हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ पुनर्पाठ – एक पत्र- अनाम के नाम ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

पुनर्पाठ –

☆ संजय दृष्टि  ☆ एक पत्र- अनाम के नाम ☆

(ब्लू व्हेल के बाद ‘हाईस्कूल गेम’ अपनी हिंसक वृत्ति को लेकर चर्चा में रहा। इसी गेम की लत के शिकार एक नाबालिग ने गेम खेलने से टोकने पर अपनी माँ और बहन की नृशंस हत्या कर दी थी। उस घटना के बाद लेखक की प्रतिक्रिया, उस नाबालिग को लिखे एक पत्र के रूप में मे कागज़ पर उतरी ।)

प्रिय अनाम..,

अपने से छोटे को यही संबोधन लिखने के अभ्यास के चलते लिखा गया ‘प्रिय’..पर नहीं तुम्हें ‘प्रिय’ नहीं लिख पाऊँगा। घृणित, नराधम, बर्बर जैसे शब्दों का भी प्रयोग नहीं कर पाऊँगा क्योंकि मेरे माता-पिता ने मुझे कटुता और घृणा के संस्कार नहीं दिये। वैसे एक बात बताना बेटा…!!! …, हाँ बेटा कह सकता हूँ क्योंकि बेटा श्रवणकुमार भी हो सकता है और तुम्हारे जैसा दिग्भ्रमित क्रूरकर्मा भी।….और मैंने देखा कि तुम्हारी कल्पनातीत नृशंसता के बाद भी टीवी पर तुम्हारा पिता, तुम्हें ‘मेरा बेटा’ कह कर ही संबोधित कर रहा था। …सो एक बात बताना बेटा, कटुता और घृणा के संस्कार तो तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें भी नहीं दिये थे, हिंसा के तो बिलकुल ही नहीं। फिर ऐसा क्या भर गया था तुम्हारे भीतर जो तुमने अपनी ही माँ और बहन को काल के विकराल जबड़े में डाल दिया!…उफ़!

जानते हो, आज सुबह अपनी सोसायटी के कुछ बच्चों को अपने-अपने क्रिकेट बैट की तुलना करते देखा। एक बच्चा बेहतर बैट खरीदवाने के लिए अपनी माँ से उलझ रहा था। माँ उसे आश्वासन दे रही थी कि उसे अच्छा, ठोस, मज़बूत और चौड़ा बैट खरीदवा देगी। अपनी माँ की हत्या करते समय तुम्हारे हाथ में जो बैट था, वह भी ठोस, मज़बूत और चौड़ा ही था न बेटा!…याद करो, बैट माँ ने ही दिलवाया था न बेटा!

माँ के आश्वासन के बाद उलझता यह बच्चा भी खुश हो गया। मैं सोच रहा था, कौन जाने उसके मस्तिष्क में तुम रोल मॉडेल की तरह बस जाओ। कहीं वह भी अभी से अपनी माँ के माथे की चौड़ाई और बैट की चौड़ाई की तुलना कर रहा हो। बैट इतना चौड़ा तो होना ही चाहिए कि एक ही बार में माँ का काम तमाम।…सही कह रहा हूँ न बेटा!

माँ ने शायद तुम्हें ‘हाईस्कूल गेम’ खेलने से रोका था। उन्हें डर था कि इस हिंसक खेल से तुम्हारे दिलो-दिमाग में हिंसा भर सकती है। तुम कहीं किसी पर अकारण वार न कर दो। गलती से, उन्माद में किसी की हत्या न कर बैठो।…माँ का डर सही साबित हुआ न बेटा!

जानकारी मिली है कि रोकने पर भी तुम्हारे ‘हिंसक गेम’ खेलते रहने पर चिंतित माँ ने तुम्हें एक-दो तमाचे जड़ दिये थे। तुम्हारी पीढ़ी, हमारे मुकाबले अधिक गतिशील है। हमने मुहावरा पढ़ा था, ‘ईंट का जवाब, पत्थर से दो’ पर तुमने तो चिंता का जवाब चिता से दे दिया दिया। इतनी गति भी ठीक नहीं होती बेटा!

.. और माँ ही क्यों..? वह नन्ही परी जो जन्म से तुम्हें राखी बाँधती आई, जिसने तुम्हें हमेशा रक्षक की भूमिका में देखा, जो संकट में तुम्हारी ओट को सबसे सुरक्षित स्थान समझती रही, ओट में ले जाकर उसकी ही अँतड़ियाँ तुमने बाहर निकाल दीं…बेटा!

खास बात बताऊँ, मरकर भी दोनों के मन में तुम्हारे लिए कोई दुर्भावना नहीं होगी। उनकी आत्मा चाहेंगी कि मेरे बेटे, मेरे भाई को दंड न हो, वह निर्दोष छूट जाए। सब कुछ लुट जाने के बाद तुम्हारा पिता भी तो यही चाहता है बेटा!

एक बात बताओ, खून से लथपथ माँ और बहन के पेट में कैंची और पिज्जा काटने का चाकू घोंपकर उनका मरना ‘कन्फर्म’ करते समय एक बार भी मन में यह विचार नहीं उठा कि इसी पेट में नौ महीने तुम पले थे बेटा!

तुम्हें जानकारी नहीं होगी इसलिए बता देता हूँ। मादा बिच्छू जब संतानों को जन्म देती है तो  नवजात बच्चे उसकी पीठ से चिपक जाते हैं। ये भूखे नवजात धीरे-धीरे माँ का पूरा शरीर खा जाते हैं। बच्चे को पालने के लिए माँ का मर जाना! …बिच्छू समझते हो न बेटा!

बहुत भयानक दंंश होता है बिच्छू का। पंद्रह वर्ष बच्चे को बड़ा करने के बाद उसीके हाथों अपना पेट फड़वाने से बेहतर है कि आनेवाले समय में स्त्री अपना पेट फाड़कर ही बच्चे को जन्म देने लगे। संतान का आगमन, माँ का गमन! ठीक कह रहा हूँ न बेटा!

ये बात अलग है कि तब संतानें पल नहीं पायेंगी। उन्हें अपने रक्त-माँस का दूध कर पयपान कौन करवायेगा? अपनी गोद में घंटों थपकाकर सुलायेगा कौन? खानपान, पसंद-नापसंद का ध्यान रखेगा कौन? ऐसे में तो माँ के चल बसने के कुछ समय बाद संतान भी चल बसेगी। न बाँस, न बाँसुरी, न सृष्टि का मूल, न सृष्टि का फूल! यही चाहते हो न तुम बेटा!

यही चाहते हो न तुम कि सृष्टि ही थम जाये। माँ न हो, बहन न हो, बेटी न हो, कोई जीव पैदा ही न हो। लौट जायें हम शून्य की ओर!…एक बात कान खोलकर सुन लो, अपवाद से परंपराएँ नहीं डिगतीं। निरी आँख से न दिखनेवाले सूक्ष्म जंतुओं से लेकर मनुष्य और विशालकाय हाथी तक में माँ और बच्चे की स्नेह नाल समान होती है। तुम्हारे कुत्सित अपवाद से अवसाद तो है पर सब कुछ समाप्त नहीं है।

…सुनो बेटा! अपनी माँ और बहन को खो देने का दुख अनुभव कर रहे हो न! ‘नेवर एंडिंग’ मिस कर रहे हो न। एक रास्ता है। उनकी ममता और स्नेह को मन में संजोकर तुम पार्थिव रूप से न सही परोक्ष रूप से माँ और बहन को अपने साथ अनुभव कर सकते हो। तुम्हारा जीवन सुधर जाये तो वे मरकर भी जी उठेंगी।

सद्मार्ग से आगे का जीवन जीने का संकल्प लेकर अपनी माँ और बहन को पुनर्जीवित कर सकते हो।…..करोगे न बेटा..!!

 

©  संजय भारद्वाज 

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 30 ☆ ऑफिसियल भाषा…..….. ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु‘

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “ऑफिसियल भाषा…..। यह रचना ऑफिस या कार्यालय के कार्यप्रणाली , मनोविज्ञान  और भाषा  और  का सार्थक विश्लेषण करती है । इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – ऑफिसियल भाषा# 30

समय के साथ व्यक्ति के  व्यवहार का बदलना कोई नयी बात नहीं है;  परिवर्तन तो प्रकृति भी करती है ; तभी तो  दिन रात होते हैं , पतझड़ से हरियाली ;   फिर अपने  चरम उत्कर्ष पर बहारों का मौसम ये सब हमें सिखाते हैं, समय के साथ बदलना सीखो, भागना और भगाना सीखो, सुधरना और सुधारना सीखो , बैठो और बैठाना सीखो ।

अब राधे लाल जी को ही देखिए जब तक काम करते रहो तब तक वो सिर पर बैठाते हैं और जैसे ही सलाह देने की हिमाकत की तो तुरंत यू टर्न लेते हुए घर बैठो की बात पर उतर आते हैं ; जिससे सारे लोग मन ही मन उनसे खफा रहते हैं । पर  क्या किया जाय जो नेतृत्व करेगा उसे तो कठोर होना ही पड़ेगा अन्यथा सभी  ज्ञान योगी बन कर ज्ञान बाटेंगे  तो कार्य कैसे पूरे होंगे ।

एक दिन की बात है;   मीटिंग चल रही थी, लोगों का ध्यान प्रोजेक्ट पर कम इस बात पर ज्यादा था कि लंच में क्या- क्या  पकवान रखे गए हैं ।  प्रोजेक्ट हेड ने प्रश्न पूछा तो विनीता मैम  अनमने मन से कुछ और बोल गयीं जिससे वहाँ बैठे अन्य लोग हँसने लगे तो  हेड बॉस ने भड़कते हुए कहा  भागिए यहाँ से , जो भागता नहीं उसे मैं भगाना भी जानता हूँ ।

अब तो मैडम जी ने आव देखा न ताव उठकर चल  दीं ।  लोगों ने  उन्हें रोका फिर एक अन्य महिला कर्मी ने जो अपने आप को कंपनी की प्रवक्ता मानती हैं , उन्होंने समझाया दरसअल सर का उद्देश्य स्पीड से है,  आप भी समय के साथ तेजी से भागिए यदि नहीं भाग सकतीं तो सर  आपको भागना भी सिखा देंगे  और आप गलत समझ बैठी  तब विनीता जी ने भी बेमन से हाँ में हाँ मिलाते हुए हाँ ऐसा ही होगा  मैं ही न समझ हूँ  ऑफिसियल भाषा समझने में जरा कच्ची हूँ ;  वो तो भला हो आपका जो आपने मेरी नौकरी बचा ली अन्यथा घर बैठना पड़ता ।

ये तो आये दिन की बात हो गयी थी  हेड बॉस  जमकर अपशब्दों का प्रयोग करते और लोग भी मजबूरी में  काम करते रहते ,लोगों को उनके टारगेट पूरा करने के बहाने बहुत प्रताड़ित किया जाता । जब पानी सर से ऊपर जाने लगता है ; तो लोग हाथ पैर मारते ही हैं सो सभी कर्मचारियों ने एकजुट होकर एक सुर में कहा आप ऑफिसियल भाषा के नाम पर अपमान नहीं कर सकते आपको अपना व्यवहार बदलना होगा तभी हम लोग काम करेंगे अन्यथा नहीं ।

जब ये बात ऊपर तक पहुँची तो बड़े सर आये उन्होंने स्नेहिल शब्दों से सबका दिल जीत लिया ।

ये सारे ही शब्द अगर हम क्रोध के वशीभूत होकर सुनेंगे तो इनका अर्थ कुछ और ही होगा किंतु  यदि सकारात्मक  विचारधारा से युक्त परिवेश में कोई इसे सुने तो उसे इसमें सुखद संदेश दिखाई देगा ।

जैसे भागना का अर्थ केवल  जिम्मेदारी से मुख मोड़ कर चले जाना नहीं होता अपितु समय के साथ तेज चलना, दौड़ना,भागना और औरों को भी भगाना ।

सबको  प्रेरित करें कि अभी समय है सुधरने का , जब जागो  तभी सवेरा, इस मुहावरे को स्वीकार कर अपनी क्षमता अनुसार एक जगह केंद्रित हो कार्य करें तभी सफलता मिलेगी ।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन# 60 – हाइबन – नभ में छवि ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक हाइबन   “नभ में छवि। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन  # 60 ☆

☆ नभ में छवि ☆

आठ वर्षीय समृद्धि बादलों को उमड़ती घुमड़ती आकृति को देखकर बोली, ” दादाजी ! वह देखो । कुहू और पीहू।” और उसने बादलों की ओर इशारा कर दिया।

बादलों में विभिन्न आकृतियां बन बिगड़ रही थी, ” हाँ  बेटा ! बादल है ।” दादाजी ने कहा तो वह बोली, ” नहीं दादू , वह दादी है।” उसने दूसरी आकृति की ओर इशारा किया, ”  वह पानी लाकर यहां पर बरसाएगी।”

“अच्छा !”

“हां दादाजी, ”  कहकर वह बादलों  को निहारने लगी।

नभ में छवि~

दादाजी को दिखाए

दादी का फोटो।

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 38 ☆ गीत – धरती गई उसारे में ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण  गीत  “धरती गई उसारे में .)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 38 ☆

☆ गीत – धरती गई उसारे में ☆ 

अनगिन दीपक नए जले हैं

कुछ डूबे अँधियारे में

रिश्तों के ये महाबन्ध हैं

बात गईं चौबारे में।।

 

कभी बजे थे ढोल-मृदंगा

नर्तन की शहनाई थी

वही पड़ा शमशान लोक में

डूब गई तरुणाई थी

थे जिससे मधु-राग-फाग से

फिर से चौड़ी खाई थी

 

सावन की मल्हारें छूटीं

छूटा मेड़ों-हारों में।।

 

भाग रहे सब यंत्रवती से

बूढ़े हैं तन्हाई में

कोई श्रम कर स्वेद बहाए

कुछ हैं माल-मलाई में

जीवन के सब अर्थ खो रहे

छूटा धान गहाई में

 

काम हो रहे बड़े-बड़े अब

धरती गई उसारे में।।

 

मूल्यों पर आघात प्रपंची

शोर शराबा मेला है

जो था हीरा कभी कैरटी

आज वही अब धेला है

गुरू हो रहे गुड़ गोबर अब

चीनी-शक्कर चेला है

 

सत्ता-कुर्सी उलझ रही हैं

सब कुछ डूबा नारे में।।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ वे कहते थे… – स्व वासुदेव प्रसाद खरे ☆ श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव

श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव

(श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव जी का उनके पिताश्री स्वर्गीय वासुदेव प्रसाद खरे  की स्मृति में विशेष आलेख।)

☆ संस्मरण – वे कहते थे… – स्व वासुदेव प्रसाद खरे ☆

वे कहते थे… लोग तुमसे मदद मांगते हैं क्योकि तुम उस  काबिल हो।

“भगवान ने तुमको  टेबिल के उस पार बैठाया है, तो तुम्हें भगवान का काम करना चाहिये, क्योकि भगवान खुद अपने हाथों से कुछ नहीं करता वह तुम्हें सामने वाले की मदद के लिये माध्यम के रुप में चुनता है.”  मेरे पिता स्व वासुदेव प्रसाद खरे आजाद भारत शासन के समय के डिप्टी कलेक्टर थे. वे कमिश्नर होकर रिटायर हुये. पर जीवन भर वे आम आदमी के मददगार जन सेवक बने रहे.

वे सागर जिले के पंजीकृत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे हैं. उन्हें ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया गया था ।

हम सातो भाई बहनो को संस्कारित परवरिश दी और आज मेरे बड़े भाई अनेक राष्ट्रपति पुरस्कारो से सम्मानित सागर के आई जी श्री के पी खरे तथा हम सभी भाई बहन अपने अपने जीवन साथियो के साथ सात स्तंभों के रूप में सभी उच्च प्रथम श्रेणी पदों पर सेवारत हैं और मम्मी पापा की इस सीख के ध्वज संवाहक हैं. शायद स्वर्गीय पापा मम्मी की इसी सीख को उनके आशीष स्वरूप स्वीकारने के कारण ही हमारी अगली पीढ़ी के सभी बच्चे भी एक से बढ़कर एक वैश्विक प्रतिभा के रूप में संवर रहे हैं और उनमें परस्पर आत्मिक प्रेम ही नही सामने वाले की हर संभव मदद करने का जन्मजात जज्बा देखने मिल रहा है. हम बच्चो में इस स्वउद्भूत संस्कार को  अपने बुजुर्गो का आशीर्वाद मानते हैं.  “महाकाव्य देवयानी” व अन्य अनेक किताबें उनकी स्मृतियां अक्षुण्य बनाये हुये हैं.

©  श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ रमती गौराईच्या पूजनी ☆ सौ.मुग्धा कानिटकर

 

☆ कवितेचा उत्सव : रमती गौराईच्या पूजनी ☆ सौ.मुग्धा कानिटकर ☆

 

मातेचा सांगावा ऐकून

माहेरवाशीण येई धावून

सख्या साऱ्या जमून

संसारी व्यथा सोडून

रमती गौराईच्या पूजनी

जाई जीवन उजळुनी

 

नेसून साडी नऊवार

लेवून नथ मोत्यांचा सर

माळून मोगऱ्याची माळ

चाफ्याचे शोभे फूल

रमती गौराईच्या पूजनी

जाई जीवन उजळुनी

 

समजून   नाती घेता

उमजून नव्या प्रेरणा

मेळवून जुन्या नव्या

सामावून घेत पिढ्या

रमती गौराईच्या पूजनी

जाई जीवन उजळुनी

 

उणेदुणे जाती विसरून

अंगणी फुगड्या खेळून

झिम्मडती आनंदी होऊन

गाणी गौराईची गाऊन

रमती गौराईच्या पूजनी

जाई जीवन उजळुनी

 

©  सौ.मुग्धा कानिटकर

सांगली

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ फुलले हसू… ☆ श्री सतीश स. कुलकर्णी

श्री सतीश स.कुलकर्णी 

अल्प परिचय  
सतीश स. कुलकर्णी : साधारण तीस वर्षांपासून पत्रकारितेत. ‘केसरी’, ‘लोकसत्ता’ ह्या दैनिकांमध्ये उपसंपादक ते वृत्तसंपादक. तीन वर्षांपासून मुक्त पत्रकारिता व व्यावसायिक लेखन, ब्लॉगलेखन. ‘एबीपी माझा’ वृत्तवाहिनीच्या ‘डिजिटल महाराष्ट्र’ उपक्रमात  khidaki.blogspot.com ब्लॉगला पहिल्या क्रमांकाचे बक्षीस. ललित लेखनाचे ‘शब्दसंवाद’  पुस्तक प्रकाशित. शब्दांकन, संपादन, पुनःलेखन, मुद्रितशोधन, पुस्तक परिचय आदी काम व्यावसायिक तत्त्वावर करतो.

☆ विविधा : फुलले हसू… ☆ श्री सतीश स. कुलकर्णी ☆

(डॉ. एडनवाला ह्यांना ‘स्माईल ट्रेन’ चा जीवनगौरव पुरस्कार अभिनेत्री ऐश्वर्या रायच्या हस्ते देण्यात आला.)

अहमदनगरचा स्थापना दिन २८ मे रोजी असतो. यंदा त्याच्या एक दिवस आधीच शहरानं आपला एक सुपुत्र गमावला. केरळातील त्रिशूर येथे जवळपास ६० वर्षे राहिलेल्या डॉ. हिरजी सोराब एडनवाला ह्यांनी २७ मे रोजी अखेरचा श्वास घेतला. ‘स्माईल मेकर’ ही त्यांची सर्वदूर असलेली ओळख.

कोण होते हे डॉ. एडनवाला? नगरशी त्यांचा नेमका काय आणि कसा संबंध? त्यांचा जन्म १९३० मध्ये नगर येथे झाला. भिंगार कँप परिसरातील ११, नगरवाला रस्ता पत्त्यावरचा बंगला, हेच डॉ. एडनवाला ह्यांचं जन्मस्थळ. त्यांचं आजोळ नगर. त्यांची आई होमाई होरमसजी नगरवाला. पत्नी गुलनारही नगरनिवासीच. ते वाढले मुंबईमध्ये. तिथे वैद्यकीय शिक्षण घेतले आणि त्यानंतर त्रिशूर (केरळ) येथेच स्थायिक झाले. त्यांच्या निधनाची बातमी ‘पारशी टाइम्स’मध्ये प्रसिद्ध झाली.

दुभंगलेले ओठ आणि टाळूच्या जन्मजात व्यंगामुळे अनेक मुलांचं आयुष्य बिकट होतं. व्यंगामुळे चेहरा विकृत होतो; बोलताना त्रास होतो. समाजात टिंगलटवाळी वाट्याला येते आणि ती मागे पडत जातात. हे जन्मजात व्यंग शस्त्रक्रियेने दूर करून ह्या मुलांच्या आयुष्यात हसू फुलवणं हेच डॉ. एडनवाला ह्यांनी जीवनध्येय मानलं. प्रदीर्घ कारकीर्दीत अशा १६ हजार मुलांवर शस्त्रक्रिया केल्या.

वैद्यकीय शिक्षणानंतर डॉ. एडनवाला ह्यांनी आपलं कार्यक्षेत्र म्हणून त्रिशूरच्या ‘ज्युबिली मिशन हॉस्पिटल’ची १९५८मध्ये निवड केली. अखेरच्या क्षणापर्यंत ते तिथेच कार्यरत राहिले. दुभंगलेले ओठ व टाळू ह्या व्यंगामुळे मुलांना किती त्रास होतो, हे सुरुवातीच्या काही वर्षांत त्यांच्या लक्षात आलं आणि हे दुःख दूर करण्याकडे त्यांनी लक्ष केंद्रित केलं. त्यांच्या प्रयत्नांमुळे ह्या रुग्णालयातील ‘चार्ल्स पिंटो क्लेफ्ट सेंटर’ ह्या शस्त्रक्रियांचे भारतातील अग्रणी केंद्र बनले.

दुभंगलेले ओठ-टाळूवरची शस्त्रक्रिया खर्चिक आहे. अनेक पालकांना हा खर्च परवडणारा नसतो. दूरवरून येणाऱ्या गरीब पालकांना डॉ. एडनवाला ह्यांनी कधी निराश केलं नाही. रुग्णालय, मित्र आणि काही संस्था ह्यांच्या मदतीने ते ह्या मुलांवर मोफत शस्त्रक्रिया व उपचार करीत.

ह्याच व्यंगावर विविध देशांमध्ये उपचार करणारी, त्यासाठी पुढाकार घेणारी स्वयंसेवी संस्था म्हणजे ‘स्माईल ट्रेन’. साधारण २० वर्षांपूर्वी डॉ. एडनवाला ह्या संस्थेबरोबर काम करू लागले. मग ते संस्थेचाच एक घटक बनले. त्यांच्या निधनानंतर ‘स्माईल ट्रेन’ ने संकेतस्थळावर विशेष श्रद्धांजली लेख प्रसिद्ध केला.

हसू फुलविण्याचे हे मिशन डॉ. एडनवाला ह्यांनी अगदी काही महिन्यांपूर्वीपर्यंत चालविले. नव्वदीच्या घरात असलेल्या या शल्यविशारदाने शेवटची शस्त्रक्रिया २०१९च्या डिसेंबरमध्ये केली.  श्री बेहेराम नगरवाला सांगतात की, आपला जन्म जिथं झाला, त्या घराबद्दल त्यांना फार जिव्हाळा होता. घराजवळचा हौद, तिथलं चिंचेचं झाड, आईने लावलेलं चिकूचं झाड ह्याची ते नेहमी आठवण काढीत. अगदी अलीकडेच त्यांनी घराचे फोटो मागविले होते. ते पाठवण्यापूर्वीच त्यांच्या निधनाची बातमी आली.

… सविस्तर लेख वाचण्यासाठी इथं भेट द्या >> – https://khidaki.blogspot.com/2020/07/Adenwalla.html

 

©  श्री सतीश स.कुलकर्णी 

संपर्क – shabdkul@outlook.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

 

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला भावलेला गणेश … ☆ सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई 

☆ विविधा : मला भावलेला गणेश … ☆ सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई ☆

 

परवाच संकष्टी झाली गणपतीची आरती आणि नंतर गणपती अथर्वशीर्ष म्हणू लागलो ओम नमस्ते गणपतये त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि…… त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासी असं म्हणून झालं आणि माझ्या मनात गणेश तत्वा बद्दल विचार सुरू झाले. गणपती, गणेश, गजानन, विनायक, अशी गणेशाची कितीतरी नावं आहेत. हत्तीचे मुख असलेली रत्नजडित किरीट घातलेली तुंदिल तनु असलेली जवळ उंदीर घेतलेली अशी सुंदर पार्थिव मूर्ती हीच गणेश का?

मला भावलेला गणेश यापेक्षा आणखी कितीतरी वेगळा आहे. प्रत्येक गोष्टीला दोन रूप असतात. एक डोळ्याला दिसणार किंवा व्यक्त रूप आणि दुसर डोळ्याला न दिसणारे सूक्ष्म किंवा अव्यक्त रूप. भाव हा सूक्ष्म असतो. त्यामुळे मला भावलेलं गणेशाचे रूप हे सूक्ष्म स्वरूपाचं असं आहे.” गण” याचा अर्थ संख्या किंवा मोजणे मोजमाप करणे वगैरे. ब्रम्ह हे अनंत अपरिमित आहे. या ब्रम्हातूनच अनेक ब्रम्हांडांचा जन्म झाला. त्यातलाच एक अगदी छोटा भाग आपलं जग. जग हे अनंता पासून सांता पर्यंत व अपरिमितापासून परिमिता पर्यंत येत तेव्हा ते मोजमाप करण्यायोग्य होत. ही  मोजमाप करणारी शक्ती गणित तज्ञांचा गणित तज्ञ तोच गणेश. प्रत्येक गोष्टीला एक मिती असते जसं चिकू आंबा फणस यातील प्रत्येकाचं पान ,फुल, फळ निरनिराळ असत. आंब्याच्या झाडाला लिंबू किंवा चिकू लागत नाही. किंवा गुलाबाला जाई जुई चमेली ही फुलं लागत नाहीत. अशी निसर्गात एक नियमबद्धता आहे ही नियमबद्धता जेव्हा असंतुलित होते, तेव्हा निसर्गच  ती संतुलित करण्याचा प्रयत्न करू लागतो. आणि मग भूकंप, ज्वालामुखी, अतिवृष्टी ,अनावृष्टी, साथीचे  आजार अशा गोष्टी घडायला लागतात. निसर्गाची ही नियमबद्धता टिकविणारा नियंत्राता तोच गणेश.

आपले जग हे पृथ्वी, आप ,तेज, वायु आकाश अशा पंचमहा तत्वांनी बनलेले आहे. ही पाच तत्वे ठराविक प्रमाणात एकमेकात मिसळून त्याचे पंचीकरण झाले. उदाहरण अर्ध्या आकाश तत्वात पुरलेली चारही तत्वे प्रत्येकी एक अष्टमांश अशी गणना झाली. या गणनेच्या मुळाशी असलेली अधिष्ठात्री देवता (त्वं मूलाधार स्थितोसी नित्यम). ती शक्ती म्हणजेच गणेश.

ही सृष्टी ओमकारातून जन्माला आली व प्रत्येक गोष्ट ओ मच आहे असे मांडुक्य उपनिषदात सांगितले आहे. आकाशातून पृथ्वीवर पडणारा पाऊस हे जलतत्त्व ,आकाशाकडे झेपावणाऱ्या ज्वाळा किंवा उष्णता हे अग्नी तत्व, या दोन्ही मधील गाठ हे पृथ्वीतत्त्व, तेथून निघणारी रेषा हे वायू तत्व ,वरील चंद्रकोरीची दोन्ही टोके, मन आणि बुद्धी .आणि त्यावरील टिंब हे चैतन्य.  आणि हे  सगळं सगळं ज्याच्या मध्ये सामावलं आहे ते आकाश तत्व. .अशीही अष्टधा प्रकृती तोच गणेश.

एक वैज्ञानिक अर्थही मला भावला आहे. पदार्थाचा वस्तूचा सगळ्यात लहान घटक म्हणजे अणू. अणू केंद्रकात प्रोटॉन भोवती न्यूट्रॉन फिरत असतो. व त्यांच्या बाहेरून इलेक्ट्रॉन फिरत असतो. त्याची अष्टक स्थिती प्राप्त करून त्याला स्थिर होण्यासाठी धडपड असते. त्याची गणना करून त्याला स्थिर होण्यासाठी पूरक बनून त्याची आठ आकड्यापर्यंत गणना करून देतो ती शक्ती म्हणजेच गणेश .कदाचित अष्टविनायकाची संकल्पना यावरूनही पुढे आलेली असावी.

निर्मिती करणारा ब्रम्हा, सातत्य राखणारा विष्णू, आणि विलय करणारा तो महेश या सर्व शक्ती म्हणजेच गणेश आपण तरी काय करतो? पार्थिव गणपती घरी आणतो. आनंदाने कौतुकाने त्याची पूजा करतो. उत्सव करतो आणि विसर्जन म्हणजे पृथ्वी तत्वात विलय करतो. हेच चक्र निसर्गात चालू आहे. झाडे पर्वत बेटे यांची  उत्पत्ती होते. स्थैर्य येते आणि आणि विलय होतो. आणि परत पुन्हा नवीन जन्म! आणि या या सगळ्यासाठी लागणारी शक्ती तोच गणेश. या विश्वाच्या मागे राहून कार्य करणारी शक्ती म्हणजे एक फार मोठे रहस्य आहे. हे गूढ आहे.  उलगडणे ही तितकेच अवघड व कठीण काम आहे. आणि ते काम करणारा ज्ञानमय विज्ञानमय असा गणेश च असतो. गणेश उत्सव सुरू झाला आहे.. सर्व शक्तीच्या प्रतीकांची पार्थिव गणेशाची पूजा करीत असताना निसर्गाचा समतोल राखून त्याचे रक्षण करणे हीच भावात्मक पूजा खऱ्या या अर्थाने पूजा होईल आणि गणेश प्रसन्न होईल.

 

© सौ. पुष्पा नंदकुमार प्रभुदेसाई

मो. ९४०३५७०९८७

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

 

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ कामाचे नियोजन … ☆ सुश्री अमृता देशपांडे 

☆ मनमंजुषेतून : कामाचे नियोजन… ☆ सुश्री अमृता देशपांडे

काम   काम  काम

आज काय केलं? ..आज काय झालं? ….. हे रात्री कागदावर उतरवण्यापेक्षा आज काय करायचं आहे, हे सकाळीच कागदावर नमूद करणं मला जास्त योग्य वाटतं. अशी कामांची यादी करत असताना ‘ आजच करणे आवश्यक आहे ‘ अशा कामांना प्राधान्य दिले जाते. अगदी देवाच्या फुलवायची तुपात भिजवण्या पासून बँकेत FD पुनर्जीवित करण्यापर्य॔त, घरातले पडदे धुवायला काढण्या पासून गाडीचा टायर बदलण्या पर्यंत, स्वयंपाकघरातला ओला पुसायचा स्पंज ते मागील दारातील पायपुसणे आणण्या पर्यंत, खिडक्यांचे गज स्वच्छ करण्यापासून पाण्याच्या टाक्या स्वच्छ करण्या पर्यंत, सर्व कामांना सारखंच आणि महत्त्वाचं स्थान मिळतं. एकदा का यादी तयार झाली की स्वतःलाच best of luck देऊन ती कामे पार पाडण्याच्या तयारीला मी लागते.देवपूजेनंतर त्या दिवसाच्या कामाची यादी देवासमोर ( मनात) ठेवली की वाटतं, अर्धं काम झालं.वेळेचं व्यवस्थापन महत्वाचं.

सुरवातीला केलीच पाहिजेत (must) अशी यादीत न घालायची कामे सुध्दा असतातंच की. ती तर रोजची. अंघोळ, पूजा, नाश्ता, स्वयंपाकाची तयारी आणि स्वयंपाक.  पिण्याचे पाणी उकळून थर्मास भरणे, अशी अनेक. ती सर्व करता करता मध्येच बाहेर जाऊन बिलं भरणे, पण हल्ली online payment मुळे खूपच फायदा झाला आहे. जेवण झालं की आवरा आवरी  करून वर्तमानपत्र हातात घेते.कोडं सोडवता सोडवता एक डुलकी काढतेच. एखादा wrong number किंवा idea वाले, बँकेत खातं उघडायला सांगणारा फोन दुपारी जागं करायला मदतच करतात.

काही कामं अचानक समोर येतात. सकाळी मुलांची शाळेला जायची रवानगी करताना भराभर सगळं आवरून झालं की, आठ वर्षाचा चंद्रू, ”  आई, चड्डीचं बटण तुटलं” म्हणतो तेव्हा शिवण्याचं काम जसं पटकन करावं लागतं तसं अनेक कामे ” मी आधी मी आधी ” म्हणत उभी ठाकतात. एकेक काम हातावेगळं करताना, आणि एकावेळी दोन तीन कामांचा फडशा पाडताना अष्टभुजा देवी संचारल्याचा भास होतो. संध्याकाळ कधी होते कळतच नाही.

निजताना यादीतली झालेली कामे  टिक् करताना झालेला आनंद खूप सुख आणि समाधान देतो. स्वतःवर खूष होऊन ” अपनेपे गुरूर आ जाता है” म्हणत मीच पाठीवर शाबासकी देते. दिवसभरात वेळोवेळी मदत केल्याबद्दल देवाचे मनोमन आभार मानून शांतपणे उशीवर विसावते.

हां! उरलेली कामे  carry forward…… कारण कागदावरची कामे आणि प्रत्यक्ष होणारी कामे यांत माझी होणारी कसरत फक्त मीच जाणे.

पण  काहीच न करण्या पेक्षा दुसर्यावर अवलंबून न रहाता कामे करणे मला जास्त उचित वाटतं. त्यामुळे Time management, work management, situation handle करणे, priorities ठरवणे अशा  management च्या अनेक कला, skills, मी आत्मसात केल्या आहेत. कुठलंही लहान काम कमी महत्वाचं नसतं. Each work has it’s own dignity. म्हणून प्रत्येक काम महत्वाचेच असते.

Mother Teresa यांचं एक वाक्य आहे- Do small things with great love. ” कित्ती खरं आहे ना!

कुठलंही काम लहान असो  वा मोठं असो, ते जर प्रेमाने, आपुलकीने, नेकीने केलं तर ते काम केल्याचा त्रास जाणवत नाही, दमायला होत नाही, कंटाळा येत नाही. काम करण्याची सवय लागते. काहीतरी  छान करण्याची नशा काही औरच असते.  कारण मिळणारा आनंद हा स्वर्गीय असतो.

 

© सुश्री अमृता देशपांडे

पर्वरी – गोवा

मो.  9822176170

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

 

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – षोडश अध्याय (21) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दैवासुर संपद्विभाग  योग

(शास्त्रविपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरणों के लिए प्रेरणा)

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌।।21।।

काम, क्रोध औ” लोभ हैं तीन नरक के द्वार

इनका करके नाश, नर करें आत्म उद्धार।।21।।

 

भावार्थ :  काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को ‘नरक के द्वार’ कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।।21।।

 

Triple is the gate of this hell, destructive of the self-lust, anger, and greed,-therefore, one should abandon these three.।।21।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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