हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर- ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर- ? ?

आज अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने उर्दू को अपनी राजभाषा घोषित किया था। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) बांग्लाभाषी था। वहाँ छात्रों ने बांग्ला को द्वितीय राजभाषा का स्थान देने के लिए मोर्चा निकाला। बदले में उन्हें गोलियाँ मिली। इस घटना ने तूल पकड़ा। बाद में 1971 में भारत की सहायता से बांग्लादेश स्वतंत्र राष्ट्र बन गया।

1952 की इस घटना के परिप्रेक्ष्य में 1999 में यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस घोषित किया।

आज का दिन हर भाषा के सम्मान , बहुभाषावाद एवं बहुसांस्कृतिक समन्वय के संकल्प के प्रति स्वयं को समर्पित करने का है।

मातृभाषा मनुष्य के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मातृभाषा की जड़ों में उस भूभाग की लोकसंस्कृति होती है। इस तरह भाषा के माध्यम से संस्कृति का जतन और प्रसार भी होता है। भारतेंदु जी के शब्दों में, ‘ निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल/ बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।’

हृदय के शूल को मिटाने के लिए हम मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा की मांग और समर्थन सदैव करते रहे। आनंद की बात है कि करोड़ों भारतीयों की इस मांग और प्राकृतिक अधिकार को पहली बार भारत सरकार ने शिक्षानीति में सम्मिलित किया। राष्ट्रीय  शिक्षानीति-2020, आम भारतीय और भाषाविदों-भाषाप्रेमियों की इच्छा का प्रलेखन है। हम सबको इस नीति से  अपरिमित आशाएँ हैं। 

विश्वास है कि यह संकल्प दिवस, आनेवाले समय में सिद्धि दिवस के रूप में मनाया जाएगा। अपेक्षा है कि भारतीय भाषाओं के संवर्धन एवं प्रसार के लिए हम सब अखंड कार्य करते करें। सभी मित्रों को शुभकामनाएँ।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अपने भी पेश आते हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अपने भी पेश आते हैं…!

☆ ॥ कविता॥ अपने भी पेश आते हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

आजकल  अपने भी पेश आते हैं परायों की तरह,

आदमी हरदम मुखौटे बदल रहा सरायों की तरह।

*

वादों  की  जमीन  पर  काँटे बबूल के उग आए हैं,

रहनुमा  अवाम  को हाँक रहे हैं चौपायों की तरह।

*

कच्चे  धागों  की  मानिंद  रेशमी  रिश्ते  टूट रहे हैं,

माएँ  बच्चों को दूध पीला रही नाजायों  की तरह।

*

कोई  कितना  भी बचना चाहे, किंतु  बच ना पाए,

क़ातिल  हवाएँ पीछा कर रही हमसायों की तरह।

*

कब, कौन, किस बात पर  दुश्मनी पर उतर आए,

बेगुनाह  ज़िंदगी  को जिए जा रहे विषपायों तरह।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४४ – कथा कहानी – एक चित्र ऐसा भी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ एक चित्र ऐसा भी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

जरा सोचिए! अगर शब्दों में आग हो और भावना में राग हो, तो ऐसा व्यक्तित्व तो अनूठा ही होगा! एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कलम ने संवेदना को नया स्वर दिया और संघर्ष को उद्घोष के अक्षय शब्द| ऐसे हैं बहु आयामी प्रतिभा के धनी राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ – यथा नाम: तथा गुण! अपने गांव की मिट्टी से लेकर साहित्य की दुनिया में जो पहचान बनाई, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। कभी-कभी शब्द उनके आँसुओं जैसे बहे… तो कभी तीर बनकर समाज को झकझोर गए। कहते हैं, उन्होंने मात्र लिखा ही नहीं अपितु यथार्थ ज़िंदगी को काग़ज़ पर जिया भी है। हर रचना में उनकी आत्मा बोलती है, और हर पंक्ति में एक नया प्रश्न उभरता है — क्या शब्द सच में दुनिया बदल सकते हैं? हाँ क्यों नहीं? आइए, जानते हैं ऐसे विलक्षण साहित्यकार – राजेश कुमार सिंह श्रेयस की जीवंत कहानी, जिसने सिद्ध कर दिया — कलम अगर ईमानदार हो, तो वह इतिहास भी लिख देती है!

 साभार – युग संवाद  (यूट्यूब)

मेरे जेहन में आज एक कहानी आ रही है। इस कहानी को मैं अक्षरश: कहना चाह रहा था , लेकिन इस कहानी को अक्षरश: कहने में स्वयं को विवश पा रहा हूँ। चलिए कहानी को कुछ आगे बढ़ा कर बताते हैं।

एक चित्रकार था उसको एक चित्र बनाने को कहा गया। जब वह चित्रकार चित्र बनाने बैठा तो उस चित्रकार की विबशता यह हुई कि चित्र बनाने के पहले ही उसके पास ढेर सारे सुझाव आने लगे। पुरानी कहानी में चित्र बनने के बाद सुझाव आये थे, लेकिन इस कहानी में तो चित्र बनने के पहले ही सुझाव आने लगे थे। यह सुझाव, खाली सुझाव नहीं थे। लोग सुझाव के साथ साथ अपने अपने रंग भी भेज रहे थे। किसी ने लाल पीला हरा, किसी ने हरा नीला लाल, किसी ने लाल सफेद काला, नाना प्रकार के रंग भेज दिये। शुरू में चित्र रंगीन हुआ। बाद में रंग इतने हो गए कि चित्रकार के ऊपर ही रंग छिटक छिटक कर पढ़ने लगा। चित्रकार को लग गया कि अब इन्हीं रंगों से सुन्दर दिखने वाला चित्र ही बदरंग होने वाला है। लेकिन चित्रकार की मजबूरी यह थी कि सुझावो के साथ भेजे रंगों को भरना ही भरना था।

चित्रकार पर दबाव बढ़ता गया, और अधिक बढ़ता गया। अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें क्या रंग डालूं और कौन सा रंग निकालूं। चित्रकार ने अपने चित्रकला के नीचे अपना छोटा सा नाम हस्ताक्षर स्वरूप लिखा था। लेकिन ऊपर का फरमान यह आया कि सुझाव देने वालों की भी नाम भी उसके रंग के साथ लिखना है। अब चित्रकार परेशान हुआ कि सबके भेजे गए रंगों को भरूं कि सबका नाम लिखूं। उसको तो एक खूबसूरत पेंटिंग बनानी थी। यहां तो पूरे पेंटिंग की किताब का मटेरियल आ गया। अब वह परेशान हो गया कि उसे पेंटिंग बनानी है की पूरी पेंटिंग की किताब बनानी है। खैर फरमान तो फरमान ही होता है और कहा भी गया है कि प्रभुता संपन्न व्यक्ति गलती नहीं करता है। राजा कभी गलती करता ही नहीं है। अब फरमान आया है तो फरमान को पूरा करना ही था।

सभी रंग भरे जाने लगे। रंगों को भेजने वालों के नाम भरे जाने लगे। पूरी पेंटिंग रंगीन हो उठी रंग पर रंग, रंग पर रंग। पेंटिक घना होता गया.. घना होता गया.. घना होता गया , घना होते होते पेंटिंग रंग डिब्बे का पूरा बॉक्स बन गया . अंततः चित्रकार की ब्रश ऐसी मजबूरी में फंसी कि सुझाव देने वालों के रंग और उनके नाम डालते डालते मूल चित्रकार का नाम ही है गायब गया। चित्रकार ने इतने पर भी संतोष किया। उसने यह सोचकर संतोष किया कि चलो अगर चित्र बढ़िया बन गया, तो लोग कहेंगे कि वाह क्या सुंदर सा चित्र बना है। भाई..कमाल का चित्रकार है। गजब का चित्र बनाया है। अब उस चित्र पर उसका नाम न लिखा होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा को सुनकर वह खुश होगा। यह सोचकर, उसने चित्र बनाना जारी रखा।

आखिरकार उसने एक भारी भरकम चित्र बना ही गया। जब चित्र बन गया और वह प्रदर्शित हुआ तो जितने लोगों ने ढेर सारे रंग भरे थे। अपने ही भेजें रंगों को देखकर, लोगों ने उनका नुक्स निकालना शुरू किया। अरे यार, यह छूट गया, यह भरना था,यह नहीं भरना था, यह रंग गया, यह नहीं रखता था। लेकिन सारे सुझाव भेजने वाले भूल गए कि चित्रकार की जगह नाम तो उन्हीं का लिखा है, जिन्होंने खाली सुझाव नही भेजे, बल्कि सुझावों के साथ अपने अपने रंग भी भेजें थे। और अपने ही रंग से पेंटीन को बर्बाद किया, तो चित्रकार का कहां दोषी हुआ।

उसकी चित्रकारिता का हुनर तो वहीं समाप्त हो गया जहां सुझाव देने वालों की संख्या थोड़ी नहीं एक भीड़ के सरीखे आ गई।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

हरिद्वार

हरिद्वार शहर गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है। हरिद्वार कई प्रमुख तीर्थ स्थलों का प्रवेश द्वार है। धार्मिक आयोजनों में सबसे महत्वपूर्ण कुंभ मेला है, जो हर 12 साल में हरिद्वार में भरता है। हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान लाखों तीर्थयात्री हरिद्वार में गंगा नदी में स्नान कर मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा से आते हैं।

समुद्र मंथन की पौराणिक मान्यता के अनुसार उज्जैन, नासिक और प्रयागराज (इलाहाबाद) के साथ हरिद्वार में अमृत की बूंदें घड़े से झलक गिरी थीं। जहां अमृत गिरा वह स्थान ब्रह्म कुंड हर की पौड़ी (भगवान के कदम) पर स्थित है और इसे हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है। यह कांवड़ तीर्थयात्रा का प्रमुख स्थान भी है, जहाँ से लाखों श्रद्धालु गंगा का पवित्र जल लेकर शिव मंदिरों में चढ़ाने के लिए सैकड़ों मील दूर पैदल जाते हैं।

हरिद्वार भारतीय संस्कृति और विकास का बहुरूपदर्शक प्रस्तुत करता है। पवित्र ग्रंथों में, इसे कपिलस्थान, गंगाद्वार और मायापुरी के रूप में अलग तरह से निर्दिष्ट किया गया है। यह छोटा चार धाम (उत्तराखंड में चार प्रमुख तीर्थ स्थलों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) के लिए एक मुख्य पड़ाव  है।

शहर के आधुनिक नाम में दो वर्तनी हैं: हरिद्वार और हरद्वार। इन नामों में से प्रत्येक का अपना अर्थ है। संस्कृत में, हिंदू धर्म की प्रचलित भाषा, हरि का अर्थ है “भगवान विष्णु”, जबकि द्वार का अर्थ है “प्रवेश द्वार”। तो, हरिद्वार का अनुवाद “भगवान विष्णु का प्रवेश द्वार” है। क्योंकि यह आमतौर पर वह स्थान है जहां तीर्थयात्री भगवान विष्णु के एक प्रमुख मंदिर बद्रीनाथ के दर्शन करने के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं। इसी तरह, हर का अर्थ “भगवान शिव” है। इसलिए, हरद्वार “भगवान शिव के प्रवेश द्वार” कैलाश पर्वत, केदारनाथ, सबसे उत्तरी ज्योतिर्लिंग और छोटे चार धाम तीर्थयात्रा सर्किट के स्थलों तक पहुंचने के लिए एक विशिष्ट स्थान है। पौराणिक कथा के अनुसार, हरिद्वार में देवी गंगा अवतरित हुईं जब भगवान शिव ने अपने बालों की जटाओं में गंगा नदी को धारण मृत्यलोक में अवतरित किया था। गंगा नदी, गंगोत्री ग्लेशियर के किनारे पर गौमुख स्रोत से 253 किलोमीटर (157 मील) बहने के बाद, हरिद्वार में पहली बार मैदान में प्रवेश करती है, जिसने शहर को इसका प्राचीन नाम गंगाद्वार दिया।

महाभारत के वनपर्व में ऋषि धौम्य ने युधिष्ठिर को भारत के तीर्थों के बारे में बताया, तब गंगाद्वार, यानी हरिद्वार और कनखल का उल्लेख किया गया है, यह भी उल्लेख है कि अगस्त्य ऋषि ने अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि ऋषि कपिला का यहां एक आश्रम है, जिसका प्राचीन नाम कपिला या कपिलस्थान है। पौराणिक राजा, भगीरथ, सूर्यवंशी राजा सागर (राम के पूर्वज) के परपोते के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 60,000 पुरखों की मुक्ति के लिए, सतयुग में वर्षों की तपस्या से गंगा नदी को स्वर्ग से नीचे लाए थे। भगवान विष्णु ने हर की पौड़ी की ऊपरी दीवार में स्थापित पत्थर पर अपने पदचिह्न छोड़े थे, जहां हर समय पवित्र गंगा इसे छूती है।

पुरातत्व संबंधी निष्कर्षों से सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में 1700  ईसा पूर्व और 1200 ईसा पूर्व के बीच टेराकोट्टा संस्कृति मौजूद थी। हरिद्वार का प्रथम आधुनिक युग का लिखित प्रमाण एक चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तांतों में मिलता है, जो 629 ईस्वी में भारत आया था। राजा हर्षवर्धन (590-647) के शासनकाल के दौरान हरिद्वार को ‘मो-यू-लो’ के रूप में दर्ज किया गया, जिसके अवशेष अभी भी मायापुर में मौजूद हैं, जो आधुनिक शहर के दक्षिण में है। खंडहरों में एक किला और तीन मंदिर हैं, जिन्हें टूटी हुई पत्थर की मूर्तियों से सजाया गया है, उन्होंने मो-यू-लो के उत्तर में एक मंदिर की उपस्थिति का भी उल्लेख किया है, जिसे ‘गंगाद्वारा’ कहा जाता है। 13 जनवरी 1399 को यह शहर तैमूर लैंग (1336-1405) के अधीन आया।

गुरु नानक (1469-1539) ने हरिद्वार की अपनी यात्रा के दौरान, ‘कुशावर्त घाट’ पर स्नान किया, जिसमें प्रसिद्ध, ‘फसलों को पानी देना’ प्रकरण हुआ। गुरुद्वारा (गुरुद्वारा नानकवाड़ा) की दो सिख जन्मसखियों के अनुसार, यह यात्रा 1504 ईस्वी में बैसाखी के दिन हुई थी। बाद में उन्होंने गढ़वाल में कोटद्वार के रास्ते में कनखल का भी दौरा किया। 

आइन-ए-अकबरी, मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान 16 वीं शताब्दी में अबुल फजल द्वारा लिखी गई, इसे माया (मायापुर) के रूप में संदर्भित करती है, जिसे गंगा पर हरद्वार के रूप में जाना जाता है, हिंदुओं के सात पवित्र शहरों के रूप में। इसमें आगे इसका उल्लेख है। अठारह कोस (प्रत्येक लगभग 2 किमी) लंबा है, और चैत्र की 10 तारीख को बड़ी संख्या में तीर्थयात्री इकट्ठा होते हैं। अपनी यात्रा के दौरान और घर पर रहते हुए, मुगल सम्राट, अकबर ने गंगा का पानी पिया जिसे उन्होंने ‘अमरता का पानी’ कहा। सोरुन और बाद में हरिद्वार में सीलबंद जार में भेजने के लिए विशेष लोग तैनात किए गए थे।

मुगल काल के दौरान, हरिद्वार में अकबर के तांबे के सिक्के के लिए टकसाल थी। ऐसा कहा जाता है कि अंबर के राजा मान सिंह ने वर्तमान शहर हरिद्वार की नींव रखी और हर की पौड़ी में घाटों का जीर्णोद्धार भी किया। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों को भी ब्रह्म कुंड में विसर्जित कर दिया गया था। सम्राट जहांगीर (1596-1627) के शासनकाल में इस शहर का दौरा करने वाले एक अंग्रेज यात्री थॉमस कोर्याट ने इसे शिव की राजधानी ‘हरिद्वार’ के रूप में वर्णित किया है।

सबसे पुराने जीवित शहरों में से एक होने के नाते, हरिद्वार का उल्लेख प्राचीन हिंदू शास्त्रों में मिलता है क्योंकि यह बुद्ध की अवधि से लेकर हाल के ब्रिटिश आगमन तक के जीवन और समय के माध्यम से बसा माना जाता है। हरिद्वार की एक समृद्ध और प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसमें अभी भी कई पुरानी हवेलियां हैं जिनमें उत्तम भित्ति चित्र और जटिल पत्थर का काम है।

गंगा नदी पर दो प्रमुख बांधों में से एक, भीमगोड़ा, यहाँ स्थित है। 1840 के दशक में निर्मित, यह गंगा के पानी को ऊपरी गंगा नहर की ओर मोड़ता है, जिससे आसपास की भूमि की सिंचाई होती है। हालांकि इससे गंगा के जल प्रवाह में गंभीर गिरावट आई, और अंतर्देशीय जलमार्ग के रूप में गंगा के क्षय का एक प्रमुख कारण है, जो 18 वीं शताब्दी तक ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाजों द्वारा भारी उपयोग किया जाता था। गंगा नहर प्रणाली का मुख्यालय हरिद्वार में स्थित है। अप्रैल 1842 में काम शुरू होने के बाद 1854 में ऊपरी गंगा नहर खोली गई, नहर की अनूठी विशेषता रुड़की में सोलानी नदी के ऊपर आधा किलोमीटर लंबी एक्वाडक्ट है, जो मूल नदी से 25 मीटर (82 फीट) ऊपर नहर को उठाती है।

हरिद्वार संघ नगर पालिका’ का गठन 1868 में किया गया था, जिसमें मायापुर और कनखल के तत्कालीन गाँव शामिल थे। हरिद्वार पहली बार लक्सर के माध्यम से 1886 में रेलवे से जुड़ा था। जब अवध और रोहिलखंड रेलवे लाइन को रुड़की से सहारनपुर तक बढ़ाया गया था, इसे बाद में 1900 में देहरादून तक बढ़ा दिया गया था। 1901 में, इसकी जनसंख्या 26,597 थी और यह संयुक्त प्रांत के सहारनपुर जिले में रुड़की तहसील का एक हिस्सा था, और 1947 में उत्तर प्रदेश के निर्माण तक ऐसा ही रहा।

हरिद्वार तन, मन और आत्मा के थके हुए लोगों का धाम रहा है। यह विभिन्न कला, विज्ञान और संस्कृति के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है। आयुर्वेदिक दवाओं और हर्बल उपचार के एक महान स्रोत के रूप में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय सहित अद्वितीय गुरुकुल (पारंपरिक शिक्षा का स्कूल) का घर है, जिसमें एक विशाल परिसर है, और पारंपरिक शिक्षा प्रदान कर रहा है। हरिद्वार के विकास ने 1960 के दशक में आधुनिक मंदिर की स्थापना के साथ, 1975 में एक ‘महारत्न पीएसयू’, की स्थापना के साथ एक गति पकड़ी, जो न केवल बीएचईएल की अपनी एक बस्ती को साथ लेकर आई, tबल्कि इस क्षेत्र में सहायक इकाइयों का एक समूह भी है। रुड़की विश्वविद्यालयहै। विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सीखने के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # २३ – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “मोबाइल में खोया बचपन “.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २३ ?

? लघुकथा – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

 स्मरण आता है, वह स्वर्णिम बचपन… l घर में जब कोई डिब्बा खाली हो जाता था, उसे लेकर हमारे साथी, हमारे भाई-बहन एक कोने में खड़े हो जाते थे, दूसरा खाली डिब्बा लेकर दूसरे कोने में हम l दोनों खाली डिब्बों को एक धागा अथवा किसी डोर से बाँध लिया जाता था l

 उस कोने से हमारे साथी या हमारे भाई-बहन खाली डिब्बे में मुँह लगाकर बोलते थे, इधर हम सुनते थे….. कभी इधर से हम बोलते थे, उधर वो सुनते थे l

 खाली डिब्बे का स्थान अब मोबाइल ने ले लिया है l बात तब भी होती थी, बात अब भी होती है l….. लेकिन बीच की स्नेहिल डोर न जाने कहाँ ग़ायब हो गई है l

 “रिश्ते-नातों के प्रति उदासीन हो गए

मोबाइल आया और हम मशीन हो गए”

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२३ ⇒ हठ – कड़ी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हठ – कड़ी।)

?अभी अभी # ९२३ ⇒ आलेख – हठ – कड़ी ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

जो किसी अपराधी को हाथों में बांधी जाती है, वह हथकड़ी होती है। आज बँधी है, कल छूट जाएगी, हो सकता है, वह अपराधी न हो। और अगर हो भी तो सज़ा काटने के बाद रिहा भी हो सकता है। देश के लिए मर मिटने वालों के लिए क्या फाँसी और क्या हथकड़ी। फिल्मों और आजकल के टीवी सीरियल ने वैसे भी हथकड़ी को मज़ाक बना दिया है। एकता कपूर का ऐसा कोई सीरियल नहीं होगा, जिसमें नायक-नायिका ने हथकड़ी न पहनी हो, जेल न तोड़ी हो, और फाँसी के फंदे से वापस न आया हो।

हम इसीलिए हथकड़ी की नहीं हठ-कड़ी की बात कर रहे हैं। हठ एक रोग भी है, और योग भी। आज हम बाल-हठ, त्रिया-हठ और राज-हठ की चर्चा तो करेंगे ही, बाबा रामदेव के हठ-योग पर भी सर्च-लाइट डालेंगे।।

तो क्यों न त्रिया चरित्र के बजाय बाबा के हठयोग से ही शुरुआत की जाए। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार ह (हकार) हमारी सूर्य नाड़ी अर्थात इड़ा है, और ठ (ठकार )चंद्र नाड़ी सुषुम्ना है। साधारण भाषा में प्राणायाम द्वारा सूर्य-चंद्र (उष्ण-शीतल)का सम अवस्था में सुषुम्ना में प्रवेश होता है, लेकिन अगर योग के नाम पर केवल कठिन आसन और स्वाभिमान यात्राएं ही निकाली जाएँ, तो वह केवल एक स्वदेशी हठ के नाम पर बाजारवाद फैलाना ही है, जिसका समय समय पर राजनैतिक फायदा वैसे ही उठाया जा सकता है, जैसा धर्म के नाम पर राजनीति में होता आया है। कबीर जिस इड़ा पिंगला सुषुम्ना की बात करते हैं, वही अध्यात्म है, वास्तविक हठ योग है।

हठ को आप ज़िद कह दें, जुनून कह दें, चाहें तो एक तरह का पागलपन कह दें। सभी प्रकार के हठ में बाल-हठ निर्दोष और मासूम होते हुए भी दिलचस्प और श्रेष्ठ है। बच्चों जैसी ज़िद कभी कभी बड़े-बूढ़े भी करते हैं, लेकिन अगर एक बार बच्चा ज़िद पर आ गया, तो आकाश पाताल एक कर देता है। वह केवल माँ की सूझ-बूझ ही होती है, जो बच्चे की ज़िद पूरी करने के लिए आसमान के चाँद को जल के थाल में उतरने के लिए मज़बूर कर देती है। बच्चे के पहाड़ जैसे हठ को एक छोटा सा खिलौना पल भर में समतल कर उसके मन को बहला सकता है।।

त्रिया हठ पर अधिक कहना उचित नहीं ! हम सब अपनी गृहस्थी लिए बैठे हैं। जो गुज़र रही है मुझ पर, उसे कैसे मैं बताऊँ। सबके अपने अपने किस्से हैं, अनुभव हैं। एक त्रिया का हठ हमने देखा, जब उसमें राजहठ भी शामिल हो गया। यानी करेला और नीम चढ़ा।

राज हठ में टके सेर भाजी और टके सेर खाजा बिकना कोई बड़ी बात नहीं ! जब यह राजहठ हिटलर बन जाता है तो दुनिया में तबाही खड़ी कर देता है। दुर्योधन के हठ और धृतराष्ट्र के पुत्रमोह के कारण अगर महाभारत हो सकता है, तो एक चाणक्य के अपमान के कारण समूचे नंद-वंश का संहार। यही हठ अगर नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अंग्रेजों के खिलाफ आज़ाद हिंद फ़ौज़ खड़ी करने की हिम्मत देता है तो एक लाठी लंगोटी वाले को न केवल महात्मा का दर्ज़ा दिलवाता है, अपितु बँटवारे का दोषी भी करार दिया जाता है।

नमक सत्याग्रह और जेल भरो आंदोलन से क्या कभी किसी देश को आज़ादी मिली है। स्वदेशी भावना के लिए विदेशी कपड़ों की होली जैसी नौटँकी में अगर दम होता, तो बाबा रामदेव कब के गाँधीजी के अनुयायी हो जाते।।

गुलज़ार साहब ने एक गीत लिखा, चप्पा चप्पा चरखा चले ! उससे प्रेरित हो, एक बार मोदीजी ने चरखा चला भी दिया। लेकिन किसी ने प्रेरणा नहीं ली। जिस देश में गर्मी के मौसम में भी, गन्ने की चरखी को भी कोई नहीं पूछ रहा, वहाँ चरखे का क्या औचित्य ? अब गाँधी-भक्त मोदीजी डिजिटल चरखा लाने से तो रहे।

हथकड़ी तो इंसान को केवल एक अपराधी ही घोषित करती है, लेकिन हठ, एक ऐसी हथकड़ी है, जो इंसान खुद अपने हाथ से ही पहन लेता है। उसे हठधर्मिता कहते हैं। केवल अपना नुकसान तो ठीक, महापुरुषों का हठ तो देश के साथ भी खिलवाड़ कर गुजरता है। समझौता एक्सप्रेस भले ही न चलाएं, लेकिन जब हठ का मामला हो, थोड़ा ठहर जाएँ।

किसी का कहा मान जाएँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९६ ☆ गीत – ।। अपनो से जंग जीत कर भी आप हार जाते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९६ ☆

☆ गीत ।। अपनो से जंग जीत कर भी आप हार जाते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

अपनो से जंग जीत कर भी आप हार जाते हैं।

उनके दिल में फिर आप जगह पा नहीं पाते हैं।।

**

जीवन में यह एक तरीका जरूर आजमाना चाहिए।

अगर हो बहस अपनो से तो  हार  जाना   चाहिए।।

अपनो से हार कर भी आप उनका दिल जीत लाते हैं।

अपनो से जंग जीत कर भी आप हार जाते हैं।।

**

रिश्ते बनाना आसान लेकिन निभाना कठिन होता है।

बिनअहसास भावना के रिश्ता कहीं और ही खोता है।।

अपनापन और विश्वास मिल कर सच्चे रिश्ते बनाते हैं।

अपनो से जंग जीत कर भी आप हार जाते हैं।।

**

वही सच्ची दोस्ती जहां दिल  का तार जुड़ा होता है।

अहंकार शून्यऔर न ही वहां कोई छोटा-बड़ा होता है।।

कुछ लोग दिल में उतरते तो कुछ दिल से उतर जाते हैं।

अपनो से जंग जीत कर भी आप हार जाते हैं।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५९ ☆ कविता – राष्ट्रहित में सोचिये, कर्त्तव्य पथ पर आइये… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – राष्ट्रहित में सोचिये, कर्त्तव्य पथ पर आइये। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५९

☆ राष्ट्रहित में सोचिये, कर्त्तव्य पथ पर आइये…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

झूठ-लालच स्वार्थ तज, सच नीति-नय अपनाइये

राष्ट्रहित में सोचिये, कर्तव्य पथ पर आइये।

 * 

कर रही है स्वार्थवश हो राजनीति अपार क्षति

कैसे इस दुर्भावना से भला संभव कोई प्रगति ?

 *

बढ़ती जाती आये दिन, नई-नई समस्यायें कई

हरेक निर्णय से उभरती हैं जटिलतायें नई।

 *

क्यों हुआ है मन यों मैला, क्यों नजर दुर्बुद्धि की ?

जरूरत है आत्मचिन्तन की औं जीवन शुद्धि की।

 *

नामसझ लोगों से दिखते अधिकतर व्यवहार हैं।

जनता की मुश्किलें बढ़ गईं, बढ़ें भ्रष्टाचार हैं।

 *

कठिन होती जा रही है जिन्दगी तकरार से

समस्या तो हल हुआ करती है मिलकर प्यार से।

 *

सभी का दायित्व है कि हों सुरक्षित सही हल

देश की उन्नति हो जिससे और सुखदायी हो कल ।

 *

तेजगति से हमारे भारत का उचित विकास हो

भावनायें हों न कुण्ठित, सबकी पूरी आश हो।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कान्हाचा साक्षात्कार… ☆ सुश्री प्राची जोशी ☆

सुश्री प्राची जोशी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ कान्हाचा साक्षात्कार… ☆ सुश्री प्राची जोशी ☆

सांज सावली दाटते वनी,

जीव व्याकुळतो क्षणोक्षणी

थांबे सळसळ मंद वाऱ्याची,

शांत होऊनी जाते पानोपानी

*

गाईगुरे फिरुनी माघारती रानी,

गोजिरी वासरे आसुसूनी बिलगी

त्यांची घुंगरे सादती झंकारूनी,

माऊलीच्या कुशीत विसाव्यासी

*

मंजूळ सुरांची वाजते बासरी,

सावळा कान्हाच हा सभोवताली

गोपगोपींचा पिंगा समतोल धरी,

मनीच्या वासनांचा क्षय होत जाई

*

निळ्या आसमंती हे मेघ दाटती,

पक्षांची किलबिल गुंजारव करी

पिल्ले आईला घरट्यात बिलगती,

धरतीवर रिमझिमता वर्षाव होई

*

रात्र अंधाराची विरती पोकळी,

अजूनही भासते रात्रीची सावली

रात्रीचे रूप दाट काळोख पांघरी,

फिरूनी नवी शुभ्र सकाळ ही

*

प्रकाशली अशी दशदिशांनी

कान्हाचा साक्षात्कार देऊनी…

©  सुश्री प्राची अभय जोशी

मो 9822065666 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ “आपण असे का वागतो?” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

☆ “आपण असे का वागतो?☆ श्री जगदीश काबरे ☆

माणसाचे सामाजिक वर्तन हे त्याच्या संस्कारांचे, परंपरांचे, भीतीच्या आणि स्वीकाराच्या अपेक्षांचे मिश्रण असते. अनेकदा आपण अनुभवतो की आपल्या आसपास असे मित्र, सहकारी किंवा नातेवाईक असतात की जे स्पष्ट बोलायला घाबरतात. त्यांना एखादे काम सांगितले असता ते आवर्जून “हो बघतो”, “हो करतो”, “नक्की करतो”, असे शब्द उच्चारतात; पण प्रत्यक्षात ते काम करतच नाहीत. ही घटना अनेकांच्या जीवनात इतकी वारंवार घडते की ती एक सामान्य ’सामाजिक पॅटर्न’ बनली आहे. या पॅटर्नचा अभ्यास केला तर त्यामागे केवळ व्यक्तीगत स्वभाव नसून खोल सांस्कृतिक आणि मानसिक संरचना दिसते. “सत्यम् ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्” या संस्कारांनी हीच मानसिकता बळकट केली आहे. सत्य बोला, पण तेही प्रिय असले पाहिजे, ही अपेक्षा चांगली असली तरी तिचा अनपेक्षित परिणाम असा होतो की माणूस अप्रिय सत्य टाळायला लागतो आणि अखेरीस बोटचेपणा किंवा लोकांना न दुखावण्याच्या वर्तनाची एक प्रमुख खूण बनते.

भारतीय संस्कृतीत सहिष्णुता, नम्रता, इतरांना न दुखावणे, सुसंवाद राखणे यांना प्रचंड महत्त्व दिले गेले आहे. हे मूल्य समाज टिकवण्यासाठी नक्कीच आवश्यक असले तरी त्यांचा अतिरेक झाल्यास माणूस स्वतःची भूमिका, मत किंवा नकार व्यक्त करताना त्याला असुरक्षित वाटायला लागते. “नाही” म्हणणे म्हणजे उद्धटपणा, रूक्षपणा, अनादर किंवा असामाजिकता, अशी एक समजूत पिढ्यानपिढ्या लोकांच्या मनात बसवली गेली आहे. त्यामुळे लोक “नाही” म्हणण्यापेक्षा “हो” म्हणतात आणि नंतर दुर्लक्ष करतात. हा प्रकार केवळ व्यक्तीगत संबंधांमध्येच नाही, तर कार्यालयीन कामकाजात, सार्वजनिक ठिकाणी, प्रशासनात आणि राजकीय जीवनातही दिसतो. वरवर पाहता सौम्य वाटणारी ही मानसिकता प्रत्यक्षात मोठ्या सामाजिक समस्यांना जन्म देते. जे करायचे नाही, तेही “हो” म्हणणे म्हणजे गैरसमज, चुकीची अपेक्षा वाढवणे आणि परस्पर अविश्वास निर्माण करणे. हीच परिस्थिती पुढे नात्यातील ताण, मित्रांमधील नाराजी किंवा कार्यक्षेत्रातील काम प्रभावीपणे न करण्यात परिवर्तित होते.

बोटचेपणा म्हणजे व्यक्तीचे स्वतःचे मत, निर्णय किंवा स्वभाव लपवत, फक्त समोरच्याला भावेल असेच बोलणे. यातून खरी संवाद प्रक्रिया अगदी बिघडण्याचा सांभाव असतो. समाजशास्त्र सांगते की संवाद जितका अस्पष्ट तितका गैरसमज निर्माण होण्याची शक्यता अधिक. आपण एखाद्याला काम सांगतो तेव्हा आपल्याला हवे असते उत्तर –ते काम शक्य आहे की नाही. परंतु समोरचा माणूस स्पष्टपणे नकार देत नाही, कारण त्याच्या मते नकार देणे म्हणजे संबंध बिघडवणे. म्हणून तो “करतो”, “बघतो”, “थोडा वेळ दे” असे शब्द वापरून दुसऱ्याच्या अपेक्षा जिवंत ठेवतो. हे उत्तर ऐकणाऱ्याला सुखकारक वाटले तरी नंतर काम न केल्यामुळे गैरसमज वाढण्याची शक्यता असते. परिणामी, काम न झाल्यावर निराशा आणि नाराजी वाढते आणि त्या व्यक्तीला पुन्हा काम न सांगण्याचा सांगण्याचा निर्णय घेतला जातो. विश्वास तुटणे हे बोटचेपणाच्या सर्वात गंभीर परिणामांपैकी एक आहे.

या मानसिकतेच्या सामाजिक मूळांचा अभ्यास केला तर सर्वप्रथम लक्ष जाते ते संस्कारांकडे. भारतात घरात, शाळेत आणि समाजात ज्या प्रकारे मुलांचे संस्कार होतात त्यात “नकार देणे चुकीचे आहे” असा भाव अगदी खोल रुजवला जातो. मुलांनी मोठ्यांना “हो” म्हटले पाहिजे, शिक्षकांनी सांगितले तसे वागले पाहिजे, घरी पालकांच्या निर्णयांवर प्रश्न विचारू नये, नम्रता दाखवावी, रागावू नये, गैरसोय होईल असे काही बोलू नये, अशा अनेक सूक्ष्म अपेक्षा त्यामागे असतात. या प्रक्रियेतून वाढणारे मूल आत्मविश्वासाने “हे मला जमत नाही”, “हे मी करू शकत नाही”, किंवा “हे मला मान्य नाही” असे बोलण्याची हिम्मत दाखवूच शकत नाही. भीडस्त स्वभाव वाढल्यामुळे मोठेपणी एखाद्या कामाला नकार द्यायचा असेल तरी त्याला ते कठीण जाते. तो विषम परिस्थितीला सामोरे जाण्यापेक्षा बोटचेपणा स्वीकारतो, कारण त्याच्या मते ते अधिक सुरक्षित असते.

समाजशास्त्रात ’संघर्ष टाळण्याची संस्कृती’ अशी एक संकल्पना आहे. भारतीय सामूहिक जीवन हा या संस्कृतीचा एक प्रमुख नमुना म्हणायला हवा. कारण आपल्यात उघड संघर्ष टाळण्याची प्रवृत्ती इतकी प्रबळ आहे की लोक सत्य बोलण्यापेक्षा शांत राहणे किंवा आनंददायी प्रतिसाद देणे पसंत करतात. एखाद्याने सांगितलेले काम नक्कीच नकोसे असू शकते, वेळ नसेल, कौशल्य कमी असेल, किंवा मनात इच्छा नसेल पण या सगळ्यांपेक्षा संघर्ष नको हा भाव जास्त महत्त्वाचा ठरतो. मैत्री, नातेसंबंध किंवा सहकार्यातील सौहार्द टिकवण्याची भीती वाटणाऱ्या व्यक्तीचा खोटे आश्वासन देण्याकडे कल वाढतो. परंतु या संस्कृतीचे दुष्परिणाम बहुआयामी आहेत. सर्वप्रथम, व्यक्ती स्वतःच्या मर्यादा मान्य करण्याची सवय गमावते. ती स्वतःच्या क्षमता, वेळ, प्राधान्ये किंवा आवडीनिवडींचा विचार न करता प्रत्येक गोष्टीला “हो” म्हणते. त्यामुळे तिच्यावर अनावश्यक भार वाढतो. ती दिलेल्या शब्दांवर ती ठाम राहू शकत नाही, कारण सुरुवातीपासूनच ते शब्द वास्तविकतेवर आधारलेले नसतात. दुसरे म्हणजे, इतरांच्या दृष्टीने तिची प्रतिमा हळूहळू अविश्वसनीय, ढिसाळ, किंवा दुटप्पी बनते. जेव्हा एखादा माणूस वारंवार “हो” सांगून काम करत नाही तेव्हा लोक त्याला गंभीरपणे घेत नाहीत. त्याचे वचन, आश्वासन किंवा बोलणे यांचे मूल्य कमी होते. कार्यक्षेत्रात ही मानसिकता अधिक गंभीर बनते. भारतीय कार्यालयीन संस्कृतीत सांगितलेली कामे स्वीकारण्याचा दबाव असतो. येथेही सरळ “हे माझ्याकडून होणार नाही” असे सांगितले जात नाही. कारण करिअर वर डाग लागण्याची भीती असते. म्हणून कोणीही नकार देत नाही, पण कार्याची गती मंदावते, जबाबदाऱ्या ढकलल्या जातात, शेवटच्या क्षणी सबबी दिल्या जातात. यामुळे कार्यक्षमतेवर परिणाम होतो. व्यवस्थित संवादाअभावी प्रकल्प अर्धवट राहतात आणि संस्थेत इतरांना दोष देण्याची प्रवृत्ती वाढते. सामूहिक कामकाजासाठी स्पष्ट संवाद ही पहिली अट असते; बोटचेपणा हा संवादाचा सर्वात मोठा शत्रू असतो.

मानसशास्त्रीय दृष्टिकोनातून पाहिले तर “नाही” म्हणू न शकणाऱ्या लोकांमध्ये अपराधगंड प्रबळ असतो. नकार दिल्यास समोरचा दुखावेल, रागावेल किंवा आपल्याबद्दल नकारात्मक विचार करेल अशी भीती वाटते. ही भीती त्यांना स्वतःच्या प्रतिमेबद्दल अतिसंवेदनशील बनवते. ते “चांगले व्यक्ती” दिसण्याची इच्छा ठेवतात. त्यांच्या मते जे लोक स्पष्टपणे नकार देतात ते उद्धट, हट्टी किंवा कठोर असतात. त्यामुळे ते कोणत्याही नात्यात स्वतःची जागा स्पष्टपणे व्यक्त करत नाहीत. परंतु दीर्घकाळात हीच प्रवृत्ती मानसिक ताण वाढवते. सतत लोकांशी गोड बोलत राहणे म्हणजे स्वतःची इच्छा, वेळ आणि ऊर्जेचा अपव्य करणे होय. त्यामुळे अशा लोकांत चिंता, निराशा निर्माण होताना दिसते.

सामाजिक पातळीवर बघितले तर “अप्रिय सत्य” बोलण्याची भीती आपल्याला आपली संस्कृती व्यक्तीगत स्वातंत्र्याला प्रोत्साहन देते की दडपते, या प्रश्नाचे द्वंद्व आपल्या मनात उभे करते. स्पष्टपणा, प्रामाणिक संवाद, आणि नकार देण्याची क्षमता या गोष्टी कोणत्याही निरोगी समाजासाठी अत्यावश्यक असतात. परंतु जिथे कधीही नकार देऊ नये, तडजोड करावीच, सौहार्द राखणेच महत्वाचे अशी मानसिकता असते तिथे समाज बाहेरून शांत वाटला तरी आतून अस्वस्थ असतो. असा समाज दुटप्पी, दाम्भीक बनतो. संबंधांमध्ये आंतरिक प्रामाणिकता नसते. लोक एकमेकांना खरेपणे ओळखू शकत नाहीत, कारण ते मुखवटे धारण करून खऱ्या भावना लपवून ठेवत असतात. परिणामी, संबंध वरवरचेच राहतात. जर आपल्याला सामाजिकदृष्ट्या प्रामाणिकपणा वाढवायचा असेल तर प्रथम “नाही” म्हणण्याच्या संस्कृतीला स्वीकारले पाहिजे. “नकार देणे म्हणजे नातं तोडणे नाही”, हे लोकांच्या मनात ठसवले पाहिजे. नकार देणारी व्यक्ती प्रामाणिक असते, कारण ती आपली क्षमता आणि मर्यादा स्पष्टपणे सांगते. यामुळे त्याचे शब्द विश्वासार्ह असतात. उलट, सतत “हो” म्हणणारी व्यक्तीच अविश्वसनीय ठरते. म्हणूनच, सामाजिक विश्वास टिकवण्यासाठी “नाही” हा शब्द आपल्याला अपमानित करणारा वाटता कामा नये. कारण “हो” आणि “नाही” या दोन शब्दांमध्येच संवादाची मूलभूत रचना असते. दोन्ही शब्द आवश्यक.

म्हणून “सत्यम् ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्” या वाक्याचा पुनर्विचार करणे आवश्यक आहे. सत्य प्रिय असावे—होय. पण “प्रिय नसल्यास सत्य बोलू नये” हा अर्थ काढणे चुकीचे आहे. सत्याने प्रिय होणे म्हणजे सत्य सांगण्याची पद्धत विनम्र असावी. म्हणजेच सत्य लपवू नका, पण ते अप्रिय असले तरीही सत्य सांगायला कचरू नका. समाजात सत्य बोलण्याला प्रोत्साहन देताना त्याची पद्धत सौम्य ठेवणे हा मूळ उद्देश आहेच, परंतु याचा अर्थ असा नाही की अप्रिय सत्य सांगूच नये. पण संस्कृतीने प्रिय सत्यच सांगा असाच संस्कार रुजवला आणि व्यक्तीला सामाजिक दबाव सहन करावा लागला. म्हणून भारतीय समाजात “नकार” हा शब्द सामाजिक भीतीचा केंद्रबिंदू झाला आहे. कुणाला दुखावण्याची, कुणाकडून अवहेलना होण्याची, कुणीकडून नाते तुटण्याची किंवा स्वतःला वाईट ठरवले जाण्याची भीती लोकांना “हो” म्हटण्यास भाग पाडते. ही मानसिकता बदलायची असेल तर शैक्षणिक स्तरावर, कौटुंबिक स्तरावर आणि सामाजात संवाद कौशल्याची नव्याने मांडणी करणे गरजेचे आहे. मुलांना “हो” आणि “नाही” दोन्ही शब्द योग्य ठिकाणी कसे वापरायचे हे शिकवणे आवश्यक आहे. “नाही” म्हणणाऱ्या व्यक्तीला समाजाने दोष देणे बंद केले पाहिजे. उलट, त्याच्या प्रामाणिकतेचा सन्मान करायला हवा. याशिवाय, काम स्वीकारताना लोकांनी स्वतःच्या क्षमतांचा आणि वेळेचा तर्कसंगत विचार करणे आवश्यक आहे. नकार देणे कठीण वाटले तरी त्याचे दीर्घकालीन फायदे अधिक असतात. सामाजिक प्रामाणिकता वाढते, काम व्यवस्थित विभागले जाते, आणि अपेक्षा स्पष्ट राहतात. अशा संवादामुळे गैरसमज कमी होतात आणि नात्यांमध्ये पारदर्शकता वाढते.

शेवटी, “नाही” म्हणण्याची क्षमता असणे ही सामाज प्रगल्भ झाल्याची खूण आहे. जिथे लोक एकमेकांशी स्पष्टपणे व्यक्त होतात आणि तसे वागतात तिथे संबंध टिकाऊ बनतात, कामकाज अधिक परिणामकारक होते आणि व्यक्तीचा आत्मविश्वासही वाढतो. बोटचेपणा माणसाला वरवर चांगला वाटतो, पण वास्तवात तो स्वतःलाही आणि इतरांनाही हानीकारक असतो. एखाद्या कामाला नकार देणे हे चुकीचे नाही तर ते प्रामाणिकपणाचे धैर्य आहे. सत्य सांगणे आणि नको असलेले टाळणे यात संतुलन साधल्याशिवाय समाज निरोगी बनू शकत नाही. “प्रिय सत्य” ही संकल्पना योग्य आहे, पण “अप्रिय सत्य” टाळणे ही सामाजिक चूक आहे. म्हणूनच, स्पष्टपणे “नाही” म्हणणे ही परस्परातील संबंध पारदर्शक ठेवण्यासाठी आवश्यक असणारी कृती आहे.

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक विज्ञान आणि वैज्ञानिक दृष्टीकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail. com

मो ९९२०१९७६८०

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares