हिंदी साहित्य – कथा-कहानी – ☆ शिक्षक दिवस विशेष – लघुकथा – स्टेटस ☆ – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर 

 

 

 

 

(  श्री सदानंद आंबेकर जी की हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में विशेष अभिरुचि है। गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर प्रवास श्री सदानंद आंबेकर  जी  द्वारा शिक्षक दिवस पर रचित विशेष लघुकथा  ‘स्टेटस’  हमें वर्तमान जीवन में मानवीय दृष्टिकोण के कटु सत्य से रूबरू कराती है । बंधुवर  श्री सदानंद जी  की यह लघुकथा पढ़िए और स्वयं तय करिये। इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्री सदानंद जी की लेखनी को नमन ।

शिक्षक दिवस विशेष – लघुकथा– स्टेटस


” भाईयों और बहिनों, शिक्षक तो भगवान से भी बड़ा होता है, भगवान जन्म देता है पर शिक्षक तो मनुष्य को गढ़ता है। आज शिक्षक दिवस पर  जिन रामस्वरूप जी के सम्मान हेतु हम सब एकत्रित हैं उन्हीं ने मुझ अनगढ़ को बनाया है जिसके कारण आज मैं सफलता की इस चोटी पर हूं। यदि ये न होते तो मेरा जीवन क्या और कहां होता, इसलिये धन्य हैं ये हमारे शिक्षक । काश  मेरे घर में भी इन जैसा कोई शिक्षक होता तो मेरा जीवन सफल हो जाता।”

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच शहर के सराफा संघ, स्टाॅक एक्सचेंज और अनेक संस्थाओं के अध्यक्ष, नगर सेठ मनोहर लाल का भाषण  पूरा हुआ।

आज शिक्षक दिवस के अवसर पर सम्मान समारोह की अध्यक्षता कर रहे सेठ मनोहरलाल ने हाथ जोडते हुये समारोह से बिदाई ली और कार की ओर बढने लगे। पंडाल से निकलते हुये उन्होंने देखा कि  रामस्वरूप जी पीछे चल रहे उनके सचिव दीक्षित से कुछ खुसुर-पुसुर कर रहे हैं।

सबके कार में बैठते ही कार चल पडी तो मनोहरलाल जी ने आगे बैठे दीक्षित से पूछा- अरे दीक्षित, वो मास्टर तुमसे क्या बात कर रहा था भाई ?

दीक्षित ने पीछे मुड कर कहा – अरे सर, आपकी बातों से प्रभावित होकर मास्टर रामस्वरूप जी ने मुझे कहा कि उनका एक बेटा है जो बाहर शासकीय हाई स्कूल में शिक्षक है और यदि हम चाहें तो आपकी बिटिया से उसके विवाह के लिये बात कर सकते हैं। उन्हें बडा अच्छा लगेगा।

एक रहस्यमय मुस्कुराहट के साथ मनोहरलाल ने कहा- पर हमें अच्छा नहीं लगेगा दीक्षित ! अरे भाई शहर के अरबपति सेठ मनोहरलाल का दामाद एक मास्टर का छोरा, वो खुद भी मास्टर !! जितने कमरे उनके घर में हैं उससे ज्यादा तो मेरे यहां बाथरूम हैं दीक्षित !! ठीक है, उन्होंने मुझे स्कूल में पढाया है पर पैसा तो मैंने अपनी मेहनत से कमाया है। भाषण देना अलग बात है, फिर सोचो लोग क्या कहेंगे मुझे, अरे आखिर हमारा भी तो कोई स्टेटस है ।

दीक्षित चेहरे पर असमंजस के भाव लिये उन्हें देखता रह गया।

©  सदानंद आंबेकर

शान्ति कुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखंड)

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शिक्षक दिवस विशेष – गुरु बिन ज्ञान नहीं ☆ सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। एच आर में कई प्रमाणपत्रों के अतिरिक्त एच. आर.  प्रोफेशनल लीडर ऑफ द ईयर-2017 से सम्मानित । आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है।  आज प्रस्तुत है शिक्षक दिवस पर उनकी विशेष कविता  – गुरु बिन ज्ञान नहीं )

?  शिक्षक दिवस विशेष – गुरु बिन ज्ञान नहीं ?

 

गुरु बिन ज्ञान नहीं जीवन में कोई

उस बिन मिलता सम्मान नहीं कहीं

ज्ञान का उस जैसा भंडार नहीं कोई

उस जैसी पदवी का नहीं विकल्प कहीं

उस जैसे दानी का उदारण नहीं कोई

सभी शिष्यों को परिपूर्ण करने की इच्छा रखता है वही

सभी है समान नज़रों में दिखाता नहीं भेदभाव कोई

कमजोर शिष्यों को भी लगाता हैं पार वही

दुखों से हार कर बैठ न जाओ कहीं

संघर्ष पूर्ण जीना सिखाता है वही

शिष्य जब कर जाता है नाम कोई

सबसे अधिक हर्षाता है गुरु वो ही

गुरु भी चाहता है ले ले ज्ञान पूर्णतया कोई

मिल जाए शिष्य एकलव्य सा जो कहीं

ज्ञान ऐसा सिखाना चाहते हैं वही

जो पग- पग पर काम आ जाए सही

गुरु की महिमा है अपार जो समझ ले कोई

बिन लालच के अपना भंडार लुटा देता है वही

उस गुरु का सम्मान करना चाहते हैं यहीं

जो पथ पदर्शन करवाता है सही

कोटि-२ प्रणाम करता हूँ तुमको जहाँ हो वहीं

स्वीकार लेना जो मैं हूँ तुम्हारा शिष्य सही

गुरु बिन ज्ञान नहीं जीवन में कोई

उस बिन मिलता सम्मान नहीं कहीं

 

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 17 – महान फ़िल्मकार : महबूब ख़ान-2 ☆ श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी  अनभिज्ञ हैं ।  उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  महान फ़िल्मकार : महबूब ख़ान पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 17 ☆ 

☆ महान फ़िल्मकार : महबूब ख़ान – 2 ☆

हिन्दी सिनेमा की फ़िल्मों में पर्दे पर पहली बार होली फ़िल्म ‘औरत’ में खेली गई थी। यह ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म साल 1940 में रिलीज़ हुई थी। यह फ़िल्म फ़िल्मकार महबूब ख़ान के निर्देशन में बनी थी, लेकिन पर्दे पर होली के रंग देखे नहीं जा सके। महबूब ख़ान की 1952 में आई फ़िल्म ‘आन’ में होली के असली रंग पर्दे पर देखने को मिले। इससे पहले फ़िल्मों में होली तो दिखती थी, लेकिन रंग नज़र नहीं आते थे। जाहिर है, जब रंगीन फ़िल्म आई, तो रंग भी पर्दे पर नज़र आए। यह नादिरा की डेब्यू फ़िल्म थी। नादिरा वाले किरदार के लिए महबूब ख़ान की पहली पसंद नर्गिस थीं लेकिन उनके पास अधिक फ़िल्म होने के कारण समय नहीं था। मधुबाला से सम्पर्क किया गया, उनके पास भी एक साल तक तारीख़ नहीं थीं। फ़िल्म देखने के बाद लगता है कि नर्गिस फ़िल्म की ख़ूँख़ार राजकुमारी और बाद में समर्पित प्रेमिका की भूमिका हेतु उपयुक्त होतीं।

आन भारत की पहली टेक्नीकलर फ़िल्म थी, जिसे 16 एम-एम ब्लेक-व्हाइट में बनाकर 32 एम-एम में लन्दन से रंगीन करवाया गया था। जिसमें दिलीप कुमार, निम्मी और प्रेमनाथ के अलावा इराक़ी लड़की नादिरा ने काम किया था और उसे पूरी दुनिया में लन्दन में रिलीज़ किया गया था।

‘अंदाज’ फिल्म प्रेम त्रिकोण के लोकप्रिय बंबइया फार्मूले पर बनी होने के बावजूद एक ताजगी की बहार लेकर आती है। उस दौर में उन्होंने दिलीप कुमार से जो निगेटिव शेड वाले चरित्र का अभिनय करवाया है वह आज भी अभिनेताओं को प्रेरणा प्रदान करता है। अंदाज़ 1949 की भारतीय बॉलीवुड फ़िल्म है, जिसे नौशाद द्वारा संगीत के साथ महबूब खान द्वारा निर्देशित किया गया है। फिल्म में दिलीप कुमार, नरगिस और राज कपूर एक प्रेम त्रिकोण में, सहायक भूमिकाओं में कुक्कू और मुराद के साथ थे। फ़िल्म का संगीत नौशाद और मजरूह सुल्तानपुरी द्वारा गीत लिखे गए। दिलीप कुमार और राज कपूर की एक साथ ऑनस्क्रीन फीचर एकमात्र फिल्म है।

महबूब ने ‘औरत’ के बाद ‘रोटी’ फिल्म बनाई, जो वर्गभेद के साथ ही पूँजीवाद और धन की लालसा के नकारात्मक प्रभाव पर केंद्रित थी। काल्पनिक पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म में सामाजिक असमानता, पैसों पर आधारित सामाजिक मूल्यों को खूबसूरती से चित्रित किया गया था। फिल्म के अंत में प्यास के कारण नायक की मौत हो जाती है। हालाँकि मौत के समय उसके पास काफी मात्रा में सोना एवं धन होता है। इस फिल्म के माध्यम से महबूब खान का सामाजिक झुकाव स्पष्ट दिखता है। ‘रोटी’ के बाद महबूब खान ने महबूब प्रोडक्शंस की स्थापना की। वह किसी साम्यवादी दल के सदस्य नहीं थे, लेकिन उनकी कृतियों में साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव स्पष्ट दिखता है। उनकी फिल्मों में अत्यधिक नाटकीयता भी नहीं दिखती।

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 44 ☆ शहरातून गावी परतलेल्या मजुरांचे मनोगत… ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  रचित एक समसामयिक भावप्रवण  कविता  “शहरातून गावी परतलेल्या मजुरांचे मनोगत…। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 44 ☆

शहरातून गावी परतलेल्या मजुरांचे मनोगत…  

 

मातीतच राहतो मी….

 

आताच आलो होतो

पाय वळवून गावाकडे मी,

रंगीत शहराची तालीम

लगेचच फिरवू कसा मी.

 

भरकटलो वर्षानुवर्षे

आताच वळलो होतो,

शेताच्या मातीत आता

बीज बनून रूजलो मी.

 

धावलो स्वप्नांच्यामागे

क्षणाची उसंत नव्हती

आताच कुठेसा रोजच

हृदयाशी बोलतो मी.

 

कोंदटलेल्या श्वासात

मज बांधून घेतले होते.

आता कुठेसा गावात

प्राणवायू शोषतो मी.

 

हिरवळ गर्द हिरवी

चहुकडे पसरलेली

रोखून ठेवी गावात

शहरी कसा येऊ मी.

 

हा बांध शेतावरचा

ओलांडू न देई मजला

खुणेनंच सांगतो नाते

मातीशी जोडतो मी.

 

आता नको ते मजला

वाळू, सिमेंट, घमेले

डोक्यावरील ओझे

मातीत सोडतो मी.

 

मातीत परिश्रम करूनि

पेरतो मी रक्त-घाम

माझाच बनून आता

मातीतच राहतो मी.

 

© सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ ललाटरेषा…. ☆ श्री प्रकाश लावंड 

☆ कवितेचा उत्सव : ललाटरेषा…. ☆ श्री प्रकाश लावंड 

माझ्या शिवारात पावसा

मोरासारखं नाचून जा

पानांवर लिहिलेली

हिरवी कविता वाचून जा

 

तुझे सांडलेले मोती

बघ आता रुजून आलेत

त्यातले शेलके मोती

तुझ्या ओंजळीनं वेचून जा

 

काळीआई तू उपजाऊ

निर्माणाची उद् गाती

तुझ्या सुपिकतेचा तुरा

माझ्या शेतात खोचून जा

 

पाखरा, शेतात माझ्या

स्वानंदी भिरभिरत रहा

चिमणीच्या दातानं चार

कोवळे दाणे चोचून जा

 

मधमाशांनो पाकोळ्यांनो

तुमच्यानंच शेत फुले

परागकण वाटत जा

मधुकण सारे शोषून जा

 

असाच राहो ऋणानुबंध

शिवार देवते तुझा लळा

माझ्या भाळी एक अमिट

ललाटरेषा खेचून जा

 

© श्री प्रकाश लावंड

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ सुखाचा मंत्र… ☆ सौ. राजलक्ष्मी देशपांडे

☆ इंद्रधनुष्य : सुखाचा मंत्र… ☆ सौ. राजलक्ष्मी देशपांडे

अंगणात एक छानसा पक्षी आला होता. मी पक्ष्यांसाठी ठेवलेल्या पाण्याच्या कुंड्यात त्यानं चक्क आंघोळ उरकली. शेजारी ठेवलेले दाणे खाल्ले. पाणी प्यायला. थोडावेळ नाचला..चिवचिवला..उडून गेला. माझी सकाळ प्रसन्न झाली.मी पुन्हा कामाला लागले.

मनात सहज विचार आला..सुंदरच होता तो पक्षी. आवाजही गोड. पण ना मी त्याला पिंजऱ्यात ठेवलं, ना त्यानं माझ्याचकडे राहावं असा हट्ट धरला. ना त्यानं मी ठेवलेल्या दाण्यापाण्याबद्दल आभार मानले. खरं तर तो त्याच्या त्याच्या जगात स्वतंत्र जगत होता. योगायोगानं माझ्या अंगणात आला काही क्षण राहिला आणि उडून गेला. मला त्याच्या सहवासात आनंद झाला कारण मला त्याला बांधून ठेवायचं नव्हतं. त्याच्याकडून कसलीच अपेक्षा नव्हती माझी. मुळात मी त्याच्यात गुंतले नव्हते.

माणसांच्या बाबतीतही असाच विचार केला तर…म्हणजे अगदीच न गुंतणं शक्य नाही. विशेषत: जवळच्या नात्यात गुंततोच आपण. पण हे गुंततानाही थोडं भान ठेवलं, की हा माणूस एक स्वतंत्र जीव आहे आणि तो त्याचं आयुष्य जगायला या जगात आला आहे.आपण त्याला देऊ केलेल्या ऐहिक वस्तू(दाणा पाणी) प्रेम, संस्कार, विचार, मैत्री, मदत हे सगळं आपण आपल्या आनंदासाठी त्याला दिलं. आता ते घेऊन त्यानं उडून जायचं की आपल्या अंगणात खेळत राहायचं हा त्यांचा प्रश्न आहे ना…या सगळ्यांची कृतज्ञता व्यक्त करून दखल घ्यायची की नाही हा त्याचा प्रश्र्न आहे. आपल्याला त्याच्या सहवासाचा जो आनंद मिळाला, आपले काही क्षण आनंदात गेले, तेच पुरेसं नाही का?गीतेत भगवंतांनी अनपेक्ष असलेला भक्त मला आवडतो असं म्हटलंय. यालाच निष्काम कर्मयोग म्हणत असतील. अल्बर्ट एलिस सारखा मानसशास्त्रज्ञ सांगतात, की कुणीतरी मला चांगलं म्हणावं ही अपेक्षाच चुकीची आहे. मी सुखी होणार की नाही, हे दुसऱ्यानं माझ्याशी कसं वागावं यावर अवलंबून असेल तर आपण कधीच सुखी होणार नाही.

मग मला साहीरच्या ओळी आठवल्या…

“जो भी जितना साथ दे एहसान है…”

मी त्या बदलून मनातच अशाही केल्या,

“जो भी जैसा साथ दे, एहसान है…”

आणि सुखाचा एक मंत्र मला सापडला.

 

© सौ. राजलक्ष्मी देशपांडे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ फुलपाखरू… ☆ सौ ज्योती विलास जोशी

☆ मनमंजुषेतून : फुलपाखरू… ☆ सौ ज्योती विलास जोशी

फुलपाखराचं  वेलींवर, फुलांवर बागडणं पाहणं हे नयन सुखकारक आहेच; पण त्याहीपेक्षा त्यांच्या पंखांवरची रंगांची पखरण न्याहाळण्यात मी जास्त रमून जाते.

लहानपणी फुलपाखरांच्या मागे धावून त्यांना पकडण्याचा माझा छंद आता मला खूप खटकतो.    कदाचित इतरांचे अनुकरण करण्याचा शिरस्ता मी मोडत नसेन इतकेच!

खूप छोटी छोटी झुंडीनं येणारी आणि डोळ्याचं पातं लवतं न लवतं तोच तोच दूर निघून जाणाऱ्या फुलपाखरांचं मला आकर्षण कधी नव्हतच. तेच जर एखादे मोठे फुलपाखरू फुलावर स्थिरावलं की मी हळूच बोटाच्या चिमटीत पकडत असेआणि बोटाच्या तळव्यावर उमटलेलं मीनाकाम तासन तास बघत बसे. फुलपाखरू केव्हाच स्वच्छंदी होऊन जायचं!!

काल सकाळी नेहमीप्रमाणे गणपती साठी जास्वंदीची फुले आणावीत म्हणून गच्चीवर गेले आणि माझं लक्ष वेधलं ते एका सुरेख अशा फुलपाखराने!! बऱ्याच दिवसानंतर फुलपाखरू दिसले आणि मी मोहरले.

जांभळा, पारवा,निळा, आकाशी,गडद निळा अशा निळ्या रंगांच्या विविध छटा आणि त्यात कोरलेली सुरेख नक्षी, तीही एक सारखी, दोन्ही पंखांवर मोजून मापून काढल्यासारखी जणू फ्रीहँड ड्रॉईंग! कमाल वाटली त्या विधात्याची!!

पिन ड्रॉप सायलेन्स म्हणतात ना इतकी निरव शांतता ठेवून मी पायरीवर स्थिरावले आणि फुलपाखराला न्याहाळू लागले मधु घटातील मध चोखता चोखता परागीभवनाचे काम नकळत सुरू होतं. जसं काही स्वार्था बरोबर परमार्थ!!!

उशीर झाला तसा मला खालून घरातून बोलावणे यायला सुरुवात झाली. मांजरीच्या पावलाने खाली उतरून “मी योगा करते आहे. मी ध्यान लावून बसले आहे. मला दहा मिनिटे त्रास देऊ नका.”अशी सर्वांना तंबी देऊन पुन्हा गच्चीवर आले.फुलपाखरू गोड हसत होतं…..

फुलपाखराला टेलीपथी झाली की काय? दहा मिनिटांनी ते उडून गेलं. ते पुन्हा येईल या आशेने तिथेच घुटमळले. पण व्यर्थ….

सकाळच्या कामाची लगबग सुरू होती.जास्वंद देवाला अर्पून मी स्वयंपाकाला लागले.अहो आश्चर्यम्! तेच फुलपाखरू माझ्या स्वयंपाक घरातील मनी प्लॅन्ट वर बसलेलं मला दिसलं.लगबगीने मी आरुषला म्हणजे माझ्या नातवाला बोलावून दाखवले. तोही बराच वेळ फुलपाखरू पाहण्यात रमला. नंतर ते सवयीप्रमाणे उडून गेले. पुन्हा दिसले म्हणून मीही भरून पावले.

दिवसभर त्याच्या निळ्या जांभळ्या पारव्या रंगाचा विचार घोळत होता. डोळ्यांनी तर ते रंग साठवूनच  घेतले होते. मिक्सिंगच्या टाक्याने अगदी डिट्टो फुलपाखरू विणायचा संकल्पही झाला मनोमन!..

संध्याकाळच्या चहासाठी स्वयंपाक घरात आले आणि एकदम दचकले! फुलपाखरू माझ्या हातावरच बसलेलं दिसलं मला. त्याचा अलवार स्पर्श जाणवला ही नाही. आरुष माझ्या पाशी उभा होता.त्याच्या चेहऱ्यावर आश्चर्य आणि भीती अशा संमिश्र भावना होत्या.

जरासा हात हलला आणि ते उडून गच्चीच्या कठड्यावर जाऊन बसलं. डोळ्याची पापणीही न लवू देता आरुष एकटक त्याकडे बघत होता. माझ्यासारखाच तोही भावूक रात्री झोपेपर्यंत त्याच्या आणि माझ्यात फुलपाखरू सोडून कोणताही विषय नव्हता. आपल्या रंग पेटीतले सगळे निळे जांभळे रंग काढून तो फुलपाखरू आठवत होता.

माझ्यासारखाच फुलपाखरू चितारण्याचा संकल्प त्याने मनोमन केला असावा.

रात्री झोपतानाही आजी फुलपाखराची गोष्ट सांग असा हट्ट त्याने धरला.

“बाळा, मी तुला फुलपाखराचं छान गाणं म्हणून दाखवू का?”असे म्हणून मी ‘छान किती दिसते फुलपाखरू’ म्हणायला सुरुवात केली. ऐकता ऐकताच माझ्या पाखराच्या पापण्या मिटल्या……

सकाळी उठल्यावर मी गॅलरीचे दार उघडलं आणि खाली पडलेलं फुलपाखरू मला दिसलं. जवळचच कुणीतरी गेल्याच दुःख मला झालं. मी पटकन कुणी उठायच्या आत त्याची विल्हेवाट लावायचं पुण्यकर्म करून टाकलं.

मी विचार करू लागले की एरवी माणसांना घाबरणारा हा जीव आज माझ्या हातावर कसा काय येऊन बसला? मरणासन्न झालेलं ते माझ्या आश्रयाला आलं होतं. माझी मदत मागत होतं. मरण जवळ आलं आणि ते अगतिक झालं होतं. माझ्यावर इतका कसा त्याचा विश्वास? माझं मन त्याला उमगलं असेल का? माझ्या भावना त्याच्या पर्यंत पोहोचल्या असतील का? म्हणून तर त्याने इतक्या विश्वासाने माझ्या हाताचे चुंबन घेतलं असेल का? एक ना दोन हजार प्रश्नांचे काहूर माजले माझ्या मनात!

आरुष उठला, “आजी आज पण ते फुलपाखरू येईल ना ग?”

“हो,येईल ना! तू सगळं दूध पटापट पिऊन होमवर्क कम्प्लीट केलस तर येईल नक्की!!”

निरागस हा ही आणि निरागस ते ही…..

 

© सौ ज्योती विलास जोशी

इचलकरंजी

jvilasjoshi@yahoo.co.in

Mob.No. 9822553857

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – सप्तदशोऽध्याय: अध्याय (6) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय १७

(श्रद्धा का और शास्त्रविपरीत घोर तप करने वालों का विषय)

 

कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्‌यासुरनिश्चयान्‌ ।।6।।

पंचभूत काया तथा आत्मा को तप कष्ट

जो देते वे असुर है, अविवेकी अतिअज्ञ ।।6।।

भावार्थ :   जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं (शास्त्र से विरुद्ध उपवासादि घोर आचरणों द्वारा शरीर को सुखाना एवं भगवान्‌के अंशस्वरूप जीवात्मा को क्लेश देना, भूत समुदाय को और अन्तर्यामी परमात्मा को ”कृश करना” है।), उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान ।।6।।

 

Senseless, torturing  all  the  elements  in  the  body  and  Me  also,  who  dwells  in  the body,-know thou these to be of demoniacal resolves. ।।6।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 60 ☆ महाभारत नहीं रामायण ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय  आलेख महाभारत नहीं रामायण । इस गंभीर विमर्श  को समझने के लिए विनम्र निवेदन है यह आलेख अवश्य पढ़ें। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 60 ☆

☆ महाभारत नहीं रामायण ☆

जब तक सहने की चरम सीमा रही, रामायण लिखी जाएगी। मांगा हक़ जो अपने हित में महाभारत हो जाएगी। जी! हां, यही सत्य है जीवन का, जो सदियों से धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इसलिए जीवन में नारी को सहन करने की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि मौन सर्वश्रेष्ठ निधि है। वैसे तो यह सबके लिए वरदान है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मौन रहकर, चित्त को एकाग्र कर अपने अभीष्ट को प्राप्त किया है और जीव-जगत् व आत्मा-परमात्मा के रहस्य को जाना है। जब तक आप में सहन करने व त्याग करने का सामर्थ्य है; परिवार-जन व संसार के लोग आपको सहन करते हैं, अन्यथा जीवन से बे-दखल करने में पल-भर भी नहीं लगाते। विशेष रूप से नारी को तो बचपन से यही शिक्षा दी जाती है, ‘तुम्हें सहना है कहना नहीं’ और  वह धीरे-धीरे उसे जीवन जीने का मूल-मंत्र बना लेती है तथा पिता, पति व पुत्र के आश्रय में सदैव मौन रह कर अपना जीवन बसर करती है।

वास्तव में नारी धरा की भांति सहनशील है; गंगा की भांति निर्मल व निरंतर गतिशील है; पर्वत की भांति अटल है; पापियों के पाप धोती है, परंतु कभी उफ़् नहीं करती। इसी प्रकार नारी भी ता-उम्र सबके व्यंग्य-बाणों के असंख्य भीषण प्रहार व ज़ुल्म हंसते-हंसते सहन करती है… यहां तक कि वह कभी अपना पक्ष रखने का साहस भी नहीं जुटा पाती। वैसे तो पुरुष वर्ग द्वारा यह अधिकार नारी प्रदत्त ही नहीं है। सो! वह दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है… एक हाड़-मांस की जीवित प्रतिमा, जिसे दु:ख-दर्द होता ही नहीं, क्योंकि उसका मान-सम्मान नहीं होता। इसलिए आजीवन कठपुतली की भांति दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति बन जाती है। वह आजीवन समस्त दायित्व-वहन करती है; उसी आबोहवा में स्वयं को ढाल लेती है; दिन-भर घर को सजाती-संवारती व व्यवस्थित करती है और वह उस अहाते में सुरक्षित रहती है। बच्चों को जन्म देकर ब्रह्मा व उनकी परवरिश कर विष्णु का दायित्व निभाती है और उसके एवज़ में उसे वहां रहने का अधिकार प्राप्त होता है। यदि वह संतान को जन्म देने में असमर्थ रहती है, तो बांझ कहलाती है और उससे उस घर में रहने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, क्योंकि वह वंश-वृद्धि नहीं कर पाती। परिणाम-स्वरूप पति के पुनः विवाह की तैयारियां प्रारंभ की जाती हैं। इस स्थिति में साक्षर-निरक्षर का भेद नहीं किया जाता है… भले ही वह अपने पति से अधिक धन कमा रही हो; अपने सभी दायित्वों का सहर्ष वहन कर रही हो। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना…जहां एक शिक्षित नौकरीशुदा महिला को केवल बांझ कह कर ही तिरस्कृत नहीं किया गया; उसे पति के विवाह में जाने को भी विवश कर लिया गया, ताकि उसके मांग में सिंदूर व गले में मंगलसूत्र धारण करने का अधिकार कायम रह सके और उसे उस छत के नीचे रहने का अधिकार प्राप्त हो सके। परंतु एक अंतराल के पश्चात् घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने के पश्चात् घर-आंगन महक उठा और वह खुशी से अपना पूरा वेतन घर में खर्च करती रही। धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति नव-ब्याहता को खलने लगी और वह उस घर को छोड़ने को मजबूर हो गयी। परंतु फिर भी वह मांग में सिंदूर धारण कर पतिव्रता नारी होने का स्वांग रचती रही। है न यह अन्याय….परंतु उस पीड़िता के पक्ष में कोई आवाज़ नहीं उठाता।

सो! जब तक सहनशक्ति है, आपकी प्रशंसा होगी और रामायण लिखी जाएगी। परंतु जब आपने अपने हित में हक़ मांग लिया, तो महाभारत हो जाएगी। वैसे भी अपने अधिकारों की मांग करना संघर्ष को आह्वान करना है और संघर्ष से महाभारत हो जाता है और जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं। राजनीति हो या धर्म, घर-परिवार हो या समाज, हर जगह इसका दबदबा कायम है। राजनीति तो सबसे बड़ा अखाड़ा है, परंतु आजकल तो सबसे अधिक झगड़े धर्म के नाम पर होते हैं। घर-परिवार में भी अब इसका हस्तक्षेप है। पिता-पुत्र, भाई-भाई, पति- पत्नी के जीवन से स्नेह-सौहार्द इस प्रकार नदारद है, जैसे चील के घोसले से मांस। जहां तक पति-पत्नी का संबंध है, उनमें समन्वय व सामंजस्य है ही नहीं… वे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपना क़िरदार निभाते हैं, जिसका मूल कारण है अहं, जो मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी कारण आजकल वे एक-दूसरे के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारते, जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष है। वैसे भी आजकल संयुक्त परिवार-व्यवस्था का स्थान एकल परिवार व्यवस्था ने ले लिया है, परंतु फिर भी पति-पत्नी आपस में प्रसन्नता से अपना जीवन बसर नहीं करते और एक-दूसरे से निज़ात पाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। वैसे भी आजकल ‘तू नहीं, और सही’ का बोलबाला है। लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, जिसका मूल कारण लिव-इन व प्रेम-विवाह है। अक्सर बच्चे भावावेश में संबंध तो स्थापित कर लेते हैं और चंद दिन साथ रहने के पश्चात् एक-दूसरे की कमियां उजागर होने लगती हैं, उन्हें वे स्वीकार नहीं पाते और परिणाम होता है तलाक़, जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। वैसे आजकल सिंगल पेरेंट का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है। सो! इन विषम परिस्थितियों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? एकांत की त्रासदी झेलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे असामान्य हो जाते हैं; सहज नहीं रह पाते और वही सब दोहराते हुए अपना जीवन नरक-तुल्य बना लेते हैं।

ग़लत लोगों से अच्छी बातों की अपेक्षा कर हम आधे ग़मों को प्राप्त करते हैं और आधी मुसीबतें हम अच्छे लोगों में दोष ढूंढ कर प्राप्त करते हैं। ग़लत साथी का चुनाव करके हम अपने जीवन के सुख-चैन को दांव पर लगा देते हैं और दोष-दर्शन हमारा स्वभाव बन जाता है, जिसके परिणाम-स्वरूप हमारा जीवन जहन्नुम बन जाता है। आजकल लोग भाग्य व नियति पर कहां विश्वास करते हैं? वे तो स्वयं को भाग्य- विधाता समझते हैं और यही सोचते हैं कि उनसे अधिक बुद्धिमान संसार में कोई दूसरा है ही नहीं। इस प्रकार वे अहंनिष्ठ प्राणी पूरे परिवार के जीवन भर की खुशियों को लील जाते हैं। संदेह व अविश्वास इसके मूल कारक होते हैं। सो! समाज में शांति कैसे व्याप्त रह सकती है? इसलिए बीते हुए कल को याद करके, उससे प्राप्त सबक को स्मरण रखना श्रेयस्कर है। मानव को अतीत का स्मरण कर अपने वर्तमान को दु:खमय नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए। जीवन में सफलता पाने का मूल-मंत्र यह है कि ‘उस लम्हे को बुरा मत कहो, जो आपको ठोकर पहुंचाता है; बल्कि उस लम्हे की कद्र करो, क्योंकि वह आपको जीने का अंदाज़ सिखाता है। दूसरे शब्दों में अपनी हर ग़लती से सीख गहण करो, क्योंकि आपदाएं धैर्य की परीक्षा लेती हैं और तुम्हें मज़बूत बनाती हैं। सो! ग़लती को दोहराओ मत। जो मिला है, उन परिस्थितियों को उत्तम बनाने की चेष्टा करो, न कि भाग्य को कोसने की। हर रात के पश्चात् सूर्योदय अवश्य होता है और अमावस के पश्चात् पूनम का आगमन भी निश्चित है। जीवन में आशा का दामन कभी मत छोड़ो। गया वक्त लौटकर कभी नहीं आता। हर पल को सुंदर बनाने का प्रयास करो। जीवन में सहन करना सीखो; त्याग करना सीखो, क्योंकि अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को त्यागना पड़ता है। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करो। इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही इस संसार से जाना है। सदाशयता को अपनाओ और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठता का भाव  रखो, क्योंकि कर्त्तव्य व अधिकार अन्योन्याश्रित हैं। अधिकार स्थापत्य अशांति-प्रदाता है; हृदय का सुक़ून छीन लेता है। उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा दो, ताकि हर घर में रामायण की रचना हो सके। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष व संघर्ष को जीवन में पदार्पण मत करने दो, क्योंकि ये महाभारत के जनक हैं, प्रणेता हैं। सो! अलौकिक आनंद से अपना जीवन बसर करो।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ समझ समझकर.. ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ समझ समझकर.. ☆

प्रातः भ्रमण कर रहा हूँ। देखता हूँ कि लगभग दस वर्षीय एक बालक साइकिल चला रहा है। पीछे से उसी की आयु की एक बिटिया बहुत गति से साइकिल चलाते आई। उसे आवाज़ देकर बोली, ‘देख, मैं तेरे से आगे!’ इतनी-सी आयु के लड़के के ‘मेल ईगो’ को ठेस पहुँची। ‘..मुझे चैलेंज?… तू मुझसे आगे?’  बिटिया ने उतने ही आत्मविश्वास से कहा, ‘हाँ, मैं तुझसे आगे।’ लड़के ने साइकिल की गति बढ़ाई,.. और बढ़ाई..और बढ़ाई पर बिटिया किसी हवाई परी-सी.., ये गई, वो गई। जहाँ तक मैं देख पाया, बिटिया आगे ही नहीं है बल्कि उसके और लड़के के बीच का अंतर भी निरंतर बढ़ाती जा रही है। बहुत आगे निकल चुकी है वह।

कर्मनिष्ठा, निरंतर अभ्यास और परिश्रम से लड़कियाँ लगभग हर क्षेत्र में आगे निकल चुकी हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था लड़के का विलोम लड़की पढ़ाती है। लड़का और लड़की, स्त्री और पुरुष विलोम नहीं अपितु पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा। महादेव यूँ ही अर्द्धनारीश्वर नहीं कहलाए। कठिनाई है कि फुरसत किसे है आँखें खोलने की।

कोई और आँखें खोले, न खोले, विवाह की वेदी पर लड़की की तुला में दहेज का बाट रखकर संतुलन(!) साधनेवाले अवश्य जाग जाएँ। आँखें खोलें, मानसिकता बदलें, पूरक का अर्थ समझें अन्यथा लड़कों की तुला में दहेज का बाट रखने को रोक नहीं सकेंगे।

समझ समझकर समझ को समझो।…भाई लोग, क्या समझे!

©  संजय भारद्वाज 

प्रात: 7:43 बजे, 3.9.2020

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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