हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२७ ☆ यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२७ ☆

?  यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लंदन में चलते हुए मेरी एक आदत बन गई है। सड़क पर चलते हुए अब मैं केवल सामने नहीं देखता, कभी ऊपर भी देखने लगता हूं। यह आदत इस शहर ने ही डाली है।

किसी पुराने भवन की खिड़की के ऊपर अचानक कोई पत्थर का चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी दरवाजे के दोनों ओर दो छोटे सिंह बैठे मिल जाते हैं। कहीं छत के किनारे कोई पक्षी पंख समेटे बैठा है और कहीं भवन की दीवार पर कोई विचित्र सा जीव मानो सदियों से आने जाने वालों को देख रहा हो।

पहले मुझे लगता था कि यह सब वास्तुशिल्प की सजावट भर है। लेकिन थोड़ा खोजने पर पता चला कि लंदन के इन पत्थर और धातु के जीवों की भी अपनी एक भाषा है।

मिसाल के लिए सिंह।

लंदन में सिंह केवल चिड़ियाघर में नहीं मिलते। वे भवनों की रखवाली भी करते हैं। Bank of England की वास्तुकला में सिंहों की उपस्थिति को शक्ति का प्रतीक माना गया है और उन्हें बुरे इरादों से रक्षा करने वाली छवि से भी जोड़ा गया है। वहां सिंह दरवाजों, दीवारों और भवन के भीतर तक दिखाई देते हैं। उसी भवन में उल्लू भी हैं, जिन्हें ज्ञान और विवेक का प्रतीक माना गया है।

यहां एक तथ्य खास तौर पर ध्यान खींचता है। सिंह लंदन या ब्रिटेन के जंगलों का स्वाभाविक प्राणी नहीं है। ब्रिटेन में सिंह कभी जंगली पशु के रूप में नहीं रहे। फिर भी ब्रिटिश प्रतीक संसार में सिंह की उपस्थिति इतनी गहरी है कि वह राजसत्ता, शक्ति, साहस और संरक्षण का मानो स्वाभाविक प्रतीक बन गया है। शायद इसी कारण लंदन की इमारतों पर पत्थर के सिंह इतने सहज दिखाई देते हैं, जैसे वे इस शहर के पुराने निवासी हों। Bank of England स्वयं सिंह को शक्ति का प्रतीक और बुरे इरादों से रक्षा करने वाली स्थापत्य छवि के रूप में बताता है।

अर्थात भवन भी शायद कह रहा होता है, बाहर से मजबूत दिखो पर भीतर से समझदार रहो।

लंदन में सिंहों की कहानी इससे भी पुरानी और रोचक है। Trafalgar Square में Nelson’s Column के नीचे बैठे चार विशाल कांस्य सिंहों को Sir Edwin Landseer ने बनाया था और 1867 में उन्हें वहां स्थापित किया गया। उनकी भूमिका केवल सौंदर्य बढ़ाने की नहीं, बल्कि Nelson की स्मृति की रक्षा करने वाले प्रहरी जैसी कल्पित की गई।

Oxford Street के पास Stratford Place के प्रवेश द्वार पर सिंह की मूर्ति लगी है। अठारहवीं शताब्दी में बने इस परिसर के प्रवेश पर सिंहों की मौजूदगी मानो आने वाले को बता रही थी कि भीतर कोई साधारण जगह नहीं, एक विशिष्ट आवासीय संसार है।

और फिर है South Bank Lion,

कभी यह सिंह Lambeth की Lion Brewery की छत के ऊपर बैठकर Thames की ओर देखता था। 1837 में William Frederick Woodington ने इसे Coade Stone में बनाया था। Brewery खत्म हुई, भवन भी चला गया, लेकिन सिंह बचा रहा। वह लंदन में इधर से उधर घूमता हुआ अंततः Westminster Bridge के पास पहुंच गया। आज वह Grade II* listed ऐतिहासिक मूर्ति है।

एक सिंह ने मानो नौकरी बदल ली, लेकिन शहर नहीं छोड़ा।

उल्लुओं की कहानी कुछ और दिलचस्प है।

Southwark में एक पुराने मकान की ऊपरी मंजिल की दीवार पर एक उल्लू और एक बिल्ली की छोटी मूर्तियां लगी हैं। स्थानीय तौर पर यह जगह “Owl and the Pussy-Cat” house के नाम से जानी जाती है। इन मूर्तियों का वास्तविक कारण आज भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। अनुमान लगाया जाता है कि शायद इनका संबंध Edward Lear की प्रसिद्ध कविता से हो, लेकिन यह भी केवल संभावना है।

मुझे लंदन की यही बात अच्छी लगती है। यहां हर चीज का अर्थ जरूरी नहीं कि एक ही हो।

कभी मूर्ति वास्तुशिल्प है, कभी प्रतीक, कभी इतिहास की बची हुई निशानी और कभी किसी व्यक्ति की निजी शरारत।

सबसे बड़ी बात आम लोग भी अपने घरों में ये प्रतीक मूर्तियाँ लगवाये हुए हैं।

हमारे यहां भी घरों के बाहर हाथी, सिंह, घोड़े, हंस और देवी देवताओं की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। उनके पीछे अक्सर धार्मिक विश्वास, वास्तु संबंधी धारणाएं या शुभता की कामना होती है। लंदन में भी प्रतीक हैं, लेकिन उनका अर्थ अधिक बार इतिहास, शक्ति, पेशे, कला, स्मृति या निजी रुचि से जुड़ता दिखाई देता है।

और शायद इसीलिए यहां चलते हुए ऊपर देखना भी एक तरह का इतिहास पढ़ना है।

नीचे फुटपाथ पर आज का लंदन चल रहा है। लोग मोबाइल पर बातें कर रहे हैं, बसें आ जा रही हैं, साइकिलें निकल रही हैं, कोई टु गो कप कॉफी लेकर जल्दी में है।

और ठीक उनके ऊपर, किसी पुराने भवन की छत पर बैठा एक पत्थर का उल्लू चुपचाप सब देख रहा है।

वह न मोबाइल देखता है, न घड़ी।

सिंह भी वहीं है, अपनी जगह अडिग।

सदियों से शायद उसका काम ही यही है, शहर को मूक रहकर देखते रहना।

मैं सोचता हूं, लंदन के भवन केवल ईंट, पत्थर और शीशे से नहीं बने हैं। उनके चेहरे भी हैं, कान भी हैं, आंखें भी हैं और कभी कभी छत पर बैठे हुए उल्लू भी।

बस फर्क इतना है कि लंदन की इन मूर्तियों से दोस्ती करने के लिए आपको ऊपर देखना पड़ता है।इस शहर में इतिहास अक्सर संग्रहालय में बंद नहीं मिलता।कभी वह आपके सिर के ऊपर छत पर बैठा होता है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८३ ⇒ पाप और पुण्य का खेल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पाप और पुण्य का खेल ।)

?अभी अभी # १०८३ ⇒ आलेख – पाप और पुण्य का खेल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

?

ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या !

रीतों पर धर्म की मोहरें है।

– साहिर

हम जो भी अच्छा-बुरा करते हैं, कुछ खुला, कुछ गुप्त करते हैं !नेकी दरिया में जाती है, बदी बदनामी दिलाती है। बैंक की बैलेंस शीट की तरह पुण्य और पाप जमा और नामे में दर्ज हो जाते हैं। देहमुक्त होते ही, चित्रगुप्त के दरबार में खाता खोला जाता है। पाप-पुण्य का हिसाब होता है, फैसला सुनाया जाता है। या तो स्वर्ग, या नर्क।

हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, विधि हाथ !

– गोस्वामी तुलसीदास

लीजिए ! स्वर्ग-नरक का हिसाब चित्रगुप्त के हाथ और हानि-लाभ, यश-अपयश विधि हाथ। तब तो फिर अपना हाथ जगन्नाथ। लेकिन यह सब इतना आसान कहाँ ! तुम जैसे कर्म करोगे वैसा फल देंगे भगवान। अब आप या तो हानि-लाभ और यश-अपयश की चिंता कर लो, या पाप और पुण्य की।।

पुण्य का खेल तो बहुत आसान है ! पुण्य को दान-पुण्य भी कहते हैं। दान-पुण्य से स्वर्ग मिलता है। शास्त्रों में लिखा है। गंगा-नहा लेने से पापों से मुक्ति मिल जाती है। तीर्थाटन से पुण्य संचित होता है। कथा-भागवत सुनने से मोक्ष मिलता है और कुम्भ स्नान से न केवल पाप नष्ट होते हैं, अमृत की कुछ बूँदों की भी आप पर वर्षा हो जाती है। मतलब हम सबका न केवल स्वर्ग, अपितु मोक्ष और वैकुण्ठ भी सुरक्षित।

चलिए ! अगर आप से इतना भी नहीं होता तो फिकर नॉट। कलयुग नाम अधारा, सिमर सिमर उतरै पारा। जय श्रीराम।

रुकिए रुकिए कहाँ चले ! अपने पापों का भी तो हिसाब करते जाइए। अरे वाह साहब ! अभी तो आपने कहा था, कि गंगा स्नान से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। उस ग्यारंटी का क्या हुआ ? हमें नहीं पता। लेकिन क्या आपको पता नहीं, झूठ बोलना, चोरी करना, किसी की निंदा करना, हिंसा करना, यह सब पाप है। काम, क्रोध, मद, मत्सर के रहते आप स्वर्ग नहीं जा सकते। आपका चित्त मलिन है, फिल्मी गाने गाया करता है। आप स्वर्ग नहीं घोर नर्क के भागी हो। क्या आपको ज्ञात नहीं, महाभारत के युद्ध के पश्चात, पाँच पांडवों में से केवल धर्मराज युधिष्ठिर ही स्वर्गारोहण कर पाए थे। एक के साथ एक फ्री की स्कीम में उनका वफादार कुत्ता भी स्वर्ग चला गया। उनके खाते में केवल आधा झूठ बरामद हुआ, जब उन्होंने कहा, नरो वा कुंजरो वा। वह भी धर्म की रक्षा के लिए। द्युत क्रीड़ा में शकुनि ने उनके साथ छल किया, इसलिए माफी मिल गई।।

तब आखिर एक सदाचारी की परिभाषा क्या ! क्या उसे दूध से धुला हुआ होना चाहिए ? जहाँ शुद्ध दूध और घी की ही गारण्टी नहीं, वहाँ केवल या तो अभिषेक-युक्त भगवान ही पंचामृत से धुले हुए हो सकते हैं, या फिर ऐश्वर्या-युक्त अभिषेक बच्चन। कितनी पीढ़ियों की पुण्याई है बंदे के पास।

हम लोग पूर्वजन्म में विश्वास नहीं रखते, स्वर्ग-नरक में विश्वास करते हैं, इसलिए या तो हमें स्वर्ग दे दो, वर्ना हमको दूसरा जन्म नहीं मंगता। eat, drink and be merry! नरक में जाएँ हमारे दुश्मन। बस, बात ख़तम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ – अनाथ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा अनाथ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ ☆

☔ लघुकथा  ☔ अनाथ ☔

पारंपरिक रूप से त्योहार मनाना, उसे उत्साह उमंग उल्लास के साथ मिलबाँट कर सहेजना प्रेम, प्यार, सौहार्द की भावना को बढ़ते देखना सभी को अच्छा लगता है।

आज मानसी के ह्दय में उथल- पुथल मची थी कि रक्षाबंधन तो आया पर क्या? राखी का प्यार विश्वास भैया निभा पाया या वह स्वयं निभा सकी।

आसपास की बातें सुनने और घर में सिर्फ औपचारिकता से राखी बंधवाने का मतलब, अब उसे लगने लगा कि रक्षाबंधन अब एक मानसिक बंधन होने लगा है। भौहें-चढ़ाना, आँखे ततेरना, हर बात पर छींटाकशी और सिर्फ मै मेरा!! तू तेरा।

वह उठी पूजा की थाल लिए घर के मंदिर में दीपक जला, भारी मन से प्रार्थना करने लगी – – – प्रभु मुझे अगले जनम अनाथ बना देना। कम से कम सामाजिक दानदाताओं और चेरिटी वाले कृतज्ञता कातर दृष्टि से ही सही एक दिन का तो परिवार मिल जाता है।

पीछे से भाई की आवाज आई रहने दो—मै अभी जा रहा हूँ!! बाद में आऊंगा तो देखते है।

मानसी राखी की डोरी लिए माँ की तरफ देखने लगी। बंधन ही तो है – – – – तू कान्हा जी को बाँध ले! बिटिया माँ ने रुंधे गले से आवाज लगाई।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८९ – देश-परदेश – नाम में क्या रखा है? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८९ ☆ देश-परदेश – नाम में क्या रखा है? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे यहां लोग अपने इष्ट देव का पर्यायवाची आदि से नाम रखना पसंद करते थे, ताकि उनका बच्चा भी उन्हीं के सामान गुणकारी बने। इसीलिये रावण, कंस, शूर्पनखा  आदि नाम किसी बच्चे का नहीं सुना हैं। इंसान अपने कर्मो से ही पहचान बना लेता है, नाम महत्वपूर्ण नहीं होता हैं।

इन दिनों चर्चित नाम है, तुकाराम मुंडे जोकि वर्तमान में  महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेटर विभाग में कमिश्नर श्री तुकाराम मुंडे इन दिनों बहुत अधिक चर्चा में चल रहे हैं। मई 2026 में इस पद पर विराजमान होते ही उन्होंने अपने तेवर दिखाने आरंभ कर दिए हैं।

कुछ सप्ताह पूर्व करीब चालीस करोड़ के गुटका मसाले जप्त करने के बाद, उन्होंने मुम्बई के बड़े होटल, खाद्य जिंसों के वितरण आदि संस्थाओं के यहां भी छापा मार कर खाद्य उद्योग में खलबली मचा दी हैं। मुम्बई में अमीर और गरीब सब के प्रिय वड़ा पाव बेचने वाले तक को नहीं छोड़ा हैं। अभी तक सस्ता वडा पाव अखबार के पन्ने को टुकड़े में परोसा जाता हैं। अखबार की स्याही हानिकारक होती है, इस लिए इसको अब प्रतिबंधित कर दिया गया हैं।

मुंबई के रद्दी/भंगार आदि व्यवसाय से जुड़े लोगों को आर्थिक हानि हो गई हैं। पुराने अखबार के स्टॉक रखने वाले सकते में आ गए हैं। एक मित्र से मुंबई में बात हुई, तो उसने बताया रद्दी क्रेताओं ने भी अब बहुत कम रेट कर दिए हैं।

विगत दिन ये अफवाह उड़ी थी, कि तुकाराम को राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया हैं। उनके दो दशक के कार्यकाल में दो दर्जन ट्रांसफर हो चुकी हैं। उपरोक्त चित्र हमारे जयपुर के बहुत सारे परिवारों की रसोई का हैं। अब जयपुर की महिलाएं इंतजार में कब तुकाराम मुंडे उनकी किचेन की गंदगी देखकर, उनके रसोई घर बंद करवा देगा और उनको भी इस बोरिंग सी दिनचर्या के काम से मुक्ति मिलेगी।

तुकाराम नाम में कुछ तो है, 26/11 के हमले में पाकिस्तानी आतंकवादी  दरिंदे कसाब को भी तो मुंबई पुलिस के कांस्टेबल स्वर्गीय तुकाराम अंबाले ने ही जान की बाजी लगा कर जिंदा पकड़ा था। हम तो इस बात को नकारते है, कि नाम में क्या रखा हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३८ ☆ डेटवर घेऊन चला… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३८ ?

☆ डेटवर घेऊन चला… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

माझ्यातल्या, दाखवीन एक एक कला

राया मला, डेटवर घेऊन चला

*

भिडवीत असता नुसत्याच नजरा

कधीच नाही तुम्ही, आणलात गजरा

नुसतं म्हणता, मला प्रीतीच्या फुला

राया मला डेटवर घेऊन चला

*

उगा नका घाबरू मी, त्यातली नाही

दरीत डोकावून, सारखाच पाही

मिळताच मोका, करू प्रेमाच्या लिला

राया मला डेटवर घेऊन चला

*

स्टेरिंग गाडीचं, करतंय वळवळ

घाटामुळे मला, होतेय मळमळ

गाडी कशी, नेहमीच लागते मला

राया मला डेटवर घेऊन चला

*

डोहाळे पुरवाल तुम्ही माझे सारे

दिवसाढवळ्याच पाहुयात तारे

असा तुम्ही, सजवून आणाल झुला

राया मला डेटवर घेऊन चला

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ दिस झुल्याविना…! ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ दिस झुल्याविना…! ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

पंचमीचा झोका बाई

अजुनी मनात झुले

गाणीही विरुन गेली

श्रावण माहेरातले.

*

वारा हृदयी भिडतो

पाखरे सवे बोलती

तरि सरले दिवस

खोल वेदना सलते.

*

काय सांगू नागपुजा

मंदिरी उपवास सुख

भक्ती विसरता ही पिढी

होतसे सृष्टीसही दुःख.

*

लोपली संस्कृती बाई

बंधुप्रेम दुरावले

माय संस्काराचे घर

झुल्याविना पानावले.

 

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “छापील पुस्तकापासून माणूस दूर जाईल का?” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

🌸 विविधा 🌸

☆ “छापील पुस्तकापासून माणूस दूर जाईल का?☆ श्री जगदीश काबरे ☆

किंडलसारख्या वाचन ऍपचा, भ्रमणध्वनीचा, संगणकाचा आणि विविध प्रकारच्या इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकांचा वाढता वापर पाहता माणसाच्या वाचनाच्या सवयींमध्ये मोठा बदल होत आहे, हे नाकारता येत नाही. पूर्वी पुस्तक वाचण्यासाठी छापील पुस्तक हातात घेणे अपरिहार्य होते; पण आज त्याच पुस्तकाचे इलेक्ट्रॉनिक रूप सहज उपलब्ध होते. एका छोट्याशा भ्रमणध्वनीत किंवा वाचनयंत्रात शेकडो, हजारो पुस्तके साठवता येतात. प्रवासात, प्रतीक्षेत किंवा घराबाहेर असतानाही वाचन करता येते. अक्षरांचा आकार बदलणे, प्रकाशाची तीव्रता नियंत्रित करणे, शब्दाचा अर्थ तत्काळ शोधणे, पुस्तकातील एखादा उतारा शोधणे आणि वाचन जिथे थांबले तिथून पुढे सुरू करणे अशा सुविधा इलेक्ट्रॉनिक वाचनाला अधिक सोयीच्या बनवतात. त्यामुळे पुढील काळात इलेक्ट्रॉनिक वाचनाचे प्रमाण निश्चितच वाढत जाण्याची शक्यता आहे. परंतु इलेक्ट्रॉनिक वाचन वाढले म्हणजे छापील पुस्तके पूर्णपणे नष्ट होतील, या निष्कर्षावर उडी मारणे घाईचे ठरेल. करण इतिहासात प्रत्येक नवीन माध्यमाच्या आगमनावेळी जुन्या माध्यमाच्या अंताची भविष्यवाणी करण्यात आली होती; पण तसे काही घडले नाही. जसे की चित्रपट आल्यावर रंगभूमी संपेल असे मानले गेले, दूरदर्शन आल्यावर चित्रपटगृहे बंद पडतील असे वाटले, संगणक आल्यावर कागदाचा अंत होईल असे सांगितले गेले आणि भ्रमणध्वनी आल्यावर दूरध्वनीचे जुने प्रकार नाहीसे होतील असे मानले गेले. प्रत्यक्षात झाले असे की नवीन माध्यमांनी जुन्या माध्यमांचे स्वरूप, वापर आणि सामाजिक स्थान बदलले; त्यांना सर्वस्वी नष्ट केले नाही. पुस्तकाबाबतही अशीच प्रक्रिया घडण्याची शक्यता अधिक आहे. इलेक्ट्रॉनिक पुस्तक छापील पुस्तकाची जागा काही क्षेत्रांत घेईल; परंतु छापील पुस्तकाचे अस्तित्व त्यामुळे संपेलच असे नाही. या मागील एक महत्त्वाचे कारण म्हणजे पुस्तक हे केवळ माहिती साठविण्याचे साधन नसून ती एक सांस्कृतिक वस्तू आहे. पुस्तकाच्या कागदाचा स्पर्श, त्याचा वास, मुखपृष्ठ, पान उलटण्याची क्रिया, पुस्तकावर केलेल्या खुणा, एखाद्या जुन्या पुस्तकातून मिळणारी आठवणींची अनुभूती आणि स्वतःचा पुस्तकसंग्रह असणे यांना इलेक्ट्रॉनिक पुस्तके पूर्णपणे पर्याय होऊ शकत नाहीत. एखाद्या व्यक्तीच्या आयुष्यातील एखाद्या पुस्तकाला काही विशिष्ट कारणांमुळे भावनिक मूल्य प्राप्त झालेले असते. मग ते पुस्तक केवळ मजकूर राहत नाही; ते एखाद्या काळाची, व्यक्तीची, विचाराची किंवा जीवनानुभवाची स्मृती बनते. त्यामुळे ज्ञानाच्या वापरासाठी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अधिक उपयुक्त ठरले, तरी पुस्तकाच्या सांस्कृतिक आणि भावनिक मूल्यामुळे छापील पुस्तक टिकून राहण्याची शक्यता मोठी आहे.

भ्रमणध्वनीवर वाचताना वाचक सतत इतर सूचनांच्या, संदेशांच्या, चित्रफितींच्या आणि सामाजिक माध्यमांच्या आकर्षणात असतो. त्यामुळे दीर्घकाळ एका विषयावर एकाग्र होऊन वाचण्याची क्षमता कमी होण्याचा धोका आहे. छापील पुस्तक वाचताना पुस्तक आणि वाचक यांच्यामध्ये इतर डिजिटल व्यत्यय तुलनेने कमी असतात. म्हणून गंभीर साहित्य, तत्त्वज्ञान, इतिहास, समाजशास्त्र किंवा विज्ञान यासारखे विषय सखोलपणे वाचण्यासाठी छापील पुस्तकाला अजूनही पर्याय नाही. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम वाचन अधिक सुलभ करते; पण सुलभता आणि एकाग्रता या दोन वेगळ्या गोष्टी आहेत. पूर्वी एखादे पुस्तक मिळवण्यासाठी ग्रंथालयात जावे लागे किंवा पुस्तक विकत घ्यावे लागे. आज इलेक्ट्रॉनिक माध्यमांमुळे जगातील अनेक ग्रंथ काही क्षणांत उपलब्ध होऊ शकतात. दुर्मिळ पुस्तके, जुन्या आवृत्त्या, संशोधनग्रंथ आणि विविध भाषांतील साहित्यही डिजिटल स्वरूपात मिळू शकते. त्यामुळे भौगोलिक अंतर, पुस्तकांची उपलब्धता आणि काही प्रमाणात आर्थिक अडथळे कमी होतात. विशेषतः विद्यार्थ्यांसाठी आणि संशोधकांसाठी ही क्रांती अत्यंत महत्त्वाची आहे.

याहून महत्त्वाचा बदल म्हणजे पुढील पिढ्यांसाठी पुस्तक या शब्दाचा अर्थच बदलू शकतो. आज पुस्तक म्हटले की अनेकांच्या मनात कागदाची पाने, मुखपृष्ठ आणि बांधणी असलेली वस्तू येते. भविष्यात एखाद्या तरुणाच्या दृष्टीने पुस्तक म्हणजे वाचण्यासाठी उपलब्ध असलेली डिजिटल सामग्री असू शकते. जसे आज अनेक तरुणांना पत्र लिहिण्याची जुनी पद्धत अपरिचित आहे, तसेच भविष्यातील काही पिढ्यांना छापील पुस्तक हे मुख्य वाचनमाध्यम वाटणार नाही. परंतु याचा अर्थ ते पुस्तक हातात घेऊन वाचणे विसरतील असा होत नाही. म्हणून लोक पुस्तके वाचणे विसरतील असे म्हणण्यापेक्षा लोक पुस्तके वाचण्याची पद्धत बदलतील हे विधान जास्त संयुक्‍तिक ठरेल. त्यामुळे छापील पुस्तकाचा ऱ्हास काही विशिष्ट क्षेत्रांत अधिक वेगाने होऊ शकतो. संदर्भग्रंथ, शब्दकोश, वर्तमान घडामोडींशी संबंधित साहित्य, शैक्षणिक सामग्री आणि त्वरित शोध घेण्यासाठी लागणारी माहिती यासाठी डिजिटल रूप अधिक सोयीचे आहे. अशा सामग्रीसाठी मोठमोठी पुस्तके जवळ बाळगण्याची आवश्यकता कमी होईल. परंतु कादंबऱ्या, कविता, आत्मचरित्रे, कलात्मक पुस्तके, संग्रहणीय आवृत्त्या आणि भेट म्हणून दिली जाणारी पुस्तके यांना छापील पुस्तकांच्या स्वरूपात मागणी राहू शकते. म्हणजे भविष्यात छापील पुस्तकाचे प्रमाण कमी होईल, पण त्याचे अस्तित्व अधिक निवडक आणि विशिष्ट स्वरूपाचे होण्याची शक्यता आहे.

या बदलाकडे केवळ तंत्रज्ञानाच्या दृष्टिकोनातून पाहणेही योग्य नाही. पुस्तक वाचण्याची सवय टिकवणे हा समाजाच्या बौद्धिक आरोग्याचा प्रश्न आहे. माध्यम कोणतेही असो, दीर्घ लेख वाचण्याची, तर्क समजून घेण्याची, विचारांशी असहमती नोंदवण्याची, कल्पनाशक्ती वापरण्याची आणि एखाद्या विषयावर शांतपणे चिंतन करण्याची क्षमता टिकणे अधिक महत्त्वाचे आहे. भ्रमणध्वनीवर हजारो पुस्तके उपलब्ध असूनही जर माणूस फक्त लहान संदेश, शीर्षके आणि चित्रफिती पाहत राहिला, तर माहितीची उपलब्धता वाढूनही सखोल ज्ञान मिळवण्याची ओढ कमी होऊ शकते. उलट एखादा माणूस इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकात तल्लीन होऊन शेकडो पाने वाचत असेल तर त्याचे वाचन छापील पुस्तकाइतकेच अर्थपूर्ण असू शकते. म्हणून भविष्यातील संघर्ष हा छापील पुस्तक आणि इलेक्ट्रॉनिक पुस्तक यांच्यातील नसून सखोल वाचन आणि वरवरच्या माहितीत रममाण होणे यात असणार आहे. छापील पुस्तक कदाचित आजच्या सारखे सर्वत्र दिसणार नाही. पुस्तकांची दुकाने, ग्रंथालये आणि घरातील पुस्तकांचे कपाट यांचे स्वरूपही बदलू शकते. परंतु माणसाला विचार समजून घेण्यासाठी, कल्पना आत्मसात करण्यासाठी आणि स्वतःशी संवाद साधण्यासाठी पुस्तकाची गरज लागणारच आहे. कारण माध्यम बदलले तरी ज्ञानाची आणि चिंतनाची गरज संपत नाही.

त्यामुळे भविष्यात लोक छापील पुस्तके वाचणे विसरून जातील हा अंदाज अतिशयोक्त आहे. अधिक वास्तववादी अंदाज असा वर्तवता येईल की छापील पुस्तक हे वाचनाचे एकमेव प्रमुख माध्यम राहणार नाही; तर इलेक्ट्रॉनिक वाचनाचे प्रमाण वाढेल एवढेच. परंतु छापील पुस्तक पूर्णपणे नाहीसे होणार नाही. भविष्यात दोन्ही माध्यमे परस्परपूरक असतील. ज्यांना वेग, उपलब्धता आणि सोय महत्त्वाची वाटेल ते इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकांकडे वळतील; ज्यांना पुस्तकाचा स्पर्श, संग्रह, सौंदर्य, स्मृती आणि एकाग्र वाचनाचा अनुभव महत्त्वाचा वाटेल ते छापील पुस्तकाकडे परततील. अखेरीस बदलणार आहे तो पुस्तकाचा आकार आणि माध्यम; माणसाची वाचण्याची आणि जाणून घेण्याची मूलभूत गरज नाही. त्यामुळे छापील पुस्तकांपासून वाचक दूर जाईल हा समज गैरसमजच आहे असे म्हटले तर वावगे ठरू नये.

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक विज्ञान आणि वैज्ञानिक दृष्टीकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail. com

मो ९९२०१९७६८०

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ जाणीव… – भाग – ३ ☆ श्री दीपक तांबोळी ☆

श्री दीपक तांबोळी

? जीवनरंग ?

☆ जाणीव… – भाग – ३ ☆ श्री दीपक तांबोळी

(“नाही गं बाई! मी तुझ्या संसारात अजिबात ढवळाढवळ करणार नाही.तू आणि तुझ्या सासरचे काय ठरवायचं ते ठरवा.तुमच्या घरात भांडणं लावायची माझी अजिबात इच्छा नाही “

“बरं “) 

इथून पुढे – –

एक महिन्याने विनायक घरी आला तर माधवी त्याला उत्साहाने म्हणाली

“अहो आनंदाची बातमी आहे.नयनाला नोकरी लागली “

” अरे वा! कोणत्या कंपनीत आणि किती पॅकेज आहे? “

कंपनीचं नाव सांगून माधवी म्हणाली

” सध्या सहा लाखाचं पॅकेज आहे आणि पुढे वाढेल असं ती म्हणत होती “

” वा छानच! पण आता कशी लागली नोकरी? काही ओळखबिळख होती का? “

” नाही हो.कसली ओळख आणि कसलं काय! इंटरव्ह्यूच्या अगोदर सहासात दिवसापासून ती अभ्यास करत होती.जावईबापूंनी तिच्या मागे लागून तिची छान तयारी करुन घेतली होती म्हणे “

“आपण हेच तर सांगत होतो तिला की इंटरव्ह्यूला जातांना थोडी तरी तयारी करुन जा.पण आपलं तिनं कधी ऐकलं नाही “

” जाऊ द्या.आता सासरी तिला अभिमानाने रहाता येईल.पैशासाठी कुणाकडे हात पसरायची वेळ येणार नाही “

“ते ठिक आहे माधवी पण आपण दिलेल्या शिक्षणाचा तिनं आपल्याला नाही सासरच्यांना फायदा करुन दिला याची मला खंत वाटते “

” तेही खरंच पण तिनं जी थोडीफार नोकरी केली तेव्हाही आपण तिचा पगार कधी मागितला नाही. आपल्याला कधी तशी गरजच भासली नाही “

“तिच्या सासरच्यांनाही कुठे तिच्या पैशाची गरज आहे? नवऱ्याला चांगला पगार आहे शिवाय सासूसासऱ्यांनाही चांगलं पेंशन आहे.जाऊ दे.जे आहे त्यात आपण आनंद मानायचा.ती खुश, तिच्या सासरचे खुश.अजून आपल्याला काय पाहिजे? “

” खरंय “

एक महिन्यानंतर एक दिवस अचानक विनायकच्या मोबाईलवर खात्यात वीस हजार जमा झाल्याचा मेसेज आला.मेसेजवर नयनाचा नंबर पाहून विनायक चांगलाच चक्रावला.त्यानं लगेच तिला फोन लावला.

“बेटा हे कसले पैसे तू मला पाठवले आहेत? “

“बाबा मी आता मी मिटिंगला चाललेय.त्यामुळे आता बोलता येणार नाही. पण मी तुम्हांला सविस्तर मेसेज व्हाॅटस्अपवर पाठवलाय.तो वाचल्यानंतर कदाचित तुम्हांला बोलायची गरज भासणार नाही. वाचून घ्या.ठेवू मी फोन? ” आणि फोन कट झाला.

विनायकनं उत्सुकतेने व्हाॅटस्अप उघडलं.तिथे खरोखरच नयनाचा भला मोठा मेसेज होता.

“प्रिय आदरणीय बाबा,

मी तुम्हांला पैसे पाठवलेत याचं तुम्हांला आश्चर्य वाटलं असेल.तीनचार दिवसांपूर्वीच माझा पहिला पगार झाला.कापूनकुपून चाळीस हजार हातात पडला. बऱ्याच वर्षांनी इतके स्वकमाईचे पैसे हातात आल्यावर खुप आनंद झाला.बाबा मी इथे नोकरीत लागल्यावर एक अशी घटना घडली की जिच्यामुळे मी आरपार बदलून गेले आहे.त्या घटनेमुळे लग्नापूर्वी मी माहेरी असतांना तुम्हांला खरंच खुप त्रास दिला याची मला जाणीव आणि पश्चाताप होऊ लागलाय.झालं असं की माझी काॅलेजची एक पुजा परदेशी नावाची मैत्रीण मला इथे कंपनीत भेटली.हो ही तीच पुजा जिचे वडील सायकलवर भाजी विक्रीचा व्यवसाय करायचे.खुप गरीब मुलगी पण अतिशय हुशार. ती इथे गेल्या तीन वर्षांपासून काम करतेय आणि सध्या तिला अठरा लाखाचं पॅकेज आहे.ती मला सांगत होती की माझ्यासोबत इंजीनियरींग सुटल्यावर ती एकही दिवस रिकामी बसली नाही. इंजीनियरींग झाल्यावर तिनं लगेच शाळेतल्या मुलांच्या ट्युशन्स घ्यायला सुरुवात केली.एका महिन्यातच तिला एका छोट्या एजन्सीजमध्ये जाॅब लागला.खरं तर त्या जाॅबचा इंजिनिअरिंगशी काहिही संबंध नव्हता.पण घरची परिस्थिती वाईट म्हणून कशाही मार्गाने आलेले पैसे तिला चालणार होते.एक वर्षाने तिला पुण्यातल्या एका कंपनीत जाॅब लागला.पॅकेज कमीच होतं पण त्या अनुभवावर तिला पुण्यातल्या पुण्यात तीनचार ठिकाणी जाॅब बदलता आले.दोन वर्षांपूर्वी तिचं लग्न झालं.लग्नाआधी तिनं नवऱ्याला अट टाकली की ‘ आईवडिलांनी पोटाला चिमटे घेऊन दिलेल्या शिक्षणाच्या जोरावर मला नोकरी मिळालीये.माझ्या पगारावर खरा हक्क त्यांचा आहे.आज ते दोघंही थकलेत.त्यांच्याकडून आता भाजीविक्रीचा व्यवसाय पुर्वीसारखा होत नाही. माझ्या भावाचं शिक्षण सुरु आहे.तर जोपर्यंत माझा भाऊ शिकून कमवायला लागत नाही तोपर्यंत मी माझ्या पगारातला अर्धा पगार माझ्या आईवडिलांना पाठवणार ‘ तिचा नवरा आणि सासूसासरेही समजदार निघाले.त्यांनी कोणतीही आडकाठी घेतली नाही. मागच्याच वर्षी तिला इथे आमच्या कंपनीत जाॅब मिळाला.आणि अजूनही ती आईवडिलांना अर्धा पगार पाठवते.तिची कहाणी ऐकून मी खुप भारावून गेले.माझ्या वागण्याची मला लाज वाटू लागली.तुम्ही म्हणायचा की ‘अगं बेटा आम्हांला तुझ्या पैशांची गरज नाहिये.पण तू कुठेतरी, कशाततरी गुंतलेली आहे याचंच आम्हांला समाधान हवंय ‘तुमचंही बरोबरच होतं, तुमच्या सगळ्या मित्रांची माझ्या बरोबरची मुलं नोकरीला लागली होती किंवा काही व्यवसाय करत होती.मीच एकटी रिकामी बसले होते.मित्र, नातेवाईक तुम्हांला माझ्याबद्दल विचारत असतील तेव्हा तुमची परिस्थिती किती ऑकवर्ड होत असेल या कल्पनेनेच मला कसंतरी होतंय.आपल्या सर्व गरजा, इच्छा आईवडिलांनी पुर्ण कराव्यात अशी मुलांची अपेक्षा असते तशीच मुलांनी शिकून कुठंतरी कामधंद्याला लागावं अशी आईवडिलांचीही अपेक्षा असते ती मी पुर्ण करु शकले नाही याची रुखरुख मला वाटू लागलीये.मी खरंच बाबा तुम्हां दोघांना खुप त्रास दिला. गेलेल्या काळाची भरपाई तर मी करु शकणार नाही पण तुम्ही माझ्या शिक्षणासाठी जो खर्च केला त्याची भरपाई तर नक्कीच करु शकते.मी ठरवलंय की कमीतकमी पाच वर्ष तरी अर्धा पगार तुम्हांला पाठवायचा.मला कल्पना आहे की तुम्हांला ते आवडणार नाही.”तुला शिकवणं माझं कर्तव्यच होतं “असं तुम्ही म्हणाल.तुमचं कर्तव्य तुम्ही व्यवस्थित पार पाडलं बाबा.आता माझं कर्तव्य मला पार पाडू द्या.प्लीज नाही म्हणू नका आणि मी पाठवलेला अर्धा पगार मला परत पाठवू नका.मला ही सुद्धा कल्पना आहे की माझ्या पैशांची तुम्हांला काहिच गरज नाहीये आणि मुलीकडून पैसे घेणं तुम्हांला आवडणारही नाही.पण असं समजा की मी माझ्यावरचं कर्ज फेडतेय.या पैशांचा उपयोग सहलींसाठी करा, समाजसेवेसाठी करा किंवा कशासाठीही करा मी तुम्हांला एका शब्दानेही विचारणार नाही. पण प्लीज नाही म्हणू नका.तुम्ही नाही म्हंटलात तर मी असं समजेन की तुमचं माझ्यावर प्रेमच नाहिये “

तो मेसेज वाचून विनायकला गहिवरून आलं.उशीरा का होईना आपल्या मुलीला जाणीव झाली याचं त्याला समाधान वाटलं.

घरी येऊन त्यानं नयनाचा मेसेज माधवीला वाचून दाखवला.तो वाचून माधवी म्हणाली

” हो.आज सकाळीच मला तिचा फोन आला होता.खुप इमोशनल झाली होती.मला म्हणत होती की बाबांना सांग पाठवलेले पैसे परत नका करु म्हणून “

“पण तिच्या नवऱ्याला आणि सासूसासऱ्यांना आवडेल का असा तिनं अर्धा पगार पाठवला तर? “

” हो तिचा नवरा आणि सासू दोघंही माझ्याशी बोलले.त्यांना उलट तिचा हा निर्णय खुप आवडलाय “

” वा मग तर काही प्राॅब्लेमच नाही.माझ्या डोक्यात एक कल्पना आलीये.अशीही आपल्याला तिच्या पैशांची गरज नाहीये.तर आपण आता असं करु तिनं पाठवलेल्या पैशात आपले थोडे पैसे टाकून गरीब, पैशाअभावी शिक्षण घेऊ न शकणाऱ्या मुलींसाठी नयनाच्याच नावाची एक स्काॅलरशिप सुरु करुया.म्हणजे तिचा पैसा योग्य कारणासाठी वापरला जाईल “

” वा खुपच छान आयडिया आहे.तिला कळवून टाका तसं.तिलाही खुप आनंद होईल “

” नको.तिला जरी आनंद झाला तरी तिच्या सासरच्यांना ते आवडेल की नाही ते सांगता येत नाही.आता नवीनच तिचं लग्न झालंय.आतापासून तिच्या संसारात गैरसमज नकोत.योग्य वेळ आली की आपण ते उघड करु “

“चालेल “

विनायकनं मोबाईल उचलला आणि तो नयनासाठी मेसेज टाईप करु लागला.

“बेटा उशीरा का होईना तुला जाणीव झाली.याचा आम्हां दोघांनाही खुप आनंद होतोय.

तुझा निर्णय आवडला.विशेष म्हणजे तुझ्या निर्णयाला सासूसासरे आणि जावईबापूंचा पाठींबा आहे याचा जास्तच आनंद होतोय.माणसं चांगली आहेत.पुढेही त्यांच्या सल्ल्याशिवाय कोणतेही निर्णय घेऊ नकोस.तुझ्या आग्रहास्तव तू पाठवलेले पैसे ठेवून घेत आहोत.ते पैसे चांगल्या कारणासाठीच वापरले जातील हा माझा शब्द आहे.तू आमच्या भावना जाणून घेतल्यास त्याबद्दल आम्हांला तुझा अभिमान वाटतो.आईवडिलांना दुसरं तरी काय हवं असतं? त्यांना मुलांचा पैसा नको असतो मात्र मुलांनी काहितरी अभिमानास्पद कार्य करावं, चारचौघात मुलांविषयी बोलतांना मान ताठ व्हावी असं मुलांचं कर्तृत्व असावं एवढीच त्यांची अपेक्षा असते.आज ती अपेक्षा पुर्ण केलीस याचा आनंद होतोय “

थोड्या वेळाने तिचा मेसेज आला

“आय लव्ह यू बाबा “

तो मेसेज पाहून विनायकचे डोळे अश्रूंनी भरुन आले.

समाप्त —  

© श्री दीपक तांबोळी

जळगांव

मो – 9209763049

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ राखी बंधन : आधुनिक विचार… ☆ राधिका भांडारकर ☆

राधिका भांडारकर

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☆ राखी बंधन : आधुनिक विचार… ☆ राधिका भांडारकर ☆

श्रावणातल्या पौर्णिमेची चाहूल लागली की मनाच्या एखाद्या हळुवार कोपऱ्यात बालपण पुन्हा जागं होतं. रंगीबेरंगी राख्या, मिठाईची ताटं, भावाच्या मनगटावर राखी बांधताना बहिणीच्या डोळ्यांत दिसणारा आनंद आणि त्यानंतर मिळणारी छोटीशी ओवाळणीची भेट… राखीबंधनाचा हा सोहळा केवळ एका दिवसाचा नसतो. तो आठवणींच्या धाग्यांनी विणलेला असतो.

पूर्वी राखी म्हणजे बहिणीने भावाच्या मनगटावर बांधलेला संरक्षणाचा धागा, अशी त्याची साधी व्याख्या होती. भाऊ बहिणीचे रक्षण करेल, तिच्या पाठीशी उभा राहील, अशी त्यामागची भावना. त्या काळाच्या सामाजिक परिस्थितीत या भावनेला निश्चितच महत्त्व होते.

पण काळ बदलला आहे. आजची बहीणही सक्षम आहे, स्वावलंबी आहे, स्वतःचे निर्णय घेणारी आहे. ती भावाकडून केवळ संरक्षणाची अपेक्षा करत नाही. तिला त्याची साथ हवी असते, पण त्याचबरोबर तीही भावाच्या आयुष्यातील आधारस्तंभ होऊ शकते.

म्हणूनच आज राखीचा अर्थ नव्याने समजून घ्यायला हवा.

‘तू माझं रक्षण कर’ ऐवजी ‘आपण एकमेकांसाठी उभे राहू’, हा आजच्या राखीचा अधिक सुंदर अर्थ असू शकतो.

भाऊ बहिणीच्या स्वप्नांना पाठिंबा देईल आणि बहीण भावाच्या संघर्षात त्याचा हात घट्ट धरून ठेवेल. यशाच्या क्षणी दोघे एकमेकांसाठी टाळ्या वाजवतील आणि अपयशाच्या क्षणी एकमेकांना सावरतील. हे नाते संरक्षणाच्या एकतर्फी भावनेतून सहजीवनाच्या आणि समानतेच्या भावनेत प्रवेश करेल.

आज अनेक भाऊ-बहिणी वेगवेगळ्या शहरांत, देशांत राहतात. स्क्रीनवरून होणाऱ्या भेटी, व्हिडिओ कॉलवरच्या गप्पा आणि कुरिअरने पोहोचणारी राखी यामुळे अंतर कमी होते. मनगटावर राखी बांधली जात नसली तरी मनातला धागा तसाच घट्ट राहतो.

कधी कधी तर राखीचा अर्थ रक्ताच्या नात्यापलीकडेही जातो. आयुष्याच्या एखाद्या वळणावर भेटलेली मैत्रीण, संकटात धावून आलेला मित्र, आधार देणारा सहकारी—ही नातीही आपल्याला सांगून जातात की माणसाला सुरक्षित वाटण्यासाठी रक्ताचं नातं असणं आवश्यक नाही; विश्वासाचं नातं असणं आवश्यक आहे.

आजच्या पिढीला राखी देताना आपण तिला केवळ एक परंपरा म्हणून देऊ नये. तिच्यामागचा विचारही द्यायला हवा. स्त्रीचे संरक्षण करण्यापेक्षा तिचा सन्मान करणे, तिच्या निर्णयांचा आदर करणे आणि तिच्या स्वातंत्र्याला साथ देणे अधिक महत्त्वाचे आहे. तसेच भावालाही आपल्या भावनांविषयी मोकळेपणाने बोलण्याचा, कमकुवत क्षणी आधार मागण्याचा आणि बहिणीकडून आधार स्वीकारण्याचा तितकाच अधिकार आहे.

बहिणीला राखीच्या बदल्यात महागडी भेटवस्तू देणे, पैसे देणे किंवा तिच्या नावावर काहीतरी देऊन आपले कर्तव्य पूर्ण झाले असे मानणे, यापेक्षा तिच्या कर्तृत्वाची दखल घेणे अधिक महत्त्वाचे आहे. तिला ‘घेणारी’ म्हणून नव्हे, तर स्वतःच्या पायावर उभी राहणारी, निर्णय घेणारी आणि कुटुंबाच्या जडणघडणीत समान वाटा उचलणारी व्यक्ती म्हणून पाहणे गरजेचे आहे.

बहिणीला दानाची नव्हे, सन्मानाची गरज आहे. तिच्या शिक्षणाला प्रोत्साहन, तिच्या करिअरला पाठिंबा, तिच्या मताला महत्त्व आणि तिच्या स्वप्नांना मोकळे आकाश—हीच तिच्यासाठी सर्वात मोठी राखीची भेट ठरू शकते.

राखीचा धागा कितीही नाजूक असला तरी त्यात नातं घट्ट बांधण्याची ताकद असते. त्या धाग्यात मालकी नसावी, बंधन नसावे; असावी ती फक्त आपुलकी, विश्वास आणि परस्पर सन्मानाची गाठ.

म्हणून या राखीपौर्णिमेला बहिणीने भावाच्या मनगटावर राखी बांधताना एवढंच म्हणावं—

“तू माझं रक्षण करशील, यापेक्षा मला खात्री आहे की तू माझ्या पाठीशी उभा राहशील. आणि तुझ्या प्रत्येक सुख-दुःखात मीही तुझ्या सोबत असेन.”

कदाचित हाच आधुनिक राखीबंधनाचा खरा अर्थ आहे.

मनगटावरचा धागा काही दिवसांनी जुना होईल, तुटेलही. पण परस्पर विश्वासाचा धागा आयुष्यभर टिकला, तरच राखीबंधन सार्थकी लागेल.

© राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ अनोळखी गुरू… ☆ तृप्ती देव ☆

तृप्ती देव

? मनमंजुषेतून ?

☆ अनोळखी गुरू…  ☆ तृप्ती देव ☆

गुरुपौर्णिमेच्या दिवस होता ऑफिसमधून परतताना एसटी स्टँडवर नेहमीप्रमाणे प्रचंड गर्दी होती.

एका बाकावर मी आणि एक वृद्ध गृहस्थ शांतपणे बसले होतो. साधा पांढरा कुर्ता, हातात जुनी कापडी पिशवी आणि डोळ्यांत विलक्षण शांतता. एकीकडे माझ्या शेजारी एक तरुण सतत मोबाईलवर ओरडत होता. बाबा तुम्हाला काहीच कळत नाही, प्रत्येक गोष्टीत सल्ले देऊ नका, मी आता लहाना राहिलेला नाही, माझं आयुष्य मी स्वतः बघेन, तुम्ही उगाच माझ्या प्रत्येक गोष्टीत ढवळाढवळ करणं बंद करा, असा रोजचाच त्रास झालाय मला तुमचा, असं रागारागाने बोलून त्याने फोन कट केला. त्याच्या चेहऱ्यावर संताप आणि अहंकार स्पष्ट दिसत होता. माझ्या मनालाही वाटलं की आजकालची मुलं आईवडिलांचा आदरच करत नाही. कोणाची परिस्थिती कशी आणि मनस्थिती मला ओळखता. येत नव्हती. नक्की काय झालं हे कळत नाही. पण एका बापाची काळजी समजत होती. कुठलातरी ताण मुलाच्या मनावर होता त्याच्या शब्दातून तो जाणवत होता.

तेवढ्यात समोर बसलेले आजोबा उठले आणि त्या मुलाजवळ गेले. ते रागावले नाहीत किंवा त्यांनी उपदेशही केला नाही. त्यांनी फक्त अत्यंत आपुलकीने त्याच्या खांद्यावर हात ठेवला आणि म्हणाले की बाळा एक विनंती करू. तो चिडून म्हणाला की काय. आजोबा हसले आणि म्हणाले की आज घरी गेल्यावर बाबांच्या खोलीत जा, ते झोपले असतील तर त्यांच्या पायाशी दोन मिनिटं शांत बस. तो हळूच हसला आणि म्हणाला की त्याने काय होणार. आजोबा अतिशय हळुवार आवाजात म्हणाले की काही नाही झालं तरी चालेल,

पण एक दिवस असा येईल की त्या खोलीत पलंग असेल, उशी असेल, त्यांच्या चप्पलाही दारात तशाच असतील, त्यांचा कपड्यांचा वासही खोलीत असेल, फक्त हाक मारायला बाबा नसतील आणि त्या दिवशी पश्चात्तापाचे अश्रू ढाळले तरी ती गमावलेली दोन मिनिटं जगातील संपूर्ण संपत्ती दिली तरी विकत मिळत नाहीत. क्षणभर संपूर्ण स्टँडवर गहिवरलेली शांतता पसरली. त्या शब्दांचा थेट त्याच्या हृदयाला स्पर्श झाला.

आईवडिलांचं असणं हे किती मोठं छत्र असतं आणि आपण काय गमावून बसू शकतो याची जाणीव त्याला झाली. त्याच्या डोळ्यात क्षणार्धात पाणी आलं. त्याने थरथरत्या हातांनी पुन्हा फोन काढला आणि बाबांना फोन लावला. यावेळी त्याचा आवाज पूर्णपणे बदलला होता, गळ्यात हुंदका दाटून आला होता. तो कातर आवाजात म्हणाला की बाबा मला माफ करा, मी खरंच खूप चुकलो, मी आत्ताच घरी येतोय, आज आपण एकत्र बसून चहा पिऊया आणि मला तुमच्याशी खूप बोलायचं आहे. फोनच्या दुसऱ्या टोकाला काय उत्तर आलं माहीत नाही, पण त्या मुलाच्या चेहऱ्यावर पश्चात्तापानंतरचं एक वेगळंच समाधान आणि हसू होतं. मी त्या आजोबांकडे पाहिलं आणि विचारलं की तुम्ही शिक्षक आहात का. 

ते हसले आणि म्हणाले की नाही बाई, मी फक्त आयुष्याकडून शिकलेला विद्यार्थी आहे. इतकं बोलून ते गर्दीत बस मधे चढून निघून गेले. मी त्यांचं नावही विचारू शकले नाही. आज अनेक वर्षांनीही गुरुपौर्णिमा आली की मी देवापुढे दिवा लावते, पण त्याआधी घरातल्या माणसांसोबत दहा मिनिटं बसते. कारण त्या अनोळखी वृद्धाने मला शिकवलं की गुरू तो नसतो जो मोठमोठी प्रवचनं देतो, गुरू तो असतो जो एका वाक्यात आयुष्याचा आणि नात्यांचा अर्थ बदलून टाकतो. त्या अनोळखी माणसाचं नाव मला आजही माहीत नाही, पण प्रत्येक गुरुपौर्णिमेला मी मनात त्यांना नमस्कार करते. कारण काही गुरू पुस्तकात भेटतात, काही मंदिरात आणि काही अचानक एखाद्या एसटी स्टँडवर. मनामध्ये गुरुचे स्थान मिळवतात.

असे गुरू कोणत्याही शाळेच्या पाटीवर किंवा पुस्तकात नसतात, तर ते आयुष्याच्या वळणावर अचानक भेटतात. त्यांची एकच साधी गोष्ट आपल्याला नात्यांचं खरं मोल शिकवून जाते. कोणतीही अपेक्षा न ठेवता मनाला स्पर्श करून आयुष्य बदलणारा हाच अनुभव खऱ्या अर्थाने गुरू असतो.

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© तृप्ती देव

भिलाई, छत्तीसगड.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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