हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शृंगार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शृंगार ? ?

वह करती है शृंगार

परतें ढाँपे रखती हैं

काया और मन की

असंगति-विसंगति,

शृंगार स्त्रीत्व का

सच्चा पहरेदार है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४९ – कविता – राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४९ ☆

☆ कविता ☆ ~ राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सीता  का  संताप  बड़ा  था,  बीता  जीवन  संघर्षो  में ।

राघव  का  दुःख  भी कम न था,  आया सुख के वर्षो में।।

*

पर अग्नि में तप कर कैसे से, सोना निज चमक दिखाता है।

सीता  का  तप  तपकर मानो, राघव को विजय दिलाता है।।

*

सीता  शब्द  राम  दोनों  मिल,  महामन्त्र  बन   जाते  है।

ध्वजा शिखर की आज  कह  रही,  राम अवध में  आतें  हैं।।

*

सीताराम  शब्द  दोनों  मिल  मानवता  का  मान  बढ़ते हैं।

जीवन   जीने   के   कौशल   को  कौशलेंद्र  बतलाते  हैं।।

*

कैसे   रिश्ते   जिए   जाते   किससे   कैसा   नाता  हो।

वह  भी  जीवन  जी  सकता है, जिसको कुछ न आता हो ।।

*

आदर्शो  को   मानदंड   पर   कैसे    नापा   जाता   है।

राम  तुला  हैं  मानवता  के,  रिश्तों  को तौला  जाता  है।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग – ३० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग- ३० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

6.सतपुड़ा वन भ्रमण

तवा नर्मदा की सबसे लंबी सहायक नदी है, जिसकी लंबाई 117 किमी है। यह उद्गम से उत्तर और पश्चिम में बहते हुए होशंगाबाद जिले के बांद्रा भान गांव में नर्मदा में मिल जाती है। सारणी के पहाड़ों, जहां से तवा नदी निकली है, से बांद्राभान की दूरी अंदाज़न 100 किलोमीटर है लेकिन तवा नदी का बहाव 117 किलोमीटर कैसे हो सकता है? क्यों नहीं हो सकता? नदी रसिक आदमियों की तर्ज़ पर सीधी नहीं बल्कि टेढ़ी-मेढ़ी चाल से चलती है। आख़िर नदी भी झरनों से रस समेटते और जीवों को रसारस करते उद्गम से गंतव्य तक की यात्रा तय करती है। इस कारण उसकी वास्तविक लम्बाई सतही लम्बाई से अधिक होती है, जैसे मूर्ख व्यक्ति की ज्ञान पूर्ण बातें घुमावदार शब्दों से खिंचकर बहुत लम्बी होती जाती है।

श्री गोपाल ने दार्शनिक अन्दाज़ में बोलना प्रारम्भ किया- देनवा अपने पिता के घर सतपुड़ा से अपने आँचल में अमृत कलश भर-भर कर लाती है। अनादि काल से उसके उद्गम से लेकर तवा में समाहित होने तक उसके दामन में और आसपास जल-जंगल-ज़मीन पर जीवन-मृत्यु के अद्भुत खेल चलते आए हैं। मृत्यु के आश्चर्यजनक खेल को जितने नज़दीक से उसने देखा है और कोई नहीं देख पाता। मृत्यु-जीव का खेल शिकार-शिकारी सा होता है। मौत रूपी शिकारी के पंजे में जब जीव रूपी शिकार आता है याने शेर जब शिकार को दबोचकर उसकी इहलीला समाप्त करने लगता है तब जीव को जीवन का मोह और तेज़ी से जकड़ता है। मौत की तरह शेर एक सबसे कुशल और मज़बूत शिकारी और हिरण की तरह जीव सबसे आसान शिकार है। हिरण की नज़र एक बार शिकारी से मिली तो वह सम्मोहन में थगा सा रह जाता है। जीवन का मोह त्याग देता है। शेर मृत्यु की तरह दबे पाँव आ कर मोह रहित हिरण के गला को जबड़े से दबा उसकी गर्दन को झटके से तोड़ कर उसकी इहलीला क्षण मात्र में समाप्त कर देता है। देह के भीतर और बाहर समस्त ब्रह्मांड में शिकार का एकांकी अनवरत घटित हो रहा है।

शेर जब किसी सघन मोहग्रस्त बड़े जानवर जैसे भैंसा या हाथी का शिकार करने की कोशिश करता है तो संघर्ष लम्बा खिंचता है। नाटक में कई पटाक्षेप होते हैं। शिकार ताक़तवर होने के कारण जीवन का मोह आसानी से नहीं त्यागता है। शेर उसके पिछली टाँग की रान पजों के नाखूनों से खरोंच कर नस को काटने की कोशिश करता है ताकि शिकार का ख़ून बहने से वह कमज़ोर हो जाए, फिर काटी गई जगह को दाँतों से काट बड़े घाव में बदलता है। जीवन-मृत्यु का संघर्ष लम्बा खिंचता जाता है। जानवर दुलत्ती मारकर मृत्यु को भगाने की कोशिश भी करता रहता है। शेर बाजु में आकर शिकार के कंधे पर चढ़कर गर्दन पकड़ने की कोशिश करता है तो भैंसा उसे धनवान रोगी की तरह धन रूपी सींगों से उछालकर दूर फेंकना चाहता है। अस्पताल का बिल बढ़ता जाता है। शिकार जीवन से मोह में समर्पण नहीं करता तो तकलीफ़देह संघर्ष की अवधि और लहू-लूहान स्थिति लम्बी खिंचती जाती है। न यम हार मानता है और न जीव मोह त्यागता है। अंत में हारना जीव को ही है, उसे अंततः देह त्यागना ही होता है। बच नहीं सकता। इस संघर्ष को अस्पताल जितना लम्बा खींच सकें, खींचते चले जाते हैं। उस हिसाब से बिल भी लम्बा खिंचता जाता है।

हमने कहा- हाँ, देह त्याग में सबसे बड़ी बाधा मोह है। अनवरत जीवन का मोह, इंद्रियसुख का मोह, संतान का मोह, धन का मोह। ये सब मिलकर जीवन के मोह को सघन बनाते हैं। आदमी मृत्यु से भागता है। मृत्यु उतनी ही तेज़ी से उसे जकड़ती है। अधिकांश लोगों को अंत समय में अक्सर धन का मोह सर्वाधिक होने लगता है। धन मृत्यु को कुछ समय के लिए टाल सकता सा प्रतीत होने के कारण एक सुरक्षा बोध देता है। दुनिया में सबसे तकलीफ़देय मौत यमदूत शेर की होती है। कभी बूढ़े शेर को चिड़ियाघर में देखिए। वह कितना निरीह, बेबस और उदास जीवन से हारा नज़र आता है। जब वह खुले जंगल में शिकार करने योग्य नहीं रह जाता तो कई दिन तक तड़फ-तड़फ कर भूखा मरता है। पानी भी नहीं पी पाता है। उसकी माँस पेशियाँ लटक जातीं हैं। वह अपना बोझ भी नहीं उठा पाता। निशक्त एक जगह पड़ा रहता है। बड़ी दर्दनाक मौत मरता है। ऐसा लगता है कि प्रकृति उससे सारी निर्ममता और निर्दयता का हिसाब बराबर कर रही है।

श्री कृष्ण ने भी दार्शनिक हवन में हव्य अर्पित किया- देनवा के दामन में मौत का  खेल शिकार भी एक कारोबार रहा है। शेर जंगल का सबसे सुंदर और ताक़तवर जानवर होता है। उसकी दहाड़ सामने वाले के होश को हिलाकर रख देती है। वह जब तक भूखा न हो शिकार नहीं करता। आदमी पर वह दो दशाओं में हमला करता है। बूढ़ा या घायल हो जाने से शिकार करने लायक हालत में न रहने पर या उसे लगे कि कोई उस पर हमला करने वाला है। शेर यदि आदमखोर हो जाए तो वह फिर आदम माँस की जुगाड़ में रहता है। उसे मानव माँस का नमकीन स्वाद भाता है। इसलिए आदमखोर जानवर को मारना ही पड़ता है। लोग शिकार अपने शौक़ या लालच के कारण भी करते थे। पहले सतपुड़ा से नर्मदा तक शेरों की अच्छी ख़ासी आबादी थी। दसवीं और ग्यारहवीं सदी में राजस्थान और गंगा के मैदान से क़ाफ़िले के क़ाफ़िले आकर जंगलों को साफ़ करके खेती करने लगे। जानवरों को मजबूरी वश पहाड़ी तलहटी में खिसकना पड़ा। जंगल का नियम है कि हर ताक़तवर कमज़ोर को हज़म कर जाता है, यह जंगल में पूरी सच्चाई से लागू होता है परंतु  आदमियों के निष्ठुर समाज में सच्चाई-बेइमानी का कुछ पता ही नहीं चलता है। कौन कब सच्चा है और कब  झूठा। जानवर यदि शिकार कर रहा है तो पूरी जानकारी और चेतावनी के साथ। आदमी शिकार करता है परंतु न तो चेतावनी देता न सँभलने का मौक़ा और न ही कभी अहसास होने देता कि वह शिकार करने वाला है।

देनवा किनारे कई शिकारी आकर तंबू में कई रात बिताते थे। उनमें कई बहादुर होते थे और कई बहादुरी ओढ़ते थे। यह सिलसिला हुशंगशाह के एक उप-कोतवाल मुहम्मद शाह के समय से शुरू होता है। वह अफ़ग़ान शिकार का शौक़ीन था। अपनी बेगमों के साथ जंगल में डेरा डालता था। उसके सैनिक उसकी सुरक्षा और खाने-पीने का सारा इंतज़ाम करके आते थे। उसने जंगल में रहने वाले गौंड़ लोगों को शिकार में साथ देने के हिसाब से तीर चलाने, हाँका लगाने और जाल बिछाकर ख़ूँख़ार जंगली जानवरों को फंदा डालकर फाँसने की कला में प्रशिक्षित कर रखा था। वह नंगी तलवार और तीर कमान लेकर ऊँचे मचान पर बैठ जाता। चारों तरफ़ से घने ऊँचे पेड़ों से घिरे छोटे मैदान में नौ-दस गज़ गड्ढा करके जाल बिछा दिया जाता। उसके बाद बीस-पच्चीस लोग हथियार बंद होकर शेर को हाँका लगाकर उस मचान के नीचे गड्ढे की ओर हाँकते या गड्ढे के बीच में एक खम्भे पर पटिया रखकर एक बकरा शेर को ललचाने वास्ते बाँध दिया जाता था। शेर के जाल में गिरते ही चारों तरफ़ के पेड़ों पर बैठे तीरंदाज़ उसके शरीर को तीरों से भेद देते थे। जिसमें मुहम्मद शाह के तीर भी होते थे। मुहम्मद शाह के दरबारी शेर के मर्मस्थल पर लगे तीर को शाह का तीर बताकर ईनाम पाते। शाह का सीना गर्व से फूल जाता। वह नज़रों ही नज़रों में बेगम से शाबाशी पाकर पेड़ से नीचे उतर कर मृत शेर का मुआयना करके मर्मस्थल पर लगे तीर को बेगम को दिखाते हुए शिकार की कुछ बारीकियाँ बताता जो बेगम को बिलकुल भी समझ ना आतीं परंतु वह खाविंद की बलैयाँ लेने से न चूकती।

शिकारी शेर की दहाड़ को छोड़कर उसके शरीर के हर हिस्से का उपयोग करते थे। उसकी खाल को तुरंत ही उतारना ज़रूरी होता था। आठ-दस घंटे की देरी होने से खाल उतारने में कठिनाई होती और खाल ख़राब हो जाती थी। खाल उस ज़माने में 700-800 कलदारों में बिकती थी जबकि कोतवाल का वेतन मात्र 125 कलदार होता था। उसके नाख़ून, बाल, दाँत और आँख भी अच्छी क़ीमत में बिकते थे। सूबे और दिल्ली के दरबारी इन चीज़ों को ख़रीदते थे। इन चीज़ों को उपयोग धीमा ज़हर बनाने में होता था या कमोत्ताजक दवाइयों में काम आती थीं। माँस को मसाला लगाकर और सुखाकर लिवर किडनी की बीमारी ठीक करने में और हड्डियों का चूरा बनाकर कमर घुटनो और हड्डियों की कमज़ोरी दुरुस्त करने में उपयोग किया जाता था। उसकी हड्डियों को शराब में कई दिन तक डुबो कर शराब को ज़्यादा उत्तेजक और पाचक बनाया जाता था। शायद तभी से दो पैग गले के नीचे उतरने के साथ ही शराबी शेर सा दहाड़ने लगता है।

मुग़लों के साथ बारूद आ गई थी तो भरमार शिकार के काम में लाई जाने लगीं थीं। अंग्रेज़ों के आने के बाद सतपुड़ा शिकारगाह का स्वर्ग हो गया था। शेर की खाल, बाल, दाँत, आँख और नाख़ून की यूरोप के बाज़ारों में अच्छी क़ीमत मिलती थी। लोग समझते हैं शिकार बहादुरी दिखाने के लिए किया जाता था। शिकार की जड़ में लालच थी। इन जंगलों में अनगिनत शेर थे। जिनका बेरहमी से शिकार करके धन कमाया गया था। अब शेरों को बचाने के लिए पैसा बहाया जाता है। मेरे चारों तरफ़ बियाबांन जंगल में अनगिनत शेर थे। शेरों और अन्य जानवरों के शिकार का यह आलम था कि सोहागपुर में पुराने “बी” केबिन के सामने एक हड्डा साईडिंग रेल लाइन अंग्रेज़ रेल्वे ऑफ़िसर द्वारा बनाया गया था। जहाँ मालगाड़ी के डिब्बों में लादने हेतु जंगली और पालतू पशुओं की हड्डियों के ढेर लगाए जाते थे। सागौंन की लकड़ी जानवरों की हड्डियाँ और शेर के विभिन्न अंग सोहागपुर से बॉम्बे होकर पानी के जहाज़ से इंग्लैंड भेजे जाने लगे थे। अंग्रेज़ लॉटसाहब स्मिथ ने पारसी ठेकेदार पेस्टोंन ने साथ मिलकर इस धंधे से ख़ूब कमाई की थी। बहुत बाद में मौलवी साहिब और वॉन साहिब भी अपने दोस्तों के साथ शिकार खेलने जाते थे।

हमने बताया- जब कैप्टन जैम्स फॉरसोथ 1861 में पचमढ़ी की मुहिम पर था तब उसने मिट्टी की खुदाई करने हिंदुस्तानी लोगों को काम पर लगाया। जिन्हें कुली कहा जाता था। वे मिट्टी खोदकर सड़क बनाते थे। तब कुलियों की एक बस्ती पिपरिया-पचमढ़ी के बीच एक छोटे से पठार पर बस गई, वही बस्ती मटकुली (मिट्टी खोदने वाले कुली) नाम से अब तक आबाद है।

कैप्टन जैम्स फॉरसोथ पिपरिया से पचमढ़ी तक सड़क बनाता चल रहा था। पिपरिया से मटकुली तक सड़क बनने के बाद आगे काम जारी रहा। मटकुली से पचमढ़ी के बीच एक जगह पर कुलियों को पगार देने के लिए बुलाया जाता था, वह जगह पगारा नाम से आबाद हो गई। आगे आम के पेड़ों से आबाद एक जगह थी। जहां लोग थकान से राहत पाने सुस्ताते थे। वहाँ एक गाँव बस गया। वह बारीआम हुआ। इस तरह पचमढ़ी की खोज में मटकुली, पगारा और बारीआम आबाद हुए थे।

जनश्रुति के अनुसार भभूत सिंह पचमढ़ी के पास पगारा के निवासी थे, सही जान नहीं पड़ता। वे क्षेत्र में अंग्रेजों के दखल के खिलाफ थे। उन्होंने पगारा तक मार करके जीत लिया होगा इसलिए पगारा उनके नाम के साथ जुड़कर किंवदंती में चल पड़ा। वे हर्राकोट के निवासी हो सकते हैं। उन्होंने 1857 की पहली क्रांति के दौरान तात्या टोपे को छुपने में मदद की। अंग्रेजों ने भभूतसिंह को अपने झांसे में लेने की बहुत कोशिश की। कोरकू जाति के मवासी आदिवासी भभूतसिंह का कहना मानते थे। इस कारण अंग्रेज यहां के प्राकृतिक सौंदर्य पर कब्जा नहीं जमा पा रहे थे। अंग्रेज पचमढ़ी को हथियाना चाहते थे। उनको रास्ते से हटाने का षडयंत्र रचा गया। उस समय भभूत सिंह के साथ हुल्ली भोई का भी एकछत्र राज्य था। अंग्रेजों ने फतहपुर के नबाव आदिल मोहम्मद खान को लालच देकर पगारा भेजा। जब वह कोशिश में नाकाम रहा तो दोनों को घेर कर मरवा देने का निर्णय किया गया।  

पिपरिया के समाजवादी चिंतक गोपाल राठी ने फ़ोन पर बताया कि “फतहपुर बनखेड़ी के पास एक गौंड रियासत थी जो तीन भागों में विभाजित थीl नदी पूरा, बीच पूरा और फतेहपुर। इन तीनो के जागीरदार अलग-अलग थेl भभूत सिंह मालगुज़ार थे। पचमढ़ी के लिए बनखेड़ी से फतहपुर होते हुए मटकुली और मटकुली से पचमढ़ी जाने का मार्ग बनाने की तैयारी थी, लेकिन फतहपुर के गौंड राजा ने यह मंज़ूर नहीं किया इसलिए यह मार्ग पिपरिया से मटकुली और मटकुली से पचमढ़ी तक बना। भभूत सिंह को अंग्रेजों ने धोखे से उस समय पकड़ा था जब वे फतहपुर में सो रहे थे।

बाघों की गिनती करने साथ आए श्री गोपाल गांगुड़ा बता रहे हैं – भैया, नागद्वारी यात्रा के दौरान अंडमान-निकोबार और केरल-कन्यकुमारी से आए काले बादल गोंड़-कोरकु की तरह महादेव पहाड़ पर चढ़ने के लिए आपस में खूब लड़ते-झगड़ते हैं, गरजते और चमकते हैं, गुत्थम-गुत्था होते हैं, कोई नहीं जीतता तो दोनों छोटे बच्चों जैसे झारझार रोने लगते हैं। तब ये सब पर्वत उनके आँसुओं से तरबतर होकर असंख्य झरनों को बहाने लगते हैं। लोगों के नौतपा से तपे चेहरे खिल जाते हैं। उनकी आँखों में ख़ुशी से आँसू झरझर बहने लगते हैं। बादलों के आँसुओं से बहकर कविता लोगों के आँसुओं के झूले में आनंद की पीगें भरकर हिलोरें ले सावनी गीत गाने  लगती है।

कुछ बादल महादेव पर्वत पर बरसते हैं तो कुछ धूपगढ़ और ऊँचा चौंड़ा पर्वत पर धूनी रमा कर बैठ जाते हैं। ऐसा लगता है कि धरती पर इंद्रसभा की तैयारी हो रही है। ग़रज़, कलकल, चहचहाहट, पत्तों पर बूँदों की सरगम इंद्रसभा के नृत्य की तैयारी में झूमने लगते हैं। वक्ष पर कंचुकी कसी उत्तरीय ओढ़े मेनका का ठुमक पदचाप करते प्रवेश का इंतज़ार है। इंद्र देव मदिरा का एक घूँट लेकर इशारा करेंगे और ता—थई—ता-ता- थई- के साथ जल देव और भी रिसाकर बरसेंगे, पवन देव जल देव को किनारे कर नृत्य भंगिमा को उड़ा ले जाने का प्रयत्न करेंगे। लेकिन अभी इंद्र देव की अनुमति नहीं है।

सतपुड़ा के ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ और घने जंगल ऐसे रहस्यों को समेटे हुए हैं जिन्हें कोई भी इसके घने इलाके में जाकर ही इसे खोज सकता है। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों में स्थित सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व का एक हिस्सा है, जो हर साल पर्यटकों की एक बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है। रिजर्व को हाल ही में प्रतिष्ठित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए संभावित सूची में शामिल किया गया था।

हमने उन्हें बताया कि पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व मध्य भारत में मध्य प्रदेश राज्य के सतपुड़ा रेंज में एक गैर-दख़लंदाज़ी  संरक्षण क्षेत्र और बायोस्फीयर रिजर्व है। इसे 1999 में भारत सरकार द्वारा संरक्षण क्षेत्र बनाया गया था। इसमें हिमालय की चोटियों और निचले पश्चिमी घाटों के जानवर भी लाए गए हैं। यूनेस्को ने 2009 में इसे बायोस्फीयर रिजर्व नामित किया था। पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व भारत में मध्य प्रदेश राज्य के होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों के क्षेत्रों में स्थित है। बायोस्फीयर रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 4,926.28 वर्ग किलोमीटर (1,217,310 एकड़) है। इसमें तीन वन्यजीव संरक्षण इकाइयां शामिल हैं:-

बोरी अभयारण्य (518.00 किमी)

पचमढ़ी अभयारण्य (461.37 किमी)।

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान (524.37 किमी)

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित रिजर्व की स्थलाकृति अद्वितीय है, इसकी पश्चिमी सीमा तवा नदी के बैकवाटर द्वारा और उत्तर में देनवा नदी के बैकवाटर द्वारा बनती है। इन विशाल जलाशयों में घूमते समय आपको समुद्र में खो जाने का एहसास होता है। सतपुड़ा पर्वत श्रंखला की ऊँची चोटियाँ दूर से ही दिखाई देती हैं। ये पहाड़ लाखों साल पुराने हैं और टाइगर रिजर्व का हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश की सबसे ऊंची चोटी (1351 मी) धूपगढ़ इस रिजर्व के अंदर स्थित है। मानसून के मौसम में कई गहरी घाटियां शानदार झरने बनाती हैं। रिजर्व के अंदर कई जगहों पर प्राचीन शैल चित्रों को देखा जा सकता है, जो उस समय के आदिम कृतियों को दर्शाते हैं।

यह पेड़ों की लगभग 92 प्रजातियों, स्तनधारियों की 52 प्रजातियों, पक्षियों की 300 प्रजातियों, तितलियों की 130 प्रजातियों और सरीसृपों की 30 से अधिक प्रजातियों का घर है। जिनमें चित्तीदार हिरणों के बड़े झुंड भी शामिल हैं।

यह रिजर्व बड़े पैमाने पर प्रमुखत: साल और सागौन के मिश्रित जंगलों से भरा है। इन मिश्रित वनों में जामुन, बहेड़ा, पलाश, महुआ, साजा, बीजा, तेंदू, अर्जुन, सेमल, सलाई, कुसुम, आचार, आंवला, धामन, लेंदिया, हर्रा और कई अन्य पेड़ प्रजातियां शामिल हैं। मध्य भारत में पाए जाने वाले पेड़ों की सूची प्रदीप कृष्ण की उत्कृष्ट पुस्तक “जंगल ट्री ऑफ सेंट्रल इंडिया” में पाई जा सकती है। रिजर्व के पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली प्रमुख प्रजाति बांस है। घास के मैदानों में भी इलाके का अपना हिस्सा होता है। समय के साथ खाली किए गए गांव समृद्ध घास के मैदानों में बदल गए हैं और विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों के ख़ज़ाने हैं। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश की जीवन रेखा है। नर्मदा को जल देने वाले ये वन इसके पारिस्थितिकी तंत्र की तुलना में कहीं अधिक मूल्य रखते हैं। ये मानसूनी वर्षा के लीवर हैं।

आज, मध्य प्रदेश को भारत के बाघ राज्य के रूप में जाना जाता है, जहां देश में सबसे अधिक बाघ रहते हैं। 2018 की गणना के अनुसार मध्य प्रदेश में 526 बाघ दर्ज किए गए। यहां सतपुड़ा में इन शानदार बिल्लियों की उपस्थिति देखने से महसूस की जा सकती है। रिजर्व के माध्यम से यात्रा करते समय बड़ी बिल्ली की उपस्थिति के बहुत सारे सबूत देखे जा सकते हैं, लेकिन इसे देखने के लिए थोड़ी किस्मत की जरूरत होती है क्योंकि वे अभी तक आने वाले वाहनों और पर्यटकों के साथ समायोजित नहीं हुए हैं। हालांकि पगमार्क और अन्य जानवरों के स्कैट और अलार्म कॉल सफारी के दौरान पूरी तरह से व्यस्त रख सकते हैं।

चित्तीदार हिरण, सांभर, भौंकने वाले हिरण, चौसिंघा, भारतीय गौर, ब्लू बुल, जंगल बिल्ली, जंगली सूअर, भारतीय सियार, बंगाल फॉक्स, धारीदार लकड़बग्घा और रीसस मकाक इस रिजर्व में पाए जाने वाले अन्य स्तनधारी हैं।

बारिश के बाद अक्टूबर में एक बार रिजर्व खुलने के बाद, भारतीय गौर के बड़े झुंडों के दर्शन के साथ पहाड़ियाँ देदीप्यमान हो जाती हैं। गौर के झुंड भोजन की तलाश में पहाड़ियों की ओर चले जाते हैं क्योंकि तराई पानी में डूब जाती है और बांस के बड़े इलाकों में यह प्रजाति बहुतायत में पाई जाती है। जैसे-जैसे गर्मी का मौसम आता है, वे पीछे हटने वाले बैकवाटर्स द्वारा बनाई गई हरी चरागाहों में लौट आते हैं। स्लॉथ बियर को देखने के लिए पहाड़ियाँ भी एकदम सही हैं।

रिजर्व में जंगली कुत्तों याने ढोल की भी अच्छी संख्या है। लेकिन जंगली कुत्तों की एक स्वस्थ आबादी का मतलब उन इलाकों में शाकाहारी आबादी को काफी नुकसान होना है। ढोल क्रूर शिकारी होते हैं, और एक बार जब वे एक लक्ष्य पर ध्यान लगा लेते हैं, तो वे लगभग हमेशा अपना शिकार पाते हैं। हाल के वर्षों में, चूरना द्वार के पास मुख्य क्षेत्र में चित्तीदार हिरणों की संख्या हजारों से घटकर कुछ सौ रह गई है। जंगली कुत्तों का एक झुंड एक चित्तीदार हिरण का शिकार करता है और कुछ ही मिनटों में उसकी हड्डियों को साफ कर देता है।

मध्य प्रदेश के राज्य पशु बारासिंघा या हार्ड-ग्राउंड दलदल हिरण के वितरण और आबादी को बढ़ाने के लिए, 2015 में कान्हा टाइगर रिजर्व से एक झुंड को यहां स्थानांतरित किया गया था। तब से सतपुड़ा में बारासिंघा की आबादी फली-फूली है।

भारतीय विशालकाय गिलहरी रिजर्व के कई हिस्सों में देखी जाती है। यदि भाग्यशाली रहे, तो दुर्लभ भारतीय विशालकाय उड़न गिलहरी को भी देखा जा सकता है। यूरेशियन ओटर, जिसे भारत में पाए जाने वाले सबसे दुर्लभ स्तनधारियों में से एक माना जाता है, को भी सतपुड़ा में देखा गया है। यहां पाई जाने वाली सरीसृप प्रजातियों में मगरमच्छ, मॉनिटर छिपकली और सांप जैसे इंडियन रॉक पायथन शामिल हैं। स्थानिक सतपुड़ा तेंदुआ गेको भी यहाँ देखा जाता है। सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के नाम पर, गेको केवल मध्य भारतीय राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में पाया जाता है। उभयचरों की कई प्रजातियाँ भी यहाँ देखी जाती हैं।

श्री कृष्ण बोले- सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बर्डवॉचर्स के लिए एक खजाना है। एवियन विविधता अधिक है, जिसमें 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज हैं। लुप्तप्राय ब्लैक-बेलिड टर्न यहां प्रजनन के लिए जाना जाता है। भारतीय स्किमर, एक और लुप्तप्राय प्रजाति, यहाँ देखी जाती है, हालाँकि कम संख्या में। गंभीर रूप से लुप्तप्राय भारतीय लंबे-चोंच वाले गिद्ध उच्च सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की चट्टानों में सुरक्षित शरण पाते हैं। वे पार्क के अंदर अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। ग्रे और रेड जंगलफॉवल दोनों को देखा गया है। सतपुड़ा ग्रे-हेडेड फिश-ईगल जैसे शिकार के खतरे वाले पक्षियों का भी घर है।

कई जगहों पर सुंदर रैकेट-टेल्ड ड्रोंगो मिश्रित शिकार दलों के भीतर घूमते हुए दिखाई देते हैं। मालाबार पाइड हॉर्नबिल प्रचुर मात्रा में मिश्रित जंगलों के भीतर बड़े पेड़ों की छतरियों में ऊपर की ओर देखा जाता है। यदि आप भाग्यशाली हैं तो आप फलों के पेड़ों पर उनके बड़े झुंड देख सकते हैं। भारतीय चित्तीदार लता यहाँ पाई जाती है। सर्दियों के मौसम में, पीले पैरों वाले हरे-कबूतरों के बड़े झुंड को सुबह के समय नंगे पेड़ों पर चहकते देखा जा सकता है। ब्लैक-कैप्ड किंगफिशर, ब्लैक-क्रेस्टेड बुलबुल और ब्लू-बर्डेड बी-ईटर अन्य स्टार आकर्षण हैं जो हर बर्डवॉचर्स की सूची में उच्च स्थान पर हैं। बड़ी संख्या में प्रवासी बार-हेडेड गीज़, जो दुनिया की सबसे ऊंची उड़ान भरने वाली पक्षी प्रजाति है, को इसके बैकवाटर में देखा जा सकता है। उनके साथ प्रवासी बत्तखों की अन्य प्रजातियां जैसे यूरेशियन विजोन, नॉर्दर्न पिंटेल और नॉर्दर्न शॉवेलर भी हैं।

टाइगर रिजर्व के आसपास के स्थानीय लोग गोंड, भारिया और कोरकू जनजाति के हैं। रिजर्व के प्रबंधन ने इन स्वदेशी समुदायों की आजीविका के लिए ध्यान रखा है। उनमें से कई वन गाइड और गार्ड के रूप में कार्यरत हैं, और रिजर्व के पास अन्य प्रतिष्ठान इन गांवों के युवाओं को रोजगार प्रदान करते हैं।

हमने कहा- रिजर्व के पांच द्वार हैं: मडई, सहेरा/जमानीदेव, धसाई/चूरना, परसापानी और नीमधान। कोर और बफर दोनों क्षेत्र वनस्पतियों और जीवों में समृद्ध हैं। इन क्षेत्रों को विवेकपूर्ण ढंग से प्रबंधित किया गया है और पर्यटकों को उत्कृष्ट स्तनपायी दृश्य प्रदान करते हैं। परसापानी, बिनाका और जमनीदेव जैसे बफर जोन वन्यजीवों को देखने के लिए एकदम सही हैं, क्योंकि मुख्य क्षेत्रों में ज्यादातर समय भीड़भाड़ रहती है। रिजर्व के बफर जोन में नाइट सफारी के रोमांच का भी आनंद लिया जा सकता है। दुनिया की सबसे छोटी जंगली बिल्ली निशाचर और शर्मीली रस्टी-स्पॉटेड कैट पर्यटकों के बीच पसंदीदा है। रात की सफारी के दौरान उल्लू, नाईटजार, सिवेट और अन्य निशाचर वन्यजीव भी देखे जाते हैं। जीप सफारी के अलावा, जंगल में सैर और नाव की सवारी जैसी गतिविधियों की अनुमति है। हमें पता चला कि चूरना की माँदीखो चौकी आवंटित हुई थी। जहां पहुँचने का रास्ता सुखतवा से जाता है। हम भौंरा में बैठे चर्चा कर रहे थे।

तभी चूरना रेंज के अनुविभागीय अधिकारी ने बताया कि हमें मांदीखो चौकी आवंटित की गई है। भौंरा रेंज के रेंज आफ़िसर ने बताया कि बाघों की गणना हेतु हम तीन में से दो की तैनाती चूरना रेंज की मादीखो चौकी पर की गई है और एक को बहुत दूर कोड़ार चौकी पर जाना होगा। यह सुनते ही हम तीनों के दिमाग़ ख़राब हो गए। हम लोग सोच रहे थे कि तीनों की तैनाती नज़दीकी चौकियों पर होगी तो शाम को हमप्याला हमनिवाला की महफ़िल छः दिनों तक जमती रहेगी।

हमने भौंरा के रेंज अधिकारी से कहा कि हम चूरना रेंज अधिकारी से बात करना चाहते हैं ताकि तीनों नज़दीकी चौंकियों पर तैनात रहें। उन्होंने बताया कि  चूरना रेंज अधिकारी श्री विनोद वर्मा आपको केसला के बोरी रेंज अधिकारी के कार्यालय में मिलेंगे। हमने वर्मा जी से बात की तो उन्होंने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि आप लोगों में से एक गोपाल गांगुड़ा को कोड़ार चौकी पर जाना होगा जो कि मादीखो चौकी से लगभग सौ किलोमीटर दूरी पर थी। रोज़ शाम को मिलना सम्भव नहीं था। हम लोगों ने निर्णय किया कि हम केसला पहुँच कर वर्मा जी से मिलकर अपनी तैनातियाँ नज़दीक चौकियों पर करवा लेंगे।

हमने वर्मा जी से फ़ोन पर सम्पर्क साध कर अपनी गुहार उनके सामने रखी। वे टस से मस नहीं हो रहे थे। बोले कि आप दो लोग केसला पहुँच जाएँ, आपको मादीखो पहुँचा दिया जाएगा। एक आदमी कोड़ार निकल जाए जो कि भौंरा से चालीस किलोमीटर घने जंगल में था। वे इसी बात पर अड़ गए। आख़िर में हमने कहा कि साहब हम आपसे मिलकर चौकियों पर जाना चाहते हैं इसलिए अपनी कार से केसला पहुँच रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो तीन बजे तक केसला पहुँचेंगे, आप बोरी रेंज के केसला स्थित कार्यालय पहुँचें। हम तीनों तीन बजे केसला में चाय पीकर केसला के सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व पहुँच गए। उनको फ़ोन से सम्पर्क साधने की कोशिश की तो पहले कवरेज से बाहर मिला परंतु लगातार प्रयास से उनसे बात हुई तो उन्होंने बड़े रूखे अन्दाज़ में कहा कि वे देरी से पहुँचेंगे। बोरी रेंज स्टाफ़ से बातचीत होती रही। वर्तमान में जंगल विभाग तीन तरह की कमान में बँटा है- सामान्य, उत्पादन और आरक्षित-वन देखभाल। फ़ील्ड में इनकी कमांड अनुविभागीय अधिकारी के हाथ में होती है। उनके नीचे रेंज आफ़िसर और रेंज आफ़िसर के नीचे पूरा अमला होता है। सबसे नीचे वन रक्षक फिर वन पाल इत्यादि पद होते हैं।

शाम के छः बजने लगे परंतु वर्मा जी का कोई पता नहीं चल रहा था। आख़िर सवा छः बजे उनका अवतरण हुआ। नमस्कार जुआर के बाद हमने अपनी बात रखी कि तीनों को या तो मादीखो और आसपास कर दें या फिर कोड़ार के आसपास रख दें। उन्होंने कहा कि उन्हें वहाँ भेजा जा रहा है जहां का स्टाफ़ शेरों की गणना का विवरण एप में दर्ज नहीं कर पाएगा, इसलिए आपको उनकी सहायता करना होगी। हम लोगों ने कहा कि हमको भी एप चलाना नहीं आता है। तब उन्होंने कहा कि यदि उनका बस चलता तो वे हम जैसों का चयन ही नहीं करते। हम चुप रहकर अपनी एक जगह रहने की माँग पर डटें रहे। आख़िर में उन्होंने तंग होकर कहा कि आप तीनों यहाँ से मादीखो चले जाएँ। इस राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 69 पर इटारसी तरफ़ जाने पर दो किलोमीटर पर दाहिनी तरफ़ एक रास्ता कटेगा। उस पर छः किलोमीटर के बाद मोरपानी गाँव की तरफ़ एक रास्ता दाहिनी ओर कटेगा उसे छोड़कर आप हल्का सा बाईं तरफ़ को जाने वाला रास्ता पकड़ना जो आपको एक स्थान पर पहुँचाएगा। वहाँ सामने कच्चा जंगली रास्ता मिलेगा वहीं हमारे दो आदमी आपको खड़े मिलेंगे। वो आपको तवा नदी किनारे स्थित मादीखो रेस्ट हाउस पहुँचा देंगे।

हम चलते गए, मोरपानी गाँव से हमारी दाहिनी तरफ़ सुखतवा नदी चलने लगी और बाईं तरफ़ घने जंगलों से भरी पहाड़ियाँ, बीच में ऊबड़-खाबड़ पथरीला रास्ता। नियत स्थान पहुँचने पर दो लड़के मोटर साइकिल सहित मिले। बहुत ही ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर डोलते-डालते सात बजे शाम नियत स्थान पर पहुँचे। वहाँ वन रक्षक प्रजापति मिले। साथ में आठ-दस लोग आग तापते बैठे थे। पूछने पर पता चला कि चोरी से मछली पकड़ने के लिए आए थे। जाल सहित पकड़ाए हैं। साहिब के आने तक यहीं रहेंगे। साहिब कब आएँगे किसी को पता नहीं था। हम गेस्ट हाउस में कपड़े उतार कर सुस्ता रहे थे। तभी वे मछुआरे हमें साहिब समझ हमारे पास आकर सफ़ाई देने लगे। हमने उन्हें वास्तविकता बताई तो वे मायूस होकर फिर आग तापने लगे। सुबह पता चला कि उनके जाल वग़ैरह जप्त करके उन्हें जाने दिया। वन अधिकारियों पर उन्हें छोड़ने हेतु राजनीतिक दबाव बनना शुरू हो चुका था। उनके जाने के बाद हम लोगों ने कमर सीधी की और सिग्नेचर चरणामृत सेवन से दिमाग़ और देह में भरी दिन भर की थकान उतारी। हम पाँच-छः दिन के हिसाब से खाना पीना बनाने का सामान तीन बोरियों में साथ लेकर चले थे। एक बोरी वन सेवक प्रजापति के हवाले कर दी। प्रजापति ने आलू की सब्ज़ी और मोटे टिक्क रोटी लाकर दिए जिन्हें गप्प लड़ाते हुए खाकर दस बजे सो गए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २८ – कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “परिन्दे“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २८ ?

? कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

ऋतु विशेष में दूर देश से, ख़ास परिंदे आते हैं

बच्चे यूँ त्यौहारों में, मेहमान सरीखे आते हैं

 =2=

हेलमेल के मिसरी जैसे, जाने कहाँ गये वो दिन

अब रिश्तों की नीरसता ज्यों, फल भी फीके आते हैं

=3=

पीढ़ी नई, मृदंग नगड़िया रसिया फगुआ क्या जाने

इनको तो बस डी.जे.वाले, तौर-तरीक़े आते हैं

=4=

हँसी-ठिठोली न पहले-सी, हुई दिल्लगी भी ग़ायब

रंग लगाने के वो दिलकश, किसे सलीक़े आते हैं

=5=

देख दूसरों को संकट में, जश्न मनाती है दुनिया

लम्हे आगे-पीछे अच्छे-बुरे सभी के आते हैं

=6=

हमसे मिलने उमड़-घुमड़कर, देखो काले बादल भी

प्यार जताने समय-समय पर, पास ज़मीं के आते हैं

=7=

हमको भी ताउम्र फर्ज़ की, रीत निभानी होती है

तब जीवन के हिस्से में कुछ, ख़ास वज़ीफ़े आते हैं

=8=

इम्तिहान से सीख सबक़, अंज़ाम की कर न फ़िक्र ज़रा

पल जीवन में खट्टे-मीठे, कड़वे-तीखे आते हैं

=9=

‘ठाकुर’ ठसक दिखाने से यूँ, काम नहीं चलने वाला

कथनी-करनी के दम, ख़ुशियों के दिन नीके आते हैं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆ मुक्तक – ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆

☆ मुक्तक ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

कभी बोल मीठे तो कभी चीत्कार लिखता है।

कभी विपक्ष  तो  कभी सरकार लिखता है।।

यह कलम  का  सिपाही रुकता नहीं  कभी।

सही बात हो   तो  वह बार – बार लिखता है।।

=2=

कभी आर -पार तो कभी कारोबार लिखता है।

कभी विसंगति और कभी  प्रचार लिखता है।।

समाज राष्ट्र के  हर एक बिंदु को छूती कलम।

हर विषय को  छूता  वह सरोकार लिखता है।।

=3=

कभी ओज तो कभी  रस श्रृंगार   लिखता है।

कभी खिजा तो कभी खूब बहार   लिखता है।।

खुशी गम के   हर   एक पहलू को छूता वह।

कभी जीत तो कभी  कोई हार  लिखता   है।।

=4=

कभी व्यंग तो कभी बन के हास्यकार लिखता है।

कभी शांति  तो कभी वह अंगार  लिखता  है।।

छू जाती है कलम उसकी दिल  को    कभी।

जब भावनाओं का  पूरा ही संसार लिखता है।।

=5=

सब पढ़ते हैं   कि  बहुत जोरदार  लिखता है।

कभी दब के या  बन कर असरदार लिखता है।।

हर हालात को   लिखता वह खूब समझ कर।

सब कोई   और नहीं बस पत्रकार लिखता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६४ ☆ कविता – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६४

☆ भगवान हमें प्यार का वरदान दीजियेस्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये ।

औरों के कष्ट का सही अनुमान दीजिये ॥

*

दुनिया में भाई-भाई से हिलमिल के सब रहें

है द्वेष जड़ लड़ाई की – यह ज्ञान दीजिये ॥

*

होता नहीं लड़ाई से कुछ भी कभी भला

सुख-शांति के निर्माण का अरमान दीजिये ॥

*

निर्दोष मन औ’ शुद्ध भावनाओं के लिये

हर व्यक्ति को सबुद्धि औ’ सद्ज्ञान दीजिये ॥

*

दुनिया सिकुड़ के  आज हुई एक नीड़ सी

इस नीड़ के कल्याण का विज्ञान दीजिये ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७५ ⇒ पनघट और जमघट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पनघट और जमघट।)

?अभी अभी # ९७५ ⇒ आलेख – पनघट और जमघट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ यादें भी बड़ी नटखट होती हैं। कहाँ गाँव की गोरी, घूंघट, पीपल की छांव और पनघट और कहां, शहर के हर चौराहे पर भीड़भाड़, धक्का मुक्की और जमघट ! पनघट पर सखियों में कोई भेदभाव नहीं होता, कोई रंगभेद की नीति भी नहीं होती, फिर भी जहां पनघट है, वहां सब गोरी, गोरी ही होती है, और काला मात्र एक घनश्याम। और जहां काले गोरे, वृद्ध युवा, बेकार, कामकाजी और आम जरूरतमंद इंसानों का जमघट हो, वहां, अप्रैल मई की गर्मी ही गर्मी, परेशानी और पसीना ही पसीना।

यमुना के तट पर अथवा किसी पनघट पर कभी गोरी मटकी लेकर पानी भरने जाती होगी, हमने तो सरकारी नल और ट्यूब वेल पर स्त्री, पुरुष और बच्चों को, हंडा, बाल्टी और मटके लिए, कतार लगाते देखा है। अब आप इसे पनघट कहें अथवा जमघट। पानी के लिए ही हर घट है, और हर घट में जल से ही जिंदगानी है।।

सुबह की सैर सबके नसीब में नहीं होती। कैसे कैसे नजारे देखने को मिलते हैं, मॉर्निंग वॉक के बहाने। स्मार्ट सिटी बनता, मेट्रो सुविधा के लिए आतुर, स्वच्छता का छक्का लगा चुका, मेरे शहर का एक व्यस्ततम चौराहा ! जब नेताओं के नामों की सूची समाप्त हो जाती है तो चहुंमुखी विकास के लिए मुंह फैलाते शहर में आगरा बॉम्बे रोड से काम नहीं चलता। रिंग रोड और बायपास तक बात पहुंच जाती है। जहां जगमगाती स्ट्रीट लाइट और सौंदर्यीकरण के साथ साथ सड़क को डिवाइडर से बांटा जाकर दोनों ओर सर्विस रोड से भी आवागमन जारी रहता है।

आप अपनी सुरक्षा के लिए खुली सड़क पर नहीं, सर्विस रोड पर ही अपना सीना ताने निकल पड़ते हैं। इस बार जूता जापानी नहीं, बाटा, एडिडास अथवा स्वदेशी भी हो सकता है।

अगर आप आत्म निर्भर हैं तो पांच छ: हजार का जूता भी पहन सकते हैं। पतलून भी इंग्लिस्तानी नहीं, देसी जीन्स की हो सकती है।।

घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, मैं उस चौराहे पर पहुंच जाता हूं जहां मेरा वास्ता पनघट और जमघट से एक साथ पड़ने वाला है। चौराहे के पास ही, नगर निगम का एक चलित झोनल कार्यालय है, जहां स्वच्छता के लिए मुस्तैद वाहन और सफाई कर्मचारी सड़क पर गंभीर वार्तालाप करते देखे जा सकते हैं। पास ही पानी के टैंकर भरने के लिए भी नलों की व्यवस्था है जिस कारण बिना गोरी के पनघट सा दृश्य उपस्थित हो जाता है। टैंकर को आप कौन सा घट कहेंगे।

जहां भी भीड़ होगी, जमघट होगा, पनघट होगा, यातायात तो बाधित होगा ही। वहीं खाली स्थान को और उपयोगी बनाने के लिए दिहाड़ी श्रमिकों के लिए अस्थायी शेड का निर्माण भी किया गया है। रोजाना रोजगार की तलाश में वहां सुबह सुबह इन्हें इंतजार करते देखा जा सकता है। जहां इतना सब कुछ हो, वहां चाय और गुटका नहीं हो, यह हो नहीं सकता। बस आप मान लीजिए, राहगीरों के आवागमन के लिए बना यह सर्विस रोड इन सेवाभावी महानुभावों की उपस्थिति के कारण, सुबह सवेरे ही, ट्रैफिक जाम का दृश्य उपस्थित कर देता है।।

एक बड़ी सी कार, कहीं से आकर रुकती है। भवन निर्माण के लिए श्रमिकों की आवश्यकता है। छंटनी और भाव ताव सड़क पर ही तय हो जाता है। एक झुंड जाता है, दूसरा झुंड उसकी जगह ले लेता है। किसका नसीब खुलेगा, इंतजार ही एकमात्र विकल्प है।

कोरोना के कहर के कारण पिछले कुछ समय से समय की गति रुक सी गई थी।

यह जमघट यूं ही नहीं है। बहुत पीड़ा है, बड़ा अभाव है, तुम नहीं समझोगे रमेश बाबू ! बच्चों के स्कूल के वाहन भी अब इन्हीं सड़कों पर दौड़ेंगे। आज का अमर पनघट से भले ही बच जाए, जमघट से नहीं बच सकता। बहुत हुआ ऑनलाइन, अब अमर, तेरी बस आ गई, इस्कूल चल ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ चैत्र पालवी… ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ चैत्र पालवी ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

 चैत्र पालवी खुलून आली,

वठलेल्या त्या झाडावरती!

ग्रीष्म झळांनी सुकून गेल्या,

करड्या पिवळ्या फांद्यांवरती!.

*

आकाशातून रवी ओकतो,

सहस्त्र किरणांनी ती आग!

प्रतीक्षेत त्या येईल कधी,

सृष्टीतील सृजनाला जाग !..

*

नभात दिसती चुकार ढग हे,

शामल शुभ्र न् विखुरलेले!

अंतर ते क्षणी भरून येईल,

जलथेंबांनी ओथंबलेले !..

*

एक दिवस अन् नक्कीच येईल

विंझणवारा घालीत सृष्टीवरी

तहानलेला भवताल सारा,

अधीर प्राशण्या जल अधरावरी!

*

शांत सजल हे रूपदेखणे,

सृष्टीस मिळण्या वाट पाहते!

चैत्र पालवी आतुरलेली,

गंधीत रंगीत फुलून येते !

© सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

वारजे 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मारिया मॉन्टेसरी ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

? विविधा ?

☆ मारिया मॉन्टेसरी ☆ शालिनी जोशी

मारिया मॉन्टेसरी

 मॉन्टेसरी म्हटलं की आपल्यासमोर येते पहिलीच्या आधीची शाळा. हे एका व्यक्तीचे, स्त्रीचे आडनाव आहे हे सहसा कुणाला माहीत नसतं. मारिया मॉन्टेसरी इटलीतील ॲलेस्सॅड्रो आणि रेनिल्देला या दाम्पत्याची मुलगी होती. जन्म ३१ ऑगस्ट १८७०. वडील सरकारी नोकरीत आणि आई घरकाम करणारी. असे हे सुखी मध्यमवर्गीय कुटुंब होते. त्या काळात स्त्री शिक्षणाला स्थान नव्हतं. तरीही मारियाला नवीन काही शिकवावं अशी इच्छा तिच्या आईची होती. मुलींच्या शिक्षणात शिवणकाम, विणकाम यावर भर असे. तेथे बुद्धिमत्तेला वाव नव्हता. मुला मुलींच्या शाळा वेगवेगळ्या असत. शिक्षक सांगतील ते ऐकायचं आणि पाठ करायचं. ही घोकंपट्टी मारियाला कंटाळवाणी वाटे. तिला सुरुवातीला गणितात गती होती. पण मुलींसाठी ते अनावश्यक अशी समाजाची समजूत होती. तरीही शेवटी आईच्या प्रोत्साहनाने ती वैद्यकशास्त्राकडे वळली.

 उभ्या इटलीत कोण्या स्त्रीने या शास्त्राचा विचार केला नव्हता. वडिलांनाही पसंत नव्हतं. पण त्यानी विरोध केला नाही. अनेक जाचक चालीरीती सांभाळून मारियाने शिक्षणात प्रगती केली. उदाहरणार्थ वर्गातील सर्व मुलांनी आपापल्या जागेवर बसल्याशिवाय मारियाला वर्गात प्रवेश नव्हता. कारण पुरुषांना ओलांडून जाणं शिष्ट संमत नव्हतं. खोडसाळ मुलानी बसायला जागाच ठेवली नाही तर दोन तीन तास सुद्धा उभे राहावे लागे. पण मारीयाने जिद्द सोडली नाही. बालकांचा विशेष अभ्यास केला. तिच्या शेवटच्या वर्षीच्या भाषणाने सर्व भारावून गेले. मानसशास्त्राचा संशोधनात्मक प्रबंध सर्वमान्य झाला. तिला डॉक्टर पदवी बहाल करण्यात आली. इटलीतील पहिली महिला डॉक्टर ती ठरली. पुरुषांच्या साठी असलेल्या पदवी सर्टिफिकेट मध्ये खाडाखोड करून तिच्यासाठी सर्टिफिकेट तयार करावे लागले.

 मारिया देखण्या होत्या. काळेभोर गनदाट केस, नीटनेटका पोशाख, वागण्यात मार्दव, आकर्षक व्यक्तिमत्व, बुद्धिमत्ता आणि धाडसी स्वभाव यामुळे मारिया रस्त्याने निघाली की लोकांच्या नजरा तिच्यावर खिळत. समाजाने तिला डॉक्टर म्हणून मान्यता दिली. स्त्रियांच्या हक्काविषयी त्यांची भाषणे उत्स्फूर्त असत. त्यामुळे वृत्तपत्रांचा कुतुहुलाचा विषय झाली. बालरोग तज्ञ म्हणून कीर्ती वाढू लागली.

 मनोरुग्ण बालकांचे विशेष निरीक्षण त्यांनी केले. तेव्हा लक्षात आलं ही मुलं जेवण झाल्यावर जमिनीवर पडलेले अन्नकण शोधून खातात. यात त्यांचा खाणे हा हेतु नसून हाताने काही कृती करावी वाटते. ती मूर्ख नाहीत तर बुद्धीचा वापर करायची संधी त्यांना मिळत नव्हती. याशिवाय जंगलातील मुलगा, मुक व कर्णबधीर मुले, अविकसित मुले यावर त्यांनी विशेष अभ्यास केला. अशा मुलांसाठी वेगळी शिक्षण व्यवस्था असावी. नाहीतर ते गुन्हेगारी प्रवृत्तीच्या आहारी जातील. येथे शिक्षेचा उपयोग नाही. डॉक्टर आणि प्रशिक्षित शिक्षक हवेत. हा विचार लोकांना पटला. बालरोगतज्ञ, मानसशास्त्रज्ञ, मानवंशशास्त्र अभ्यासक, शिक्षणशास्त्र अभ्यासक अशी महिला डॉक्टर अशी त्यांची ओळख निर्माण झाली.

 स्त्रियांविषयी त्यांची मते स्पष्ट होती. स्त्रियांना दुय्यम ठरविण्याला त्यांचा विरोध होता. विवाह आणि मातृत्व स्त्रियांवरती लादू नये. ते त्यांनी स्वेच्छेने स्विकारावे. अतिरिक्त कामामुळे बायका अशक्त व कमकुवत होतात. त्यामुळे तशीच मुले जन्माला येतात. नव स्त्री ही शुद्ध सामाजिक पर्यावरण निर्माण करेल. तिथे युद्ध नसतील. गुन्हेगारी नसेल. न्यायव्यवस्थेची गरज पडणार नाही. असे त्या आर्जवून सांगत. दु:खाला तोंड देण्यासाठी धर्मादाय काम, अशी समाजाची धारणा बदलून दुःख निर्माण होणार नाही यासाठी विज्ञानाच्या साह्याने प्रतिबंधात्मक प्रयत्न व्हावे. रोग आजार दुरुस्त करण्यापेक्षा निर्माण होणार नाहीत असे प्रयत्न असावे. त्यामुळे समस्या निवारार्थ होणारा पैशाचा भार कमी होईल. असे त्यांचे ठाम मत होते. अशा प्रकारे स्त्रीवादी म्हणून इटलीत त्या ओळखल्या जाऊ लागल्या.

 अक्षम, मतिमंद मुलेही योग्य शिक्षणाने सर्वसामान्य मुलांच्या शाळेत जाऊ शकतात. हे त्यांनी सिद्ध करून दाखवले. त्यासाठी योग्य शैक्षणिक साधने आणि मुलांच्या पातळीवर येऊन मुलांत दडलेल्या माणसाला शोधणारे शिक्षक हवेत. शिक्षक हा मार्गदर्शक असावा. साधने कशी वापरावी याचे स्वातंत्र्य मुलांना असावे. यासाठी निरनिराळ्या आकाराचे, रंगाचे ठोकळे व अक्षरे हवीत. कृतिशील शिक्षणावर त्यांनी भर दिला. मुलांच्या वर्तनाला, शिस्त व स्वच्छतेला त्यांनी महत्त्व दिले. शारीरिक व्यायामासाठी साधने तयार केली. गैरवर्तनाला शिक्षा म्हणजे गप्प बसायला लावणे. बेघर, झोपडपट्टीतील रोगराईग्रस्त कुपोषित मुलांसाठीही अशा शाळांचा चांगला परिणाम दिसून आला. पुढे हीच पद्धत सामान्य मुलांसाठी उपयोगात आली. सर्व साहित्याने युक्त शाळा आणि शिक्षकाची केवळ निरीक्षकाची भूमिका, अशीही स्वयंशिक्षण पद्धत क्रांतिकारी ठरली. खेळण्याच्या मुक्त आनंदातून प्रशिक्षण अशी ही डॉक्टर मॉन्टेसरी शिक्षण पद्धती एक चळवळ झाली. इंग्लंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटिना, चीन, रशिया येथेही अशा शाळा निघाल्या. डॉक्टर मारियाने वैद्यकीय व्यवसाय बंद केला. सर्व देशात भेटी व व्याख्याने होऊ लागली. ‘मॉन्टेसरी मेथड’ नावाचे पुस्तक निघाले. प्रशिक्षण वर्ग व त्यातून मॉन्टेसरी महाविद्यालयही इटलीत निघालं.

 भारतातही ॲनी बेझंट यांनी १९१४ मध्ये पहिली मॉन्टेसरी शाळा काढली. रवींद्रनाथ टागोर व डॉक्टर मारिया यांचा पत्र व्यवहार असे. महात्मा गांधींनी इंग्लंडला त्यांची भेट घेतली होती. गिजूभाई बघेका नावाचे वकील होते. त्यांनाही पद्धत जीवन दृष्टी वाटली. त्यांनी ताराबाई मोडक यांच्या मदतीने ही पद्धत गुजराथ, सौराष्ट्र मुंबई येथे वाढवली. त्यांच्या निमंत्रणाने डॉक्टर मारिया भारतात आल्या. येथे त्या सात वर्षे राहिल्या. सर्व देशात मान्यता मिळत असूनही त्यांचे पाय जमिनीवर होते. १९४६ मध्ये त्या परत भारतात आल्या. ताराबाई मोडक यांनी बालशिक्षण नगर भरवले. त्या परिषदेच्या उद्घाटनासाठी त्या आल्या होत्या. कमलाबाई काकोडकर, अनुताई वाघ यांनी या पद्धतीचा अवलंब केला. अजूनही ही पद्धत सुरू आहे. काळानुसार नवीन बदल झाले असतील.

 अशा प्रकारे इटलीची मारिया कार्याच्या वैश्विकतेमुळे सर्व जगाची झाली. अशा या स्त्री शक्तीला सलाम! १९५२ मध्ये वयाच्या ८१ व्या वर्षी त्यांची प्राणज्योत मालवली. पण मॉन्टेसरी रूपाने अमर झाल्या.

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ व्यथा तिची, कथा माझी… – लेखिका : प्रतिभा परांजपे ☆ प्रस्तुती – सौ. मीनल केळकर ☆

सौ. मीनल केळकर

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ व्यथा तिची, कथा माझी… – लेखिका : प्रतिभा परांजपे ☆ प्रस्तुती – सौ. मीनल केळकर ☆

सुमनने नाश्ता टेबलावर ठेवून मुलांना आवाज दिला.

कालच मुलांची परीक्षा संपली होती त्यामुळे घरी सगळं रिलॅक्स्ड झालं होतं.

मागचे दहा-बारा दिवस मुलांच्या अभ्यासापुढे सुमनला काही सुचत नव्हतं. घर काम पटापट आवरून ती मुलांना अभ्यासाला बसवी. आता घराकडे लक्ष द्यायला हवे आहे, उन्हाळा ही सुरू होतो आहे.

गरम कपडे धुवायला काढून ते धुवून सुमन बाल्कनीत वाळत टाकायला गेली.

बाल्कनीत खाली खूपसा कचरा काड्या, पिसं पडलेली होती. तिने कपडे वाळत टाकून कचरा गोळा करून टाकला.

उद्यापासून एक एक खोली आवरायची असं ठरवून कामाला लागली.

दुपारी जरा झोपली तो चिवचिवाटाने तिला जाग आली.

 

काय बाई कल -कल आहे म्हणत ती बाल्कनीत आली. खाली परत कचरा पडला होता. सुमनने वर पाहिलं, बाल्कनीत एक विंड चाईम लावलेलं होतं त्यावर चिमणीने घरटे बांधले होते. “आता इथे ही घरटं ! बाई -बाई आणखीन कुठे जागा नाही का गं तुला मिळाली??” सुमन चिमणीकडे पहात बडबडली.

 

अचानक चिमणी खिडकीत येऊन बसली. सुमनला वाटले चिमणी तिच्याकडे पाहून बोलतिये.

“मग कुठे बांधू?? एक तरी झाड सोडल कां तुम्ही आमच्यासाठी? तुम्ही आमच्या जागेवर आपलं घर बांधलं, मग आता आम्ही तुमच्या घरात घरट बांधतोय.

अचानक घर मोडणं आणि त्यानंतर कुठे जायचं हे माहित नसल्यावर काय स्थिती होते हे तुम्हा माणसांना कसे समजणार??”

चिमणीचे बोलणे ऐकून सुमनच्या डोळ्यासमोर तिचे चाळीतले घर आले.

लग्न होऊन ती उदय बरोबर चाळीतल्या घरात आली होती. वर्षभरात अंकिताचा जन्म झाला. एक दिवस कुजबुज सुरू झाली येथे हायवे बनणार आहे तेव्हा त्यांची चाळ मोडून इथून हायवेचा पूल बनणार. तेव्हा ही जागा रिकामी करायची ऑर्डर आहे असे ऐकायला येत होते. मालकांनी आम्ही प्रयत्न करतो असे खोटे आश्वासन दिले. पण अचानक एक दिवस बुलडोजर घेऊन कामगार आले आणि एकच गोंधळ उडाला. कसेबसे सामान बाहेर काढून लोक बाहेर येऊन बसले.

 

उदयच्याएका मित्राने एका खोलीचे घर रिकामे असल्याचे सांगितले. भाडं जरा जास्त होतं, पण मागचा पुढचा विचार न करता उदयने ते घर घेतले. पैशांसाठी तिने सोन्याच्या बांगड्याही विकल्या.

पुढे उज्वल झाला. नशीब पालटले. उदयला बढती मिळाली आणि त्यांनी हा दोन बेडरूमचा फ्लॅट विकत घेतला. फ्लॅट नवीनच बांधलेले होते.

रस्ता पक्का करण्यासाठी बरीच झाडे कापली गेली होती. हे सर्व आठवून सुमनला तो दिवस आठवला आणि चिमणीची व्यथा जाणवली.

मुलांचा रिझल्ट लागला दोघे छान पास झाली म्हणून दोन दिवसासाठी चौघे गावी देवदर्शनाला जाऊन परत आली.

 

इकडे आता चिमणा चिमणीच्या घरट्यात चिवचिवाट वाढलेला होता. अंड्यांतून पिल्लं बाहेर आली होती. चिमणी चिमणा पोरांसाठी किडे, धान्य गोळा करून आणत होती.

 

सुमनही एका ताटलीत भात, पोळीचा चुरा ठेवायची. हळूहळू बाळ मोठे होत गेली.

काही दिवसांनी चिमणबाळे फुर्र– फुर्र उडू ही लागली आणि अचानक त्यांचं येणं बंद झालं.

चिमणी ही फारशी दिसत नव्हती.

आता सुमनला दुपार रिकामी रिकामी वाटू लागली.

चिमणी घर सोडून गेली वाटतं. ती विचार करू लागली. अचानक तिला चिऊ चिऊ चा आवाज आला. वाटलं चिमणी तिला बाय-बाय करायला आली आहे.

 

“पुढच्या वर्षी इथेच घरटं बांधायला ये हं!” सुमन चिमणीला म्हणाली.

“मी असेल कि नाही माहित नाही पण ही माझी बाळ त्यांच काय होणार??”

सुमनला जाणवले चिमणीला काय सांगायचे आहे! तिने मनाशी ठरवले बाल्कनीत कुंडीत लावलेले वडाचे व आंब्याचे रोप समोरच्या पार्कमध्ये नेऊन लावूया. चिमणीच्या पुढच्या पिढ्यांसाठी तरी घराची सोय होईल.

लेखिका : प्रतिभा परांजपे

प्रस्तुती : मीनल केळकर

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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