसू लागले. तीन एसयुव्ही गाड्या वेगाने बसचा पाठलाग करत होत्या. त्यांना आश्चर्य वाटले नाही, ते चलबिचल झाले नाहीत. त्यांचे हात स्टिअरिंग व्हीलवर स्थिर होते. त्यांनी मागे झोपलेल्या ६२ यात्रेकरूंना जागे केले नाही. कारण त्यांना माहित होते की ते येणार आहेत.

खरं तर, ते तीन दिवसांपासून या क्षणाची वाट पाहत होते. तीन दिवसांपूर्वीच त्यांना एक निनावी फोन आला होता, “या शनिवारी, खाटूश्यामजींच्या दर्शनाला पहाटे निघणारी तुमची बस ४७ किलोमीटरच्या मैलाच्या दगडाशी थांबवली जाईल. ” एवढंच सांगून फोन कट केला गेला होता.

किशनजी पूर्ण पाच मिनिटे फोनकडे पाहत राहिले. नंतर ते फक्त गूढ हसले. त्यांनी ना आपल्या दैनंदिन व्यवहारांत बदल केला, ना आपल्या पत्नीला – ना ट्रॅव्हल कंपनीच्या मालकाला या फोनबद्दल काही सांगितलं.

फोननंतर दुसऱ्या दिवशी ते नेहमीप्रमाणे गाडी मेकॅनिककडे घेऊन गेले. ब्रेक, तेल पाणी वगैरे सर्व तपासून घेतलं, प्रवासात काही तांत्रिक अडचण यायला नको होती. दुसऱ्या दिवशी त्यांनी सर्व प्रवाश्यांना फोन केले. “तुमची औषधे सोबत आहेत का? ”, “तुम्ही तुमच्या कुटुंबाला सांगितले आहे का? ”, “तुम्हाला खात्री आहे की तुम्हाला जायचेच आहे? ” आपल्या नातवाच्या आरोग्यासाठी नवस करणाऱ्या ८४ वर्षीय शांती देवी म्हणाल्या, “बाळा, मी सहा महिन्यांपासून वाट पाहत आहे. भले माझा हा जीवनातील शेवटचा प्रवास ठरला, तरी मी जाईनच. ” 

फोनवर होकार दिलेले सर्व प्रवासी आपापल्या पिशव्या, थर्मास, जपमाळा आणि आशा घेऊन गाडीत बसलेले होते, माळा जपत असलेल्या वृद्ध स्त्रिया, संपूर्ण कुटुंबे, घोंगड्यांमध्ये गुंडाळलेली मुले – सगळे निद्रादेवीच्या अधीन झाले होते.

आरशात दिसणारा हेडलाईट्सचा प्रकाश अधिक तेजस्वी झाला. मैलाचा दगड जवळ येत होता. पुढे काय होणार हे किशनजींना ठाऊक होतं, त्यांनी ब्रेक लावायला सुरुवात केली. मैलाचा दगड आला आणि त्याच क्षणी, एसयूव्ही गाड्या बसचा मार्ग रोखत तिला आडव्या थांबवल्या गेल्या.

किशनजींनी ब्रेक दाबले. बसच्या एअरब्रेकने एक मोठा सुस्कारा सोडला. बस थांबली. साइड मिररमध्ये त्यांनी पाहिलं, एसयूव्हीमधून माणसे खाली उतरत होती. सहा – आठ – दहा. हातात वॉकी-टॉकी, फ्लॅशलाइट्स — आणि ती चाल – ज्यांना आव्हान देण्याचे धाडस कोणी करत नाही.

त्यांच्यापैकी एकजण, बहुधा त्यांचा म्होरक्या, बसच्या दरवाजाजवळ आला. बोटांनी काचेवर दोनदा थाप मारली. किशनजींनी बटन दाबून आत येणाऱ्या दरवाज्याचे दार उघडलं, बसचे इंजिन बंद केलं, आणि म्हणाले, “बोला. मी तुमची वाटच बघत होतो. तुम्ही इथे बस थांबवणार हे सांगणारा फोन आला होता मला. “

तो म्होरक्या, सुमारे ३५ वर्षांचा, धिप्पाड शरीरयष्टीचा, करारी नजरेचा— बसच्या पहिल्या पायरीवर चढला. त्याच्या टॉर्चचा प्रकाश किशनजींच्या चेहऱ्यावर पडला. “आम्ही तुम्हाला थांबवणार हे माहित होतं, आणि तरीही तुम्ही आलात? ”

किशनजींनी सरळ त्याच्या डोळ्यात पाहिले. “मी गेली ४० वर्षे या मार्गावरून प्रवास करत आहे. मी लष्करी चेकपॉईंट पाहिले आहेत. मी पोलीस अधिकारी पाहिले आहेत. तुमच्यासारखी माणसे. इतर टोळ्या. दरोडे, अपहरण, लाचखोरी—सगळं काही. आणि या सगळ्यातून एकच शिकलो, पाठ दाखवायची नाही, लपायचं नाही. लपल्याने गोष्टी नेहमीच बिघडतात. ”

तो म्होरक्या किशनजींकडे पाहत राहिला— त्यांच्या नजरेतली भीती शोधत, कमकुवतपणा शोधत, आवाजातील कंप शोधत. पण त्याला यापैकी काहीच आढळलं नाही. आणि याच गोष्टीमुळे त्याला सर्वाधिक अस्वस्थता वाटत होती.

“आम्ही कोण आहोत हे तुम्हाला माहीत आहे का? ” त्याने विचारले.

“मला माहीत आहे, ” किशन म्हणाला. “तुम्ही गेल्या आठ महिन्यांपासून या भागावर नियंत्रण ठेवले आहे. तुमच्याआधी कोणीतरी दुसरे होते. आणि कदाचित काही वर्षांनंतर कोणीतरी दुसरे असेल. ”

मग त्यांनी आपले डोके मागे वळवले— जिथे प्रवासी बसमध्ये झोपले होते. “पण ही माणसे… ती येतच राहतील. कारण श्रद्धा अमर आहे. ”

म्होरक्याचा एक साथीदार बसमध्ये चढला. तरुण. थोडा घाबरलेला, गोंधळलेला. त्याचे बोट वायरलेस रेडिओच्या बटणाजवळ होते. “सर… आता आपण काय करायचे? ” तो कुजबुजला. म्होरक्याने उत्तर दिले नाही. तो अजूनही किशनजींकडेच पाहत होता.

“तुम्ही बसमध्ये काय घेऊन जात आहात? ” त्याने विचारले.

“६२ भाविक. १७ मुले. २८ महिला. १७ पुरुष. ” किशनजींनी लगेच सांगितलं. “खाटूश्यामला जात आहेत. काहीजण आभार मानण्यासाठी. काहीजण चमत्काराची मागणी करण्यासाठी. ” 

मग त्याने हळूच मागे बोट दाखवले. “सीट नंबर २३ वर बसलेल्या शांती देवी त्यांच्या नातवासाठी प्रार्थना करायला जात आहेत. त्याला कॅन्सर आहे. रामस्वरूपजी सीट नंबर १५ वर आहेत— आपल्या मुलीच्या जगण्यासाठी घेतलेला नवस पूर्ण करण्यासाठी. आणि ८ ते १२ पर्यंत शर्मा कुटुंब आहे— गेल्या पुरात त्यांचे घर वाहून गेले. ते फक्त नव्याने सुरुवात करण्यासाठी शक्ती मिळावी म्हणून प्रार्थना करायला जात आहेत. ”

म्होरक्याने डोळे मिचकावले. “तुम्हाला जणू प्रत्येकाची कहाणी आठवते, नाही का? ”

“प्रत्येकाची, ” किशनजींनी मान डोलावली. “कारण तेच माझे काम आहे, फक्त बस चालवणे नाही—मी कोणाला घेऊन जात आहे, का घेऊन जात आहे, हे जाणून घेणे, हे माझे काम आहे. माझी बस फक्त एक बस नाही, ते एक चालतेफिरते मंदिर आहे. श्रद्धाळूंच्या आशेचे प्रतीक! ”

आणखी काही न बोलता किशनजींनी आपला थर्मास बाहेर काढला, एक कप चहा स्वतःला घेतला, दुसऱ्या कपात चहा ओतला आणि त्या म्होरक्याला देऊ केला. “चहा घ्या, थंडी आहे. “

म्होरक्याने एक घोट घेतला. चहा गरम होता—वेलची आणि गुळाच्या सुगंधाने दरवळणारा. अगदी तसाच, जसा त्याची आजी लहानपणी त्याला बनवून द्यायची. आणि त्या क्षणी— फक्त एका क्षणासाठी— तो त्या भागातला शक्तिशाली माणूस – भाई – डॉन राहिला नाही, तो फक्त एक ३५ वर्षांचा माणूस होता, जो वीस वर्षांपूर्वीच्या एका प्रेमळ स्वयंपाकघराची आठवण काढत होता. “तू घाबरत का नाहीस? ” त्याने हळूवारपणे विचारले.

किशनजी क्षणभर शांत राहिले, मग म्हणाले, “नाही. कारण मी अनेकांना भीतीने मरताना पाहिले आहे आणि अनेकांना श्रद्धेने जगताना. त्यातून मी शिकलो आहे— खरी श्रद्धा घाबरत नाही. ती सन्मानाने उभी राहते, ठाम, भीतीशिवाय. ”

– क्रमशः भाग पहिला 

© श्री मकरंद पिंपुटकर 

चिंचवड, पुणे.  मो 8698053215

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “म्हैस…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “म्हैस…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर

मी राहतो पुण्याला कर्वेनगर या भागात. आम्ही रोजच दुपारी बावधन या भागात मुलीकडे जातो. नातवंडं दुपारी शाळेतून घरी येतात. त्यावेळेला आम्ही घरी असल्यामुळे त्यांचे दुपारचे खाणे – पिणे, अभ्यास, क्लास ला सोडणे / आणणे वगैरे, याची काळजी रहात नाही. संध्याकाळी मुलगी किंवा जावई ऑफिस मधून घरी आले, की, थोड्या गप्पा मारून, आम्ही साधारण ६ – ६. ३० ला तिथून निघून कर्वे नगरला, आमच्या घरी येतो. आमचे जाणे येणे स्कुटरनी असते. कधी कधी बायको बावधनहून स्कुटर घेऊन आधी निघून जाते, अशावेळेस, मी घरापर्यंत कधी पायी जातो, कधी अर्धे अंतर बसनी व पुढचे पायी जातो.

एक दिवस बायको स्कूटर घेऊन लवकर घरी गेली म्हणून त्या दिवशी संध्याकाळी मला बसनी घराकडे जायचं होतं.

मुलीकडून ६. ३० ला निघालो. साधारण ५ – ७ मिनिटे चालत गेलो, की मेन रोड लागतो. रस्ता ओलांडला, की, समोरच बसचा थांबा आहे. ट्रॅफिकच्या पीक- आवर्स मध्ये पुण्यात कुठलाही रस्ता ओलांडणे हे एक दिव्यच असते. मी जाऊन रस्त्याच्या अलीकडे उभा राहिलो व ट्रॅफिक मध्ये गॅप पडण्याची वाट बघत थांबलो. त्या दिवशी ट्रॅफिक जरा जास्तच होता. या रोडची खासियत अशी आहे, की, पुणे विद्यापीठ ते व्हाया पाषाण रोड – व्हाया चांदणी चौक – पौड डेपोपर्यंत, म्हणजे साधारण ५ – ६ किमी अंतरामध्ये कुठेही सिग्नल नाही. त्यामुळे सगळ्याच गाड्या, म्हणजे कार/ स्कुटर/ मोटर सायकल/ बसेस आणि ऑटो, रस्त्याच्या दोन्हीकडून सुसाट स्पीडनी धावत असतात. बहुदा, ४-५ मिनिटे गेली, की, छोटीशी गॅप मिळते व त्यामध्ये जीव मुठीत धरून रस्ता क्रॉस करता येतो. आज काय प्रकार होता माहित नाही, मधे गॅपच येत नव्हती. बाजूला बघितलं, तर काही तरुण मंडळी गॅप नसतांना पण, धावून रस्ता क्रॉस करत होती. तेवढ्यात एक अंध व्यक्ती समोरून आरामात रस्ता ओलांडून आली. अज्ञानात सुख असतं, असं म्हणतात, ते असं!

मी बऱ्याच वेळेला ४ – ५ पावले पुढे जायचो आणि वेड्यावाकड्या येणाऱ्या गाड्यांना घाबरून परत मागे यायचो. पण पुढे जायची हिम्मत होत नव्हती. वाट बघता बघता १० मिनिटे झाली, पण ‘नो चान्स’. अशा वेळेस वाटतं, की, काहीतरी घडून ट्रॅफिक जॅम व्हावा, त्यामुळे आपोआपच क्रॉस करणाऱ्यांची सोय होते. पण तसही आज काही घडत नव्हतं. १५ मिनिटे झाली, तरी मी होतो त्याच ठिकाणी होतो.

तेवढ्यात माझी नजर मागे गेली. मागे एक तगडी म्हैस उभी होती व तिच्या गळ्यातली दोरी धरून मुलगा उभा होता. म्हशीकडे बघताच मी मनातल्या मनात ‘युरेका’, ‘युरेका’ (म्हणजे ‘सापडले’, ‘सापडले’) असे ओरडलो. मी लगेच त्या मुलाकडे गेलो.

मी : दादा, म्हैस घेऊन पलीकडे चलणार का?

मुलगा : कशाकरता? काय करायचं आहे?

मी : करायचं काहीच नाही. फक्त पलीकडे माझ्याबरोबर चलायचं आणि लगेच परत यायचं. ५ रुपये देईन.

(मुलाला काहीच अर्थबोध झाला नसावा. पण ५ रु मिळणार आणि करायचं काहीच नाही, हे त्याला समजलं 

मुलगा : काका, चला 

मुलगा म्हैस घेऊन निघाला. मी म्हशीची ढाल करून, तिच्या उजव्या बाजूनी रस्ता क्रॉस करायला सुरुवात केली. इतका धुव्वाधार ट्रॅफिक असूनही मी मजेत रस्ता ओलांडत होतो. काही वाहन चालकांनी म्हशीकरता कर्कश्य हॉर्न वाजवले, काहींनी म्हशीला मनात शिव्या दिल्या असतील. आम्ही थाटात पलीकडे पोहोचलो. मी मुलाला ५ रु दिले आणि आभार मानले. पलीकडे ४ वयस्कर रस्ता क्रॉस करायला उभेच होते. मला इतक्या आरामात रस्ता ओलांडतांना बघून, सगळेच मुलाला म्हणाले – अरे आम्हाला पण पलीकडे सोड. आम्ही २ – २ रु देऊ. लगेच मुलानी म्हैस मागे वळवली आणि सगळे म्हशीच्या आडोश्यानी पलीकडे निघाले. मला हे बघतांना मजा वाटली. मी जवळच्या बस थांब्यावर जाऊन बस ची वाट बघत बसलो.

रस्त्यावरचा ट्रॅफिक मगाशी होता, तसाच टॉप गिअर मधे होता. सहजंच माझं लक्ष पलीकडून येणाऱ्या म्हशीकडे गेलं. २ वयस्कर म्हशीच्या आडोशाने रस्ता क्रॉस करत होते. म्हशीच्या फेऱ्या सुरु झालेल्या बघून मला मजा वाटली आणि लक्षात आलं, की, म्हशीबरोबर रस्ता क्रॉस करणं, या सारखा सुरक्षित पर्याय नक्कीच नाही. तेवढ्यात त्या मुलाचं लक्ष माझ्याकडे गेलं व त्यानी आनंदानी हात हलवला. बहुदा मनामध्ये मला थँक्स म्हटले असेल. मी पण हात हलवून त्याच्याशी संवाद साधला. तेवढ्यात माझी बस आली आणि मी आत चढलो.

नंतर साधारण महिनाभर माझी जा- ये स्कुटरनीच सुरु होती. स्कुटर असली, की, माझा जाण्यायेण्याचा रस्ता थोडा बदलतो.

आज बायको स्कुटर घेऊन बावधनहून लवकर घरी गेली, त्यामुळे मला बसनी जायचे होते. मुलीकडून निघालो आणि चालत मेनरोडला पोहोचलो. साडेसात ची वेळ असल्यामुळे रस्त्याच्या दोन्हीबाजूनी सुसाट गाड्या धावत होत्या, सगळीकडून हेडलाईट डोळ्यावर येत होते, कर्कश्य हॉर्न वाजत होते. काही टू व्हीलरवाले उलटीकडून येत होते. काही फुटपाथवरून येत होते. थोडक्यात म्हणजे, पुण्यातल्या कुठल्याही हमरस्त्याचं चित्र समोर होतं. चित्रातला एक रंग मिसिंग आहे, हे पटकन लक्षात आलं. जीव मुठीत घेऊन रस्ता क्रॉस करतांना कुणीच दिसत नव्हते. मी मनात म्हटलं, हे गेले कुठे? तेवढ्यात माझं लक्ष थोडं पलीकडे उभ्या असलेल्या म्हशीकडे गेलं आणि म्हशीबरोबरच्या मुलाचं माझ्याकडे गेलं. मला बघताच मुलांनी हात उंचावला आणि ओरडला, ‘काका, चला पलीकडे सोडतो. फ्री मध्ये, पैसे द्यायचे नाही’.

माझ्या डोक्यात महिन्यापूर्वीच्या घटनेची ट्यूब पेटली, आपण याला म्हशीबरोबर रस्ता क्रॉस करण्याचे ५ रु दिले होते.

मुलगा मला थांबा म्हणाला आणि धावत जवळच्या फुलवाल्याकडून एक फुलांचा सुंदर गुच्छ घेऊन आला. मला गुच्छ देऊन त्यानी खाली वाकून मला नमस्कार केला व म्हणाला, काका चला.

आम्ही म्हशीच्या आडोशाने रस्त्यावर उतरलो आणि चालायला लागलो. महिन्यापूर्वी गेलो होतो, तेव्हा म्हैस थोडी बिचकत होती. आज ती एकदमच कंफर्टेबल वाटत होती. आपल्याकडे सिग्नल तोडणारे, उलटे येणारे, फुटपाथवर गाड्या घालणारे जेवढे कंफर्टेबल असतात तेवढीच.

चालता चालता —

मी : अरे म्हशीला घेऊन इकडे काय करत होतास? आणि मला हा गुच्छ कशाकरता?

मुलगा : काका, गेल्या वेळेला आपण भेटलो होतो, त्या दिवसापासून मी रोजच इथे असतो. आणि रोजचं तुमची वाट बघत होतो.

मी : कशाकरता?

मुलगा : तुम्हीच मला हा मार्ग दाखवला. संध्याकाळी रोज म्हशीला घेऊन इथे येतो आणि रस्ता क्रॉस करणाऱ्यांची मदत करतो, मला पण छान पैसे मिळतात. गेल्या १० दिवसांपासून ह्याच रोडवर आता ८ म्हशी सोडल्या आहेत. घरचे सगळेच म्हशींबरोबर इथे निरनिराळ्या चौकात येतात, व २- ३ तास थांबतात. रोजचे म्हशीमागे ८० – १०० रु मिळतात. ह्या वेळेला म्हशींना काहीच काम नसते. त्यांची खाण्यानंतरची शतपावली होते. रात्री त्यांना झोप पण छान लागत असेल. त्यामुळे दूध पण वाढले आहे.

मी : ट्रॅफिक कमी असेल तर ट्रिपा मिळत नसतील!

मुलगा : काका, क्रॉस करणारी पब्लिक कायमच असते. आणि ट्रॅफिक कमी असतांना गाड्यांवाले जास्तच स्पीडनी आणि वेड्यावाकड्या गाड्या मारतात. त्यामुळे माझ्या ट्रिपांना मरण नाही. अगदीच दुपारी किंवा रात्री ९ नंतर मीच येत नाही.

मी : वा, क्या बात है!

तेवढ्यात आम्ही पलीकडे पोहोचलो. तिथे ५- ६ वयस्कर स्त्री – पुरुष उभे होतेच. मुलानी लगेच त्यांना माझी ओळख करून दिली – ह्या काकांनीच मला ही म्हशीची कल्पना दिली. वगैरे.

मी मनातून आनंदलो व देवाचे आभार मानले.

सगळ्यांनीच मला थँक्स दिले. त्यातल्या तिघा जणांनी मला बाजूला घेतले व मुलाला सांगितले, ‘आम्ही पुढच्या ट्रिप ला येतो. तू जा पुढे’.

एक जण (मला) : तुम्ही आमचा व आमच्या घरच्यांचा फार मोठा प्रॉब्लेम सोडवला आहे. आता घरून बाहेर पडतांना बायको बजावते, ‘म्हैस असेल तरच रस्ता क्रॉस करा. २ -५ रु जाऊ देत’.

दुसरी व्यक्ती : पूर्वी रोज रस्ता ओलांडताना समोर म्हशीवर बसलेले यमराज दिसायचे. आता त्यांची म्हैसच बरोबर असते, त्यामुळे एकदम ‘बी – न – धा – स’.

तिसरी व्यक्ती : आमच्या ज्येष्ठ नागरिक संघाच्या पुढच्या मीटिंगला आम्ही तुम्हाला बोलावू. आम्हाला तुमचा सत्कार करायचा आहे. तुम्हाला नक्की यायचे आहे. तुमची म्हशींची कल्पना म्हणजे – तोड नाही. फोन नंबर ची देवाण घेवाण झाली.

त्यांना बाय करून मी बस स्टॉप वर पोहोचलो. तिथे बसायला नवीनच बाक केले आहेत. बाकावर बसलो आणि कल्पनेच्या दुनियेत पोहोचलो ⤳ ⤳ ⤳ ⤳ ⤳ ⤳

पुढच्या काही दिवसांनंतरची वर्तमानपत्रे मला दिसायला लागली ⤳ ⤳ ⤳ ⤳ ⤳ ⤳

# ‘सिनियर सिटिझन्सच्या मदतीला म्हशी सरसावल्या’

पुण्यातल्या रस्त्यांवर चालणे ‘मौत का कुंवा’ मधे गाडी चालवण्याइतके धोकादायक होते. तुम्हाला कोण आणि केंव्हा उडवेल, ही चालणाऱ्यांच्या मनात सतत धास्ती असायची. म्हशीचा आडोसा घेऊन चालतांना लोकांची ही धास्ती आता संपली आहे. खाली निरनिराळ्या चौकातले वयस्कर मंडळींना घेऊन रस्ता क्रॉस करणाऱ्या म्हशींचे फोटो होते.

 # ‘रस्त्यावरच्या स्पीड ब्रेकर्स ना रामराम’

बहुतेक रस्त्यांवरचे स्पीड ब्रेकर्स हद्दपार झाले आहेत. रस्त्यांवर ठराविक अंतरांवर म्हशींची जा – ये सुरु असल्यामुळे वाहनांच्या वेगावर आपोआपच वचक बसला आहे. ‘वाहने सावकाश चालवा, पुढे स्पीड ब्रेकर आहे’ ह्या पाट्या जाऊन, ‘म्हशी पुढे आहेत’ अशा पाट्या आल्या आहेत.

# ‘आर्थोपेडीक क्लिनिक मधली गर्दी ओसरली’

रस्त्यांवरचे स्पीड ब्रेकर्स काढल्यामुळे वाहन चालकांचे पाठीचे व कंबरेचे दुखणे यात लक्षणीय घट नोंदवण्यात आली आहे.

# ‘शाळा चालकांची म्हशीला पसंती’

शाळा सुटल्यानंतर लहान मुले रस्ता ओलांडताना वाहनांची नेहेमीच दशहत असायची. शाळेनी शाळा सुटतांना शाळेसमोर २ म्हशी तैनात कराव्या, अशी पालकांनी शाळा चालकांकडे मागणी केली आहे. बहुतेक शाळा चालकांनी याला मंजुरी दिली आहे.

# ‘म्हशींना सर्वच शहरांमध्ये डिमांड’

सर्वच मोठ्या शहरांमध्ये पादचाऱ्यांच्या सुरक्षिततेकरता म्हशींची मदत घेणार. पाहणी पथके पुण्यात दाखल.

# वर्षातली सगळ्यात इनोव्हेटिव्ह कल्पना म्हणून लवकरच शिक्कामोर्तब होण्याची शक्यता!

मीडिया संशोधकाच्या शोधात!!!

काहीतरी गोड आवाजामुळे माझी तंद्री मोडली. शेजारी बसलेली मुलगी सांगत होती, बस येतेय, चला. लांब बस दिसत होती. मी उठून पुढे आलो. बाजूला म्हशीच्या ट्रिप सुरु होत्याच. तेवढ्यात बस आली. मी म्हशीकडे बघून तिला बाय केलं आणि बसमध्ये चढलो.

© श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३ आणि ४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ३ आणि ४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

– – श्लोक ३.

प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा |

पुढे वैखरी राम आधी वदावा |

सदाचार हा थोर सांडू नये तो |

जगी तोचि तो मानवी धन्य होतो ||३||

अर्थ : पहाटेच्या वेळी मनात श्रीरामाचे चिंतन करावे. त्यानंतर वाणीने त्याचे नाम उच्चारावे. जगात सदाचाराला अत्यंत महत्त्व आहे; तो कधीही सोडू नये. सदाचाराने वागणारा मनुष्यच खऱ्या अर्थाने धन्य ठरतो.

पहाटेची वेळ किती रम्य आणि शांत असते! आपल्या संस्कृतीत तर या वेळेला “रामप्रहर” असे सुंदर नाव आहे. रात्रीच्या विश्रांतीनंतर पहाटे मन स्वच्छ, प्रसन्न आणि स्थिर असते—जणू एखाद्या शांत डोहातील निर्मळ पाणी. म्हणूनच दिवसाची सुरुवात भगवंताच्या चिंतनाने करावी, असे समर्थ सांगतात. चिंतन म्हणजे एखाद्या गोष्टीचा विचार.

प्रभाती मनात रामाचे स्मरण केले, त्याचे नाम घेतले, तर त्या नामाचा संस्कार दिवसभर मनावर राहतो. सकाळी ऐकलेले एखादे गाणे जसे दिवसभर ओठांवर रेंगाळते, तसेच पहाटे घेतलेले भगवन्नाम मनात गुंजत राहते. जसे एखादा रुग्ण सकाळी घेतलेल्या औषधामुळे दिवसभर सुदृढ राहतो, तसेच प्रभातीचे नामस्मरण मनाला अंतर्गत बळ देते.

समर्थ पुढे सांगतात—“पुढे वैखरी राम आधी वदावा”—म्हणजे कोणतेही कार्य सुरू करण्यापूर्वी मुखाने, वाणीने रामनाम उच्चारावे. पूर्वी घराघरांत सकाळी स्तोत्रपठण, भजन, आरती यांची परंपरा होती. आजच्या वेगवान जीवनात ती कमी होत चालली आहे. अनेकदा प्रश्न विचारले जातात—याचा काय उपयोग? परंतु प्रत्येक गोष्ट विज्ञानाच्या कसोटीवर मोजता येत नाही; तरीही ती निरर्थक ठरत नाही.

प्रभातीचे चिंतन मनावर सुसंस्कार घडवते. दिवसाची सुरुवात मोबाईलच्या पडद्याने नव्हे, तर भगवंताच्या नामाने झाली, तर एकाग्रता, सकारात्मकता आणि संयम यांची वाढ होते. वाईट विचारांवर नियंत्रण ठेवण्याची शक्ती मिळते.

“प्रभाते” या शब्दाचा आणखी एक अर्थ लावता येतो—जीवनाची पहाट, म्हणजेच बालपण. लहान वयातच चांगल्या विचारांचे, सद्गुणांचे सिंचन झाले, तर ती शिदोरी आयुष्यभर साथ देते. म्हणूनच बालसंस्कारांचे महत्त्व अधोरेखित होते.

समर्थ पुढे म्हणतात—“सदाचार हा थोर सांडू नये तो. ”

सदाचार म्हणजे शुद्ध, पवित्र आणि सुसंगत आचरण. सत्ता, संपत्ती किंवा पद यामुळे कोणी थोर होत नाही; तर ज्याच्या बोलण्यात आणि वागण्यात एकवाक्यता आहे, तो खरा थोर. तुकाराम महाराज म्हणतात—“बोले तैसा चाले, त्याची वंदावी पाऊले. ” संतांचे आचरणच त्यांची खरी ओळख असते. अशा सदाचरणाचा अंगीकार करणारा मनुष्यच जगात खऱ्या अर्थाने धन्य ठरतो.

नामस्मरण, शुद्ध विचार आणि सदाचार—या त्रिसूत्रीने दिवसाची आणि जीवनाची पहाट उजळून निघते.

स्वसंवाद

  • मी माझ्या दिवसाची सुरुवात भगवंताच्या चिंतनाने करतो का?
  • मी करीत असलेले नामस्मरण ही केवळ सवय आहे की अंतर्मनाला बळ देणारी जाणीवपूर्वक कृती?
  • माझ्या बोलण्यात आणि वागण्यात एकवाक्यता राखण्याचा मी प्रयत्न करतो का? (क्रमशः)

– – – – – 

– – श्लोक ४.

मना वासना दुष्ट कामा नये रे |

मना सर्वथा पापबुद्धि नको रे |

मना धर्मता नीती सोडू नको हो |

मना अंतरी सार विचार राहो ||४||

अर्थ : हे मना, दुष्ट वासना, अहितकारक इच्छा मनात येऊ देऊ नकोस. पापबुद्धीला स्थान देऊ नकोस. धर्म आणि नीती कधीही सोडू नकोस. अंतर्यामी जे खरे, श्रेष्ठ आणि शाश्वत आहे त्याचाच विचार नांदू दे.

मनाच्या श्लोकांची एक साखळी आहे. मागील श्लोकात समर्थांनी सांगितले—“सदाचार हा थोर सांडू नये तो. ”या श्लोकात ते त्या सदाचाराची अंतर्गत पायाभरणी स्पष्ट करतात. सदाचार बाह्य वर्तनातून दिसतो खरा; पण त्याची सुरुवात मनातून होते. आधीच्या श्लोकात समर्थ म्हणतात, “गमू पंथ अनंत या राघवाचा. ” एक वेळ भ्रष्टाचार, अनितीने वागणे हे लौकिक व्यवहारात खपून जाईलही पण राघवाच्या पंथावर चालायचे तर मनामध्ये वाईट विचार आणि अनितीची वागणूक कशी बरं चालेल?

मन अत्यंत चंचल आहे. तेच आपले मित्र आणि तेच आपले शत्रू. म्हणूनच आपण म्हणतो “मन चिंती ते वैरी न चिंती. ” कधी कधी मनात येणारे विचार इतके तीव्र, भयंकर आणि नकारात्मक असतात की आपण स्वतःच दचकतो. पण असे विचार येणे ही मानवी प्रवृत्ती आहे; त्या विचारांना आपण पोषक खाद्य पुरवायचे की ते सोडून चांगले विचार जाणीवपूर्वक जोपासायचे हे आपल्या हातात आहे.

वाईट विचार मनात येण्यासाठी विशेष प्रयत्न करावे लागत नाहीत. ते सहज येतात. दूरदर्शनवरील धारावाहिक, हिंसाचार आणि भडक प्रणयदृश्ये असलेले चित्रपट, समाजमाध्यमे अशा विचारांना हातभारच लावतात. परंतु चांगले, उन्नत, हितकारक विचार जाणीवपूर्वक जोपासावे लागतात. हीच साधना आहे. पूर्वी मोठी माणसे सांगत, “चांगले बोला. आपल्या भोवती देवतांचा वास असतो त्या देवता तथास्तु म्हणत असतात. ” दुसऱ्या शब्दात सांगायचे झाले तर शब्दांनाही शक्ती असते. आपले विचार, शब्द आणि कृती यांचा परस्पर संबंध असतो. आपण जे वारंवार चिंततो, तेच आपण बोलतो; आणि जे बोलतो, ते आचरणात उतरते. म्हणूनच सद्विचारांचा जागर करणे ही सदाचाराची पहिली पायरी आहे.

आपल्यासमोर दोन वाटा असतात. त्या म्हणजे श्रेयस आणि प्रेयस. श्रेयस म्हणजे दीर्घकालीन हित आणि मूल्याधिष्ठित निवड असे म्हणता येईल. तर प्रेयस म्हणजे तात्कालिक सुख, आकर्षक वाटणारे पण शेवटी अहितकारक ठरणारी निवड.

तात्पुरत्या लाभासाठी अनैतिक मार्ग स्वीकारणे, सहजसोप्या सुखासाठी मूल्यांचा त्याग करणे ही प्रेयसाची उदाहरणे. पण कठीण असले तरी योग्य मार्ग स्वीकारणे, इतरांच्या आनंदात आनंद मानणे, मदतीचा हात पुढे करणे हे श्रेयसाचे लक्षण.

समर्थ म्हणतात, “मना धर्मता नीती सोडू नको हो. ” धर्मता म्हणजे धर्माचरण. पण धर्माचरण म्हणजे केवळ धार्मिक आचार नव्हे; तर न्याय, प्रामाणिकपणा, जबाबदारी आणि संवेदनशीलता. नैतिकेने वागण्याची जबाबदारी. परस्त्रीला मातेसमान किंवा बहिणीसमान मानले पाहिजे असं काही कायदा सांगत नाही. परंतु भारतीय संस्कृतीने सांगितलेली नीतीमूल्ये आचरणात आणायची ठरवली तर आपल्याला सुरुवात तिथूनच करावी लागेल. असे झाले तर अनेक अनर्थ टळतील.

नीती म्हणजे आचरणातील सुसंगती. सज्जनांनी घालून दिलेल्या मार्गावर वाटचाल करणे. आजच्या काळात प्रसारमाध्यमे, सामाजिक वातावरण, स्पर्धेची धडपड या सर्वांचा परिणाम मनावर होत असतो. कधी कधी अनैतिक मार्गाने यश मिळताना दिसते. मग मन म्हणते, “ मीच कशाला चांगले वागू? माझ्यामुळे असा काय फरक पडणार आहे? ” पण समाजाचा पाया हा प्रत्येकाच्या व्यक्तिगत नीतीवर उभा असतो. आपला छोटा तडजोडीचा निर्णयही मोठ्या अध:पतनाची सुरुवात ठरू शकतो.

या श्लोकात समर्थ पुढे म्हणतात, “मना अंतरी सार विचार राहो. ” सार म्हणजे जे खरे, टिकाऊ, मूल्याधिष्ठित आहे ते.

.. क्षणिक लाभ, राग, द्वेष, मत्सर—हे असार.

.. प्रेम, करुणा, प्रामाणिकपणा, संयम—हे सार.

आपली वाटचाल प्रेयसकडून श्रेयसकडे व्हावी, हीच समर्थांची अपेक्षा आहे. मोठ्या प्रतिज्ञेपेक्षा छोटा पण सातत्यपूर्ण प्रयत्न अधिक प्रभावी असतो. मनावर कठोर बंधने लादण्यापेक्षा छोट्या, पाळता येतील अशा नियमांनी सुरुवात केली तर संस्कार हळूहळू दृढ होतात. श्रेयसाचा मार्ग हा टप्प्याटप्प्याने चालायचा असतो. मन जसे घडवू, तसे जीवन घडते. म्हणूनच समर्थांचे हे आवाहन केवळ उपदेश नाही; ती अंतःकरण शुद्धीची दिशा आहे. या सगळ्या पार्श्वभूमीवर स्वतःशी थोडा संवाद साधू या.

स्वसंवाद

  • माझ्या मनात येणाऱ्या नकारात्मक विचारांना मी ओळखून त्यांच्यावर संयम ठेवतो का?
  • तात्कालिक फायद्यासाठी मी कधी माझ्या मूल्यांशी तडजोड करतो का?
  • माझ्या निर्णयांत श्रेयस अधिक आहे की प्रेयस?
  • ‘सार विचार’ मनात टिकून राहावेत यासाठी मी रोज काय करतो?

– – क्रमशः श्लोक ३ आणि ४. 

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “बाबा आमटे आणि ‘ आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कार” – भाग १ – लेखक : श्री विकास आमटे ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “बाबा आमटे आणि ‘ आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कार” – भाग १ – लेखक : श्री विकास आमटे ☆ प्रस्तुती – श्री सुनील देशपांडे

बाबा आमटें ना मिळालेल्या आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कारादरम्यान घडलेला किस्सा…

स्थळ : राष्ट्रपती भवन. दरबार हॉल.

१९९९ सालचा जानेवारी महिना. त्या दिवशी तापमान असेल ५-६ डिग्री सेन्टीग्रेड. बाबांचा पोशाख मात्र नेहमीचाच. खादीची बनियन आणि चड्डी. कंबरेला पट्टा. *पंतप्रधान अटलजी* मला बाजूला घेत म्हणतात,

‘‘विकास, तेरे बाप को ठंड नहीं लगती क्या?’’

मी त्यांना म्हणालो, ‘‘नहीं अटलजी, ये पैलवान आदमी है!’’

पुढे बाबांना राष्ट्रपती भवनातच आंबेडकर आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करण्यात आला. त्यादरम्यान आणखी एक प्रसंग घडला. भारताने नुकतीच पोखरणमध्ये अणुचाचणी केली होती. अणुकार्यक्रमाचे जनक *डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम* या पुरस्कार सोहोळ्यास उपस्थित होते. पुरस्कार सोहोळ्यादरम्यान त्यांच्याकडे जात बाबांनी त्यांना सुनावलं,

‘‘Dr. Kalam, we don’t need bombs, we need toilets! ‘National Highways’ have become national toilets! If you say we are a nation of Mahavir, Buddha, Guru Nanak and Gandhi, we don’t need bombs!’’

डॉ. कलाम अचंब्याने पाहतच राहिले! (आजच्या परवलीच्या *‘स्वच्छ भारत अभियाना’*ची नीव बाबांनी कधीच रचली होती.)

‘मेरा बाप पैलवान आदमी था..’ असं मी कायम म्हणतो याचं कारण- जसे बाबांनी अनेक प्राणघातक हल्ले, अपघात, आजारपणं पचवली, तशी त्यांनी विधायक कार्य असो वा संघर्ष- ‘ठाम भूमिका’ ही घेतलीच. त्यांनी कधीही कचखाऊ धोरण अवलंबलं नाही. त्यामुळे बाबांचं शारीरिक अस्तित्व संपल्यानंतर माणसं रडली निश्चित; पण खचली मात्र नाहीत.

ब्लड कॅन्सरशी लढता लढता बाबांनी ९ फेब्रुवारी २००८ ला पहाटे पावणेपाचच्या सुमारास अखेरचा श्वास घेतला. बाबांच्या या अखेरच्या आजारपणात रात्रीचा दिवस करत उपचार करणारे डॉ. विजय पोळ आणि विलास मनोहर त्यावेळी बाबांसोबत होते. बाबांची मनोभावे सेवा करणारे देवानंद सलामे, कमल उमरोटकर होते. इंदू, रेणुका, मी आणि भारतीही आनंदवनातच होतो. प्रकाश-मंदा लोकबिरादरी प्रकल्पावर. आमची पोरं बाहेर होती.

रात्रीपर्यंत सर्वजण आले. तो पूर्ण दिवस, रात्र आणि दुसऱ्या दिवशी सकाळीसुद्धा बाबांना बघण्यासाठी लोकांची रीघ कायम होती. दोन किलोमीटरची माणसांची रांग. कुठलाही आवाज नाही. फक्त बाबांना बघून हात जोडण्याची आस असलेली, सर्वदुरून आलेली ही माणसं. हजारोंची गर्दी लोटली होती.

केळीच्या पानात गुंडाळून आणि वरनं मीठ टाकून आपलं दफन केलं जावं, ही बाबांची इच्छा होती. त्याला दोन वैज्ञानिक कारणं होती. बाबा म्हणत, *‘‘एका मृतदेहाचं दहन करायला जेवढी लाकडं लागतात तेवढ्यात हजार माणसांचा तीन-चार दिवसांचा स्वयंपाक होऊ शकतो! ’’* (हा विचार अहमदाबादच्या ‘सद्विचार परिवारा’ने रुजवला होता. म्हणून बाबा-इंदूने त्यांचे फॉर्म्स भरत दहनाऐवजी दफन जाणीवपूर्वक स्वीकारलं होतं.)

दुसरं म्हणजे _‘पशूपंछी भोजन करे, तन भंडारा होएँ’_ या संत कबिरांच्या दोह्याप्रमाणे, मर्त्य शरीरावर पशुपक्ष्यांचा, किड्यामुंग्यांचा अधिकार असतो. तेव्हा मृतदेह त्यांच्या हवाली केला जावा; जेणेकरून हे शरीर भंडाऱ्याप्रमाणे विरून जाईल! त्याप्रमाणे बाबांच्या देहाचं दफन केलं गेलं. ही तीच अनाम कुष्ठरुग्णांच्या स्मरणशिलेची जागा- जिथे बाबांच्या जिवाला जीव देणारे त्यांचे शेकडो कुष्ठमुक्त सोबती वास करत होते.

९ फेब्रुवारी काय किंवा १० फेब्रुवारी- आनंदवनाला सुट्टी नव्हती. त्या दिवशीही काम सुरूच होतं. पॉवरलूम्स तशाच धडधडत होत्या. हातमाग खट्खट् आवाज करत चादरी-टॉवेल्स विणत होते. वेल्डिंग मशीन्स चरचर आवाज करत जोडणी करत होत्या. आनंदवन थांबलं नव्हतं.

२०१४ हे बाबा आमटेंचं जन्मशताब्दी वर्ष होतं. हे वर्ष कसं ‘साजरं’ करणार, याबाबत नेहमीच कुणी ना कुणी विचारत. अशी विचारणा करणाऱ्यांना मी सांगत असे की, आनंदवनात साजरं होतं ते *‘कार्याचं गुणात्मक विस्तृतीकरण’! * समाजातील जास्तीत जास्त दुर्बल घटकांपर्यंत कार्याचा विस्तार हाच आमच्यासाठी सोहोळा. आनंदवनाच्या इतिहासात कधी कुणाची जयंती, पुण्यतिथी साजरी झाल्याचं मला स्मरत नाही. आणि भविष्यातही असं होणं नाही.

*बाबा आमटे* या व्यक्तीशी किती माणसं जोडली गेली होती याचा प्रत्यय आम्हाला ते गेल्यानंतर आला. बाबांना श्रद्धांजली वाहणाऱ्या सुमारे तीन लक्ष तारांचा खच आनंदवनात पडला! अक्षरश: पोती भरभरून तारा येत होत्या.

असं काय होतं बाबांमध्ये ज्याने ही माणसं त्यांच्याकडे ओढली गेली आणि कायमची जोडली गेली? यात जशी राजकारण, प्रशासन, उद्योग, कला, संगीत, साहित्य, पत्रकारिता, विज्ञान-तंत्रज्ञान, अध्यात्म या क्षेत्रांतली नावाजलेली मंडळी होती, तशीच देश काय आणि विदेश काय, समाजातल्या प्रत्येक स्तरातली लाखो सर्वसामान्य माणसंही होती. या अनुषंगाने मला काही छोटे-मोठे प्रसंग आठवतात ते सांगतो…

ते बहुधा १९५९ साल असावं. जबलपूरच्या ‘नवभारत’ दैनिकात साहाय्यक संपादक म्हणून काम करणारी *चंद्र मोहन जैन* नावाची एक व्यक्ती आनंदवनात येते आणि काम बघून प्रभावित होत बाबांना म्हणते,

_‘‘बाबा, आपके हाथों को सेवा कि खुशबू आती है. ’’_ परत जाऊन जैन ‘नवभारत’मध्ये बाबांबद्दल विस्तृत लेख लिहितात. या लेखावरून जैन यांचा दैनिकाच्या मालकाशी वाद होतो. मालक म्हणतात,

_‘‘तू माझं दिवाळं काढणार! राजकारण, हत्या, भानगडी यांच्या बातम्या सोडून असे विधायक कार्याविषयीचे लेख छापून आले तर माझं दैनिक लवकरच बंद पडेल. ’’_

यावर जैन उत्तरतात, _‘‘जगात खून, आत्महत्या, अत्याचार यांव्यतिरिक्त चांगल्या गोष्टीही खूप घडत असतात. बाबा आमटेंनी आपलं आयुष्य कुष्ठकार्यासाठी वेचलं आहे. या माणसाचं काम सर्वांपर्यंत पोहोचलंच पाहिजे. बाबा आमटेंविषयी छापल्यामुळे दैनिकाचं सक्र्युलेशन वाढणार नाही हे मला माहिती आहे. पण काळजी नसावी. मी बाहेर पडतो. तुम्ही तुमचं सक्र्युलेशन वाढवा, ’’_ असं म्हणत तत्क्षणी ते आपला राजीनामा मालकाच्या तोंडावर फेकतात.

*हीच चंद्रमोहन जैन नावाची व्यक्ती पुढे जाऊन सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक बनते… ज्यांना आपण सर्व ‘रजनीश-आचार्य- भगवान- ओशो’ म्हणून ओळखतो. *

जेआरडी टाटांना बाबांविषयी प्रचंड स्नेहादर होता. मणक्याच्या शस्त्रक्रियेदरम्यान बाबा मुंबईला असताना जेआरडींनी त्यांची भेट घेतली. ते बाबांना म्हणाले, _‘‘मी आनंदवनाला काय मदत करू शकतो? ’’_

बाबा उत्तरले, _‘‘मी आपला ऋणी आहे. पण आनंदवनाला मदतीची गरज नाही. उलट, समाजाने नाकारलेल्या ज्या माणसांच्या कष्टांतून आनंदवन उभं राहिलं आहे, त्यांच्यात आज समाजातल्या मूलभूत समस्यांवर मात करण्याची जिगर आहे! ’’_

२०१३ च्या जूनमध्ये मी आणि माझा मुलगा कौस्तुभ एका कामासाठी पंतप्रधान डॉ. मनमोहन सिंग यांना भेटायला दिल्लीला गेलो होतो. महाराष्ट्र भवनातून आम्ही दोघं ऑटोरिक्षा घेऊन ७, रेस कोर्स रोडला पोहोचलो. आता ऑटोरिक्षामधनं ७, रेस कोर्स रोडला येणारी माणसं कदाचित विरळाच असतील. कारण गेटवरच्या सुरक्षारक्षकांच्या चेहऱ्यावर तरी तेच भाव होते!

_‘‘क्या है? ’’_ असं विचारताच मी माझं व्हिजिटिंग कार्ड दिलं. कार्ड आत काय गेलं, मिनिटभरातच सगळे पहारे खटाखट बाजूला झाले आणि काय चाललंय याचा थांगपत्ता लागण्याआधीच आम्ही पंतप्रधानांच्या ‘Special Protection Group’चे प्रमुख चतुर्वेदी यांच्या कार्यालयात पोहोचलोसुद्धा!

– क्रमशः भाग पहिला 

लेखक : श्री विकास आमटे

प्रस्तुती : सुनील देशपांडे

ईमेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ “घर म्हणजे काय?” लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुति – सौ. उज्ज्वला केळकर ☆

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

? वाचताना वेचलेले ?

☆ “घर म्हणजे काय?” लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुति – सौ. उज्ज्वला केळकर

जे घर हौसेने बांधलेले असते

त्याला.. HOUSE.. म्हणतात.

*

ज्या घरात होम हवन चालतात

त्याला.. HOME.. म्हणतात.

*

ज्या घरात हवा खेळती असते

त्याला.. HAVELI.. म्हणतात.

*

ज्या घरात भिंतीला कान असतात

त्याला.. MAKAN.. म्हणतात.

*

ज्या घरात माणसांचे हाल होतात

त्याला.. MAHAL.. म्हणतात.

*

ज्या घरात झोप चांगली येते

त्याला.. ZOPADI.. म्हणतात.

आणि

ज्या घराचे हप्ते

फेडून – फेडून

लोक आडवे होतात

त्याला.. FLAT.. म्हणतात.

* * * *

लेखक: अज्ञात

प्रस्तुती: सौ. उज्ज्वला केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो.  836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ हळदीकुंकू असेही ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

सुश्री नीलांबरी शिर्के

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? हळदीकुंकू असेही ?  सुश्री नीलांबरी शिर्के 

हळदकुंकू भाळी लेऊन

गवत हिरवे डोलू लागले

सुवासिनींचा मेळा जमला

गप्पाचे फड जणू रंगले

*

अल्पायुषी जरी आहे जगणे

देखणेपणातच दरवळणे

हिरव्या गालिचावर लोळत

सुंदर वाटे मना.. फूल होणे

© सुश्री नीलांबरी शिर्के

मो 8149144177

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है, उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है, उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।

 वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।

अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में, धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।

अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।

तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं .., आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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