☆ “भारतीय नास्तिकतेचा मागोवा” ☆ लेखक आणि परिचयकर्ता – श्री जगदीश काबरे ☆
पुस्तक : भारतीय नास्तिकतेचा मागोवा
लेखक : जगदीश काबरे
प्रकाशक : मधुश्री पब्लिकेशन, पुणे
किंमत : रु. २५०/- (घरपोच मिळण्यासाठी संपर्क : 9322688872)
आपल्या समाजात ‘आस्तिक’ आणि ‘नास्तिक’ या संज्ञांबद्दल अनेक गैरसमज आहेत. नास्तिक म्हणजे देवाला शिव्या घालणारा, धर्मविरोधी किंवा समाजविघातक व्यक्ती, अशी एक चुकीची समजूत अनेकांच्या मनात आढळते. प्रत्यक्षात भारतीय तत्त्वज्ञानाचा इतिहास पाहिला, तर चित्र पूर्णपणे वेगळे दिसते. हा खरा इतिहास सामान्य वाचकांपर्यंत पोहोचावा, हा या पुस्तकामागचा मुख्य उद्देश आहे.
प्राचीन भारतात विविध तत्त्वचिंतनातून अनेक दर्शने निर्माण झाली. या दर्शनांनी विश्व, मनुष्य, आत्मा, ज्ञान, ईश्वर, कर्म आणि मोक्ष यांसारख्या प्रश्नांची स्वतंत्र उत्तरे शोधण्याचा प्रयत्न केला. या सर्वांमध्ये मतभेद होते; परंतु हे मतभेद वैचारिक होते. आजच्या भाषेत सांगायचे तर हा एक मुक्त बौद्धिक संवाद होता. कोणताही विचार अंतिम नाही, त्यावर प्रश्न विचारले जाऊ शकतात, त्याची चिकित्सा केली जाऊ शकते, अशी ही भारतीय परंपरेची मोठी ताकद होती. ‘भारतीय नास्तिकतेचा मागोवा’ हे पुस्तक केवळ नास्तिकतेवर नाही; तर भारतीय बौद्धिक परंपरेच्या वैविध्यावर आहे. हे पुस्तक वाचताना वाचकाला अनेक प्रस्थापित समजुती नव्याने तपासून पाहाव्या लागतील. काही निष्कर्ष आश्चर्यचकित करतील, काही प्रश्न अस्वस्थ करतील आणि काही विचार नव्या अभ्यासाची प्रेरणा देतील. त्यातून विचारांचा पराभव बंदी घालून होत नाही; तो अधिक सक्षम विचार मांडूनच होतो हे लक्षात येईल. विवेक, तर्क, संवाद आणि चिकित्सक दृष्टी हीच भारतीय तत्त्वज्ञानाची खरी ओळख आहे. त्या परंपरेचा एक छोटासा मागोवा या पुस्तकातून घेण्याचा प्रयत्न केला आहे. वाचकांनी हे पुस्तक पूर्वग्रह न ठेवता, खुल्या मनाने आणि जिज्ञासेने वाचावे, हीच अपेक्षा.
सर्वसाधारणपणे बौद्ध, जैन आणि चार्वाक ही दर्शने नास्तिक मानली जातात. कारण त्यांनी वेदांचे अंतिम प्रामाण्य स्वीकारले नाही. परंतु या वर्गीकरणाकडे बारकाईने पाहिले, तर अनेक मनोरंजक प्रश्न उभे राहतात. उदाहरणार्थ, सांख्य आणि वैशेषिक या दर्शनांनी विश्वाच्या निर्मितीसाठी सर्वशक्तिमान ईश्वराची आवश्यकता मानलेली नाही. विश्वाचे स्पष्टीकरण त्यांनी नैसर्गिक तत्त्वांवर करण्याचा प्रयत्न केला. तरीही भारतीय परंपरेत त्यांना आस्तिक दर्शनांमध्ये स्थान मिळाले. याचे कारण त्यांनी आत्मा, कर्म आणि पुनर्जन्म यांसारख्या संकल्पना स्वीकारल्या. म्हणजेच भारतीय तत्त्वज्ञानात ‘आस्तिक’ आणि ‘नास्तिक’ या संज्ञा केवळ देवावर विश्वास आहे की नाही, एवढ्यावर ठरत नाहीत. त्या अधिक सूक्ष्म आणि ऐतिहासिक संदर्भात समजून घ्याव्या लागतात. या पुस्तकात याच गुंतागुंतीचा मागोवा घेतला आहे.
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परिचयकर्ता : लेखक जगदीश काबरे
मो ९९२०१९७६८०
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५९ ☆
☆ बुन्देली कविता – “दुख से खीब चिन्हारी कर लइ“☆ आचार्य भगवत दुबे
☆ व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
(हाफ लाइनर)
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आखिर पीटा भी तो किसे, निरीह जीव कवि को और वो भी कहाँ डबरा में।
खबर पढ़ते ही लतीफा याद आ गया। मकान मालिक ने किराएदार को इसलिए निकाल दिया कि जब वो रात में लिखता है तो उसकी पेन किर्र किर्र करती है। इसलिए मालिक की नींद में खलल पड़ता है।
लेखक / कवि होना जैसे गुनाह हो गया। माँ बाप की नज़र में नकारा और लोग— लोगों का काम है कहना— जो कुछ नहीं बन सकता वह नेता या तो कवि बन जाता है।
प्रमाण बिखरे पड़े हैं। पुरातत्वविदों को तलब करने की जरूरत नहीं है।
अब कोई दीदे होकर भी न दिखने का ढोंग करे उसका तो परमात्मा भी कुछ नहीं कर सकता।
एक कविता ही तो सुनाई बेचारे ने। इतनी सी बात पर उसके कपड़े फाड़ डाले। दयनीय दशा में पहुँचाया यहां तक तो ठीक है फिर फोटो भी खींच ली(उसने कब कहा था– खींच्च मेरी फोटो—)
फोटो खींची यहां तक भी ठीक है फिर उसे अखबार में छपवा भी दिया। घोर बेइज्जती।
अखबार की बात समझ में आती है, सोशल मीडिया पर भी डाल दिया। इतना जघन्य अपमान। कवि को चाहिए वह एक करोड़ की मानहानि का दावा करे। इससे कम का तो कतई नहीं। समूची कवि बिरादरी की इज्जत का सवाल है।
या फिर सारे कवि मिलकर इस घनघोर अपमान के विरोध में मीम बनाएं, स्लोगन लिखें, जेन जी की तरह विरोधात्मक नृत्य करें या पैरोडी गाएं।
कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। अत्याचार सहने की भी सीमा होती है।
मारनेवाले जितना मार खानेवाला भी अपराधी है।
काश कवियों को इतनी सी बात समझ में आ जाती।
हर घटना के दो पहलू होते हैं। दूसरा पहलू न पूछिए— जो भी पढ़ रहा है, मंद मंद मुस्कुरा रहा है। इतना आनंद तो शायद ही कभी नसीब हो। इतना बेचैन है देश पर इस दशा में भी गदगदायमान हो रहा है।
ऐसे तो कारण अकारण कई पीटते /पिटते/ पिटवाते हैं। किसी किसी के भाग्य में ही होता है स्वयं दुःख सहकर दूसरों को आनंद प्रदान करना। कवि के सामाजिक सरोकारों पर गौर फरमाने की जरूरत है।
उस कवि पर तरस खाने की बजाय उसके लिये पुरस्कार की व्यवस्था करनी चाहिए। इस नेक काम के लिये चंदा आसानी से मिल जाएगा।
अगर आयोजक चंदा चुराएगा तो भी कितना।
दो सौ करोड़ तो नहीं ना।
ऐसे तो बेवजह बेसबब सत्कार के कारनामे नित्य होते हैं। यहां तो कवि की बेइज्जती का सवाल है। कोई गा के कविता पढ़ता है कोई दहाड़कर। कोई अभिनय के साथ। उसे तो याद भी रखना पड़ता है। इतने कमसिन जीव को कोई टेलीप्राॅम्प्टर तो देगा नहीं। न पुष्पवर्षा करेगा।
चिंघाड़ना कवि का संवैधानिक अधिकार है। इसे चुनौती देना ठीक नहीं।
परिसर में रहनेवालों को नींद नहीं आती। कवि की दहाड़ से नींद उड़ जाती है। हैरानी है जो गहरी नींद में सोये हैं उनपर किसी कवि के गरजने बरसने का असर होने से रहा। होता ही नहीं।
भविष्य में कवि जैसे हानिरहित प्राणी (प्राणधारक) को हानि न पहुँचाई जाए अन्यथा ——-सौ करोड़ याद रखना। ।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उड़न किस…“।)
अभी अभी # १०७६ ⇒ आलेख – उड़न किस श्री प्रदीप शर्मा
इस नश्वर संसार में उड़न खटोले से लगाकर उड़न परी और उड़न सिख के बीच इतनी उड़ती उड़ती चीजें हैं, कि इन्हें देखकर एक साधारण इंसान का तो सर ही चकरा जाए । क्या पता,कब कोई एलियन उड़न परी, उड़न तश्तरी से इस धरती पर उतर आए, जिसे देख उड़न दस्ता भी आश्चर्य में पड़ जाए और उसका एक एलियन किस,हमारे धरती के फ्लाइंग किस पर भारी पड़ जाए ।
जब एक मक्खी उड़ती हुई,आपके मुंह पर फ्लाइंग किस मारकर उड़ जाती है,तो आप उसका क्या बिगाड़ लेते हो । हमने वे दिन भी देखे हैं जब खटमल हमारा खून चूस रहे हैं,और डैंड्रफ के कारण हम अपना सर खुजा रहे हैं । भला हो, ऑल आउट, काला हिट, मच्छरदानी,पैंटीन शैंपू और लक्ष्मण रेखा का,जो हमें इन उड़ते मक्खी,मच्छर और रेंगती छिपकली, चींटी मकोड़े और कॉकरोचों से हमारा और हमारी बालों की रूसी का भी बचाव करती रहती हैं ।।
हर इंसान को उड़ती खबर और उड़ती नज़र से सावधान रहना चाहिए । कोई अच्छी बुरी खबर उड़ते उड़ते कहां पहुंच जाए,कहा नहीं जा सकता । वे दिन हवा हुए,जब उड़ते हुए शांतिदूतों के जरिए प्रेम संदेश और मित्रता संदेश भेजे जाते थे । सरकारी आदेश तो डुगडुगी पीटकर ही सुनाया जाता था। सुनो,सुनो, सुनो ! और सबको सुनना भी पड़ता था ।
फिर काम की खबरें भी बेतार के तारों के जरिए भेजी जाने लगी । बेतार की भाषा किसी गागर में सागर से कम नहीं होती थी । शब्द और अक्षरों में कोई भेद नहीं होता था । कई बार तो अर्थ का अनर्थ भी हो जाता था ।।
फिर आया सरस्वतीचंद्र का जमाना,जब ” फूल तुम्हें भेजा है खत में,फूल नहीं मेरा दिल है “,जैसे संदेश फूलों के जरिए भेजे जाने लगे । किसी भी पुरानी किताब में सूखा,मुरझाया कोई गुलाब का एक फूल कोई भूली दास्तान बयां करता नजर आता था ।
हमारे नीरज जी तो फूलों के रंग से ,और दिल की कलम से रोज ही पाती लिखते थे ।
आज तो स्थिति यह है कि इधर व्हाट्सएप पर संदेश लिखा जा रहा है,और उधर उन्हें उसकी भी खबर प्रसारित हो रही है । किस टाइप का प्रेम संदेश है यह,
जो लिखने से पहले ही बयां होने को लालायित है,उत्सुक है ।।
आसमान में उड़ते बादल भी विरही प्रेमियों के दिल का हाल जानते हैं । सावन के बादलों,उनसे ये जा कहो ,और ;
जा रे कारे बदरा,
सजना के पास ।
वो हैं ऐसे बुद्धू,
कि समझे ना प्यार ।।
हमारे आनंद बक्षी जी ने सावन को लाखों का बताया है,और नौकरी को दो टकियाॅं की । ऐसे फुल टाइम फूल,गुलदस्ता और फ्लाइंग किस भेजने वालों से भगवान हम शरीफों को बचाए । हम तो चाहते हैं,इस अधिक मास के सावन में दाल रोटी खाएं,और प्रभु के गुण गाकर कुछ पुण्य कमाएं ।।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – रिश्तों की डोरी फिर टूटी….”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३१ ☆
☆ रिश्तों की डोरी फिर टूटी…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है श्री अरविंद तिवारी जी द्वारा लिखित “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २१4 ☆
☆ “लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला” – लेखक : श्री अरविंद तिवारी ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला
लेखक – अरविंद तिवारी
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ : व्यंग्य की चटपटी प्लेट में समय का स्वाद – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
व्यंग्य की अपनी तरह की यह गोलगप्पे वाली प्लेट हमें हास्य का स्वाद देने के बाद हमारे वैचारिक हाजमे को कितना दुरुस्त करती है? किताब बंद करने के बाद हमारे भीतर कितनी हँसी, कितनी खटास और कितनी डकारें बची रहती हैं? अरविंद तिवारी का व्यंग्य-संग्रह ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ पढ़ते हुए यही सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। गड्ढे, सेमिनार, पुरस्कार, पुस्तक मेले, ए.आई., साहित्यकार, आलोचक और अंततः गोलगप्पेवाला—ये पात्र और प्रसंग पुस्तक बंद होने के बाद भी मन में घूमते रहते हैं।
यह अरविंद तिवारी का चौदहवाँ व्यंग्य-संग्रह है। साहित्य और राजनीति इसके प्रमुख सरोकार हैं, लेकिन लेखक की दृष्टि प्रशासन, सामाजिक व्यवहार, प्रकाशन, पुरस्कार, मीडिया, चुनाव और नई तकनीक तक जाती है। ‘गड्ढों का विद्रोह’, ‘जाना एक सेमिनार में’, ‘ए.आई. वाला लोचा’, ‘शोक सभा के विशेषज्ञ’, ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ जैसी रचनाएँ समकालीन विसंगतियों के अलग-अलग चेहरे सामने लाती हैं।
संग्रह की शुरुआत ‘गड्ढों का विद्रोह’ से होती है। सड़क के गड्ढे सामान्यतः नागरिकों की परेशानी हैं, लेकिन तिवारी उन्हें व्यवस्था के स्वाभाविक अंग में बदल देते हैं। उनका कथन—“गड्ढा बिना सड़क के भी हो सकता है”—सिर्फ हास्य पैदा नहीं करता, बल्कि उस मानसिकता पर चोट करता है जिसमें पुरानी समस्या धीरे-धीरे समस्या न रहकर व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है।
‘जाना एक सेमिनार में’ साहित्यिक दुनिया के महानगरीय मोह और छोटे शहर के लेखक की विडंबना को पकड़ता है। कई बार साहित्यकार से अधिक उसका शहर महत्वपूर्ण हो जाता है। यह विसंगति इसलिए अधिक चुभती है क्योंकि साहित्य की दुनिया भी उससे मुक्त नहीं है।
तिवारी की खासियत यह है कि उनका व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं चलता। वे साहित्यिक संसार को भी उसी निर्ममता से कटघरे में खड़ा करते हैं। ‘कवर पेज का भौकाल’, ‘किताब हाथोंहाथ ली गई’, ‘पुरस्कार चुक गए हैं’, ‘साहित्य के खटुआ आम’ और ‘बीस करोड़ का व्यंग्य संग्रह’ साहित्यिक प्रतिष्ठा, औपचारिक मित्रता, पुरस्कार-व्यवस्था और बाजारवाद की पोल खोलते हैं।
‘किताब हाथोंहाथ ली गई’ में मुहावरा ही व्यंग्य का हथियार बन जाता है। किताब का हाथोंहाथ घूमना साहित्यिक मित्रता और दिखावे की विडंबनाओं को उजागर करता है। इसी तरह ‘पुरस्कार चुक गए हैं!’ में सब्जी मंडी की भाषा साहित्यिक पुरस्कारों की दुनिया में प्रवेश करती है। थोक, रिटेल, खरीददार और माल जैसे शब्द हँसाते तो हैं, लेकिन पुरस्कारों के बाजारीकरण का गंभीर प्रश्न भी खड़ा करते हैं।
‘दूधों नहाओ वोटों फलो!’ चुनावी संस्कृति के प्रदर्शन और राजनीतिक गणित को निशाना बनाता है। वहीं ‘ए.आई. वाला लोचा’ और ‘इस बार ए.आई. वाली दीवाली’ में नई तकनीक के बहाने आभासी छवि, प्रचार और असली-नकली की धुंधली होती सीमा पर टिप्पणी की गई है। इससे तिवारी की समकालीनता स्पष्ट होती है। वे पुराने मुहावरों के व्यंग्यकार हैं, लेकिन विषयों में पुराने नहीं हैं।
इस संग्रह की भाषा सहज, बातचीत के करीब और मुहावरेदार है। तिवारी असंगत चीजों को एक साथ रखकर नया व्यंग्यार्थ पैदा करते हैं—गड्ढा और व्यवस्था, सब्जी मंडी और पुरस्कार, आम और साहित्यकार, ए.आई. और दीवाली। यही उनका विशिष्ट व्यंग्य-कौशल है।
उनके व्यंग्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता आत्मव्यंग्य है। साहित्यिक संसार पर चोट करते हुए वे स्वयं को उससे बाहर खड़ा नहीं करते। यही ईमानदारी उनके व्यंग्य को उपदेश बनने से बचाती है। हाँ, कुछ रचनाओं में व्यंग्य की ऊर्जा इतनी अधिक है कि लेखक एक ही प्रसंग पर कुछ अधिक देर ठहर जाते हैं; किंतु यह उस लेखक की स्वाभाविक सीमा भी है जिसके पास कहने को बहुत कुछ है।
अरविंद तिवारी छोटी-सी विसंगति पकड़ते हैं और उसे इस तरह विस्तार देते हैं कि उसमें पूरा समय दिखाई देने लगता है। ‘लेखक, आलोचक और गोलगप्पेवाला’ की सार्थकता इसी में है कि यह दूसरों पर हँसने वाली किताब भर नहीं, बल्कि साहित्य और स्वयं साहित्यकार को भी हँसी के कटघरे में खड़ा करती है।
शायद हमारे समय की हर गंभीर चीज के भीतर सचमुच एक गोलगप्पा छिपा है। उसे फोड़ने के लिए व्यंग्यकार की उंगली चाहिए और उसमें चटपटा पानी भरने की कला भी। अरविंद तिवारी यह काम बखूबी करते हैं।
मेरी दृष्टि में यह संग्रह समकालीन हिंदी व्यंग्य की सशक्त धारा में अपनी जगह बनाता है। इसे पढ़कर मुस्कान आती है, लेकिन मुस्कान के पीछे एक असुविधाजनक सवाल भी रह जाता है—जिन विसंगतियों पर हम हँस रहे हैं, कहीं वे हमारी अपनी आदतें तो नहीं?
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “नई दिशा”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७४ ☆
🌻लघुकथा🌻 नई दिशा 👩🍼
मम्मी आपने बताया आप पापा के साथ शादी के पहले सोलह सोमवार का व्रत कई बार किया है। अंजली ने बड़े भोलेपन से मम्मी को प्रश्न किया मेरी सभी सहेलियों के यहाँ शिव अभिषेक बड़ी श्रद्धा से करते है। न आप करती है न मुझे व्रत करने देती। कहा जाता है – – – इसको करने से मनचाहे पति की प्राप्ति होती है।
मम्मी ने तुरंत बात काटते हुए कहा–बस इसलिये ही नही करने देती। मनचाहा नही वो चाहे ऐसे पति की कामना रखनी चाहिए।
हम नारियों को भगवान ने ममता से भरपूर बनाया है। हमें तो पत्थर से भी प्रेम हो जाता है। पर समय बदल गया है अंजली!!! अब पति की चाहत होना बहुत आवश्यक है।
सारी जिंदगी घूटन से अच्छा है वो चाहे ये मायने रखता है। मम्मी के इस निर्णय पर अंजली हैरान थी। परन्तु नई दिशा, नई सोच मिलने से उसका व्याकुल मन शांत हो चला।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८८ ☆ देश-परदेश – मुफ्त का मॉल ☆ श्री राकेश कुमार ☆
फ्री या मुफ्त शब्द का आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण की गति से भी तीव्र माना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे कुछ ज्ञानी “कॉम्प्लीमेंट्री” बताकर अपने आप को सफेद पोश समझ लेते हैं। उनका ये मानना है, हमारे द्वारा खरीदी गई सुविधा के साथ ही तो मिल रहा है, इसलिए ये फ्री से अलग होता हैं।
दो साबुन के साथ एक फ्री का मिलना हो या होटल में किराए के कमरे के साथ नाश्ता और एक समय का भोजन जैसी सुविधा इस श्रेणी में गिना जाता हैं।
होटल का कॉम्प्लिमेंट्री ब्रेकफास्ट वह जगह है, जहाँ आदमी भूख से नहीं, कमरे के किराए की वसूली की भावना से खाता है, घर पर सुबह दो टोस्ट से काम चल जाता है मगर होटल में प्लेट उठाते ही भीतर का चार्टर्ड अकाउंटेंट जाग जाता है।
व्हाट्स ऐप ज्ञान से प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले फल डालेंगे क्योंकि स्वस्थ दिखना है, फिर उसके बगल में आलू पराठा, इडली, पोहा, सॉसेज और एक ऐसा छोटा तिरामिसु रख देंगे जिसकी पहचान हमें नहीं मगर मुफ़्त है इसलिए सम्मान देना ज़रूरी है।
प्लेट में जगह खत्म होते ही दूसरी प्लेट उठा लेते हैं और अपने आप से कहते हैं यह सिर्फ ऑमलेट के लिए है, लाइव काउंटर वाला पूछता है वेज या चीज़, प्याज़, टमाटर, मिर्च, मशरूम, अब हम ऑमलेट नहीं बनवा रहे, जीवनसाथी चुनने जितनी जानकारी दे रहे हैं।
फिर टोस्टर में ब्रेड डालते हैं, वह नीचे से गायब हो जाती है मगर निकलती कहीं नहीं, आप मशीन के सामने झुककर भीतर ऐसे देखते हैं जैसे बच्चा बोरवेल में गिर गया हो, तभी पीछे से किसी और की जली हुई ब्रेड निकलती है और वह आपको संदेह से देखता है कि आपने उसकी ब्रेड के साथ क्या किया, कॉफी मशीन पर छह बटन हैं, एस्प्रेसो दबाओ तो कप में दो चम्मच दुःख गिरता है, कैपुचीनो दबाओ तो मशीन पहले कराहती है, फिर भाप छोड़ती है, फिर इतनी झाग देती है कि कॉफी नीचे कहीं किरायेदार बनकर रह जाती है।
आप मेज़ पर लौटते हैं तो साथी पूछती है इतना कौन खाएगा, आप कहते हैं थोड़ा थोड़ा लिया है, जबकि मेज़ देखकर लगता है संयुक्त राष्ट्र ने अकाल राहत सामग्री भेजी है, बीच में वेटर प्लेट उठाने आता है और आप आधी खाई इडली बचाते हुए कहते हैं अभी चल रही है, भोजन है या पुरानी ईएमआई जिसे बंद नहीं होने देना है।
अंत में पेट जवाब दे चुका होता है मगर नज़र मिठाई पर पड़ती है, हम एक मफ़िन नैपकिन में लपेटकर बाद के लिए रख लेते हैं, फिर कमरे में लौटकर दो घंटे बिस्तर पर सीधे नहीं लेट पाते और गर्व से कहते हैं आज लंच की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, यही होटल ब्रेकफास्ट की असली बचत है, पैसे एक वक्त के बचते हैं और पाचन तंत्र दो दिन का ओवरटाइम करता है।
यदि होटल में कमरे के किराए में नाश्ते के बदले कुछ छूट मिल जाय तो निजी यात्रा के समय हम सब कम किराए वाला ऑप्शन उपयोग करते है। ऑफिशल यात्रा के समय कॉम्प्लीमेंट्री नाश्ता ही चुना जाता हैं।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता।)
☆ चुभते तीर # १२८ – व्यंग्य – बोनस☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
विकास की कंपनी ‘ग्लोबल सॉल्यूशंस’ में दिवाली का बोनस सिर्फ़ एक आर्थिक सहायता नहीं थी, बल्कि कर्मचारियों की योग्यता मापने का सबसे बड़ा पैमाना थी। दफ़्तर में यह फुसफुसाहट थी कि इस बार कंपनी का मुनाफ़ा दोगुना हुआ है, इसलिए सीनियर मैनेजर वर्मा जी सब कर्मचारियों को भारी-भरकम बोनस का लिफ़ाफ़ा थमाने वाले हैं। लेकिन एक पेंच था, लिफ़ाफ़ा देने का तरीका हमेशा की तरह बहुत ही गुप्त रखा गया था।
विकास पिछले तीन महीनों से जी तोड़ मेहनत कर रहा था। रात-रात भर जागकर प्रेजेंटेशन तैयार करना, चाय की चुस्कियों के साथ बॉस के बेतुके चुटकुलों पर सबसे तेज़ हंसना और हर मीटिंग में सबसे आगे खड़े रहना, उसने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उसके सहकर्मी अमित का मानना था कि काम से ज़्यादा बॉस का मूड मायने रखता है। अमित दिन भर अपनी मेज़ पर बैठा सोशल मीडिया स्क्रॉल करता रहता था, लेकिन जब भी बॉस पास से गुजरते, वह स्क्रीन पर किसी गंभीर एक्सेल शीट को खोलकर मुंह ऐसा बना लेता जैसे देश की आर्थिक नीति वही तय कर रहा हो।
बोनस वितरण का दिन आया। कॉन्फ्रेंस रूम का दरवाज़ा बंद था। बाहर लंबी कतार लगी थी। कर्मचारी एक-एक करके अंदर जाते और बाहर निकलते समय चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान या गहरी खामोशी होती। कोई किसी को यह बताने को तैयार नहीं था कि अंदर क्या मिला। जब विकास की बारी आई, तो उसके दिल की धड़कन किसी पुराने इंजन की तरह तेज़ चलने लगी।
कमरे के अंदर वर्मा जी एक बड़ी सी लकड़ी की मेज़ के पीछे बैठे थे। मेज़ पर दो अलग-अलग रंगों के लिफ़ाफ़े रखे थे, एक चमकीला सुनहरे रंग का और दूसरा साधारण सफ़ेद। सुनहरे लिफ़ाफ़े का आकार सफ़ेद वाले से दुगना था। वर्मा जी ने विकास की तरफ देखते हुए गंभीर स्वर में कहा, “विकास, तुमने इस साल काम तो बहुत किया, लेकिन हमारी नीति के अनुसार तुम्हें इन दो लिफ़ाफ़ों में से किसी एक का चुनाव करना होगा। एक में नकद बोनस है और दूसरे में कंपनी के शेयर के साथ एक विशेष सम्मान पत्र।”
विकास धर्मसंकट में पड़ गया। सुनहरे लिफ़ाफ़े में ज़रूर भारी नकद राशि होगी, जबकि सफ़ेद लिफ़ाफ़ा साधारण लग रहा था। अमित ने बाहर निकलते समय सफ़ेद लिफ़ाफ़ा ही पकड़ा हुआ था और उसकी आंखों में चमक थी। विकास ने जोखिम लेने का फ़ैसला किया और भारी लगने वाले सुनहरे लिफ़ाफ़े पर उंगली रख दी।
वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए सुनहरा लिफ़ाफ़ा विकास को सौंप दिया। विकास ने उत्सुकता से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर नकद पैसों की जगह ‘सर्वश्रेष्ठ धैर्यवान कर्मचारी’ का एक प्लास्टिक का मेडल और एक कूपन निकला, जिस पर लिखा था ‘अगले तीन महीने तक मुफ़्त ओवरटाइम चाय’।
विकास की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने तुरंत पूछा, “सर, और सफ़ेद लिफ़ाफ़े में क्या था?”
वर्मा जी ने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा खोलकर दिखाया, उसमें पचास हज़ार रुपये नकद और एक हफ्ते की सशुल्क छुट्टी का पत्र था। वर्मा जी बोले, “कंपनी ने इस बार चालाकी की परीक्षा ली थी। जो इंसान सिर्फ चमक-धमक देखकर फैसला लेता है, वह बोनस नहीं, सिर्फ मेडल का हकदार होता है।”
तभी कॉन्फ्रेंस रूम का पर्दा हटा और पूरी टीम ने ज़ोरदार तालियां बजाना शुरू कर दिया। विकास ने अपना प्लास्टिक का मेडल गले में डाला और मुस्कुराते हुए कहा, “सर, कम से कम तीन महीने चाय के पैसे तो बचेंगे!” पूरा कमरा फिर से ठहाकों और तालियों से गूंज उठा।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)