हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # ११२ – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें।)  

☆  चुभते तीर # १११ – कथा कहानी – दौड़ते हुए जूते, ठहरती हुई सांसें ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कमरे का तापमान ठीक सोलह डिग्री पर लॉक था। इस कमरे में न धूप आती थी, न हवा, बस एक सफेद सी रोशनी थी जो चौबीसों घंटे जागती रहती थी ताकि मौत को आने में कोई गलतफहमी न हो। बेड नंबर चार पर लेटे सत्तर साल के दीनानाथ जी के मुंह पर लगे ऑक्सीजन मास्क पर हर तीन सेकेंड बाद भाप जमती और पिघल जाती। यही उनके जिंदा होने का इकलौता सबूत था, जिसे देखकर बगल की कुर्सी पर बैठी नर्स सिस्टर मैरी अपनी डायरी में कुछ नोट कर रही थीं।

रात के ठीक दो बज रहे थे। यह वह वक्त होता है जब अस्पताल के गलियारों में सन्नाटा इतना गहरा हो जाता है कि ग्लूकोज की टपकती बूंदों की आवाज भी किसी टाइम बम के टिक-टिक जैसी सुनाई देती है। सिस्टर मैरी ने अपनी घड़ी देखी। वह जानती थीं कि दीनानाथ जी के पास अब कुछ ही घंटे बचे हैं। डॉक्टर आनंद ने शाम को ही राउंड पर कह दिया था कि मल्टीपल ऑर्गन फेलियर है, बस सुबह का सूरज देखना मुश्किल है।

अचानक दीनानाथ जी की उंगलियों में थोड़ी हरकत हुई। उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना मास्क एक तरफ सरकाया। उनकी आवाज में एक अजीब सी घबराहट थी, “मैरी… वो… वो आ गया क्या?”

मैरी ने उनके ठंडे पड़ रहे हाथ को अपने हाथों में लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “कौन दीनानाथ जी? यमराज? अरे, अभी उनका सर्वर डाउन है, इतनी जल्दी नहीं आते वो।”

मैरी का यह व्यंग्य दीनानाथ के चेहरे पर एक सूखी सी हंसी छोड़ गया। इस हॉस्पिस केयर यानी मरणासन्न मरीजों के आखिरी घर का यही नियम था यहाँ दर्द को दवाओं से ज्यादा चुटकुलों से सुखाया जाता था। दीनानाथ जी पिछले दो महीने से यहाँ थे। उनके फेफड़े जवाब दे चुके थे, पर उनकी आँखें हर रोज दरवाजे पर टिकी रहती थीं। वह किसी का इंतजार कर रहे थे। एक ऐसा इंतजार जो इस कमरे की सफेद दीवारों से भी ज्यादा पथरीला था।

“मैरी, मेरी वसीयत… सब ठीक है न? कोर्ट का वो आदमी सुबह आएगा?” दीनानाथ ने हांफते हुए पूछा।

“हाँ बाबा, सब तैयार है। आपके वकीलों ने आपके कहे अनुसार सब कुछ कर दिया है। बस आप सुबह तक दिल थाम के बैठिए,” मैरी ने उनके माथे से पसीना पोंछते हुए कहा। उनके लहजे में एक कड़वा मजाक था, जो दीनानाथ की अमीरी पर नहीं, बल्कि उस लाचारी पर था जो करोड़ों रुपये होने के बाद भी एक-एक सांस के लिए भीख मांग रही थी।

तभी दरवाजे पर किसी के कदमों की आहट हुई। भारी बूटों की आवाज। मैरी चौंक गई। इतनी रात गए कौन आ सकता था? दरवाजा धीरे से खुला। एक लंबा, सूट-बूट पहने नौजवान अंदर दाखिल हुआ। चेहरे पर थकावट से ज्यादा एक अजीब सी जल्दबाजी थी। उसने सीधे दीनानाथ के बेड की तरफ रुख किया।

दीनानाथ की आँखों में जैसे बुझते हुए दीये की आखिरी लौ चमक उठी। उन्होंने कांपते होंठों से कहा, “अविनाश… तुम आ गए बेटा! मुझे मालूम था, तुम अपनी नौकरी, अपना लंदन का सब काम छोड़कर अपने बूढ़े बाप के आखिरी वक्त में जरूर आओगे।”

अविनाश ने अपनी महंगी घड़ी पर वक्त देखा और बिना कोई जज्बात दिखाए सीधे मैरी से मुखातिब हुआ, “सिस्टर, डॉक्टर कहाँ हैं? ये कुछ जरूरी  कागजात हैं, जिन पर इनके दस्तखत चाहिए। सुबह की मेरी लंदन की फ्लाइट है, बोर्ड मीटिंग मिस नहीं कर सकता। क्या ये होश में हैं?”

कमरे का सन्नाटा जैसे और नुकीला हो गया। सिस्टर मैरी ने अविनाश को ऊपर से नीचे तक देखा। उस महंगे सूट की चमक के पीछे छुपा हुआ जो गिद्ध था, वह मैरी को साफ दिख रहा था। चिकित्सा विज्ञान ने भले ही इंसान को अमर बनाने की दवा न खोजी हो, पर ऐसे रिश्तों को जिंदा रखने का वेंटिलेटर जरूर ढूंढ लिया था।

मैरी ने एक गहरी सांस ली और कहा, “हाँ सर, आपके पिता बिल्कुल होश में हैं। वो पिछले दो महीने से सिर्फ आपकी इस बोर्ड मीटिंग के लिए ही अपनी आखिरी सांसें रोककर बैठे थे। मेडिकल साइंस भी हैरान है कि जो इंसान बिना ऑक्सीजन के दो मिनट नहीं रह सकता, वो बेटे के मोह में दो महीने कैसे जी गया।”

अविनाश को इस व्यंग्य की चुभन महसूस तो हुई, पर उसके पास रीढ़ की हड्डी नहीं थी जो वो सीधा खड़ा हो पाता। उसने तुरंत अपने बैग से लीगल पेपर्स निकाले और दीनानाथ के सामने रख दिए, “डैड, प्लीज यहाँ साइन कर दीजिए। इसके बाद आपको इस दर्द से मुक्ति मिल जाएगी। डॉक्टर्स वैसे भी कह रहे हैं कि अब कोई उम्मीद नहीं है।”

दीनानाथ ने कांपते हाथों से पेन थामा। उनकी आँखों से बहता हुआ पानी उस वसीयत के सफेद कागज पर गिरा और स्याही थोड़ी सी फैल गई। उन्होंने बिना पढ़े, अपने जीवन की आखिरी ऊर्जा समेटकर उस कागज पर दस्तखत कर दिए। जैसे ही दस्तखत पूरे हुए, अविनाश ने झपट्टा मारकर वो कागज अपनी फाइल में सुरक्षित किए और एक राहत की सांस ली।

“थैंक यू डैड। अब मैं चलता हूँ। एयरपोर्ट के लिए लेट हो रहा हूँ। सिस्टर, इनका ख्याल रखिएगा,” अविनाश ने बिना मुड़े दरवाजे की तरफ कदम बढ़ा दिए। उसे अपने बाप के ठंडे होते शरीर को छूने तक का परहेज था, शायद मौत की छूत उसकी करोड़ों की डील को न लग जाए।

“अविनाश…” दीनानाथ की एक दबी हुई चीख कमरे में गूंजी। लेकिन अविनाश तब तक कॉरिडोर पार कर चुका था। उसकी परछाईं भी गायब हो चुकी थी।

कमरे में फिर वही ‘टिक-टिक’ की आवाज लौट आई। दीनानाथ की आँखें अब छत को ताक रही थीं। मॉनिटर पर चलती हुई हरी लकीरें अब धीरे-धीरे सीधी होने की तरफ बढ़ रही थीं। बीप की आवाज की रफ्तार कम हो रही थी।

सिस्टर मैरी ने चुपचाप उनके पास आकर बेडसाइड टेबल पर रखा एक लिफाफा उठाया। यह वह लिफाफा था जो दीनानाथ ने एक हफ्ते पहले मैरी को इस शर्त पर दिया था कि जब अविनाश आएगा, तब इसे खोला जाए।

“दीनानाथ जी, आपका बेटा तो चला गया। क्या मैं अब इसे खोलूं?” मैरी की आवाज में एक भारीपन था।

दीनानाथ ने बस धीरे से अपनी पलकें झुका दीं।

मैरी ने लिफाफा खोला। उसके भीतर एक और कानूनी दस्तावेज था, जिस पर भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की सील थी। जैसे ही मैरी ने उस कागज की इबारत पढ़ी, उसके हाथ कांपने लगे। उसकी आँखों से आंसू टपक कर उस कागज पर गिर पड़े।

उस कागज पर लिखा था कि दीनानाथ जी ने अपनी सारी संपत्ति, सारी फैक्ट्रियाँ और बैंक बैलेंस तीन महीने पहले ही अनाथ बच्चों के एक ट्रस्ट के नाम कर दिया था। और जो कागज अभी अविनाश दस्तखत करवा कर ले गया था, वह दरअसल संपत्ति की वसीयत नहीं थी। वह नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट  था, जिसके तहत दीनानाथ जी ने मरने के बाद अपनी दोनों आँखें, लिवर और दिल उस अनाथालय के बीमार बच्चों के लिए डोनेट करने की मंजूरी दी थी। और उस एनओसी के लिए सगे वारिस के तौर पर अविनाश के गवाह वाले दस्तखत जरूरी थे, जो वो अपनी हड़बड़ी में बिना पढ़े कर गया था।

कागज के नीचे दीनानाथ के हाथ से लिखी एक छोटी सी लाइन थी: “बेटा, तुमने मुझे जीते जी कभी अपना वक्त नहीं दिया, लेकिन तुम्हारे इस अनजाने दस्तखत की वजह से आज मेरी मौत किसी और को जिंदगी दे जाएगी। मैंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सौदा कर लिया है… तुम्हारी बेरुखी के बदले, कुछ बच्चों की सांसें खरीद ली हैं।”

मैरी ने सिर उठाकर बेड की तरफ देखा। मॉनिटर की स्क्रीन पर अब एक सीधी हरी रेखा खिंच चुकी थी और एक लंबी, अंतहीन ‘बीप’ की आवाज कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। दीनानाथ जी के चेहरे पर एक ऐसी शांत, तीखी और मुकम्मल मुस्कान थी, जिसने दुनिया के सबसे बड़े बाजारू रिश्ते को हमेशा-हमेशा के लिए हरा दिया था। मैरी ने रोते हुए उनके चेहरे पर सफेद चादर डाल दी, पर उस चादर के भीतर से भी वह व्यंग्य साफ चमक रहा था जो एक मरते हुए बाप ने अपनी आखिरी सांस से इस मतलबी दुनिया पर किया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३०) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३०)  ? ?

-कुछ कहो,

तुम्हारी चुप्पी

बरदाश्त नहीं होती,

मैंने कोरा काग़ज़

मोड़कर थमा दिया,

-पढ़ लो, सारा कुछ

इस पर लिख दिया है,

…ज़िंदगी भी

एक करवट ले चुकी,

उसका बाँचना

बदस्तूर जारी है,

सोचता हूँ

इतना ज़्यादा तो

नहीं लिखा था मैंने!

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, 12:25 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ Sojourn from Self to Infinite… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Sojourn from Self to Infinite ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Sojourn from Self to Infinite??

☆ 

I squandered all the riches

of love upon you, my beloved

Until I became a stranger within

the chambers of my own heart

 *

How curious is the covenant

of these fleeting encounters

I never knew when your city

became my only home

 *

I drifted on, wearing the visage of

water, to the melody of stream

Then, with a single leap of the tide,

I became the ocean itself

 *

Love reshaped the very

fabric of my being

I embraced the night, only to

awaken as your dawn

 *

The fire of longing chiseled

me with such grace

That what was once mere stone

emerged as burnished gold

 *

No fetters, no fears remained

no sense of self survived

A nameless prayer once adrift,

I’ve now become a benediction

 *

This soul was adorned with

such a great resplendence

That like a rose upon the breeze

I became its fragrant essence

 *

I erased every trace of myself,

to be abided wholly in you

Yesterday I was but a drop

Today I am the Ocean itself

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆ मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “मेरे पापा मिले क्या?“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆

✍ कविता – मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे पापा मिले क्या?

एक बेटी के ये शब्द

सबको आहत करते रहे ,

और आहत मन से ही

बचाव कार्य में जुटे

पुलिस कर्मी

एनडीआरएफ जवान

नम आंखों से

बचाव कार्य में लगे रहे।

मेरा भाई मिला

मेरे पति मिले

प्रश्नों के अंबार लगे

उत्तर किसी के न मिले।

परिजनों की भीगी आंखें

गिरे हुए कचरे के पहाड़ को

ताकती हैं

निरखती परखती हैं।

 

पूरे शहर के निवासी

कितना कचरा उत्पन्न करते हैं

कि उसका पहाड़ बन जाए,

और जब गिरे तो

तीन मंजिला भवन को ढहा जाए।

कचरे के ढेर में दबे लोगों के

प्राण कैसे, कितने तड़पे होंगे

शरीर से कैसे निकले होंगे

क्या कचरे से बाहर आये होंगे

या कचरे में विचरण करते होंगे।

 

कौन जाने ?

जिस कचरे में रह नहीं सकते

उसमें दबने पर क्या

तकलीफ़ हुई होगी

कौन जाने?

मोशी पिंपरी चिंचवड़ पुणे

इसके साक्षी हैं।

और परिजनों की नम  आँखें

व सिसकियाँ

साक्षी हैं।

पर बेटी का प्रश्न गूंजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

 

प्रश्न तो अंतस् में यह भी उठता है

कि इतना कचरा

क्यों और कहाँ से आता है

पहले भी लोग रहते थे

पर इतना कचरा नहीं होता था।

घर से कचरा बहुत कम निकले

यह सोचना होगा

बेटी के प्रश्न का उत्तर

देना होगा

और सबको मिलकर

देना होगा।

नहीं तो हर कान में गूँजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५९ ☆ सारा कमाल इश्क़ का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सारा कमाल इश्क़ का“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५९ ☆

✍ सारा कमाल इश्क़ का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मौला करम किया वही क़ीमत बनी रहे

अज़दाद जो बनाये वो इज़्ज़त बनी रही

 *

सारा कमाल इश्क़ का तेरे किया हुआ

दरिया को मोड़ने की जो हिम्मत बनी रही

 *

रख्खी हर एक याद हिफाज़त से ज़ह्न में

अपने तमाम दोस्त से निस्बत बनी रही

 *

ये माँ की परवरिश का करिश्मा है देखिए

झूठों के बीच रहके सदाक़त बनी रही

 *

ग़ुरबत में हाथ में न जो फैलाया था कभी

मेरे ख़ुदा की मुझपे इनायत बनी रही

 *

अल्लाह ने दी नेक वो औलाद है मुझे

दस्तार मेरे सर की सलामत बनी रही

 *

इंसान बन मशीन गया दौरे- हाल में

घर को न वक़्त दे ये शिकायत बनी रही

 *

बचपन में जिसके साथ में खेले छुपा छुपी

ताउम्र उससे मिलने की चाहत बनी रही

 *

अहसास का न धागा कभी टूटने दिया

रिश्तों में वो हमारे थी लज्ज़त बनी रही

 *

मैंने अरुण हराम समझ घूस ली नहीं

इस दौर में भी घर मेरे बरक़त बनी रही

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोग छुपे रुस्तम हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – लोग छुपे रुस्तम हैं…!

☆ ॥ कविता॥ लोग छुपे रुस्तम हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

तिनके जिद को ठाने हैं,

खुद  को  खुदा  माने हैं।

*

शमाँ की लौ पर मंडराते,

मरने पर तुले परवाने हैं।

*

दुनिया में जितने इंसां हैं,

सबके  अपने फ़साने हैं।

*

बात-बात पर शत्रुन की,

विष  उगलती ज़ुबानें हैं।

*

शौक शहंशाहों के पाले,

खाने  को  नहीं  दाने हैं।

*

जिसको  हम घर समझे,

दर-अस्ल सरायखाने हैं।

*

लोग  बड़े छुपे रुस्तम हैं,

मन  के कई तहखाने हैं।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६३ – बहेलिया… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बहेलिया।)

☆ हेमंत साहित्य # ६३ ☆

✍ बहेलिया… ☆ श्री हेमंत तारे  

अभी, अभी

बांस के इसी झुरमुट में,

सुनी थी सरसराहट,

और

देखी थी कुछ गौरैया,

आपस में कर रही थी,

चुहलबाजी,अठखेलियाँ,

फुर्र हो गयी पलक झपकते,

शायद समझ बैठी मुझे

बहेलिया |

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४४ ⇒ अपराध-बोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अपराध-बोध।)

?अभी अभी # १०४४ ⇒ आलेख – अपराध-बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अपराधियों को अपराध-बोध नहीं होता और जो निर्दोष होते हैं, वे अपराध-बोध के तले दबे रहते हैं। अपराध बोध, अपराध करने से अधिक घातक होता है।

अक्सर अवसाद और आत्महत्या की जड़ में यही अपराध-बोध होता है।

अपराध क्या है, यह कानून तय करता है। इंसान नैतिकता और अनैतिकता के चक्र में उलझा रहता है। जिसमेंलोग क्या कहेंगे” वाला भाव मुख्य रूप से हावी रहता है।।

सिगरेट पीना, शराब पीना अथवा झूठ बोलना कोई इतना बड़ा अपराध तो नहीं ! इन्हें अधिक से अधिक आप बुरी आदत अथवा लत कह सकते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ये तीनों ही आदतें आदमी में आत्म-विश्वास बढ़ाती हैं। एक तो गलत काम और उससे आत्म-विश्वास, विश्वास नहीं होता।

पान वाले की दुकान पर, घर में, सार्वजनिक स्थान में, कभी छुपकर, कभी खुले आम, जिस आत्म-विश्वास से लोग सिगरेट का धुआँ छोड़ते हैं, वह देखते ही बनता है। कोई भी बुरी आदत आसानी से नहीं छूटती। जिनकी इच्छा-शक्ति प्रबल होती है, वे बुरी आदतों से बाज आते हैं, कुछ इसे एक मानवीय कमज़ोरी मान, भरे मन से ही सही, आदतों के समक्ष आत्म-समर्पण कर देते हैं।।

अच्छी-बुरी आदत अपराध नहीं ! अपराध-बोध सकारात्मक भी हो सकता है, और नकारात्मक भी।

सकारात्मक अपराध-बोध में विवेक मन पर अंकुश लगाए बैठा रहता है, और छोटी से छोटी भूल होने पर भी, मन को आगाह किया करता है। जो आत्म-विश्लेषण करते रहते हैं, वे अपने अपराधों /भूलों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर लेते हैं।

इससे उनके मन का बोझ भी हल्का हो जाता है। ईसाइयों के confession, जैनियों का पर्युषण के वक्त जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा, और गाँधीजी के सत्य के प्रयोग इसी श्रेणी में आते हैं। प्रायश्चित अपराध-बोध से मुक्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

नकारात्मक अपराध-बोध की श्रेणी में ऐसी छोटी-मोटी भूलें होती हैं, जिन्हें व्यक्ति बड़ा मान बैठता है, और अंदर ही अंदर घुटते रहकर अवसाद की स्थिति निर्मित कर लेता है। यह स्थिति इतनी घातक होती है कि इसमें चित्त में अंधकार व्याप्त हो जाता है, और आत्महत्या के अलावा उसे कोई दूसरी राह नज़र नहीं आती। स्वाभिमानी, सच्चरित्र लोगों पर जब झूठे इल्ज़ाम या केस लगाए जाते हैं, तो उन्हें अपने स्वाभिमान को बचाने का कोई अन्य रास्ता दिखाई नहीं देता और वे आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाते हैं।।

आसाराम और राम-रहीम में कितना अपराध-बोध है, और वे किस हद तक अपराधी हैं, यह ईश्वर जाने, लेकिन जब भैय्यू महाराज जैसे कथित संत पारिवारिक समस्याओं के लिए स्वयं को ज़िम्मेदार मानते हुए स्वयं को गोली मारकर समाप्त कर लेते हैं, तो अपराध-बोध की सकारात्मकता, नकारात्मकता में बदल जाती है। इसका मतलब यह भी कतई नहीं कि आसाराम का सकारात्मकता से कुछ लेना-देना है। कुछ अपराधियों में अपराध-बोध होता ही नहीं।

इस तरह वे अपने आपको एक सच्चा अपराधी ही सिद्ध कर रहे होते हैं।

अपराध बुरा है, लेकिन अपराध-बोध उससे भी बुरा है। अपराध से बचें, और अपराध-बोध से भी ! छोटी-मोटी गलतियों को कबूलें, बड़ी गलतियों से तौबा करें। अनजाने में, अथवा आवेश में हुए अपराध के लिए प्रायश्चित करें। अपराध और अपराधी को संरक्षण देना जुर्म है और पाप भी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२२ ☆ गझल – सूर ना सोसे तिला… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२२ ?

☆ गझल – सूर ना सोसे तिला ☆  प्रभा सोनवणे ☆

चूल होती छान, आता धूर ना सोसे तिला

चांदराती आसवांचा पूर ना सोसे तिला

*

ही अशी साधी घरे आहेत का गावाकडे?

 कंदिलाचा मंदसा तो नूर ना सोसे तिला

*

पुस्तके कोरी नवी ,अभ्यास करती बालके

 गोंधळाचा कोणताही सूर ना सोसे तिला

*

बाप गेला माय आता एकटी पाहे घरा

रापलेला चेहरा, संतूर ना सोसे तिला

*

दप्तरांचा रंग नीळा जांभळा आहे जरी

दाटलेले अंतरी काहूर ना सोसे तिला

© प्रभा सोनवणे

१३- ७- २६

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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