हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 13 ☆ पावस में शिव आराधना तथा उत्तम स्वास्थ्य की सहज दिनचर्या ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख  पावस में शिव आराधना तथा उत्तम स्वास्थ्य की सहज दिनचर्या)

☆ किसलय की कलम से # 13 ☆

☆ पावस में शिव आराधना तथा उत्तम स्वास्थ्य की सहज दिनचर्या

पावस को भारतीय ऋतु-चक्र में महत्त्वपूर्ण  माना गया है। पावस में ही श्रावण मास भी आता है, जो व्रत, पर्वों, उपवास तथा स्वास्थ्य के लियेअत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। श्रवण नक्षत्र के योग के कारण ही ‘श्रावण मास’ कहलाने वाले  इस मास और प्रकृति का आपस में अत्यंत मधुर संबंध है। पावस ग्रीष्म की तपन से व्याकुल जीवों को वर्षा और फुहारों से शीतलता प्रदान कर आत्मिक सुख देता है। आँखों के सामने सर्वत्र हरियाली व यत्रतत्र भरा हुआ जल दिखाई देता है। विशेषतः कृषकों के चेहरे हरे-भरे खेतों को देखकर खिल उठते हैं। प्रकृति नवयौवना सी सजने लगती है। पपीहे, मोर, चातक, कोयल व विभिन्न पक्षियों की मधुर आवाजें कानों में रस घोलती हैं। थोड़ा सा मौसम खुलते ही भँवरे व तितलियाँ  सबकी आँखों को अनोखा सुख पहुँचाती हैं। हमारे देश में सावन की झड़ी तथा वर्षा की फुहारें जनमानस में विशेष स्थान रखती हैं। जल की उपलब्धता, फसलों की पैदावार व प्राकृतिक हरियाली भी इसी वर्षा पर निर्भर करती है।

पावस  व्रत-पर्वों का समय होता है। हरियाली तीज, रक्षाबंधन, नागपंचमी व शिव को समर्पित श्रावण के सभी सोमवार, हसलषष्ठी, संतान सप्तमी आदि अनेक त्यौहार पावस को हर्षोल्लास से युक्त तथा भक्तिमय बना देते हैं। भगवान विष्णु के देवशयनी एकादशी से योगमुद्रा में जाने के पश्चात भगवान शिव ही सृष्टि के पालनकर्ता बन जाते हैं। यही कारण है कि श्रावण में शिव भगवान की सर्वाधिक भक्ति व आराधना की जाती है। इन्हीं दिनों देवी सती ने अपना शरीर त्यागने से पूर्व हर जन्म में शिव जी को ही पति के रूप में पाने का प्रण लिया था। समुद्र-मंथन से निकले विष को भी श्रावण माह में ही शिव जी ग्रहण कर नीलकंठ के नाम से विख्यात हुए। विष की तपन और व्याकुलता कम करने के लिए उस समय सभी ऋषि-मुनियों व देवताओं ने शिवजी को जल अर्पित किया था।  तब से आज तक श्रावण में शिव जी को जलाभिषेक से शीतलता प्रदान कर प्रसन्न किया जाता है। कन्यायें योग्य वर के लिए व महिलायें अपने पति की मंगल कामना हेतु व्रत, उपवास व शिव आराधना करती हैं। वैसे भी शिव ध्वनि में ऐसी विराट शक्ति है कि जिसके प्रभाव से प्राणियों के दुख-संकट दूर हो जाते हैं। “शिवमस्तु सर्व जगताम्” अर्थात संपूर्ण विश्व का कल्याण हो। आशय यह है कि जब शिव का मूल ही कल्याण हो तब उनकी भक्ति-आराधना से मनुष्यों का कल्याण तो होना ही है। अतः सनातन धर्मावलंबियों के लिए देवों के देव महादेव अर्थात शिव जी विशेष महत्त्व रखते हैं। ऐसे विशिष्ट देव और भगवान राम के आराध्य शिवजी की पूजा तथा आराधना भी विशिष्ट तरह से ही की जाती है।

मंदिरों व देवस्थानों के अतिरिक्त पार्थिव शिवलिंग का भी विशेष महत्त्व हमारे ग्रंथों में वर्णित है। स्नान करने के उपरांत इष्ट का स्मरण करते हुए गंगाजल अथवा पवित्र जल, भस्म, गाय का गोबर, कोई एक अनाज, उपलब्ध फलों का रस, कनेर के पुष्प, मक्खन, गुड़ एवं स्वच्छ मिट्टी अथवा रेत सहित सभी को किसी बड़े पात्र में लेकर गूँथ लें। तत्पश्चात पवित्र किए गए नियत स्थान पर अक्षत रखकर शिवलिंग का निर्माण करें। अभिषेक हेतु ताम्रपत्र के अतिरिक्त अन्य धातु के पात्रों का उपयोग करें, क्योंकि दुग्ध अथवा पंचामृत ताम्रपात्र में मदिरा तुल्य हो जाते हैं और हम अनजाने में शिव जी को विष का अर्पण कर देते हैं। इसी तरह शिव जी द्वारा श्रापित केतकी के फूल, तुलसी पत्र, हल्दी, सिंदूर आदि शिवलिंग पर न चढ़ायें। दुग्ध, शहद, दही, जल से शिवलिंग का अभिषेक करें। बिल्व पत्रों पर चंदन से ‘ॐ नमः शिवाय’ लिखकर शिवलिंग पर चढ़ायें। शिव जी भोले भंडारी हैं। आप के पास पूजन हेतु जो भी सामग्री उपलब्ध उनका ही उपयोग करें, शेष हेतु अपने भाव निवेदित करने से भी वही फल प्राप्त होता है। अतः जो भी उपलब्ध हो- दूर्वा, हरसिंगार, जुही, कनेर, बेला, चमेली, अलसी के फूल, शमी के पत्ते, बेलपत्र, केसर, चंदन, इत्र, मिश्री, ऋतुफल, चंदन, अबीर, भभूती, गुलाल, ऋतुफल, भाँग, धतूरा, अकौआ, श्वेत मिष्ठान, धूप, दीप, हवन, आरती के साथ पूजन संपन्न करें। पूजन के उपरांत चावल, तिल जौ, गेहूँ, चना आदि गरीबों में बाँटना चाहिए। ऐसा भी कहा गया है कि पारद शिवलिंग की पूजा से समृद्धि व धन-धान्य प्राप्त होता है। काँसे के पात्र में भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिये। शरीर पर तेल न लगायें। दिन में शयन न करें। नंदी (बैल) को हरी घास या कुछ न कुछ अवश्य खिलायें। श्रावण में व्रत न रखने वाले प्राणी स्नानपूर्व कुछ ग्रहण न करें और न ही तामसी भोजन करें। आटे की गोलियाँ मछलियों को खिलाना चाहिए। हरे पेडों को न काटें। हमारे शिव जी इतने भोले हैं कि शिवमूर्ति अथवा शिवलिंग के अभाव में भक्तजन अपने अंगूठे को भी शिवलिंग मानकर उनका स्मरण कर सकते हैं, इसीलिये  तो कहा गया है कि ईश्वर भाव के भूखे होते हैं।

भगवान शिव का अभिषेक जल से करने पर ताप-ज्वर, शहद चढ़ाने से क्षय रोग व गौ-दुग्ध से शारीरिक क्षीणता समाप्त होती है। पंचाक्षरी मंत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ के जाप से मानसिक शांति प्राप्त होती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से श्रावण मास सहित पूरे पावस में उपवास रखने से पाचन संस्थान ठीक से कार्य करता है। स्वच्छता, संतुलित भोजन, सुपाच्य फलाहार, धूप, दीप, हवन, आराधना, ध्यान, जाप आदि निश्चित रूप से शांति व स्वास्थ्यवर्धक होते हैं। व्रत, शिव आराधना, परोपकार व सात्त्विक दिनचर्या जहाँ तनाव एवं रक्तचाप बढ़ने नहीं देती वहीं मानव कठिन परिस्थितियों में विचलित भी नहीं होता। ऐसा करने पर प्राणी स्वयं से मौसमी बीमारियाँ दूर रखते हुए नीरोग रह सकता है, क्योंकि अब यह वैज्ञानिक तौर पर भी सिद्ध हो चुका है कि कुछ मंत्रों के जाप, शंख ध्वनि, तुलसी, पंचामृत, पंचगव्य, हवन, धूप आदि हानिकारक जीवाणुओं और विषाणुओं को नष्टकर हमें अनेक बीमारियों से सुरक्षित रखने में सक्षम हैं।

पावस में प्राकृतिक सौंदर्य बढ़ जाता है। धरा को जलवृष्टि से संतृप्ति मिलती है। पावस प्राणियों में सद्भावना का गुण विकसित करता है। पवित्रता, स्वच्छता तथा संयमित खानपान हमें बीमारियों से बचाते हैं।  प्राणियों द्वारा किये जाने वाले व्रत, उपवास और शिव की पूजा-आराधना का विधान संपूर्ण विश्व के कल्याण हेतु ही बना है। यही पावस के श्रावण मास में शिव आराधना का उद्देश्य तथा उत्तम स्वास्थ्य की सहज दिनचर्या भी है।

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

दिनांक: 22 जुलाई 2020

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 59 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं   “भावना के दोहे। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 59 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

कलम

कलम आज जो लिख रही,

जीवन का संग्राम।

दर्ज हुआ इतिहास में,

रणवीरों के नाम।।

 

यामा

यामा के संघर्ष को,

मिला अंततः न्याय।

चाहत ने अभिनव लिखा,

जीवन का अध्याय।।

 

आमंत्रण

आमंत्रण अनुराग का,

करते हैं स्वीकार।

हल्दी, कुमकुम में रचा,

बसा तुम्हारा प्यार।।

 

अनुराग

प्रियतम के प्रति चित्त में,

यह कैसा अनुराग।

प्रति दिन छल करता रहा,

किया नहीं पर त्याग।।

 

नलिनी

नलिनी जब खिलने लगी,

हर्षित हुए तड़ाग।

कल-कल कल झरना बहे,

मधुरिम गाता राग।।

 

अनुराग

कभी प्रेम की बांसुरी,

कभी सुरों का राग।

कभी पिया की रागिनी,

जीने का अनुराग ।।

 

तर्पण

है आमंत्रण काग को,

जगे काग के भाग।

पितरों को तर्पण करें,

बुला मुँडेर काग।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – कथा-कहानी – ☆ अगले बरस तू जल्दी आ ☆ – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर 

 

 

 

 

 

(  श्री सदानंद आंबेकर जी की हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में विशेष अभिरुचि है। गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर प्रवास श्री सदानंद आंबेकर  जी  द्वारा रचित यह समसामयिक लघुकथा ‘अगले बरस तू जल्दी आ’ हमें वर्तमान जीवन के कटु सत्य से रूबरू कराती है । बंधुवर  श्री सदानंद जी  की यह लघुकथा पढ़िए और स्वयं तय करिये। इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्री सदानंद जी की लेखनी को नमन ।

 लघुकथा  – अगले बरस तू जल्दी आ

पवित्र कैलाश  पर्वत की श्वेत चोटी पर सविता देवता की प्रथम रश्मियों के आगमन के साथ ही भगवान शिव  गुफा से बाहर आये तो देखा गणाधीश  विनायक का पृथ्वी से आगमन हो चुका है।

भोले नाथ से प्रसन्न वदन से पूछा – कहो वत्स इस बार कैसी रही पृथ्वी की यात्रा ?

पिता का चरण वंदन कर गणनाथ ने शून्य  में देखते हुये अनमने भाव से कहा – ठीक ही रही पिताश्री।

महादेव ने कुछ चिंता से पूछा – क्या बात है पुत्र कुछ अप्रसन्न दिख रहे हो? क्या इस बार भारत भू पर तुम्हारी उचित उपासना नहीं हुई?

मंगलमूर्ति ने नीची दृष्टि से ही उत्तर दिया – उपासना तो सदैव की भांति हुई किंतु इस बार उस पुण्यभूमि भारतवर्ष  एवं शेष  क्षेत्रों में स्थिति को देखकर मुझे मानव पर बहुत दया आई।

भगवान गंगाधर ने पूछा – अरे, ऐसा क्या हो गया ? सब कुशल तो है ? किसी देवता ने कोई श्राप आदि तो नहीं दिया ?

गणनाथ ने बहुत धीमे स्वर कहा – ऐसा तो लगता नहीं है, पर भारत माता के सब पुत्र बहुत कष्ट में हैं। इन दिनों पूरी धरती पर एक भयावह बीमारी चल रही है जिसके कारण भगवान ब्रह्मा की बनाई धरती पर हाहाकार मचा हुआ है। इस बार भारतवर्ष  में मेरी स्थापना भी बहुत कम स्थानों पर हुई है। इसके अतिरिक्त पूरे देश  में मुझे जलप्रलय की सी स्थिति दिखाई दी, चहुंओर असुरक्षा, महिला उत्पीडन, हत्या की अनेक घटनायें, बड़े बड़े  देश एक दूसरे से युद्ध को उद्यत दिख रहे थे। उस बीमारी के संकट के कारण गरीब मनुष्य  की तो छोड़ें पूरे संसार की अर्थव्यवस्था संकट में आ गई है। अनेकानेक लोगों के सेवा और व्यवसाय बंद हो गये हैं। कुल मिलाकर बहुत ही चिंताजनक स्थिति निर्मित दिखाई दी और जब कल अंतिम दिन बिदाई के समय भक्तों ने कहा – अगले बरस तू जल्दी आ तो मेरा मन भर आया कि ऐसी विपरीत स्थिति में मैं कैसे फिर जाऊंगा !!!!  पिताश्री ये ऐसी स्थिति क्यों हुई है ?

यह सुनकर भोलेनाथ ने गंभीर होकर उत्तर दिया – तो यह बात है , पुत्र, यह सब मानव का ही किया हुआ है, अनियमित-असंयमित जीवन, प्रकृति का दोहन, अति लालसा के कारण अपराध, इन सबकी परिणति इस रूप में है। इसके लिये मनुष्य  को स्वयं ही प्रयास करने होंगे, अपना दृष्टिकोण बदलना होगा तो हम भी उनका साथ देंगे, अन्यथा मेरी बनाई हुई व्यवस्था के अनुसार मनुष्य  को महाविनाश  के लिये तैयार रहना होगा- – –
कहते कहते भगवान शिव  की मुख मुद्रा भी गंभीर होती चली गई।   .  .  .  .  .  .  .  .  .

©  सदानंद आंबेकर

शान्ति कुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखंड)

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विजय सूर्य मुस्कायेगा! ☆ श्री अमरेंद्र नारायण

श्री अमरेंद्र नारायण

( आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं  देश की एकता अखण्डता के लिए समर्पित व्यक्तित्व श्री अमरेंद्र नारायण जी की ओजस्वी कविताविजय सूर्य मुस्कायेगा! )

☆ विजय सूर्य मुस्कायेगा!  

कट जायेगा

यह कठिन समय कट जायेगा

कुहरे से निकलेगा सूरज

स्वर्णकिरण बिखरायेगा!

 

कट जायेगा

पुरुषार्थ की भट्ठी में तप कर

सारा तलछट कट जायेगा

कुंदन ही दमकता आयेगा!

 

कट जायेगा

संघर्ष,जूझने  की शक्ति से

चक्रवयूह कट जायेगा

शत्रु भी मुंहकी खायेगा

 

कट जायेगा

श्रद्धा भक्ति की महिमा से

मन का भी कलुष कट जायेगा

नर और निखर कर आयेगा!

 

कट जायेगा

जो लोग समझते हैं कायर

उनका भ्रम भी कट जायेगा

आक्रमणकारी पछतायेगा

 

कट जायेगा

संघर्ष एकता  शक्ति से

हर कुटिल जाल कट जायेगा

विजय सूर्य मुस्कायेगा!

 

©  श्री अमरेन्द्र नारायण 

२९ अगस्त २०२०

जबलपुर

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 50 ☆ एक बुन्देली रचना ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  “एक बुन्देली रचना। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 50☆

☆ एक बुन्देली रचना ☆

 

आपहुं आप मुंह फुला ऱए काय के लाने

बिन बुलाए ही घर खों आ ऱए काय के लाने

 

कभहुँ बात समझ कछु आतई नइयां

जबरन हम खों चाटे जा ऱए काय के लाने

 

नेता के संग बहुतई घूम घूम खें

उसई सब खों धमका ऱए काय के लाने

 

कहवे खों तो झट बुरो मान रए दद्दा

मास्क मुँह में नहीं लगा रए काय के लाने

 

कोरोना में लूट मची अस्पतालन की

लाखों खों खर्चा बता रए काय के लाने

 

कोरोना की आड़ में जबरन डर फैला खें

जइ बहाने खूब कमा रए काय के लाने

 

ढ़ीली कर दी सरकारों ने लगाम अब तो

जन-जन खों “संतोष” भी नइयां काय के लाने

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ लपलास का रे देवा…. ☆ श्री गौतम कांबळे

☆ कवितेचा उत्सव : लपलास का रे देवा…. ☆ श्री गौतम कांबळे 

वाचवेल कोण आता सांग तुझ्या लेकराला

लपलास का रे देवा गाभाऱ्यात आडोशाला

 

माझी काया रे नाजूक तुझे अंग दगडाचे

कसे कळणार दु:ख तुला जंतू प्रतापाचे

कधी फुटेल पाझर तुझ्या दगडी मनाला

लपलास का रे देवा गाभाऱ्यात आडोशाला

 

कष्टातला माझ्या घास वाहिला मी तुझ्या पायी

कर्मकांडे तुझी मी रे कधी चुकवली नाही

दुग्ध अभिषेक तुला भुके ठेवून बाळाला

लपलास का रे देवा गाभाऱ्यात आडोशाला

 

कसा ठेवू भरवसा सांग तुझ्या आस्तित्वाचा

ठेवा येईल कामाला माणसाच्या कर्तृत्वाचा

सारे शांत झाल्यावर धावशील तू श्रेयाला

लपलास का रे देवा गाभाऱ्यात आडोशाला

 

© श्री गौतम कांबळे

सांगली

मो – ९४२१२२२८३४

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेखर साहित्य # 4 – लाडक्या (न पाहिलेल्या) लेकीस!! ☆ श्री शेखर किसनराव पालखे

श्री शेखर किसनराव पालखे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेखर साहित्य # 4 ☆

☆ कविता – लाडक्या (न पाहिलेल्या) लेकीस!! ☆

तुझ्या आठवांचा बहर

जरासा ओसरेस्तोवर

तू पुन्हा उभी ठाकतेस

माझ्या मनाच्या गाभाऱ्यात

आणि खुणावत राहतेस

माझा अप्रिय भुतकाळ

किती बरं वर्ष झाली?..

तुझ्या अस्तित्वाच्या पाऊलखुणा

शोधता शोधता हा म्हातारा

हरवून बसलाय स्वतःला..

आताशा तू स्वप्नं रंगवत असशील तुझ्या

उज्ज्वल भविष्याची -(माझ्याशिवाय)

मी मात्र अडकून पडलोय

माझ्याबरोबरच्या तुझ्या भूतकाळात

तू जवळ असल्याचे काही मोजके क्षण

अन तू दूर गेल्यानंतचे सगळेच क्षण

मी कसा जगत आलोय

याचंच नवल वाटतंय आता

बाकी काही नाही पण

या लादलेल्या एकांतवासात

मी मलाच सापडत नाही ..

अन तुही…….

 

© शेखर किसनराव पालखे 

पुणे

07-04-2020

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ धोका ☆ श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

श्री भगवान वैद्य प्रखर

☆ जीवनरंग : लघुकथा : धोका –  श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’☆

मोबाइल वाजला. घरात पोछा लावित असलेल्या बाईनी मोबाइल उचलला आणि घाई-घाईत चालत जाऊन बाहेर झाडांना पाणी देत असलेल्या वयस्क गृहस्थांना म्हणाली, ‘‘बाबूजी…फोन…!’’

वयस्क गृहस्थ अलजाइमरनी आजारी.  थरथरत्या हातात फोन घेऊन नांव बघू लागले. नंतर संयमी स्वरांत बोलू लागले, ‘‘हैलो…हैलो…हैलो…आवाज येत नाही आहे…।’’

तिकडून पुन्हा आवाज आला, ‘‘हैलो…हैलो…बाबा…! तुम्ही लोकं घरी आहात काय बाबा…! हैलो…हैलो…बाबा…माझी घरी यायची इच्छा आहे बाबा…’’ उत्तराखातर वयस्क गृहस्थ फक्त हैलो…हैलो…हैलो करीत राहीले. ‘‘हैलो…हैलो…मला कांहीच ऐकायला येत नाही आहे…हैलो…!’’ आणि वयस्क   गहस्थानी मोबाइल बंद करुन टाकला.

थोड्या वेळानी पुन्हा बेल वाजली. वयस्क व्यक्तिने नाव वाचले आणि स्वत: बंद होईपर्यंत बेल वाजू दिली.

‘‘आवाज तर येत होता. स्पीकर सुरु होता न! मी ऐकला. अनुरागचाच आवाज होता. तो घरी येतो म्हणतो. तिथे कोणत्या परिस्थितीत आहे आपला मुलगा कोण जाणे? …तुम्ही असं कां बरं केलं?’’ शेजारी मनी-प्लांट सावरत असलेली वयस्क स्त्री जवळ येऊन उभी झाली होती.

‘‘गौरी…पंचायतीनं कालच निर्णय घेतला आहे की जो पर्यंत हे कोरोना वायरस संपत नाही तोवर बाहेरुन कोणालाच गावांत येऊ दिलं जाणार नाही. आपला मुलगा ज्या शहरात आहे तिथे सर्वात जास्त केसेस पॉजिटिव निघालेल्या आहेत. अशा स्थितित त्याचे इथे येणे संपूर्ण गावाकरिता धोक्याचे ठरू शकते. ’’

‘‘आणि त्याचे तिथेच राहणे..?’’ थरथरत्या आवाजात एक प्रश्न हवेत गुंजारव करित राहीला.

वयस्क गृहस्थानी ऐकले खरे पण कांहीच उत्तर दिले नाही. बंडी च्या खिशातून एक रुमाल काढला आणि बाहेर आलेल्या अश्रुंना वाट मोकळी करुन देत पुन: झाडांकडे वळले.

© श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

संपर्क : मो. 9422856767, 8971063051  * E-mailvaidyabhagwan23@gmail.com *  web-sitehttp://sites.google.com/view/bhagwan-vaidya

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ कासव …. ☆ श्रीमती अनुराधा फाटक

श्रीमती अनुराधा फाटक

प्रकाशित साहित्य – बालसहित्य- कथा संग्रह 18, किशोर कादंबरी 3, काव्यसंग्रह 2,

संकीर्ण 1

प्रौढ साहित्य – काव्यसंग्रह 3, कथासंग्रह 12,कादंबरी 11, वैचारिक 11

पुरस्कार 18

☆ इंद्रधनुष्य : कासव …. ☆ श्रीमती अनुराधा फाटक

कासव!

समुद्रमंथनाच्या प्रसंगी मंदार पर्वताला आधार देण्यासाठी भगवान विष्णूनी कूर्मावतार- कासवावतार घेतला होता. त्या प्रसंगाचे प्रतिक म्हणून बहुतेक देवालयात, सभामंडपात किंवा अन्यत्र दगडात कासवाची आकृती खोदलेली दिसते. उंच शिखरयुक्त मंदिर म्हणजे मंदार पर्वत होय. त्याला आधारभूत म्हणून कासव रुपात विष्णूची प्रतिमा असते. देवत्व प्राप्त झालेले हे कासव लहान मुलांना प्रिय असते.

मंद चालीच्या कासवाची आणि सशाची पैज लागली असता गडबडीने धावणाऱ्या सशाने फाजील आत्मविश्वासापोटी विश्रांती घेतली आणि तोवर कासव पुढे गेले.गडबडून जाऊन स्वतःची फजिती करून घेण्यापेक्षा विचारपूर्वक केलेले काम कासवाप्रमाणे यशस्वी हो कितीही संकटे आली तरी सर्व संकटांना खंबीरपणे तोंड देऊन यशस्वी होणारी माणसं कासवाच्या पाठीची असतात मात्र अशा कासवाच्या पाठीच्या माणसांना थोडीसुद्धा कासवदृष्टी म्हणजे दया नसते, तर कासव पाठीप्रमाणं ही माणसं कठीण,कठोर अंतःकरणाची असतात.संतानी मात्र सर्वांकडे कासव दृष्टीने म्हणजे दयाळू अंतःकरणाने पाहिले.

पाण्यात व पाण्याबाहेर रहाणाऱ्या कासवाच्या पाठीचा उपयोग ढालीसारखा होत असे त्यामुळे पाठीची ढाल करणे म्हणजे संरक्षणासाठी लढणे हा वाक्प्रचार रूढ झाला असावा.

कासवाच्या पाठीपासून विविध वस्तू बनवितात.कासवाच्या पाठीसारखे टणक असणारे शिवधनुष्य सीतास्वयंवरात ‘पण ‘ म्हणून ठेवले होते.’ बहु कठो म्हणे धनु जानकी, निपट कासव पृष्ठ समानकी l असा उल्लेख सीतास्वयंवरात आढळतो.

आयुष्याच्या शेवटच्या क्षणी माणसाची सर्व गात्रे आवळली जातात.सर्व कारभार आटोपतो त्याला  ‘ कासवासमान ‘ गाड्डा( गात्रे) आवुळली म्हणतात.

एखादा श्रीमंत माणूस  अडचणीत असताना दुर्दैवाने त्याला गरिबाला जामीन रहाण्यासंबंधी विनंती करावी लागते.अशा अवस्थेला कोकणी भाषेत ‘ कासवाक कोंबो जमान ‘म्हणतात.

कासवाच्या पिलाची भूक कासवाच्या प्रेमळ नजरेने भागते असे म्हणतात. तुकाराम महाराज म्हणतात,’ कासवाचे बीळ आहे कृपादृष्टी ,दुधा नाही भेटी अंगसंगे। ‘

सशाच्या शिंगाप्रमाणेच कासवाचे तूप ही गोष्ट असंभवनीय असल्याने,जेव्हा असंभवनीय गोष्टीबद्दल चर्चा होते,तेव्हा तो प्रकार म्हणजे कासवाचे तूप आणण्याचाच प्रकार होतो.

कासवाच्या पाठीचा उपयोग पोटातले म्हणून जो रोग होतो त्यावर औषधासारखा होतो तर बस्तीप्रदेश ताणला जाऊन त्याच्याअंगी जे कठीण्य येते त्याला ‘ कासव्या रोग ‘ म्हणतात.

कासव काशिंदा या प्रकारचे एक झुडुप असून तरवडापेक्षा त्याची पाने बारीक असतात.

हातास किंवा पायास पाणी असलेला जो फोड होतो त्याला कासवफोड’ म्हणतात.प्रामुख्याने काटा टोचल्याने जे कुरुप होते त्यास ‘ कसवकुरुप’ म्हणतात.

पाण्यात राहून माशाशी वैर न करता पाण्यातील घाण खाऊन पाणी स्वच्छ करून प्रदूषणाचा समतोल राखणारे कासव आजही देवपण टिकवून आहे.

 

© श्रीमती अनुराधा फाटक

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ निरोप समारंभ ☆ सौ.अमृता देशपांडे

: निरोप समारंभ ☆ सौ.अमृता देशपांडे

ऑफिस मधला एक सहकारी रामानंद आज सेवानिवृत्त झाला. त्या निमित्ताने एक छोटासा कार्यक्रम आयोजित केला होता. कोणी ही  सेवानिवृत्त होतानाचा हा दिवस खूपच वेगळा असतो.  सकाळी 9 ते संध्याकाळी 6, दिवस भर एकत्र काम करणे, खाणे- जेवणे, एकमेकांवर रागावणे, रुसणे, एकमेकांची काळजी घेणे, आपलं काम

जितकंं चांगले करता येईल तितका प्रयत्न करणे.  या सर्वात इतकी वर्षे कशी गेली कळतच नाही. सेवानिवृत्त होणारी व्यक्ती उद्यापासून आपल्यात नसणार ही हुरहुर सर्वांना अस्वस्थ करते. निवृत्त होणार्या व्यक्तीच्या  मनात तर भावनांचे काहूर माजलेले असते. काळीज गलबलून गेलेले असते.  मनातलं  वादळ, गलबलणं, चेहर्यावर दिसत असतं. खूप ह्रदयस्पर्शी असतो तो दिवस.

रामानंदच्या निरोप समारंभाचा प्रसंग.  आज प्रास्ताविकापासून सगळं  वातावरण घरगुती स्वरूपाचं होतं. प्रेमळ आणि साधेपणाचं होतं.  आपण घरी जसे एकत्र जमून छोटंसं स्नेहपूर्ण संमेलन करतो, अगदी तसं…..कुठेच औपचारिकता नाही, कुणाचा ईगो नाही, सर्वच जण आपापली post ची शाल आपल्या जागेवर ठेऊन मनमोकळ्या स्वच्छ मनाने एकत्र जमले होते. मनाच्या कोपर्यात चलबिचल होती, रामानंद उद्या पासून ऑफिस मध्ये असणार नाही याची.

रामानंद मॅनेजिंग डायरेक्टर श्री भट सर यांच्या ऑफिस मध्ये attendant म्हणून काम करत होता. पर्सोनल खात्याच्या श्री बाल्लीकर सरांनी त्याच्या कामाची मोजक्या पण अर्थपूर्ण, यथोचित आणि नेमक्या शब्दात प्रशंसा केली.  ते काही वरवरचे शब्द नव्हते.  त्यातलं खरेपण आम्ही सर्वांनी अनुभवलेलं होतं. त्याचं पटपट चालणं, चटचट काम करणं, भराभर फाईल्स पोहोचवणं. कधीच  कामचुकारपणा नाही, वेळकाढूपणा नाही कि कंटाळा नाही.  चालण्या बोलण्यात, काम करण्यात ex- serviceman ची शिस्त आणि तत्परता होती. नेहमीच स्वच्छ, व्यवस्थित  inshirt केलेला पेहराव.  गबाळेपणाला थारा नाही. ना वागण्यात, ना बोलण्यात, ना कामात. आजही त्यानं घातलेला गुलाबी शर्ट त्याला छान शोभत होता. त्याच्याच सहकारी मित्रांनी त्याला आज प्रेमानं भेट दिला होता.

स्टेजवर होते फक्त दोघं. भटसर आणि रोज सकाळी आल्यावर चहा देणारा रामानंद. मला भट सरांचही कौतुक वाटलं आणि मनातला आदर दुणावला.

रामानंदला तुला काही बोलायचं आहे का असं विचारण्यात आले.  खूपदा निवृत्त होणारा नाही बोलत. मन असंख्य आठवणीनी आणि भावनांनी व्याकुळ झालेलं असतं. डोळ्यांच्या काठांवर थोपवलेलं पाणी कोणत्याही क्षणी  कोसळेल असं वाटत असतं. पण रामानंदनं सुखद धक्काच दिला. तो बोलायला उभा राहिला.  …….” MD साहेबा, सब बडे साहेबा, और मित्रों…. हे शब्द मनाला स्पर्शून गेले. पहिल्यांदाच त्याचं इतकं सलग बोलणं ऐकलं. एरव्ही कामाशिवाय तो जास्त बोलत नसे. त्याच्या शब्दातून, भावना व्यक्त करण्याच्या शैलीवर भारतीय सैन्य दलातील हिंदीचा प्रभाव थक्क करणारा होता. अतिशय सहज, सोप्या भाषेत त्याने मनातले भाव व्यक्त केले. मनाच्या गाभार्यातून आलेल्या ह्रदयस्पर्शी भावना साध्या शब्दातूनही किती सुंदर परिणाम साधतात, हे सर्वांनी कडकडून वाजवलेल्या टाळ्यांनी सिद्ध केले.

सैन्य दलातून निवृत्ती घेऊन तो 18 वर्षांपूर्वी EDC त आला. आज तो याही सेवेतून मुक्त झाला.  मुलं अजून शिकत होती.  आर्थिक परिस्थिती पण जेमतेमच.  पण कुठेच त्रासिक पणा नाही, रड नाही, ” आणि दोन वर्षे वाढवून द्या, एक तरी  द्या……” अशी भीक नाही मागितली. शांत, समाधानी, नम्र स्वभाव. उद्यापासून काय करायचं ते आधीच ठेवलेलं. वयाची साठी आली तरी आरोग्य ठणठणीत कसं ठेवायचं ते त्याच्याकडून शिकावं.

Healthy mind stays in healthy body. समाधानी वृत्तीच चांगल्या आरोग्याची गुरुकिल्ली असते. कामचुकारपणा? लबाडी, अति हव्यास, हेवेदावे, मत्सर, खरेपणाचा अभाव अशा वृत्तींमुळे आपण सुखाला मुकतो आणि आनंदाला पारखे होतो.

रामानंदची समाधानी वृत्ती, सतत  कार्यरत रहाण्याची धडपड, आणि साधेपणा खूपकाही शिकवून गेला. आभार मानताना त्यानं हिंदीतून व्यक्त केलेलं अस्खलित आणि ओघवतं मनोगत खूपच भावलं.

इतकी वर्षे आपल्या बरोबर असणार्या सहकारी मित्राची नवी ओळख सर्वांचंच मन हेलावून गेली. वयाच्या 18 व्या वर्षी भारतीय सैन्य दलात सामील होऊन 40 व्या वर्षापर्यंत तेथील कडक शिस्तीचे, कठोर परिश्रमांची नोकरी संपवून घरी आला. Ex serviceman म्हणून आमच्या ऑफिस मध्ये आला.  आता 58 व्या वर्षी निवृत्त झाला. आता तो त्यांच्या घराण्याचा पारंपारिक व्यवसाय आनंदाने करतो. मासे गरवण्याचा. म्हणजे गळ टाकून मासे पकडणे.

आधी देशसेवा, नंतर राज्यसेवा, आता पारंपरिक व्यवसाय.  सर्वार्थाने आयुष्यातली परिपूर्ती हीच आहे ना!

 

© सौ.अमृता देशपांडे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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