हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 71 ☆ दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप – 2 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 70 – दीपावली के तीन दिन और तीन शब्ददीप – 2 

दूसरा शब्द-दीप

आज बलि प्रतिपदा है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि। देश के अनेक भागों में बोलचाल की भाषा में इसे पाडवा कहते हैं।

शाम के समय फिर बाज़ार में हूँ। बाज़ार के लिए घर से अमूमन पैदल निकलता हूँ। दो-ढाई किलोमीटर चलना हो जाता है, साथ ही पात्र-परिस्थिति का अवलोकन और खुद से संवाद भी।

दीपावली यानी पकी रसोई के दिन। सोचता हूँ फल कुछ अधिक ले लूँ ताकि पेट का संतुलन बना रहे। मंडी से फल लेकर मेडिकल स्टोर की ओर आता हूँ। एक आयु के बाद फलों से अधिक बजट दवाइयों का होता है।

सड़क खचाखच भरी है। दोनों ओर की दुकानों ने सड़क को अपने आगोश में ले लिया है या सड़क दुकानों में प्रवेश कर गई है, पता ही नहीं चलता। दुकानदार मुहूर्त की बिक्री करने में और ग्राहक उनकी बिक्री करवाने में व्यस्त हैं। जहाँ पाँव धरना भी मुश्किल हो उस भीड़ में एक बाइक पर विराजे ट्रिप्सी ( ट्रिपल सीट का यह संक्षिप्त रूप आजकल खूब चलन में है)  मतलब तीन नौजवान गाड़ी आगे ले जाने की नादानी करना चाहते हैं। कोलाहल में हॉर्न की आवाज़ खो जाने से कामयाबी कोसों दूर है और वे बुरी तरह झल्ला रहे हैं। भीड़ मंथर गति से आगे बढ़ रही है। देह की भीड़ में मन का एकांत मुझे प्रिय है। मन खुद से बातें करने में तल्लीन है और देह भीड़ के साथ कदमताल। किर्रररर .. किसी प्राणी के एकाएक आगे आ जाने से कोई बस ड्राइवर जैसे ब्रेक लगाता है, वैसे ही भीड़ की गति पर विराम लग गया। कौतुहलवश आँखें उस स्थान पर गईं जहाँ से गति शून्य हुई थी। देखता हूँ कि दो फर्लांग आगे चल रही लगभग अस्सी वर्ष की एक बूढ़ी अम्मा एकाएक ठहर गई थीं। अत्यंत साधारण साड़ी, पैरों में स्लीपर, हाथ में कपड़े की छोटी थैली। बेहद निर्धन परिवार से सम्बंध रखने वाली, सरकारी भाषा में ‘बीपीएल’ महिला। हुआ यों कि विपरीत दिशा से आती उन्हीं की आयु की, उन्हीं के आर्थिक वर्ग की दूसरी अम्मा उनके ठीक सामने आकर ठहर गई थीं। दोनों ओर का जनसैलाब भुनभुना पाता उससे पहले ही विपरीत दिशा से आ रही अम्मा भरी भीड़ में भी जगह बनाकर पहली के पैरों में झुक गईं। पूरी श्रद्धा से चरण स्पर्श किये। पहली अम्मा के चेहरे पर मान पाने का नूर था।  स्मितहास्य दोनों गालों पर फैल गया था। हाथ उठाकर पूरे मन से आशीर्वाद दिया। प्रणाम करने वाली ने विनय से ग्रहण किया। दोनों अपने-अपने रास्ते बढ़ीं, भीड़ भी चल पड़ी।

दीपावली की धोक देना, प्रतिपदा को मिलने जाना, प्रणाम करने की परम्पराएँ जाने कहाँ लुप्त हो गईं! पश्चिम के अंधानुकरण ने सामासिकता की चूलें ही हिलाकर रख दीं।

हिलाकर रखनेवाला एक तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सर्वाधिक युवाओं का देश, भविष्य में सर्वाधिक वृद्धों का होगा। परम्पराओं की तरह उपेक्षित वृद्ध या वृद्धों की तरह उपेक्षित परम्पराएँ!  हम अपनी परम्पराओं को धोक देंगे, उनका चरणस्पर्श करेंगे, उनसे आशीर्वाद ग्रहण करेंगे या ‘हाय’ कहकर ‘बाय’ करते रहेंगे? आज बलि प्रतिपदा है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि। देश के अनेक भागों में बोलचाल की भाषा में इसे पाडवा कहते हैं।

शाम के समय फिर बाज़ार में हूँ। बाज़ार के लिए घर से अमूमन पैदल निकलता हूँ। दो-ढाई किलोमीटर चलना हो जाता है, साथ ही पात्र-परिस्थिति का अवलोकन और खुद से संवाद भी।

दीपावली यानी पकी रसोई के दिन। सोचता हूँ फल कुछ अधिक ले लूँ ताकि पेट का संतुलन बना रहे। मंडी से फल लेकर मेडिकल स्टोर की ओर आता हूँ। एक आयु के बाद फलों से अधिक बजट दवाइयों का होता है।

सड़क खचाखच भरी है। दोनों ओर की दुकानों ने सड़क को अपने आगोश में ले लिया है या सड़क दुकानों में प्रवेश कर गई है, पता ही नहीं चलता। दुकानदार मुहूर्त की बिक्री करने में और ग्राहक उनकी बिक्री करवाने में व्यस्त हैं। जहाँ पाँव धरना भी मुश्किल हो उस भीड़ में एक बाइक पर विराजे ट्रिप्सी ( ट्रिपल सीट का यह संक्षिप्त रूप आजकल खूब चलन में है) मतलब तीन नौजवान गाड़ी आगे ले जाने की नादानी करना चाहते हैं। कोलाहल में हॉर्न की आवाज़ खो जाने से कामयाबी कोसों दूर है और वे बुरी तरह झल्ला रहे हैं। भीड़ मंथर गति से आगे बढ़ रही है। देह की भीड़ में मन का एकांत मुझे प्रिय है। मन खुद से बातें करने में तल्लीन है और देह भीड़ के साथ कदमताल। किर्रररर .. किसी प्राणी के एकाएक आगे आ जाने से कोई बस ड्राइवर जैसे ब्रेक लगाता है, वैसे ही भीड़ की गति पर विराम लग गया। कौतुहलवश आँखें उस स्थान पर गईं जहाँ से गति शून्य हुई थी। देखता हूँ कि दो फर्लांग आगे चल रही लगभग अस्सी वर्ष की एक बूढ़ी अम्मा एकाएक ठहर गई थीं। अत्यंत साधारण साड़ी, पैरों में स्लीपर, हाथ में कपड़े की छोटी थैली। बेहद निर्धन परिवार से सम्बंध रखने वाली, सरकारी भाषा में ‘बीपीएल’ महिला। हुआ यों कि विपरीत दिशा से आती उन्हीं की आयु की, उन्हीं के आर्थिक वर्ग की दूसरी अम्मा उनके ठीक सामने आकर ठहर गई थीं। दोनों ओर का जनसैलाब भुनभुना पाता उससे पहले ही विपरीत दिशा से आ रही अम्मा भरी भीड़ में भी जगह बनाकर पहली के पैरों में झुक गईं। पूरी श्रद्धा से चरण स्पर्श किये। पहली अम्मा के चेहरे पर मान पाने का नूर था। स्मितहास्य दोनों गालों पर फैल गया था। हाथ उठाकर पूरे मन से आशीर्वाद दिया। प्रणाम करने वाली ने विनय से ग्रहण किया। दोनों अपने-अपने रास्ते बढ़ीं, भीड़ भी चल पड़ी।

दीपावली की धोक देना, प्रतिपदा को मिलने जाना, प्रणाम करने की परम्पराएँ जाने कहाँ लुप्त हो गईं! पश्चिम के अंधानुकरण ने सामासिकता की चूलें ही हिलाकर रख दीं।

हिलाकर रखनेवाला एक तथ्य यह भी है कि वर्तमान में सर्वाधिक युवाओं का देश, भविष्य में सर्वाधिक वृद्धों का होगा। परम्पराओं की तरह उपेक्षित वृद्ध या वृद्धों की तरह उपेक्षित परम्पराएँ! हम अपनी परम्पराओं को धोक देंगे, उनका चरणस्पर्श करेंगे, उनसे आशीर्वाद ग्रहण करेंगे या ‘हाय’ कहकर ‘बाय’ करते रहेंगे?

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 69☆ आमने-सामने – 5 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है ।

प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ  के अंतर्गत आमने -सामने शीर्षक से  आप सवाल सुप्रसिद्ध व्यंग्यकारों के और जवाब श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के  पढ़ सकेंगे। इस कड़ी में प्रस्तुत है  सुप्रसिद्ध  साहित्यकार  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा जी (हैदराबाद),श्री  अशोक व्यास जी (भोपाल) एवं श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी  (जबलपुर) के प्रश्नों के उत्तर । ) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 69

☆ आमने-सामने  – 5 ☆

डॉ सुरेश कुमार मिश्रा (हैदराबाद)

क्या एक सरकारी कर्मचारी सत्ता पक्ष के गलत फैसलों पर तंज कसते हुए व्यंग्य लिख सकता है? यदि हाँ तो उसके लिए क्या प्रावधान हैं?

जय प्रकाश पाण्डेय –

सुरेश कुमार जी, जब तक ढका मुंदा है और आपके कार्यालय परिवार के लोग जीवन से तटस्थ हैं, तब तक तो कुछ नहीं होता, कार्यालय का काम और अनुशासन आपकी प्राथमिकता है और यदि लेखक के अहंकार में चूर होकर बास से खुन्नस ली तो साथ के लोग और बास आपको फांसी चढ़ाने के लिए बैठे रहते हैं। क्योंकि आप जानते हैं कि सच को उजागर करने वालों का दुनिया पक्ष कम लेती है और आपको व्यंग्य लिखने की सरकारी अनुमति मिलेगी नहीं, ऐसी दशा में लेखक को विसंगतियों पर इशारे करके लिखना होगा।

 

श्री अशोक व्यास (भोपाल) 

मेरा प्रश्न है कि आजकल जो व्यंग्य पढ़ने में आ रहे हैं उसमें  साहियकारों  पर जिसमें अधिकतर व्यंग्यकारों पर व्यंग्य किया जा रहा है । क्या विसंगतियों को अनदेखा करके दूसरे के नाम पर अपने आप को व्यंग्य का पात्र बनाने में खुजाने जैसा मजा ले रहे हैं हम ?

जय प्रकाश पाण्डेय –

भाई साहब, सही पकड़े हैं। हम आसपास बिखरी विसंगतियों, विद्रूपताओं, अंधविश्वास को अनदेखा कर अपने आसपास के तथाकथित नकली व्यंंग्यकारों को गांव की भौजाई बनाकर मजा ले रहे हैं, जबकि हम सबको पता है कि इनकी मोटी खाल खुजाने से कुछ होगा नहीं, वे नाम और फोटो के लिए व्यंग्य का सहारा ले रहे हैं।

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव (जबलपुर)

आप लंबे समय तक बैंकिंग सेवाओं मे थे, बैंक हिंदी पत्रिका छापते थे, आयोजन भी करते थे।

आप क्या सोचते हैं की व्यंग्य, साहित्य के विकास व संवर्धन में संस्थानों की बड़ी भूमिका हो सकती है ? होनी चाहिये ?

जय प्रकाश पाण्डेय –

विवेक भाई, हम लगातार लगभग 36 साल बैंकिंग सेवा में रहे और शहर देहात, आदिवासी इलाकों के आलावा सभी स्थानों पर लोगों के सम्पर्क में रहे और अपने ओर से बेहतर सेवा देने के प्रयास किए। पर हर जगह पाया कि बेचारे दीन हीन गरीब, दलित, किसान, मजदूर दुखी है पीड़ित हैं, उनकी बेहतरी के लिए लगातार सामाजिक सेवा बैंकिंग के मार्फत उनके सम्पर्क में रहे, गरीबी रेखा से नीचे के युवक युवतियों को रोजगार की तरफ मोड़ा, दूरदराज की ग़रीब महिलाओं को स्वसहायता समूहों के मार्फत मदद की मार्गदर्शन दिया। प्रशासनिक कार्यालय में रहते हुए गृह पत्रिकाओं के मार्फत गरीबों के उन्नयन के लिए स्टाफ को उत्साहित किया, बिलासपुर से प्रतिबिंब पत्रिका, जबलपुर से नर्मदा पत्रिका, प्रशिक्षण संस्थान से प्रयास पत्रिका आदि के संपादन किए, और जो थोड़ा बहुत किया वह आदरणीय प्रभाशंकर उपाध्याय जी के उत्तर में देख सकते हैं। बैंक में रहते हुए साहित्य सेवा और सामाजिक सेवा से समाज को बेहतर बनाने की सोच में उन्नयन हुआ, दोगले चरित्र वाले पात्रों पर लिखकर उनकी सोच सुधारने का अवसर मिला। कोरोना काल में विपरीत परिस्थितियों के चलते बैंकों में अब समय खराब चल रहा है इसलिए आप जैसा सोच रहे हैं उसके अनुसार अभी परिस्थितियां विपरीत है।

क्रमशः ……..  6

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ अमरकंटक का भिक्षुक -5 ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है। आज से हम एक नई  संस्मरणात्मक आलेख श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं।  इस श्रृंखला में श्री अरुण कुमार डनायक जी ने अपनी सामाजिक सेवा यात्रा को संस्मरणात्मक आलेख के रूप में लिपिबद्ध किया है। हम  आपके इस संस्मरणात्मक आलेख श्रृंखला को अपने पाठकों से साझा करने हेतु श्री डनायक जी के ह्रदय  से आभारी  हैं।  इस कड़ी में प्रस्तुत है  – “अमरकंटक का भिक्षुक – भाग 5”। )

☆ संस्मरण ☆ अमरकंटक का भिक्षुक -5 ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆ 

मुझे अमरकंटक से वापस आने में विलम्ब हो गया। जब पहुंचा तो विवेकानंद युवा मंडल की बैठक समाप्त होने को थी। अरुण कुमार चटर्जी युवाओं को प्रेरणा दे रहे थे। वे बता रहे थे कि स्वामीजी ने भारत वासियों को उन्नति करने हेतु जो मंत्र दिया था वह साहस के साथ सेवा और कर्म करने का है। भूखे को रोटी और तन ढकने को कपड़ा देना, अशिक्षित को शिक्षित करना सबसे बड़ा सेवा कार्य है। ‘बाबूजी’ ने भी सेवा कार्य के महत्व को बतायाऔररामकृष्ण परमहंस का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि   सेवा की भावना का प्रदर्शन तो ठाकुर ने  मथुर बाबू के साथ तीर्थयात्रा के दौरान किया। जब उन्होंने एक गांव में लोगों को दुखी देखा तो वे वहीं धरने पर बैठ गए और विवश होकर मथुर बाबू ने कलकत्ता से अनाज और कपड़ा मंगवाया व गरीबों के बीच बांटा तब ठाकुर काशी की तीर्थयात्रा के लिए तैयार हुए।

जब विकास चंदेल ने  केरापानी गाँव की व्यथा का वीडिओ दिखाया तो लगा कि असली बैठक तो अब शुरू हुई जिसने मन को दुखी भी किया और आशा का संचार भी किया। यह वीडिओ कृतार्थ देवा चतुर्वेदी और विकास ने मिलकर बनाया है। केरापानी गाँव में बीस बैगा आदिवासी परिवार आज भी आदिम युग में जीने को मजबूर हैं। आवागमन और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उन्हें उपलब्ध नहीं हैं। पेय जल लाने  हेतु उन्हें मीलों कठिन रास्ते पर पैदल चलना होता है। वे पहाड़ी  झिरिया या नाले जैसे जल स्त्रोतों पर आश्रित हैं और गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। पानी के ये स्त्रोत दुर्गम व कठिनाई भरे स्थलों पर हैं और वहाँ से जल लाना बहुत मेहनत भरा है। यहाँ तक कि गर्भवती महिलाएं भी पानी भरने हेतु यह कष्ट सहने  को मजबूर हैं। गाँव के बुजुर्ग लामू बैगा कहते हैं कि पानी बड़ी समस्या है, दूर जंगल से पानी लाना पड़ता है, बरसात में तो चल जाता है पर गर्मी में बहुत दिक्कत होती है। बिजली और सड़क भी नहीं है तथा पूरा गाँव अशिक्षित है। सरपंच से लेकर सचिव और दूसरे कर्मचारी कोई ध्यान नहीं देते, हमारी तरफ देखते तक नहीं हैं । इसी गाँव के ज्ञान सिंह बैगा बताते हैं कि केवल एक लड़का पढ़ा है, कोई बीमार पड़ जाए तो जीप से राजेंद्रग्राम लेकर जाते हैं लेकिन रुपया ज्यादा नहीं है तो इलाज के बाद पैदल वापस आते हैं। इस वीडिओ को देखकर यथार्थ का अनुभव होता है। सरकारी दावों की पोल खुलती दिखती है। आज़ादी के 73 साल बाद भी ग्रामीण अंचलों में बिजली, सड़क, शुद्ध पेय जल, स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं आसानी से उपलब्ध न करा पाने के कारण  हम विश्व के सर्वाधिक गरीब देशों में शामिल हैं। यह असफलता एक  राष्ट्रीय शर्म है। अनेक समस्याएं तो इसलिए हल नहीं हो पाती क्योंकि वे जंगल और सामान्य प्रशासन विभाग के बीच फुटबाल बन जाती हैं। सरकारी विभागों में जवाबदेही का अभाव भी समस्याओं के निराकरण में बाधक है। भ्रष्टाचार तो सबसे बड़ा कारण है ही। कर्मचारियों व अधिकारियों के साथ-साथ राजनेताओं की संवेदनहीनता इन सम्स्स्याओं को द्विगुणित कर रही है तो दूसरी तरफ आदिवासियों मे से पढ़े लिखे युवा अपने समाज के ने भद्र पुरुष बन गए हैं, नए शोषक हो गए हैं।

इस वीडिओ से हम सब उदास व व्यथित थे कि आज़ादी के बाद भी इन दुर्गम गाँवों  की हालत कितनी बदतर है। यह तो एक गाँव की थोड़ी सी झलक मात्र है वह भी ग्रीष्म ऋतु की, बरसात के दिनों जिन्दगी कैसी होती होगी, वे कैसे मुख्य मार्ग या नज़दीकी कस्बे तक पहुँचते होंगे। फर्रीसेमर के भिलवागोंडा की भी तो ऐसी ही स्थिति थी, नाला पार कर हम वहाँ पहुंचे थे। और इसीलिए ‘बाबूजी’ दो  अन्य गाँवों  की चर्चा छेड़ी। उन्होंने श्री सुरेन्द्र कुमार यादव के माध्यम से जालेश्वर टोला गाँव  तथा विकास चंदेल और कृतार्थ देवा चतुर्वेदी  जैसे युवाओं से उमरगोहान गाँव का व्यापक सर्वे करवाया और उसकी रिपोर्ट हम सब के साथ साझा की।

जालेश्वरटोला गाँव अमरकंटक से 10 किलोमीटर व आश्रम से आठ-दस किलोमीटर की दूरी पर सतपुड़ा के जंगल के मध्य बसा है। यहाँ 25 झोपड़ियों में एक सौ लोग बसते हैं, जिनकी औसत आयु 50 वर्ष से कम है। केवल तीन पुरुष और चार महिलाएं पौत्र-पोत्रियों का सुख भोगने जीवित हैं और यही कारण है कि 21 परिवार, नुक्लियर फैमिली हैं, माता-पिता और बच्चों तक सीमित हैं। अशिक्षित 80% प्रतिशत हैं और शेष बीस लोगों को केवल प्राथमिक शिक्षा मिली है। भू सम्पत्ति से वंचित 12 परिवार, मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं, तो 8 परिवारों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है, वे लघु कृषक हैं । कृषि योग्य भूमि भी उबड़-खाबड़ है और धान, कोदो, कुटकी, उड़द आदि फसलों की  पैदावार बहुत ही कम है, शायद प्रति एकड़ दो कुंटल। सड़क व आवागमन के साधनों से विहीन इस गाँव के अत्यंत विपन्न और निर्धन जन पैदल यात्रा कर निकटतम कस्बे, हाट-बाज़ार आदि जाते हैं। केंद्र सरकार की विभिन्न बहुचर्चित योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री आवास, शौचालय निर्माण, उज्ज्वला आदि योजनाओं का लाभ इन विपन्न लोगों तक आज भी नहीं पहुंचा है।

इस गाँव में न तो प्राथमिक शाला है और न ही आंगनवाडी केंद्र। इन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है और धनाभाव के कारण वे बीमार व्यक्ति को निकटतम स्वास्थ्य केंद्र भी, जो लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है, नहीं ले जा पाते हैं। पेय जल के लिय उन्हें 5-6 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है और उसे भी पूर्णत: शुद्ध नहीं कहा जा सकता। साग-सब्जी रहित भोजन व शुद्ध पेयजल का अभाव विभिन्न बीमारियों यथा रक्ताल्पता, दस्त, चर्मरोग, कुपोषण आदि का कारक है।

आश्रम से कोई पांच- छह किलोमीटर दूर स्थित, दूसरे गाँव उमरगोहान का  सर्वे, विकास चंदेल और उनके युवा साथियों ने किया था, जिसे हम सबने पावर पॉइंट के माध्यम से देखा।  यह रिपोर्ट छात्रों की प्रस्तुतीकरण की अद्भुत क्षमता की परिचायक है। इस गाँव को देखने हम लोग अगले दिन गए और ग्रामीणों से सार्थक चर्चा की ।  उमरगोहान गाँव का विस्तार तीन टोलों में है। बीचटोला गौंड आदिवासियों की बस्ती है, डूमरटोला व लंका टोला बैगा बहुल मोहल्ले हैं और यादवों के भी कुछ परिवार रहते हैं। बीचटोला व  डूमरटोला, मुख्य मार्ग से तीन किलोमीटर अन्दर  हैं तो लंकाटोला जंगल में है। गाँव के पास से ही जोहिला नदी बहती है और उस पर एक बाँध बनाया गया है, लेकिन सिचाई होती है, ग्रामीण पानी ले सकते हैं, ऐसा लगा नहीं। एकाध नाला भी है, जिसमें पानी ठण्ड भर बहता है और यही पेय जल उपलब्ध कराता है। यह नाला डूमरटोला के पास से बहता है।  गर्मी आते आते  नाला  सूख जाता  है, तब जल की आपूर्ति समस्या हो जाती है और अन्य ग्रामों के निवासियों की भाँति यहाँ के लोग भी पानी के लिए तीन-चार किलोमीटर भटकने को मजबूर हो जाते हैं। जब हम गाँव गए तो ग्रामीण हमें वहाँ तक आग्रहपूर्वक ले गए और नलकूप खुदवाने हेतु प्रार्थना करते रहे। इन लोगों में एक महिला, सरोज गौंड  बहुत सक्रिय थी। इस स्पष्टवक्ता की पुत्री भारती ‘बाबूजी’ द्वारा संचालित माँ सारदा कन्या विद्यापीठ में सातवीं कक्षा में पढ़ती है। बेटी ने माँ को भी शिक्षित बना दिया। इस गाँव में भी उप स्वास्थ्य केंद्र, आंगनवाडी आदि नहीं है लेकिन प्राथमिक व मिडिल स्कूल हैं। यह सभी सुविधाएं, छह किलोमीटर दूर, उमरगोहान के ग्राम पंचायत मुख्यालय पौंडकी में उपलब्ध है। एएनएम, आशा कार्यकर्ता जैसे  कर्मचारी सप्ताह में दो बार बीचटोला तक आते हैं पर लंकाटोला उनका जाना नहीं हो पाता। गाँव में प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय निर्माण आदि कार्य शत प्रतिशत नहीं हुए हैं। ग्रामीण परिवेश व इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यदि यहाँ रोजगारमूलक  आर्थिक गतिविधियाँ शुरू की जाए तो वे अन्य ग्रामीणों को प्रेरित करने हेतु प्रदर्शन का केंद्र बन सकती हैं। ग्रामीणों से मिलकर हमने उन्हें एक सार्वजनिक चबूतरा बनाने का सुझाव दिया और कहा कि यदि ग्रामीण श्रमदान करेंगे तो हम निर्माण सामग्री जैसे ईंट, सीमेंट, रेत आदि उपलब्ध कराएंगे। दो- तीन मिनिट में ही वे सब सहर्ष तैयार भी हो गए। बीचटोला के निवासी मुकेश सिंह परस्ते ने अपनी जमीन इस हेतु देने का आश्वासन दिया और सबने मिलकर वहाँ प्रतीकात्मक श्रमदान भी किया और मैंने निर्माण सामग्री उपलब्ध कराने का संकल्प लिया। उमरगोहान में चन्द्रभान गौंड की रामायण मंडली है तो सुगरतिया बैगा और उसकी सखियाँ  करमा गायन में निपुण हैं। इनके समूह बनाए जा सकते हैं और यह लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रस्तुती देकर जीविकोपार्जन कर सकते हैं। इसकी संभावनाएँ हमें तलाशनी होंगी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाति विश्वविद्यालय व होटल आदि से इस सम्बन्ध में टाई-अप किया जा सकता है। उमरगोहान, ग्रामीण पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है और यदि ऐसा होता है तो रामायण मंडली व करमा गायकों की  रोजी रोटी का जुगाड़ हो सकता है।    दो युवा लडकियाँ, ज्ञानवती धुर्वे और राजेशनंदनी, सिलाई जानती हैं पर प्रशिक्षित नहीं है और इसीलिये  उनमे  आत्मविश्वास की कमी हैं। प्रशिक्षण देकर उनके हुनर को संवारा जा सकता है। बातचीत में पता चला कि गाँव में सात स्वयं सहायता समूह हैं, पर सब सरकारी ढर्रे पर बने हैं और सुसुप्त हैं। अगर इन्हें जागृत किया जा सके तो लोगों का आर्थिक कायाकल्प हो सकता है।

यद्दपि सर्वे तैयार करने में विकास और उसके साथियों ने काफी मेहनत की और समस्याओं के साथ साथ उन्होंने उनके निराकरण के उपाय भी सुझाए तथापि वे यहाँ के निवासियों के सामाजिक-आर्थिक पक्ष को उजागर करने हेतु आवश्यक आंकड़े जुटाने में असफल रहे। यह आंकड़े जुटाने के बाद इस गाँव के उन्नयन में निश्चय ही सफलता मिलेगी, हम बेहतर योजनाएँ बना सकेंगे । मैंने कृतार्थ और विकास से  कहा कि तुम लोगों के जोश में मेरा अनुभव मिला दो तो हम तेजी से आगे बढ़ सकते हैं। मुझे प्रसन्नता हुई कि उन्होंने मुझे अंगीकृत करने में देरी नहीं की। आज से उमरगोहान अगर आश्रम का अडाप्टेड विलेज है तो मैं इन युवाओं का अडाप्टेड दोस्त। कभी जमनालाल बजाज ने महात्मा गांधी से कहा था कि ‘मैं आपको पिता के रूप में गोद लेना चाहता हूँ।’

फर्रीसेमर गाँव हम लोग तीन दिन पहले ही होकर आये थे और पौंडकी के रास्ते मैंने सुबह सबरे भ्रमण करते हुए देख लिए थे। इन सभी  ग्रामों के विभिन्न  पहलुओं का हम सभी ने तुलनात्मक अध्ययन किया और तय किया कि चूँकि  उमरगोहान आश्रम से नज़दीक है, वहाँ गौंड, बैगा व यादव समुदाय की मिश्रित आबादी है, ग्रामीण उत्साही हैं, सहयोग करने को तत्पर हैं, इसीलिए इस गाँव को  आदर्श ग्राम के रूप में विकसित करने की व्यापक योजना बनाई जाए एवं इस हेतु हम प्रौढ़ लोग व  आश्रम के युवा साथी मिलकर प्रयास करेंगे। विभिन्न शासकीय कार्यालयों से समन्वय स्थापित कर आदिवासियों की दशा व दिशा बदलने का कार्य करेंगे । फर्रीसेमर गाँव के भिलवा टोला में एक या दो स्वयं सहायता समूहों को सुसुप्तावस्था से मुक्त कर जागृत करने का प्रयास करेंगे। और अगर ऐसा कर पाए तो स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी के सपनों का गाँव और फिर भारत बनते देर नहीं लगेगी।

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ निधि की कलम से # 25 ☆ दीपावली ☆ डॉ निधि जैन

डॉ निधि जैन 

डॉ निधि जैन जी  भारती विद्यापीठ,अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पुणे में सहायक प्रोफेसर हैं। आपने शिक्षण को अपना व्यवसाय चुना किन्तु, एक साहित्यकार बनना एक स्वप्न था। आपकी प्रथम पुस्तक कुछ लम्हे  आपकी इसी अभिरुचि की एक परिणीति है। आपका परिवार, व्यवसाय (अभियांत्रिक विज्ञान में शिक्षण) और साहित्य के मध्य संयोजन अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है  आपकी एक समसामयिक कविता  “दीपावली”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆निधि की कलम से # 25 ☆ 

☆ दीपावली

वसुंधरा पर स्वर्ण की वर्षा सी,

निशा पर प्रभात की विजय सी,

दीपावली करती हमें आनंदित दीपों के पर्व सी I

 

दीपों की रौशनी से मिटता निशा का अंधकार सा,

द्वार की रंगोली से, भरती जीवन में नया आकार सा,

हर रूठे मन मे भरता उजाले सा,

हर अंग सजता, अलंकार सा,

हर मुखड़ा चहकता मोहक चितवन सा,

हर आँगन लगता मधुवन सा I

 

वसुंधरा पर स्वर्ण की वर्षा सी,

निशा पर प्रभात की विजय सी,

दीपावली करती हमें आनंदित दीपों के पर्व सी।

 

निधिपति का स्वागत करने का ये पर्व,

राम के लिये हर पूजा हर जतन करने का ये पर्व,

राम के वनवास से लौटने का ये पर्व,

हर आँगन में फैलता स्वर्ण लता सा ये पर्व,

मिठाईयों में मीठा रसगुल्ले सा ये पर्व,

पुष्पों में सुन्दर कमल सा ये पर्व,

वसुंधरा पर स्वर्ण की वर्षा सी,

निशा पर प्रभात की विजय सी,

दीपावली करती हमें आनंदित दीपों के पर्व सी।

 

ऐसे ही हर साल आये ये पर्व,

कुमार के मौसम को जगमगाये ये पर्व,

भाईचारे और एकता को जगाये ये पर्व,

हर आँगन हर मुखड़ा पटाखे की रोशिनी से चहके ये पर्व,

पकवानों की महक से हर आँगन महकाये ये पर्व,

रुढ़िवाद, भेदभाव को दूर करे ये पर्व।

 

वसुंधरा पर स्वर्ण की वर्षा सी,

निशा पर प्रभात की विजय सी,

दीपावली करती हमें आनंदित दीपों के पर्व सी।

 

सरोवर में स्वर्ण मीन सा ये पर्व,

भानु पर अग्नि सा ये पर्व,

प्रभात में रोशन और पानी में दामिनी सा ये पर्व,

भाईचारे और एकता की मिसाल पैदा करे ये पर्व।

 

©  डॉ निधि जैन,

पुणे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #17 ☆ इक ज्योति जलाइए ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आखिर मैं भी तो वही कर रहा हूँ। आज से हम प्रत्येक सोमवार आपका साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी प्रारम्भ कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर, अर्थपूर्ण एवं भावप्रवण  कविता “इक ज्योति जलाइए”। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 17 ☆ 

☆ इक ज्योति जलाइए ☆ 

हर मायूस दिल में

इक ज्योति जलाइए

दीपोत्सव का उत्सव है

सब मिलकर मनाइए

माना हवाओं में

जहर बहुत है

माना तूफानों में

कहर बहुत बहुत है

घमंड, अभिमान के

मेले लग रहे हैं

बिक रहा इन्सान

और बिकते इन्सानों के

ठेले लग रहे हैं

मर्यादा पुरुषोत्तम

कशमकश में पड़े हैं

अटृहास करते

चहुं ओर रावण खड़े हैं

वध कीजिये इन दुष्टात्माओं का

सत्य को बचाइये

इक ज्योति जलाइये

 

कुछ उम्मीद लिए

आसमान में तांक रहें हैं

फिर अपनी झोपड़ी के

अंधेरे में झांक रहें हैं

चाँद सितारे

हो तुमको मुबारक

उनको तो है

बस जुगनुओं की जरूरत

कोई टूटा हुआ तारा

उनकी नजर कर देता

अरमानों से उनकी

झोली भर देता

कुछ पल जीवन में

खुशियाँ आ जाती

मिठाई की मिठास तो

सबको है भाती

बुझ गई आँखों में

रोशनी जलाइए

टूटे हुए दिलों को

धीरज बंधाइए

बाँटिए खुशियाँ

उनको गले लगाइए

इक ज्योति जलाइए

 

कब तलक एक दूसरे से

नफ़रत करोगे

इन्सान हो इन्सान से

कब मुहब्बत करोगे

जख्मों को कुरेदोगे

तो क्या फ़ायदा होगा ?

भर जाये जख्म ऐसा

क्या कोई कायदा होगा ?

मंदिर की घंटियाँ हो

या मस्जिद की हो अजान

हर जगह सर झुकाके

खड़ा है इन्सान

कुछ सौदागर यह अफीम

बाँट रहे हैं

एकता, भाईचारे की जड़ों को

काट रहे हैं

इन भटके हुए राहगीरों को

सही राह दिखाइए

इक ज्योति जलाइए

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 24 ☆ भ्रमनिरस… ☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 24 ☆ 

☆ भ्रमनिरस… ☆

पाऊस येणार नक्की

मनात पालवी फुटली

पालवी मनात फुटताना

गर्दी ढगाने केली…

 

ढग दाटून आले

काळोख ही पडला

कुठल्याही क्षणाला

सुरुवात होईल पावसाला…

 

मयूर नाचू लागला

पिसारा खुलून गेला

पानांची सळसळ

थंडगार वारा सुटला…

 

थंडगार वारा सुटला

त्याचा जोर वाढला

आलेले आभाळ सर्व

काढता पाय त्यांनी घेतला…

 

भ्रमनिरस जाहला

मन अशांत जाहले

न येता पाऊस काहीच

ढग निघून-विरून गेले…

 

आघात असा झाला

खूप बेकार वाटले

येणाऱ्या पावसाने

का असे भुलविले…?

 

© कवी म. मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पणती घेऊन हाती ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के

☆ कवितेचा उत्सव ☆ पणती घेऊन हाती ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

 

पणती घेऊन हाती

प्रकाश होऊन आले

हलकेच तमाच्या पुढती

उजळती रेषा झाले

 

थंडीच्या गडद रातीला

उबदापणाही येतो

वेढून कुडी भवताली

मायेची उब तो देतो

 

हि इवली प्रकाशपणती

ह्रदयाशी तेवत ठेवु

आपुलकी विश्वासाचे

नीत स्नेह तियेला देऊ

 

एक चिमट रांगोळीची

अंगणास दे श्रीमंती

उंबरठा त्याच सदनाचा

मर्यादेची सांगतो किर्ती

 

व्यवहार भावनेमधुनी

उंबरठा रेष ओढीतो

व्यवहावर जग चाले

घरगाडा भावना जपतो

 

हा प्रकाश घेऊन हाती

चल जपुया सारी नाती

हा वेढून असता भवती

ना उरे तमाची भिती

 

दिपावलीच्या पूर्ण परिवारातील सर्वांना शुभेच्छा ??

 

©  सुश्री नीलांबरी शिर्के

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ भाऊबीज ☆ सौ. मुग्धा कानिटकर

☆ जीवनरंग ☆ भाऊबीज ☆ सौ. मुग्धा कानिटकर ☆ 

भगवान आणि भाग्यलक्ष्मी यांच्या  लग्नानंतर बऱ्याच वर्षांनी घरी पाळणा हलला. सासर-माहेरच्या नातेवाईकांनी बाळ -बाळंतीणीचं कौतुक  भरभरून केले.दिसामासांनी बाळाची प्रगती अगदी नजरेत भरू लागली.केजीतच या बाळाला दुसऱ्या ईयत्तेचा अभ्यास  पण अगदी सहज अवगत झाला होता.त्याचे पाठांतर पाहून शेजारचे लोक अचंबित होत असत.त्याच्या प्रखर बुद्धिमत्तेची चुणूक स्काॅलरशिपच्या परीक्षेतील सुयशाने त्याच्या शिक्षकांना जाणवली. “त्याला शहरात पाठवा ,आणखी चांगली प्रगती होईल” असा सल्लाही भगवानला शिक्षकांनी दिला.पण खर्चाचे गणित जमणारे  नव्हते.

भाग्यलक्ष्मीच्या  संसार वेलीवर बाळच्या पाठोपाठ आणखी एक सुंदर कळी उमलली. जणूकाही  नक्षत्रांची तेजस्वी  जोडीच भास्कर आणि भावना यांच्या रूपाने अंगणात बागडत असे. भगवान एका खासगी काॅलेजमध्ये प्राध्यापक म्हणून कार्यरत होते.पगार अगदी कमी आणि तोही बऱ्याच वेळा वेळेवर होत नसे. भाग्यलक्ष्मी काटकसरीने संसाराचा गाडा हाकण्यासाठी जमेल तसा आपल्या पतीस हातभार लावत असे. आईबाबांच्या आचरणातून सुसंस्कार घेतं मुलं मोठी होत होती.भास्करला एका चांगल्या कंपनीचा नोकरी साठी काॅल आला.सर्वांचा निरोप घेऊन भास्कर परगावी गेला. त्याची व भावनांची भेट मोठ्या सणांच्या निमित्ताने होई.

एकदा  दिवाळीच्या  सुट्टीत घरी आल्यावर इंजिनिअरिंगच्या शेवटच्या वर्षाला शिकणाऱ्या भावनाताईच्या मनात आलं, “एवढा पगारदार दादा आहे पण दरवर्षी शंभर रुपयेच ‘भाऊबीज’ म्हणून ओवाळणी देतो.आईबाबांसाठी तर एकदाच नवीन कपडे त्यानं आणलेत.” तिनं हा विषय सहज आईजवळ काढला .बोलताना भाग्यलक्ष्मीचा गळा  अगदी दाटून आला.

“जादा तयारीसाठी भास्करला शिकवणी लावणं आवश्यक होती. पण तेव्हा घरच्या बेताच्याच परिस्थितीचे भान ठेवून त्याने मोठ्या स्वकष्टाने दहावीत गावात पहिल्या क्रमांकावर आपली मोहोर उमटवली.आता शहरात जाऊन मोठा इंजिनिअर होऊन गावाकडे परत यायचं असं स्वप्न उराशी बाळगून होता.”

“जमीन -जुमला, शिल्लक काही नाही. अशी निर्धन अवस्था पाहून बाबांची मोठी घालमेल सुरू झाली होती. सुजाण भास्करने त्याच क्षणी  ‘डिप्लोमा कोर्स पूर्ण करावा’  असाच निर्णय घेतला.  पण धाकट्या बहिणीने सतत चांगल्या पद्धतीने मेरीट मिळवावे. तिने इंजिनिअर होऊन आपले अधुरं स्वप्न पूर्ण करावं. अशी इच्छा आमच्या जवळ त्याने व्यक्त केली.”

“पार्टटाईम नोकरी करत अभ्यास करून तो डिप्लोमा कोर्सला प्रथम आला. पण पुन्हा डिग्रीचे शिक्षण परवडणारे नव्हते. त्याला नोकरी करणेच भाग पडले. भास्करदादानं  इंजिनिअर होणाऱ्या  धाकट्या बहिणीच्या डोळ्यांमध्येच त्याची करिअरची स्वप्ने साकार होताना पाहिली होती.”

भास्करच्या  या असीम त्यागाची जाणीव प्रथमच भावनेला झाली. तिच्या चांगल्या भवितव्यासाठी भास्कर ने अगदी जीवाचे रान केले होते.

तिच्यासाठी वेळ काढून त्याने  सर्व प्रकारचे मार्गदर्शन केले होते. वेळच्यावेळी काॅलेजची फी, हाॅस्टेलच्या सर्व खर्चाला तोच बाबांकडून पैसे पाठवत होता. सहा वर्षे त्याने आपल्याला काही कमी पडू दिले नाही हे तिला आता उमगले.

मायलेकींचा अश्रूंचा बांध केव्हाच फुटला होता. “आपला दादा किती ग्रेट आहे” असं म्हणत त्या नोटेकडे  आणि नोकरी साठी परगावी चाललेल्या लाडक्या भास्करदादाच्या पाठमोऱ्या आकृतीकडे पुन्हा पुन्हा पहात राहिली.

 

© सौ. मुग्धा कानिटकर

सांगली

फोन 9403726078

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ बलिप्रतिपदा–भाऊबीज ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

☆ विविधा ☆ धनत्रयोदिशी ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे  ☆ 

? दिन दिन दिवाळी—५ ?

!! बलिप्रतिपदा–भाऊबीज !!

शुभ दीपावली ! नवीन वर्षाच्या हार्दिक शुभेच्छा.नवीन वर्ष कसे ? तर महापराक्रमी राजा विक्रमादित्याच्या नावाने होणारी कालगणना आजपासून सुरू होते. आजपासून हे विक्रम संवत्सर सुरू होते.शालिवाहन शकानुसार चैत्री पाडवा हा वर्षारंभ मानला जातो.तर बलिप्रतिपदेपासून नवे व्यापारी वर्ष सुरू होते.दिवाळी पाडव्याला व्यापारी वही पूजनाची प्रथा महत्त्वाची असते.

या दिवशी सर्व वर्षातील व्यापाराचा आढावा घ्यायचा असतो.याच पद्धतीने आपण प्रत्येकाने आपल्या जीवनाचा ही आढावा घेतला पाहिजे.जुन्या वर्षातल्या राहिलेल्या गोष्टी,नवीन वर्षात करायच्या गोष्टी यासाठीचे नियोजन, जुने राग-द्वेष,  भांडणं विसरून पुन्हा नव्याने स्नेहबंध जुळवणे, श्रद्धा उत्साह वाढेल याकडे लक्ष दिले पाहिजे.

बलिराजाच्या स्मरणार्थ हा दिवस साजरा करतात. विरोचन पुत्र बली धर्मप्रिय, लोकप्रिय राजा होता. श्री विष्णूंनी त्याच्यासाठी वामन अवतार घेतल्याची कथा आपल्याला माहीत आहेच. हा बलिराजा उदार होता. त्याच्या गुणांचे स्मरण आपल्याला वाईट माणसातही असणारे चांगले गुण पाहण्याची दृष्टी देते.

कनक आणि कांता यामुळे माणूस असूर बनतो.म्हणूनच श्रीविष्णूंनी या दोघांकडे पाहण्याची विशिष्ट दृष्टी देणारे दोन दिवस प्रतिपदेच्या आगेमागे जोडून तीन दिवसांचा उत्सव साजरा करण्याचा आदेश दिला. त्यानुसार लक्ष्मीपूजनाला कनक म्हणजे लक्ष्मीला पूजण्याची पूज्य दृष्टी; तर भाऊबीजेला समस्त स्त्री वर्गाकडे आई किंवा बहिणीच्या मायेने पाहण्याची दृष्टी देणारे दोन दिवस येतात.थोडक्यात म्हणजे अज्ञान, मोह, लालसा, सत्ता यांच्या अंधारातून ज्ञान,श्रद्धा,सद्भावना यांच्या प्रकाशात जाण्याचा प्रयत्न सर्वांनी केला पाहिजे.

आजचा दिवस हा संकल्पासाठी एकदम शुभ  आहे. हा पाडवा साडेतीन शुभमुहूर्तांपैकी एक दिवस आहे. कोणत्याही कार्याची सुरुवात आजपासून करावी असे संकेत आहेत. हा दिवस पती-पत्नीच्या नात्यातील पावित्र्य जपणारा आहे.

याच्या दुसऱ्या दिवशी येते भाऊबीज.बहिण भावांच्या नात्यातील प्रेम, जिव्हाळा व्यक्त करणाऱ्या या दिवसाला  ‘यमद्वितीया’ असेही म्हणतात. याची एक कथा अशी सांगतात. यमराजाची बहिण यमुनाने या दिवशी आपल्या घरी त्याची पूजा केली, त्याला ओवाळले. यमराजाने तिला वरदान मागायला सांगितले. ती म्हणाली, “दरवर्षी या दिवशी तू माझ्याकडे जेवायला यायचेस. तसेच या दिवशी जो भाऊ स्वतःच्या बहिणीच्या हातचे जेवील त्याला तू सुख द्यायचेस.” यमराजाने यमुनेला तसा वर दिला म्हणून दरवर्षी  भाऊबीज साजरी होते

एका घरात हसत खेळत भाऊ बहीण मोठे होतात. त्यांच्यात जिव्हाळ्याचे, मायेचे, विश्वासाचे नाते  निर्माण होते. पुढे लग्न झाल्यावर बहिण सासरी जाते.सतत भेटत नाही. म्हणून मग भाऊबीजेच्या निमित्ताने तिला भेटून तिची खुशाली विचारायची,तिच्या सुखदुःखात सहभागी व्हायचे हा यामागचा उद्देश असतो. हे नाते असतेच अगदी हळुवार. कितीही अडचणी आल्या तरी आपला भाऊ आपल्या पाठीशी आहे याचा बहिणीच्या मनात दृढ विश्वास असतो आणि सुखदुःखाच्या गोष्टी बोलण्यासाठी भावाला बहिणीची आठवण येते.

या नात्याचा आज उत्सव असतो. आजकाल घरात एकच अपत्य असते. त्यामुळे सख्खी भावंडे कमी झालीत. पण चुलत, आत्ये, मामे,मावस भावंडं कोणतीही असोत हे नाते मनापासून जपावे हेच हा दिवस सांगतो. सर्वांना खूप खूप शुभेच्छा.

शुभ दीपावली.  ?

© सौ. ज्योत्स्ना तानवडे

वारजे, पुणे.५८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ राशी – फटाके – (दिवाळी मनोरंजन) ☆ श्री अमोल अनंत केळकर

श्री अमोल अनंत केळकर

☆ विविधा ☆ राशी – फटाके – (दिवाळी मनोरंजन) ☆ श्री अमोल अनंत केळकर ☆ 

(गेल्या काही वर्षांपासून दिवाळीत रात्री १० नंतर फटाके उडवण्यास बंदी यावर आम्ही एक सर्वे घेतला ज्यात वेगवेळ्या राशींच्या लोकांची मते जाणून घेतली.  राशी प्रमाणे उत्तरे साधारण अशी मिळाली *)

मेष: काय वाट्टेल ते होऊ दे रात्री  १० नंतरच फोडणार फटाके. ?

वृषभ: व्यवस्थित आवरून तयार व्हायला तसंही दरवर्षी ८ वाजतात च म्हणा ?

मिथुन: रात्री ८ ते १० इथे आणि सकाळी  ८ ते १० अमेरिकेतील वेळेप्रमाणे  इथेच फटाके फोडू ?

कर्क: दिवाळीत चंद्र नसताना आकाश दिवा, पणत्या यांचा प्रकाश हीच दिवाळी. लक्ष्मी पुजनाला मात्र मी फुलबाजी लावणारच. ?

सिंह: खरे बॉम्ब फोडणारे मस्त परदेशात एन्जॉय करतायत आणि शिक्षा कुणाला ?

रात्री १० नंतर फुसके फटाके फोडणारी लोकं….. ?

कन्या : किती ते प्रदूषण सध्या होतंय ना. दिवाळी अंक पण महागलेत. ८ ते १० रोज कुणा कुणा कडे जायचंय. यंदा फटाके खरेदी होईल असं वाटत नाही??‍♀

तुळ:  दिवाळीत रोज पाऊस पडावा. फक्त रात्री ८ ते १० पाऊस न पडावा ☔ म्हणजे फक्त त्याचवेळेत फटाके उडवावे लागतील आणि निर्णयाचा सन्मान होईल ⚖

वृश्चिक : अगरबत्तीला खालच्या बाजूल ला एका बाॅम्बची वात गुंडाळून असे असंख्य टाईम बाॅम्ब  रात्री १० नंतर मोक्याच्या जागी ठेऊन येईन ?

धनू  : नाही त्याच्या गल्लीत रात्री १२ वा बाण सोडला तर नावाचा/ नावाची  धन्नू नाही ?

मकर: रोज रात्री १० नंतर न उडलेले फटाके गोळा करायचे. तेच दुस-या दिवशी ८ ते १० या वेळेत उडवायचे ?

कुंभ : दिवाळीच्या आधी काहीतरी करुन हा निर्णय स्थगित कसा करता येईल हे पहायला पाहिजे.?

मीन: मार्केट एवढे पडले असताना ‘आय मिन’ काही गरज आहे का फटाके उठवण्याची? त्यापेक्षा ‘लक्ष्मी मित्तल’ चे शेअर्स घेऊन आत्तापासून मुंबई -गोवा सागरी प्रवासाची तयारी करु आणि फटाक्यांच्या आवाजाची कॅसेट विकत घेऊ.?

??????✨?

? (राशीतज्ञ) अमोल

* काल्पनिक

©  श्री अमोल अनंत केळकर

नवी मुंबई, मो ९८१९८३०७७९

poetrymazi.blogspot.in, kelkaramol.blogspot.com

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