हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक समसामयिक परिप्रेक्ष्य को संदर्भित रचना– शाँति-दूतों के नाम…!
☆ ॥ कविता॥ शाँति-दूतों के नाम…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०९ ☆
आलेख – साहित्यिक पत्रकारिता की चुनौतियां श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन वर्तमान समय में किसी दुर्गम हिमालयी चढ़ाई से कम नहीं है क्योंकि यह केवल मुद्रण का व्यवसाय नहीं बल्कि एक वैचारिक प्रतिबद्धता का अनुष्ठान है। आज के इस तीव्र गति वाले डिजिटल युग में जहाँ सूचनाएं पलक झपकते ही स्मृति से ओझल हो जाती हैं वहाँ एक गंभीर साहित्यिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन करना अपनी संस्कृति और भाषा के प्रति अगाध प्रेम का ही परिणाम हो सकता है।
कितनी ही साहित्यिक पत्रिकाएं बड़े उत्साह से प्रारंभ की जाती हैं, किन्तु पाठकीय समर्थन ना मिलने से या आर्थिक समस्याओं के चलते, विज्ञापन नहीं मिल पाने से अनेक उतनी ही जल्दी बंद भी हो जाती हैं। साहित्यिक पत्रकारिता के समक्ष सबसे पहली और बुनियादी चुनौती आर्थिक आत्मनिर्भरता की ही है क्योंकि व्यावसायिक पत्रिकाओं की तरह इनके पास विज्ञापनों का बड़ा आधार नहीं होता और यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अर्थ प्रबंधन या सुधि पाठकों के सहयोग पर टिकी होती है। जबलपुर से विश्व वाणी हिंदी संस्थान के बैनर तले दिव्य नर्मदा और मंडला से महिष्मति जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशन के दौरान मैंने इन धरातलीय संघर्षों को करीब से जिया है जहाँ बढ़ती मुद्रण लागत और डाक व्यय की चुनौतियों के चलते कई बार उत्कृष्ट प्रयासों को भी विराम देना पड़ता है।
कागज की बढ़ती कीमतों और वितरण की जटिलताओं ने लघु पत्रिकाओं के अस्तित्व पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है, हम देख रहे हैं कि इसी कारण कई ऐतिहासिक प्रिंट पत्रिकाएं दम तोड़ रही हैं। हालांकि संकट के इसी दौर ने तकनीक के माध्यम से एक नया मार्ग भी प्रशस्त किया है जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारा ई-अभिव्यक्ति पोर्टल है। वेब पत्रकारिता के नए प्रतिमान स्थापित करते हुए इस मंच ने सात लाख अड़सठ हजार से अधिक हिट्स प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सामग्री स्तरीय हो, नियमित प्रकाशन किया जाए तो पाठक भौगोलिक सीमाओं को लांघकर जुड़ता है।
त्वरित संपादन और वैश्विक पहुंच के कारण यह पोर्टल पारंपरिक साहित्यिक पत्रकारिता और आधुनिक तकनीक का एक प्रभावी संगम बनकर उभरा है जहाँ पंद्रह अक्टूबर दो हजार अठारह से हमारी टीम निरंतर साहित्यिक अलख जगा रही है।
प्रिंट मीडिया के अपने गौरव और डिजिटल की अपनी गति के बीच समन्वय साधना ही आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
एक बड़ी चुनौती नई प्रतिभाओं के चयन और परिष्कार की भी है क्योंकि आज रचनाओं की बाढ़ तो है लेकिन गुणवत्ता का अकाल पड़ता जा रहा है। ऐसे में संपादक का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह आत्ममुग्धता के इस दौर में श्रेष्ठ और कालजयी साहित्य को पहचानकर उसे स्थान दे। वैचारिक और संवैधानिक चुनौतियों के बीच निष्पक्षता बनाए रखना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मर्यादा के बीच एक महीन संतुलन साधना पड़ता है।
ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से फ्लिप बुक बनाना, जैसे नवाचारों ने यह दिखाया है कि कैसे दीपावली विशेषांकों की परंपरा को आधुनिक बदलते प्रकाशन चोले में जीवित रखा जा सकता है, और बढ़ते डाक व्यय से निपटकर एक क्लिक में उसे दुनिया में कही भी पहुंचाया जा सकता है।
आब ओ हवा पोर्टल पर मैं नियमित स्तंभ लिख रहा हूं, मेरा अनुभव यही है कि अब युवाओं में प्रकाशित साहित्य की जगह, पॉडकास्ट, ई बुक, किंडल बुक्स आदि अधिक लोकप्रिय है।
अंततः साहित्यिक प्रकाशन केवल पन्नों का संकलन नहीं बल्कि एक जीवंत संवाद है जो अतीत की विरासत को भविष्य के सपनों से जोड़ता है। यदि समाज और सरकारें इन वैचारिक केंद्रों को संरक्षण नहीं प्रदान करेंगी तो आने वाले समय में हमारी बौद्धिक चेतना का धरातल संकुचित हो जाएगा। चुनौतियों के इस महासागर के बीच जो पत्रिकाएं और वेब पोर्टल निरंतर सक्रिय हैं वे वास्तव में शब्द की मशाल लेकर अंधेरों से लड़ने वाले प्रहरियों की तरह हैं जिनकी तपस्या ही साहित्य को सजीव बनाए रखे हुए है। प्रिंट के संघर्षों से लेकर वेब पत्रकारिता के इस नए आकाश तक की यात्रा यही सिखाती है कि माध्यम चाहे जो भी हो निष्ठा और गुणवत्ता ही अंततः पाठक के हृदय में स्थान बनाती है। दिव्य तूलिका इसी संघर्ष की आग में तप कर, मुरैना जैसे एक छोटे शहर से, अवस्थी जी के व्यक्तिगत प्रयासों से निखर रही है। मेरी अशेष मंगल कामनाएं सदैव पत्रिका के साथ हैं।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक कविता “विश्व प्रेम आराधना… ”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “आशीर्वाद के अक्षत”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆
🌻लघुकथा🌻 💐आशीर्वाद के अक्षत 💐
आजकल पैसों से गरीब कोई नहीं होता। जो गरीब दिखते हैं वास्तव में वह कुछ करना ही नहीं चाहते या फिर एकदम बेसहारा लाचार प्राकृतिक आपदा दिव्यांगता।
इन चीजों को परे हट कर देखा जाए तो आज वास्तव में पैसा संस्कार, श्रद्धा, अपनापन, रीतरिवाज, मर्यादा, सम्मान सब भूला देता है। भीषण युद्ध का समाचार पढ़ते- पढ़ते अचानक पेपर पर निगाह दौड़ रही थी।
एक पूंजीपति इंसान की दर्दनाक मौत। वजह अकेलापन, अपनों की याद, जकड़े हुए रिश्ते और बोझिल होती साँसे।
आसमान साफ परंतु हल्की सी बूंदाबांदी मानो कह रही हो राहत तो अपनों से ही मिलती है। पर अपने है कहाँ??
तभी दरवाजे पर दस्तक। चश्मे से निहारते नयन दरवाजे पर जाकर अटकी। सामने महीने बंदी सामान लेकर आने वाला किराना व्यापारी खड़ा था। मालती— सुनिए भैया इस बार का राशन का सामान आप इस पते पर पहुंचा दीजिएगा।
व्यापारी बोला – – क्या बात है मैडम कहीं जा रही है और यह किसको देना है।
मालती ने बड़े भोलेपन और खुशी जाहिर करते हुए बोली– वह हम अपने बेटे के यहाँ जा रहे हैं। यहाँ घर पर जो बनेगा वह सब वहाँ बन जाएगा।
व्यापारी – मैडम बेटे के यहाँ सामान लेकर जा रही है? मैं कुछ समझा नहीं। अपना ही बेटा है न?
हमारा ही बेटा है। खूब बड़ी कंपनी में नौकरी करता है। कल उसने फोन पर कहा है–अपना दो-चार दिन रहने का इंतजाम करके आना।
मुझे समय नहीं मिल रहा हैअब कुछ खाना है। तो ले जाना पड़ेगा और उसे उपहार में कुछ देना पड़ेगा। उपहार ही समझो। पर चिंता न करो हम कुछ दिन उसके घर पर ही रहेंगे।
जलती तवे पर पानी की बूँदे जैसे चटपटाती है, ठीक उसी तरह उसके हृदय के बोल निकल रहे थे। बाबूजी की आवाज – – अब छोड़ो भी बच्चों के पास जा रहे हैं क्या यह काम है।
जन्मदिन पर बुलाया है आशीर्वाद के अक्षत तो लेकर जाना ही है। व्यापारी को आशीर्वाद के अक्षत और उपहार का सामान समझते देर न लगी। वह बोला– ठीक है जल्दी आ जाईयेगा और अपना ध्यान रखिएगा
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७३ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग-१☆ श्री राकेश कुमार ☆
घर का चूल्हा ना जले, तो कितना बड़ा पहाड़ टूट पड़ता हैं। आप लोग अभी ये अनुभव नहीं करें होंगे। पुरानी कहावत है, जिस तन लगे वो ही तन जाने”, जिनको समझ ना आया हो तो ” it is bearer who knows where shoe pinches”
कल एक पुराने साथी का फोन आया, उसने बताया कि दस वर्ष पूर्व वो जयपुर में अपना गैस का कनेक्शन जमा करवा कर अपने गृह नगर आ गया था। अब उसको गैस बुक नहीं करने दी जा रही है। जयपुर के कनेक्शन के समय उसका आधार कार्ड लिंक किया गया था। उसको एजेंसी ने डिएक्टिवेट नहीं किया है।
मित्र ने ये भी कह दिया, यदि मेरा काम नहीं हुआ तो, वो अपने गृह नगर से हमारे यहां आ जायेगा। उसकी इस धमकी से हम भी डर गए, और तुरंत गैस एजेंसी चल पड़े।
गैस एजेंसी की दुकान से पांच सो गज़ पूर्व वाहन प्रतिबंधित थे। जिस तरफ भीड़ जा रही थी, हम भी उसका हिस्सा बन गए, अधिकतर लोग खाली सिलेंडर साथ लिए हुए थे।
हमें भी कुंभ मेले की याद आ गई, वहां जैसा मोहाल था। ऐसा लग रहा था आगे त्रिवेणी संगम हैं। सब हमसे आगे जाते हुए प्रतीत हो रहे थे। हम तो भरपेट भोजन किए हुए थे, इसलिए धीरे चल पा रहे थे। भीड़ वाले चेहरे परेशान से नज़र आ रहे थे। मानो कई दिनों से बिना भोजन किए जल्दी में थे। कुछ लोग वापिस भी आ रहे थे। खाली पेट “करो या मरो” जैसी स्थिति होती हैं। हमारे यहां भी कहा गया है, “भूखे भजन ना होई गोपाला”
अब हमें भी भूख लग रही है, आगे की जानकारी के लिए भाग 2 का इंतजार करें।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खिलाड़ी भावना…“।)
अभी अभी # ९६५ ⇒ आलेख – खिलाड़ी भावना श्री प्रदीप शर्मा
अगर किसी खेल में हार-जीत न हो, तो खेल का मज़ा ही क्या ! हर खेल जीतने के उद्देश्य से ही खेला जाता है। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है। हारे को हरि नाम।
हर खेल में एक ही भावना होती है, प्रतिद्वंद्विता की भावना ! खेल की एक ही नीति होती है, रणनीति ! अगर भाई भाई भी कोई खेल खेलते हैं, तो एक हारता है, और एक जीतता है। महाभारत में युधिष्ठिर ने जुआ खेला था। पासे उल्टे पड़ते गए, वे सब कुछ हारते चले गए। राजसभा देखती रही, विदुर, भीष्म, कृष्ण कुछ न कर पाए और युधिष्ठिर द्रौपदी को भी हार बैठे। जहाँ शकुनि सामने होता है, हमेशा पासे उल्टे ही पड़ते हैं।।
आजकल सभी खेल पेशेवर हो गए हैं ! जीतने वाले को अगर बड़ी राशि और बड़ा पदक दिया जाता है, तो हारने वाले भी करोड़पति होने लग गए हैं। winner न सही, runner ही सही।
राजनीति भी एक खेल ही है ! यह सेवा का खेल है ! जो जीतेगा, सरकार बनाएगा, वही सेवा करेगा, जो हारेगा, वह न तो खेल छोड़ेगा और न ही सेवा करेगा। उसका खेला तो अब शुरू होता है। जो जीता है, उसे नहीं खेलने देना। वह एक ऐसी कबड्डी का खेल खेलता है, जिसमें सिर्फ टांग खींची जाती है। अगर सामने वाला गिर गया तो बच्चों की तरह ताली बजाई जाती है।।
खेल हो या राजनीति, जीतने के लिए हर तरह के खेल खेले जाते हैं। शक्ति प्रदर्शन, सूझबूझ और साम, दाम, दंड भेद सबका सहारा लिया जाता है। एक खेल मिलीभगत का भी होता है। जहाँ आर्थिक लाभ के लालच में शक्तिशाली हार जाता है और कमज़ोर विजयी हो जाता है। आईपीएल की भाषा में इसे सट्टा कहा जाता है। यह खेल भावना के विपरीत है।
राजनीति में चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। ये कंडे गोबर के होते हैं और हाथ से बनाये जाते हैं। जब कभी ये हथकंडे भी काम नहीं आते, तो यही कहा जाता है, सारा गुड़ गोबर हो गया। पैसा, शराब और चुनावी वादे भी हथकंडों की श्रेणी में ही आते हैं।।
हमारे देश में दो ही तो राष्ट्रीय खेल हैं, राजनीति और क्रिकेट। राजनीति में खिलाड़ी भावना वैसे तो कम देखने को मिलती है। लेकिन सौजन्यवश, अगर जीता हुआ प्रत्याशी, हारे हुए प्रत्याशी को उसके घर जाकर बधाई दे दे, तो इसे खेल भावना का परिचय कहा जा सकता है।
चूँकि खिलाड़ी भावना, जिसे अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करने के लिए अंग्रेज़ी में स्पोर्ट्समैन स्पिरिट कहते हैं, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, खेल से जुड़ी होती है, इसलिए आज भी खेल की हार-जीत केवल खेल के मैदान तक ही सीमित होती है। बाद में सभी हारे हुए, और जीते हुए खिलाड़ी पुरस्कार समारोह में एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं, बधाई देते हैं। और खेल समाप्ति के बाद साथ साथ शॉपिंग करते हैं, प्रशंसकों को ऑटोग्राफ देते हैं।।
कितना विचित्र संयोग है ! इस बार चुनाव और आईपीएल टी-20 टूर्नामेंट, तकरीबन, साथ साथ ही चल रहे हैं। एक ओर अगर विश्व के सभी क्रिकेट के धुरंधर अपनी राष्ट्रीयता भूल एक बैनर के तले, पेशेवर तरीके से ही सही, अपनी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं, कोई जीत रहा है, कोई हार रहा है, लेकिन प्रशंसक हर बॉल पर, और हर शॉट पर तालियाँ बजा रहे हैं और स्टेडियम में बैठे दर्शक ही नहीं, घरों में टीवी के सामने बैठे शौकीन और जानकार इस जेंटलमैन’स् गेम अर्थात सभ्य पुरुषों के खेल का आनंद ले रहे हैं, तो दूसरी ओर चुनावी माहौल में केवल एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा है। लोकतंत्र के पवित्र उत्सव का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।
चलिए मान लिया, everything is fair in love and war ! लेकिन क्या हम चुनावी हार जीत को क्रिकेट की हार जीत की तरह नहीं ले सकते ? नहीं कदापि नहीं ! ये चुनाव देश का भविष्य निर्धारित करेंगे, देश का भाग्य बदलेंगे। और हम मतदाता भाग्य-विधाता हैं। हमारे लिए यह चुनाव जीवन मरण का प्रश्न है। आईपीएल कोई भी जीते, हमें कोई मतलब नहीं। हमारा ध्यान तो इस ओर है कि इस बार किसकी सरकार बनती है। कोई खिलाड़ी भावना नहीं। खुला खेल फरूखाबादी।।
‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ – नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा सेमिनार आयोजित
आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय के सहयोगी 17 देश 455 एकड़ का विशाल परिसर प्राचीन और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत संगम ।
नव स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा आयोजित ‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार (28-29 मार्च) में वक्ता के रूप में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इस विश्वविद्यालय को 17 देशों के सहयोग से पुनर्जीवित किया गया है। भारत सरकार ने 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया और बिहार में राजगीर के पास ही 2014 में इसका शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हुआ। इस विश्वविद्यालय का नवीन परिसर 455 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है जो प्राचीन नालंदा और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत उदाहरण है । भारत सहित विभिन्न देशों के लगभग 700 विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास पांचवीं शताब्दी में शुरू होता है जब गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने बिहार के राजगीर में 427 ई के लगभग इसकी स्थापना की थी और इसे बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र माना जाता था ।यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था जिसमें 10, 000 से अधिक छात्र और लगभग 2000 शिक्षक थे। चीन, तिब्बत, जावा, जापान कोरिया, म्यांमार, कंबोडिया श्रीलंका आदि देशों से यहां छात्र अध्ययन के लिए आते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने यहां कई साल रहकर अध्ययन किया और नालंदा के वैभव को दुनिया तक पहुंचाया। विश्वविद्यालय का 9 मंजिला पुस्तकालय जिसे धर्मगंज कहा जाता था, में ज्ञान का विपुल भंडार था। यह विश्वविद्यालय 800 वर्षों तक शिक्षा और शोध का वैश्विक केंद्र बना रहा ।ज्ञान की इस विशाल ज्योति को 1193 इस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने बुझा दिया किंतु नालंदा विश्वविद्यालय अब पुनः अपने वैभव को अर्जित करने के लिए कुलपति प्रो. सतीश चतुर्वेदी के नेतृत्व में प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्री श्याम परांडे, सचिन श्री गोपाल अरोड़ा और निदेशक श्री नारायण कुमार को इस सफल आयोजन के लिए बधाई और धन्यवाद।
साभार – डॉ जवाहर कर्णावट
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈