हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वतंत्रता संग्राम के अनाम सिपाही -लोकनायक रघु काका-4 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  एक धारावाहिक कथा  “स्वतंत्रता संग्राम के अनाम सिपाही  -लोकनायक रघु काका ” का द्वितीय  भाग।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – स्वतंत्रता संग्राम के अनाम सिपाही  -लोकनायक रघु काका-4

अब तूफ़ान थम चुका था। उनके सारे सपने बिखर गये थे। वे वापस  लौट चलें थे।  अपने गाँव की उन गलियों की ओर जिसके निवासियों ने उन्हें अपार स्नेह दिया था। वहीं पर उनके अपने ने घृणा नफरत का उपहार दिया था।उन्हें प्रांगण से ‌बाहर निकलता देख रामखेलावन की जान में जान आई थी,और तुरंत मंचासीन हो अपनी कुर्सी संभाल चुके थे। प्रतियोगियों को पुरस्कृत भी किया था।  लेकिन उनके हृदय का सारा उत्साह जाता रहा था।  उन दोनों बाप बेटों के मन में अपने ही विचारों के  अंतर्द्वंद्व की  आँधियां चल रही थी।  दोनों की व्यथा अलग अलग थी। रामखेलावन सोच रहे थे कि यही स्थिति रही तो एक न एक दिन बूढ़ा बेइज्जती कर ही देगा। पिता जी के आचरण से मुझे अपमानित होना पड़ेगा। उन्होंने अपने मन‌ में झूठी शानो-शौकत तथा बड़प्पन का दंभ पाल लिया था।वे शायद यह भूल चुके थे कि वह आज जो कुछ भी है,वह रघूकाका के त्याग तपस्या व व्यवहार का परिणाम था। उसी के चलते ऊँचा ओहदा ऊँची कुर्सी मिली थी। वे आज दृढ़ निश्चय कर घर को चले थे कि अब और नहीं वे आज ही बुढऊ की ढोल खूंटी पर टांग देंगे। एक तरफ जहां रामखेलावन के‌ हृदय में आक्रोश की ज्वाला क्षोभ का लावा उबाल मार रहा था, वहीं  रघूकाका किसी हारे हुए जुआरी की तरह  ‌बोझिल कदमों से घर लौट रहे थे

ऐसा लगा जैसे ‌जीवन के जुये में एक ही दांव पर वे अपना सब कुछ अपनी ‌सारी पूँजी एक बार में ही हार बैठे हों। आज चोट बलिष्ठ शरीर पर नहीं भावुक दिल पर लगी थी। वे सोच रहे थे कि काश उस दिन अंग्रेजों की एक गोली उनके छाती में उतर गई होती तो अपमान जनक जिंदगी से सम्मानजनक मौत भली होती। इस प्रकार भावनाओं के भंवर में ‌डूबते उतराते ही रघूकाका घर  पहुँचे थे। तब तक राम खेलावन का तांगा भी घर के दरवाजे पर आ लगा था।

लालटेन की‌ पीली जलती हुई लौ की रोशनी के साये में उन दोनों बाप-बेटे का‌ सामना हुआ था।

एक ही रोशनी में बाप बेटों का रंग अलग अलग दिख रहा ‌था। रघूकाका का चेहरा जहां जूड़ी के बुखार के मरीजों की तरह पीला म्लान एवम् उतरा दीख रहा था, वहीं रामखेलावन के चेहरे की‌ भाव भंगिमा बता‌ रही थी कि आक्रोश की आग में  जलते दहकतेअंगारों सी लालिमा लिए रामखेलावन रूपी उगता सूरज आज अवश्य कहर ढायेगा ।

रघूकाका के सामने आते ही ना दुआ ना सलाम फट पड़े थे बारूद के गोले की तरह रामखेलावन – “का हो बुढ़ऊ!  काहे हमरे इज्जत के कबाड़ा करत हउआ,अब तक ई ढोल रख द, तोहार सारी कमी हम पूरा करब।”

अब रघूकाका से भी रहा नहीं गया।

उनके हृदय में पक कर मथ रहा भावनाओं का‌ फोड़ा फूट‌ पडा़ और वे भी अपने ‌ताव में आ गये और बोल पडे़ – “राम खेलावन जी, आज ई जे कुर्सी  तोहके मिलल ह, ई
एही ढोल के कमाई ह, हमें खुशी तो तब होत जब तूं सारे समाज के सामने सीना तान के कहता कि हम‌ एगो आल्हा गावे‌ वाला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के लडिका हई, जेवन
अपने मेहनत अ इनके ‌परिश्रम के पसीना से इहा तक पहुंचल हइ,। औ अपने समाज के उदाहरन‌ बनता, लेकिन जे समाज में अपना बाप के बाप ना कहि‌ सकल उ बेटा के रिस्ता का निभाई,जा बेटा‌ तू आपन सम्मान के‌ जिनगी में सुखी रहा, हमें हमरे हाल पे छोडि दा  तू भले छूटि जईबा लेकिन  ई समाज अ ढोलक हम ना छोडि पाईब” इस ‌प्रकार रघूकाका के व्यंगबाणो ने रामखेलावन को आहत तो किया ही । निरूत्तर भी,और बह चली उस सेनानी की आंखों से अश्रु धारा और फिर एक बार लौट चलें अपनी‌ सहचरी  ढोल को कंधे पे‌ लटकाये नीम स्याह काले घने अंधेरे के बीच जीवन की पथरीली राहों पर अपने जीवन की नई राह तलाशने। उस राह पे चल पड़े उल्टे पांव जिस राह से चलकर वे घर आये थे।

उन्होंने उस नीम अंधेरी घनी  काली आज की ‌रात  अपने मन में मचलते अंतर्दद्व के साथ शिवान में खेतों बीच बने भग़्न शिवालय में ‌बिताने का निश्चय कर लिया था। आखिर वे जाते भी तो कहां ? राम खेलावन की उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं हुई थी। वो सोच रहे थे कि कल की मंजिल सुबह की सूर्योदय के साथ नई उम्मीद के सहारे ढ़ूढ़ ही लेंगे ।
वो मंदिर के बरामदे में बैठे कुछ सोच रहे थे। गतिशील समय के साथ रात गहराती जा रही‌ थी और उसी गहराती रात के साथ रघूकाका के हृदय का अंतर्दद्व तीव्र हो चला था। उसी अंतर्दद्व में फँसे अपनी स्मृतियों डूबते चले गये थे। जब विचारों की गहनता बढ़ी तो रघूकाका के‌ स्मृतिपटल पर पत्नी का  चेहरा नर्तन कर उठा।  ऐसा लगा जैसे वे उन बीते पलों से संवाद कर उठे हो।

उन्हें पत्नी के साथ बिताए ‌पल हंसाने व रूलाने लगे थे।  सहसा उनके स्मृति में पत्नी के मृत्यु के समय का दृश्य उभर आया थाऔर जीवन के आखिरी पल में कहे पत्नी के शब्द याद आ रहे थे।

आखिरी समय में उनकी पत्नी ने प्यार से उनका हाथ थामते हुए आशा भरी नजरों से उन्हें देखते हुए कहा था “देखो जी रामखेलावन अभी बच्चा है इसे पाल पोस कर अच्छा इंसान ‌बनाना , . मेरे मरने पर इसी के‌ सहारे जीवन बिताना। अपना बुढ़ापा काटना। लेकिन दूसरी शादी मत करना।”

इसके बाद वह कुछ नहीं कह पाई क्यो कि रघूकाका ने उसको ओंठो पर अपना हाथ रख दिया।अब जीवन के आखिरी पलों में बिछोह‌ पीड़ा का भाव रघूकाका के हृदय में कटार की तरह चुभ रहे थे, जिसे सहने में वे असहाय नजर आ रहे थे। और फिर अगली सुबह उनकी पत्नी उनको रोता बिलखता छोड़ नश्वर संसार से बिदा हो गई।

क्रमशः …. 5

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ स्वप्नपालवीची आस ☆ सौ. मनिषा पाटील

☆ कवितेचा उत्सव ☆ स्वप्नपालवीची आस ☆ सौ. मनिषा पाटील ☆

 

वेदनांचा मळवट

नाही ओंजळीत सुख

कुरतडे काही आत

मनामध्ये रुखरुख

 

कसे गाठू क्षितिजाला

पायी रस्ता सरेना

दाटे आठवांचे नभ

तरी पाऊस झरेना

 

मधमाशीने फुलांना

दंश जहरी मारिला

तडफड पाकळ्यांची

आता सोसेना जिवाला

 

असे अवेळी नात्याचे

फूल फूल गळताना

स्वप्नपालवीची आस

कशी छळे जळतान

 

© सौ. मनिषा पाटील

मु/पोःदेशिंग हरोली

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ सामाजिक दूरी (अंतर) ☆ डॉ. वसुधा गाडगीळ 

डॉ. वसुधा गाडगीळ 

☆ जीवनरंग  ☆ सामाजिक दूरी (अंतर) ☆ डॉ. वसुधा गाडगीळ  ☆

”  वर्तमानपत्रातही आले आहे  , आता सामाजिक रीत्या सर्वांना एकमेकांपासून दूर राहावेच लागणार आहे. कुठेही येणे नको जाणे नको ! आम्हाला सर्वांना घरात कोंडूनच राहावे लागणार. समजलात का ! कसली नातीगोती  आणि कसलेकाय ! ” दिलीपने अख्या कुटुंबाला ही बातमी वाचवून दाखवली आणि तणावाने म्हणाला

” केवढा कठीण काळ आला आहे ! ”

” अगदी सोपे आहे दिलीप ! तुम्ही सगळेजण  एकमेकांबरोबर बसून जेवणखाण करता ना….. मी तर कित्येक वर्षांपासून बाजूच्या पड़वीत एकटा… ”

वडिलांच्या तोंडून सामाजिक दूरीचे उदाहरण ऐकून दिलीप अचंबितच झाला !

 

© डॉ. वसुधा गाडगीळ 

संपर्क –  डॉ. वसुधा गाडगिल  , वैभव अपार्टमेंट जी – १ , उत्कर्ष बगीचे के पास , ६९ , लोकमान्य नगर , इंदौर – ४५२००९. मध्य प्रदेश.

मोबाईल  – 9406852480

– श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवन रंग ☆ सुनमुख (भावानुवाद) ☆ सुश्री माया सुरेश महाजन

श्रीमती माया सुरेश महाजन

परिचय 

एम. ए – इंग्रजी, एम. ए. अर्थशास्त्र बी.एड.

हायस्कूल क्लासेस अध्यापिका, कोचिंग क्लासेसमध्ये इंग्लिश बरोबरच कॉर्मसचेही अध्यापन.

वाचन, लेखन, गायन, वत्तृत्व, अभिनय या क्षेत्रांत आवड व सहभाग ज्यासाठी अनेक बक्षिसे.

आकाशवाणी दिल्ली, पणजी (गोवा) औरंगाबाद येथे विविध कार्यक्रमात सहभाग, अयोजन, लेखन, सादरीकरण, ‘साहित्य संपदा’ कार्यक्रमात काव्यवाचन व मुलाखत.

गेल्या काही वर्षांपासून स्वतंत्र लेखनाबरोबरच अनुवाद क्षेत्रात कार्यरत दै. वर्तमानपत्रे आणि मासिकांमधून ललित लेखन, प्रासंगिक, व्यक्ति परिचय, पुस्तक परिचय, कविता प्रकाशित.

स्वलिखित कविता व लेखांवर आधारित कार्यक्रम ‘शब्द सूरांच्या गाठीभेटी’ चे पंधरावर प्रयोग.

‘मंगळागौरीचा जागर’ या कार्यक्रमासाठी सूत्र संचालन व लेखन 150 वर प्रयोग, स्टार-प्रवाह वाहिनीतर्फे कार्यक्रमास प्रथम क्रमांक व इतर ठिकाणीही बक्षिसे.

पहिल्या ‘मराठवाडा लेखिका साहित्य सम्मेलनात’ काव्यवाचन.

उस्मानाबाद येथे मराठवाडा लेखिका साहित्य सम्मेलनात सन्मान.

पहिल्याच अनुवादित पुस्तकाला (माध्यम) केंद्रिय हिंदी निदेशालयाचा उत्कृष्ट अनुवादाचा  (रु. एक लाख) पुरस्कार ज्यासाठी सह्याद्री वाहिनी (मुंबई) व औरंगाबाद दुरदर्शनवर मुलाखत.

☆ जीवनरंग  ☆ सुनमुख श्रीमती माया सुरेश महाजन 

मोठ्या थाटामाटात लग्न सोहळा पार पडला. दुसर्‍या दिवशी लक्ष्मीपूजन आणि सुनमुख पहाण्याचा कार्यक्रम होणार होता. सगळ्या नातेवाईकांची उत्सुकता अगदी शिगेला पोहोचली होती. की सासूबाई सुनमुख पाहाण्यासाठी आपल्या सुनेला काय देतील?

सुनबाई जेव्हा तयार होऊन आली आणि सासूबाईंच्या पाया पडली, तेव्हा सासूबाईंनी मस्तकावर आशीर्वादाचा हात ठेवला; नंतर विचारले, ‘‘सुनबाई, तुला काय हवे?’’

‘‘सुनबाई, आज तर तुझा हक्काचा दिवस आहे. चांगले छान जडावाचे तोडे मागून घे.’’ एका नातेवाईकाने सुचविले.

‘‘अरे नाही, हिर्‍याचे नेकलेस मागून घे.’’ दुसर्‍याने सांगितले, थट्टा मस्करी सुरू झाली. तिसर्‍याने म्हटले, स्वत:साठी गाडी मागून घ्या. नवरीदेखील इतरांबरोबर मंद स्मित करत होती आणि सासूसुद्धा पण सासूच्या मनात मात्र धडधड सुरू झाली की नातेवाईकांच्या सांगण्यावरून सून खरोखरीच एखादी अशी मागणी न करो जी आपल्याला पूर्ण करता येणार नाही. मग सासुने म्हटले, ‘‘हं सुनबाई, बोल, काय हवं तुला?’’

‘सासुबाई नव्हे आई! मी खूप लहान असतानाच माझे वडील वारले. वडिलांचे प्रेम काय असते ते कधी अनुभवलेच नाही. आईनेच आम्हा दोघी बहिणींचे पालन-पोषण केले, मोठे केले. माझी अशी इच्छा आहे की, तुमचा आशीर्वाद आणि प्रेमासोबतच मला मामंजीचे नव्हे,  बाबांचेही प्रेम मिळावे, जेणेकरुन मला वडिलांच्या प्रेमाची अनुभूती येईल. आणखी काही नको मला!’ सुनेनं मोठ्या विनम्रतेने म्हटले. सगळ्या नातेवाईकांच्या नजरेत सुनेबद्दल स्तुतीचे भाव दिसू लागले. सासुने सुनेच्या डोक्यावरून हात फिरवला, तिच्या मस्तकाचे चुंबन घेतले आणि तिला आपल्या मिठीत घेतले.

 

मूळ हिंदी कथा – मुंह दिखाई  – सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा

मो.- ९३२५२६१०७९

अनुवाद – सुश्री माया सुरेश महाजन 

मो.-९८५०५६६४४२

– श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ माझं वेड…. ☆ सौ. मानसी काणे

☆ विविधा ☆ माझं वेड…. ☆ सौ. मानसी काणे 

मी त्याच्यासाठी वेडी झाले होते,  वेडी आहे आणि राहीन. त्याला मी प्रथम पाहिल तेंव्हा तो मुक्या माणसाच्या भूमिकेत होता पण त्याचे डोळे माझ्याशी बोलले. मग ‘‘देखा न हाय रे सोचा न हाय रे’’अस म्हणत आपले उंचच उंच पाय त्यान नाचवले आणि त्याचा खट्याळपणा मला फार भावला. मग वेगवेगळ्या रुपात ‘‘विजय’’या एकाच नावान तो मला सतत भेटत राहिला. डोळ्यात अंगार पेटवून त्वेषान ‘‘है कोई माईका लाल ’’अस त्यान विचारताच माझही रक्त उसळल.‘‘ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बापका घर नहीं’ ’अस म्हणत त्यानं खूर्ची उलटवून टाकली तेंव्हा त्याची तडफ पाहून मी सुखावले.‘‘मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता’’ अस त्यान ठणकावल तेंव्हा त्याचा स्वाभिमान पाहून मी भारावले.आपल्या हातावर गोंदलेल्या ‘‘मेरा बाप चोर है’’या गोंदणाकड त्यान करूण नजरेन पाहिल तेंव्हा माझा गळा दाटून आला.‘‘मैं बहुत थक गया हूं माँ’’अस म्हणून त्यान आईच्या मांडीवर हताशपणे डोक टेकवल तेंव्हा माझाही शक्तीपात झाल्यासारख वाटल.तो अन्यायाविरुद्ध नेहमी पेटून उठायचा.सगळ्या जगाशी लढायचा.शर्टाच्या दोन्ही टोकांची गाठ मारून एक खांदा झुकवून डायनामाईट लावून तो धुरातून मोठ्या डौलात बाहेर यायचा पण तोपर्यंत इकडे माझ्या नाडीचे ठोके थांबलेले असायचे. कधीकधी तो प्रेमान ‘‘मै अपने बच्चे के लिए पालना लाया हूं सुधा’’ अस म्हणायचा तेंव्हा त्याच्या नजरेत मला कोवळा बाप दिसायचा .‘‘तुझे थामे कई हाथों से, मिलूंगा मदभरी रातों से ’’अस म्हणत कधी तो प्रियकर प्रेमळ पती व्हायचा. कधी प्रेयसीला ‘‘हे सखी’’ अशी साद घालायचा. त्याच हे प्रेम करणं मला त्याच्या पेटून उठण्याइतकच वेड  लावायच. त्यानं ‘‘इंतहा हो गई इंतजार की’’ अस म्हटल तेंव्हा त्याच्याबरोबरच मीही जिवाच्या आकांतानं वाट पाहिली .‘‘इसके आगे की अब दास्ताँ मुझसे सुन सुनके तेरी नजर डबडबा जाएगी ’’अस तो म्हणाला आणि खरच माझे डोळे भरून आले. ‘‘डॉक्तरानीजी बेहोश मत कीजिए मुझे. मैं होश में दर्द सहना जानता हूं’’ अस म्हणत आपला जखमी हात टाके घालण्यासाठी त्यान पुढ केला तेंव्हा त्याच्या मनातल वादळ माझ्याही मनात उसळल. माऊथ ऑर्गनच्या करूण स्वरातून त्यान आपल विधवेवरच अबोल प्रेम व्यक्त केल. आपल्याला डाकूंच्या हाती सोपवणार्‍या कर्तव्यनिष्ठ पोलीस अधिकारी बापाकडं त्यान निश्चयानं पाठ फिरवली. त्याच्या प्रेमभंगाची आणि दु:खाची झळ मला पोहोचली.‘‘कल अगर न रोशनी के काफिले हुए?’’ या प्रेयसीच्या प्रश्नावर ‘‘प्यार के हजार दीप है जले हुए ’’अस म्हणत हात पसरून उभ्या असलेल्या त्यान मलाही एक आधाराच आश्वासन दिल. कधीतरी कोणी ‘‘मोहब्बत बडे कामकी चीज है’’ अस म्हटल्यावर ‘‘ये बेकार बेदाम की चीज है’’ अस तो तोडून  टाकायचा. पण मी मात्र ‘‘सब कहते है तूने मेरा दिल लिया, मैं कहती हूं मैंने तुझको दिल दिया’ अशी दीवानी झाले होते. शेकडो माणस आजूबाजूला वावरत असूनही पडदाभर फक्त तो आणि तोच असायचा. पहाणार्‍याची नजर त्याच्यावरून जराही इकडतिकड होऊच शकायची नाही. त्याच प्रेम, त्याची हाणामारी, त्याचा राग ,त्याचा त्वेष या सगळ्यासाठी, त्याच्या आवाजासाठी, त्याच्या डोळ्यातल्या अनामिक आकर्षणासाठी मी खरच वेडी होते आणि आहे. ‘‘भाईयों और बहनों, देवियों और सज्जनों हम और आप खेलने जा रहे है यह अदभुत खेल कौन बनेगा करोडपती’’ परत तोच रुबाब, तोच धीर गंभीर आवाज ,प्रौढत्वाला न्याय देणारा अप्रतीम रंगसंगतीचा पोषाख ,सर्वाना समजून घेणारे डोळे आणि तेच भारावून टाकणं. साठी उलटून घेली तरी माझ त्याच्याबद्दलच वेड काही कमी होत नाही. येस आय अ‍ॅम क्रेझी फॉर माय अँग्री यंग मॅन!

© सौ. मानसी काणे

– श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ साक्षात्कार … ☆ श्री रवींद्र पां. कानिटकर

☆ मनमंजुषेतून : साक्षात्कार… ☆  श्री रवींद्र पां. कानिटकर 

आमच्या घराच्या बागेत आंबा, पेरु, नारळ, सिताफळ अशी अनेक फळझाडे आहेत. जास्वंदी,जाई, जुई,मोगरा, अबोली, गोकर्ण, गौरी अशी मनमोहक फुलझाडे बहरलेली असतात. फुलझाडांना येणाऱ्या कळ्या, हळुवार उमलणारी फुले, अंगणात दरवळणारा सुगंध तासनतास राहतो. सुगंधाने मन उल्हसित होतेच त्याबरोबर निसर्गाचे अनाकलनीय चमत्कार ही अनुभवायास येतात.

दरवर्षी मे महिन्यात अतिशय चविष्ट, मोठमोठाले भरपूर आंबे येतात. पावसाळ्याच्या सुरुवातीला भरपूर पेरु, पावसाळ्यात सिताफळे, बारमाही नारळ अशा अनेक फळांची आमचे येथे रेलचेल असते. उन्हाळ्यात आंबे पाडाला आले की ते अलगदपणे काढून घरातच अढी घालण्याचा आमचेकडे जणू एक कार्यक्रमच असतो. त्यातल्या त्यात कच्च्या आंब्यांचे पन्हे,चटणी, चैत्रातील आंबा घालून केलेली हरभराडाळीची कोशिंबीर यांची चव जीभेवर बराच कळ रेंगाळते. हळूहळू, आंब्याच्या आंबट गोड वासिने घर भरून जाते. आंबे पिकत आले की ते आमच्या मित्रांना, गल्लीतील ओळखिच्या लोकांना तसेच गावातील नातेवाईकांना देण्याचा दरवर्षीचा आमचा रिवाज आहे. कुणाला आंबे द्यायचे चुकून विसरलेच तर ते स्वतः आवर्जून, अगदी हक्काने आंबे घेऊन जातात. आम्हालाही त्यांच्या आनंदात सहभागी व्हायला आवडते.

दरवर्षीप्रमाणे यावर्षीही आंब्याच्या झाडातून मोहोर हळुहळू डोकावू लागला. शिवरात्रीला शंकराला आंब्याचा मोहोर वाहून भरपूर आंबे येवोत अशी प्रार्थना केली जाते. वाऱ्याच्या झुळुकेबरोबर मोहराचा मंद सुवास संध्याकाळी घर भारून टाकतो.

परराज्यात राहणाऱ्या आमच्या मुलीने फारच हट्ट केल्याने व तिलाही एकटीला थोडी सोबत व्हावी या उद्देशाने आम्ही उभयता मार्च 2020 च्या पहिल्या आठवड्यात तिच्याकडे गेलो. माझी पत्नी थोडे जास्त दिवस तिथे राहणार होती. मी मात्र 15-20 दिवसांनी, म्हणजे मार्च 2020 अखेरीस घरी, सांगलीला परत यायचे असे नियोजन केले. परंतु, अचानक करोनाचे संकट सर्व जगभर पसरले. आपल्या भारतातही मग लॉकडाउन -1,  2,  3 असे करत लॉकडाउनची कालमर्यादा वाढतच गेली. तिकडे आंब्याचा हंगाम सुरु झाला. दरवर्षीचे घरच्या झाडाचे आंबे क्षणोक्षणी डोळ्यासमोर येऊ लागले. माझ्या 2-3 मित्रांना मी फोन केले. त्यांनी थोड्या थोड्या दिवसांनी, गेटवरुन चढून जाऊन, जमेल तसे आंबे काढून त्यांचा आस्वाद घेतला. काही मित्रांनी आंब्याचे लोणचे, चटणी, मुरांबा, साखरांबा असे अनेकविध पदार्थ केले आणि त्यांचे फोटो आम्हाला वॉटस्अप वर शेअर देखिल केले. आमचे घरी कुलुप असल्याने दरवर्षीची आंब्याची अढी यावर्षी नव्हती. आमच्या मित्रांनी काढलेले आंबे, आमच्या शेजाऱ्यांना, आमच्या नातेवाईकांना दिले. आंब्याची अप्रतिम चव व जिभेवर रेंगाळणाऱ्या अविट गोडीच्या रसभरीत वर्णनाचे फोनही आम्हाला आले.

करोनाची परिस्थिती थोडीशी आटोक्यात आल्यावर, कोव्हीड -19 स्पेशल ट्रेन सुरु झाल्यावर, सर्व नियमांचे काटेकोरपणे पालन करुन, जून अखेरीस, म्हणजे, तब्बल साडेतीन महिन्यांनंतर, आम्ही एकदाचे आमचे घरी, सांगलीला परतलो. एक दोन उन्हाळी व यावर्षी उशीरा सुरु झालेल्या  पावसामुळे अंगणातील फुलझाडे तरारली होती. जाई, जुई, मोगरा आदी फुलांच्या भरगच्च ताटव्यांनी व मंदधुंद सुगंधाने त्यांनी पहाटे आमचे गेटमध्येच स्वागत करून आमच्या प्रवासाचा शीण क्षणात घालवला.

थोडी विश्रांती घेतली. सकाळी उठल्यावर झाडांभोवतीचा पालापाचोळा गोळा केला,  नारळाच्या पडलेल्या झावळ्यांची आवराआवर केली. झाडांवर मायेने हात फिरवत, पाणी घातले. “घरचे चविष्ट आंबे यावर्षी आम्हाला चाखायला देऊ शकलो नाही” अशा अपराधी भावनेने आंब्याचे झाड, मान खाली घालून, जणू उदासवाणे आमचेकडे पहात असल्याचा भास झाला.

दरवर्षी पानापानात लपून बसणारे हिरवे, अर्धे पिवळसर आणि हळूवारपणे गडद पिवळे होणारे आंबे आठवले. दरवर्षीचे आंब्यानी लगडलेले झाडाचे मोबाइल मधील फोटो व आत्ता मात्र आंबेरहित झाडाचे काढलेले फोटो पाहताना मन हेलावून गेले.

गच्चीवरून आत्ता असेच काढलेले फोटो सहजच झूम करून पाहताना, पानाआड लपून बसलेला एक आंबा दिसला. अलगद हाताने त्याला खाली काढले आणि त्याचाही फोटो काढला.

फोटोत दिसणारा आंबा व आंब्याचे झाड याकडे पाहताना, आंब्याचे झाड आमच्याकडे पाहून गालातल्या गालात थोडे स्मित हास्य करत असल्याचा जणू भास झाला.

महाराज विशाळगडावर पोहोचेपर्यंत बाजीप्रभूने पावनखिंड जशी एका हाती लढवली तशीच आमच्या आंब्याच्या झाडाने आम्ही परगावातून परत येइपर्यंत, तो एकमेव आंबा, जवळजवळ साडेतीन महिने ऊन, वारा, पाऊस या सर्वांशी प्राणपणाने झुंज देऊन, इतर सर्वांपासून, पानात जणू लपवून ठेवला होता.

तेवढ्यात, वाऱ्याची एक झुळुक आल्याने, फांद्या हलवून, पानांच्या सळसळीने, आंब्याचे झाड, आमच्या पुनर्भेटीने, त्याला झालेला आनंदच जणू व्यक्त करीत असल्याचा साक्षात्कार आम्हाला झाला.

© श्री रवींद्र पां. कानिटकर

– श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – सप्तदशोऽध्याय: अध्याय (7) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय १७

(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद)

 

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।

यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु ।।7।।

 

होता है सबका यॅू ही त्रिविध रूप आहार

यज्ञ, तपस्या, दान का भी है यही प्रकार ।।7।।

 

भावार्थ :  भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्‌पृथक्‌भेद को तू मुझ से सुन ।।7।।

 

The food  also  which  is  dear  to  each  is  threefold,  as  also  sacrifice,  austerity  and alms-giving. Hear thou the distinction of these. ।।7।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

 

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 6 ☆ शिक्षक दिवस विशेष – विद्या की महत्ता ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( शिक्षक दिवस के विशेष अवसर पर प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  का आशीर्वचन विद्या की महत्ता। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 6 ☆

☆ शिक्षक दिवस विशेष – विद्या की महत्ता ☆

विद्या बिन मांगे दिया करती है वरदान

पढे लिखो का हर जगह होता है सम्मान

 

बुद्धि को देती धार नई समझ को चमक निखार

विद्या पा ही व्यक्ति बन पाता है गुणवान

 

मिट जाता अज्ञान सब हट जाता अंधियार

शिक्षा पा ही व्यक्ति हर कहलाता विद्वान

 

सोच समझ के क्षेत्र में आता बडा सुधार

सही गलत की परख की मिल जाती पहचान

 

खुद पर बढता भरोसा  सध सकते सब काम

शिक्षित जन की जिंदगी हो जाती आसान

 

शुभ शिक्षा जहॉ मिले उसका लीजै लाभ

विद्या अमृत बिंदु है नित करती कल्याण

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ शिक्षक दिवस विशेष – गांधीजी और शिक्षक तथा  गुरु ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “शिक्षक दिवस विशेष – गांधीजी और शिक्षक तथा  गुरु”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ शिक्षक दिवस विशेष – गांधीजी और शिक्षक तथा  गुरु

शिक्षकों के प्रति गांधीजी के मन में बालकाल से ही बड़ा सम्मान था।  अपने स्कूली जीवन की  तीन घटनाओं का उल्लेख गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में किया हैI वे लिखते हैं कि ‘ मुझे याद है कि एक बार मुझे मार खानी पडी थी।  मार का दुःख नहीं था, पर मैं दंड का पात्र माना गया, इसका मुझे बड़ा दुःख रहाI मैं खूब रोया। ’ पहली या दुसरी कक्षा में घटे इस प्रसंग के अलावा एक अन्य प्रसंग जो सातवीं कक्षा से सम्बंधित है को याद करते हुए गांधीजी ने अपनी आत्म कथा में लिखा है कि ‘उस समय दोराबजी एदलजी गीमी हेड मास्टर थे।  वे विद्यार्थी  प्रेमी थे , क्योंकि वे नियमों का पालन करवाते थे , व्यवस्थित रीति से काम करते और लेते और अच्छी तरह पढ़ाते थे।  उन्होंने उच्च कक्षा के विद्यार्थियों के लिए कसरत-क्रिकेट अनिवार्य कर दिए थे।  मुझे इनसे अरुचि थी।  इनके अनिवार्य बनने से पहले मैं कभी कसरत, क्रिकेट या फुटबाल में गया ही न था।  न जाने मेरा शर्मीला स्वभाव ही एक मात्र कारण था।  अब देखता हूँ कि वह अरुचि मेरी भूल थी। ’ अपनी इस भूल को स्वीकारते हुए गांधीजी ने शिक्षा का अर्थ विद्याभ्यास के साथ व्यायाम भी बताया और माना कि मानसिक व शारीरिक शिक्षण का शिक्षा में बराबरी का स्थान होना चाहिए।  छठवी कक्षा में घटित एक तीसरी घटना के बारे में गांधीजी ने लिखा है कि ‘संस्कृत-शिक्षक बहुत कड़े मिजाज के थे।  विद्यार्थियों को अधिक सिखाने का लोभ रखते थे।  मैं भी फारसी आसान होने की बात सुनकर ललचाया और एक दिन फारसी वर्ग में जाकर बैठ गया।  संस्कृत-शिक्षक को दुःख हुआ।  उन्होंने मुझे बुलाया और कहा : “ यह तो समझ कि तू किनका लड़का है।  क्या तू अपने धर्म की भाषा नहीं सीखेगा? तुझे जो कठनाई हो, सो मुझे बता।  मैं तो सब विद्यार्थियों को बढ़िया संस्कृत सिखाना चाहता हूँ।  आगे चलकर उसमे रस के घूँट पीने को मिलेंगे।  तुझे यों हारना नहीं चाहिए।  तू फिर से मेरे वर्ग में बैठ। ” मैं शिक्षक के प्रेम की अवगणना न कर सका।  आज मेरी आत्मा कृष्ण शंकर मास्टर का उपकार मानती है। ’ गांधीजी ने संस्कृत भाषा के उस स्कूली  ज्ञान के आधार पर ही संस्कृत साहित्य के ग्रंथों का अध्ययन अपनी विभिन्न जेल यात्राओं के दौरान किया।

स्कूल के शिक्षकों के अलावा गांधीजी ने आध्यात्मिक गुरुओं के सम्बन्ध में भी समय-समय पर अपने विचार रखे हैं।  वे अपने जीवनकाल में आदर्श गुरु की तलाश में रहे।  इस सम्बन्ध में वे कहते थे कि ‘ मैं तो ऐसे आदर्श गुरु की तलाश में हूँ जो देहधारी होने पर भी अविकारी है , जो विकारों से निर्लिप्त है ,  स्त्री पुरुष के भाव से मुक्त है और जो सत्य और अहिंसा का पूर्ण अवतार है।  और इसलिए न वह किसी से डरता है और न कोई दूसरा ही उससे डरता हैI

हम सबके जीवन में यही कुछ गुजरा है और स्कूली शिक्षा के अलावा हमारे जीविकोपार्जन के व्यवसायिक पेशे में अनेक शिक्षकों ने हमें ज्ञान दिया है, उचित सलाह व मार्गदर्शन प्रदान कर हमारे जीवन को सफ़ल बनाया है।  शिक्षक दिवस पर उन सबको नमन।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #61 ☆ शिक्षक दिवस विशेष – मनुष्य अशेष विद्यार्थी है ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच –  शिक्षक दिवस विशेष – मनुष्य अशेष विद्यार्थी है ☆

मनुष्य अशेष विद्यार्थी है। प्रति पल कुछ घट रहा है, प्रति पल मनुष्य बढ़ रहा है। घटने का मुग्ध करता विरोधाभास यह कि प्रति पल, पल भी घट रहा है।

हर पल के घटनाक्रम से मनुष्य कुछ ग्रहण कर रहा है। हर पल अनुभव में वृद्धि हो रही है, हर पल वृद्धत्व समृद्ध हो रहा है।

समृद्धि की इस यात्रा में प्रायः हर पथिक सन्मार्ग का संकेत कर सकने वाले मील के पत्थर को तलाशता है। इसे गुरु, शिक्षक, माँ, पिता, मार्गदर्शक, सखा, सखी कोई भी नाम दिया जा सकता है।

विशेष बात यह कि जैसे हर पिता किसी का पुत्र भी होता है, उसी तरह अनुयायी या शिष्य, मार्गदर्शक भी होता है। गुरु वह नहीं जो कहे कि बस मेरे दिखाये मार्ग पर चलो अपितु वह है जो तुम्हारे भीतर अपना मार्ग ढूँढ़ने की प्यास जगा सके। गुरु वह है जो तुम्हें ‘एक्सप्लोर’ कर सके, समृद्ध कर सके। गुरु वह है जो तुम्हारी क्षमताओं को सक्रिय और विकसित कर सके।

गुरु वह है जो तुम्हें एकल नहीं एकाकार की यात्रा कराये। एकाकार ऐसा कि पता ही न चले कि तुम गुरु के साथ यात्रा पर हो या तुम्हारे साथ गुरु यात्रा पर है। दोनों साथ तो चलें पर कोई किसी की उंगली न पकड़े।

यदि ऐसा गुरु तुम्हारे जीवन में है तो तुम धन्य हो। तुम्हारा मार्ग प्रशस्त है।

जिनकी गुरुता ने जीवन का मार्ग सुकर किया, उनको वंदन। जिन्होंने मेरी लघुता में गुरुता देखी, उन्हें नमन।

शुभं भवतु।

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

 

Please share your Post !

Shares